02. स्मृति – पाठ का सार

स्मृति पाठ का सारांश

  • प्रस्तुत पाठ या संस्मरण श्रीराम शर्मा जी द्वारा लिखा गया है। इसमें लेखक ने अपनी बाल्यावस्था की एक अविस्मरणीय घटना का वर्णन किया है, जिसमें उन्होंने एक साँप से लड़कर चिट्ठियों को सुरक्षित किया।
  • संस्मरण के अनुसार, ठंड का मौसम चल रहा था। एक दिन शाम को, जब लेखक अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, तभी एक आदमी ने उन्हें बताया कि उनके छोटे भाई ने बुलाया है। लेखक डरे हुए अपने भाई के साथ घर की ओर चल पड़े।
  • लेखक के मन में किसी गलती के कारण पिटने का डर था। घर पहुँचने पर, उन्होंने देखा कि उनके बड़े भाई चिट्ठी लिख रहे हैं। बाद में, बड़े भाई ने उन्हें चिट्ठियाँ दीं और कहा कि उन्हें मक्खनपुर पोस्ट ऑफिस में भेजना है।
  • लेखक और उनके छोटे भाई ने चिट्ठियाँ अपनी टोपी में रखीं और डंडे लेकर चल पड़े। वे गाँव से चार फर्लांग दूर उस कुएँ के पास पहुँचे, जहाँ एक भयंकर काला साँप था। कुआँ कच्चा था और लगभग चौबीस हाथ गहरा था।
  • लेखक ने एक ढेला उठाया और एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर ढेला मार दिया। इस दौरान तीनों चिट्ठियाँ कुएँ में गिर गईं। लेखक को ऐसा लगा जैसे उनकी जान निकल गई हो। दोनों भाई कुएँ के पास बैठकर रोने लगे। कुछ समय बाद, उन्होंने तय किया कि लेखक कुएँ के अंदर जाकर चिट्ठियाँ निकालेंगे।
  • उन्होंने धोतियों और रस्सियों को बाँधकर एक बड़ी रस्सी बनाई। रस्सी के एक छोर पर डंडा बाँधकर उसे कुएँ में डाला गया। लेखक ने रस्सी के दूसरे छोर को अपने छोटे भाई के हाथ में दिया। कुएँ के अंदर साँप फ़न फैलाए बैठा था।
  • लेखक धीरे-धीरे कुएँ में उतरने लगे। उनकी आँखें साँप के फ़न पर थीं, लेकिन जहाँ साँप था, वहाँ डंडा चलाने की जगह नहीं थी। लेखक को लगा कि उनकी योजना असफल हो रही है। साँप ने उन पर कोई हमला नहीं किया, इसलिए उन्होंने डंडे से साँप के फ़न को दबाने की कोशिश नहीं की।
  • ज्यों ही लेखक ने डंडा चिट्ठियों की ओर बढ़ाया, साँप ने विष डंडे पर छोड़ दिया। लेखक का डंडा हाथ से छूट गया। साँप ने डंडे पर लगातार तीन बार प्रहार किया। लेखक के छोटे भाई को डर हुआ कि कहीं साँप ने लेखक को डस तो नहीं लिया।
  • लेखक ने डंडा उठाकर चिट्ठियाँ उठाने का प्रयास किया, लेकिन साँप ने फिर से वार किया। इस बार लेखक ने डंडा नहीं गिरने दिया। जैसे ही साँप का पिछला भाग लेखक के हाथों में लगा, उन्होंने डंडा फेंक दिया। तभी लेखक ने चिट्ठियाँ उठाईं और रस्सी में बाँध दिया।
  • रस्सी से बंधी चिट्ठियाँ ऊपर खींची गईं। नीचे गिरे डंडे को साँप के पास से लेने में बहुत कठिनाई हुई। लेखक को हाथों के बल पर ऊपर चढ़ना था। ग्यारह वर्ष की उम्र में 36 हाथ चढ़ने का साहसिक कार्य उन्होंने किया।
  • लेखक और उनके छोटे भाई ने वहीं पर विश्राम किया। जब लेखक ने 10वीं की परीक्षा पास की, तो उन्होंने यह साहसिक घटना अपनी माँ को सुनाई। उस समय उनकी माँ ने उन्हें अपनी गोद में बैठाकर उनकी प्रशंसा की।

श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय

  • प्रस्तुत पाठ या संस्मरण के लेखक श्रीराम शर्मा जी हैं। इनका जीवनकाल 1896 से 1967 तक रहा। शुरुआती दौर में अध्यापन कार्य करने के बाद वे स्वतंत्र रूप से लम्बे समय तक राष्ट्र और साहित्य सेवा में जुटे रहे। श्रीराम शर्मा जी हिन्दी में ‘शिकार साहित्य’ के अग्रणी लेखक माने जाते हैं।
  • इन्होंने ‘विशाल भारत’ के सम्पादक के रूप में विशेष ख्याति हासिल की। श्रीराम शर्मा जी की प्रमुख रचनाएँ हैं:
    • शिकार
    • बोलती प्रतिमा
    • जंगल के जीव (शिकार संबंधी पुस्तकें)
    • सेवाग्राम की डायरी
    • सन् बयालीस के संस्मरण

स्मृति पाठ के कठिन शब्द शब्दार्थ

  • परिधि – घेरा
  • एकाग्रचित्तता – स्थिरचित्त 
  • सूझ – उपाय
  • समकोण – 90° कोण
  • चक्षु:श्रवा – आँखों से सुनने वाला
  • आकाश-सुमन – कोरी कल्पना
  • पैंतरों – स्थिति
  • अचूक – खाली ना जाने वाला 
  • अवलंबन – सहारा
  • कायल – मानने वाला
  • गुंजल्क – गुत्थी
  • ताकीद – बार-बार चेताने की क्रिया
  • डैने – पंख
  • चिल्ला जाड़ा – बहुत अधिक ठण्ड 
  • आशंका – डर
  • मज्जा – हड्डी के भीतर भरा मुलायम पदार्थ
  • ठिठुर – काँपना 
  • झूरे – तोड़ना 
  • मूक – मौन 
  • प्रसन्नवदन – प्रसन्न चेहरा
  • उझकना – उचकना 
  • किलोले – क्रीड़ा 
  • मृगसमूह – हिरनों का झुण्ड
  • प्रवृत्ति – मन का किसी विषय की ओर झुकाव 
  • मृगशावक – हिरन का बच्चा
  • दाढ़ें – ज़ोर-ज़ोर से रोना
  • उद्वेग – बैचैनी 
  • कपोलों पर – गालों पर
  • दुधारी – दो तरफ़ से धार वाली
  • दृढ़ – पक्का
  • आलिंगन – गले लगना
  • आश्वासन – भरोसा
  • अग्र भाग – अगला हिस्सा
  • प्रतिद्वंदी – विपक्षी