प्रस्तुत पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। यह कथा प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश-रूप में दिए गए फैसले पर आधारित है।
‘सत्यमेव जयते’ परंतु सत्य की विजय के लिए भी प्रमाण की आवश्यकता होती है। सत्य की जीत, निष्पक्ष और उचित न्याय प्रमाण के बिना नहीं हो सकता। अतएव ‘विचित्र साक्षी’ नामक प्रस्तुत पाठ में चोरी के अभियोग में साक्ष्य के अभाव में न्यायाधीश निर्णय नहीं कर सकता। परंतु न्यायाधीश बंकिमचंद्र महोदय प्रमाण के अभाव में अपनी बुद्धि की चतुरता से साक्ष्य उपस्थित करने में सफल होते हैं।

कोई निर्धन जन बहुत परिश्रम से धन अर्जित कर अपने पुत्र को किसी महाविद्यालय में प्रवेश दिलवाता है। छात्रावास में रहने वाले अपने पुत्र की बीमारी सुनकर पुत्र को देखने के लिए जाता है। रात्रि में किसी गृहस्थ के घर आश्रय लेता है। उसी रात कोई चोर भी उसी घर में प्रवेश कर रखी हुई एक पेटी लेकर भागता है। चोर के पदध्वनि से जागे हुए अतिथि ने ‘चोर चोर’ चिल्लाया। ऊँचे स्वर से जागे हुए ग्रामवासी भी आ गए और उस अतिथि को ही चोर मानकर पीटने लगे। यद्यपि असली चोर सिपाही (चौकीदार) ही था। परंतु उस समय उस सिपाही ने अतिथि को ही जेल में डाल दिया। न्यायालय में न्यायाधीश बंकिमचंद्र ने पूरा विवरण सुना। सत्य जानते हुए भी साक्ष्य के अभाव में वह निर्णय न ले सके। अतः उन्होंने अपने बुद्धिचातुर्यबल से एक जीवित साक्ष्य उपस्थित किया। शव रूप में छिपे साक्ष्य ने सब कुछ सत्य उद्घाटित कर दिया। दोषी सिपाही को कारावास हुआ और अतिथि ससम्मान मुक्त हुआ। अतः कहा जाता है “बुद्धिबल से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।”