10. तताँरा–वामीरो कथा – पाठ का सार

कवि परिचय

लीलाधर मंडलोई का जन्म 1954 में जन्माष्टमी के दिन छिंदवाड़ा जिले के गुढ़ी गाँव में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई भोपाल और रायपुर में पूरी की। 1987 में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लंदन के कॉमनवेल्थ रिलेशंस ट्रस्ट से बुलाया गया। अभी वे प्रसार भारती दूरदर्शन के महानिदेशक हैं। मंडलोई जी मुख्य रूप से एक कवि हैं, और उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ की भाषा और लोगों का जीवन साफ़ दिखता है। उनकी प्रसिद्ध किताबें हैं – घर-घर घूमा, रात-बिरात, मगर एक आवाज़, देखा-अनदेखा और काला पानी।

पाठ प्रवेश

प्राचीन सभ्यताओं के साथ कई कहानियाँ और किस्से जुड़े होते हैं, जिनमें कोई न कोई संदेश छिपा होता है। अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में भी ऐसी कई कहानियाँ प्रचलित हैं। लीलाधर मंडलोई ने अपनी रचनाओं में कुछ ऐसी ही कहानियों को दोबारा लिखा है। ‘तताँरा-वामीरो कथा’ भी इसी द्वीपसमूह की एक लोककथा है, जो प्यार और नफरत के असर को दिखाती है।

पाठ सार

‘तताँरा-वामीरो कथा’ लिटिल अंदमान और कार-निकोबार द्वीपों की एक पुरानी कहानी है, जो बताती है कि ये दोनों द्वीप अलग कैसे हुए। इस कहानी का नायक तताँरा एक अच्छा और बहादुर युवक था। गाँव के लोग मानते थे कि उसकी लकड़ी की तलवार में खास शक्ति है। वह हमेशा अपनी तलवार कमर में बांधकर रखता था और जरूरतमंदों की मदद करता था। इसलिए गाँव के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे।
एक दिन तताँरा समुद्र किनारे टहल रहा था, तभी उसने वामीरो को गाना गाते सुना। उसकी मीठी आवाज सुनकर वह बहुत खुश हुआ और उसे पसंद करने लगा। धीरे-धीरे, दोनों एक-दूसरे से मिलने लगे और उनके बीच प्यार हो गया। लेकिन वे अलग-अलग जातियों से थे, इसलिए उनका शादी करना नियमों के खिलाफ था। फिर भी, वे हर दिन मिलते और उनका प्यार गहरा होता गया।

एक दिन, तताँरा को बहुत गुस्सा आ गया। उसने अपनी तलवार से ज़मीन को काट दिया, जिससे द्वीप दो हिस्सों में बँट गया। इस वजह से तताँरा और वामीरो अलग-अलग द्वीपों पर रह गए। तताँरा ने वामीरो तक पहुँचने के लिए समुद्र में छलांग लगाई, लेकिन वह डूब गया। वामीरो बहुत दुखी हो गई और उसने खाना-पीना छोड़ दिया।
उनकी प्रेम कहानी का असर निकोबारी समाज पर पड़ा। इसके बाद, अलग-अलग गाँवों के लोग आपस में शादी करने लगे। आज भी यह कहानी लोककथा के रूप में सुनाई जाती है और इसने द्वीपों के लोगों को और करीब ला दिया।

पाठ का परिप्रेक्ष्य

लीलाधर मंडलोई की ‘तताँरा-वामीरो कथा’ एक अमर प्रेम और बलिदान की कहानी है, जो द्वीपसमूह के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को दिखाती है। यह कहानी बताती है कि प्रेम और बलिदान से समाज में अच्छे बदलाव आ सकते हैं। तताँरा और वामीरो की कहानी न केवल उनके प्रेम को अमर बनाती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्चे प्रेम के लिए सामाजिक परंपराओं को चुनौती देना भी संभव है।

शब्दार्थ

  • श्रृंखला: कम्र
  • आदिम: प्रारम्भिक
  • विभक्त: बँटा हुआ
  • लोककथा: जन-समाज में प्रचलित कथा
  • आत्मीय: अपना
  • विलक्षण: साधारण
  • बयार: शीतल मंद हवा
  • तंद्रा: ऊँघ
  • चैतन्य: चेतना
  • विकल: बैचैन
  • संचार: उत्पन्न होना
  • असंगत: अनुचित
  • सम्मोहित: मुग्ध
  • झुंझुलाना: चिढ़ना
  • अन्यमनस्कता: जिसका चित्त कहीं और हो
  • निनिर्मेष: बिना पलक झपकाये
  • अचम्भित: चकित
  • रोमांचित: पुलकित
  • निश्चल: स्थिर
  • अफवाह: उड़ती खबर
  • उफनना: उबलना
  • शमन: शांत करना
  • घोंपना: भोंकना