परिचय
यह नाटक त्याग और बलिदान की महत्ता को दर्शाता है। इसमें वीरवर नामक राजपुरुष का चरित्र है जो राजा शूद्रक की सेवा करता है। वह अपने धन का एक अंश परिवार पर, एक अंश दान में और शेष अंश पत्नी को देता है। जब एक दिन वह एक करुणार्द्र रानी को देखता है, तब उसके त्याग और निष्ठा की परीक्षा होती है। वीरवर यह दिखाता है कि जब किसी उच्च उद्देश्य के लिए त्याग की आवश्यकता हो, तब अपने जीवन और सम्पत्ति का त्याग करना श्रेष्ठ होता है।पाठ का गद्यांश
(१) प्रारम्भ
- वीरवर राजा शूद्रक का सेवक था।
- उसे वेतन में सौ स्वर्णमुद्राएँ मिलती थीं।
- आधा परिवार पर, चौथाई दान में और शेष पत्नी को देता था।
- राजद्वार पर वह तलवार लेकर सेवा करता था।
(२) रात्रिकाल की घटना
- एक दिन उसने आभूषणों से अलंकृत रानी को रोते देखा।
- रानी ने कहा कि राजा शूद्रक का आयुष्य केवल एक दिन शेष है।
- उसे बचाने के लिए असाधारण उपाय आवश्यक था।
(३) वीरवर का त्याग
- वीरवर ने अपना समस्त स्वर्ण, वस्त्र, द्रव्य आदि रानी को उपहारस्वरूप दे दिए।
- रानी अदृश्य होकर चली गयी।
- यह सब राजा शूद्रक ने गुप्त रूप से देखा और संवाद सुना।
(४) संवाद
- राजा ने कहा – “धन और जीवन परार्थे त्याग करना चाहिए।”
- रानी ने प्रसन्न होकर राजा का जीवन सुरक्षित कर दिया।
- राजा ने घोषणा की कि ऐसा त्यागी इस संसार में दुर्लभ है।
(५) परिणाम
- देवी के आशीर्वाद से राजा की मृत्यु टल गयी।
- वीरवर अपने परिवार सहित स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
- पुनः राजा शूद्रक के महल में अदृश्य रूप से रहने लगा।
श्लोक
(१) धनान्यजीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥
- पदच्छेदः धनानि + जीवितम् + च + एव + परार्थे + प्राज्ञः + उत्सृजेत्। सन्निमित्ते वरम् त्यागः विनाशे नियते सति।
- अन्वयः प्राज्ञः धनानि जीवितम् च परार्थे उत्सृजेत्। नियते विनाशे सति सन्निमित्ते त्यागः वरम्।
- भावार्थः बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि धन और जीवन को परोपकार हेतु त्याग दे। क्योंकि विनाश तो निश्चित है, अतः श्रेष्ठ कारण के लिए त्याग ही सर्वोत्तम है।
(२) जात्ये कृत्ये च मादृशाः क्षुद्रजातयः।
अनेन दृष्टो लोके न भूतो न भविष्यति ॥
- पदच्छेदः जात्ये + कृत्ये + च + मादृशाः + क्षुद्रजातयः। अनेन + दृष्टः + लोके + न + भूतः + न + भविष्यति।
- अन्वयः जात्ये कृत्ये च मादृशाः क्षुद्रजातयः। अनेन सदृशः लोके न भूतः न भविष्यति।
- भावार्थः मेरे समान अल्प लोग जन्म लेकर शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ऐसा त्यागी न तो पहले हुआ है, न भविष्य में होगा।
शब्दार्थ (हिन्दी सहित)
- आवासम् = गृह (घर)
- चन्द्रालसाम् = नींद से अलसाई हुई
- दुहित्रम् = पुत्री
- अवर्ण्यत् = वर्णन किया
- सान्दम् = प्रसन्नता सहित
- स्वल्पयोगः = थोड़े उपयोग वाला
- परमश्लाघ्यः = अति प्रशंसनीय
- त्यागः = त्यागना
- गृहीतस्वाश्मवृत्तिनस्य = ऋणदाता का ऋण चुकानेवाला
- आयतनम् = प्रांगण
- राज्यभङ्गः = राज्य का नाश
- वात्सल्येन = स्नेहपूर्वक
व्याकरण
वाच्य
- कर्तरिवाच्य
- कर्मणिवाच्य
- भाववाच्य
उदाहरण
- कर्तरिवाच्य – बालकः ग्रामं गच्छति।
- कर्मणिवाच्य – बालकेन ग्रामः गम्यते।
- भाववाच्य – बालकेन हस्यते।
निष्कर्ष
इस अध्याय से शिक्षा मिलती है कि जब किसी महान उद्देश्य के लिए त्याग करना पड़े तो अपने धन और जीवन का बलिदान करना ही श्रेष्ठ है। वीरवर ने इस आदर्श को अपने आचरण से सिद्ध किया।