12. संस्कृति – पाठ का सार

लेखक परिचय

भदंत आनंद कौसल्यायन

इनका जन्म सन 1905 में पंजाब के अम्बाला जिले के सोहाना गाँव में हुआ। इनके बचपन का नाम हरनाम दास था। इन्होने लाहौर के नेशनल कॉलिज से बी.ए. किया। ये बौद्ध भिक्षु थे और इन्होने देश-विदेश की काफी यात्राएँ की तथा बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। वे गांधीजी के साथ लम्बे अरसे तक वर्धा में रहे। सन 1988 में इनका निधन हो गया। 

प्रमुख कार्य

पुस्तक: भिक्षु के पत्र, जो भूल ना सका, आह! ऐसी दरिद्रता, बहानेबाजी, यदि बाबा ना होते, रेल का टिकट, कहाँ क्या देखा।

पाठ का संक्षिप्त परिचय
प्रस्तुत पाठ बौद्ध भिक्षु भदतं आनदं कौसल्यायन द्वारा लिखित ‘संस्कृति’ नामक शीषर्क से अवतरित है। इसमें लेखक ने ‘सभयता’ और ‘सस्ं कृति’ शब्दों की व्यावहारिकता का उल्लेख करते हएु इसे अनेक उद्धरणों द्वारा समझाने का प्रयास किया है। लेखक ने इसके लिए काफी सरल, सुबोध एवं प्रभावोत्पादक भाषा का प्रयोग किया है। लैखक द्वारा लिखा या यह लेख उर्पयुक्त दोनों शब्दों की व्यापकता को रेखाकिंत करता ह।

पाठ का सार
लेखक ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ शब्दों को समझाने के क्रम में बता रहा है कि ये दोनों ऐसे शब्द हैं, जो सर्वाध्कि प्रयोग तो किए जाते हैं किंतु समझे कम जाते हैं। इनके साथ कुछेक विशेषण लगा देने से इन्हें समझना और भी कठिन हो जाता है। कभी-कभी दोनों को एक समझ लिया जाता है तो कभी अलग। आखिर वे दोनों एक हैं अथवा अलग। लेखक अपने ढंग से समझाने का प्रयास करता है। सर्वप्रथम वह आग के आविष्कर्ता की बात कहकर व्यक्ति विशेष की योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा को व्यक्ति विशेष की संस्कृति कहता है, जिसके बल पर आविष्कार किया गया। इसी प्रकार से वह सुई-धागे का भी उदाहरण देता है।

लेखक ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ के अंतर को समझाते हुए सुई-धगे और आग के आविष्कार से जुड़ी प्रारंभिक प्रयत्नशीलता और बाद में हुई उन्नति के उदाहरण देता है। लोहे के टुकड़े को घिसकर छेद बना और धगा पिरोकर दो अलग-अलग टुकड़ों को सिलकर जोड़ने की सोच ही संस्कृति है। इन खोजों को आधर बनाकर आगे जो इन क्षेत्रों में विकास हुआ, वह सभ्यता कहलाता है। एक सुसंस्कृत व्यक्ति की पहचान उसकी योग्यता, प्रवृत्ति और प्रेरणा के रूप से होती है। अपनी बुद्धि अथवा  विवेक के आधर पर नए निश्चित तथ्य को खोज आगामी पीढ़ी को सौंपने वाला संस्कृत होता है, जबकि उसी तथ्य को आधर बनाकर आगे बढ़ने वाला सभ्यता का विकास करने वाला होता है। न्यूटन अपने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धंत के आगे कुछ न जान सका, परंतु फिर भी संस्कृत कहलाया, जबकि इस सिद्धंत से अन्य ऐसे तथ्यों को जिन्हें न्यूटन नहीं जानता था, जोड़ने वाले लोग सभ्यता में आते हैं।

लेखक के अनुसार भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु खोजे सुई-धगे और आग के आविष्कार करते तथ्य संस्कृत होने या बनने के आधर नहीं बनते, बल्कि मनुष्य में सदा बसने वाली सहज चेतना भी इसकी उत्पत्ति या बनने का कारण बनती है। इस सहज चेतना का प्रेरक अंश हमें अपने मनीषियों से भी मिला है। मुँह के कौर का दूसरे के मुँह में डाला जाना और रोगी बच्चे को रात-रात भर गोदी में लेकर माता का बैठे रहना, इसी चेतना से प्रेरित होता है। ढाई हशार वर्ष पूर्व बुद्ध का मनुष्य को तृष्णा से मुक्ति के लिए उपायों को खोजने में गृह त्यागकर कठोर तपस्या करना, कार्ल माक्र्स का मज़दूरों के सुखद जीवन के सपने देखने के लिए अपने जीवन को दुःखपूर्ण बिता देना और लेनिन का मुश्किल से मिले डबल रोटी के टुकड़ों को दूसरों को खिला देना इस चेतना से प्रेरित हो संस्कृत बनने के उदाहरण हैं।

लेखक के अनुसार खाने-पीने, पहनने-आढे़ने के तरीके, आवागमन के साधन, यहाँ तक कि परस्पर मर-कटने के तरीके भी संस्कृति का ही परिणाम सभ्यता के उदाहरण हैं। मानव हित में काम न करने वाली संस्कृति असंस्कृति है। इसे संस्कृति नहीं कहा जा सकता। इसके उदाहरण हमारे परस्पर मर कटने के तरीके, आत्मविनाश के बढ़ते साधन हैं। यह निश्चित ही असभ्यता को जन्म देती है।

मानव हित में निरंतर परिवर्तनशीलता का ही नाम संस्कृति है। संस्कृति बुद्धि और विवेक से बना एक ऐसा नया तथ्य है, जिसकी कभी दल बाँधकर रक्षा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। संस्कृति का कल्याणकारी अंश अकल्याणकारी की तुलना में सदा श्रेष्ठ और स्थायी है। इसी अर्थ में यह अविभाजित अर्थात अखंड भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. आध्यात्मिक – परमात्मा या आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला
  2. साक्षात – आँखों के सामने
  3. अनायास – आसानी से
  4. तृष्णा – लोभ
  5. परिष्कृत – सजाया हुआ
  6. कदाचित – कभी
  7. निठल्ला – बेकार
  8. मिनिषियों – विद्वानों
  9. शीतोष्ण – ठंडा और गरम
  10. वशीभूत –  वश में होना
  11. अवश्यंभावी – अवश्य होने वाला
  12. पेट की ज्वाला – भूख
  13. स्थूल – मोटा
  14. तथ्य – सत्य
  15. पुरस्कर्ता – पुरस्कार देने वाला
  16. ज्ञानेप्सा – ज्ञान प्राप्त करने की लालसा
  17. सर्वस्व – स्वयं को सब कुछ
  18. गमना गमन – आना-जाना
  19. प्रज्ञा – बुद्धि
  20. दलबंदी – दल की बंदी
  21. अविभाज्य – जो बाँटा ना जा सके