7. मञ्जुलमञ्जुषा सुन्दरसुरभाषा – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय संस्कृत भाषा की महिमा का परिचय कराता है। संस्कृत को देववाणी, सभ्य भाषाओं की जननी, साहित्य का आधार तथा ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका कहा गया है। इसमें श्लोकों के माध्यम से बताया गया है कि संस्कृत न केवल सौंदर्य और माधुर्य से परिपूर्ण है, बल्कि यह मानव-जीवन, साहित्य, विज्ञान और दर्शन को भी आलोकित करती है।

श्लोक १

मूल श्लोकः
मुनिवरनवकनितकनववरनवलनित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा ।
अनिमातसत्त्व पोषणक्षमता
मम वच्यातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥१॥

  • पदच्छेदः – मुनिवर-नवकनित-नववर-नवलनित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे माते! तव पोषणक्षमता मम वच्यातीता, सुन्दरसुरभाषा (असि)।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत भाषा अत्यन्त सुन्दर है।
    • यह देवभाषा कहलाती है।
    • मुनियों ने इसके द्वारा गवेषणाएँ कीं और ग्रन्थों की रचना की।
    • संस्कृत अन्य भाषाओं की जननी है।
    • इसके शब्द कोमल और सम्पूर्ण हैं।
    • संस्कृत अन्य भाषाओं का पोषण करती है।

श्लोक २

मूल श्लोकः
वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः कृतानि
कालिदास-बाणकविभिः रचितानि ।
पौराणिक-सामान्य-जीविनाम् आशा
सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥

  • पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः कालिदास-बाणकविभिः पौराणिक-सामान्य-जीविनाम् आशा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! तव आश्रयेण वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः रचितानि, कालिदास-बाणकविभिः रचितानि, पौराणिक-सामान्यजीविनाम् आशा असि।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत रमणीय भाषा है।
    • वेदव्यास ने महाभारत, वाल्मीकि ने रामायण रची।
    • कालिदास, बाणभट्ट आदि कवियों ने साहित्य की अमूल्य धरोहर दी।
    • प्राचीन काल से आज तक संस्कृत सामान्य जन के जीवन में आशा का संचार करती रही है।

श्लोक ३

मूल श्लोकः
श्रुतिसुखनिर्दे कलप्रमोदे
समस्मृतिवर्द्धे सरसविनोदे ।
गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे
तव संस्कृतिः एषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥

  • पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिदे कलप्रमोदे स्मृतिवर्द्धे सरसविनोदे गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! श्रुतिसुखनिदे! कलप्रमोदे! स्मृतिवर्द्धे! सरसविनोदे! गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे! तव एषा संस्कृतिः अस्ति।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत सुनने में मधुर और आनन्दप्रद है।
    • यह कला और संस्कृति का विकास करती है।
    • स्मृति और विवेक को बढ़ाती है।
    • सरस विनोद का अनुभव कराती है।
    • यह साहित्य और काव्य की प्रेरणा है।
    • यह मानव-जीवन में उत्तम मार्गदर्शन देती है।

श्लोक ४

मूल श्लोकः
रस-रुचिरालङ्कृत-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा ।
वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः
विज्ञैः धरा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥

  • पदच्छेदः – रस-रुचिरा अलङ्कृत-धारा वेदविषय-वेदान्तविचारा वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः विज्ञैः धरा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! रस-रुचिरा अलङ्कृत-धारा, वेदविषय-वेदान्तविचारा, वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः धरा (असि)।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत में शृंगार, हास्य, रौद्र, वीर आदि सभी रस विद्यमान हैं।
    • शब्दों की अलंकारयुक्त धारा इसे और समृद्ध बनाती है।
    • वेद, उपनिषद्, वेदान्त और पुराणों के विचार इसमें समाहित हैं।
    • आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, खगोल आदि शास्त्र संस्कृत में रचे गए।
    • इस प्रकार संस्कृत सर्वत्र प्रतिष्ठित है।

शब्दार्थ (संग्रह से)

  • मञ्जुल = मोहक
  • मञ्जूषा = पेटिका, संचित निधि
  • सुन्दरसुरभाषा = देवभाषा संस्कृत
  • पोषणक्षमता = पालन-पोषण करने की शक्ति
  • वच्यातीता = वाणी से परे
  • श्रुतिसुख = सुनने में आनन्ददायक
  • सरसविनोद = हृदय को आनन्द देने वाला
  • रस-रुचिर = रसों से युक्त
  • अलङ्कृतधारा = अलंकारों से सुसज्जित धारा

व्याकरण (समास का विवेचन)

  • मातुः भूमि = मातृभूमिः
  • सुराणां भाषा = सुरभाषा
  • पोषण + क्षमत्वम् = पोषणक्षमत्वम्
  • वच्यम् अतीतम् = वच्यातीतम्
  • विरसैः रुचिरा = विरसरुचिरा
  • वेद + विषय = वेदविषयः
  • खगोल + शास्त्रम् = खगोलशास्त्रम्