कहानी परिचय
यह कहानी प्रेमचंद जी की रचना है जिसमें उन्होंने अपने बचपन की मीठी यादों को बहुत ही सुंदर ढंग से बताया है। इसमें उन्होंने खेतों में खेलना, पेड़ों पर चढ़ना, रामलीला देखना और सबसे ज़्यादा गुल्ली-डंडा खेलने का आनंद याद किया है। लेखक बताते हैं कि उस समय खेलों में न कोई अमीरी-गरीबी का फर्क था और न ही किसी तरह का दिखावा। सब बच्चे मिलकर उत्साह से खेलते थे। बचपन की सादगी और देशी खेलों की खुशी सबसे अनोखी और सच्ची होती है।

मुख्य विषय
इस लेख का मुख्य विषय है बचपन की यादें और गुल्ली-डंडा जैसे साधारण खेलों का आनंद। प्रेमचंद अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं, जब वे अपने चचेरे भाई के साथ पढ़ने जाते थे, रामलीला देखने का उत्साह होता था, और गुल्ली-डंडा खेलते थे। वे बताते हैं कि गुल्ली-डंडा एक ऐसा खेल है, जिसमें न तो महंगे सामान की जरूरत होती है और न ही किसी खास मैदान की। यह खेल सभी बच्चों को एक साथ लाता था, चाहे वे अमीर हों या गरीब। प्रेमचंद कहते हैं कि भारतीय खेल सरल और मजेदार हैं, लेकिन लोग अब अंग्रेजी खेलों के पीछे भाग रहे हैं। वे अपने बचपन के उत्साह, दोस्तों के साथ खेलने की मस्ती और सादगी को बहुत याद करते हैं।

कहानी का सार
यह कहानी “मेरा बचपन” प्रेमचंद जी द्वारा लिखी गई है। इसमें लेखक ने अपने बचपन की यादों को बहुत ही सरल और प्यारे ढंग से बताया है। लेखक कहते हैं कि उनका बचपन बहुत ही साधारण था। वे कच्चे टूटे घर में रहते थे और पयाल (खप्पच्ची) का बिछौना बिछाकर सोते थे। वे नंगे बदन और नंगे पाँव खेतों में घूमते थे और आम के पेड़ों पर चढ़ते थे। वे अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में मौलवी साहब के पास पढ़ने जाते थे। उस समय उनकी उम्र आठ साल थी और हलधर उनसे दो साल बड़े थे। सुबह-सुबह दोनों मटर और जौ का चबेना खाते थे।
लेखक को रामलीला देखने में बहुत आनंद आता था। उनके घर के पास ही रामलीला का मैदान था और जहाँ लीला के पात्र सजते थे वह घर तो उनके घर से बिलकुल मिला हुआ था। दोपहर से ही पात्रों की सजावट शुरू हो जाती और लेखक छोटे-मोटे काम करने में बहुत उत्साह दिखाते। वे कहते हैं कि उस समय जितना उत्साह काम करने में था, उतना उत्साह आज पेंशन लेने में भी नहीं आता।
बचपन में उन्हें सबसे ज़्यादा मज़ा गुल्ली-डंडा खेलने में आता था। लेखक कहते हैं कि गुल्ली-डंडा सभी खेलों का राजा है। आज भी जब वे बच्चों को गुल्ली-डंडा खेलते देखते हैं तो उनका मन करता है कि वे भी जाकर खेलने लगें। इस खेल के लिए न लॉन चाहिए, न कोर्ट चाहिए और न ही महँगा सामान। बस पेड़ से टहनी काटकर गुल्ली बना ली और खेल शुरू हो गया। लेखक कहते हैं कि विदेशी खेलों में सबसे बड़ी कमी यह है कि उनमें बहुत पैसे खर्च होते हैं। लेकिन आज लोग अंग्रेजी खेलों के पीछे दीवाने हो गए हैं और भारतीय खेलों से दूरी बना ली है।

वे यह भी कहते हैं कि अगर गुल्ली-डंडा खेलते समय आँख फूटने का डर है तो क्रिकेट खेलते समय सिर फूटने का भी डर है। उनके माथे पर आज भी गुल्ली का दाग है और कई दोस्त तो ऐसे भी हुए जिन्हें चोट लगने से बैसाखी का सहारा लेना पड़ा। फिर भी लेखक को गुल्ली-डंडा सबसे अच्छा लगता है। लेखक अपने बचपन के खेलों की बातें बताते हुए कहते हैं कि प्रातःकाल ही घर से निकल जाना, पेड़ों की टहनियाँ काटना, गुल्ली-डंडा बनाना, खिलाड़ियों का इकट्ठा होना, लड़ाई-झगड़े करना, सब कुछ बहुत मज़ेदार था। उस समय अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था, न कोई घमंड था। सब खेलते, सब हँसते।
घरवाले अक्सर नाराज़ रहते थे कि वे न नहाते हैं, न ठीक से खाते हैं, बस गुल्ली-डंडा खेलते रहते हैं। पिताजी तो कभी-कभी रोटियाँ बेलते समय गुस्सा भी उतारते। लेकिन लेखक के लिए गुल्ली-डंडा ही सबसे बड़ी खुशी थी। उन्हें उसमें मिठाइयों से भी ज़्यादा मिठास और तमाशों से भी ज़्यादा आनंद मिलता था। इस प्रकार, इस कहानी में लेखक ने अपने बचपन की यादों, रामलीला के आनंद और सबसे बढ़कर गुल्ली-डंडा जैसे भारतीय खेलों की महत्ता को सरल और मज़ेदार ढंग से बताया है।
कहानी की मुख्य बातें
- बचपन की यादें: लेखक को अपने बचपन की बातें बहुत याद आती हैं, जैसे पुराना घर, खेतों में नंगे पांव घूमना, और आम के पेड़ पर चढ़ना।
- पढ़ाई का समय: लेखक 8 साल की उम्र में अपने चचेरे भाई हलधर के साथ मौलवी साहब के पास पढ़ने जाता था। सुबह वे मटर और जौ का चबेना खाते थे।
- रामलीला का मजा: लेखक को रामलीला देखना बहुत पसंद था। वह दोपहर से ही पात्रों की सजावट देखने चला जाता और छोटे-मोटे कामों में मदद करता।
- गुल्ली-डंडा का खेल: लेखक को गुल्ली-डंडा सबसे अच्छा खेल लगता है। इसे खेलने के लिए ज्यादा सामान की जरूरत नहीं, सिर्फ पेड़ की टहनी से गुल्ली और डंडा बन जाता।
- खेलों की तुलना: लेखक कहते हैं कि अंग्रेजी खेल महंगे हैं, लेकिन भारतीय खेल जैसे गुल्ली-डंडा सस्ते और मजेदार हैं। स्कूलों में भारतीय खेलों को बढ़ावा देना चाहिए।
- खेलों का खतरा: गुल्ली-डंडा से आंख फूटने का डर होता है, लेकिन क्रिकेट जैसे खेलों में भी सिर टूटने का खतरा है। फिर भी लेखक को गुल्ली-डंडा सबसे प्यारा है।
- बचपन की मस्ती: बचपन में खेलने का उत्साह इतना था कि नहाना-खाना भूल जाता था। गुल्ली-डंडा में बहुत मजा और मिठास थी।
- सादगी और भाईचारा: बचपन में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था। सब मिलकर खेलते थे, और अभिमान की कोई जगह नहीं थी।
कहानी से शिक्षा
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बचपन बहुत ही अनमोल होता है। उस समय की सादगी, खुशी और खेलकूद हमें जीवनभर याद रहते हैं। हमें अपने देशी खेलों और परंपराओं की कद्र करनी चाहिए, क्योंकि उनमें मज़ा भी है और अपनापन भी। खेल हमें मिलजुलकर रहना, भाईचारा और सरलता सिखाते हैं। हमें केवल महँगे या विदेशी खेलों के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि अपने भारतीय खेलों को भी महत्व देना चाहिए।
शब्दार्थ
- पयाल: धान के पौधे का सूखा तना / पराली
- जेठ: उम्र में बड़ा
- चबेना: भुना हुआ अन्न
- थापी: आटा बेलने या रोटियाँ बनाने में प्रयोग होने वाला सपाट लकड़ी का टुकड़ा
- विलायती: विदेशी
- कौड़ी: मुद्रा का एक रूप
- भय: डर
- चौके: रसोईघर
- सुध: होश
- मुहावरा: जी लोट-पोट होना- मन अत्यधिक प्रसन्न होना