04.हमारा आहार- Chapter Notes

परिचय

इस कविता में हमें बताया गया है कि हमें अपने खाने में क्या-क्या खाना चाहिए और स्वस्थ रहने के लिए कैसे खाना चाहिए। कविता हमें सिखाती है कि सही और ताजा खाना खाने से हम बीमार नहीं पड़ते और हमारा शरीर चुस्त और फुर्तीला रहता है। यह कविता आसान शब्दों में बच्चों को स्वस्थ आहार की महत्त्वपूर्ण बातें समझाती है।

कविता की व्याख्यापहला प्रसंग

कैसा हो अपना आहार, 
आओ मिलकर करें विचार।
चावल, दाल और सब्जी खाओ, 
तन में चुस्ती-फुर्ती लाओ।

व्याख्या: कविता की शुरुआत में कवि कहते हैं कि हमें सोचना चाहिए कि हमारा खाना कैसा होना चाहिए। चावल, दाल और सब्जियाँ खाने से हमारा शरीर ताकतवर, चुस्त और फुर्तीला बनता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अच्छा और सेहतमंद खाना खाना चाहिए।

दूसरा प्रसंग

केवल आलू तुम मत लाना, 
भिंडी, परवल, नेनुआ भी खाना।
दूध-दही तुम छककर खाओ, 
फल-फूलों के बाग लगाओ।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि हमें सिर्फ़ आलू नहीं खाना चाहिए, बल्कि भिंडी, परवल और नेनुआ जैसी दूसरी सब्जियाँ भी खानी चाहिए। साथ ही, दूध और दही खाने से हमें ताकत मिलती है। हमें फल खाने और अपने आसपास फल के पेड़ लगाने चाहिए।

तीसरा प्रसंग

आम-अमरूद, पपीता खाओ, 
केला, बेल भी घर ले आओ।
खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा, 
गर्मी की हरते हैं पीड़ा।

व्याख्या: कवि बताते हैं कि हमें आम, अमरूद, पपीता, केला और बेल जैसे फल खाने चाहिए। गर्मी के मौसम में खरबूज, तरबूज, ककड़ी और खीरा खाने से गर्मी की परेशानी कम होती है। यह हमें मौसम के हिसाब से खाना खाने की सलाह देता है।

चौथा प्रसंग

खूब करो पानी का व्यवहार,
इसकी महिमा अपरंपार।
भोजन में हो खूब सलाद,
इसका है अपना अंदाज।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि हमें खूब पानी पीना चाहिए, क्योंकि पानी हमारे शरीर के लिए बहुत ज़रूरी है और इसकी महत्ता अनमोल है। खाने में सलाद शामिल करना चाहिए, क्योंकि यह स्वादिष्ट और सेहतमंद होता है।

पाँचवाँ प्रसंग

मूली, टमाटर, गाजर खाना, 
पालक को भी भूल न जाना।
भूँजा-सत्तू नियमित खाएँ, 
वैद्य-हकीम घर न आएँ।

व्याख्या: कवि सलाह देते हैं कि हमें मूली, टमाटर, गाजर और पालक जैसी सब्जियाँ खानी चाहिए। भूँजा-सत्तू जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ रोज़ खाने से हम स्वस्थ रहते हैं और हमें डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

छठा प्रसंग

पेट से ज्यादा जब कोई खाए, 
खाकर वह पीछे पछताए।
ताजा खाना हरदम खाओ, 
नहीं बहाना कभी बनाओ।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि हमें ज़रूरत से ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए, वरना बाद में पछताना पड़ता है। हमें हमेशा ताजा खाना खाना चाहिए और खाने में कोई बहाना नहीं बनाना चाहिए।

सातवाँ प्रसंग

जब खाते हैं ढंग से खाना, 
व्याधि को ना मिले बहाना।
ऐसा हो अपना आहार, 
खाकर हम ना पड़ें बीमार।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि अगर हम सही तरीके से और सही खाना खाते हैं, तो बीमारियाँ हमें परेशान नहीं करतीं। हमें ऐसा खाना खाना चाहिए, जिससे हम स्वस्थ रहें और बीमार न पड़ें।

कविता से शिक्षा

  • पौष्टिक और ताजा आहार: चावल, दाल, सब्जियाँ, फल, और दही जैसे ताजा और पौष्टिक खाना खाने से हम स्वस्थ रहते हैं और बीमारियाँ दूर रहती हैं।
  • मौसम के हिसाब से खाना: गर्मी में खरबूज, तरबूज, ककड़ी और खीरा खाने से गर्मी से राहत मिलती है।
  • पानी का महत्त्व: खूब पानी पीना चाहिए, क्योंकि यह शरीर को स्वस्थ रखता है।
  • संयमित खाना: ज़रूरत से ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए, ताकि पेट खराब न हो।
  • सलाद का महत्त्व: खाने में सलाद शामिल करना चाहिए, क्योंकि यह सेहत के लिए अच्छा होता है।

शब्दार्थ

  • आहार: खाना
  • चुस्ती-फुर्ती: ताकत और तेज़ी
  • नेनुआ: एक प्रकार की सब्जी (दौरी)
  • छककर: पूरी मात्रा में, भरपूर रूप से
  • अपरंपार: बहुत ज्यादा
  • भुंजा-सत्तू: भुना हुआ अनाज और उसका पाउडर
  • वैद्य-हकीम: डॉक्टर
  • व्याधि: बीमारी
  • अंदाज: तरीका
  • परवल: एक हल्की हरी सब्जी, जिसे उबालकर या तलकर खाया जाता है
  • बेल: एक गोल फल, जिसका रस या गूदा खाया जाता है
  • पछताए: बाद में अफसोस करना
  • ढंग: सही तरीका या विधि