4. हरिद्वार – Textbook Solutions

पाठ से

मेरी समझ से

नीचे दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर के सामने तारा (*) लगाया गया है। प्रत्येक प्रश्न के उत्तर के साथ सरल भाषा में व्याख्या दी गई है, जो कक्षा 8 के छात्रों के लिए समझने में आसान होगी।

1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?

  • लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।
  • लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं। *
  • लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
  • लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।

उत्तर: लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
भारतेंदु ने हरिद्वार के वृक्षों की तुलना सज्जन (अच्छे) लोगों से की है। जैसे सज्जन लोग बुराई के बदले भी अच्छाई करते हैं, वैसे ही ये वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं। यहाँ वे वृक्षों की उदारता को मानवीय गुणों से जोड़ रहे हैं, न कि दुकानदारों या फल तोड़ने की बात कर रहे हैं।

2. “वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?

  • शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
  • आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
  • मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव *
  • सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम

उत्तर: मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
वैराग्य (दुनिया से दूरी) और भक्ति (ईश्वर के प्रति प्रेम) का मतलब है कि लेखक को हरिद्वार में शांति और आध्यात्मिक (धार्मिक) अनुभव हुआ। गंगा और प्रकृति की सुंदरता ने उनके मन को शांत और ईश्वर के करीब किया, न कि थकान या सामाजिक प्रेम की भावना दी।

3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?

  • संतुष्टि में सुख होता है। *
  • सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।
  • लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।
  • पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।

उत्तर: संतुष्टि में सुख होता है।
लेखक कहते हैं कि गंगा के किनारे पत्थर पर भोजन करने का सुख सोने की थाली से भी ज्यादा था। इसका मतलब है कि सादगी और प्रकृति के बीच मिलने वाली संतुष्टि (खुशी) सबसे बड़ी होती है, न कि भोजन स्वादिष्ट था या सोने की थाली की कमी थी।

4. “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?

  • अंधविश्वास और लालच
  • मानवता और देशप्रेम
  • सादगी और आत्मनिर्भरता *
  • स्वच्छता और प्रकृति प्रेम *

उत्तर: सादगी और आत्मनिर्भरता, स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
लेखक ने खुद खाना बनाकर सादगी से गंगा के पास बैठकर खाया – यह सादगी और स्वावलंबन (आत्मनिर्भरता) को दिखाता है। साथ ही, उन्होंने प्रकृति के पास रहकर स्वच्छ वातावरण में भोजन किया – यह प्रकृति प्रेम और स्वच्छता को भी बढ़ावा देता है।

5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?

  • राजनीतिक
  • आध्यात्मिक *
  • सामाजिक
  • प्राकृतिक *

उत्तर: आध्यात्मिक
हरिद्वार की सुंदरता (प्राकृतिक अनुभव) और वहाँ मिली शांति, भक्ति और ज्ञान (आध्यात्मिक अनुभव) – दोनों ही लेखक के अनुभव का मुख्य भाग हैं।

5. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?

  • कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
  • मुहावरों का अधिक प्रयोग
  • सरलता और चित्रात्मकता *
  • जटिलता और संक्षिप्तता

उत्तर: सरलता और चित्रात्मकता
लेखक ने अपने अनुभवों को ऐसे लिखा है कि पढ़ने वाले के मन में चित्र बन जाएँ। भाषा सरल और भावों से भरी हुई है।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर: 

  1. हमने यह उत्तर इसलिए चुने क्योंकि लेखक ने वृक्षों की उदारता की तुलना सज्जनों से की है, जो बिना किसी स्वार्थ के फल देते हैं।
  2. “वैराग्य और भक्ति” जैसे शब्द बताते हैं कि लेखक आध्यात्मिक भावों से भर गया था।
  3. “पत्थर पर भोजन” का वर्णन यह स्पष्ट करता है कि सच्चा सुख साधनों में नहीं, संतोष में होता है।
  4. गंगा के तट पर भोजन करना सादगी, प्रकृति के प्रति प्रेम और आत्मीयता को दर्शाता है।
  5. पूरी यात्रा-वृत्तांत में प्रकृति, आध्यात्मिकता और भक्ति का वर्णन प्रमुख है, इसलिए यह अनुभव आध्यात्मिक और प्राकृतिक दोनों था।
  6. पत्र की भाषा में सरलता और चित्रात्मकता है, जिससे पाठक दृश्य को कल्पना में देख सकता है।

मिलकर करें मिलान

पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। आपस में चर्चा कीजिए और इनके उपयुक्त संदर्भों से इनका मिलान कीजिए-
उत्तर: 

मिलकर करें चयन

(क) पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो निष्कर्ष दिए गए हैं- एक सही और एक भ्रामक। अपने समूह में इन पर विचार कीजिए और उपयुक्त निष्कर्ष पर सही का चिह्न लगाइए।

उत्तर: 

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।

(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
उत्तर: 

  • अर्थ: भारतेंदु कहते हैं कि हरिद्वार की कुशा (एक विशेष प्रकार की घास, जो पूजा में उपयोग होती है) बहुत अनोखी है। इसकी खुशबू दालचीनी और जावित्री जैसी मसालों की तरह शानदार है। वे कहते हैं कि यह दिखाता है कि हरिद्वार इतनी पवित्र जगह है कि यहाँ की साधारण घास भी सुगंधित और खास है।
  • विचार: यह पंक्ति हरिद्वार की पवित्रता और खासियत को दर्शाती है। लेखक बताते हैं कि इस तीर्थस्थल की हर चीज़, यहाँ तक कि घास भी, सामान्य नहीं है। यहाँ की प्रकृति में एक विशेष आध्यात्मिक शक्ति है, जो हर चीज़ को सुंदर और पवित्र बनाती है। मुझे लगता है कि लेखक यह कहना चाहते हैं कि हरिद्वार की पवित्रता इतनी गहरी है कि यहाँ की छोटी-छोटी चीज़ें भी असाधारण हो जाती हैं। यह हमें सिखाता है कि पवित्र स्थानों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वहाँ की हर चीज़ में कुछ खास होता है।
  • समूह में साझा करने के लिए: मैं अपने दोस्तों से कहूँगा कि यह पंक्ति दिखाती है कि हरिद्वार की प्रकृति और आध्यात्मिकता कितनी खास है। हम इस पर चर्चा कर सकते हैं कि क्या हमने कभी ऐसी जगह देखी है, जहाँ की साधारण चीज़ें भी खास लगी हों, जैसे कोई मंदिर या नदी।

(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।”
उत्तर: 

  • अर्थ: भारतेंदु हरिद्वार के वृक्षों की तारीफ करते हैं और कहते हैं कि इनका जन्म धन्य है, क्योंकि ये हमेशा लोगों की मदद करते हैं। ये वृक्ष फल, फूल, खुशबू, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी, और जड़ देते हैं। यहाँ तक कि जलने के बाद भी उनकी राख और कोयला लोगों के लिए उपयोगी होता है। कोई भी इनसे खाली हाथ नहीं लौटता।
  • विचार: यह पंक्ति वृक्षों की उदारता और हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाती है। लेखक वृक्षों को ऐसे लोगों की तरह देखते हैं, जो बिना स्वार्थ के सब कुछ दे देते हैं। मुझे लगता है कि यह हमें प्रकृति का सम्मान करना और उसकी कीमत समझना सिखाता है। यह पंक्ति यह भी बताती है कि हरिद्वार की प्रकृति पवित्र और उपयोगी है, जो लोगों की हर जरूरत पूरी करती है। यह हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि हमें भी दूसरों की मदद बिना स्वार्थ के करनी चाहिए, जैसे ये वृक्ष करते हैं।
  • समूह में साझा करने के लिए: मैं अपने दोस्तों से कहूँगा कि यह पंक्ति वृक्षों की उदारता को दिखाती है और हमें सिखाती है कि हमें भी दूसरों की मदद करनी चाहिए। हम इस पर चर्चा कर सकते हैं कि प्रकृति हमारी कैसे मदद करती है और हम उसका ख्याल कैसे रख सकते हैं।

सोच-विचार के लिए

पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।

(क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…”
लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब?
(संकेत – किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)

उत्तर: इस वाक्य से पता चलता है कि लेखक का मन हरिद्वार की पवित्रता, शांति और सुंदरता से इतना प्रभावित हुआ कि वह वहाँ से लौटने के बाद भी मन से वहीं बना रहा। उसका मन हरिद्वार की यादों में ही बसा रहा।
मेरी अनुभूति: हाँ, मुझे भी ऐसा अनुभव हुआ है। जब मैं किसी सुंदर जगह जैसे पहाड़ों या किसी शांत गाँव से लौटती हूँ, तो कई दिन तक वहीं की बातें, लोग, दृश्य और अनुभव मन में चलते रहते हैं। ऐसा लगा जैसे मैं वहाँ से लौटी ही नहीं।

(ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।”
लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि वहाँ के पंडे लालच नहीं करते, वे कम में भी खुश रहते हैं।
आज के समय में ऐसा व्यवहार बहुत कम देखने को मिलता है। आज कई लोग अधिक पैसा कमाने की होड़ में रहते हैं। फिर भी कुछ लोग आज भी संतोषी होते हैं – जैसे गाँवों के कुछ दुकानदार या मंदिरों के पुजारी, जो कम में भी खुश रहते हैं और सेवा भाव रखते हैं।
उदाहरण: मेरे गाँव के पास एक मंदिर के पुजारी हैं, जो केवल भक्ति से पूजा कराते हैं और दान में जो भी मिले, उसी से संतुष्ट रहते हैं। ऐसे लोग आज भी समाज में हैं, पर बहुत कम।

(ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।”
आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी?
(संकेत – केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)

उत्तर: लेखक ने इस स्थान को ‘टिकने योग्य’ इसलिए कहा क्योंकि वहाँ चारों ओर से शीतल हवा आती थी, स्थान शांत था, आरामदायक था और वहाँ से हरिद्वार की सुंदरता का आनंद लिया जा सकता था।
अनुमानित विशेषताएँ:

  • वहाँ प्राकृतिक वातावरण था।
  • गर्मी या भीड़ नहीं थी।
  • शांत, सुरक्षित और स्वच्छ स्थान था।
  • मन को प्रसन्न करने वाला वातावरण था।

इसलिए लेखक को वहाँ ठहरना अच्छा लगा।

(घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।”
इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?

उत्तर: इस वाक्य से वृक्षों की उपयोगिता और उदारता का पता चलता है। पेड़ जीवन भर और मृत्यु के बाद भी लोगों की मदद करते हैं। वे बिना कुछ माँगे फल, फूल, छाया देते हैं। यहाँ तक कि जब पेड़ जल जाते हैं, तब भी उनकी राख और कोयले से लोग लाभ उठाते हैं।
मेरी समझ: यह हमें सिखाता है कि हमें भी वृक्षों की तरह निःस्वार्थ सेवा करनी चाहिए और प्रकृति का आदर करना चाहिए। वृक्ष सच्चे सज्जन और समाज के सेवक होते हैं।

अनुमान और कल्पना से

(क) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।”
कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?

उत्तर: यदि मैं हरिद्वार में हूँ, जहाँ हरे-भरे पहाड़ हैं, तो मैं ये चीज़ें करना चाहूँगा:

  • गंगा में स्नान: मैं हरि की पैड़ी पर जाकर गंगा में स्नान करूँगा, क्योंकि यह पवित्र और ठंडा जल मेरे मन को शांति देगा।
  • पहाड़ों पर सैर: मैं हरे-भरे पर्वतों पर चढ़कर प्रकृति की सुंदरता देखूँगा, जैसे चहचहाते पक्षी और लहलहाती वनस्पतियाँ।
  • मंदिर दर्शन: मैं चण्डिका देवी मंदिर और विल्वेश्वर महादेव मंदिर जाऊँगा, ताकि वहाँ की आध्यात्मिक शांति का अनुभव कर सकूँ।
  • गंगा आरती: मैं शाम को हरि की पैड़ी पर गंगा आरती देखूँगा, क्योंकि दीयों की रोशनी और भक्ति का माहौल बहुत सुंदर होता है।
  • प्रकृति का आनंद: मैं गंगा के किनारे बैठकर ठंडी हवा और पानी की आवाज़ का मज़ा लूँगा, जैसे भारतेंदु ने अपने अनुभव में बताया। 

(ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।”
कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।

उत्तर: मैं गंगा के तट पर हरि की पैड़ी के पास बैठा हूँ। गंगा का ठंडा, साफ़ पानी बह रहा है, और उसकी छोटी-छोटी लहरें मेरे पास आकर छींटे मार रही हैं। पानी के ये छींटे मेरे चेहरे पर पड़ते हैं, जो इतने ठंडे और ताज़ा हैं कि मुझे गर्मी और थकान भूल जाती है। हल्की हवा चल रही है, जो गंगा के पानी की ठंडक को मेरे पास लाती है। चारों ओर पक्षियों की चहचहाहट और गंगा की कल-कल की आवाज़ सुनाई दे रही है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी शांत और पवित्र दुनिया में हूँ। मैं अपने हाथों से पानी छूता हूँ, और उसकी शीतलता मेरे मन को शांति देती है। मैं सोचता हूँ कि गंगा माँ मुझे अपनी गोद में बुला रही हैं। यह अनुभव इतना सुंदर है कि मैं इसे हमेशा याद रखना चाहता हूँ।

(ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।”
यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?

उत्तर: यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें, तो दुनिया बहुत रोचक और अलग होगी:

  • बातचीत: पेड़ हमसे बात करेंगे। उदाहरण के लिए, एक बरगद का पेड़ कह सकता है, “मुझे पानी दो, मैं तुम्हें छाया दूँगा!” या कोई फल का पेड़ कहेगा, “मेरे फल खाओ, लेकिन मेरी डालियाँ मत तोड़ो!”
  • उदारता: जैसे भारतेंदु ने कहा, पेड़ सज्जनों की तरह रहेंगे। अगर कोई उन पर पत्थर फेंके, तो वे गुस्सा होने की बजाय और फल दे सकते हैं, जैसे कहें, “तुम्हें और फल चाहिए? लो!”
  • शिकायतें: पेड़ शायद शिकायत करें कि लोग उनकी छाल या लकड़ी काटते हैं। वे कह सकते हैं, “हमें दर्द होता है, कृपया हमें बख्श दो!”
  • पर्यावरण की रक्षा: पेड़ इंसानों को सिखाएँगे कि उनकी देखभाल कैसे करनी है। वे कह सकते हैं, “ज़्यादा पेड़ लगाओ, ताकि हमारा परिवार बढ़े!”

(घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं- एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।” 
इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?

उत्तर: भारतेंदु ने ‘गंगा’ के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ का उपयोग इसलिए किया होगा:

  • सम्मान और पवित्रता: गंगा को हिंदू धर्म में माँ और देवी माना जाता है। ‘श्री’ और ‘जी’ लगाना गंगा के प्रति सम्मान और उनकी पवित्रता को दर्शाता है। यह दिखाता है कि लेखक गंगा को सिर्फ़ नदी नहीं, बल्कि एक पवित्र शक्ति मानते हैं।
  • आध्यात्मिक भावना: हरिद्वार एक तीर्थस्थल है, और गंगा वहाँ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। ‘श्री’ और ‘जी’ का उपयोग लेखक की भक्ति और श्रद्धा को व्यक्त करता है।
  • सांस्कृतिक परंपरा: भारत में पवित्र नदियों, जैसे गंगा, यमुना, को सम्मान देने के लिए ‘जी’ या ‘माँ’ जैसे शब्द जोड़े जाते हैं। यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है।

(ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर: अगर मैं किसी श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित मित्र के साथ हरिद्वार गया/गई होता/होती, तो मैं इन बातों का ध्यान रखता/रखती:

  • उन्हें रास्ता सुरक्षित तरीके से दिखाता/दिखाती।
  • हरिद्वार का वातावरण, गंगा की ठंडक, हवा की ताजगी उन्हें स्पर्श से महसूस कराता/कराती।
  • मंदिरों में आरती का कंपन और घंटियों की ध्वनि उन्हें अनुभव करवाता/करवाती।
  • उनके लिए विशेष गाइड या संकेत भाषा (sign language) की मदद लेता/लेती।
  • उन्हें गंगा जल का स्पर्श, फूलों की खुशबू, प्रसाद का स्वाद और चप्पलों की ध्वनि से यात्रा का आनंद दिलवाता/दिलवाती।

लिखें संवाद

(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।”
लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।

उत्तर: 
लेखक: (गंगा जल में हाथ डुबोते हुए) कल्लू जी, देखिए न! इस जल की शीतलता जैसे मन की सारी थकावट दूर कर दे।
कल्लू जी: बिल्कुल! लगता है जैसे गंगा माँ हमें स्वयं स्नेह से बुला रही हैं। कितना शांत, कितना पवित्र वातावरण है!
लेखक: और वह देखिए — सामने के पर्वतों पर कितनी हरियाली है! लगता है जैसे वे हमें आलिंगन दे रहे हों।
कल्लू जी: (मुस्कुराते हुए) यह भूमि सच में पुण्यभूमि है। यहाँ के पेड़-पौधे, जल, हवा — सबमें एक भक्ति की सुगंध है।
लेखक: सही कहा आपने। यहाँ आकर मैं जैसे अपने अंदर उतर गया हूँ। ऐसा लग रहा है, जैसे मेरी आत्मा गंगा में स्नान कर रही है।
कल्लू जी: और संतों का वैराग्य देखिए — धन का लोभ नहीं, केवल संतोष। क्या आजकल ऐसा कहीं देखने को मिलता है?
लेखक: सचमुच, इस यात्रा ने मेरी सोच को बदल दिया है। लगता है जैसे मन को कोई नया रास्ता मिल गया हो।

(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।”
लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए- जैसे पर्वत बोल रहे हों।

उत्तर: 
लेखक: (पर्वतों को निहारते हुए) हे पर्वतों! तुम्हारी ऊँचाई और स्थिरता को देखकर मन श्रद्धा से भर जाता है।
पर्वत: (मुस्कराते हुए) धन्यवाद, पथिक! हम सदियों से यहीं खड़े हैं — स्थिर, शांत और साक्षी।
लेखक: क्या आप कभी थकते नहीं? न गर्मी से, न वर्षा से, न सर्दी से?
पर्वत: नहीं, क्योंकि हमारा काम है सहना और सँभालना। हम धरती की रीढ़ हैं — तुम्हें छाया, हवा, जल और शांति देते हैं।
लेखक: तुम्हारे ऊपर की हरियाली, झरनों की ध्वनि और हवा की गंध — सबकुछ मंत्रमुग्ध कर देता है।
पर्वत: यह सब तुम्हारे मन की निर्मलता पर निर्भर करता है। जब मन शांत होता है, तब ही प्रकृति की आवाज़ सुनाई देती है।
लेखक: मैं धन्य हो गया। तुम्हारी गोद में बैठकर मैं खुद को खोज रहा हूँ।
पर्वत: खोजते रहो, पथिक। जब तक भीतर प्रकृति न जागे, तब तक सच्चा सुख नहीं मिलता।

‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग

इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दीजिए-

  • विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।
  • यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं।

आप जानते ही हैं कि एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ है’ का प्रयोग किया जाता है और बहुवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘हैं’ का। सोचिए, ‘गंगा’ शब्द एकवचन है, फिर भी इसके साथ ‘हैं’ क्यों लिखा गया है?
इसका कारण यह है कि कभी-कभी हम आदर-सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एकवचन संज्ञा शब्दों को भी बहुवचन के रूप में प्रयोग करते हैं। इसे ‘आदरार्थ बहुवचन’ प्रयोग कहते हैं। उदाहरण के लिए-

  • मेरे पिता जी सो रहे हैं।
  • भारत के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हैं।

अब ‘आदरार्थ बहुवचन’ को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
उत्तर: