लेखक परिचय
माधवराव सप्रे हिंदी के शुरुआती कहानीकार थे। उनकी मातृभाषा मराठी थी और उनका जन्म मध्य प्रदेश के दमोह में हुआ था। वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से प्रेरित होकर हिंदी साहित्य में आए। उन्होंने तिलक की प्रसिद्ध पुस्तक गीता-रहस्य का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट शामिल हैं। उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि समाज की सोच और रिश्तों पर भी सवाल उठाती है।

माधवराव सप्रे
मुख्य विषय
कहानी “एक टोकरी भर मिट्टी” में दिखाया गया है कि धन और ताकत के घमंड में इंसान अक्सर गलत रास्ता चुन लेता है और दूसरों के दुख को नहीं समझ पाता। ज़मींदार ने लालच और अहंकार में आकर एक गरीब वृद्धा की झोंपड़ी छीन ली, लेकिन वृद्धा की सच्ची बात ने उनका दिल बदल दिया। टोकरी भर मिट्टी न उठा पाने पर उन्हें समझ आया कि किसी का घर और यादें छीनना कितना भारी बोझ होता है। यह कहानी बताती है कि दूसरों की भावनाओं और उनके जीवन से जुड़ी चीज़ों का सम्मान करना चाहिए। अंत में, दया और समझदारी ही इंसान को सही रास्ते पर ले आती है।

कहानी का सार
यह कहानी एक गरीब, अनाथ वृद्धा और एक अमीर ज़मींदार की है। ज़मींदार के पास एक बड़ा महल था, और उसके पास ही वृद्धा की छोटी सी झोंपड़ी थी। ज़मींदार को अपने महल का आंगन बढ़ाने की इच्छा हुई, और इसके लिए उसे वृद्धा की झोंपड़ी चाहिए थी। उसने वृद्धा से कई बार कहा कि वह अपनी झोंपड़ी हटा ले, लेकिन वृद्धा इसके लिए तैयार नहीं थी। उस झोंपड़ी में उसकी जिंदगी की कई यादें थीं। वहां उसका पति और उसका इकलौता बेटा मर चुका था।

उसकी बहू भी एक पांच साल की बेटी को छोड़कर मर गई थी। अब उसकी पोती ही उसका एकमात्र सहारा थी। जब उसे अपनी पुरानी जिंदगी याद आती, तो वह रोने लगती थी। जब से उसने सुना कि ज़मींदार उसकी झोंपड़ी लेना चाहता है, तब से वह बहुत दुखी और कमजोर हो गई थी। वह उस झोंपड़ी से इतना प्यार करती थी कि वह मरने से पहले वहां से नहीं हटना चाहती थी।

ज़मींदार ने बहुत कोशिश की, लेकिन वृद्धा नहीं मानी। आखिरकार, उसने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। उसने वकीलों को पैसे देकर अदालत से वृद्धा की झोंपड़ी पर कब्जा कर लिया और उसे वहां से निकाल दिया। बेचारी वृद्धा अनाथ थी, इसलिए वह पास-पड़ोस में कहीं और रहने चली गई।

एक दिन जमींदार उस झोंपड़ी के पास टहल रहा था और अपने नौकरों को काम बता रहा था। तभी वृद्धा एक टोकरी लेकर वहां आई। ज़मींदार ने उसे देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे वहां से हटा दो। लेकिन वृद्धा गिड़गिड़ाकर बोली, “महाराज, अब तो यह झोंपड़ी आपकी हो चुकी है। मैं इसे लेने नहीं आई। मेरी आपसे एक विनती है।” ज़मींदार ने सिर हिलाकर उसे बोलने की इजाजत दी।
वृद्धा ने कहा, “जब से यह झोंपड़ी मुझसे छीनी गई है, मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानती। वह बार-बार कहती है कि अपने घर जाऊंगी और वही रोटी खाऊंगी। इसलिए मैंने सोचा कि इस झोंपड़ी की थोड़ी सी मिट्टी लेकर जाऊंगी और उससे चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। शायद तब मेरी पोती खाना खाने लगे। कृपया मुझे इस टोकरी में मिट्टी ले जाने की इजाजत दें।” ज़मींदार ने उसे मिट्टी ले जाने की अनुमति दे दी।

वृद्धा झोंपड़ी के अंदर गई। वहां पहुंचते ही उसे अपनी पुरानी यादें ताजा हो गईं, और वह रोने लगी। उसने अपने दुख को किसी तरह संभाला और टोकरी में मिट्टी भर ली। फिर वह बाहर आई और जमींदार से हाथ जोड़कर बोली, “महाराज, कृपया इस टोकरी को थोड़ा सा छू दें ताकि मैं इसे अपने सिर पर रख सकूं।” जमींदार पहले तो बहुत गुस्सा हुए, लेकिन वृद्धा बार-बार गिड़गिड़ाने लगी और उनके पैरों पर गिर गई।
आखिरकार, ज़मींदार को उस पर दया आ गई। उन्होंने किसी नौकर को नहीं बुलाया और खुद टोकरी उठाने के लिए आगे बढ़े। लेकिन जब उन्होंने टोकरी को उठाने की कोशिश की, तो वह बहुत भारी लगी। उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाई, लेकिन टोकरी एक इंच भी नहीं उठी। शर्मिंदगी के साथ उन्होंने कहा, “नहीं, यह टोकरी मुझसे नहीं उठेगी।”

यह सुनकर वृद्धा बोली, “महाराज, नाराज न हों। आप एक टोकरी मिट्टी नहीं उठा पा रहे, और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी है। उसका बोझ आप पूरी जिंदगी कैसे उठाएंगे? इस बारे में सोचिए।” वृद्धा के ये शब्द सुनकर ज़मींदार को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ। उन्होंने वृद्धा से माफी मांगी और उसकी झोंपड़ी उसे वापस दे दी।
कहानी की मुख्य बातें
- कहानी का आधार: यह कहानी एक गरीब, अनाथ वृद्धा और एक अमीर ज़मींदार के बीच की घटना पर आधारित है। वृद्धा की झोंपड़ी ज़मींदार के महल के पास थी।
- ज़मींदार की इच्छा: ज़मींदार अपने महल का अहाता बढ़ाना चाहता था और इसके लिए वृद्धा की झोंपड़ी को हटाना चाहता था।
- वृद्धा का लगाव: वृद्धा की झोंपड़ी में उसकी पुरानी यादें थीं। उसका पति और बेटा वहाँ मरे थे, और अब उसकी पोती ही उसका एकमात्र सहारा थी। वह झोंपड़ी छोड़ना नहीं चाहती थी।
- ज़मींदार की चाल: ज़मींदार ने वकीलों की मदद से अदालत से झोंपड़ी पर कब्ज़ा कर लिया और वृद्धा को वहाँ से निकाल दिया।
- वृद्धा की विनती: वृद्धा एक टोकरी मिट्टी लेने झोंपड़ी आई। उसने ज़मींदार से कहा कि उसकी पोती झोंपड़ी की मिट्टी से बने चूल्हे की रोटी ही खाएगी।
- ज़मींदार का प्रयास: वृद्धा ने ज़मींदार से टोकरी को छूकर उसे सिर पर रखने में मदद माँगी। ज़मींदार ने टोकरी उठाने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत भारी थी और उठी नहीं।
- वृद्धा का संदेश: वृद्धा ने कहा कि अगर एक टोकरी मिट्टी नहीं उठती, तो पूरी झोंपड़ी का बोझ ज़मींदार कैसे उठाएगा? यह सुनकर ज़मींदार को अपनी गलती का एहसास हुआ।
- ज़मींदार का पश्चाताप: ज़मींदार ने अपनी गलती मानी, वृद्धा से माफी माँगी, और उसकी झोंपड़ी वापस कर दी।

कहानी से शिक्षा
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धन और ताकत के घमंड में कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा दूसरों की भावनाओं और परेशानियों को समझना चाहिए। किसी को उसके घर या अधिकार से बेघर करना बहुत गलत है। सच्ची ताकत पैसा या शक्ति नहीं, बल्कि दया, करुणा और इंसानियत होती है। अगर हमसे गलती हो जाए तो उसे मानकर सुधार लेना ही सही रास्ता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि दूसरों के दुःख को समझकर ही हम अच्छे इंसान बन सकते हैं।
शब्दार्थ
- ज़मींदार: गाँव या क्षेत्र में ज़मीन का मालिक
- अहाता: घर या भवन के चारों ओर घिरा हुआ खुला स्थान
- बहुतेरा कहा: बहुत बार समझाया
- पतोहू: पुत्रवधू, बहू
- आधार: सहारा, सहायक
- मृतप्राय: जो लगभग मर चुका हो
- निष्फल: असफल
- चाल चलना: कोई योजना या उपाय अपनाना
- बाल की खाल निकालना: बहुत बारीकी से खोज करना
- वकील की थैली गरम करना: वकील को रिश्वत देना या अधिक पैसे देना
- कब्ज़ा करना: अपने अधिकार में लेना
- गिड़गिड़ाना: विनती करना, बार-बार आग्रह करना
- चूल्हा: रोटी पकाने का स्थान
- स्मरण: याद आना
- आंतरिक: भीतर का
- प्रार्थना: निवेदन, विनती
- लज्जित: शर्मिंदा
- गर्वित: अभिमानी
- कृतकर्म: किए गए काम
- पश्चाताप: गलती पर पछतावा करना