10. सत्रमिते वरं त्याग: (क-भाग:) – Chapter Notes

परिचय

यह पाठ हितोपदेश नामक प्रसिद्ध नीति-ग्रंथ से लिया गया है। इसमें वीरवर नामक राजपुत्र की कथा वर्णित है। वीरवर ने शत्रु-राजा शूद्र की सेवा स्वीकार की, परंतु उसका जीवन त्याग, परोपकार और राष्ट्रभक्ति का आदर्श बना। इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना सर्वस्व त्यागना ही सच्चा धर्म है।

पाठ का सार

नगर और राजा

आसीत् शोभावती नाम नगरी। 
तत्र शूद्रः नाम महापराक्रमी राजा वसति स्म।

एक नगर था जिसका नाम शोभावती था। वहाँ शूद्र नामक बलशाली और पराक्रमी राजा रहता था।

वीरवर का आगमन

अथैदा वीरवरनाम राजपुत्रः वकृत्यर्थं राजद्वारमुपागच्छत्। 
सः स्वपत्नी वेदरता, सुतः शक्तधरः, कन्या वीरवती च सह आगतः।

उसी समय वीरवर नामक राजपुत्र अपनी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तधर और पुत्री वीरवती के साथ आजीविका के लिए राजद्वार पर आया।

राजा से भेंट

वीरवरः – भोः प्रतिहार! वकृत्यर्थमागतोऽस्मि, आनय माम्।

वीरवर ने द्वारपाल से कहा – “मैं सेवा हेतु आया हूँ, मुझे राजा के पास ले चलो।”

राजा – किं ते वर्तनम्? वीरवरः – प्रतिदिनं चतुश्शतं सुवर्णमुद्राः।

राजा ने पूछा – “तुम्हें कितना वेतन चाहिए?” वीरवर ने कहा – “प्रतिदिन चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ।”

राजा – नैतत् शक्यम्!

राजा बोला – “यह संभव नहीं।”

मन्त्री की सलाह और नियुक्ति

मन्त्री – देव! प्रथमं परीक्ष्यतामस्य स्वरूपम्, ततः एव वेतनं दातव्यम्।

मन्त्री ने कहा – “हे महाराज! पहले इसके आचरण और योग्यता की परीक्षा होनी चाहिए, फिर वेतन दिया जाए।”

ततः ताम्बूलदानादिना राजा तं नियुक्तवान्। 
वीरवरः प्रतिदिनं वेतनं लब्ध्वा देवभ्यः अर्धं यच्छति स्म, शेषं दरिद्रभ्यः ददाति, पत्न्याः भोजनविलासे व्ययति च।

फिर राजा ने उसे नियुक्त कर लिया। 
वीरवर वेतन पाकर उसका एक भाग देवताओं को अर्पित करता, कुछ दरिद्रों को देता और शेष घर पर भोजन में लगाता।

मध्यरात्रि का रोदन

कृष्णचतुर्दश्यामधिरात्रे राजा श्रुतवान् रुणरोदनध्वनिम्।

एक दिन कृष्णचतुर्दशी की रात राजा ने रोने की ध्वनि सुनी।

राजा – कः अत्र? वीरवरः – सेवकः वीरवरः। 
राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!

राजा ने पूछा – “कौन है वहाँ?” वीरवर ने उत्तर दिया – “मैं सेवक वीरवर हूँ।” 
राजा ने कहा – “जाकर इस रोदन का कारण पता करो।”

राजलक्ष्मी का वचन

वीरवरः – का त्वम्? राजलक्ष्मीः – अहं अस्य शूद्रराजस्य राजलक्ष्मीः। 
तृतीये दिने अपराधे राजा मरणं प्राप्स्यति, तदा अहं न स्थास्यामि।

वीरवर ने रो रही सुन्दरी से पूछा – “आप कौन हैं?” उसने उत्तर दिया – “मैं इस शूद्रराजा की राजलक्ष्मी हूँ। 
तीसरे अपराध पर यह राजा मर जाएगा और तब मैं यहाँ से चली जाऊँगी।”

वीरवरः – अस्त्यत्र कश्चिदुपायः?

वीरवर ने पूछा – “क्या कोई उपाय है जिससे आप स्थिर रह सकें और स्वामी जीवित रह सके?”

राजलक्ष्मीः – यदि त्वं स्वस्य सर्वस्वं त्यक्त्वा सदा प्रसन्नमुखेन सर्वमङ्गलायै उपहारं करिष्यसि, तदा शूद्रराजः शतवर्षं जीवेत।

राजलक्ष्मी ने कहा – “यदि तुम अपना सर्वस्व त्याग कर प्रसन्न मुख से सर्वमंगल देवी को अर्पित करोगे तो शूद्रराजा सौ वर्ष तक जीवित रहेगा।”

शब्दार्थ

  • महापराक्रमी – अत्यन्त बलशाली
  • नानाशास्त्रवित् – अनेकों शास्त्रों का ज्ञाता
  • प्रतिहारः – द्वारपाल
  • वर्तनम् – वेतन
  • उपपन्नम् – उपयुक्त, उचित
  • धृतायतुधः – शस्त्रधारी
  • रुणरोदनध्वनिः – रोने की ध्वनि
  • अनाथा – बिना रक्षक
  • दुष्साध्या – कठिनाई से सम्भव

व्याकरण बिन्दु

  • वाक्यान्वयः – संस्कृत साहित्य में पदक्रम विशेष प्रकार से बदला जाता है, जैसे –
    • सामान्य क्रमः – रामः वनं गच्छति।
    • साहित्य क्रमः – वनं गच्छति रामः।
  • भूतकाल प्रयोगः – उपागच्छत, अनयत, श्रुतवान् इत्यादि।