कहानी का परिचय
यह कहानी अरुणाचल प्रदेश के चौखाम गाँव की है। वल्लरी के पिताजी वहाँ काम करते हैं और उन्होंने अपने परिवार को भी बुला लिया है। दिल्ली की भीड़-भाड़ और शोरगुल से अलग, चौखाम का वातावरण शांत और हरा-भरा है। कहानी में वल्लरी अपनी दोस्त चाऊतान के घर जाती है। वहाँ से वे लोग गाँव में निकल रही एक शोभायात्रा देखते हैं, जिसमें भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ नए मंदिर में ले जाई जा रही हैं। यह मंदिर बाँस और फूलों से बहुत सुंदर सजाया गया है। गाँव के लोग इस समय साङकेन का त्योहार मना रहे हैं। यह उनका नया वर्ष होता है, जिसमें लोग एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, चावल का आटा लगाते हैं, गीत गाते हैं और नाचते हैं। वल्लरी को यह त्योहार होली जैसा लगता है। कहानी हमें बताती है कि अलग-अलग जगहों के त्योहार भले ही अलग हों, लेकिन उनका मकसद खुशी बाँटना और मिल-जुलकर रहना होता है।

मुख्य विषय
यह कहानी अरुणाचल प्रदेश के साङकेन त्योहार के बारे में है। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चौखाम में अपने दोस्त चाऊतान के घर जाती है और वहाँ उसे शोभायात्रा, मंदिर की सजावट, मूर्तियों की पूजा और लोगों का पानी व आटे से खेलना देखने को मिलता है। यह त्योहार उनके यहाँ नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, जैसे हमारे यहाँ होली। इसमें लोग खुश होकर गाते-नाचते हैं, एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं और मिलजुलकर आनंद मनाते हैं।
कहानी का सार
अरुणाचल प्रदेश में एक सुंदर जगह है जिसका नाम है चौखाम। यहाँ का मंडल कार्यालय है, जहाँ वल्लरी के पिताजी एक अधिकारी के रूप में काम करते हैं। इस बार उन्होंने अपने परिवार को दिल्ली से चौखाम बुला लिया। दिल्ली में तो हर तरफ भीड़भाड़, हॉर्न बजाती गाड़ियाँ और लोगों की लंबी-लंबी कतारें दिखती हैं। लेकिन चौखाम बिल्कुल अलग है। यहाँ चारों तरफ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, और शांति है। यहाँ के लोग हमेशा मुस्कुराते रहते हैं।

एक दिन वल्लरी का दोस्त चाऊतान उसे अपने घर बुलाने आया। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चाऊतान के घर गई। जब वे वहाँ पहुँचे, तो चाऊतान के पिताजी घर की सफाई कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने वल्लरी और उसके पिताजी को देखा, उन्होंने सफाई का काम छोड़ दिया और उनका स्वागत किया।
चाऊतान की माँ कई तरह के स्वादिष्ट पकवान ले आईं। वल्लरी और उसके पिताजी ने बड़े चाव से पकवान खाए। तभी वल्लरी ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर एक शोभायात्रा निकल रही थी। इसमें बहुत सारे लोग थे। कुछ लोग अपने कंधों पर पालकियाँ लिए हुए थे। इन पालकियों में बड़ी-बड़ी और सुंदर मूर्तियाँ रखी थीं। लोग नाचते-गाते, खुशी-खुशी आगे बढ़ रहे थे।
वल्लरी ने चाऊतान से पूछा, “ये लोग कहाँ जा रहे हैं? सब बहुत खुश दिख रहे हैं।”
चाऊतान ने बताया, “हमारे गाँव के लोगों ने कुछ दिन पहले नदी के किनारे एक मंदिर बनाया है। ये लोग बौद्ध-विहार से भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ लाए हैं। अब वे इन्हें मंदिर ले जा रहे हैं। ये मूर्तियाँ तीन दिन तक मंदिर में रहेंगी। गाँव के लोग हर दिन इन पर जल चढ़ाएँगे और इनकी पूजा करेंगे।”
वल्लरी के पिताजी ने पूछा, “क्या हम भी इस शोभायात्रा में शामिल हो सकते हैं?”
चाऊतान के पिताजी ने कहा, “हाँ, बिल्कुल! चलो, हम सब चलते हैं।”
सब लोग शोभायात्रा में शामिल हो गए। लोग गाते, बाजे बजाते, और नाचते-कूदते हुए चल रहे थे। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
थोड़ी देर बाद शोभायात्रा मंदिर के पास पहुँची। मंदिर बहुत सुंदर था। इसकी दीवारें बाँस और बाँस की खपच्चियों से बनी थीं। दीवारों में जगह-जगह हरी-हरी टहनियाँ लगाई गई थीं, और उन पर रंग-बिरंगे फूल सजाए गए थे। वल्लरी को ऐसा सादा और सुंदर मंदिर पहले कभी नहीं दिखा था।
भीड़ मंदिर के द्वार पर इकट्ठा हो गई। बौद्ध भिक्षुओं ने मंत्र पढ़ते हुए मूर्तियों को पालकियों से उतारा और मंदिर में रख दिया। फिर उन्होंने मूर्तियों की पूजा शुरू की और उन पर जल चढ़ाया।
वहाँ का माहौल बहुत खुशहाल था। वल्लरी ने देखा कि लोग एक-दूसरे पर बाल्टियों से पानी डाल रहे थे। कुछ लोग एक-दूसरे के चेहरों पर चावल का आटा भी लगा रहे थे। वल्लरी को अपने शहर की होली याद आ गई। उसने चाऊतान से कहा, “चाऊतान भाई, ये तो होली जैसा लग रहा है।”
चाऊतान ने जवाब दिया, “नहीं, ये होली नहीं है। आज हमारा साङकेन का त्योहार है। आज से हमारा नया साल शुरू होता है।”
वल्लरी ने बताया, “हमारे यहाँ भी होली से नया साल शुरू होता है। होली के दिन हम लोग एक-दूसरे पर रंगीन पानी और गुलाल डालते हैं। अगले दिन लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, मिठाइयाँ और नमकीन खाते हैं, और मेहमानों का स्वागत करते हैं।”
चाऊतान ने कहा, “आज शाम को हम भी अपने ताऊजी के घर जाएँगे। ताईजी ने कई तरह के पकवान बनाए होंगे। हम उन्हें प्रणाम करेंगे, और वे हमें आशीर्वाद देंगे। कल मेरी बुआजी और फूफाजी हमारे घर आएँगे।”
तभी किसी ने वल्लरी और उसके पिताजी पर एक बालटी पानी डाल दिया। वे पूरी तरह भीग गए। फिर लोग देर तक एक-दूसरे पर पानी डालते रहे और साङकेन का त्योहार मनाते रहे।

चाऊतान ने बताया, “तीन दिन तक साङकेन का त्योहार ऐसे ही मनाया जाता है। तीसरे दिन बौद्ध भिक्षु इन मूर्तियों को फिर से पालकियों में रखकर बौद्ध-विहार ले जाएँगे। वहाँ मंत्र पढ़कर मूर्तियों को उनके स्थान पर रखा जाएगा।”
चाऊतान के पिताजी ने कहा, “फिर गाँव के लोग बौद्ध-विहार जाएँगे और भिक्षुओं को बार-बार प्रणाम करेंगे। भिक्षु हमें आशीर्वाद देंगे –

कहानी की मुख्य बातें
- वल्लरी के पिताजी अरुणाचल प्रदेश के चौखाम में अधिकारी हैं और उन्होंने दिल्ली से परिवार को बुला लिया।
- चौखाम दिल्ली की भीड़ और शोर से अलग, बहुत शांत और हरा-भरा स्थान है।
- वल्लरी अपने पिताजी के साथ दोस्त चाऊतान के घर गई।
- चाऊतान के माता-पिता ने उनका स्वागत किया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए।
- वल्लरी ने सड़क पर एक शोभायात्रा देखी जिसमें लोग मूर्तियाँ लेकर मंदिर जा रहे थे।
- यह मूर्तियाँ बौद्ध-विहार से लाकर नए बने मंदिर में रखी जानी थीं और तीन दिन पूजा होनी थी।
- सब लोग शोभायात्रा में शामिल होकर गाते, बजाते और नाचते हुए मंदिर पहुँचे।
- मंदिर बाँस और फूलों से सजाया गया था, बहुत सुंदर और सादा था।
- लोग मूर्तियों की पूजा कर रहे थे और एक-दूसरे पर पानी डाल रहे थे, चेहरों पर चावल का आटा लगा रहे थे।
- चाऊतान ने बताया कि यह साङकेन का त्योहार है और इससे उनका नया साल शुरू होता है।
- वल्लरी ने बताया कि उनके यहाँ होली से नया साल शुरू होता है।
- साङकेन तीन दिन तक मनाया जाता है और आखिरी दिन मूर्तियाँ वापस बौद्ध-विहार ले जाई जाती हैं।
- त्योहार के अंत में भिक्षु लोगों को आशीर्वाद देते हैं कि उनकी खेती अच्छी हो और सब खुश रहें।
कहानी से शिक्षा
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि त्योहार खुशी और मिलजुलकर मनाने के लिए होते हैं। हमें एक-दूसरे की परंपराओं और संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए। मिलजुलकर रहने से प्यार और दोस्ती बढ़ती है। अतिथियों का स्वागत करना और उनका आदर करना एक अच्छी आदत है। परंपराएँ हमें अपनी संस्कृति से जोड़ती हैं और हमें एकता का अनुभव कराती हैं।
शब्दार्थ
- मंडल कार्यालय: प्रशासनिक क्षेत्र का दफ्तर
- भीड़-भाड़ वाली सड़कें: बहुत अधिक लोगों और वाहनों वाली सड़कें
- पालकी: कंधों पर उठाकर ले जाने की डिब्बेनुमा सवारी
- शोभायात्रा: किसी पर्व या अवसर पर सजाकर निकाली जाने वाली यात्रा
- बौद्ध-विहार: बौद्ध भिक्षुओं का मठ या धर्मस्थल
- भिक्षु: बौद्ध धर्म का साधु
- प्रतिदिन: हर दिन
- जालीदार: जाल की तरह बनी हुई संरचना
- खपच्ची: बाँस या लकड़ी की पतली पट्टी
- टहनियाँ: पेड़ों की छोटी शाखाएँ
- सादा: साधारण, बिना दिखावे का
- मंत्र: धार्मिक अवसर पर पढ़े जाने वाले पवित्र वाक्य
- गुलाल: रंग-बिरंगा सूखा पाउडर जो होली पर लगाया जाता है
- अतिथि: मेहमान
- आशीर्वाद: शुभकामना के रूप में दी गई दुआ
- दंडवत प्रणाम: जमीन पर लेटकर किया जाने वाला प्रणाम
- खेती फूले-फले: खेती अच्छी तरह बढ़े और भरपूर उपज दे
- हिल-मिलकर: मिलजुलकर, आपसी मेल से