7. आत्मत्राण – पाठ का सार

कवि परिचय
– रवीन्द्रनाथ ठाकुर

इनका जन्म 6 मई 1861 को धनी परिवार में हुआ है तथा शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। ये नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रथम भारतीय हैं। छोटी उम्र में ही स्वाध्याय से अनेक विषयों का ज्ञान इन्होने अर्जित किया। बैरीस्ट्री पढ़ने के लिए विदेश भेजे गए लेकिन बिना परीक्षा दिए ही लौट आये। इनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित होता है। प्रकृति से इनका गहरा लगाव था।

आत्मत्राण पाठ प्रवेश
यदि कोई तैरना सीखना चाहता है तो कोई उसे पानी में उतरने में मदद तो कर सकता है, ताकि उसे डूबने का डर न रहे; परन्तु जब तैरना सीखने वाला पानी में हाथ – पैर चलाएगा तभी वो तैराक बनेगा। परीक्षा जाते समय व्यक्ति बड़ों के आशीर्वाद की कामना करता ही है ,और बड़े आशीर्वाद देते भी हैं लेकिन परीक्षा तो उसे खुद ही देनी होती है। इसी तरह जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तब उनका उत्साह तो सभी लोग बढ़ाते हैं जिससे उनका मनोबल अर्थात हौंसला बढ़ता है। मगर कुश्ती तो उन्हें खुद ही लड़नी पड़ती है।
प्रस्तुत पाठ में कविगुरु मानते हैं कि प्रभु में सबकुछ संभव करने की ताकत है फिर भी वह बिलकुल नहीं चाहते कि वही सब कुछ करे। कवि कामना करते हैं कि किसी भी आपदा या विपदा में ,किसी भी परेशानी का हल निकालने का संघर्ष वो स्वयं करे ,प्रभु को कुछ भी न करना पड़े। फिर आखिर वो अपने प्रभु से चाहते क्या हैं।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रस्तुत कविता का बंगला से हिंदी अनुवाद श्रद्धेय आचार्य हरी प्रसाद द्विवेदी ने किया है। द्विवेदी जी का हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने में बहुत बड़ा योगदान है। यह अनुवाद बताता है कि अनुवाद कैसे मूलतः  रचना की ‘आत्मा ‘ को ज्यों का त्यों  बनाये रखने में सक्षम है। 

कविता का सार
आत्मत्राण’ मूलतः बांग्ला में लिखी गई है। इस कविता का हिंदी अनुवाद ‘आचार्य हरि प्रसाद द्विवेदी’ ने किया है।
यह कविता अन्य प्रार्थनाओं से भिन्न है। कवि इस कविता के माध्यम से ईश्वर से शक्ति पाने की कामना करता है। वह नहीं चाहते कि ईश्वर उसके हर मार्ग, हर विपत्ति को सरल बना दें। वह ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि विपत्ति के समय मुझमें इतनी शक्ति भर दो कि मैं सभी मुसीबतों का सामना कर सकूँ। यदि मुझे कोई सहायक न मिले तो भी मेरा पौरुष बल न डगमगाए पाए। यदि मुझे जीवन-संग्राम में धोखा ही उठाना पड़े, तब भी मैं हार न मानूँ। तुम मुझे भय से छुटकारा न दिलाओ, मुझे सांत्वना न दो। पर इतनी कृपा करना कि मैं निडर होकर सब कुछ सहन कर सकूँ। मैं सुख के दिनों में शीश झुकाकर तुम्हें नमन करना चाहता हूँ। मैं क्षण-क्षण तुम्हारा मुख पहचानना चाहता हूँ। दुख रूपी रात में जब मुझे धोखा खाना पड़े, तब भी मैं तुम पर संदेह न करूँ। हे ईश्वर! मुझे इतनी शक्ति प्रदान करो।

कविता की व्याख्या

1. 
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
 केवल इतना हो (करुणामय)
 कभी न विपदा में पाऊँ भय।
 दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
 पर इतना होवे (करुणामय)
 दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
 कोई कहीं सहायक न मिले
 तो अपना बल पौरुष न हिले
 हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
 तो भी मन में ना मानूँ क्षय।।

शब्दार्थ:

  • विपदा – विपत्ति ,मुसीबत
  • करुणामय – दूसरों पर दया करने वाला
  • दुःख-ताप – कष्ट की पीड़ा
  • व्यथित – दुःखी
  • चित्त – मन
  • सांत्वना – दिलासा
  • सहायक – मददगार
  • पौरुष – पराक्रम
  • वंचना – वंचित
  • क्षय – नाश

व्याख्या:  प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कविता आत्मत्राण से उद्धृत हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि मैं स्वयं को कष्टों से दूर रखने की विनती नहीं कर रहा हूँ | बल्कि आप मुझे उन तमाम कष्टों को सहने की शक्ति प्रदान करें | कवि ठाकुर जी अपने कष्ट भरे वक़्त में ईश्वर की सहायता नहीं चाहते, बल्कि वे कष्टों पर विजय हासिल करने के लिए आत्मविश्वास और हौसला की कामना करते हैं | कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं कि चाहे जितना भी तकलीफ़ क्यों न आ जाए, मगर हमारा पुरुषार्थ डगमगा न सके | कवि कहते हैं कि यदि हमें नुकसान उठाना पड़े, तो भी मुझे इतनी शक्ति देना की हम उस चुनौती का सामना सरलतापूर्वक कर सकें | 

काव्य-सौंदर्य:

भाव पक्ष: 1. कवि ईश्वर से विपदाओं वेफ समय में पौरुष एवं शक्ति देने की प्रार्थना कर रहे हैं।
2. संघर्षमय समय में व्यथित न होने वेफ लिए वह ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं।

कला पक्ष: 1. भाषा सहज एवं सरल है। भाषा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
2. ‘कोई कहीं’ में अनुप्रास अलंकार है।

2. मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
 बस इतना होवे (करुणामय)
 तरने की हो शक्ति अनामय।
 मेरा भार अगर लघु करवेफ न दो सांत्वना नहीं सही।
 केवल इतना रखना अनुनय –
 वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
 नत शिर होकर सुख के दिन में
 तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
 दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही।
 उस दिन ऐसा हो करुणामय,
 तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।

शब्दार्थ: 

  • त्राण – भय निवारण ,बचाव
  • अनुदिन  – प्रतिदिन
  • तरने – पार करना
  • अनामय – रोग रहित
  • लघु – कम
  • सांत्वना – हौसला ,तसली देना
  • अनुनय- विनय
  • वहन  – सामना करना
  • निर्भय – बिना डर के
  • नत शिर – सिर झुका कर
  • दुःख-रात्रि  – दुःख से भरी रात
  • निखिल – सम्पूर्ण
  • संशय – संदेह

व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कविता आत्मत्राण से उद्धृत हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कहते हैं कि हे प्रभु ! मेरी यह विनती नहीं है कि आप हर रोज मुझे डर से मुक्ति दिलाओ | मेरी रक्षा करो | बस आप मुझे रोग मुक्त और स्वस्थ रखें, ताकि मैं अपने बलबूते इस संसार के तमाम कष्टों को पार कर सकूँ | कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए आगे कहते हैं कि आप मेरी तकलीफ़ों को कम करें और मेरा ढाढ़स बंधाएँ | आप मुझमें निडरता पैदा करें, ताकि मैं हर कष्टों से डटकर मुकाबला कर सकूँ | कवि कहते हैं कि दुःखों से भरी रात में जब पूरी दुनिया मुझे धोखा दे, मेरी सहायता करने से इनकार कर दे | फिर भी मेरे अंदर आपके (ईश्वर) प्रति संदेह न उत्पन्न हो | हे प्रभु ! कुछ ऐसी ही शक्ति मुझमें भरना | 

काव्य-सौंदर्य:

भाव पक्ष:1. कवि ईश्वर से विशेष शक्ति पाने की प्रार्थना कर रहा है।
2. कवि क्षण-क्षण ईश्वर के दर्शन करने की कामना कर रहा है।
3. उदार हृदय व्यक्ति के गुणों का बखान किया गया है।

भाषा: 1. सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग किया गया है। भाषा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
2. ‘छिन-छिन’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
3. छंदमुक्त कविता है।