11. तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेन्द्र – पाठ का सार

कवि परिचय

प्रहलाद अग्रवाल (1947) का जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ। इन्होंने हिंदी में एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त की और किशोर वय से हिंदी फ़िल्मों के इतिहास तथा फ़िल्मकारों के जीवन पर गहरी रुचि और अध्ययन किया। वर्तमान में, सतना के शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत, अग्रवाल फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विषयों पर कई महत्वपूर्ण लेखन कर चुके हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ में ‘सातवाँ दशक’, ‘तानाशाह’, ‘मैं खुशबू’, ‘सुपर स्टार’, ‘राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना’, ‘कवि शैलेंद्र : ज़िंदगी की जीत में यकीन’, ‘प्यासा : चिर अतृप्त गुरुदत्त’, ‘उत्ताल उमंग : सुभाष घई की फ़िल्मकला’, ‘ओ रे माँझी : बिमल राय का सिनेमा’, और ‘महाबाज़ार के महानायक : इक्कीसवीं सदी का सिनेमा’ शामिल हैं।

पाठ प्रवेश

साल के किसी भी महीने का शुक्रवार लगभग हमेशा हिंदी फ़िल्मों की प्रदर्शनी का दिन होता है। कुछ फ़िल्में सफल होती हैं, जबकि कुछ दर्शकों के मन में छाप छोड़ने में असफल रहती हैं। जब एक फ़िल्मकार किसी साहित्यिक कृति को पूरी लगन और ईमानदारी से पर्दे पर उतारता है, तो उसकी फ़िल्म न केवल यादगार बनती है, बल्कि दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कृति ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’ को सिनेमा में लाना एक ऐसा ही उदाहरण है, जिसे आज भी हिंदी सिनेमा की अमर फ़िल्मों में गिना जाता है। यह फ़िल्म राजकपूर और वहीदा रहमान की बेहतरीन अदाकारी और संगीतमयता के साथ एक उत्कृष्ट कृति है।

पाठ सार

फिल्मी गीतकार शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु की अमर कृति ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’ को सिनेमा परदे पर उतारा, और यह फिल्म एक मील का पत्थर साबित हुई। यह फिल्म साबित करती है कि हिंदी फिल्म जगत में सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फिल्म बनाना कितना कठिन और जोखिम भरा कार्य है।
फिल्म ‘संगम’ की सफलता के बाद राजकपूर ने एक साथ चार फिल्मों में काम करने का विचार किया, जिनमें ‘तीसरी कसम’ भी शामिल थी। ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र की पहली और अंतिम फिल्म थी, और इस फिल्म को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। यह फिल्म कला से परिपूर्ण थी और इसमें शैलेंद्र की भावनाओं का सुंदर चित्रण था।
राजकपूर, जो अपनी आँखों से अभिनय में माहिर थे, ने शैलेंद्र की भावनाओं को बड़े खूबसूरती से फिल्म में जीवंत किया। शैलेंद्र ने अपनी कविता और फिल्म की कहानी में उन भावनाओं को शब्द रूप दिया, जिन्हें राजकपूर ने अभिनय में ढाला।
शैलेंद्र को कभी भी धन या नाम की इच्छा नहीं थी, वह बस अपने काम से संतुष्ट थे। ‘तीसरी कसम’ फिल्म को बड़े मुश्किल से प्रदर्शित किया गया क्योंकि इसके भावनात्मक पहलुओं को समझना मुनाफे की उम्मीद रखने वालों के लिए आसान नहीं था। फिल्म के गीतों को भी शैलेंद्र ने बड़ी गहरी समझ से लिखा, और उनके गीतों का अर्थ अक्सर गहरे और शांत होते हुए भी विशाल होता था, जैसे नदी का गहरा समुद्र।
फिल्म की खासियत यह थी कि दुःख को जीवन की सही परिस्थितियों की तरह प्रस्तुत किया गया था, बिना किसी ओवरड्रामा के। ‘तीसरी कसम’ फिल्म साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय करती है, और इसका मुख्य लेखन फणीश्वरनाथ रेणु का था, जिसका हर छोटा-से-छोटा हिस्सा फिल्म में सटीक रूप से दिखाई दिया।

पाठ का परिप्रेक्ष्य

‘तीसरी कसम’ केवल एक फ़िल्म नहीं है, बल्कि यह साहित्य और सिनेमा के बीच एक महत्वपूर्ण पुल है। शैलेंद्र की संवेदनशीलता और राजकपूर की अदाकारी ने इस फ़िल्म को एक अनमोल कृति बना दिया। यह फ़िल्म एक आदर्शवादी कवि की दृष्टि और एक महान अभिनेता की क्षमता को दर्शाती है, जिन्होंने मिलकर एक ऐसी कृति बनाई, जो न केवल दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें गहराई से प्रभावित भी करती है। ‘तीसरी कसम’ ने यह साबित किया कि कला के हर रूप को ईमानदारी और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है।