लेखक परिचय
शिवपूजन सहाय हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक थे। उनका जन्म 1893 में बिहार के शाहाबाद जिले में हुआ था। उन्होंने हिंदी गद्य लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया और कहानी, निबंध, उपन्यास, और संस्मरण आदि विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाएँ सरल भाषा, मार्मिकता और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत होती हैं। ‘माता का आँचल’ उनकी चर्चित रचनाओं में से एक है। उनकी भाषा सहज, सुंदर और भावपूर्ण है। शिवपूजन सहाय को उनकी लेखन शैली के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनका निधन 1963 में हुआ।

मुख्य बिंदु
- पिता का प्यार: बाबूजी का भोलानाथ के साथ आत्मीय रिश्ता, जो पूजा, खेल और मस्ती में दिखता है।
- माँ की ममता: माँ का प्यार भोजन खिलाने, सजाने और संकट में सांत्वना देने में झलकता है।
- बचपन की मस्ती: भोलानाथ और दोस्तों के नाटक और शरारतें बचपन की मासूमियत दिखाती हैं।
- माता का आँचल: माँ का आँचल सुरक्षा और शांति का प्रतीक है, जहाँ भोलानाथ को डर से राहत मिलती है।
पाठ का सार
‘माता का आँचल’ कहानी शिवपूजन सहाय के बचपन की मासूम यादों पर आधारित है। लेखक का असली नाम तारकेश्वरनाथ है, लेकिन पिता उन्हें प्यार से ‘भोलानाथ’ कहते थे। भोलानाथ अपने पिता को ‘बाबूजी’ और माँ को ‘मइयाँ’ पुकारते थे। उनका ज्यादातर समय अपने पिता के साथ और दोस्तों के साथ मस्ती में बीतता था।
बाबूजी सुबह जल्दी उठकर पूजा करते और भोलानाथ को भी अपने साथ स्नान करवाकर पूजा में बिठाते। वे भोलानाथ के माथे पर भभूत का तिलक लगाते, जिससे भोलानाथ ‘बम भोला’ जैसे लगते। पूजा के बाद बाबूजी ‘राम-नाम’ लिखते और आटे की गोलियों में राम-नाम की पर्चियाँ लपेटकर गंगा जी में मछलियों को खिलाते। भोलानाथ उनके कंधे पर बैठकर यह सब देखते और मस्ती करते। घर लौटते वक्त बाबूजी उन्हें झूले पर झुलाते या उनके साथ कुश्ती खेलते।

माँ भोलानाथ को बहुत प्यार करती थीं। वे उन्हें पक्षियों के नाम से कौर बनाकर दही-भात खिलातीं और जबरदस्ती उनके सिर में तेल लगाकर चोटी सजातीं। इससे भोलानाथ ‘कन्हैया’ जैसे दिखते। भोलानाथ अपने दोस्तों के साथ मिट्टी की मिठाइयों की दुकान, घरौंदा, बारात का जुलूस और खेती जैसे नाटक खेलते। बाबूजी भी इन खेलों में शामिल होकर मज़ा लेते।
आम की फसल ले दौरान आँधी चलने से बहुत से आम गिर जाते थे। बच्चे उन आमों को उठाने भागा करते थे। एक दिन सारे बच्चे आम के बाग़ में खेल रहे थे। तभी बड़ी जोर से आंधी आई। बादलों से पूरा आकाश ढक गया और देखते ही देखते खूब जम कर बारिश होने लगी। काफी देर बाद बारिश बंद हुई तो बाग के आसपास बिच्छू निकल आए जिन्हें देखकर सारे बच्चे डर के मारे भागने लगे। संयोगवश रास्ते में उन्हें मूसन तिवारी मिल गए।
भोलानाथ के एक दोस्त बैजू ने उन्हें चिढ़ा दिया। फिर क्या था बैजू की देखा देखी सारे बच्चे मूसन तिवारी को चिढ़ाने लगे। मूसन तिवारी ने सभी बच्चों को वहाँ से भगा दिया और सीधे उनकी शिकायत करने पाठशाला चले गए। पाठशाला में लेखक और लेखक के साथियों की शिकायत गुरु जी से कर दी। गुरु जी ने सभी बच्चों को स्कूल में पकड़ लाने का आदेश दिया। सभी को पकड़कर स्कूल पहुंचाया गया। दोस्तों के साथ भोलानाथ को भी जमकर मार पड़ी। जब बाबूजी को इस बात की खबर पहुंची तो , वो दौड़े-दौड़े पाठशाला आए। जैसे ही भोलानाथ ने अपने बाबूजी को देखा तो वो दौड़कर बाबूजी की गोद में चढ़ गए और रोते-रोते बाबूजी का कंधा अपने आंसुओं से भिगा दिया। गुरूजी की विनती कर बाबूजी भोलानाथ को घर ले आये।
भोलानाथ काफी देर तक बाबूजी की गोद में भी रोते रहे लेकिन जैसे ही रास्ते में उन्होंने अपनी मित्र मंडली को देखा तो वो अपना रोना भूलकर मित्र मंडली में शामिल होने की जिद्द करने लगे। मित्र मंडली उस समय चिड़ियों को पकड़ने की कोशिश कर रही थी। चिड़ियाँ तो उनके हाथ नहीं आयी। पर उन्होंने एक चूहे के बिल में पानी डालना शुरू कर दिया। उस बिल से चूहा तो नहीं निकला लेकिन सांप जरूर निकल आया।
सांप को देखते ही सारे बच्चे डर के मारे भागने लगे। भोलानाथ भी डर के मारे भागे और गिरते-पड़ते जैसे-तैसे घर पहुंचे। लहूलुहान शरीर लिए जैसे ही घर में घुसे सामने बाबूजी बैठ कर हुक्का पी रहे थे। उन्होंने भोलानाथ को आवाज लगाई परन्तु आज भोलानाथ सीधे अंदर अपनी मां की गोद में जाकर छुप गए। भोलानाथ को ऐसा डरा हुआ देखकर माँ का भी रोना निकल गया। उन्होंने भोलानाथ के जख्मों की पट्टी की और उससे उसके डर का कारण पूछने लगी। बाबूजी ने भोलानाथ को अपनी गोद में लेना चाहा लेखिन डरे व घबराए हुए भोलानाथ को उस समय पिता के मजबूत बांहों के सहारे व दुलार के बजाय अपनी माँ का आंचल ज्यादा सुरक्षित व महफूज लगने लगा।
कहानी से शिक्षा
“माता का आँचल” कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि माँ का स्नेह और सुरक्षा बच्चे के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण होती है। पिता का अनुशासन और धार्मिक संस्कार बच्चों को सही मार्ग दिखाते हैं। बचपन की मासूमियत और खेलों से बच्चे रचनात्मकता और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। गलती पर डाँट और पश्चाताप से बच्चों को अच्छा बनने की प्रेरणा मिलती है। यह कहानी बताती है कि प्रेम, अनुशासन और सुरक्षित वातावरण से ही बच्चों का सही विकास होता है।
शब्दार्थ
- संग: साथ , मिलन , मिलने की क्रिया
- मृदंग: एक तरह का वाद्य यंत्र
- बुड्ढों: वृद्ध , बुजुर्ग का संग , अधिक उम्र का
- तंग: जिसमें उचित व आवश्यक विस्तार का अभाव हो
- तड़के: सुबह के समय , सवेरे – सवेरे , भोर मे
- निबट: समाधान , समायोजन , निर्णय
- बैठक: सभा , बैठने का कमरा , चौपाल , उठने और बैठने की कसरत
- भभूत: वह भस्म जिसको शिव भक्त शरीर पर लगाते हैं , यज्ञ कुंड या धूनी की भस्म
- दिक: जिसे कष्ट पहुँचा हो , परेशान , हैरान , पीड़ित , तंग आया हुआ , अस्वस्थ , बीमार
- झुँझलाकर: क्रुद्ध या व्यथित होकर कोई बात कहना , खीजना , चिड़चिड़ाना , चिढ़ना , बिगड़ना
- लिलार: ललाट , माथा , मस्तक ,भाल
- त्रिपुंड: एक प्रकार का तिलक जिसमें ललाट पर तीन आड़ी या अर्धचंद्राकार रेखाएँ बनाई जाती है
- जटाएँ: सिर के बहुत लंबे , उलझे , आपस में चिपके या गुथे हुए बाल
- रमाने: लगाना