03. तुम कब जाओगे, अतिथि – Previous year question

Very Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: अतिथि के आने पर लेखक का बटुआ अंदर-ही-अंदर क्यों काँप गया?  [2025]
उत्तर:
 अतिथि के आने पर लेखक का हृदय अज्ञात आशंका से धड़क उठा। वह सोचने लगा कि अब मेहमान की मेहमाननवाज़ी में काफ़ी धन खर्च हो जाएगा तथा उसकी आर्थिक स्थिति चरमरा जाएगी। इसी कारण वह अपने बटुए अर्थात् धन की चिंता करने लगा।

प्रश्न 2: चौथे दिन लेखक को क्या आशा हुई?  [2024]
उत्तर: 
लेखक को आशा हुई कि कल अतिथि स्थिति समझकर स्वयं ही चला जाएगा।

प्रश्न 3: अतिथि के आने पर लेखक और उसकी पत्नी के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए?  [2023]
उत्तर:
 जब अतिथि दो दिन के बाद भी विदा नहीं हुआ, तो लेखक तीसरे व चौथे दिन उसे दिखाकर कैलेंडर में तारीखें बदलने लगा, ताकि उसे यह एहसास दिला सके कि उसे लेखक के घर पर ठहरे हुए चार दिन बीत गए हैं तथा अब उसे और अधिक दिन न ठहरकर वापस चले जाना चाहिए।

प्रश्न 4: आर्थिक सीमाओं की बैंजनी मिट्टी खोदने से क्या तात्पर्य है?  [2022]
उत्तर:
 लेखक की आय सीमित है और अतिथि के सत्कार के कारण बजट बिगड़ गया है।

प्रश्न 5: अतिथि के अधिक दिन रुकने से स्थिति में क्या बदलाव आया?  [2021]
उत्तर:
 अतिथि और लेखक दोनों चुप हैं। दोनों के बीच बातचीत नहीं हो रही है।

प्रश्न 6: लेखक ने अतिथि की तुलना एस्ट्रॉनाट्स से क्यों की है?  [2020]
उत्तर: 
लेखक ने कहा है कि एस्ट्रॉनॉट्स लाखों मील लंबी यात्रा तय करने के बाद चाँद पर पहुँचे थे तथा अपना कार्य समाप्त कर वे धरती पर लौट आए थे, किंतु अतिथि छोटी-सी यात्रा तय करके आया था तथा अपने सारे कार्य कर चुकने के बाद भी जाने का नाम तक नहीं ले रहा था। उसे तो उतने दिन भी नहीं रुकना चाहिए था, जितने दिन एस्ट्रॉनॉट्स चाँद पर रुके थे। 

Short Answer Type Questions

प्रश्न 1. उफ, तुम कब जाओगे, अतिथि? इस प्रश्न के द्वारा लेखक ने पाठकों को क्या सोचने पर विवश किया है?  [2025]
उत्तरः इस प्रश्न द्वारा लेखक ने पाठकों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि अच्छा अतिथि कौन होता है? वह, जो पहले से अपने आने की सूचना देकर आए और एक-दो दिन मेहमानी कराके विदा हो जाए न कि वह, जिसके आगमन के बाद मेज़बान वह सब सोचने को विवश हो जाए, जो इस पाठ का मेज़बान निरन्तर सोचता रहा। उफ! शब्द द्वारा मेज़बान की उकताहट को दिखाया गया है।

प्रश्न 2. अच्छा अतिथि कौन कहलाता है ?  [2024]
उत्तरः वास्तव में अच्छा अतिथि तो वही होता है जो पहले से अपने आने की सूचना देकर आए और एक या दो दिन की मेहमानी कराकर विदा ले।

प्रश्न 3. लेखक का बटुआ क्यों काँप गया? ‘तुम कब जाओगे अतिथि’ पाठ के आधार पर लिखिए।  [2024]
अथवा
”अन्दर ही अन्दर कहीं मेरा बटुआ काँप गया।“ कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तरः अतिथि के स्वागत-सत्कार में अधिक खर्च होने व आर्थिक स्थिति बिगड़ने के डर से लेखक का बटुआ काँप उठा।
व्याख्यात्मक हल:
जिस दिन अतिथि आया, मेजबान को उस दिन आशंका हुई कि कहीं वह कुछ दिन ठहरने की इच्छा से तो नहीं आया। उसकी आवभगत पर होने वाले खर्चे का अनुमान लगा कर लेखक भयभीत हो उठा था। उसे अपनी आर्थिक स्थिति बिगड़ने की आशंका सताने लगी।

प्रश्न 4. ‘अतिथि सदैव देवता नहीं होता’ वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है। कथन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
‘अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है।’ आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि आप इस बात से कहाँ तक सहमत हैं?  [2023]
उत्तरः यदि अतिथि थोड़ी देर तक टिकता है तो वह देवता रूप बनाए रखता है, पर फिर वह मनुष्य रूप में आ जाता है। उसका मान-सम्मान होता है, और ज्यादा दिन तक टिकने पर वह राक्षस का रूप ले लेता है। तब वह राक्षस जैसा बुरा प्रतीत होता है। लेखक की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।

प्रश्न 5. ‘सम्बन्धों का संक्रमण के दौर से गुजरना’-पंक्ति से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।  [2022]
उत्तरः सम्बन्धों का संक्रमण के दौर से गुजरने का अर्थ है सम्बन्धों में परिवर्तन आना, सम्बन्धों में दरार आना। पहले जो सम्बन्ध आत्मीयतापूर्ण थे, वे अब तिरस्कार में बदलने लगे। लेखक की आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी और सम्बन्ध बिगड़ने लगे।

प्रश्न 6. घर की स्वीटनेस कब समाप्त हो जाती है? ‘तुम कब जाओगे अतिथि’ पाठ के आधार पर लिखिए।  [2021]
उत्तरः
 घर में किसी अतिथि के अधिक दिनों तक रुकने पर घर की मधुरता समाप्त हो जाती है। घर के सदस्यों को औपचारिकतावश शिष्टता का दिखावा करना पड़ता है और वे आराम से नहीं रह पाते।

प्रश्न 7. लेखक के मन में अतिथि को ‘गेट आउट’ कहने की बात क्यों आई ?  [2020]
उत्तरः
 चार दिन की मेहमाननवाजी के पश्चात् लेखक की सहनशीलता जवाब दे गई, वह सोचने लगा कि अतिथि को शराफ़त से लौट जाना चाहिए अन्यथा ‘गेट आउट’ भी एक वाक्य है, जो इसे बोला जा सकता है।

Long Answer Type Questions

प्रश्न 1. “मेरे अतिथि, मैं जानता हूँ कि अतिथि देवता होता है, पर आखिर मैं भी मनुष्य हूँ। मैं कोई तुम्हारी तरह देवता नहीं। एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते। देवता दर्शन देकर लौट जाता है। तुम लौट जाओ अतिथि” का आशय स्पष्ट कीजिए। [2024]
उत्तरः
 यदि अतिथि थोड़ी देर तक टिकता है तो वह देवता रूप बनाए रखता है, फिर वह मनुष्य रूप में आ जाता है, और ज्यादा देर तक टिकने पर वह राक्षस का रूप ले लेता है। तब वह राक्षस जैसा बुरा प्रतीत होता है। जब अतिथि तीसरे दिन भी नहीं गया और धोबी से कपड़े धुलाने की बात कहने लगा तो इससे मेहमान के कई दिन और रुकने की सम्भावना हो गई। इसके बाद लेखक अतिथि को देवता न मानकर मानव तथा राक्षस मानने लगा था। उसका अतिथि राक्षस का रूप लेता जा रहा था। भावनाएँ भी अपशब्दों का रूप धारण कर लेती है। मेजबान को गेट आउट तक कहने को विवश होना पड़ा। अतिथि के जल्दी घर जाने में ही उसका देवत्व सुरक्षित है क्योंकि एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर तक साथ नहीं रह सकते।

मनुष्य देवता-स्वरूप अतिथि का आदर सत्कार अधिक दिन तक नहीं कर सकता क्योंकि इस महँगाई के दौर में मनुष्य-रूप में देवता का आदर-सत्कार करते-करते उसके घर का बजट बिगड़ जाता है। आज के समय में अपना परिवार पालना भी कठिन होता है, वहाँ अतिथि का खर्च उठाना पड़े तो मनुष्य का चैन उड़ना स्वाभाविक है।

प्रश्न 2. जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए? क्या यह परिवर्तन सही थे?’ अतिथि तुम कब जाओगे?’ पाठ के आधार पर लिखिए।
अथवा
अतिथि के सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ ?  [2023]
उत्तरः जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो उसकी आवभगत में कमी आई। लेखक के व्यवहार में परिवर्तन आ गया। सौहार्द धीरे-धीरे बोरियत में बदल गया। शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय खत्म हो गए। बढ़िया लंच और डिनर ने खिचड़ी का स्थान ले लिया। लेखक को अतिथि थोड़ा-थोड़ा राक्षस प्रतीत होने लगा। यहाँ तक कि लेखक का मन उसे गेट आउट कहने को करने लगा। अतिथि के कई दिन तक रुकने पर घर का बजट बिगड़ जाता है। महँगाई के जमाने में जब अपना परिवार पालना कठिन होता है तब अतिथि का खर्च उठाते-उठाते मेहमान के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक है।

प्रश्न 3. ‘अतिथि देवो भवः’ उक्ति की व्याख्या पर आधुनिक युग के सन्दर्भ में इसका आंकलन प्रस्तुत कीजिए।  [2021]
उत्तरः अतिथि देवता के समान होता है। यह कथन पहले के समय में सार्थक था किन्तु आधुनिक युग में यह चरितार्थ नहीं होता है। आज लोगों के पास अपने लिए ही समय नहीं है। वे अतिथियों को कैसे समय दें? आज के लोग कमाने में, अपना भविष्य बनाने में, पढ़ने-पढ़ाने में अधिक ध्यान देने लगे हैं। अतः अब अतिथि के आने पर उनकी खुशी बढ़ती नहीं, बल्कि कम होती है। अतिथि के आने की खबर सुनकर ही चैन उड़ जाता है क्योंकि उसके आने की खबर के साथ ही जेहन में सवाल उठने लगते हैं कि कहाँ उन्हें ठहराया जाएगा? खाने में क्या-क्या बनाना होगा? आदि सवाल अतिथि के आने के पहले ही परेशान करने लगते हैं।