महत्वपूर्ण लोकोक्ति एवं उसके अर्थ
आग लगने पर कुँआ खोदना – आपति के चरम क्षण में बचाव की सोचना।
उल्टे बाॅस बरेली को – विरुद्ध कार्य करना।
काला अक्षर भैंस बराबर – निरक्षर होना।
घोड़ा घास से यारी करे तो खाये क्या – पारिश्रमिक लेने में सकोंच कैसा।
जल में रहकर मगर से बैर – आश्रयदाता से ही शत्राुता करना।
तेल देखो तेल की धर देखो – अभी क्या है, देखते जाओ।
थोथा चना बाजे घना – गुणहीन व्यक्ति ही आडम्बर अध्कि करता है।
दुधरू गाय की लात भी भली – लाभ देने वाले की बातें भी सुननी पडती है।
दूर के ढोल सुहावने – दूरवर्ती वस्तुएं अच्छी मालूम होती हैं।
नानी के आगे ननिहाल की बातें – जानकार के समक्ष बड़ी-बड़ी बाते करना।
सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज्ज को – चली जीवन भर पाप करके अंत में भक्ति की बातें।
न नौ नकद न तेरह उधर – तुरत का थोडा लाभ अच्छा, बाद का अध्कि भी अच्छा नहीं।
पढे फारसी बेचें तेल यह देखो कुदरत के खेल – शिक्षित होकर भी क्षुद्र कार्य करना।
पहले लिख और पीछे दे, कमती हो तो मुझसे ले – लिख देने से हिसाब-किताब में गड़बड़ी नहीं होती।
क्या जाने उंट किस करवट बैठे – अनिश्चित परिणाम।
भागते भूत की लंगोटी भली – सर्वनाश के समय यदि थोड़ा भी बचे तो ठीक है।
माया तेरे तीन नाम, परसा, परसी, परसराम – निकृष्ट व्यक्ति भी धनवान होने पर अधिक से अधिक आदर का भागी हो जाता है।
खरगोश के सींग होना – असंभव बात होना।
मुँह में राम बगल में ईट – धेखेबाजी करना।
साँच को आँंच कहाँ – जो सच्चा है उसे क्या डर।
सिर मुँडाते ही ओले पड़ना – कार्यारम्भ में ही झगड़ा पड़ जाना।
होनहार विरवान के होत चीकने पात – भविष्य में उन्नति करने वालो के अच्छे लक्षण पहले से ही दीखने लगते हैं।
चार दिन की चाँदनी पिफर अंध्यिारी रात – सुख का समय थोड़ा होता है।
चोर के पैर नहीं होते – अपराधी में साहस अधिक नहीं होता है।
चोर-चोर मौसरे भाई – एक से स्वभाव वाले।
चाँदी की रात सोने के दिन – सभी प्रकार सुख होना।
टके की हाँडी गयी पर कुत्ते की जात पहचान ली- थोडे का धेखा खाकर धेखेबाज को पहचान लेना।
टके की बुलबुल नौ टका टुसकाई – अल्प लाभ और अधिक लागत होना।
जहाँ काम आवै सुई कहा करे तरवारि – छोटे से जहाँ काम पड़ता है, वहाँ बड़े का उपयोग नहीं होता है।
कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरी संगति से बुराई पफैलाती है।
अहिरन साथ गड़रिया नाचै भेडी खाँय सियार – अपनी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना दूसरों की देखादेखी साहस करने में हानि होती है।
झूँठ के पाँव कहाँ – असत्य अध्कि देर तक नहीं चल सकता है।
तिनके की ओट मेें पहाड़ – थोड़ी सी सहायता से बड़ा काम बन जाना।
पापड़ बेलना – विषम परिस्थितियों से गुजरना।
बासी बचे न कुत्ता खाय – जितनी आवश्यकता हो उतनी ही वस्तु का होना।
बाँह गहे की लाज – शरणागत की रक्षा करना।
मरा हाथी नौ लाख का – मरने के बाद भी महत्व मिलना।
बसन्त के कोकिल – यदाकदा बोलने या दिखाई देने वाले।
गूलर के पफल – असंभव बात या अनहोनी बात।
साँकरे के साथी – विपत्ती मेें साथ निभाने वाला साथी या मित्रा।
हल्दी लगे न पिफटकरी रंग चोखा आ जाए – सरलता से काम बन जाना।
छूछंदर के सिर पर चमेली का तेल – अयोग्य के पास उपयोगी व श्रेष्ठ वस्तु का होना।
ते ते पाँव पसारिये जेती लांबी सौर – आय के अनुसार व्यय करना या अपनी हैसियत के अनुसार काम करना।
थाली का बैंगन – स्थिर बुद्धि न रखने वाला व्यक्ति।
दाँत काटी रोटी – प्रगाढ़ मित्रता होना।
देसी कौआ मराठी बोल – अशिक्षित व्यक्ति का उंची-उंची बाते करना।
जल दूलह तस बनी बराता – जैसा मनुष्य वैसे उसके सहयोगी।
जड़ काटते जाना और पानी देते जाना – उपर से प्रेम दिखाना और वास्तव में हानि पहुँचाना।
जहाँ जाए भूखा, वहाँ परे सूखा – दुखी व्यक्ति कहीं भी आराम नहीं पा सकता है।
जादू वही जो सिर चढ़कर बोले – प्रभावशाली व्यक्ति का दबदबा सभी मानते है।
जहाँ पर देखे तवा परात वहाँ पर गाए सारी रात – चमत्कार को नमस्कार।
नीम जली पर स्वाद न आया – बदनामी होने पर भी काम न हो पाना।
झोंपड़ी में रहना और संकलदीप के सपने देखना
– अप्राप्त वस्तु की कामना करना।
टके की मुर्गी नोट की निकाई – कम कीमत की वस्तु की सजावट पर अधिक व्यय करना।
ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है
– शांति से ही क्रोध पर विजय पायी जा सकती है।
डूबते को तिनके का सहारा – मुसीबत में किंचित् सहायता भी पर्याप्त होती है।
तीन में न तेरह में मृदंग बजाये डेरे में समाज में पतित होने पर अपने को महान् बताने वाले।
तीन बुलाए तेरह आयें – अनिमंत्रित व्यक्तियों का आना।
थका उफंट सराय ताकता है – परिश्रम में बाद विश्राम आवश्यक है।
दूध् का जला छाछ को भी फुँक-फुँक कर पीता है – एक बार धेखा खाने पर व्यक्ति भविष्य में सतर्क रहता है।
दोनों हाथों में लडडू होना – सर्वत्रा लाभ ही लाभ होना।
दाँतो तले उंगली दबाना – आश्चर्यचकित रह जाना।
दाल में काला होना – सन्देह का अनुभव होना।
आँखों में धूल झोंकना – आँखों के सामने ठग लेना।
जिस दीपक में तेल नहीं, उसे जलने का क्या अधिकार – शक्तिहीन व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होता है।
झोली डारे गज फिरे, मुक्ता डारे साथ – निजी सम्पत्ति होने पर भी दूसरों से आशा करना।
तबले की बला बंदर के सिर – सबकी बुराई को एक के सिर डालना।
तीन कनौजिए तेरह चूल्हे – व्यर्थ का ढोंग करना।
थोड़ी पूँजी खसमहिं खाइ – थोड़ी पूँजी लगाने से व्यवसाय मेें लाभ नहीं होता है।
दुविध में दोउ गये माया मिली न राम – एक साथ दो कार्य नहीं हो सकते है।
दूध का दूध और पानी का पानी – सही और सच्चा न्याय करना।
बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना – संयोग से काम बनना।
बिन माँंगे मोती मिलें माँगे मिले न भीख – लालच करने से कोई काम नहीं बनता है।
बावले गाँव में उफंट आना – विचित्रा वस्तु का प्रदर्शन होना।
मन के हारे है मन के जीते जीत – साहस बनाये रखना आवश्यक होता है।
मरने पर शहीद मारने पर गाजी – धर्मयुद्ध में सभी प्रकार से लाभ होता है।
रोग की जड़ खाँसी लड़ाई की जड़ हाँसी – अधिक मजाक और व्यंग्य ठीक नहीं होता है।
वहम की दवा लुकमान के पास भी नहीं थी – सन्देह का कोई इलाज नहीं होता है।
विधि कर लिखा को मेटन हारा – विधाता के लेख को कोई नहीं मिटा सकता है।
सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है – संसार को अपने स्वभावनुसार देखना।
धुएं के बादल उड़ना – मिथ्या भाषण करना।
धूल फाँकना – दर-दर की ठोकरे खाना।
गोद में बैठकर आंख में उगली करना – कृतघ्न होना।
गए रोजा छुड़ाने नमाज गले पड़ी – सुख के बदले दुख मिलना।
गरीब ने रोजे रखे तो दिन ही बड़ा हो गया – गरीब सदैव कष्ट पाता रहता है।
गागर में अनाज गंवार का राज – थोड़ा सा पाकर ही इतराना।
कोठी वाला रोवे-उपर वाला सोवे – अधिक समृद्ध होना भी हानिकारक है।
करना चाहे नौकरी सोना चाहे गांव – नौकरी में आराम नहीं होता है।
काम जो आवै कामरी काले करे कमाच – उपयोगी वस्तु ही गुहणीय होती है।
गुरू कीजै जान, पानी पीवै छानि – अच्छी तरह समझ-बूझ कर काम करना।
गरल सुध रिपु करहि मिताई – दो विरोधी स्वभाव वालों का मिलना।
खाई खने जो आन को ताको कूप तैयार – दूसरों का बुरा चाहने वालों का भी बुरा होता है।
खेत खाए गदहा मार खाए जुलाहा – दोष किसी का सजा किसी को।
गुड़ देने से मरे तो जहर क्यों दें – जो समझाने से माने, उसे दण्ड नहीं देना चाहिए।
गोद में छोरा जगत में ढिंढोरा – पास में रखी वस्तु को दूसरी जगह खोजने जाना।
चन्दन विष व्याप्त नहीं लपटे रहत भुंजंग – अच्छे स्वभाव वाले पर बुरे व्यक्ति का असर नहीं होता।
चन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है – सज्जन भी विपत्तिग्रस्त होते है।
चोरी का माल मोरी में जाता है चुराई हुई दौलत बेकार चली जाती है।
छुद्र नदी भरि चली इतराई – छोटे व्यक्ति अधिक इतराते है।
जहां न जाये रवि वहाँ जाये कवि – सीमातीत कल्पना करना।
जैसी बहे वयार पीठ तक तैसी दीजे – समयानुसार कार्य करना।
जर है तो नर नहीं तो पूरा खर – धनहीन व्यक्ति सम्मानित नहीं होता है।
न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी – कारण या मूल को नष्ट कर देना।
पासा पड़े सो दाव राजा करो सो न्याय – अधिकारी की बात सभी को मान्य होती है।
शौकीन डुकरिया चटाई का लहँगा – बुरी तरह का भयंकर शौक।
सूप बोले तो बोले छलनी भी बोले – दोषी का बोलना ठीक नहीं होता है।
हाथ कंगन को आरसी क्या – प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता है?
हिन्दी न फारसी मियाँ जी बनारसी – गुणहीन होकर भी गुणी होने का दंभ करना।
उसर मे मूसर – व्यर्थ ही बीच में पड़ना।
उसर बरसे तिन नहीं जामा – मूर्ख पर उपदेश का प्रभाव नहीं होता है।
ओछे की प्रीति बालू की भीति – तुच्छ व्यक्ति के साथ की गई मित्राता टिकाउ नहीं होती।
अेकेले सूपन खाँ आगे लडें कि पीछे – अकेला व्यक्ति अनेक काम एक साथ नहीं कर सकता है।
आधी छोड़ सारी को धवै आधी जाइ न सबरी पावै – सर्वस्व हड़पने का लोभी कुछ भी नहीं पाता है।
करेला और वह भी नीम चढ़ा – दुष्ट प्रकृति वाले को और भी दुष्ट का साथ मिलना।
कहीं की ईट कहीं का रोड़ा भानूमती ने कुनबा जोड़ा – इधर-उधर से छोटी-छोटी वस्तुएं लेकर काम चलाना।
काम परे कुछ और है, काम सरे कुछ और – काम निकाल कर लोग मुँह फेर लेते है।
कमान से छूटा तीर फिर लौटता नहीं – मुख से निकली बात का कोई उपाय नहीं होता है।
कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरी संगाति से बुराई पैफलती है।
काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती – धोखा एक बार ही खाया जा सकता है।
गाल में चावल – सम्पत्ति या उफंचा पद पाना और दूसरों को उपदेश देना।