10. महत्वपूर्ण लोकोक्तियाँ एवं उनके अर्थ

महत्वपूर्ण लोकोक्ति एवं उसके अर्थ

आग लगने पर कुँआ खोदना – आपति के चरम क्षण में बचाव की सोचना।

उल्टे बाॅस बरेली को –  विरुद्ध कार्य करना।

काला अक्षर भैंस बराबर –  निरक्षर होना।

घोड़ा घास से यारी करे तो खाये क्या  – पारिश्रमिक लेने में सकोंच कैसा।

जल में रहकर मगर से बैर – आश्रयदाता से ही शत्राुता करना।

तेल देखो तेल की धर देखो – अभी क्या है, देखते जाओ।

थोथा चना बाजे घना   – गुणहीन व्यक्ति ही आडम्बर अध्कि करता है।

दुधरू गाय की लात भी भली – लाभ देने वाले की बातें भी सुननी पडती है।

दूर के ढोल सुहावने – दूरवर्ती वस्तुएं अच्छी मालूम होती हैं।

नानी के आगे ननिहाल की बातें – जानकार के समक्ष बड़ी-बड़ी बाते करना।

सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज्ज को – चली जीवन भर पाप करके अंत में भक्ति की बातें।

न नौ नकद न तेरह उधर  – तुरत का थोडा लाभ अच्छा, बाद का अध्कि भी अच्छा नहीं।

पढे फारसी बेचें तेल यह देखो कुदरत के खेल – शिक्षित होकर भी क्षुद्र कार्य करना।

पहले लिख और पीछे दे, कमती हो तो मुझसे ले –  लिख देने से हिसाब-किताब में गड़बड़ी नहीं होती।

क्या जाने उंट किस करवट बैठे – अनिश्चित परिणाम।

भागते भूत की लंगोटी भली – सर्वनाश के समय यदि थोड़ा भी बचे तो ठीक है।

माया तेरे तीन नाम, परसा, परसी, परसराम – निकृष्ट व्यक्ति भी धनवान होने  पर अधिक से अधिक आदर का भागी हो जाता है।

खरगोश के सींग होना – असंभव बात होना।

मुँह में राम बगल में ईट – धेखेबाजी करना।

साँच को आँंच कहाँ  – जो सच्चा है उसे क्या डर।

सिर  मुँडाते ही ओले पड़ना – कार्यारम्भ में ही झगड़ा पड़ जाना।

होनहार विरवान के होत चीकने पात – भविष्य में उन्नति करने वालो के अच्छे लक्षण पहले से ही दीखने लगते हैं।

चार दिन की चाँदनी पिफर अंध्यिारी रात – सुख का समय थोड़ा होता है।

चोर के पैर नहीं होते – अपराधी में साहस अधिक नहीं होता है।

चोर-चोर मौसरे भाई – एक से स्वभाव वाले।

चाँदी की रात सोने के दिन – सभी प्रकार सुख होना।

टके की हाँडी गयी पर कुत्ते की जात पहचान ली-  थोडे का धेखा खाकर धेखेबाज को पहचान लेना।

टके की बुलबुल नौ टका टुसकाई – अल्प लाभ और अधिक लागत होना।

जहाँ काम आवै सुई कहा करे तरवारि – छोटे से जहाँ काम पड़ता है, वहाँ बड़े का उपयोग नहीं होता है।

कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरी संगति से बुराई पफैलाती है।

अहिरन साथ गड़रिया नाचै भेडी खाँय सियार – अपनी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना दूसरों की देखादेखी साहस करने में हानि होती है।

झूँठ के पाँव कहाँ – असत्य अध्कि देर तक नहीं चल सकता है।

तिनके की ओट मेें पहाड़ –  थोड़ी सी सहायता से बड़ा काम बन जाना।

पापड़ बेलना – विषम परिस्थितियों से गुजरना।

बासी बचे न कुत्ता खाय – जितनी आवश्यकता हो उतनी ही वस्तु का होना।

बाँह गहे की लाज – शरणागत की रक्षा करना।

मरा हाथी नौ लाख का – मरने के बाद भी महत्व मिलना।

बसन्त के कोकिल – यदाकदा बोलने या दिखाई देने वाले।

गूलर के पफल – असंभव बात या अनहोनी बात।

साँकरे के साथी – विपत्ती मेें साथ निभाने वाला साथी या मित्रा।

हल्दी लगे न पिफटकरी रंग चोखा आ जाए – सरलता से काम बन जाना।

छूछंदर के सिर पर चमेली का तेल – अयोग्य के पास उपयोगी व श्रेष्ठ वस्तु का होना।

ते ते पाँव पसारिये जेती लांबी सौर – आय के अनुसार व्यय करना या अपनी हैसियत के अनुसार काम करना।

थाली का बैंगन – स्थिर बुद्धि न रखने वाला व्यक्ति।

दाँत काटी रोटी – प्रगाढ़ मित्रता होना।

देसी कौआ मराठी बोल – अशिक्षित व्यक्ति का उंची-उंची बाते करना।

जल दूलह तस बनी बराता – जैसा मनुष्य वैसे उसके सहयोगी।

जड़ काटते जाना और पानी देते जाना – उपर से प्रेम दिखाना और वास्तव में हानि पहुँचाना।

जहाँ जाए भूखा, वहाँ परे सूखा – दुखी व्यक्ति कहीं भी आराम नहीं पा सकता है।

जादू वही जो सिर चढ़कर बोले – प्रभावशाली व्यक्ति का दबदबा सभी मानते है।

जहाँ पर देखे तवा परात वहाँ पर गाए सारी रात – चमत्कार को नमस्कार।

नीम जली पर स्वाद न आया – बदनामी होने पर भी काम न हो पाना।

झोंपड़ी में रहना और संकलदीप के सपने देखना

 – अप्राप्त वस्तु की कामना करना।

टके की मुर्गी नोट की निकाई – कम कीमत की वस्तु की सजावट पर अधिक व्यय करना।

ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है

– शांति से ही क्रोध पर विजय पायी जा सकती है।

डूबते को तिनके का सहारा – मुसीबत में किंचित् सहायता भी पर्याप्त होती है।

तीन में न तेरह में मृदंग बजाये डेरे में समाज में पतित होने पर अपने को महान् बताने वाले।

तीन बुलाए तेरह आयें – अनिमंत्रित व्यक्तियों का आना।

थका उफंट सराय ताकता है – परिश्रम में बाद विश्राम आवश्यक है।

दूध् का जला छाछ को भी फुँक-फुँक कर पीता है – एक बार धेखा खाने पर व्यक्ति भविष्य में सतर्क रहता है।

दोनों हाथों में लडडू होना – सर्वत्रा लाभ ही लाभ होना।

दाँतो तले उंगली दबाना – आश्चर्यचकित रह जाना।

दाल में काला होना – सन्देह का अनुभव होना।

आँखों में धूल झोंकना – आँखों के सामने ठग लेना।

जिस दीपक में तेल नहीं, उसे जलने का क्या अधिकार – शक्तिहीन व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होता है।

झोली डारे गज फिरे, मुक्ता डारे साथ – निजी सम्पत्ति होने पर भी दूसरों से आशा करना।

तबले की बला बंदर के सिर – सबकी बुराई को एक के सिर डालना।

तीन कनौजिए तेरह चूल्हे – व्यर्थ का ढोंग करना।

थोड़ी पूँजी खसमहिं खाइ – थोड़ी पूँजी लगाने से व्यवसाय मेें लाभ नहीं होता है।

दुविध में दोउ गये माया मिली न राम – एक साथ दो कार्य नहीं हो सकते है।

दूध का दूध और पानी का पानी  – सही और सच्चा न्याय करना।

बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना – संयोग से काम बनना।

बिन माँंगे मोती मिलें माँगे मिले न भीख – लालच करने से कोई काम नहीं बनता है।

बावले गाँव में उफंट आना – विचित्रा वस्तु का प्रदर्शन होना।

मन के हारे है मन के जीते जीत – साहस बनाये रखना आवश्यक होता है।

मरने पर शहीद मारने पर गाजी – धर्मयुद्ध में सभी प्रकार से लाभ होता है।

रोग की जड़ खाँसी लड़ाई की जड़ हाँसी – अधिक मजाक और व्यंग्य ठीक नहीं होता है।

वहम की दवा लुकमान के पास भी नहीं थी – सन्देह का कोई इलाज नहीं होता है।

विधि कर लिखा को मेटन हारा  – विधाता के लेख को कोई नहीं मिटा सकता है।

सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है – संसार को अपने स्वभावनुसार देखना।

धुएं के बादल उड़ना – मिथ्या भाषण करना।

धूल फाँकना – दर-दर की ठोकरे खाना।

गोद में बैठकर आंख में उगली करना – कृतघ्न होना।

गए रोजा छुड़ाने नमाज गले पड़ी – सुख के बदले दुख मिलना।

गरीब ने रोजे रखे तो दिन ही बड़ा हो गया – गरीब सदैव कष्ट पाता रहता है।

गागर में अनाज गंवार का राज – थोड़ा सा पाकर ही इतराना।

कोठी वाला रोवे-उपर वाला सोवे – अधिक समृद्ध होना भी हानिकारक है।

करना चाहे नौकरी सोना चाहे गांव – नौकरी में आराम नहीं होता है।

काम जो आवै कामरी काले करे कमाच – उपयोगी वस्तु ही गुहणीय होती है।

गुरू कीजै जान, पानी पीवै छानि – अच्छी तरह समझ-बूझ कर काम करना।

गरल सुध रिपु करहि मिताई – दो विरोधी स्वभाव वालों का मिलना।

खाई खने जो आन को ताको कूप तैयार – दूसरों का बुरा चाहने वालों का भी बुरा होता है।

खेत खाए गदहा मार खाए जुलाहा – दोष किसी का सजा किसी को।

गुड़ देने से मरे तो जहर क्यों दें – जो समझाने से माने, उसे दण्ड नहीं देना चाहिए।

गोद में छोरा जगत में ढिंढोरा – पास में रखी वस्तु को दूसरी जगह खोजने जाना।

चन्दन विष व्याप्त नहीं लपटे रहत भुंजंग – अच्छे स्वभाव वाले पर बुरे व्यक्ति का असर नहीं होता।

चन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है – सज्जन भी विपत्तिग्रस्त होते है।

चोरी का माल मोरी में जाता है चुराई हुई दौलत बेकार चली जाती है।

छुद्र नदी भरि चली इतराई – छोटे व्यक्ति अधिक इतराते है।

जहां न जाये रवि वहाँ जाये कवि – सीमातीत कल्पना करना।

जैसी बहे वयार पीठ तक तैसी दीजे – समयानुसार कार्य करना।

जर है तो नर नहीं तो पूरा खर – धनहीन व्यक्ति सम्मानित नहीं होता है।

न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी – कारण या मूल को नष्ट कर देना।

पासा पड़े सो दाव राजा करो सो न्याय – अधिकारी की बात सभी को मान्य होती है।

शौकीन डुकरिया चटाई का लहँगा – बुरी तरह का भयंकर शौक।

सूप बोले तो बोले छलनी भी बोले – दोषी का बोलना ठीक नहीं होता है।

हाथ कंगन को आरसी क्या –  प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता है?

हिन्दी न फारसी मियाँ जी बनारसी – गुणहीन होकर भी गुणी होने का दंभ करना।

उसर मे मूसर – व्यर्थ ही बीच में पड़ना।

उसर बरसे तिन नहीं जामा – मूर्ख पर उपदेश का प्रभाव नहीं होता है।

ओछे की प्रीति बालू की भीति – तुच्छ व्यक्ति के साथ की गई मित्राता टिकाउ नहीं होती।

अेकेले सूपन खाँ आगे लडें कि पीछे – अकेला व्यक्ति अनेक काम एक साथ नहीं कर सकता है।

आधी छोड़ सारी को धवै आधी जाइ न सबरी पावै – सर्वस्व हड़पने का लोभी कुछ भी नहीं पाता है।

करेला और वह भी नीम चढ़ा – दुष्ट प्रकृति वाले को और भी दुष्ट का साथ मिलना।

कहीं की ईट कहीं का रोड़ा भानूमती ने कुनबा जोड़ा – इधर-उधर से छोटी-छोटी वस्तुएं लेकर काम चलाना।

काम परे कुछ और है, काम सरे कुछ और – काम निकाल कर लोग मुँह फेर लेते है।

कमान से छूटा तीर फिर लौटता नहीं – मुख से निकली बात का कोई उपाय नहीं होता है।

कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरी संगाति से बुराई पैफलती है।

काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती – धोखा एक बार ही खाया जा सकता है।

गाल में चावल – सम्पत्ति या उफंचा पद पाना और दूसरों को उपदेश देना।