11. पदबंध: परिभाषा, भेद और उदाहरण

पदबंध की परिभाषा

पदबंध: जब दो या दो से अधिक (शब्द) पद नियत क्रम और निश्र्चित अर्थ में किसी पद का कार्य करते हैं तो उन्हें पदबंध कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि कई पदों के योग से बने वाक्यांशों को, जो एक ही पद का काम करते हैं, पदबंध कहलाते हैं। 

कुछ उदाहरणों की सहायता से पदबंध को और सरलता से समझने का प्रयास करने से पहले आपको पदबंध से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना चाहिए जिससे आप पदबंध को बिना किसी कठिनाई से सरलता से समझ पाएंगे:

  • पदबंध एक वाक्यांश होता है न कि पूरा वाक्य।
    आपको सबसे पहले यह बात ध्यान में रखनी है कि पदबंध कोई पूरा वाक्य नहीं होता, पदबंध केवल वाक्य का एक भाग होता है जो निश्चित अर्थ और क्रम के परिचायक होते हैं।
  • पदबंध में एक से अधिक पदों का समावेश होता है जिस कारण इसे पदबंध कहा जाता है।
    यहाँ समझने योग्य बात यह है कि पदबंध एक नहीं बल्कि कई पदों के मेल से बनता है। आपको पदबंध के नाम से ही अंदाजा लग गया होगा कि पदबंध मतलब पदों का बंधन। और ये पदों का समूह व्याकरणिक इकाई की ओर भी संकेत करते हैं।
  • पदबंध में जुड़े हुए पदों का समूह व्याकरणिक इकाई का रूप ले लेते हैं और वही इनकी पहचान होती है।
  • प्रत्येक पदबंध में एक मुख्य पद होता है और अन्य पद उस मुख्य पद पर आश्रित होते हैं। उदाहरण के लिए – बगीचे में रंग-बिरंगे सुंदर फूल खिल रहे हैं। अब यहाँ पर जो फूल है वो मुख्य पद है और बाकि के पद जैसे रंग-बिरंगे और सुंदर आश्रित पद हैं।
  • पदबंध का निर्धारण मुख्य पद के आधार पर होता है।
    आपको यह बात भी ध्यान में रखनी है कि यदि पदबंध का आखरी पद संज्ञा है तो पूरा पद संज्ञा पदबंध कहलाएगा। इसी तरह यदि आखरी पद सर्वनाम है तो पूरा पद सर्वनाम पदबंध कहलाएगा। यदि आखरी पद क्रिया है तो पूरा पद क्रिया पदबंध कहलाएगा। और यदि आखरी पद विशेषण है तो पूरा पद विशेषण पदबंध कहलाएगा। उदाहरण के लिए- आजकल पेड़ों पर स्वादिष्ट फल लगे हुए हैं।  यहाँ पर फल मुख्य पद है और पेड़ों पर स्वादिष्ट पद आश्रित पद है। लेकिन यह पूरा पद संज्ञा पदबंध है क्योंकि इस पदबंध का आखरी पद और मुख्य पद फल है जो की संज्ञा है।

कुछ उदाहरणों की सहायता से पदबंध को और अच्छे से समझने की कोशिश करते हैं:
इन चार वाक्यों में रेखांकित शब्द पदबंध है।

  • सबसे तेज दौड़ने वाला घोड़ा जीत गया।
    पहले वाक्य ‘सबसे तेज दौड़ने वाला घोड़ा जीत गया।’ के ‘सबसे तेज दौड़ने वाला घोड़ा’ में पाँच पद है, किन्तु वे मिलकर एक ही पद का कार्य कर रहे हैं अर्थात संज्ञा का कार्य कर रहे हैं।
  • रमेश अत्यंत सुशील और परिश्रमी है।
    दूसरे वाक्य ‘रमेश अत्यंत सुशील और परिश्रमी है।’ के ‘अत्यंत सुशील और परिश्रमी’ में भी चार पद हैं, किन्तु वे भी मिलकर एक ही पद का कार्य कर रहे हैं अर्थात विशेषण का कार्य कर रहे हैं।
  • झरना बहता चला जा रहा है।
    तीसरे वाक्य ‘झरना बहता चला जा रहा है।’ के ‘बहता चला जा रहा है’ में पाँच पद हैं किन्तु वे भी मिलकर एक ही पद का कार्य कर रहे हैं अर्थात क्रिया का काम कर रहे हैं।
  • नदी कल-कल करती हुई बह रही थी।
    चौथे वाक्य ‘नदी कल-कल करती हुई बह रही थी।’ के ‘कल-कल करती हुई’ में तीन पद हैं, किन्तु वे भी मिलकर एक ही पद का कार्य कर रहे हैं अर्थात क्रिया विशेषण का काम कर रहे हैं।
    पदबंध को और सरलता से समझने के लिए आइए पदबंध के भेदों के बारे में जानते हैं। पदबंध के भेदों के ज्ञान से आपको अपनी परीक्षा में पदबंध को पहचानने में अत्यधिक आसानी हो जाएगी। तो चलिए पदबंध के भेदों के बारे में उदाहरण सहित विस्तार पूर्वक जानते हैं-

पदबंध के भेद

मुख्य पद के आधार पर पदबंध के पाँच भेद माने जाते हैं:

1. संज्ञा-पदबंध: वह पदबंध जो किसी वाक्य में संज्ञा का कार्य करता है, संज्ञा पदबंध कहलाता है। दूसरे अथवा सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि पदबंध का अंतिम अथवा मुख्य पद यदि संज्ञा हो और अन्य सभी पद उसी पर आश्रित हो तो वह ‘संज्ञा पदबंध’ कहलाता है

उदाहरण के लिए:

  • दो ताकतवर आदमी इस भारी मेज़ को उठा पाए।
  • मेहनती छात्र ही अच्छे अंक प्राप्त कर पाते हैं।
  • दशरथ पुत्र राम ने रावण को मारा था।
  • आसमान में उड़ता गुब्बारा फट गया।

उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द ‘संज्ञा पदबंध’ है। क्योंकि ये सभी पद मिलकर संज्ञा की ओर संकेत कर रहे हैं।

2. विशेषण पदबंध: वह पदबंध जो संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता बताता हुआ वाक्य में विशेषण का कार्य करता है, विशेषण पदबंध कहलाता है। दूसरे अथवा सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि पदबंध का मुख्य अथवा अंतिम शब्द यदि विशेषण हो और अन्य सभी पद उसी पर आश्रित हों तो वह ‘विशेषण पदबंध’ कहलाता है।

उदाहरण के लिए:

  • वह बहुत सूंदर कविता लिखता है।
  • उस घर के कोने में लगा हुआ पेड़ आम का है।
  • उसका कुत्ता अत्यंत सुंदर, फुरतीला और आज्ञाकारी है।
  • गर्मियों में सफेद खादी कपडे पहनना आरामदायक होता है।

उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द ‘विशेषण पदबंध’ है। क्योंकि ये शब्द संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता बताते हुए विशेषण का कार्य कर रहे हैं।

3.  सर्वनाम पदबंध: वह पदबंध जो वाक्य में सर्वनाम का कार्य करे, सर्वनाम पदबंध कहलाता है।

उदाहरण के लिए:

  • हमारे देश के नेताओं में कुछ नेता अच्छे हैं।
  • शरारत करने वाले छात्रों में से कुछ पकड़े गए।
  • विरोध करने वाले लोगों में से कोई नहीं बोला।
  • आपके अपनों में कौन आपका साथ देगा?

उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द सर्वनाम पदबंध हैं क्योंकि वे क्रमशः ‘कुछ’ ‘कोई’ और ‘कौन’ इन सर्वनाम शब्दों से सम्बद्ध हैं।

4. क्रिया पदबंध: वह पदबंध जो अनेक क्रिया-पदों से मिलकर बना हो, क्रिया पदबंध कहलाता है। क्रिया पदबंध में मुख्य क्रिया पहले आती है। उसके बाद अन्य क्रियाएँ मिलकर एक समग्र इकाई बनाती है। यही ‘क्रिया पदबंध’ है। दूसरे अथवा सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि वाक्य में कई पद मिलकर जब क्रिया का कार्य करते हैं तो वह क्रिया पदबंध कहलाता है।

उदाहरण के लिए:

  •  वह विद्यालय से सीधे घर की ओर आया होगा।
  • दादी हर रात हमें नई-नई कहानियाँ सुनाती रहती हैं।
  • गायक अपना पसंदीदा गीत गा रहा है।
  • बच्चे मैदान में फूटबॉल खेल रहे हैं।

उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द ‘क्रिया पदबंध’ है। क्योंकि ये शब्द वाक्य में क्रिया का कार्य कर रहे हैं।

5. क्रिया विशेषण पदबंध: जब किसी वाक्य में क्रिया विशेषण का कार्य करने वाले पद हों तो वहाँ क्रिया विशेषण पदबंध होता है। दूसरे अथवा सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि वाक्य में जो पद क्रिया की विशेषता बताने वाले हों वे क्रिया विशेषण पदबंध कहलाते हैं।

उदाहरण के लिए:

  • आज गाड़ी बहुत जल्दी आ गयी। 
  • पक्षी पिंजरे के अन्दर बैठा है। 
  • मैं इस माह के अंत तक आ जाऊँगा। 
  • खिलाड़ी मैदान की ओर गए हैं। 

इन वाक्यों में रेखांकित शब्द क्रिया विशेषण के उदाहरण हैं। क्योंकि ये शब्द क्रिया की विशेषता को उजागर कर रहे हैं।

10. महत्वपूर्ण लोकोक्तियाँ एवं उनके अर्थ

महत्वपूर्ण लोकोक्ति एवं उसके अर्थ

आग लगने पर कुँआ खोदना – आपति के चरम क्षण में बचाव की सोचना।

उल्टे बाॅस बरेली को –  विरुद्ध कार्य करना।

काला अक्षर भैंस बराबर –  निरक्षर होना।

घोड़ा घास से यारी करे तो खाये क्या  – पारिश्रमिक लेने में सकोंच कैसा।

जल में रहकर मगर से बैर – आश्रयदाता से ही शत्राुता करना।

तेल देखो तेल की धर देखो – अभी क्या है, देखते जाओ।

थोथा चना बाजे घना   – गुणहीन व्यक्ति ही आडम्बर अध्कि करता है।

दुधरू गाय की लात भी भली – लाभ देने वाले की बातें भी सुननी पडती है।

दूर के ढोल सुहावने – दूरवर्ती वस्तुएं अच्छी मालूम होती हैं।

नानी के आगे ननिहाल की बातें – जानकार के समक्ष बड़ी-बड़ी बाते करना।

सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज्ज को – चली जीवन भर पाप करके अंत में भक्ति की बातें।

न नौ नकद न तेरह उधर  – तुरत का थोडा लाभ अच्छा, बाद का अध्कि भी अच्छा नहीं।

पढे फारसी बेचें तेल यह देखो कुदरत के खेल – शिक्षित होकर भी क्षुद्र कार्य करना।

पहले लिख और पीछे दे, कमती हो तो मुझसे ले –  लिख देने से हिसाब-किताब में गड़बड़ी नहीं होती।

क्या जाने उंट किस करवट बैठे – अनिश्चित परिणाम।

भागते भूत की लंगोटी भली – सर्वनाश के समय यदि थोड़ा भी बचे तो ठीक है।

माया तेरे तीन नाम, परसा, परसी, परसराम – निकृष्ट व्यक्ति भी धनवान होने  पर अधिक से अधिक आदर का भागी हो जाता है।

खरगोश के सींग होना – असंभव बात होना।

मुँह में राम बगल में ईट – धेखेबाजी करना।

साँच को आँंच कहाँ  – जो सच्चा है उसे क्या डर।

सिर  मुँडाते ही ओले पड़ना – कार्यारम्भ में ही झगड़ा पड़ जाना।

होनहार विरवान के होत चीकने पात – भविष्य में उन्नति करने वालो के अच्छे लक्षण पहले से ही दीखने लगते हैं।

चार दिन की चाँदनी पिफर अंध्यिारी रात – सुख का समय थोड़ा होता है।

चोर के पैर नहीं होते – अपराधी में साहस अधिक नहीं होता है।

चोर-चोर मौसरे भाई – एक से स्वभाव वाले।

चाँदी की रात सोने के दिन – सभी प्रकार सुख होना।

टके की हाँडी गयी पर कुत्ते की जात पहचान ली-  थोडे का धेखा खाकर धेखेबाज को पहचान लेना।

टके की बुलबुल नौ टका टुसकाई – अल्प लाभ और अधिक लागत होना।

जहाँ काम आवै सुई कहा करे तरवारि – छोटे से जहाँ काम पड़ता है, वहाँ बड़े का उपयोग नहीं होता है।

कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरी संगति से बुराई पफैलाती है।

अहिरन साथ गड़रिया नाचै भेडी खाँय सियार – अपनी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना दूसरों की देखादेखी साहस करने में हानि होती है।

झूँठ के पाँव कहाँ – असत्य अध्कि देर तक नहीं चल सकता है।

तिनके की ओट मेें पहाड़ –  थोड़ी सी सहायता से बड़ा काम बन जाना।

पापड़ बेलना – विषम परिस्थितियों से गुजरना।

बासी बचे न कुत्ता खाय – जितनी आवश्यकता हो उतनी ही वस्तु का होना।

बाँह गहे की लाज – शरणागत की रक्षा करना।

मरा हाथी नौ लाख का – मरने के बाद भी महत्व मिलना।

बसन्त के कोकिल – यदाकदा बोलने या दिखाई देने वाले।

गूलर के पफल – असंभव बात या अनहोनी बात।

साँकरे के साथी – विपत्ती मेें साथ निभाने वाला साथी या मित्रा।

हल्दी लगे न पिफटकरी रंग चोखा आ जाए – सरलता से काम बन जाना।

छूछंदर के सिर पर चमेली का तेल – अयोग्य के पास उपयोगी व श्रेष्ठ वस्तु का होना।

ते ते पाँव पसारिये जेती लांबी सौर – आय के अनुसार व्यय करना या अपनी हैसियत के अनुसार काम करना।

थाली का बैंगन – स्थिर बुद्धि न रखने वाला व्यक्ति।

दाँत काटी रोटी – प्रगाढ़ मित्रता होना।

देसी कौआ मराठी बोल – अशिक्षित व्यक्ति का उंची-उंची बाते करना।

जल दूलह तस बनी बराता – जैसा मनुष्य वैसे उसके सहयोगी।

जड़ काटते जाना और पानी देते जाना – उपर से प्रेम दिखाना और वास्तव में हानि पहुँचाना।

जहाँ जाए भूखा, वहाँ परे सूखा – दुखी व्यक्ति कहीं भी आराम नहीं पा सकता है।

जादू वही जो सिर चढ़कर बोले – प्रभावशाली व्यक्ति का दबदबा सभी मानते है।

जहाँ पर देखे तवा परात वहाँ पर गाए सारी रात – चमत्कार को नमस्कार।

नीम जली पर स्वाद न आया – बदनामी होने पर भी काम न हो पाना।

झोंपड़ी में रहना और संकलदीप के सपने देखना

 – अप्राप्त वस्तु की कामना करना।

टके की मुर्गी नोट की निकाई – कम कीमत की वस्तु की सजावट पर अधिक व्यय करना।

ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है

– शांति से ही क्रोध पर विजय पायी जा सकती है।

डूबते को तिनके का सहारा – मुसीबत में किंचित् सहायता भी पर्याप्त होती है।

तीन में न तेरह में मृदंग बजाये डेरे में समाज में पतित होने पर अपने को महान् बताने वाले।

तीन बुलाए तेरह आयें – अनिमंत्रित व्यक्तियों का आना।

थका उफंट सराय ताकता है – परिश्रम में बाद विश्राम आवश्यक है।

दूध् का जला छाछ को भी फुँक-फुँक कर पीता है – एक बार धेखा खाने पर व्यक्ति भविष्य में सतर्क रहता है।

दोनों हाथों में लडडू होना – सर्वत्रा लाभ ही लाभ होना।

दाँतो तले उंगली दबाना – आश्चर्यचकित रह जाना।

दाल में काला होना – सन्देह का अनुभव होना।

आँखों में धूल झोंकना – आँखों के सामने ठग लेना।

जिस दीपक में तेल नहीं, उसे जलने का क्या अधिकार – शक्तिहीन व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होता है।

झोली डारे गज फिरे, मुक्ता डारे साथ – निजी सम्पत्ति होने पर भी दूसरों से आशा करना।

तबले की बला बंदर के सिर – सबकी बुराई को एक के सिर डालना।

तीन कनौजिए तेरह चूल्हे – व्यर्थ का ढोंग करना।

थोड़ी पूँजी खसमहिं खाइ – थोड़ी पूँजी लगाने से व्यवसाय मेें लाभ नहीं होता है।

दुविध में दोउ गये माया मिली न राम – एक साथ दो कार्य नहीं हो सकते है।

दूध का दूध और पानी का पानी  – सही और सच्चा न्याय करना।

बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना – संयोग से काम बनना।

बिन माँंगे मोती मिलें माँगे मिले न भीख – लालच करने से कोई काम नहीं बनता है।

बावले गाँव में उफंट आना – विचित्रा वस्तु का प्रदर्शन होना।

मन के हारे है मन के जीते जीत – साहस बनाये रखना आवश्यक होता है।

मरने पर शहीद मारने पर गाजी – धर्मयुद्ध में सभी प्रकार से लाभ होता है।

रोग की जड़ खाँसी लड़ाई की जड़ हाँसी – अधिक मजाक और व्यंग्य ठीक नहीं होता है।

वहम की दवा लुकमान के पास भी नहीं थी – सन्देह का कोई इलाज नहीं होता है।

विधि कर लिखा को मेटन हारा  – विधाता के लेख को कोई नहीं मिटा सकता है।

सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है – संसार को अपने स्वभावनुसार देखना।

धुएं के बादल उड़ना – मिथ्या भाषण करना।

धूल फाँकना – दर-दर की ठोकरे खाना।

गोद में बैठकर आंख में उगली करना – कृतघ्न होना।

गए रोजा छुड़ाने नमाज गले पड़ी – सुख के बदले दुख मिलना।

गरीब ने रोजे रखे तो दिन ही बड़ा हो गया – गरीब सदैव कष्ट पाता रहता है।

गागर में अनाज गंवार का राज – थोड़ा सा पाकर ही इतराना।

कोठी वाला रोवे-उपर वाला सोवे – अधिक समृद्ध होना भी हानिकारक है।

करना चाहे नौकरी सोना चाहे गांव – नौकरी में आराम नहीं होता है।

काम जो आवै कामरी काले करे कमाच – उपयोगी वस्तु ही गुहणीय होती है।

गुरू कीजै जान, पानी पीवै छानि – अच्छी तरह समझ-बूझ कर काम करना।

गरल सुध रिपु करहि मिताई – दो विरोधी स्वभाव वालों का मिलना।

खाई खने जो आन को ताको कूप तैयार – दूसरों का बुरा चाहने वालों का भी बुरा होता है।

खेत खाए गदहा मार खाए जुलाहा – दोष किसी का सजा किसी को।

गुड़ देने से मरे तो जहर क्यों दें – जो समझाने से माने, उसे दण्ड नहीं देना चाहिए।

गोद में छोरा जगत में ढिंढोरा – पास में रखी वस्तु को दूसरी जगह खोजने जाना।

चन्दन विष व्याप्त नहीं लपटे रहत भुंजंग – अच्छे स्वभाव वाले पर बुरे व्यक्ति का असर नहीं होता।

चन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है – सज्जन भी विपत्तिग्रस्त होते है।

चोरी का माल मोरी में जाता है चुराई हुई दौलत बेकार चली जाती है।

छुद्र नदी भरि चली इतराई – छोटे व्यक्ति अधिक इतराते है।

जहां न जाये रवि वहाँ जाये कवि – सीमातीत कल्पना करना।

जैसी बहे वयार पीठ तक तैसी दीजे – समयानुसार कार्य करना।

जर है तो नर नहीं तो पूरा खर – धनहीन व्यक्ति सम्मानित नहीं होता है।

न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी – कारण या मूल को नष्ट कर देना।

पासा पड़े सो दाव राजा करो सो न्याय – अधिकारी की बात सभी को मान्य होती है।

शौकीन डुकरिया चटाई का लहँगा – बुरी तरह का भयंकर शौक।

सूप बोले तो बोले छलनी भी बोले – दोषी का बोलना ठीक नहीं होता है।

हाथ कंगन को आरसी क्या –  प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता है?

हिन्दी न फारसी मियाँ जी बनारसी – गुणहीन होकर भी गुणी होने का दंभ करना।

उसर मे मूसर – व्यर्थ ही बीच में पड़ना।

उसर बरसे तिन नहीं जामा – मूर्ख पर उपदेश का प्रभाव नहीं होता है।

ओछे की प्रीति बालू की भीति – तुच्छ व्यक्ति के साथ की गई मित्राता टिकाउ नहीं होती।

अेकेले सूपन खाँ आगे लडें कि पीछे – अकेला व्यक्ति अनेक काम एक साथ नहीं कर सकता है।

आधी छोड़ सारी को धवै आधी जाइ न सबरी पावै – सर्वस्व हड़पने का लोभी कुछ भी नहीं पाता है।

करेला और वह भी नीम चढ़ा – दुष्ट प्रकृति वाले को और भी दुष्ट का साथ मिलना।

कहीं की ईट कहीं का रोड़ा भानूमती ने कुनबा जोड़ा – इधर-उधर से छोटी-छोटी वस्तुएं लेकर काम चलाना।

काम परे कुछ और है, काम सरे कुछ और – काम निकाल कर लोग मुँह फेर लेते है।

कमान से छूटा तीर फिर लौटता नहीं – मुख से निकली बात का कोई उपाय नहीं होता है।

कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरी संगाति से बुराई पैफलती है।

काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती – धोखा एक बार ही खाया जा सकता है।

गाल में चावल – सम्पत्ति या उफंचा पद पाना और दूसरों को उपदेश देना।

09. महत्वपूर्ण मुहावरे एवं उनके अर्थ

यहाँ कुछ बहुप्रचलित मुहावरों के अर्थ और उनका वाक्यों में प्रयोग दिया जा रहा है:

1. अक्ल पर पत्थर पड़ना: बुद्धि मारी जाना।
प्रयोग: तुम्हारी अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए थे तो तुम बच्चे को अकेला छोड़ आए?

2. अंकुश लगाना: नियंत्रण करना।
प्रयोग: सुरेश! तुम अपने बेटे पर अंकुश लगाओ, नहीं तो आगे बहुत पछताओगे।

3. अपना उल्लू सीधा करना: स्वार्थ पूरा करना।
प्रयोग: आज के राजनीतिज्ञ जनता की सेवा नहीं करते अपना उल्लू सीधा करते हैं।

4. अपनी खिचड़ी अलग पकाना: सबसे अलग।
प्रयोग: मिलजुलकर काम करो, अपनी खिचड़ी अलग पकाने से कोई लाभ नहीं।

5. अपने पैरों पर खड़ा होना: स्वावलम्बी होना।
प्रयोग: मैं तुम लोगों का बोझ कब तक उठाऊँगा अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करो।

6. अपने पैरों कुल्हाड़ी मारना: अपने ही हाथों अपना अहित करना।
प्रयोग: तुमने शर्माजी का कहा न मानकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।

7. आँखों में धूल झोंकना: धोखा देना।
प्रयोग: तुम यह सड़ी – गली सब्जी देकर मेरी आँखों में धूल झोंकना चाहते हो।

8. आँख खुलना: समझ आ जाना।
प्रयोग: उसका व्यवहार देखकर मेरी आँखें खुल गईं।

9. आँख दिखाना: धमकाना।
प्रयोग: माताजी ने ज्यों ही आँखें दिखाईं त्यों ही बालक ने मिठाई लेने से इन्कार कर दिया।

10. आटे: दाल का भाव मालूम होना वास्तविकता का ज्ञान होना।
प्रयोग: आठ सौ – नौ सौ रुपये में घर का सब खर्च चलाओगे तब आटे – दाल का भाव मालूम होगा।

11. आस्तीन का साँप होना: विश्वासघाती सिद्ध होना।
प्रयोग: जिसे हमने अपना परम मित्र समझा था, वह आस्तीन का साँप सिद्ध हुआ।

12. ईंट से ईंट बजाना : नष्ट कर देना।
प्रयोग: मानसिंह ने राणा प्रताप से कहा, “मैं मेवाड़ की ईंट से ईंट बजा दूंगा।”

13. उँगली उठाना: दोषारोपण करना।
प्रयोग: ऐसा काम करना कि कोई उँगली न उठा सके।

14. कमर कसना: कार्य करने को तैयार होना।
प्रयोग:  नौजवानों को देश के सम्मान की रक्षा के लिए कमर कस लेनी चाहिए।

15. कमर टूटना: दुःखदायक स्थिति बनना।
प्रयोग: व्यापार में बहुत हानि होने से उसकी तो कमर ही टूट गई।

16. काठ का उल्लू: महान् मूर्ख।
प्रयोग: उसे क्या समझते हो, वह तो निरा काठ का उल्लू है।

17. कान भरना: चुगली करना, भड़काना।
प्रयोग: शर्माजी अन्य अध्यापकों के खिलाफ प्रिंसिपल साहब के कान भरते रहते हैं।

18. कान का कच्चा होना: दूसरों की बात पर शीघ्र विश्वास कर लेना।
प्रयोग: जो अधिकारी कान का कच्चा होता है, उससे न्याय की आशा कैसे की जा सकती है।

19. खरी – खोटी सुनाना: भला – बुरा कहना।
प्रयोग: मेरी कोई गलती नहीं थी, फिर भी प्रिंसिपल साहब ने मुझे खरी – खोटी सुना दी।

20. खून खौलना: बहुत क्रुद्ध होना।
प्रयोग: द्रोपदी को लज्जित होते देख भीम का खून खौलने लगा।

21. खाक में मिलना: बर्बाद हो जाना।
प्रयोग: रावण की हठधर्मी से सोने की लंका खाक में मिल गई।

22. गड़े मुर्दे उखाड़ना: पुरानी बातें दोहराना।
प्रयोग: इतिहास में तो गड़े मुर्दे ही उखाड़े जाते हैं।

23. गले का हार: अत्यंत प्रिय।
प्रयोग: रामचरितमानस भक्तों के गले का हार है।

24. गाल बजाना बढ़: चढ़कर बातें करना।
प्रयोग: धीरेन्द्र की बात पर यकीन न करना, उसे गाल बजाने की आदत है।

25. गुदड़ी का लाल: निर्धनता में उत्पन्न प्रतिभाशाली व्यक्ति।
प्रयोग: लाल बहादुर शास्त्री गुदड़ी के लाल थे।

26. घाव पर नमक छिड़कना: दुखी को और दुखी करना।
प्रयोग: एक तो उसका नुकसान हुआ, अब ताने देकर उसके घाव पर नमक मत छिड़को।

27. चंगुल में फँसना: काबू में कर लेना।
प्रयोग: भोले – भाले लोग धूर्तों के चंगुल में फँस जाते हैं।

28. चकमा देना: धोखा देना।
प्रयोग: चोर पुलिस को चकमा देकर भाग निकला।

29. चार दिन की चाँदनी: थोड़े समय की सम्पन्नता।
प्रयोग: लक्ष्मी चंचल है, चार दिन की चाँदनी पर गर्व मत करो।

30. चिकना घड़ा: जिस पर किसी बात का असर न हो।
प्रयोग: वह तो चिकना घड़ा है, तुम्हारी बातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

31. छप्पर फाड़कर देना: भाग्य के बल पर लाभ होना।
प्रयोग: भगवान ने उसे छप्पर फाड़कर धन दिया।

32. छोटे मुँह बड़ी बात: अपनी मर्यादा से अधिक बोलना।
प्रयोग: छोटे मुँह बड़ी बात करके तुमने समझदारी का काम नहीं किया।

33. जान के लाले पड़ना: संकट में पड़ना।
प्रयोग: सारा गाँव बाढ़ की चपेट में आ गया; लोगों को जान के लाले पड़ गए।

34. जले पर नमक छिड़कना: दुखी के दुख को और अधिक बढ़ाना।
प्रयोग: सुरेश तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर वैसे ही दुखी था, तुमने उसका उपहास करके जले पर नमक छिड़क दिया।

35. टका – सा जवाब देना: साफ इन्कार कर देना।
प्रयोग: इस बार भी जब चंदा देने की बात उठी तो उसने टका – सा जवाब दे दिया।

36. टाँग अड़ाना: रुकावट डालना।
प्रयोग: मेरी उसकी बात हो रही है, तुम क्यों बीच में टाँग अड़ाते हो?

37. टेढ़ी खीर: कठिन कार्य।
प्रयोग: कक्षा में प्रथम आना टेढ़ी खीर है।

38. डंके की चोट: सबके सामने।
प्रयोग: उसने डंके की चोट पे समाज से बाहर शादी की।

39. तलवे चाटना: चापलूसी करना।
प्रयोग: वे कोई और होंगे जो आपके तलवे चाटते हैं, मुझसे आशा न करना

40. तिनके का सहारा: थोड़ा – सा आश्रय।
प्रयोग: डूबते को तिनके का सहारा होता है।

41. तूती बोलना: धाक जमना।
प्रयोग: वे दिन गए, जब जमींदारों की तूती बोलती थी।

42. दंग रह जाना: आश्चर्यचकित होना।
प्रयोग: बालक के करतब देखकर दर्शक दंग रह गए।

43. दाँत खट्टे करना: पराजित करना।

प्रयोग: भारत ने अनेक बार दुश्मनों के दाँत खट्टे किए हैं।

44. दाल में काला होना: संदेहजनक बात होना।
प्रयोग: आपकी बातों से लगता है कि दाल में कुछ काला है।

45. दाल न गलना: चाल सफल न होना।
प्रयोग: पिताजी को पता लग गया है, अब तुम्हारी दाल नहीं गलेगी।

46. दुम दबाकर भागना: डरकर भाग जाना।
प्रयोग: दुम दबाकर भागना तो कायरों का काम है।

47. दो टूक बात कहना: साफ – साफ बात कहना।
प्रयोग: मुझे कुछ लेना – देना नहीं है, मैंने दो टूक बात कह दी।

48. नमक खाना: पालन – पोषण होना।
प्रयोग: मैंने इस घर का नमक खाया है, इसे बरबाद न होने दूंगा।

49. नाक कटना: बदनामी होना।
प्रयोग: भारतीय टीम तीनों मैच हार गई, उसकी तो नाक कट गई।

50. नाक में दम करना: परेशान करना।
प्रयोग: मच्छरों ने तो नाक में दम कर रखी है, रात भर सोने नहीं देते।

08. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द – 3

अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

वाक्य                                                                          एक शब्द

जिसके चार मुँह है                                                            चतुरानन

जिसका मुँह गज का है                                                      गजानन, गणपति

जिसके माँ-बाप न हों                                                         अनाथ

जिसका जन्म निम्न जाति में हुआ                                         अंत्यज

जिसका जन्म जल में हुआ है                                               जलज

जिसमें पाप नहीं हो                                                         निष्पाप

जो नया-नया आया हो                                                      नवागन्तुक

जिसकी अच्छी मति हो                                                   सुमतिवान

जिसकी थोड़ी आयु हो                                                       अल्पायु

जिसकी बहुत आयु हो                                                       दीर्घायु

जिसको कोई रोग न हो                                                       निरोग

व्याकरण का वि(ान                                                       वैयाकरण

विजय प्राप्त करने का इच्छुक                                           विजयाकांक्षी

दोपहर से पहले का समय                                                 पूर्वाह

दोपहर के बाद का समय                                                  अपराह

मार्ग में खाने के लिए भोजन                                                पाथेय

दूसरों की त्राुटियाँ ढूँढने वाला                                            परछिन्द्रावेशी

जिस पर विचार चल रहा हो                                              विचाराध्ीन

जहाँ अनेक लोगों का मिलन हो                                         सम्मेलन

गोद लिया गया                                                                 दत्तक

आदेश या नियम की अवहेलना                                        अवज्ञा

मृत्यु को जीतने वाला                                                         मृत्युंजय

जो देखने योग्य हो                                                             दर्शनीय

जो भिन्न-भिन्न भाषाओं को एक दूसरे को समझाए              दुभाषिया

न बहुत ठंडा न बहुत गर्म                                                 समशीतोष्ण

बहुत बड़ा-चढ़ा कर कही बात                                        अतिशयोक्ति

आरम्भ से अन्त तक                                                     आद्योपान्त

संध्या और रात के मध्य की बेला                                    गोध्ूलि

जो ध्र्म का आचरण करता हो                                        ध्र्मात्मा

जो पाप का आचरण करता हो                                        पापात्मा

जो व्याख्या करता हो                                                   व्याख्याकार

जो द्वार की रखवाली करे                                             द्वाराल

जो कोई चीज ले जाता हो                                            वाहक

जो वस्तुएँ बेचता हो                                                    विक्रेता

जो वस्तुएँ  क्रय करता हो                                             क्रेता

समान उम्र वाले                                                        समवयस्क

झूठ बोलने वाला                                                      मिथ्यावादी

वह स्त्राी जिसे पति ने छोड़ दिया है                             परित्यक्ता

जो मन हो मोहित कर ले                                           मनोहर

पीछे-पीछे चलने वाला                                             अनुगामी

प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति लब्ध्                                          प्रतिष्ठ

जो बात बार-बार कही जाए                                     पुनरूक्ति

केवल अपनी भलाई चाहने वाला                               स्वार्थी

जो सरोवर में पैदा होता हो                                     सरसिज

जो स्त्राी अभिनय करती हो                                     अभिनेत्राी

जो पुरूष अभिनय करता हो                                  अभिनेता

जो विष्णु का उपासक हो                                       वैष्णव

जो शक्ति का उपासक हो                                     शाक्त

जो शिव का उपासक हो                                       शैव

जिसके  दय में ममता नहीं है                                  निर्मम

जिसके दस मुँह है                                                 दशानन, रावण

जिसके चार मुँह है                                                चतुरानन

जिसका मुँह गज का है                                           गजानन, गणपति

जिसके माँ-बाप न हों                                           अनाथ

जिसका जन्म निम्न जाति में हुआ                             अंत्यज

जिसका जन्म जल में हुआ है                               जलज

जिसमें पाप नहीं हो                                            निष्पाप

जो नया-नया आया हो                                       नवागन्तुक

जिसकी अच्छी मति हो                                       सुमतिवान

जिसकी थोड़ी आयु हो                                       अल्पायु

जिसकी बहुत आयु हो                                       दीर्घायु

जिसको कोई रोग न हो                                       निरोग

व्याकरण का वि(ान                                          वैयाकरण

विजय प्राप्त करने का इच्छुक                              विजयाकांक्षी

दोपहर से पहले का समय                                   पूर्वाह

दोपहर के बाद का समय                                   अपराह

मार्ग में खाने के लिए भोजन                               पाथेय

दूसरों की त्राुटियाँ ढूँढने वाला                               परछिन्द्रावेशी

जिस पर विचार चल रहा हो                                   विचाराधीन

जहाँ अनेक लोगों का मिलन हो                            सम्मेलन

गोद लिया गया                                                  दत्तक

आदेश या नियम की अवहेलना                          अवज्ञा

मृत्यु को जीतने वाला                                         मृत्युंजय

08. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द – 2

अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

वाक्य                                                                          एक शब्द

जो नकल करने योग्य हो                                                    अनुकरणीय

जिसकी उपमा न दी जा सके                                               अनुपमेंय

जिसे किसी बात का पता न हो                                            अनभिज्ञ

जो बात पहले न हुई हो                                                        अभूतपूर्व

जिसका मूल्य न आॅका जा सके                                            अमूल्य

जिसको थोड़ा ज्ञान हो                                                         अल्पज्ञ

जो विध् िअथवा विधन के विपरीत हो                                अवैधनिक 

जो न हो सके                                                                    अशक्य

जो पढ़ने सुनने अथवा कहने में घिनौनी व लज्जापूर्ण हो              अश्लील

जिस रोग की चिकित्सा न की जा सके                                   असाध्य रोग

आगे आने वाला                                                                     आगामी

अत्यन्त क्रूर व्यक्ति                                                              आततायी

स्वरचित जीवन गाथा                                                           आत्मकथा

किसी देश के सर्वाध्कि पुराने निवासी                                    आदिवासी

आजकल से सम्बन्ध्ति                                                          आधुनिक

मृत्युपर्यन्त व्रत                                                                     आमरण व्रत

ईश्वर और परलोक पर विश्वास न रखने वाला                            नास्तिक

जो इन्द्रियों की पहँुच से परे हो                                              अनीन्द्रिय

जिसका मन जगह से उचट गया हो                                          विरक्त

जो ट्टण से मुक्त हो चुका हो                                                     उट्टरण

जिसके उफपर कथन किया गया हो                                         उपर्युक्त

जिस बात का सम्बन्ध् इस लोक से हो                                        ऐहिक

जो इच्छा पर निर्भर हो                                                              ऐच्छिक

मन गढंत बात कपोल                                                               कल्पित

जैसे तैसे समय बिताना                                                             कालयापन करना

जो काम से जी चुराता हो                                                           कमचोर

जिसका चाल-चलन अच्छा न हो                                                 कुचाली

जो उपकार न माने                                                                    कृतघ्न

जो उपकार मानता हो                                                               कृतज्ञ

कीटाणु मारने वाली                                                                   कृमिध्न

आकाश में उड़ने वाले                                                                नभचर

जो छिपाने योग्य हो                                                                    गोपनीय

जो ग्रहण करने योग्य हो                                                             ग्राहा

दूसरों के छिद्र ढूँढने वाला                                                          छिद्रान्वेषी

दूसरे का मूँह ताकने वाला                                                         परमुखापेक्षी

परस्पर मेल-मिलाप करना                                                        तारतम्य

जो छोड़ने योग्य हो                                                                   त्याज्य

तीनों लोकों का स्वामी                                                              त्रिलोकीनाथ

पति-पत्नी                                                                               दम्पत्ति

जो देखने योग्य हो                                                                  दर्शनीय

जो भिन्न-भिन्न भाषाओं को एक दूसरे को समझाए                      दुभाषिया                                                     

न बहुत ठंडा न बहुत गर्म                                                        समशीतोष्ण

बहुत बड़ा-चढ़ा कर कही बात                                               अतिशयोक्ति

आरम्भ से अन्त तक                                                              आद्योपान्त

संध्या और रात के मध्य की बेला                                            गोधूलि

जो धर्म का आचरण करता हो                                               धर्मात्मा

जो पाप का आचरण करता हो                                               पापात्मा

जो व्याख्या करता हो                                                           व्याख्याकार

जो द्वार की रखवाली करे                                                      द्वाराल

जो कोई चीज ले जाता हो                                                      वाहक

जो वस्तुएँ बेचता हो                                                            विक्रेता

जो वस्तुएँ  क्रय करता हो                                                    क्रेता

समान उम्र वाले                                                                समवयस्क

झूठ बोलने वाला                                                              मिथ्यावादी

वह स्त्राी जिसे पति ने छोड़ दिया है                                     परित्यक्ता

जो मन हो मोहित कर ले                                                   मनोहर

पीछे-पीछे चलने वाला                                                     अनुगामी

प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति लब्ध्                                               प्रतिष्ठ

जो बात बार-बार कही जाए                                           पुनरूक्ति

केवल अपनी भलाई चाहने वाला                                     स्वार्थी

जो सरोवर में पैदा होता हो                                            सरसिज

जो स्त्राी अभिनय करती हो                                           अभिनेत्राी

जो पुरूष अभिनय करता हो                                        अभिनेता

जो विष्णु का उपासक हो                                               वैष्णव

जो शक्ति का उपासक हो                                            शाक्त

जो शिव का उपासक हो                                               शैव

जिसके  दय में ममता नहीं है                                        निर्मम

जिसके दस मुँह है                                                     दशानन, रावण

08. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द – 1

अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

वाक्य                                                                          एक शब्द

जिस व्यक्ति का आचरण भ्रष्ट हो                                         दुराचारी

वो व्यक्ति जो अपने स्वार्थ में चतुर हो                                   स्वार्थी

पिता से प्राप्त हुई सम्पत्ति                                                  पैतृक

पर्वत का उपरी भाग                                                         अधित्यका

पर्वत का निचला भाग                                                        उपत्यका

जल्दी जाने या चलने वाला                                                 द्रुतगामी

भविष्य की सोचने वाला                                                   दूरदर्शी

जिस पुरूष की स्त्राी मर गई                                             विधुर

जिस स्त्राी का पति मर गया                                              विधवा

वह व्यक्ति जो कमजोर है                                                 निर्बल

जिसे मोल लिया गया हो                                                   क्रीत

उत्तम आचरणवान                                                          सदाचारी

शीघ्र समाप्त होने वाला                                                   क्षणभंगुर

जहाँ कोई व्यक्ति न हो                                                   निर्जन

धन का दुरूपयोग करने वाला                                        अपव्ययी

मीठी वाणी बोलने वाला                                                  मृदुभाषी

जन्म से अन्ध                                                                 जन्मांध

जिसकी कोई उपमा न हो                                              अनुपमेय

जो कहा न जा सके                                                       अकथनीय

जो विनाश को प्राप्त न हो सके                                        नित्य

बिना सोच समझे कार्य करने वाला                                  अविवेकी

तर्क करने वाला व्यक्ति                                                   तार्किक

सोच समझ कर कार्य करने वाला                                     विवेकी

धर्म-पूजादि करने वाला                                                  धर्मिक

जो पढ़ा न जा सके                                                       अपठनीय

जो दिखाई न दे                                                           अदृश्य

जो वेतन न ग्रहण करे                                                  अवैतनिक

जो ईश्वर में विश्वास रखता हो                                         आस्तिक

वह जो भाग्य को मानता है                                            भाग्यवादी

कर्म में लगा रहने वाला                                                 कर्मठ

जो कठिनता से भेदा जा सके                                         दुर्भेद्य

जिसे किसी पर दया नहीं आती                                       निर्दयी

आत्मा को कष्ट देने वाला                                                आत्महंता

जिसका वर्णन नहीं किया जा सके                                   अवर्णनीय

दूसरों को धेखा देने वाला                                                धूर्त

दूसरों को दूःख पहुँचाने वाला                                          परपीड़क

दूसरों का पोषण करने वाला                                           परपोषक

वह जो साहित्यिक गुण-दोष की  विवेचना करता है            समालोचक

बाहर के देशों से आई वस्तुओं का व्यापार                       आयात

देश की सीमा से बाहर जोन वाली वस्तुओं का व्यापार         निर्यात

वह रमणी जिसके नेत्रा मृग के नयनों के समान हों               मृगनयनी

जब मात्रा से अध्कि वर्षा हो                                              अतिवृष्टि

वह व्यक्ति जो पहले किसी पद पर रह चुका हो               भूतपूर्व

दूर से टकराकर लौटी ध्वनि                                            प्रतिध्वनि

जो मारने योग्य न हो                                                       अवध्य

जिसके टुकड़े न हो सकते हो                                           अखण्ड

जो काटा ना जा सके                                                        अकाट्य

अण्डे से जन्म लेने वाला                                                   अंडज

जो बिना सोचे-समझे अनुगमन करे                                   अन्धनुगामी

एक-एक अक्षर का ब्यान रखना                                        अक्षरशः

जिसका जन्म पहले हुआ हो                                              अग्रज

जो बहुत गहरा हो                                                            अगाध

जिसका चिन्तन न किया जा सके                                       अचिन्त्य

जो इन्द्रियों से परे हो                                                          अगोचर

जिसका जन्म न होता हो                                                    अजन्मा

जिसका शत्राु पैदा न हुआ हो                                              अजातशत्राु

जिसे जीता न जा सके                                                        अजेय

जिसे पता न हो                                                                  अज्ञात

जो तर्क से परे हो                                                                अतक्र्य

जो बीत गया हो                                                                  अतीत

जिसने नीचे हस्ताक्षर किये हों                                              अधेहस्ताक्षरी

जिसकी गहरायी का पता न हो                                            अथाह

जो कभी न आया हो                                                          अनागत

जिसके माता-पिता न हों                                                     अनाथ

जो श्रेष्ठ गुणों से युक्त न हो                                                  अनार्य

जिसका जन्म बाद में हुहआ हो                                            अनुज

07. अनेकार्थक शब्द, समानार्थक शब्द और प्रयोगगत अन्तर

अनेकार्थक शब्द

शब्द   –  अर्थ

अंनत – विष्णु, शेषनाग, आकाश

अक्ष – आँख, सूर्य, ज्ञान, रूद्राक्ष

अम्बर – आकाश, अभिप्राय

अर्थ – धन, प्रयोजन, अभिप्राय

इन्दु – चंद्रमा, कपूर

उग्र – उत्कट, क्रोधी, कठिन, विष्णु

उत्तर – जवाब, उत्तर दिशा, प्रतिवचन

उमा – दुर्गा, शांति, कांति, कीर्ति

कर – हाथ, सँड, किरण, राज्यकर

कर्ण – कान, काम, समकोण

कहल – विवाद, तलवार की म्यान

कल – सुदंर, मधुर ध्वनि

काल – समय, मुहूर्त, अवसर, यम, युग

कल्प – उपाय, प्रलय, प्यास, सूर्य

कृष्ण – वासुदेव-पुत्रा, काल कलियुग

केश – किरण, विश्व, बाल, विष्णु

क्रिया – व्यवहार, कार्य, शपथ, श्राद्ध

क्षत्रा – बल, राष्ट, धन, शरीर, जल

गति – चाल, मोक्ष

गौ – गाय, वाणी, सूर्य, चंद्रमा

चपला – लक्ष्मी, बिजली

चारा – घास, उपाय

चश्मा – ऐनक, झरना

जगत – संसार, टेक, वायु, शंकर

जीवन – प्राण, परमेश्वर, जल, मक्खन

ताल – जलाशय, ताड़

दक्षिण – सरल, अनुकूल, चतुर, उदार

द्वन्द्व – जोड़, रहस्य, कलह

निर्वाण – मृत्यु, मोक्ष, संगम, विश्राम

नीलकंठ – शंकर, मोर

पक्ष – पंख, बल, मित्रा, दल, समूह

पट – वस्त्रा, यवनिका, किवाड़

पद – पाँव, चिन्ह्, स्थान

प्रकृति – स्वभाव, धर्म, गुण, माया, योनि

प्रसव –    जन्म, फल, पूफल

पफल – लाभ, परिणाम, चर्म, ढ़ाल

बलि – नैवेद्य, चढ़ावा, राजा बलि

बीर – वीर, बहादुर, भाई, सखी

मद – घमंड, हर्ष, उन्माद, शराब

मल – मैल, कप़फ, पाप, विकाल, शुद्र

मा – माता, लक्ष्मी, मान, माप

मित्रा – दोस्त, प्रिय, सूर्य

योग – जोड़, युक्ति, विधन, सूत्र

लिंग – चिन्ह, प्रमाण, पुरूष

शंकू – बाण, कील, भाला, पाप, हंस

श्री – छह रागों में एक, लक्ष्मी, यश

सिला – इनाम, बदला, शिला

हर – महादेव, अग्नि, ग्रहण

हरिण – मृग, शिव, विष्णु, सूर्य, भूरा

समानार्थक शब्द और उनका प्रयोगगत अन्तर

अध्ययन समान्य रूप से पढ़ना

अनुशीलन विषय का गहन अध्ययन

अधर्म ऐसा कार्य जो धर्म के प्रतिकूल हो

अन्याय कानून के विरूद्ध कार्य

अज्ञान जिसमें ज्ञान का अभाव हो

अनभिज्ञ जिसमें अनुभव का अभाव हो

अज्ञात जो ज्ञात न हो, किन्तु जाना जा सकता हो

अज्ञेय जो जाना ही न जा सके

अनुभव कर्मेंद्रियों से प्राप्त बाहरी ज्ञान

अनुभूति ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त आतंरिक ज्ञान

अन्वेषण अज्ञात वस्तु, पदार्थ या स्थान आदि की जानकारी प्राप्त करना

अनुसंधन प्रकट तथ्यों में से कतिपय छिपे तथ्यों की छानबीन करना

अणु एकाधिक परमाणुओं के योग से बनने वाला पदार्थ

परमाणु पदार्थ का वह सबसे छोटा भाग जिसके टुकड़े न किये जा सकते हों

अभिमान अपने आप को उफँचा समझना

घमंड अपने को बड़ा और दूसरों को छोटा समझना

अंहकार झूठा घमंड, आवश्यकता से अधिक निजत्व की भावना

दर्प नियम की अवहेलना करके घमण्ड करना

गर्व धन, विद्या और सौन्र्दय आदि का यथोचित और यथावश्यक अभिमान

आवश्यकता ऐसी वस्तु की इच्छा जो किसी भी प्रकार से प्राप्त की जा सके

इच्छा ऐसी कल्पनाएँ जिनका पूर्ण होना जरूरी नहीं है

अनुराग वस्तुओं के प्रति निःस्वार्थ प्रेम

आसक्ति किसी वस्तु के प्रति विशेष मोह

आग्रह अधिकार भावना से तुष्ट याचना 

अनुरोध् नम्रतापूर्वक याचना करना

आशा पुण्य और आदरणीय व्यक्तियों द्वारा दिया गया कार्य-निर्देंश

आदेश अधिकारी व्यक्ति द्वारा दिया गया निर्देंश

आधि मानसिक कष्ट

व्याधि शारीरिक कष्ट

आशंका वह मानसिक संशय जिसे किसी अभद्र घटना के होन की भयमिश्रित शंका हो

भय मन की व्याकुलता जिससे अन्ष्टि की सम्भावना हो

अपमान किसी की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाना

अवमान अनजाने में किसी की प्रतिष्ठज्ञ को हानि पहुँचाना

अवस्था शीघ्र ही परिवर्तित होने वाली स्थिति

आयु समय, उम्र, पूरा जीवन

अगम जहाँ पहुँचा ना जा सके

दुर्गम जहाँ पहुँचना कठिन हो

अद्वितीय जिसके समान दूसरा न हो 

अनुपम जिसकी तुलना या उपमा न हो

अस्त्रा वह हथियार जो पेककर चलाया जा सके

शस्त्रा वह हथियार जो हाथ से पकड कर चलाया जा सके

असम्य जो प्राप्त न किया जा सके

दुष्प्राप्य जो कठिनाई से प्राप्त किया जा सके

आयाम वह कठोर श्रम जिससे थकावट हो

अर्पण जो छोटे बड़ों को देते हैं

प्रदान जो बड़े छोटों को देते हैं

अध्यक्ष किसी संस्था, परिषद का प्रधन व्यक्ति जिसका पदस्थायी हो

सभापति किसी गोष्ठी अथवा सभी का अस्थायी प्रधान

अलोचना गुण दोषों का वर्णन करना

समीक्षा गुण दोषों के विषय में टीका-टीप्पणी करना

आराध्ना मनोगत आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु आराधय का पूजन

उपासना उपवास और पूजा करना जिससे इष्टदेव की कृपा प्राप्त की जा सके

अनुग्रह किसी के प्रति प्रकट भाव

अनुकंपा किसी को कष्ट में देखकर दया से भर उठना

आशा किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा 

विश्वास पूरा भरोसा

अलौकिक जो सांसरिक नहीं हो

असाधरण जो साधरण से अधिक हो और विशिष्ट हो, किन्तु अलौकिक न हो

आचार वैयक्तिक आचरण

व्यवहार सामाजिक आचरण

आह्मद तीव्र, किन्तु क्षणिक मानसिक आनंद

आमोद क्षणिक प्रसन्नता देने वाली इन्द्रिय क्रीड़ा

आमोद क्षणिक प्रसन्नता देने वाली इन्द्रिय क्रीड़ा

अज्ञ स्वाभाविक ज्ञान से शून्य व्यत्तिफ

अनभिज्ञ किसी विशिष्ट अनुभव से शून्य व्यक्ति

आंतक बलशाली के अन्याय से उत्पन्न भय

वास डर से उत्पन्न हुई व्याकुलता की भावना

आगामी आने वाला

अनुमान बौद्धिक तर्कणा से किया गया निश्चय या निर्णय

प्राक्ककलन वह निर्णय या निश्चय जो गणना के सहारे किया गया हो

अनुमोदन किसी कार्यवाही या कथन पर सहमत होना

स्वीकृति किसी प्रस्ताव को स्वीकारना

अस्वीकृति किसी दावे को नामंजूर करना

प्रतिबंध किसी का खण्डन करना

अपराध वह कार्य जो विधि-कानून के विरूद्ध हो

पाप धर्म और आचरण विषयक नियमों की अवहेलना

अपयश ऐसी बदनामी जो यश प्राप्त करने के बाद में होती है

कलंक समाज विरोधी आचरण करने पर मिली बदनामी

ह्रास कीमत में हुई गिरावट

क्षीणता किसी वस्तु का अपनी सामान्य स्थिति से भी घट जाना

संस्कृति आध्यात्मिक, अनुशासनात्मक और सूक्ष्म व्यवहार

सभ्यता भौतिक और स्थूल व्यवहार

सृजन निर्माण करना

उत्पादन उत्पन्न करना

शाश्वत जो वस्तु नष्ट न हो सके

स्थित स्वयं के स्थान पर ही खड़ा होना

स्थिर वह जो अपने नियमों से हटे नहीं 

समय काल विशेष

अवधि समय की निश्चित सीमा

शोक किसी प्रिय या स्वजन की अनुपस्थिति में उत्पन्न पीड़ादायक भाव

विषाद शोक की चरम सीमा

ईर्ष्या दूसरों की उन्नति को सहन न कर पाने के कारण उत्पन्न भाव

द्वेष शत्राुता के कारण मन में उत्पन्न विरोध्ी भाव

उत्तेजना किसी के द्वारा ज्यादती किये जाने पर उत्पन्न भाव

उत्साह सत्कार्य के संपादनार्थ उत्पन्न उल्लास

भक्ति ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ और स्थायी भाव

श्रद्धा पूज्य व्यक्तियों के प्रति उनके गुणों के कारण उत्पन्न आदर सूचक भावना,

उद्दण्ड वह व्यक्ति जो दण्ड से भी नहीं डरता है

उच्छृंखला नियमवद्ध न होना

प्रगाति साधरण रूप से विकास करना

उन्नति उपर उठते हुए विकास करना

उपकरण किसी कार्य को करने वाला यंत्रा

उपादान किसी वस्तु को तैयार करने का सामान

उपहार बराबर वालों को सप्रेम प्रदत्त वस्तु 

भेंट बड़ों को दी जाने वाली वस्तु

पौरूष वीरोचित कार्य करने की शक्ति

ओज आतंरिक गुण जो वीरभावों से प्रेरित हो

मुनि तत्व चिन्तक एवं धर्मिक तत्वों का विश्लेषणकत्र्ता

ऋषि मंत्राद्रष्टा और आध्यात्मिक तत्वों को विश्लेषणकत्र्ता

उद्देश्य अंतिम लक्ष्य

ध्येय जिस पर दृष्टि केन्द्रित हो

औषधलय औषध्यिाँ रखने का स्थान

चिकित्सालय रोगों और रोगियों की चिकित्सा करने का स्थान

कार्य कोई भी सामान्य कार्य

कर्त्तव्य वह कार्य जिसे करने के लिए नैतिक बंधन हो

काल समय की वह सत्ता जिससे भूत, वत्र्तमान और भविष्य का बोध होता हो

युग समय की लम्बी सीमा

विख्यात अच्छे कार्यों के लिए प्रसिद्धि

कुख्यात बुरे कार्यों के लिए प्रसिद्धि

सहयोग वह क्रिया जिसमें दोनों पक्ष बराबर योगदान देते हैं

सहायता वह क्रिया जिसमें केवल एक ही पक्ष संक्रिय होता है

अभिनेता अभिनय करने वाला व्यक्ति

पात्र नाटक या एकांकी के मूल चरित्र

जानना वस्तुस्थिति का प्रत्यक्षीकरण

समझना वस्तुस्थिति का कार्य-कारण परम्परा से अवगत होना

सूक्ष्म इतना छोटा होना कि दिखाई ही न दे 

संक्षिप्त छोटा

उपयोग किसी वस्तु का लाभ उठाते हुए उसे काम में लाना

प्रयोग किसी वस्तु को साधरण ढंग से काम में लाना

चतुर होशियार 

चालाक अपने कार्य को सिद्ध करने में निपुण

कुशल प्रकृति प्रदत्त योग्यता वाला व्यक्ति

निपुण प्रयत्न से ही प्राप्त योग्यता वाला व्यक्ति

सहानुभूति दूसरों के दुख-सुख को अपना समझना

संवेदना दूसरों को दुखी देखकर दुख प्रकट करना

मन संकल्प-विकल्प से मुक्त होता है

चित्त बातों का स्मरण-विस्मरण करने वाला

बुद्धि कार्यों का निश्चय करने वाली, निर्णय लेने वाली शक्ति

ग्रंथ बड़ी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक

पुस्तक सभी साधरण पुस्तकें

प्रेम बराबर वालों से किया जाने वाला प्यार 

प्रणय नर नारी के मध्य प्रेम

स्नेह छोटों के प्रति बड़ों का प्रेम

मन्त्रणा गुप्त रीति से किसी विश्वदूत के कत्र्तव्य का निर्धारण

परामर्श परिणाम का पूर्ण रूप से विचार करके दिया गया मत

विलाप शोक के कारण होने वाले उद्वार

प्रलाप अध्कि शोकावेग में संज्ञाहत

संलाप वार्तालाप

शिक्षा पढ़ाने या सिखाने का कार्य

दीक्षा आचार्य द्वारा दिया गया मंत्र, उपदेश

मृत्यु जन सामान्य की मौत के लिए शब्द

निध्न महापुरूषों व विशिष्ट व्यक्तियों की मौत पर प्रयुक्त शब्द

प्रणाम अपने से बड़ों को किया गया नमन

नमस्कार अपने बराबर वालों को किया गया नमन

पुराना जो ताजा व नवीन न हो

प्राचीन अत्यंत पुराना

तन्द्रा उंघना, नींद की अर्द्ध अवस्था

निन्द्रा गहरी नींद में रहना या सोना

अशिक्षित विचारों से पिछड़ा व्यक्ति

निरक्षर वह व्यक्ति जो न तो पढ़ना जानता हो और न ही लिखना

चेष्टा किसी कार्य के लिए किया गया साधारण प्रयत्न

प्रयास सफलता की विशेष आशा से किया गया प्रयत्न

चिन्ह निशान

लक्षण विशेषताएँ

भाव्य किसी रचना की विशेष विवेचनात्मक व्याख्या

टीका किसी पद्य का सामान्य अर्थ करने वाली प(ति

तट नदी या समुद्र का किनारा

तीर पृथ्वी का वह छोर जिसे जल स्पर्श करता है

संघर्ष दो से अध्कि व्यक्तियों का टकराव

द्वन्द्व दो व्यक्तियों या वस्तुओं का टकराव

नायिका कहानी, उपन्यास, नाटक की प्रधन स्त्राी पात्रा

अभिनेत्राी नाटक या सिनेमा में अभिनय करने वाली स्त्राी

परिक्षक योग्यता की जाँच करने वाला व्यक्ति

निरीक्षक व्यवस्था की देख-रेख करने वाला व्यक्ति

पारितोषिक प्रतियोगिता में विजय होने पर दिया जाने वाला इनाम

पुरस्कार किसी व्यक्ति के अच्छे कार्य या अच्छी सेवा पर दिया गया इनाम

06. समास, उपसर्ग, समानार्थी या पर्यायवाची शब्द

समास

समास का अर्थ है ‘संक्षिप्तीकरण’। इसका शाब्दिक अर्थ होता है – छोटा रूप। अथार्त जब दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर जो नया और छोटा शब्द बनता है उस शब्द को समास कहते हैं।

दूसरे शब्दों में: दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नवीन एवं सार्थक शब्द (जिसका कोई अर्थ हो) को समास कहते हैं।

जैसे:

  • रसोई के लिए घर इसे हम रसोईघर भी कह सकते हैं।
  • ‘राजा का पुत्र’ – राजपुत्र

संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में समास का बहुतायत में प्रयोग होता है। जर्मन आदि भाषाओं में भी समास का बहुत अधिक प्रयोग होता है। समास के बारे में संस्कृत में एक सूक्ति प्रसिद्ध है:

वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद्गेहे नित्यमव्ययीभावः।
तत् पुरुष कर्म धारय येनाहं स्यां बहुव्रीहिः॥

समास रचना में दो पद होते हैं , पहले पद को ‘पूर्वपद’ कहा जाता है और दूसरे पद को ‘उत्तरपद’ कहा जाता है। इन दोनों से जो नया शब्द बनता है वो समस्त पद कहलाता है। 
जैसे:

  • रसोई के लिए घर = रसोईघर
  • हाथ के लिए कड़ी = हथकड़ी
  • नील और कमल = नीलकमल
  • रजा का पुत्र = राजपुत्र

समास के भेद

समास के 6 भेद होते है, जो इस प्रकार है:

1. अव्ययीभाव समास
इसमें प्रथम पद अव्यय होता है और उसका अर्थ प्रधान होता है उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। इसमें अव्यय पद का प्रारूप लिंग, वचन, कारक, में नहीं बदलता है वो हमेशा एक जैसा रहता है।

दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यदि एक शब्द की पुनरावृत्ति हो और दोनों शब्द मिलकर अव्यय की तरह प्रयोग हों वहाँ पर अव्ययीभाव समास होता है संस्कृत में उपसर्ग युक्त पद भी अव्ययीभाव समास ही मने जाते हैं।

जैसे:

  • दिनानुदिन  =  दिन के बाद दिन
  • यथार्थ  =  अर्थ के अनुसार
  • बखूबी  = खूबी के साथ
  • निर्भय  = बिना भय के साथ
  • यथा शक्ति = शक्ति के अनुसार
  • प्रत्येक =  एक-एक
  • प्रत्यंग  = अंग-अंग
  • आजीवन  = समस्त जीवन
  • नित्यप्रति =  प्रतिदिन (नित्य प्रति)
  • आजन्म  = जन्म से मृत्यु तक
  • एकाएक = अचानक ही
  • निर्विवाद  = बिना विवाद के
  • हाथो-हाथ = एक हाथ से दूसरे हाथ

2. तत्पुरुष समास
तत्पुरुष समास में उत्तरपद प्रधान होता है, पूर्वपद अप्रधान होता है। इसी के साथ दोनों पदों के मध्य में कारक का लोप रहता है, तो इस प्रकार के समास को तत्पुरुष समास तत्पुरुष समास कहते हैं। तत्पुरुष समास में विशेषणीय पद और मुख्य पद का संबंध एक निश्चित भावना को प्रकट करता है।

जैसे: 

  • धर्म का ग्रन्थ = धर्मग्रन्थ
  • राजा का कुमार = राजकुमार
  • तुलसीदासकृत = तुलसीदास द्वारा कृत (रचित)

तत्पुरुष समास के 6 भेद होते है, जो इस प्रकार है:

i. कर्म तत्पुरुष समास: इसमें दो पदों के बीच में कर्मकारक छिपा हुआ होता है। कर्मकारक का चिन्ह ‘को’ होता है। को’ को कर्मकारक की विभक्ति भी कहा जाता है। उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं।

जैसे:

  • रथचालक = रथ को चलने वाला
  • ग्रामगत = ग्राम को गया हुआ
  • माखनचोर = माखन को चुराने वाला
  • वनगमन = वन को गमन
  • मुंहतोड़ = मुंह को तोड़ने वाला
  • स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
  • देशगत = देश को गया हुआ
  • जनप्रिय = जन को प्रिय
  • मरणासन्न = मरण को आसन्न

ii. करण तत्पुरुष समास: जहाँ पर पहले पद में करण कारक का बोध होता है। इसमें दो पदों के बीच करण कारक छिपा होता है। करण कारक का चिन्ह य विभक्ति “के द्वारा” और ‘से’ होता है। उसे करण तत्पुरुष कहते हैं।

जैसे:

  • स्वरचित = स्व द्वारा रचित
  • मनचाहा = मन से चाहा
  • शोकग्रस्त = शोक से ग्रस्त
  • भुखमरी = भूख से मरी
  • धनहीन = धन से हीन
  • बाणाहत = बाण से आहत
  • ज्वरग्रस्त = ज्वर से ग्रस्त
  • मदांध = मद से अँधा
  • रसभरा = रस से भरा
  • भयाकुल = भय से आकुल
  • आँखोंदेखी = आँखों से देखी

iii. सम्प्रदान तत्पुरुष समास: इसमें दो पदों के बीच सम्प्रदान कारक छिपा होता है। सम्प्रदान कारक का चिन्ह या विभक्ति “के लिए” होती है। उसे सम्प्रदान तत्पुरुष समास कहते हैं।

जैसे:

  • विद्यालय = विद्या के लिए आलय
  • रसोईघर = रसोई के लिए घर
  • सभाभवन = सभा के लिए भवन
  • विश्रामगृह = विश्राम के लिए गृह
  • गुरुदक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
  • प्रयोगशाला = प्रयोग के लिए शाला
  • देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
  • स्नानघर = स्नान के लिए घर
  • सत्यागृह = सत्य के लिए आग्रह
  • यज्ञशाला = यज्ञ के लिए शाला
  • डाकगाड़ी = डाक के लिए गाड़ी
  • देवालय = देव के लिए आलय
  • गौशाला = गौ के लिए शाला

iv. अपादान तत्पुरुष समास: इसमें दो पदों के बीच में अपादान कारक छिपा होता है। अपादान कारक का चिन्ह (से) या विभक्ति ‘से अलग’ होता है। उसे अपादान तत्पुरुष समास कहते हैं।

जैसे:

  • कामचोर = काम से जी चुराने वाला
  • दूरागत = दूर से आगत
  • रणविमुख = रण से विमुख 
  • नेत्रहीन = नेत्र से हीन
  • पापमुक्त = पाप से मुक्त
  • देशनिकाला = देश से निकाला
  • पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
  • पदच्युत = पद से च्युत
  • जन्मरोगी = जन्म से रोगी
  • रोगमुक्त = रोग से मुक्त

v. सम्बन्ध तत्पुरुष समास: इसमें दो पदों के बीच में सम्बन्ध कारक छिपा होता है। सम्बन्ध कारक के चिन्ह या विभक्ति “का, के, की” होती हैं। उसे सम्बन्ध तत्पुरुष समास कहते हैं।

जैसे:

  • राजपुत्र = राजा का पुत्र
  • गंगाजल = गंगा का जल
  • लोकतंत्र = लोक का तंत्र
  • दुर्वादल =दुर्व का दल
  • देवपूजा = देव की पूजा
  • आमवृक्ष = आम का वृक्ष
  • राजकुमारी = राज की कुमारी
  • जलधारा = जल की धारा
  • राजनीति = राजा की नीति
  • सुखयोग = सुख का योग
  • मूर्तिपूजा = मूर्ति की पूजा
  • श्रधकण = श्रधा के कण
  • शिवालय = शिव का आलय
  • देशरक्षा = देश की रक्षा
  • सीमारेखा = सीमा की रेखा

vi. अधिकरण तत्पुरुष समास: इसमें दो पदों के बीच अधिकरण कारक छिपा होता है। अधिकरण कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘ में ‘, ‘पर’ होता है। उसे अधिकरण तत्पुरुष समास कहते हैं।

जैसे:

  • कार्य कुशल = कार्य में कुशल
  • वनवास = वन में वास
  • ईस्वरभक्ति = ईस्वर में भक्ति
  • आत्मविश्वास = आत्मा पर विश्वास
  • दीनदयाल = दीनों पर दयाल
  • दानवीर = दान देने में वीर
  • आचारनिपुण = आचार में निपुण
  • जलमग्न = जल में मग्न
  • सिरदर्द = सिर में दर्द
  • क्लाकुशल = कला में कुशल
  • शरणागत = शरण में आगत
  • आनन्दमग्न = आनन्द में मग्न
  • आपबीती = आप पर बीती

3. कर्मधारय समास
इस समास का उत्तर पद प्रधान होता है। इस समास में विशेषण -विशेष्य और उपमेय -उपमान से मिलकर बनते हैं उसे कर्मधारय समास कहते हैं।

जैसे:

  • चंद्रमुख = चंद्र जैसा मुख
  • कमलनयन = कमल के समान नयन
  • देहलता = देह रूपी लता
  • दहीबड़ा = दही में डूबा बड़ा
  • नीलकमल = नीला कमल
  • पीतांबर = पीला अंबर (वस्त्र)

कर्मधारय समास के भेद:

i. विशेषण पूर्वपद कर्मधारय समास: जहाँ पर पहला पद प्रधान होता है वहाँ पर विशेषणपूर्वपद कर्मधारय समास होता है। 

जैसे:

  • नीलीगाय = नीलगाय
  • पीत अम्बर =पीताम्बर
  • प्रिय सखा = प्रियसखा

ii. विशेष्य पूर्वपद कर्मधारय समास: इसमें पहला पद विशेष्य होता है और इस प्रकार के सामासिक पद ज्यादातर संस्कृत में मिलते हैं। 

जैसे: कुमारी श्रमणा = कुमारश्रमणा

iii. विशेषणोंभयपद कर्मधारय समास: इसमें दोनों पद विशेषण होते हैं। 

जैसे:

  • नील = पीत
  • सुनी = अनसुनी
  • कहनी = अनकहनी

iv. विशेष्योभयपद कर्मधारय समास: इसमें दोनों पद विशेष्य होते है। 

जैसे: आमगाछ ,वायस-दम्पति।

कर्मधारय समास के उपभेद:

i. उपमानकर्मधारय समास: इसमें उपमानवाचक पद का उपमेयवाचक पद के साथ समास होता है। इस समास में दोनों शब्दों के बीच से ‘ इव’ या ‘जैसा’ अव्यय का लोप हो जाता है और दोनों पद , चूँकि एक ही कर्ता विभक्ति , वचन और लिंग के होते हैं , इसलिए समस्त पद कर्मधारय लक्ष्ण का होता है। उसे उपमानकर्मधारय समास कहते हैं। 

जैसे: विद्युत् जैसी चंचला = विद्युचंचला

ii. उपमितकर्मधारय समास: यह समास उपमानकर्मधारय का उल्टा होता है। इस समास में उपमेय पहला पद होता है और उपमान दूसरा पद होता है। उसे उपमितकर्मधारय समास कहते हैं। 

जैसे:

  • अधरपल्लव के समान = अधर – पल्लव
  • नर सिंह के समान = नरसिंह

iii. रूपककर्मधारय समास: जहाँ पर एक का दूसरे पर आरोप होता है वहाँ पर रूपककर्मधारय समास होता है। 

जैसे: मुख ही है चन्द्रमा = मुखचन्द्र।

4. द्वन्द समास
द्वन्द जिस समास के सभीपद प्रधन हो द्वन्द होता है। द्वन्द का अर्थ है- दो का जोड़ा। इसमें दो पद प्रधन होते हैं और इसमें अवयव शब्दों के बीच समुच्चयबोध्क अव्यय ‘और’ अथवा, ‘या’ का लोप होता है। विग्रह करने पर ‘और’ अथवा ‘या’ का प्रयोग किया जाता है। 

जैसे: 

  • माता-पिता  =  माता और पिता
  • सीता-राम  =   सीता और राम
  • राध-कृष्ण  =  राध और कृष्ण
  • भाई-बहन  =  भाई और बहन
  • रात-दिन  =  रात और दिन
  • सुबह-शाम  =  सुबह और शाम
  • दुःख-दर्द =   दुःख और दर्द
  • शीतोष्ण  =  शीत और उष्ण
  • लेन-देन  =   लेना और देना

द्वन्द समास के भेद:

i. इतरेतरद्वंद्व समास: वो द्वंद्व जिसमें और शब्द से भी पद जुड़े होते हैं और अलग अस्तित्व रखते हों उसे इतरेतर द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास से जो पद बनते हैं वो हमेशा बहुवचन में प्रयोग होते हैं क्योंकि वे दो या दो से अधिक पदों से मिलकर बने होते हैं।

जैसे:

  • राम और कृष्ण = राम-कृष्ण
  • माँ और बाप = माँ-बाप
  • अमीर और गरीब = अमीर-गरीब
  • गाय और बैल = गाय-बैल
  • ऋषि और मुनि = ऋषि-मुनि
  • बेटा और बेटी = बेटा-बेटी

ii. समाहार द्वन्द्व समास: समाहार का अर्थ होता है समूह। जब द्वंद्व समास के दोनों पद और समुच्चयबोधक से जुड़ा होने पर भी अलग-अलग अस्तिव नहीं रखकर समूह का बोध कराते हैं , तब वह समाहारद्वंद्व समास कहलाता है। इस समास में दो पदों के अलावा तीसरा पद भी छुपा होता है और अपने अर्थ का बोध अप्रत्यक्ष रूप से कराते हैं।

जैसे:

  • दालरोटी = दाल और रोटी
  • हाथपॉंव = हाथ और पॉंव
  • आहारनिंद्रा = आहार और निंद्रा

iii. वैकल्पिक द्वंद्व समास: इस द्वंद्व समास में दो पदों के बीच में या,अथवा आदि विकल्पसूचक अव्यय छिपे होते हैं उसे वैकल्पिक द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास में ज्यादा से ज्यादा दो विपरीतार्थक शब्दों का योग होता है। 

जैसे:

  • पाप-पुण्य = पाप या पुण्य
  • भला-बुरा = भला या बुरा
  • थोडा-बहुत = थोडा या बहुत

5. द्विगु समास
द्विगु समास में पूर्वपद संख्यावाचक होता है और कभी-कभी उत्तरपद भी संख्यावाचक होता हुआ देखा जा सकता है। इस समास में प्रयुक्त संख्या किसी समूह को दर्शाती है किसी अर्थ को नहीं। इससे समूह और समाहार का बोध होता है। उसे द्विगु समास कहते हैं। 

जैसे:

  • नवरत्न = नव़रत्न  – नौ रत्त्नों का समाहार
  • त्रिलोक = त्रि़लोक – तीन लोकों का समाहार
  • अष्टाधयी = अष्ट़अध्याय – अष्ट अध्यायों का समाहार
  • सप्ताह = सप्त़अह – सात दिनों का समाहार
  • दशानन = दश़आनन – दश सिरों वाला
  • पंचतत्व = पंच़तत्व – पाँच तत्वों का समाहार

द्विगु समास के भेद:

i. समाहारद्विगु समास: समाहार का मतलब होता है समुदाय , इकट्ठा होना , समेटना उसे समाहारद्विगु समास कहते हैं। 

जैसे:

  • तीन लोकों का समाहार = त्रिलोक
  • पाँचों वटों का समाहार = पंचवटी
  • तीन भुवनों का समाहार = त्रिभुवन

ii. उत्तरपदप्रधानद्विगु समास: उत्तरपदप्रधानद्विगु समास दो प्रकार के होते हैं।
क. बेटा या फिर उत्पन्न के अर्थ में। 
जैसे:

  • दो माँ का = दुमाता
  • दो सूतों के मेल का = दुसूती

ख. जहाँ पर सच में उत्तरपद पर जोर दिया जाता है। 
जैसे:

  • पांच प्रमाण = पंचप्रमाण
  • पांच हत्थड = पंचहत्थड

6. बहुव्रीहि समास
इस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता। जब दो पद मिलकर तीसरा पद बनाते हैं तब वह तीसरा पद प्रधान होता है। इसका विग्रह करने पर “वाला है, जो, जिसका, जिसकी, जिसके, वह” आदि आते हैं वह बहुब्रीहि समास कहलाता है।

जैसे:

  • घनश्याम = बादल जैसा काला (कृष्ण) हो
  • लम्बोदर = लंबे उदरवाला (गणेश) हो
  • गजानन = हाथी के समान आनन हो
  • नीलकंठ = नीले कण्ठ वाला (शिव) हो
  • जलज = जल में उत्पन्न (कमल) है
  • त्रिनेत्रा  = तीन नेत्रों वाला है जो (शंकर)
  • दशानन = दश मुख है जिसके (रावण)
  • चतुर्भुज = चार है भुजाएँ जिसकी (विष्णु)

बहुव्रीहि समास के भेद:

i. समानाधिकरण बहुब्रीहि समास: इसमें सभी पद कर्ता कारक की विभक्ति के होते हैं लेकिन समस्त पद के द्वारा जो अन्य उक्त होता है ,वो कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण आदि विभक्तियों में भी उक्त हो जाता है उसे समानाधिकरण बहुब्रीहि समास कहते हैं। 

जैसे:

  • प्राप्त है उदक जिसको = प्रप्तोद्क
  • जीती गई इन्द्रियां हैं जिसके द्वारा = जितेंद्रियाँ
  • दत्त है भोजन जिसके लिए = दत्तभोजन
  • निर्गत है धन जिससे = निर्धन
  • नेक है नाम जिसका = नेकनाम
  • सात है खण्ड जिसमें = सतखंडा

ii. व्यधिकरण बहुब्रीहि समास: समानाधिकरण बहुब्रीहि समास में दोनों पद कर्ता कारक की विभक्ति के होते हैं लेकिन यहाँ पहला पद तो कर्ता कारक की विभक्ति का होता है लेकिन बाद वाला पद सम्बन्ध या फिर अधिकरण कारक का होता है उसे व्यधिकरण बहुब्रीहि समास कहते हैं। 

जैसे:

  • शूल है पाणी में जिसके = शूलपाणी
  • वीणा है पाणी में जिसके = वीणापाणी

iii. तुल्ययोग बहुब्रीहि समास: जिसमें पहला पद ‘सह’ होता है वह तुल्ययोग बहुब्रीहि समास कहलाता है। इसे सहबहुब्रीहि समास भी कहती हैं। सह का अर्थ होता है साथ और समास होने की वजह से सह के स्थान पर केवल स रह जाता है। इस समास में इस बात पर ध्यान दिया जाता है की विग्रह करते समय जो सह दूसरा वाला शब्द प्रतीत हो वो समास में पहला हो जाता है। 

जैसे:

  • जो बल के साथ है = सबल
  • जो देह के साथ है = सदेह
  • जो परिवार के साथ है = सपरिवार

iv. व्यतिहार बहुब्रीहि समास: जिससे घात या प्रतिघात की सुचना मिले उसे व्यतिहार बहुब्रीहि समास कहते हैं। इस समास में यह प्रतीत होता है की ‘ इस चीज से और उस चीज से लड़ाई हुई। 

जैसे:

  • मुक्के-मुक्के से जो लड़ाई हुई = मुक्का-मुक्की
  • बातों-बातों से जो लड़ाई हुई = बाताबाती

v. प्रादी बहुब्रीहि समास: जिस बहुब्रीहि समास पूर्वपद उपसर्ग हो वह प्रादी बहुब्रीहि समास कहलाता है। 

जैसे:

  • नहीं है रहम जिसमें = बेरहम
  • नहीं है जन जहाँ = निर्जन

समास की शुद्धता का निर्णय

समास संबंधी अशुद्धियों के कुछ उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं-

  • अशुद्ध शब्द = शुद्ध
  • अष्टवक्र = अष्टावक्र
  • दिवारात्रि = दिवारात्रा
  • पिता भक्ति = पितृभक्ति
  • पिता-माता = माता-पिता
  • कृतध्न = कृतध्नी
  • स्वामी भक्त = स्वामिभक्त
  • महाराजा = महाराज
  • माताहीन = मातृहीन
  • राजापथ = राजपथ
  • निर्गुणी = निर्गुण

उपसर्ग

शब्द निर्माण के लिए क्रिया या शब्दों के प्रति पूर्व जो शब्दांश जोड़े जाते है वे उपसर्ग कहलाते हैं। जैसे: प्र, परा, अप, सम, आदि। ये किसी न किसी शब्द के साथ ही आते हैं और उसके अर्थ में प्रायः परिवत्र्तन भी करते हैं। 

जैसे:

उपसर्ग के भेद

उपसर्गों के विभिन्न प्रकार होते हैं, जो निम्नलिखित हैं:

1. प्रातिपदिक उपसर्ग

  • ये उपसर्ग संज्ञा या विशेषण के प्रारंभिक रूप के साथ जुड़कर उसका विशेषाधिकार का निर्माण करते हैं।
  • इस प्रकार के उपसर्गों के उदाहरण हैं: ‘प्राचीन’, ‘पुराना’, ‘नया’ आदि।

2. क्रियाविशेषण उपसर्ग

  • ये उपसर्ग क्रियाओं के साथ जुड़कर उन्हें परिभाषित या प्रतिष्ठित करते हैं।
  • उपसर्गों की यह श्रेणी उत्पन्न क्रियाएं नई बनाती हैं। 
  • इस प्रकार के उपसर्गों के उदाहरण हैं: ‘विद्या’, ‘बुद्धि’, ‘दुर्दिन’ आदि।

3. उपसर्ग समानार्थक शब्द

  • ये उपसर्ग दूसरे शब्दों के समानार्थक रूप होते हैं और उनके साथ जुड़कर उनकी अर्थ विशेषता या परिवर्तन करते हैं।
  • इस प्रकार के उपसर्गों के उदाहरण हैं: ‘अविमान’, ‘अपात्र’, ‘असुविधा’ आदि।

समानार्थी या पर्यायवाची शब्द

समानार्थी शब्द ऐसे शब्द होते हैं जिनके शाब्दिक अर्थ अलग-अलग होते हैं, लेकिन उच्चारण या वर्तनी में समानताएँ होती हैं। समानार्थी शब्द समानार्थी शब्दों से भिन्न होते हैं, जो अलग-अलग अर्थ वाले शब्द होते हैं जिनका उच्चारण या वर्तनी एक जैसी होती है।

जैसे:

  • आम: सहकार, अतिसौरभ, अमृतपल, अम्र
  • अलि: भ्रमर, मधुकर, मिलिन्द, भौंरा, मधुप
  • आसमान: आकाश, अनन्त, अंतरिक्ष, व्योग
  • अन्वेषण: जाँच, शोध्, खोज, अनुसंधन
  • अश्व: तुरंग, घोटक, घोड़ा, सैंध्व
  • आनन्द: माद, प्रमाद, हर्ष, आमोद, सुख
  • ईश्वर: जगदीश, परमेश्वर, पिता, जगन्नाथ
  • इच्छा: स्पृहा, मनोरथ, अभिलाषा, वासना
  • कमल: राजीव, अरविन्द, पंकज, सरोज
  • कन्दर्प: मनोज, मदन, काम, मीन
  • किरण: ज्योति, रश्मि, अंशु, प्रभा, भानु, दीप्ति
  • कृष्ण: माध्व, मुरलीध्र, मुकुन्द, मधुसूदन
  • कंचन: कनक, हेम, स्र्वण, हाटक, सोना
  • खून: रूध्रि, लहु, रक्त, शोणित
  • खरा: तेज, तीक्ष्ण, स्पष्ट
  • गंगा: भागीरथी, मंदाकिनी, ध्ुवनंदा, विष्णुपदी
  • गजानन: गणेश, विनायक, गणपति
  • चरण: पैर, पग, पद, पाँव
  • चंद्रमा: शशि, राकेश, शशांक, इन्दु
  • ज्योत्सना: चंद्रिका, कलानिधि, उजियारी
  • तरू: वृक्ष, पेड़, विपट, द्रुम
  • दाँत: दन्त, द्विज, रद, दशन
  • दास: किंगर, परिचारक, चाकर, अनुचर
  • दया: अनुग्रह, करूणा, सांत्वना, क्षमा
  • दुर्गा: कामाक्षी, कालिका, कुमारी, चंड़िका
  • पार्वती: सर्वमंगला, गिरिजा, भावनी, उमा
  • पवन: अनिल, समीर, वायु, हवा, वीणापति
  • विष: कालकूट, गरल, जहर, हलाहल
  • बहना: अंडज, अज, प्रजापति, विधता
  • रवि: सूर्य, अर्क, अर्यमा, अरूण, आदित्य
  • रत्नाकर: सारंग, सागर, सिंधु, नदीश
  • यमुना: सूर्यसुता, रविसुता, रविनंदिनी
  • अर्जुन: पार्थ, कृष्णसखा, भारत, ध्नंजय
  • प्रभात: अरूणोदय, प्रातः, सूर्योदय
  • कर्ण: सूर्यपुत्रा, सूतपूत्रा, राधेय, अंगराज
  • सरस्वती: ब्राह्मी, वीणावादनी

05. वाक्य शुद्धीकरण

वाक्य शुद्धीकरण.                                                      अ अनेकों विद्यार्थी उद्यम कर रहे हैं।शअनेक विद्यार्थी उद्यम कर रहे हैं।अनाम मेरा कुमार जी भरतपुरी है।शमेरा नाम कुमार जी भरतपुरी है।अआपका भवदीय।शआपका या भवदीय।अरवि एवं तरूण से सम्बध्ी चर्चा।शरवि एवं तरूण से सम्ब( चर्चा।अपिंकी के अनेकों उपनाम हैं।शपिंकी के अनेक उपनाम हैं।अवह गीत की दो चार लड़िया गाती है।शवह गीत की दो-चार कड़िया गाती है।अशब्द केबल संकेतमात्रा है।शशब्द केवल संकेत है।अबबलू के मुर्गी का बच्चा बड़ा प्यारा है।शबबलू के मुर्गी का चुजा बड़ा प्यारा है।अबैर अपनों से अच्छा नहीं।शअपनों से बैर अच्छा नहीं।अहमारी समाज उन्नति पर है।शहमारा समाज उन्नति पर है।अआदरणीय बहिन जी आ रही है।शआरणीया बहिन  जी आ रही है।अवह विद्वान महिला है।शवह विदुषी महिला है।असीता बु(िमान स्त्राी है।शसीता बु(िमती स्त्राी है।अचोरों और पुलिस में लड़ाई हुई।शचोरों और पुलिस वालों में लड़ाई हुई।अभेड़  बकरी और गायों की समान दृष्टि से देखना  चाहिए।शभेड़ों बकरियाँ और गायों को समान दृष्टि से देखना चाहिए।अहिन्दी  बंगाल  पंजाब  मध्य प्रान्त और अन्य कई प्रान्तों में बोली जाती है।शबंगाल  पंजाब  मध्य प्रान्त और कई अन्य प्रान्तों में हिन्दी बोली जाती है।अनाटक  कहानी  उपन्यास और कविताओं में नया जीवन आकार पा रहा है।शनाटकों  कहानियों  उपन्यासों और कविताओं में नया जीवन आकार पा रहा है।अकई खरीदी हुई किताबें थी।शकई किताबें खरीदी हुई थी।अविद्यालय मार्ग जाने का अवरू( है।शविद्यालय जाने का मार्ग अवरू( है।अमै पानी पर तैरने का व्यायाम करता हूँ।शमै पानी में तैरने का अभ्यास करता हूँ।अप्रसाद के नाटकीय पात्रों का अध्ययन किया जाना चाहिए।शप्रसाद के नाटकीय पात्रों का अध्ययन विशेष रूप से किया जाना चाहिए।अबाजार में भारी भरकम भीड़ थी।शबाजार में विशेष भीड़ थी।अविद्याथियों ने प्रधनाध्यापक को अभिनन्दन पत्रा दिया।शविद्याथियों ने प्रधनाध्यापक को अभिनन्दन पत्रा अर्पित किया।अइस दूकान पर शीशा  कंघा और रेशमी कपड़ा मिलते है।शइस दूकान पर शीशा  कंघा और रेशमी कपड़ा मिलता है।अआज बजट के उफपर बहस होगी।शआज बजट पर बहस होगी।अबेटी पराये घर का ध्न होता है।शबेटी परये घर का ध्न है।अवहाँ सभी श्रेणी के लोग एकत्रा हुए।शवहाँ सभी श्रेणी के लोग थे।अभक्तियुग का काल स्र्वणयुग माना गया है।शभक्तियुग स्वर्णयुग माना गया है।असर्वत्रा आध्ुनिकीकरण करना ठीक नहीं।शसर्वत्रा आध्ुनिकीकरण ठीक नहीं।अतब शायद यह काम अवश्य हो जायेगा।शतब शायद यह काम हो जाए।अपिताजी ने मुझको कहा।शपिताजी ने मुझसे (मुझे्) कहा।

04. अव्यय और निपात

अव्यय

‘अव्यय’ ऐसे शब्द को कहते हैं, जिसके रूप में लिंग, वचन, पुरूष कारक इत्यादि के कारण कोई विकार नहीं होता।

अव्यय के प्रकार

कालवाचक अव्यय जैसे – आज, कल, तुरंत, पीछे, अब, जब, तब, कभी-कभी इत्यादि।

स्थानवाचक अव्यय जैसे – यहाँ, वहाँ, कहाँ, जहाँ, इध्र, उध्र इत्यादि।

दिशासूचक अव्यय जैसे – दूर, परे, अलग,  बायें, आरपार आदि।

स्थितिवाचक अव्यय जैसे – नीचे, उपर, तले, सामने, बाहर, भीतर इत्यादि।

निपात

निपात वे अव्यय हैं, जिनका प्रयोग निश्चित शब्द, शब्द-समुदाय या पूर वाक्य का अतिरिक्त भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है। हिन्दी में अधिकतर निपात शब्द समूह के बाद आते हैं, जिनको वे बल प्रदान करते हैं। निपात का मुख्य कार्य प्रश्न बोध्, अस्वीकृत बोध्, विस्मय बोध् कराना या वाक्य में किसी शब्द पर बल देना आदि होता है।

निपात के भेद

निपात मुख्यतः नौ प्रकार के होते हैं-

स्वीकारात्मक निपातः जैसे-हाँ, जी, जी हाँ।

नकारार्थक निपातः जैसे- नहीं, जी नहीं।

निषेधत्मक निपातः जैसे-मत।

प्रश्नबोध्क निपातः जैसे-क्या।

विस्मयादिबोध्क निपातः जैसे-क्या, काश।

बलदायक या सीमा बोध्क निपातः जैसे-तो, ही, तक, सिपर्फ, केवल।

तुलना बोधक निपातः जैसे-सा, से, सी, समान।

अवधरणा बोधक निपातः जैसे-ठीक, लगभग, करीब।

आदर बोधक निपातः जैसे-जी।