03. विशेषण, क्रिया, वाच्य और काल

विशेषण :

जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतायें, उसे ‘विशेषण’ कहते हैं। जिसकी विशेषता बताई जाए व ‘विशेष्य’ कहलाता है।

जैसे- काली गाय मेरी है। यहाँ काली गाय- विशेषणीकृत है।

विशेषण के भेद

1. सार्वनामिक विशेषण – मैं, तू, वह (पुरूषवाचक, निजवाचक) को छोड़कर अन्य सर्वनाम जब किसी संज्ञा के पहले आते हैं; तब वे ‘सार्वनामिक विशेषण’ कहलाते हैं। जैसे वह पुस्तक काली है। यहाँ पुस्तक (संज्ञा) के पहले वह (सर्वनाम) आया है। व्युत्पत्ति के अनुसार सार्वनामिक विशेषण के भी दो भेद है- (i) मौलिक सार्वनामिक विशेषण जो बिना रूपांतर के संज्ञा के पहले आता है। जैसे- यह घर, वह घर (ii) यौगिक सार्वनामिक विशेषण जो मूल सर्वनामों में प्रत्यय लगाने से बनते हैं। जैसे-ऐसा आदमी, जैसा देश आदि।

2. गुणवाचक विशेषण– जिस शब्द से संज्ञा का गुण, दशा, स्वभाव, आदि लक्षित हो, उसे गुणवाचक विशेषण कहते है।

इनके कुछ मुख्य रूप इस प्रकार हैं-

काल नया, पुराना, ताजा, भूत, वत्र्तमान, भविष्य, प्राचीन, अगला, पिछला

स्थान उजाड़, भीतरी, बाहरी, पूरबी, दायाँ, बायाँ, स्थानीय, देशीय, क्षेत्राीय, असमी, पंजाबी, अमेरिकी, भारतीय

आकार गोल, चैकोर, सुदर, नुकीला, लंबा, चैड़ा, सीध, तिरछा

रंग लाल, पीला, हरा, सपफेद, काला, फीका, धुँधला, 

दशा दुबला, पतला, मोटा, भारी, गाढ़ा, गीला, सूखा, गरीब, पालतू, रोगी

गुण भला, बुरा, सच्चा, झूठा, पापी, दानी, दुष्ट, शांत

द्रष्टव्य गुणवाचक में सा जोड़कर-बड़ा-सा, पीला-सा आदि।

3. संख्यावाचक विशेषण जिन शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या लक्षित होती हो, उसे ‘संख्यावाचक विशेषण’ कहते हैं। जैसे-दस लड़के, चार दिन, कुछ एवं सब संख्यावाचक विशेषण हैं। इसके तीन भेद हैं-

(i) निश्चित संख्यावाचक इसके प्रकार हैं-

(क) गुणवाचक एक, सौ, हजार।

(ख) क्रमवाचक पहला, दूसरा।

(ग) आवृतिवाचक दूना, चैगुना।

(घ) समुदायवाचक दोनों, तीनों।

(ड़) प्रत्येक बोध्न प्रत्येक, हर-एक, दो-दो, सवा-सवा।

(ii) अनिश्चित संख्यावाचक जैसे- कुछ सौ, कई।

(iii) परिमाण बोधक इससे किसी वस्तु के नाम-तौल का बोध् होता है। इसके दो प्रकार हैं-

(क) निश्चित परिमाण बोधक दो सेर चना, पाँच उंगालियाँ, चैदह मीटर।

(ख) अनिश्चित परिमाण बोधक बहुत पानी, कुल धन, संपूर्ण आनन्द इत्यादि।

अन्तर्विशेषण

हिंदी में कुछ विशेषणों के भी विशेषण होते हैं। जैसे- शंकर बड़ा साहसी लड़का है। समा अत्यंत बातूनी लड़की है।

विशेषणों की रचना

विशेषण के रूप निम्नलिखित स्थितियों में परिवर्तित होते हैं-

1. रूप रचना की दृष्टि से विशेषण विकारी और अविकारी दोनों होते हैं। अविकारी विशेषणों के रूप में परिवत्र्तन नहीं होता है। ये अपने मूल रूप में बने रहते हैं। जैसे- काला, पीला, सुदर, चंचल, गोल, सुडौल आदि।

2. कुछ विशेषण संज्ञाओं में प्रत्यय लगाकर बनते हैं। जैसे-

प्रत्यय    

संज्ञा    

विशेषण

इक    

अर्थ     

आर्थिक

ईय    

राष्ट    

राष्टीय

वान्    

गुण    

गुणवान

ईला    

शर्म     

शर्मिला

मान्     

श्री     

श्रीमान्

3. सार्वनामिक एवं आकारांत विशेषण लिंग, वचन और कारक के अनुसार बदलकर ‘ए’ या ‘ई’ रूप बन जाते हैं। जैसे-

एकवचन    

बहुवचन

पुलिंग     

काला, बड़ा    

काले, बड़े

स्त्राीलिंग     

काली, बड़ी    

काली, बड़ी

4. संज्ञा के लोप रहने पर विशेषण ही संज्ञा का कार्य करता है। सामान्यतः विशेषण के साथ परसर्ग नहीं लगता, विशेष्य के साथ लगता है, किन्तु विशेषण के संज्ञा बनने पर परसर्ग लगता है। जैसे-बड़ों की बात माननी चाहिए। विद्वानों का आदर करना चाहिए।

तुलनात्मक विशेषण

हिंदी में तुलना अंग्रेजी एवं संस्कृत की तरह नहीं की जाती है। हिंदी में तुलना करने पर विशेषणों के रूप ज्यों के त्यों रहते हैं। जैसे-रवि बब्लू से अध्कि समझदार है।

हिंदी में ‘से’, ‘अपेक्षा’, ‘सामने’, ‘सबसे’, लगाकर विशेषणों की तुलना की जाती है।

क्रिया

जिस शब्द से किसी काम का करना या होना समझा जाय उसे ‘क्रिया’ कहते हैं। जैसे- खाना, जाना, पढ़ना, सोना आदि।

धतु-क्रिया के निमार्ण में ‘धतु’ का विशेष योगदान होता है। ‘धतु’ क्रियापद का वह अंश होता है, जो किसी क्रिया के प्रायः सभी रूपों में पाया जाता है। अर्थात् क्रिया के मूल अक्षर ही ‘धातु’ कहलाते हैं जैसे- खाना-(मूल अक्षर+‘ना’ प्रत्यय) हिंदी में विशेषण से भी क्रिया बनती है;

जैसे- चिकना + आना = चिकनाना

धतु के दो भेद हैं – मूल धतु और यौगिक धातु। मूल धतु स्वतंत्रा होती है जैसे खा, जी, पी देख इत्यादि। जबकि यौगिक धतु तीन प्रकार से बनती है-

(i) धतु में प्रत्यय लगाकर अकर्मक से सकर्मक एवं प्रेरणार्थक क्रिया में कत्र्ता स्वयं काम न कर प्रेरणा देता है। जैसे- लिखना से लिखवाना। उदाहरण-अमित यश से हिंदी लिखवाता है।

(ii) कई धतुओं को संयुक्त करने से संयुक्त धातु बनती है जैसे- खाना खिलाना।

(iii) संज्ञा या विशेषण से नाम धतु बनती है- जो धतु संज्ञा या विशेषण से बनी हो, ‘नाम धातु’ कहते हैं जैसे-संज्ञा से-बात-बतियानाऋ विशेषण से-गरम-गरमाना

रचना की दृष्टि से क्रिया के भेद

रचना की दृष्टि से क्रिया के दो भेद होते हैं-

(i) सकर्मक और (ii) अकर्मक

(i) सकर्मक क्रिया ‘सकर्मक क्रिया’ उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की सम्भावना हो अर्थात् क्रिया का संचालक तो कत्र्ता हो पर पफल दूसरे व्यक्ति या वस्तु अर्थात् कर्म पर पड़े। जैसे-बबलू आम खाता है। यहाँ बबलू के खाने का पफल आम पर पड़ता है।

(ii) अकर्मक क्रिया जिन क्रियाओं का व्यापार और पफल कत्र्ता पर हो वे ‘अकर्मक’ कहलाती हैं। जैसे- जी घबराता है।

अन्य क्रिया भेद

द्विकर्मक क्रिया जिस क्रिया में दो कर्म हों जैसे- ‘मैं उदय को भूगोल पढ़ाता हूँ। इसमें दो कर्म है उदय को और भूगोल।

संयुक्त क्रिया जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनती है उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे- किरण रो रही थी, रमा भी रोने लगी, जया उन दोनों को चुप कराने लगी।


पूर्वकालिक क्रिया जब कत्र्ता एक क्रिया समाप्त कर उसी क्षण दूसरी क्रिया मेें प्रवृत होता हैं तब पहली क्रिया ‘पूर्वकालिक’ कहलाती है। जैसे- उसने नहाकर भोजन किया। इसमें ‘नहाकर’ पूर्वकालिक क्रिया है क्योंकि इससे नहाने की क्रिया की समाप्ति के साथ ही भोजन करने की क्रिया का बोध् होता है।


क्रियार्थक संज्ञा जब क्रिया संज्ञा की तरह व्यवहार में आये, तब वह ‘क्रियार्थक संज्ञा’ कहलाती है। जैसे-टहलना स्ववस्थ्य के लिए अच्छा है।

वाच्य

क्रिया के उस परिवत्र्तन को ‘वाच्य’ कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का बोध् होता है कि वाक्य के अन्तर्गत कर्त्ता, कर्म अथवा भाव में से किसकी प्रधनता है। इनमें किसके अनुसार क्रिया के पुरूष, वचन आदि आए हैं। वाच्य के निम्न तीन भेद हैं-

कर्तृवाच्य क्रिया का वह रूप जिसमें वाक्य में कर्त्ता की प्रधनता का बोध् हो। जैसे- लड़का खाता है, मैंने पुस्तक पढ़ी।

कर्मवाच्य जिस वाक्य में कर्म प्रधन हो। जैसे- पुस्तक पढ़ी जाती है।

भाववाच्य जिस वाक्य में भाव की प्रधनता का बोध् हो। जैसे- राज से चला भी नहीं जाता। यहाँ क्रिया (भाव) की कर्त्ता एवं कर्म के स्थान पर अध्कि प्रभावी हो गयी है।

काल

क्रिया के उस रूपांतर को ‘काल’ कहते हैं, जिससे उसके कार्य व्यापार का समय और उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध् हो।

 काल के तीन भेद हैं-

(i) वर्तमान काल  क्रियाओं में निरंतरता को ‘वत्र्तमानकाल’ कहते हैं। जैसे- वह जा रहा है, वह आया हो, वह गाता है।

(ii) भूतकाल जिस क्रिया से कार्य की समाप्ति का बोध् हो, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं। जैसे- अजय ने  गाना गाया।

(iii) भविष्यत काल भविष्य में होनेवाली क्रिया को भविष्यत काल की क्रिया कहते हैं। जैसे- मनोज कल दवा लाएगा।

02. संधि

संधि

“दो वर्णों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) या ध्वनि उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते है।” 
जैसे: 

हिम + आलय = हिमालय
अ + आ = आ
एक + एक = एकैक
अ + ए = ऐ

संधि के भेद

  • स्वर संधि दो स्वर वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वरसंधि कहते हैं, जैसे: भानु + उदय = भानूदय, महा + इन्द्र = महेन्द्र।
  • व्यंजन संधि व्यंजन वर्ण के साथ स्वर या व्यंजन के मिलने से व्यंजन में जो विकार उत्पन्न होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं। जैसे: अहम् + कार = अहंकार, जगत+आन्नद = जगदान्नद।
  • विसर्ग संधि विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन के मेल से जो विकार होता है, उसे ‘विसर्ग संधि’ कहते हैं। जैसे: निः + चय = निश्चय, निः + तार = निस्तार।

संधि निर्णय

स्वर-संधि

  • अति + अध्कि  = अत्यध्कि
  • अति + अंत  = अत्यंत
  • अति + आवश्यक  = अत्यावश्यक
  • अनु + अय  = अन्वय
  • अभि + आगत  = अभ्यागत
  • आदि + अंत = आद्यंत
  • इति + आदि  = इत्यादि
  • उपरि + उक्त  = उपर्युक्त
  • उमा + ईश = उमेश
  • एक + ईश्वर = एकेश्वर
  • एक + अंकी = एकांकी
  • काम + अन्ध्  = कामन्ध्
  • कृप+ आचार्य = कृपाचार्य
  • कृष्ण + आनंद  = कृष्णानंद
  • खग + इन्द्र  = खगेन्द्र
  • गण + ईश  = गणेश
  • गै + इका  = गायिका
  • ग्राम + उद्धार   = ग्रामोद्धार
  • घन + आनन्द  = घनानन्द
  • चन्द्र + उदय   = चन्द्रोदय
  • चिर + आयु  = चिरायु
  • चे + अन  = चयन
  • छात्रा + आवास  = छात्रावास
  • जन्म + अंतर  = जन्मांतर
  • जल + आशय  = जलाशय
  • तथा + अपि  = तथापि
  • तथा + आगत  = तथागत
  • तथा + एव  = तथैव
  • त्रिगुण + अतीत  = त्रिगुणातीत
  • थान + ईश्वर  = थानेश्वर
  • दाव + अनल  = दावानल
  • दिन + अंत  = दिनांत
  • दीप + आवली  = दीपावली
  • दश + आनन   = दशानन
  • देव + इन्द्र   = देवेन्द्र
  • देश + अंतर  = देशांतर
  • धर्म + अन्ध्  = धर्मान्ध्
  • धर्म + आत्मा  = धर्मात्मा
  • ध्वज + उत्तोलन  = ध्वजोत्तोलन
  • नग + इन्द्र  = नगेन्द्र
  • नर + इन्द्र  = नरेन्द्र
  • नि + उन  = न्यून
  • ने + अन  = नयन
  • पंच + अमृत  = पंचामृत
  • पत्रा + आचार  = पत्राचार
  • पद + अध्किारी  = पदाधिकारी
  • पर + अर्थ  = परार्थ
  • परम + अर्थ  = परमार्थ
  • पीत + अंबर  = पीतांबर
  • पुण्य + आत्मा  = पुण्यात्मा
  • पौ + अन  = पावन
  • प्रति + एक  = प्रत्येक
  • पल + उदय  = पलोदय
  • ब्रह्म + अस्त्रा  = ब्रह्मास्त्रा
  • भो + अन  = भवन
  • मत + एक्य  = मतैक्य
  • मद + अंध्  = मदांध्
  • महा + आशय   = महाशय
  • महा + ट्टषि  = महर्षि
  • यथा + इष्ट  = यथेष्ट
  • योग + इन्द्र = योगेन्द्र
  • रजनी + ईश = रजनीश
  • रमा + ईश  = रमेश
  • राम + अयन = रामायण
  • रूद्र + अक्ष  = रूद्राक्ष
  • लम्ब + उदर  = लम्बोदर
  • वसुध+  एव    = वसुधैव
  • वि+  अर्थ = व्यर्थ
  • वि+  उत्पत्ति  = व्युत्पत्ति
  • शरण+  आगत = शरणागत
  • श्वेत+  अम्बर  = श्वेतांबर
  • सदा+  एव  = सदैव
  • सु+  आगत  = स्वागत
  • हिम+  अचल  = हिमाचल

व्यंजन-संधि

  • आ +  छादन = आच्छादन
  • उत् +  अय  = उदय
  • उत् +  ज्वल  = उज्जवल
  • उत् +  नति  =  उन्नति
  • ट्टक् +  वेद  =  ट्टग्वेद
  • किम् +  चित  =  किंचित
  • जगत् +  ईश   =  जगदीश
  • तत् +  हित  =  तद्धित
  • दिक्+  गज  =  दिग्गज
  • मर् +  अन   = मरण
  • वि +  छेद  = विच्छेद
  • सम् +  कल्प   =  संकल्प
  • सम् +  तोष   = संतोष
  • सम् +  लग्न   =  संलग्न
  • सम् +  कार =  संस्कार
  • सत् +  मार्ग   =  सन्मार्ग
  • सत् +  चित् आनंद  =  सच्चिदानंद

विसर्ग-संधि

  • अतः+  एव   =  अतएव
  • आविः+  कार  = आविष्कार
  • तपः+  वन =  तपोवन
  • दुः+  कर  =  दुष्कर
  • दुः+  जन   =  दुर्जन
  • नमः+  चय  =  निश्चय
  • पुरः+  कार  =  पुरस्कार
  • प्रातः+  काल =  प्रातःकाल
  • पुनः+  जन्म  =  पुनर्जन्म
  • भाः+  कर = भास्कर
  • मनः+  ज =  मनोज
  • मनः+  रथ  =  मनोरथ
  • यशः+ दा =  यशोदा
  • यशः+ धरा  =  यशोध्रा
  • बहिः+ कार =  बहिस्कार
  • श्रेयः+ कर =  श्रेयस्कर
  • सरः+ वर   =  सरोवर
  • स्वः+ ग =  स्वर्ग

01. संज्ञा, लिंग निर्णय और सर्वनाम

संज्ञा

संज्ञा का शाब्दिक अर्थ होता है – नाम। किसी व्यक्ति , गुण, प्राणी, व् जाति, स्थान , वस्तु, क्रिया और भाव आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। शब्दों का वो समूह जिन्हें हम किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु, विचार, गुण या भाव को बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसे संज्ञा (Sangya) या संज्ञा शब्द (Sangya Shabd) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, संज्ञा एक ऐसा शब्द होता है जो किसी चीज़ की पहचान कराता है।

संज्ञा के भेद

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा 

जिससे किसी विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति का बोध् हो। 
उदाहरण:

  • व्यक्तियों एवं दिशाओं के नाम रवि, मिथिलेश, तरूण एवं पूर्व, उत्तर, दक्षिण
  • देशों एवं राष्ट्रीयताओं के नाम भारत,जापान, भारतीय, जर्मनी
  • समुद्रों एवं नदियों के नाम कालासागर, हिंद महासागर, बैकाल सागर, अटलांटिक महासागर, गंगा, यमुना, सतलुज
  •  नगरों, सड़कों के नाम दिल्ली,मुम्बई, आगरा, पृथ्वीराज रोड, राजपथ 
  • पर्वतों के नाम हिमालय, विध्याचल, कैमूर, काराकोरम
  • पुस्तकों तथा समाचार पत्रों के नाम रामायण, महाभारत, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा
  • ऐतिहासिक युद्धों, घटनाओं के नाम अक्टूबर क्रांति, 1857 का गदर
  • दिनों, महीनों एवं त्यौहारों, उत्सवों के नाम जनवरी, मंगलवार, रक्षाबंध्न, होली।

2. जातिवाचल संज्ञा 

जिस संज्ञा से समान प्रकार के वस्तुओं या व्यक्तियों का बोध् हो।
उदाहरण:

  • रिश्तेदारों के नाम, व्यवसाय, पद और कार्यकर्ता, वीवर, संचार मंत्री
  • पशु,पक्षियों के नाम घोड़ा,मुर्गा, तोता
  • प्राकृतिक तत्वों के नाम वर्षा, बिजली, ज्वालामुखी, भँकप
  • वस्तुओं के नाम मकान, दुकान, घड़ी

3. भाववाचक संज्ञा 

जिस संज्ञा शब्द से किसी के गुण, दोष, दशा, स्वाभाव , भाव आदि का बोध हो वहाँ पर भाववाचक संज्ञा कहते हैं। 

4. समूहवाचक संज्ञा

जिस शब्द से किसी एक विशेष व्यक्ति , वस्तु, या स्थान आदि का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। अथार्त जिस संज्ञा शब्द से किसी विशेष स्थान, वस्तु,या व्यक्ति के नाम का पता चले वहाँ पर व्यक्तिवाचक संज्ञा होती है।

5. द्रव्यवाचक संज्ञा

जो संज्ञा शब्द किसी द्रव्य पदार्थ या धातु का बोध कराते है उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। अथार्त जो शब्द किसी पदार्थ, धातु और द्रव्य को दर्शाते हैं वहाँ पर द्रव्यवाचक संज्ञा होती है।

संज्ञा के रूपों में लिंग, वचन और कारक संबंधी अंतर

  • लिंगानुसार नर खाता है – नारी खाती है। 
  • वचनानसुार लड़का खाता है -लड़़के खाते हैं।
  • उपर्युक्त शब्दों में नर का रूपांतर हुआ जबकि नीचे लड़के एवं लड़की के वचन में रूपांतरण हुआ।
  • कारकनुसार: लड़का गाना गाता है- लड़के ने गाना गाया।
  • लड़की गाना गाती है – लड़कियों ने गाना गाया।
  • उत्तर क्रिया में काल का अंतर एवं रूपांतर कत्र्ता कारक ‘ने’ के कारण हुआ।

लिंग निर्णय

प्राणियों का जोड़ा अथवा पदार्थ की जाति बनाने हेतु शब्दों में जो रूपांतर होता है, उसे लिंग कहते हैं।

लिंग का अर्थ चिन्ह होता है। हिन्दी में लिंग के दो भेद हैं- स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग।

तत्सम पुलिंग शब्द 

राष्ट्र, प्रांत, नगर, देश सर्प, सागर, साधन, सार, तत्त्व, स्वर्ण, दातव्य, दण्ड, दोष, धन, नियम, पक्ष, विधेयक, विनिमय, विनियोग, विभाग, विभाजन, विरोध, विवाद, वाणिज्य, शासन, प्रवेश, अनुच्छेद, शिविर, वाद, अवमान, अनुमान, आकलन, निमंत्राण, आमन्त्राण, उद्भव, निबंध्, नाटक, स्वास्थ्य, निगम, न्याय, समाज, विघटन, विर्सजन, विवाह, व्याख्यान ध्र्म, वित्त, उपादान, उपकरण, आक्रमण, पर्यवेक्षण, श्रम, विधन, बहुमत, निर्माण, संदेश, प्रस्ताव, ज्ञापक, आभार, आवास, छात्रावास, अपराध्, प्रभाव, उत्पादन, लोक, विराम, परिहार, विक्रम, न्याय, इत्यादि।

तत्सम स्त्राीलिंग शब्द

दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा, सभा, प्रार्थना, वेदना, समवेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना, अवस्था, नम्रता, सुंदरता, प्रभुता, जड़ता, महिमा, गरिमा, कालिमा, लालिमा, ईष्र्या, भाषा, अभिलाषा,  आशा, निराशा, पूर्णिमा, अरूणिमा, काया, कला, चपला, इच्छा, आज्ञा, अनुज्ञा, आराध्ना, उपासना, याचना, रक्षा, संहिता, आजीविका, घोषणा, गणना, परीक्षा, गवेषणा, नगरपालिका, योग्यता, सीमा इत्यादि।

अप्राणिवाचक पुलिंग हिन्दी शब्द

शरीर के अवयवों रत्नों, धातुओं, अनाज, पेड़ों द्रव्य पदार्थों, भौगोलिक जल एवं स्थल के नाम प्रायः पुलिंग होते हैं जैसे, कान मुँह, मोती, पन्ना, जौ, गेहूँ, पीपल, बड़ पानी, घी, देश, नगर, द्वीप, वायुमंडल आदि।

अपवाद: मणि, चांदी मूंग, खेसारी, लीची, नारंगी, नाशपाती, चाय, शराब, पृथ्वी, झील, इत्यादि स्त्राीलिंग हैं।

अप्राणिवाचक स्त्राीलिंग हिन्दी शब्द नदी गंगा, यमुना, नक्षत्रों -भरणी, अश्वनी, किराना सामान लौंग, हल्दी, हींग खाने-पीने की चीजें प्राय: स्त्राीलिंग होती हैं।

अपवाद सिंधु नदी, पुष्प नक्षत्रा, ध्नियां जीरा, पराठा, दही, रायता, हलुआ, पुलिंग होते हैं।

लिंग निर्णय हेतु सरल सूत्रा

1. तद्भव चाहे अकारांत हो या आकारांत, उनके तत्सम यदि अकरांत हैं, तो शब्द पुलिंग होंगे। जैसे- आम, हाथ, कान (तद्भव)- आम्र, हाथ, कर्ण ;तत्समद्ध पुलिंग हैं।

2. तद्भव अकारांत हो और उनके तत्सम आकारांत हो तब भी ऐसे शब्द स्त्राीलिंग होंगे जैसे- संध्या, शय्या (तत्सम) सांझ, सेज, (तद्भव) स्त्राीलिंग हैं।

3. भाववाचक संज्ञाएं (आकारांत) स्त्राीलिंग होती है जैसे माया, दया, कृपा, छाया, क्षमा, करूणा, लज्जा इत्यादि।

4. द्रव्यवाचक संज्ञाएं जैसे- दही, मोती, क्रिर्याथक संज्ञाएं जैसे लिखना, पढ़ना, उठाना, एवं द्वंद समास जैसे- सीता-राम, दाल-भात, नर-नारी, शब्द पुलिंग होते हैं।

प्रत्यय एवं लिंग निर्णय

5. अकारांत एवं आकारांत पुलिंग को इकारांत करने से स्त्राीलिंग हो जाते हैं जैसे: लड़का-लड़की, नाला-नाली, गोप-गोपी, आदि।

6. व्यवसाय बोध्क जाति बोध्क संज्ञा में इन और आइन प्रत्यय लगाकर स्त्राीलिंग बनाया जाता है। जैसे: माली- मालिन, लाला-ललाइन, धेबी-धेबिन इत्यादि।

7. कुछ उपनाम वाची शब्द में आनी लगाकर स्त्राीलिंग बनाया जाता है जैसे: ठाकुर -ठाकुरानी, सेठ-सेठानी, इत्यादि।

सर्वनाम

सर्व (सब) नामों (संज्ञाओं) के बदले जो शब्द  आते हैं, उन्हें ‘सर्वनाम’ कहते हैं। इन प्रकार यह किसी भी संज्ञा के बदले आता है। जैसे में, तुम, वह, यह इत्यादि।

 सर्वनाम के भेद

हिन्दी में कुछ ग्यारह सर्वनाम हैं- मैं, तू, आप, यह, वह, जो, सो, कोई, कुछ, कौन, क्या, प्रयोग के अनुसार सर्वनाम के छह भेद हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. पुरुषवाचक सर्वनाम: ये मानव के नाम के बदले आते हैं। उत्तम पुरुष में लेखक या वक्ता आता है, मध्यम पुरुष में पाठक या श्रोता और अन्यपुरुष में लेखक और श्रोता को छोड़कर अन्य लोग होते हैं।

इसके तीन भेद होते हैं –

  • उत्तम पुरुष: मैं, हम।
  • मध्यम पुरुष: तू, तुम, आप।
  • अन्य पुरुष: वह, वे, यह, ये।

2. निजवाचक सर्वनाम: इसका रूप ‘आप’ है। यह कत्र्ता का बोध्क है, पर स्वयं कर्त्ता का काम नहीं करता। यह (आप) बहुवचन में आदर हेतु प्रयुक्त होता है। निजवाचक ‘आप’ का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित के लिए होता है। जैसे दूसरे व्यक्ति को निराकरण हेतु होता है। जैसे – वह औरों को नहीं, अपने आप को सुधर रहा है।

3. निश्चयवाचक सर्वनाम: जिससे किसी वस्तु के निश्चय का बोध् हो जैसे- यह, वह। उदाहरणार्थ-यह कोई नया नियम नहीं है; चावल मत खाओ, क्योंकि वह कच्चा है।

4. अनिश्चयवाचक सर्वनाम: जिससे किसी निश्चित वस्तु का बोध् न हो जैसे-कोई, कुछ। उदाहरणार्थ-कोई पुकार तो नहीं रहा है; वह कुछ देर बाद आएगा।

5. सम्बन्ध्वाचक सर्वनाम: जिस सर्वनाम से वाक्य में किसी दूसरे सर्वनाम से संबंध् स्थापित किया जाए, उसे संबंध्वाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-जो, सो। उदाहरणार्थ-वह लड़की कौन थी जो अभी यहाँ आई थी; वह जो न करे, सो थोड़ा।

6. प्रश्नवाचक सर्वनाम: प्रश्न करने के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग होता है, उन्हें ‘प्रश्नवाचक सर्वनाम’ कहते हैं। जैसे-कौन, क्या। उदाहरणार्थ-कौन नियामक है सृष्टि का? क्या उत्तर देना संभव है?

सर्वनाम के रूप में अंतर लिंग, (वचन एवं कारक के अनुसार) सर्वनाम का रूप लिंग परिवर्तन से नहीं बदलता। संज्ञाओं के समान सर्वनाम के भी दो वचन होते हैं-एकवचन एवं बहुवचन। पुरूषवाचक एवं निश्चयवाचक सर्वनाम को छोड़कर शेष सर्वनाम विभक्तिरहित बहुवचन में एकवचन के समान रहते हैं। सर्वनाम में केवल संबोध्न कारक नहीं होता। कारकों में विभक्तियाँ लगाने से सर्वनामों के रूप में विकृति आ जाती है। जैसे- मैं-मुझे, मुझको, मुझसे, मेरा; तुम-तुम्हें, तुम्हारा; हम-हमें, हमारा; वह-उसने, उसको, उसे; कौन-किसने, किससे, किसे।

सर्वनाम की कारक-रचना (सारणी रूप में)