10. नए इलाके में… खुशबू रचते हैं हाथ… – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: कवि नए इलाके में पहुंचने के बाद क्या खोज रहा है?
उत्तर:
 कवि ने इलाके में पहुंचने के बाद उस ताकते हुए पीपल के पेड़ को ढहे हुए घर को और उस जमीन के खाले टुकड़े को ढूंढते हैं जहां से उनको बाय मुड़ना था और बाएं मुड़ने के बाद उनको दो मकान बाद एक बिना रंग वाले लोहे के फाटक का एक मंजिला घर मिलता है।

प्रश्न 2: कवि बदलती हुई दुनिया को जानने के लिए कौन सा उपाय बताते हैं?
उत्तर: 
कवि बदलती हुई दुनिया को जानने के लिए उपाय बताते हुए कहते हैं कि अब हर दरवाजा खटखटाना पड़ेगा और पूछना पड़ेगा कि क्या यह वही घर है? 

प्रश्न 3: कवि “खुशबू रचते हैं हाथ” नामक कविता में अगरबत्तियां बनाने वालो का किस प्रकार वर्णन कर रहे हैं?
उत्तर:
 कवि “खुशबू से रचते हैं हाथ” नामक कविता में अगरबत्तियां बनाने वालो का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इन अगरबत्तियां बनाने वालो का हाथ उभरी हुई नसों से युक्त है और इनके नाखून घिसे हुए हैं।
इनके गंदे-गंदे कटे फटे हाथ और जख्म से भरे हुए हाथ हैं। इनके हाथों में पीपल के पत्ते लगे हुए हैं और जूही की डाल से इनके हाथ सुगंधित हो रहे हैं।

प्रश्न 4: कवि खुशबू से रचते हैं हाथ नामक कविता में किसका वर्णन कर रहे हैं?
उत्तर: 
कवि खुशबू से रचते हैं हाथ नामक कविता में देश की मशहूर अगरबत्तियां बनाने वाले लोगों की एक टोली की बात कर रहे हैं।

प्रश्न 5: खुशबू रचते हाथ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
 कवि बता रहे हैं कि कुछ दूर आगे चलने पर उनको एक गली दिखाई दे जहां पर लोगों के हाथ कटे फटे थे, उनके नाखून घिसे हुए थे और नसें दिख रही थी। ये वही लोग हैं तो भारत की सबसे सुगंधित अगरबत्तियां बनाते हैं। 

प्रश्न 6: कवि खुशबू से रचते हैं हाथ नामक कविता में किस-किस अगरबत्तियां की बात कर रहे है?
उत्तर:
 कवि खुशबू से रचते हैं हाथ नामक कविता में जूही, केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी अगरबत्तियां की बात कर रहे है।

प्रश्न 7: नए इलाके कविता का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
 कवि बता रहे हैं कि दिन-प्रतिदिन दुनिया बदलती जा रही है जहां पहले पीपल का पेड़ था ढहा हुआ घर था और जमीन का खाली टुकड़ा था, वहां आज नए नए मकान बन रहे हैं कि आज वह गली पहचानना भी मुश्किल हो गया है। इंसान रोज करो जो बदल रहा है और अब तो अपनों से भी ये पूछना पड़ रहा है कि क्या तुम वही इंसान हो? 

09. अग्नि पथ – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: चल रहा मनुष्य है। अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, पथपथ। पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 कवि देखता है कि जीवन पथ में बहुत-सी कठिनाइयाँ होने के बाद भी मनुष्य उनसे हार माने बिना आगे बढ़ता जा रहा है। कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए वह आँसू, पसीने और खून से लथपथ है। मनुष्य निराश हुए बिना बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 2: कवि मनुष्य से क्या अपेक्षा करता है? अग्नि पथ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
कवि मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह अपना लक्ष्य पाने के लिए सतत प्रयास करे और लक्ष्य पाए बिना रुकने का नाम न ले।

प्रश्न 3: अग्निपथ में क्या नहीं माँगना चाहिए?
उत्तर:
 ‘अग्निपथ’ अर्थात् – संघर्षमयी जीवन में हमें चाहे अनेक घने वृक्ष मिलें, परंतु हमें एक पत्ते की छाया की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। किसी भी सहारे के सुख की कामना नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न 4: कवि हरिवंश राय बच्चन ने मनुष्य से किस बात की शपथ लेने का आग्रह किया है और क्यों?
उत्तर: 
कवि ने मनुष्य से आग्रह किया है कि यह जीवन-मार्ग कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ है। जीवन की राह पर आगे बढ़ते हुए वह कभी निरुत्साहित नहीं होगा। जीवन की राह सरल नहीं है। यह बहुत कठिन है। वह कभी थकान महसूस नहीं करेगा। न शारीरिक न मानसिक। रास्ते में कभी नहीं रुकेगा। रुकना ही मौत है, जीवन की समाप्ति है। इसलिए कवि मनुष्य से इस बात की शपथ दिलाता है कि वह संघर्ष भरे मार्ग पर निरंतर आगे ही बढ़ता रहेगा। वह न तो कभी रुकेगा, न थकेगा और न ही कभी संघर्ष से मुँह मोड़ेगा।

प्रश्न 5: घने वृक्ष और एक पत्र-छाँह का क्या अर्थ है? अग्निपथ कविता के अनुसार लिखिए।
उत्तर:
 ‘घने वृक्ष’ मार्ग में मिलने वाली सुविधा के प्रतीक हैं। इनका आशय है-जीवन की सुख-सुविधाएँ। ‘एक पत्र-छाँह’ का प्रतीकार्थ है-थोड़ी-सी सुविधा।

प्रश्न 6: अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ से क्या आशय है? अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ का आशय है-संकटों से पूरी तरह ग्रस्त मनुष्य। मार्ग में आने वाले कष्टों को झेलता हुआ तथा परिश्रम की थकान को दूर करता हुआ मनुष्य अपने-आप में सुन्दर होता जाता है।

प्रश्न 7: अग्निपथ कविता का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर: 
इस कविता का मूल भाव है निरन्तर संघर्ष करते हुए जियो। कवि जीवन को अग्निपथ अर्थात् आग से भरा पथ मानता है। इसमें पग-पग पर चुनौतियाँ और कष्ट हैं। मनुष्य को इन चुनौतियों से नहीं घबराना चाहिए और इनसे मुँह भी नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि आँसू पीकर, पसीना बहाकर तथा खून से लथपथ होकर भी निरन्तर संघर्ष पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

प्रश्न 8: अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए कि क्या घने वृक्ष भी हमारे मार्ग की बाधा बन सकते हैं?
उत्तर: 
अग्निपथ कविता में संघर्षमय जीवन को अग्निपथ कहा गया है और सुख-सुविधाओं को घने वृक्षों की छाया। कभी-कभी जीवन में मिलने वाली सुख-सुविधाएँ (घने वृक्षों की छाया) व्यक्ति को अकर्मण्य बना देती है और वे सफलता के मार्ग में बाधा बन जाते हैं इसीलिए कवि जीवन को अग्नि पथ कहता है। घने वृक्षों की छाया की आदत हमें आलसी बनाकर सफलता से दूर कर देती है।

08. गीत – अगीत – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: प्रेमी के गीत को सुनकर प्रेमिका क्या सोचती है?
उत्तर: प्रेमी के गीत को सुनकर प्रेमिका यह सोचती है कि हे भगवान! मैं इस गीत की एक कड़ी क्यों नहीं हूं।

प्रश्न 2: ‘हुई न क्‍यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है। इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए?
उत्तर: 
जब प्रेमी शाम के समय प्यार से आल्हा गाता है तो उसकी प्रेमिका उसका गाना सुनने के लिए अपने घर से भागने को मजबूर हो जाती है और वह नीम के पेड़ के पीछे खड़ी होकर उसका गाना सुनती है गाना सुनते सुनते वह अपने मन में यह गुनगुनाती है कि हे भगवान मैं इस गीत की एक कड़ी क्यों नहीं हुई।

प्रश्न 3: गीत अगीत पाठ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: 
गीता अगीत पाठ में लेखक एक गुलाब और एक प्रेमिका के मन की विवशता का वर्णन करते हुए बता रहे हैं कि जब नदी झरझर की आवाज करते हुए जाती है तो उसके तट पर उपस्थित एक गुलाब यह सोचता है कि काश मुझे भी भगवान अगर बोलने की क्षमता देते तो मैं भी अपने पतझड़ के सपनों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता ठीक उसी प्रकार जब प्रेमी आल्हा गाता है तो उसकी प्रेमिका घर से भाग कर चली आती है और नीम के पेड़ के पीछे छुपके उसका स्वर सुनती हुई भगवान से कहती है कि हे! भगवान काश मैं इस स्वर की एक कड़ी क्यों न हूं।

प्रश्न 4: नदी को बहते देखकर तट पर स्थित गुलाब क्या सोचता है?
उत्तर: नदी को बहते देखकर तट पर स्थित गुलाब यह सोचता है कि अगर भगवान ने मुझे भी स्वर दिए होते तो मैं भी पूरी दुनिया को पतझर के सपने सुनाता।

प्रश्न 5: जब शुक गाता है, तो शुकी के हृदय पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
 जब शुक गाता है तो गीत के स्वर पत्तियों से छनकर शुकी के हृदय को छू जाते हैं और वह गीत के स्वर शुकि के प्रेम से मिल जाते हैं।

प्रश्न 6: “देते स्वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।” इस पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 कवि बता रहे हैं कि नदी झर-झर की आवाज करके बहते हुई जा रही है तभी उसके तट पर खिला एक गुलाब मन ही मन कहता है कि हे ईश्वर यदि आपने मुझे नदी की तरह बोलने का वरदान दिया होता तो मैं भी इस दुनिया को अपने पतझड़ के सपनों के बारे में सुनाता। 

07. दोहे – Short and Long Question answer

lप्रश्न 1: रहीम के अनुसार मोती का मूल्य कब तक होता है?
उत्तर: मोती का मूल्य तब तक होता है जब तक उस पर चमक होती है। मोती की वास्तविकता गुणवत्ता उसके बाहरी भाग पर विद्यामान चमक ही है। जब चमक नहीं रहती है, तो वह मूल्यहीन हो जाता है।

प्रश्न 2: अवध नरेश चित्रकूट में कब व क्यों रहे?
उत्तर: अवध नरेश श्रीरामचंद्र सीता व लक्ष्मण के साथ कुछ समय के लिए चित्रकूट में तब रहे थे, जब उन्हें वनवास मिला था। विपत्ति के समय शान्ति पाने के उद्देश्य से वे यहाँ रहे थे।

प्रश्न 3: जलहीन कमल की रक्षा सूर्य भी क्यों नहीं कर पाता है? रहीम के पद के आधार पर लिखिए।
उत्तर: जलहीन यानी पानी बिना कमल की रक्षा सूर्य भी नहीं कर सकता, यद्यपि सूर्य ही कमल को खिलाता है। वह कमल खिलेगा जो पानी के मध्य स्थित है। अर्थात् दूसरा भी हमारी मदद तभी कर पाता है जब हमारे पास कुछ होता है। साधनहीन की कोई मदद नहीं करता।

प्रश्न 4: सूई तथा तलवार के उदाहरण द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर: रहीम का मानना है कि प्रत्येक छोटी-बड़ी वस्तु की अपनी अलग-अलग उपयोगिता होती है, इसलिए वह कहते हैं कि कभी भी धनी मित्रों को पाकर निर्धन मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। इसके लिए रहीम सुई और तलवार का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जहाँ सुई का काम होता है, वहाँ तलवार व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार रहीम इस उदाहरण के माध्यम से समाज में सभी के सम्मान का संदेश देते हैं। सभी वस्तु भले ही वे छोटी ही क्यों न हों, उपयोगी होती हैं इसलिए छोटे व्यक्तियों या छोटी वस्तुओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 5: नट किस कला में सिद्ध होने के कारण ऊपर चढ़ जाता है? रहीम के पद के आधार पर लिखिए।
उत्तर: नट कुण्डली मारने की कला में सिद्ध होने के कारण ऊपर चढ़ जाता है। वह कुण्डली में सिमट जाता है और छलाँग मारकर रस्सी के ऊपर चढ़ जाता है।

प्रश्न 6: सागर की बड़ाई क्यों नहीं होती? रहीम के पद के आधार पर लिखिए।
उत्तर: सागर के जल से किसी की प्यास न बुझने के कारण सागर की बड़ाई नहीं होती।

प्रश्न 7: रहीम के अनुसार कौन-सा जल स्रोत या साधन उपयोगी होता है? रहीम के पद के आधार पर लिखिए।
उत्तर: रहीम के अनुसार, वही जल स्रोत या साधन मनुष्य के लिए उपयोगी होता है जो उसके काम आता है। सागर कितना भी बड़ा हो किंतु वह किसी की प्यास नहीं बुझा पाता, इसलिए अनुपयोगी होता है। इसके विपरीत पंक का जल भी लघु जीवों के काम आने के कारण उपयोगी कहलाता है। इसलिए महत्व उपयोग में आने का है, विस्तार का नहीं।

प्रश्न 8: रहीम के दोहे के आधार पर बताइए कि आप तालाब के जल को श्रेष्ठ मानते हैं या सागर के जल को और क्यों?
उत्तर: रहीम ने अपने दोहे में सागर में स्थित विशाल मात्रा वाले जल और तालाब में स्थित लघु मात्रा में कीचड़ वाले जल का वर्णन किया है। इन दोनों में मैं भी तालाब वाले पानी को श्रेष्ठ मानता हूँ। यद्यपि समुद्र में अथाह जल होता है, परंतु उसके किनारे जाकर भी जीव-जंतु प्यासे के प्यासे लौट आते हैं। दूसरी ओर तालाब में स्थित कीचड्युक्त पानी विभिन्न प्राणियों की प्यास बुझाने के काम आता है। अपनी उपयोगिता के कारण यह पंकिल जल सागर के खारे जल से श्रेष्ठ है।

06. रैदास – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: कवि रैदास के स्वामी कौन हैं? वे क्या-क्या कार्य करते हैं?
उत्तर: 
रैदास के स्वामी निराकार प्रभु हैं। वे अपनी असीम कृपा से नीच को ऊँच और अछूत को महान बना देते हैं।

प्रश्न 2: कवि रैदास ने सोने व सुहागे की बात किस संबंध में कही है व क्यों?
उत्तर: 
सोने और सुहागे का आपस में घनिष्ठ संबंध है। सुहागे का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है; किंतु जब वह सोने के साथ मिल जाता है, तो उसमें चमक उत्पन्न कर देता है।

प्रश्न 3: रैदास द्वारा रचित ‘अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी’ को प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर:
 रैदास द्वारा रचित ‘अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी’ में कवि ने अपने आराध्य के नाम की रट न छोड़ पाने के माध्यम से अपनी अटूट एवं अनन्य भक्ति भावना प्रकट की है। इसके अतिरिक्त, कवि ने चंदन-पानी, दीपक-बाती जैसे अनेक उदाहरणों के द्वारा अपने स्वामी के प्रति दास्य भक्ति की स्वीकारोक्ति की है और उनके सान्निध्य पाने की इच्छा व्यक्त की है।

प्रश्न 4: रैदास के प्रभु में वे कौन-सी विशेषताएँ हैं जो उन्हें अन्य देवताओं से श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं?
उत्तर: 
रैदास के प्रभु में कई विशेषताएँहैं जो उन्हें अन्य देवताओं से श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं:

  • वे केवल झूठी प्रशंसा या स्तुति नहीं चाहते।
  • वे जाति प्रथा या छुआछूत को महत्व नहीं देते।
  • वे समदर्शी हैं और सभी को समान दृष्टि से देखते हैं।
  • उनके लिए भावना प्रधान है।
  • वे भक्त वत्सल हैं और अपने भक्तों की भलाई के लिए तत्पर रहते हैं।
  • वे दीन-दुखियों और शोषितों की विशेष रूप से सहायता करते हैं।
  • वे गरीब नवाज हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोरों का समर्थन करते हैं।
  • वे किसी से नहीं डरते हैं और निडरता का परिचय देते हैं।

प्रश्न 5: कवि ने स्वयं को पानी मानकर प्रभु को क्या माना है? ‘रैदास के पद’ के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 कवि ने स्वयं को पानी मानकर प्रभु को चंदन माना है। इस भाव के माध्यम से कवि यह दिखाना चाहते हैं कि पानी की शुद्धता और चंदन की सुगंध में एक गहरा संबंध है। पानी के माध्यम से जीवन की शुद्धता को दर्शाते हुए, कवि प्रभु को चंदन के रूप में मानते हैं, जो शांति और आध्यात्मिकता का प्रतीक है।

प्रश्न 6: तुम घन बन हम मोरा-ऐसी कवि रैदास ने क्यों कहा है?
उत्तर:
 कवि रैदास अपने प्रभु के अनन्य भक्त हैं, जिन्हें अपने आराध्य को देखने से असीम खुशी मिलती है। उन्होंने यह बात इसीलिए कही है, क्योंकि जिस प्रकार वन में रहने वाला मोर आसमान में घिरे बादलों को देखकर प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार कवि भी अपने आराध्य को देखकर प्रसन्न होता है।

प्रश्न 7: कवि रैदास ने गरीब निवाजु किसे कहा है और क्यों?
उत्तर:
 कवि ने ‘गरीब निवाजु’ अपने आराध्य प्रभु को कहा है, क्योंकि उन्होंने गरीबों और कमज़ोर समझे जाने वाले तथा अछूत कहलाने वालों का उद्धार किया है। इस कार्य से इन लोगों को समाज में मान-सम्मान और ऊँचा स्थान मिल सकता है।

प्रश्न 8: कवि रैदास ने अपने पद के माध्यम से तत्कालीन समाज का चित्रण किस प्रकार किया है?
उत्तर: 
कवि रैदास ने अपने पद ‘ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै’ में सामाजिक छुआछूत एवं भेदभाव की तत्कालीन स्थिति का अत्यंत मार्मिक एवं यथार्थ चित्र खींचा है। उन्होंने अपने पद में कहा है कि गरीब एवं दीन-दुखियों पर कृपा बरसाने वाला एकमात्र प्रभु है। उन्होंने ही एक ऐसे व्यक्ति के माथे पर छत्र रख दिया है, राजा जैसा सम्मान दिया है, जिसे जगत के लोग छूना भी पसंद नहीं करते। समाज में निम्न जाति और निम्न वर्ग के लोगों को तिरस्कारपूर्ण दृष्टि से देखा जाता था। ऐसे समाज में प्रभु ही उस पर द्रवित हुए। कवि द्वारा नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना, सैन आदि संत कवियों का दिया गया उदाहरण दर्शाता है कि लोग निम्न जाति के लोगों के उच्च कर्म पर विश्वास भी मुश्किल से करते थे। इसलिए कवि को उदाहरण देने की आवश्यकता पड़ी। इन कथनों से तत्कालीन समाज की सामाजिक विषमता की स्पष्ट झलक मिलती है।

05. शुक्र तारे के सामान – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: गाँधी जी ने महादेव भाई को अपने उत्तराधिकारी का पद कब सौंपा?

उत्तर: महादेव भाई जब 1917 में गाँधी जी के पास आए तभी गाँधी जी ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को पहचान लिया और उन्हें अपने उत्तराधिकारी का पद सौंप दिया।

प्रश्न 2: गांधी जी ने यंग इंडिया प्रकाशित करने के विषय में क्या निश्चय किया?
उत्तर:
 गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ प्रकाशित करने के विषय में यह निश्चय किया कि वह इस साप्ताहिक पत्र को हफ्ते में केवल दो बार प्रकाशित करेंगे, क्योंकि सत्याग्रह आंदोलन में लीन रहने के कारण गांधी जी का काम बहुत बढ़ गया था।

प्रश्न 3: शुक्र तारे के समान किसे बताया गया और क्यों?
उत्तर: 
शुक्र तारे के समान महादेव भाई देसाई को बताया गया है, जो गाँधी जी के परम सहयोगी थे। आकाश के तारों में शुक्र का कोई जोड़ नहीं। शुक्र, चन्द्र का साथी। जिस प्रकार शुक्र तारा नक्षत्र मण्डल में ऐन शाम या सवेरे घण्टे दो घण्टे दिखता है, पर अपनी आभा-प्रभा से आकाश को जगमगा देता है, उसी प्रकार महादेव भाई आधुनिक भारत की स्वतन्त्रता के उषाकाल में अपने स्वभाव व विद्वता से देश-दुनिया को मुग्ध करके अचानक अस्त हो गए।

प्रश्न 4: उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वायसराय लम्बी साँस-उसाँस लेने लगते थे। शुक्र तारे के समान पाठ के आधार पर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
भारत में उनके अक्षरों का कोई सानी नहीं था। वायसराय के नाम जाने वाले गाँधी जी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। बड़े-बड़े सिविलियन और गर्वनर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखने वाला कहीं खोजने पर नहीं मिलता था। महादेव भाई गाँधी जी को जो पत्र लिखते थे, उनके पास ऐसा व्यक्ति देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वायसराय लम्बी साँस लेते थे, क्योंकि उनके पास सुन्दर अक्षर लिखने वाला कोई लेखक नहीं था।

प्रश्न 5: शुक्रतारे के समान पाठ में गांधी जी के पत्र किसके लिखावट में जाते थे?
उत्तर: 
गांधी जी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाया करते थे।

प्रश्न 6: गाँधीजी से मिलने से पहले महादेव भाई कहाँ नौकरी करते थे?
उत्तर: 
गाँधीजी से मिलने से पहले महादेव भाई सरकारी अनुवाद विभाग में नौकरी करते थे।

प्रश्न 7: महादेव की साहित्यिक देन क्या है? ‘शुक्र तारे के समान’ पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 महादेव को प्रथम श्रेणी की शिष्ट, सम्पन्न भाषा और मनोहारी लेखन-शैली की ईश्वरीय देन मिली थी। गाँधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेज़ी अनुवाद इन्होंने किया। नरहरि भाई के साथ उन्होंने टैगोर द्वारा रचित साहित्य का उलटना-पुलटना शुरू किया। टैगोर द्वारा रचित ‘विदाई का अभिशाप’ ‘शीर्षक नाटिका’, ‘शरद बाबू की कहानियाँ’ आदि अनुवाद उस समय की उनकी साहित्यिक देन हैं।

प्रश्न 8: विद्यार्थी अवस्था में महादेव भाई क्या करते थे? महादेव भाई की साहित्यिक गतिविधियों में क्या देन है?
उत्तर:
 महादेव भाई पहले सरकार के अनुवाद विभाग में नौकरी करते थे। 1917 में वे गाँधी जी के पास आए और उनके वैयक्तिक सहायक बन गए।
महादेव भाई को शिष्ट सम्पन्न भाषा और मनोहारी लेखन शैली की ईश्वरीय देन मिली थी। गाँधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ (मूल गुजराती) का अंग्रेजी अनुवाद महादेव भाई ने किया। टैगोर के नाटक ‘विदाई का अभिशाप’ और शरत बाबू की कहानियों का अनुवाद उनकीसाहित्यिक देन है।

04. वैज्ञानिक चेतना के वाहक : चन्द्र शेखर वेंकटरमन – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: रामन के प्रारंभिक जीवन पर प्रकाश डालिए?
उत्तर: 
चंद्रशेखर वेंकट रामन का जन्म 7 नवंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। वे एक विशेषज्ञ भौतिकविज्ञानी थे और उन्होंने अपने विशेषज्ञता के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उनके पिता भी एक गणित और भौतिकी के शिक्षक थे, जिनका प्रभाव रामन के शैक्षिक प्रवृत्तियों पर बड़ा था। उनका बचपन विज्ञान के प्रति उनकी गहरी रुचि के साथ गुजरा, और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय और स्थानिक शिक्षा संस्थानों से प्राप्त की। वे अपनी पढ़ाई को और भी आगे बढ़ाते गए और उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज, मद्रास से अपनी पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई की जहाँ से उन्होंने भौतिकी में मास्टर्स डिग्री प्राप्त की।

प्रश्न 2: ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस की प्रयोगशाला के बारे में बताइए?
उत्तर:
 ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’ या आई.ए.ई.सी.एस. भारतीय विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संगठन थी जिसकी स्थापना महेंद्रलाल सरकार ने की थी। इसका उद्देश्य था विज्ञान की प्रोत्साहन देना, वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करना, और भारत में विज्ञान की शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देना। इस संगठन के तहत विज्ञानिकों को आवश्यक संसाधनों की प्राप्ति के लिए समर्थन प्रदान किया जाता था।

प्रश्न 3: रामन्‌ वाद्य यंत्रों में खोज क्यों करना चाहते थे?
उत्तर:
 रामन्‌ की खोज की एक मुख्य दिशा थी वाद्य यंत्रों के प्रदर्शन के क्षेत्र में। उन्होंने सबूत देने का इरादा किया कि भारतीय वाद्य यंत्र भी उतने ही उच्च गुणवत्ता और प्रदर्शन क्षमता के साथ हो सकते हैं जैसे कि विदेशी वाद्य यंत्र। उन्होंने भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ-साथ विदेशी वाद्य यंत्रों में भी खोज कर दिखाया कि यह भ्रांति गलत है और भारतीय यंत्र भी अच्छे प्रदर्शन क्षमता रखते हैं।

प्रश्न 4: रमन प्रभाव क्या है?
उत्तर:
 रमन प्रभाव एक भौतिकीय प्रभाव है जिसमें प्रकाश के बिखरने के प्रक्रिया में वर्णक्रम में परिवर्तन होता है। यह प्रक्रिया सबसे पहले भारतीय भौतिकविज्ञानी चंद्रशेखर वेंकट रामन द्वारा 1928 में प्रस्तुत की गई थी। जब प्रकाश किसी द्रव्य के साथ मिलता है, तो कुछ तरह की किरणों का बिखरना या परावर्तन होता है, जिससे प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन आता है। यह परिवर्तन उस द्रव्य की मोलेक्युलर संरचना के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

प्रश्न 5: रामन्‌ को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उत्तर: 
रामन्‌ को उनके योगदान के लिए कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • 1930: नोबेल पुरस्कार (भौतिकी)
  • 1954: भारत रत्न
  • रोम का मेथ्यूसी पुरस्कार
  • रॉयल सोसाइटी का ह्यूज पुरस्कार
  • फिलाडेल्फिया इंस्टिट्यूट का फ्रैंकलिन पुरस्कार
  • सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार


प्रश्न 6: रामन्‌ की खोज से भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में क्या बदलाव लाए?
उत्तर:
 रामन्‌ की खोज ने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव लाए। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए रामन प्रभाव के प्रयोग से प्रकाश के बिखरने के तरीके का अध्ययन किया गया और यह पता चला कि प्रकाश के बिखरने के प्रक्रिया में एक नई दिशा को प्रमोट किया जा सकता है। इससे विज्ञानिकों को पदार्थों की संरचना के बारे में नई जानकारी प्राप्त हुई और यह उन्हें अधिक समझने और अनुसंधान करने का अवसर प्रदान किया।

प्रश्न 7: रामन्‌ के साथ स्टॉकहोम में क्या हुआ?
उत्तर: 
जब रामन्‌ स्टॉकहोम गए थे ताकि उन्हें नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जा सके, तो वह एक प्रस्तावना प्रस्तुत करने के लिए वहाँ पहुँचे। इस प्रस्तावना के दौरान, उन्हें विज्ञानिकों के साथ मिलकर उनके शोध कार्यों का प्रस्तुतीकरण करने का अवसर मिला। उन्होंने अल्कोहल पर रामन प्रभाव का प्रदर्शन किया, जिसमें प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन आता है। यह उनके शोध कार्य की एक महत्वपूर्ण दिशा थी और इससे वे विज्ञानिक समुदाय में एक महत्वपूर्ण योगदान करने में सफल रहे।

प्रश्न 8: रमन की खोज से आइंस्टाइन का क्या संबंध है?
उत्तर:
 रामन की खोज की एक महत्वपूर्ण परिणामिकता थी जो आइंस्टाइन के विचारों को प्रायोगिक रूप में समर्थन प्रदान करती थी। आइंस्टाइन की सापेक्ष तात्त्विकता के अनुसार, प्रकाश की किरणों का बिखरना और परावर्तन विशिष्ट तरीके से होता है जब यह किसी पदार्थ में प्रवेश करता है। रामन की खोज ने इस दिशा को प्रायोगिक रूप में प्रमाणित किया जब उन्होंने दिखाया कि प्रकाश के बिखरने के प्रक्रिया में वर्णक्रम में परिवर्तन होता है, जो पदार्थ की संरचना के बारे में जानकारी प्रदान करता है, जिससे आइंस्टाइन की सिद्धांतों को समर्थन मिला।

प्रश्न 9: रमन ने “रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट” की स्थापना क्यों की?
उत्तर: 
रमन ने बंगलौर, भारत में “रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट” की स्थापना उनके दृष्टिकोण में विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए की। उन्हें भारतीय वैज्ञानिकों को उच्चतर शिक्षा और शोध के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता महत्वपूर्ण लगी थी, जिससे वे विद्यार्थियों को बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होती और वे देश में ही उन्नत तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर सकते। इसके अलावा, उन्होंने इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स नामक वैज्ञानिक पत्रिका की स्थापना भी की, जिससे विज्ञान समुदाय में विज्ञानिक अनुसंधान की प्रोत्साहन की गई।

प्रश्न 10: रमन विवाद क्या था?
उत्तर:
 ‘रमन विवाद’ भारतीय विज्ञान समुदाय में एक महत्वपूर्ण विवाद था जो चंद्रशेखर वेंकट रामन के और विज्ञान समुदाय के बीच में था। 1930 में रामन्‌ के द्वारा रामन प्रभाव की खोज के बाद, उन्होंने एक शोध लेख प्रकाशित किया जिसमें वे यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे कि प्रकाश के बिखरने का कारण क्या है। इसमें उन्होंने यह माना कि प्रकाश के बिखरने का कारण अलकोहल जैसे द्रव्यों में है, जो बाद में गलत साबित हुआ। इसके परिणामस्वरूप, कुछ भारतीय वैज्ञानिकों ने रामन्‌ के विचारों का खंडन किया, जिनमें भगवान चंद्रशेखर वेंकट रामन के अनुयायी भी शामिल थे। इस विवाद के कारण, रामन्‌ की खोज पर सवाल उठे और इसका परिणामस्वरूप उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार से वंचित कर दिया गया। हालांकि, बाद में उनकी खोज सत्य सिद्ध हुई और उन्हें 1930 में ही नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

03. तुम कब जाओगे, अतिथि – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: अतिथि को आया देख लेखक की क्या दशा हुई और क्यों?
उत्तर: अतिथि को असमय आया देख लेखक ने सोचा कि यह अतिथि अब पता नहीं कितने दिन रुकेगा और इसके रुकने पर उसका आर्थिक बजट भी खराब हो जाएगा। इसका अनुमान लगाते ही लेखक का दृश्य किसी अज्ञात आशंका से धड़क उठा।

प्रश्न 2: लेखक अपने अतिथि को दिखाकर दो दिनों से कौन-सा कार्य कर रहा था और क्यों?
उत्तर: 
लेखक अपने अतिथि को दिखाकर दो दिनों से तारीखें बदल रहा था। ऐसा करके वह अतिथि को यह बताना चाह रहा था कि उसे यहाँ रहते हुए चौथा दिन शुरू हो गया है। तारीखें देखकर शायद उसे अपने घर जाने की याद आ जाए

प्रश्न 3: अतिथि के दूसरे दिन भी ठहर जाने के उपरान्त लेखक ने किस आशा के साथ अतिथि का सत्कार किया? और, किस रूप में?
उत्तर: 
अतिथि के दूसरे दिन भी ठहर जाने के उपरान्त लेखक ने दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि में सिनेमा दिखाया। लेखक ने सोचा कि इसके बाद तुरंत भावभीनी विदाई होगी। वह अतिथि को विदा करने स्टेशन तक जाएँगे। इसी आशा के साथ लेखक ने दूसरे दिन भी अतिथि का सत्कार किया।

प्रश्न 4: बातचीत की उछलती गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनों से टप्पे खाकर फिर सेंटर में आकर चुपचाप पड़ी हैं – तुम कब जाओगे अतिथि पाठ के आधार पर कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 लेखक ने अतिथि से घर-परिवार, दोस्तों, नौकरी, राजनीति, फिल्म, साहित्य, परिवार नियोजन, महँगाई और पुरानी प्रेमिकाओं तक के विषय में काफी बातें कर ली थीं। अब उनके सारे विषय खत्म हो चुके थे। बातचीत रूपी गेंद विषय रूपी कमरे के सारे कोनों को छू आई थी और अब वह शांत पड़ी थी। इस सबका कारण अतिथि का लेखक के घर लंबे समय तक रुकना था। लेखक को लगने लगा था कि यदि अतिथि का मन बातों में ज्यादा ही रम गया तो वह और जम जाएगा और फिर एक ही बात करते-करते उसे बोरियत भी होने लगी थी। इसलिए उनकी बातचीत पर विराम लगा हुआ था। यदि अतिथि समय से खुशी-खुशी चला जाता, तो यह स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होती।

प्रश्न 5: तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा?
उत्तर: 
तीसरे दिन सुबह अतिथि ने लॉण्ड्री में कपड़े देने को कहा क्योंकि वह उससे कपड़े धुलवाना चाहता था।

प्रश्न 6: कैलेण्डर की तारीख फड़फड़ाने का क्या आशय है? तुम कब जाओगे अतिथि पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
अतिथि के जाने के इन्तजार में लेखक के दिन बहुत बेचैनी से बीत रहे थें।

प्रश्न 7: अतिथि सदैव देवता नहीं होता’ वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है। तुम कब जाओगे, अतिथि? पाठ के आधार पर कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
: यदि अतिथि थोड़ी देर तक टिकता है तो वह देवता रूप बनाए रखता है, पर फिर वह मनुष्य रूप में आ जाता है। उसका मान-सम्मान होता है, और ज्यादा दिन तक टिकने पर वह राक्षस का रूप ले लेता है। तब वह राक्षस जैसा बुरा प्रतीत होता है।

प्रश्न 8: जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए? क्या यह परिवर्तन सही थे?
उत्तर:
 जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो उसकी आवभगत में कमी आई। लेखक के व्यवहार में परिवर्तन आ गया। सौहार्द धीरे-धीरे बोरियत में बदल गया। शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा विषय खत्म हो गए। बढ़िया लंच और डिनर ने खिचड़ी का स्थान ले लिया। लेखक को अतिथि थोड़ा-थोड़ा राक्षस प्रतीत होने लगा। यहाँ तक कि लेखक का मन उसे गेट आउट कहने को करने लगा। अतिथि के कई दिन तक रुकने पर घर का बजट बिगड़ जाता है। महँगाई के जमाने में जब अपना परिवार पालना कठिन होता है तब अतिथि का खर्च उठाते-उठाते मेहमान के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक है।

02. एवरेस्ट: मेरी शिखर यात्रा – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: अंगदोरजी के पाँव ठंडे क्यों पड़ जाते थे? एवरेस्ट-मेरी शिखर यात्रा पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: अंगदोरजी कुशल पर्वतारोही था। वह बिना ऑक्सीजन के बर्फ़ पर चलने का अभ्यस्त था। इसलिए वह यात्रा में ऑक्सीजन नहीं लगाता था। पंरतु बिना ऑक्सीजन के उसके पैर ठंडे पड़ जाते थे।

प्रश्न 2: एवरेस्ट-मेरी शिखर यात्रा पाठ के आधार पर बताइए बछेन्द्री पाल ने एवरेस्ट की तरफ क्या देखा?
उत्तर: 
बछेंद्री पाल ने एवरेस्ट की तरफ एक भारी बर्फ का का बड़ा फूल (प्लूम) देखा।

प्रश्न 3: एवरेस्ट शिखर पर पहुँचकर बछेन्द्री पाल ने स्वयं को किस प्रकार सुरक्षित रूप से स्थिर किया?
उत्तर: 
एवरेस्ट शिखर सँकरा व नुकीला था। अतः वहाँ पहुँचकर स्वयं को सुरक्षित रूप से स्थिर करने के लिए बछेन्द्री पाल ने बर्फ के फावड़े से खुदाई की और उसके उपरान्त घुटनों के बल बैठकर ‘सागरमाथे’ के शिखर का चुंबन किया।

प्रश्न 4: एवरेस्ट की शिखर यात्रा में किन-किन लोगों ने लेखिका बछेन्द्री पाल को सहयोग दिया?
उत्तर:
 एवरेस्ट की शिखर यात्रा में अभियान दल के नेता कर्नल खुल्लर, उपनेता प्रेमचंद, साथी अंगदोरजी तथा डॉक्टर मीनू मेहता ने लेखिका को सफलता प्राप्त करने में उल्लेखनीय सहयोग दिया। कर्नल खुल्लर ने लेखिका को शिखर यात्रा के प्रारंभ से लेकर अंत तक हिम्मत बँधायी, उसका साहस बढ़ाया। उन्होंने अभियान दल के सभी सदस्यों की मृत्यु को सहजता से स्वीकार करने का पाठ पढ़ाकर उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त किया। उपनेता प्रेमचंद ने पहली बाधा खंभु हिमपात की स्थिति से उन्हें अवगत कराया और सचेत किया कि ग्लेशियर बर्फ की नदी है तथा बर्फ का गिरना जारी है। अतः सभी लोगों को सावधान रहना चाहिए। डॉक्टर मीनू मेहता ने एल्युमीनियम की सीढ़ियों से अस्थायी पुल बनाने, लट्ठों एवं रस्सियों का उपयोग, बर्फ की आड़ी-तिरछी दीवारों पर रस्सियों को बाँधना आदि सिखाया। अंगदोरजी ने लेखिका को लक्ष्य तक पहुँचने में सहयोग दिया तथा प्रोत्साहित भी किया।

प्रश्न 5: शिखर पर चढ़ने वालों को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? एवरेस्ट- मेरी शिखर यात्रा पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: 
जो पर्वतारोही हिमालय पर्वत के शिखर पर चढ़ते हैं, उन्हें खराब मौसम और बर्फ के तूफ़ान का मुकाबला करना ही पड़ता है।

प्रश्न 6: एवरेस्ट-मेरी शिखर यात्रा पाठ के सन्दर्भ में बताइए एवरेस्ट अभियान दल कब रवाना हुआ?
उत्तर:
 एवरेस्ट अभियान दल दिल्ली से काठमांडू के लिए 7 मार्च को हवाई जहाज से रवाना हुआ।

प्रश्न 7: ‘एवरेस्ट-मेरी शिखर यात्रा’ पाठ के आधार पर बताइए जय लेखिका को देखकर हक्का-बक्का क्यों रह गया?
उत्तर:
 जय बछेन्द्री पाल का पर्वतारोही साथी था। उसे भी बछेन्द्री के साथ पर्वत-शिखर पर जाना था। शिखर कैम्प पर पहुँचने में उसे देर हो गई थी। वह सामान ढोने के कारण पीछे रह गया था। अतः बछेन्द्री उसके लिए चाय-जूस आदि लेकर उसे लेने के लिए पहुँची। जय ने यह कल्पना नहीं की थी कि बछेन्द्री उसकी चिन्ता करेगी। इसलिए जब उसने बछेन्द्री पाल को उसके लिए चाय-जूस के साथ देखा तो वह हक्का-बक्का रह गया।

प्रश्न 8: एवरेस्ट : मेरी शिखर यात्रा पाठ के आधार पर बताइए मई की रात को कैंप तीन में क्या घटना घटी और एक अन्य साथी ने लेखिका की जान कैसे बचाई?
उत्तर: 
15-16 मई, 1984 को बुद्ध पूर्णिमा के दिन जब लेखिका ल्होत्से की बर्फीली सीधी ढलान पर नाइलॉन के बने तंबू के कैंप तीन में गहरी नींद में सोई हुई थी तभी रात में लगभग 12:30 बजे उसके सिर के पिछले हिस्से में एक ज़ोरदार धमाके के साथ कोई सख्त चीज टकराई। वह बर्फ का बड़ा विशालकाय पंज था। जिसने कैंप को तहस-नहस करने के साथ सभी व्यक्तियों को चोटिल किया। लेखिका तो बर्फ के नीचे फंस गयी थी।
तभी लोपसांग अपनी स्विस छुरी की मदद से उनके तंबू का रास्ता साफ करने में सफल हो गया तथा उसने ही लेखिका के चारों तरफ के कड़े जमे बर्फ की खुदाई कर लेखिका को बर्फ की कब्र से बाहर खींच कर निकाला। इस तरह लेखिका की जान बची।

01. दुःख का अधिकार – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: खरबूजे बेचने आई महिला फफक-फफक कर क्यों रोए जा रही थी? दुःख का अधिकार पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: महिला खरबूजे बेचने आई थी और वह फफक-फफक कर रो रही थी क्योंकि एक दिन पहले ही उसका जवान बेटा साँप के डसने से चल बसा था। उसके घर में पोते-पोती और बीमार बहू के लिए खाने को कुछ भी नहीं था। इस परिस्थिति में, शोक मनाने की जगह उसे खरबूजे बेचने की विवशता थी। बेटे की मृत्यु का दुःख उसके दिल को चीर रहा था, जिसके कारण वह रो रही थी।

प्रश्न 2: किस आधार पर हमारे समाज में व्यक्ति का स्तर निर्धारित किया जाता है? दुःख का अधिकार पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: हमारे समाज में व्यक्ति का स्तर मुख्यतः उसकी पोशाक के आधार पर निर्धारित किया जाता है। एक व्यक्ति की पहचान उसकी पोशाक से होती है, क्योंकि यही उसे अधिकार और दर्जा दिलाती है।

प्रश्न 3: भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
उत्तर: भगवाना शहर के पास डेढ़ बीघा जमीन पर हरी तरकारियाँ और खरबूजे उगाया करता था। वह रोज़ इन्हें सब्ज़ी-मण्डी या फुटपाथ पर बैठकर बेचता था। इस प्रकार, वह कृषि करके अपने परिवार का निर्वाह करता था।

प्रश्न 4: यशपाल जी की कहानी दुःख का अधिकार में दुख मनाने का अधिकार सबको क्यों नहीं है?
उत्तर: दुःख की अनुभूति समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा की जाती है; हालाँकि, दुःख मनाने का अधिकार सभी को नहीं है। यह विशेष अधिकार केवल सम्पन्न वर्ग को प्राप्त है, क्योंकि उनके पास शोक मनाने के लिए आवश्यक सहूलियतें और समय होता है। इसके विपरीत, गरीब वर्ग की विवशता उन्हें दुःख मनाने की सुविधा नहीं प्रदान करती। वे तो अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए रोज़ी-रोटी की उलझनों में ही जूझते रहते हैं। इस तरह, दुःख मनाने का भी एक अधिकार होता है, जो केवल कुछ लोगों के पास होता है।

प्रश्न 5: दुःख का अधिकार पाठ के आधार पर बताइए बुढ़िया के बेटे का नाम क्या था?
उत्तर: बुढ़िया के बेटे का नाम भगवाना था।

प्रश्न 6: लेखक ने बुढ़िया के दुःख का कारण किस प्रकार पता लगाया? दुःख का अधिकार पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: लेखक ने बुढ़िया के दुःख का कारण आस-पड़ोस की दुकानों से पूछकर पता लगाया था। इस प्रक्रिया में उन्होंने स्थानीय लोगों से जानकारी प्राप्त की, जिससे उन्हें बुढ़िया के दुःख की वास्तविकता का पता चला।

प्रश्न 7: भगवाना के इलाज और उसकी मृत्यु के बाद घर की आर्थिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: भगवाना के इलाज में घर का आटा और अनाज तक समाप्त हो गया था। उसकी मृत्यु के बाद, कफ़न के इंतजाम के लिए छोटे-मोटे आभूषण तक बिक गए। अब उसके घर में खाने की भी किल्लत होने लगी। इस तरह, घर की आर्थिक स्थिति बिल्कुल खराब हो गई थी।

प्रश्न 8: इस पाठ का शीर्षक दुःख का अधिकार कहाँ तक सार्थक है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पाठ का शीर्षक दुःख का अधिकार सटीक एवं सार्थक है। लेखक यह बताना चाहता है कि यद्यपि दुःख प्रकट करना हर व्यक्ति का अधिकार है, परन्तु हर कोई ऐसा कर नहीं सकता। एक ओर, सम्पन्न महिला है जो बिना किसी जिम्मेदारी के अपने दुःख का प्रदर्शन कर सकती है। उसके पास डॉक्टर, सेवा-कर्मी, साधन, धन और समय है, जिससे वह पुत्र-शोक मनाने में सक्षम है। वहीं, गरीब लोग अभागे हैं; वे चाहे तो भी शोक प्रकट करने के लिए आसानी से दो आँसू नहीं बहा सकते। उनके सामने खड़ी भूख, गरीबी और बीमारी नंगा नाच करने लगती है। इस प्रकार, दुःख प्रकट करने का अधिकार गरीबों को नहीं है, क्योंकि उनके पास इससे निपटने के लिए आवश्यक साधन नहीं होते।