01. दुःख का अधिकार – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: किसी व्यक्ति की पोशाक को देखकर हमें क्या पता चलता है?
उत्तर: 
किसी व्यक्ति की पोशाक देखकर हमें उसकी श्रेणी या वर्ग का पता चलता है।

प्रश्न 2: उस स्त्री को देखकर लेखक को कैसा लगा?
उत्तर:
 उस स्त्री को देखकर लेखक का हृदय पीड़ा से भर उठा और वह उसके दुख को जानने के लिए बेचैन हो गया।

प्रश्न 3: बुढ़िया को कोई भी उधार क्यों नहीं देता?
उत्तर:
 उस स्त्री को उधार देने वाला व्यक्ति कोई भी नहीं था क्योंकि उसके घर में कोई भी कमाने वाला अब नहीं रह गया था।

प्रश्न 4: पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है?
उत्तर:
 पोशाक हमारे लिए तब बंधन और अड़चन बन जाती है जब समाज की निचली श्रेणियों की अनुभूतियों को समझने और उनके सुख-दुखों को बांटने में हमारा सम्मान कम होने लगता है अथवा कम होने की संभावना होती है।

प्रश्न 5: भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
उत्तर:
 भगवाना शहर के पास डेढ़ बीघे जमीन पर साग-सब्जी और फल उगाता था। उसी की बिक्री से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था।

प्रश्न 6: खरबूज़े बेचने वाली स्त्री से कोई खरबूजे क्यों नहीं खरीद रहा था?
उत्तर: 
खरबूजे बेचने वाली अपने मुँह को कपड़े में छुपाकर सिर को घुटनों में रखे रो रही थी इसलिए लोग उससे खरबूजे नहीं खरीद रहे थे।

प्रश्न 7: उस स्त्री के लड़के की मृत्यु का क्या कारण था?
उत्तर: 
उस स्त्री के बेटे की मृत्यु का कारण एक साँप का डसना था। जब उस स्त्री का बेटा खरबूजे के खेत में बने हुए मेड़ पर खरबूज़े चुन रहा था, तभी किसी विषधर साँप ने उसे डस लिया था।

प्रश्न 8: मनुष्य के जीवन में पोशाक का क्या महत्व है?
उत्तर: 
पोशाक के माध्यम से मनुष्य को समाज में सम्मान के साथ ऊँचा दर्जा भी मिलता है। इस पोशाक से उसके अधिकार तय होते हैं और जीवन में आगे बढ़ने के लिए नए रास्ते भी खुल जाते हैं, किंतु कभी-कभी पोशाक लोगों की अनुभूतियों को समझने में बाधक बन दुख पहुँचाने का माध्यम भी बन जाती है।

प्रश्न 9: लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाया?
उत्तर: 
लेखक एक अच्छी पोशाक पहने हुए थे, जिससे समाज में बनाई अपनी प्रतिष्ठा के बिगड़ जाने का  डर था इसलिए उस गरीब और उपेक्षित स्त्री से चाहते हुए भी उसके रोने का कारण नहीं पूछ पाये।

प्रश्न 10: लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुढ़िया खरबूज़े बेचने क्यों चल पड़ी?
उत्तर: 
लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन वो बूढ़ी स्त्री इसलिए खरबूजे बेचने के लिए बाहर निकल पड़ी क्योंकि पुत्र की अंतिम-क्रिया में घर में बचे हुए पैसे और सारा राशन खर्च हो गया था। अब सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट था। उसकी बहू बुखार से पूरी तरह तप रही थी और बुढ़िया को अपने पोते-पोतियों के लिए भोजन जुटाना भी जरूरी था।

10. नए इलाके में… खुशबू रचते हैं हाथ… – पाठ का सार

कवि परिचय

कवि अरुण कमल का जन्म 1936 में हुआ था। वे हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में से एक माने जाते हैं। उनकी कविताओं में जीवन, संघर्ष और समाज की सच्चाइयों को उजागर किया गया है। निराला की कविताओं में खासकर संवेदनशीलता और गहरी सोच का अनुभव होता है। वे भारतीय समाज की वास्तविकताओं को चित्रित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने आम जनमानस को प्रभावित किया और समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया।

कविता का सार

‘नए इलाके में’

प्रस्तुत पाठ की पहली कविता ‘नए इलाके में’ में कवि ने एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करने का वर्णन किया है, जो एक ही दिन में पुरानी हो जाती है। इस कविता के माध्यम से कवि यह समझाना चाहते हैं कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, अर्थात कोई भी वस्तु या जीव हमेशा के लिए नहीं रहते। कवि का अक्सर यह अनुभव होता है कि वह अपना रास्ता ढूंढने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है, लेकिन हर जगह मकानों के बनने के कारण वह पीपल का पेड़ अब नहीं मिलता। कवि पुराने गिरे हुए मकान को खोजता है, लेकिन वह भी अब कहीं नहीं दिखता। कवि कहता है कि जहाँ रोज कुछ नया बन रहा हो और कुछ मिटाया जा रहा हो, वहाँ व्यक्ति अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं कर सकता। कवि के अनुसार, एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। अब सही घर खोजने का उपाय यही है कि हर दरवाजे को खटखटा कर पूछा जाए कि क्या वह सही घर है।

‘खुशबू रचते हैं हाथ’

इस पाठ की दूसरी कविता ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ में कवि ने सामाजिक विषमताओं को उजागर किया है। इस कविता में कवि ने गरीबों के जीवन पर प्रकाश डाला है। कवि कहता है कि अगरबत्ती का इस्तेमाल लगभग हर व्यक्ति करता है। कवि ने उन खुशबूदार अगरबत्ती बनाने वालों का वर्णन किया है जो खुशबू से दूर हैं। अगरबत्ती का कारखाना अक्सर किसी तंग गली में, गंदे पानी के बहाव के लिए बनाए गए रास्ते के पार और बदबूदार कूड़े के ढेर के करीब होता है। कवि ने यह भी बताया कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ अलग-अलग होते हैं; कुछ के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं, तो कुछ के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं। कवि कहता है कि दूसरों के लिए खुशबू बनाने वाले खुद कितनी कठिनाइयों का सामना करते हैं। यह विडंबना है कि खुशबू उन स्थानों पर बनाई जाती है जहाँ गंदगी होती है।

नए इलाके में कविता का भावार्थ

(1)
इन नए बसते इलाकों में
जहाँ रोज बन रहे हैं नए-नए मकान
मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ

भावार्थ: कवि कहता है कि शहर में नए मुहल्ले रोज़ ही बसते हैं। ऐसी जगहों पर रोज नये-नये मकान बनते हैं। रोज-रोज नये बनते मकानों के कारण कोई भी व्यक्ति ऐसे इलाके में रास्ता भूल सकता है। कवि को भी यही परेशानी होती है। वह भी इन मकानों के बीच अपना रास्ता हमेशा भूल जाता है।

(2)
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढ़हा हुआ घर
और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंजिला

भावार्थ: कवि कहता है कि जो पुराने निशान हैं वे धोखा दे जाते हैं क्योंकि कुछ पुराने निशान तो सदा के लिए मिट जाते हैं। कवि के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह अपना रास्ता ढूँढ़ने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है परन्तु हर जगह मकानों के बनने के कारण उस पीपल के पेड़ को काट दिया गया है।फिर कवि पुराने गिरे हुए मकान को ढूँढ़ता है परन्तु वह भी उसे अब कही नहीं दिखता। कवि कहता है कि पहले तो उसे घर का रास्ता ढूँढ़ने के लिए जमीन के खाली टुकड़े के पास से बाएँ मुड़ना पड़ता था और उसके बाद दो मकानों के बाद बिना रंगवाले लोहे के दरवाजे वाले इकमंजिले मकान में जाना होता था। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि को अब बहुत से मकानों के बन जाने से घर का रास्ता ढूँढ़ने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

(3)
और मैं हर बार एक घर पीछे
चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता
यहाँ रोज कुछ बन रहा है
रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं

भावार्थ: कवि कहता है कि अपने घर जाते हुए वह हर बार या तो अपने घर से एक घर पीछे ठहर जाता है या डगमगाते हुए अपने घर से दो घर आगे ही बढ़ जाता है। कवि कहता है जहाँ पर रोज ही कुछ नया बन रहा हो और कुछ मिटाया जा रहा हो, वहाँ पर अपने घर का रास्ता ढ़ूँढ़ने के लिए आप अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं कर सकते।

(4)
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ
अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ
और पूछो – क्या यही है वो घर?
समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढ़हा आ रहा अकास
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर।

भावार्थ: कवि कहता है कि एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। ऐसा लगता है जैसे महीनों बाद लौटा हूँ। ऐसा लगता है जैसे घर से बसंत ऋतु में बाहर गया था और पतझड़ ऋतु में लौट कर आया हूँ।
जैसे बैसाख ऋतु में गया और भादों में लौटा हो। कवि कहता है कि अब सही घर ढ़ूँढ़ने का एक ही उपाय है कि हर दरवाजे को खटखटा कर पूछो कि क्या वह सही घर है। कवि कहता है कि उसके पास अपना घर ढूँढ़ने लिए बहुत कम समय है क्योंकि अब तो आसमान से बारिश भी आने वाली है और कवि को उम्मीद है कि कोई परिचित उसे देख लेगा और आवाज लगाकर उसे उसके घर ले जाएगा।

खुशबू रचते हैं हाथ कविता का भावार्थ

(1)
नई गलियों के बीच
कई नालों के पार
कूड़े करकट
के ढ़ेरों के बाद
बदबू से फटते जाते इस
टोले के अंदर
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ!

भावार्थ: कवि कहता है कि अगरबत्ती का इस्तेमाल लगभग हर व्यक्ति करता है। अगरबत्ती हालाँकि पूजा पाठ में इस्तेमाल होती है लेकिन इसकी खुशबू ही शायद वह वजह होती है कि लोग इसे प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं।
इस कविता में कवि ने उन खुशबूदार अगरबत्ती बनाने वालों के बारे में बताया है जो खुशबू से कोसों दूर है। ऐसा कवि ने इसलिए कहा है क्योंकि अगरबत्ती का कारखाना अकसर किसी तंग गली में, घरों और सड़कों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाए गए रास्ते के पार और बदबूदार कूड़े के ढेर के समीप होता है। ऐसे स्थानों पर कई कारीगर अपने हाथों से अगरबत्ती को बनाते हैं।

(2)
उभरी नसोंवाले हाथ
घिसे नाखूनोंवाले हाथ
पीपल के पत्ते से नए नए हाथ
जूही की डाल से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे पिटे हाथ
जख्म से फटे हुए हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ!

भावार्थ: कवि कहता है कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ विभिन्न प्रकार के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं। कवि कहता है कि दूसरों के लिए खुशबू बनाने वाले खुद न जाने कितनी और कैसी तकलीफों का सामना करते हैं।

शब्दावली

  • इलाका: क्षेत्र
  • अकसर: प्रायः 
  • ताकतादेखता
  • ढहागिरा हुआ 
  • ठकमकाताडगमगाते हुए
  • स्मॄतियाद 
  • वसंतएक ऋतु
  • पतझडएक ऋतु जिसमें पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं
  • वैसाखचैत के बाद आने वाला महीना
  • भादोंसावन के बाद आने वाला महीना
  • अकासगगन
  • कूड़ा-करकटरद्दी या कचरा
  • टोलेछोटी बस्ती
  • जख्मघाव
  • मुल्कदेश 
  • खसपोस्ता
  • रातरानीएक सुगंधित फूल
  • मशहूरप्रसिद्ध

09. अग्नि पथ – पाठ का सार

कविता का सार

प्रस्तुत कविता में कवि ने संघर्षमय जीवन को ‘अग्नि पथ’ कहते हुए मनुष्य को यह संदेश दिया है कि राह में सुख रूपी छाँह की चाह न कर अपनी मंजिल की ओर कर्मठतापूर्वक बिना थकान महसूस किए बढते ही जाना चाहिए। कवि कहते हैं कि जीवन संघर्षपूर्ण है। जीवन का रास्ता कठिनाइयों से भरा हुआ है। परन्तु हमें अपना रास्ता खुद तय करना है। किसी भी परिस्थिति में हमें दूसरों का सहारा नही लेना है। हमें कष्ट-मुसीबतों पर जीत पाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करना है।

कवि परिचय

हरिवंश राय बच्चन – इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में 27 नवंबर 1907 को हुआ। बच्चन कुछ समय तक विश्वविधालय में प्राध्यापक रहने के बाद भारतीय विदेश सेवा में चले गए थे। इस दौरान इन्होने कई देशों का भम्रण किया और मंच पर ओजस्वी वाणी में काव्यपाठ के लिए विख्यात हुए। बच्चन की कविताएँ सहज और संवेदनशील हैं। इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना और जीवन दर्शन के स्वर मिलते हैं।

प्रमुख कार्य
कविता संग्रह – मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, मिलन यामिनी, आरती और अंगारे, टूटती चटानें, रूप तरंगिणी।
आत्मकथा के चार खंड – क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. अग्निपथ – कठिनाइयों से भरा हुआ मार्ग।
  2. पत्र – पत्ता
  3. शपथ – कसम
  4. अश्रु – आंसू
  5. स्वेद – पसीना
  6.  रक्त – खून
  7. लथपथ – सना हुआ।

08. गीत – अगीत – पाठ का सार

गीत अगीत कविता का अर्थ व्याख्या

गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कहती जाती है।
तट पर एक गुलाब सोचता
“देते स्वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।“

गा-गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ गीत-अगीत कविता से उद्धृत हैं, जो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि नदी दुःखी होकर विरह या दुःख का गीत गाते हुए तेज गती से निरन्तर बहती जा रही है तथा अपना दुःख से भारी दिल हलका करने के लिए किनारों या उपलों से कुछ कहती जा रही है। तत्पश्चात्, इसी बीच किनारों पर खिला एक गुलाब के मन में भाव जागता है और वह सोचता है कि यदि भगवान ने मुझे भी स्वर दिया होता तो मैं भी अपने पतझड़ के सपनों का गीत सारे जग को सुनाता। बहते हुए झरने गीत गा-गाकर निरन्तर बह रही है, और गुलाब किनारों या तट पर शान्त खड़ा है। आगे कवि कह रहे हैं कि गीत, अगीत, कौन सुंदर है ? अर्थात् मेरे गीत सुन्दर हैं या प्रकृति के यह अद्भुत ना बोलने वाले अगीत अधिक सुंदर हैं।


(2) बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो खोंते को छाया देती।
पंख फुला नीचे खोंते में
शुकी बैठ अंडे है सेती।
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर।
किंतु, शुकी के गीत उमड़कर
रह जाते सनेह में सनकर।

गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फूला मग्न शुकी का पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ गीत अगीत कविता से उद्धृत हैं, जो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि शुक यानी तोता एक घनी डाल पर बैठा है, जो डाल तोते के घोंसले को छाया देती है तथा उसी डाल में नीचे के घोंसले में उस तोते की पत्नी शुकी पंख फैलाकर अपने अंडों को सेती है। जब सुनहरे सूर्य की किरणें पत्तों से पार होकर तोते के पंखो को छूती है, तो तोता बेशुद्ध होकर गीत गाने लगता है, साथ में उसकी पत्नी शुकी भी गाना चाहती है, किन्तु पत्नी के गीत पति के प्रेम के बंधन में ही बंध कर रह जाती है | तोता यानी शुक का स्वर वन में गूंजता देख उसकी पत्नी शुकी फुले नहीं समा रही है, वह अत्यंत हर्षित है | आगे कवि कह रहे हैं कि ये सब विचार करने वाली बात है कि कवि के गीत सुन्दर हैं या प्रकृति के न बोल पाने वाले अगीत सुन्दर हैं।


(3)  दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्हा गाता है,
पहला स्वर उसकी राधा को
घर से यहीं खींच लाता है।
चोरी-चोरी छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है।

वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है।
गीत, अगीत कौन सुंदर है?
भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ गीत अगीत कविता से उद्धृत हैं, जो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि यहाँ दो प्रेमी रहते हैं, जब एक प्रेमी संध्या के वक़्त आल्हा (एक प्रकार की गीत) गाता है, तो गीत का पहला स्वर उसकी प्रेमिका रूपी राधा को सीधे घर से खिंच लाता है | वह चोरी से छुपकर अपने प्रीतम का गीत सुनती है | प्रेमिका मन में सोचने लगती है कि मैं भी इस गीत का हिस्सा क्यों नही हूँ | ये सब देखकर कवि विचार करते हैं कि मेरा गीत सुन्दर है या ये प्रकृति का अगीत सुन्दर है | 


गीत अगीत कविता पाठ का सारांश 

प्रस्तुत पाठ गीत-अगीत लेखक रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इस पाठ में कवि ने प्रकृति का सजीव चित्रण किया है | यह पूरा पाठ प्रकृति में उपस्थित नदी, झरने, पुष्प, पशु-पक्षी, वन और प्रेमी-प्रेमिका के कुछ कहने और मौन रहने दोनों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष वर्णन  किया गया है।
कवि को नदी के बहाव में गीत का सृजन होता जान पड़ता है | नदी के विरह के गीत गाते हुए बहना, गुलाब का तट पर मौन खड़े होकर भगवान से आवाज़ होने पर अपने सपनों का बखान करना, शुक-शुकी के प्रेम के गीत में पूरे वन में गूंज जाना। प्रेमी के गीत को सुनकर प्रेमिका का मन में सोचना की वह भी इस गीत का हिस्सा क्यों नहीं है। यह सब देखकर कवि को दुविधा बस इतनी होती है कि उनका गीत सुन्दर है या ये प्रकृति का मौन अगीत सुन्दर है…|| 


जीवन परिचय

प्रस्तुत पाठ के रचयिता रामधारी सिंह दिनकर जी हैं। इनका जन्म 30 सितम्बर 1908 को बिहार में मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव मे हुआ था। दिनकर जी सन् 1952 में राज्य सभा के सदस्य मनोनीत किये गए थे, भारत सरकार ने दिनकर जी को ‘पद्मभूषण’ सम्मान  से अलंकृत किया था। इनको  “संस्कृति की चार अध्याय” पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं काव्यकृति “उर्वशी” के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दिनकर जी की लेखनी अत्यंत सरल, ओजस्वी, प्रवाहपूर्ण है , इन्हें ओज के कवि के रूप में जाना जाता है, ये हमेशा युग एवं देश के प्रति सजग रहे है,  इनके विचार और संवेदना का अनोखा समन्वय प्राप्त होता है। दिनकर जी की रचनाओं में प्रेम और सुंदरता का भी अनूठा चित्रण मिलता है। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, हुँकार, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, और संस्कृति के चार अध्याय…||

07. दोहे – पाठ का सार

रहीम के नीतिपरक दोहे

इस पाठ में रहीम के ग्यारह नीतिपरक दोहे संकलित हैं। ये दोहे जहाँ एक ओर पाठक वर्ग को दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए – इसकी सीख देते हैं, वहीं सभी मनुष्यों को करणीयअकरणीय आचरण का ज्ञान भी कराते हैं।पहले चार दोहे

  • पहले दोहे में कवि ने प्रेम रूपी धागे को तोड़ने से मना किया है, क्योंकि आपसी प्रेम-संबंध में एक बार दरार पड़ने पर वह पहले जैसा नहीं रहता।
  • दूसरे दोहे में बताया गया है कि अपने मन की वेदना या कष्ट को अपने मन में ही छिपाकर रखना चाहिए, जो कि संयम की शिक्षा है।
  • तीसरे दोहे में कवि कहते हैं कि जिस प्रकार वृक्ष के मूल जड़ को सींचने से वृक्ष में फल-फूल स्वयं उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार इस सृष्टि के मूल परमात्मा की साधना करने से इस संसार की सभी कामनाएँ स्वतः पूरी हो जाती हैं।
  • चौथे दोहे में कहा गया है कि विपत्ति आने पर मनुष्य शांति प्रदान करने वाले स्थान में चला जाता है।

पाँचवे से ग्यारहवें दोहे

  • पाँचवे दोहे में दोहा छंद की विशेषता का वर्णन हुआ है।
  • छठे दोहे में रहीम बताते हैं कि कीचड़ का पानी भी धन्य है, क्योंकि इससे न जाने कितने छोटे-छोटे प्राणी अपनी प्यास बुझाते हैं।
  • इसके विपरीत, विशाल जल का भंडार होकर भी सागर किसी की प्यास नहीं बुझा सकता।
  • सातवें दोहे में कवि ने कहा है कि संगीत की सुर-लहरी पर मुग्ध होकर मृग अपने प्राण तक न्यौछावर कर देता है, किंतु मनुष्य यदि किसी की कला पर मोहित होकर कुछ दान नहीं करता तो वह पशु से भी अधम है।
  • आठवें दोहे में कवि ने कहा है कि कोई बात यदि एक बार बिगड़ जाए, तो लाख प्रयत्न करने पर भी वह बात बनती नहीं है, जैसे दूध फट जाने पर मक्खन नहीं निकलता।
  • नवें दोहे में कवि ने कहा है कि प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व होता है। बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
  • दसवें दोहे में अपनी निजी संपत्ति का महत्व बताया गया है।
  • ग्यारहवें दोहे में कवि ने पानी की महत्ता को विभिन्न संदर्भों में स्थापित किया है।

06. रैदास – पाठ का सार

कवि परिचय

कवि रैदास का मूल नाम संत रविदास था, परन्तु इन्हें ख्याति ‘रैदास’ के नाम से हासिल हुई। ऐसी मान्यता है कि कवि रैदास का जन्म 1388 और निर्वाण 1518 में बनारस में ही हुआ | इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था | मध्ययुगीन साधकों में कवि रैदास का विशिष्ट स्थान है | मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का तनिक भी विश्वास नहीं था | वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म माना करते थे | 
संत कवि रैदास की रचनाओं में सरल और व्यवहारिक ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है, जिसमें, राजस्थानी, अवधि, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी शब्दों का भी मिश्रण है | उल्लेखनीय है कि कवि रैदास के 40 पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में भी सम्मिलित हैं |

कविता का सारांश

इस कविता में रैदास जी ने भगवान के प्रति भक्ति की अत्यंत गहरी भावना को व्यक्त किया है। पहले पद में रैदास जी बताते हैं कि जब भक्त पर भगवान की भक्ति का रंग चढ़ जाता है, तो वह भगवान के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। वे उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं कि जैसे चंदन की सुगंध पानी में समा जाती है, वैसे ही भगवान की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समा जाती है। दूसरे पद में रैदास जी भगवान की महिमा का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि भगवान गरीबों और दुःखी जनों के उद्धारकर्ता हैं। वे जात-पात का अंत करने की शक्ति रखते हैं और सबको एक समान दृष्टि से देखते हैं।

मुख्य विषय

इस कविता का मुख्य विषय भगवान की भक्ति और भक्त का भगवान के प्रति समर्पण है। रैदास जी ने यह व्यक्त किया है कि जब भगवान की भक्ति भक्त के हृदय में समा जाती है, तो भक्त को भगवान से अलग करना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, रैदास जी भगवान के साकार रूप, उनके गुणों और उनकी शक्ति का बखान करते हैं, यह बताते हुए कि भगवान सबकी मदद कर सकते हैं और किसी को भी उद्धार दे सकते हैं।

कविता का भावार्थ

(1)
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी , जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा , जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती , जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा , जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा , ऐसी भक्ति करै रैदासा।

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियाँ संत कवि रैदास जी द्वारा रचित कविता या पदों से उद्धृत की गई हैं। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से अपने आराध्य (ईश्वर) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि प्रभु! हमारे मन में जो आपके नाम की रट लगी हुई है, वह कैसे छूटेगी? जिस प्रकार चंदन पानी के संपर्क में आते ही अपनी सुगंध पानी में बिखेर देता है, ठीक उसी प्रकार मेरे तन-मन में आपके प्रेम रूपी सुगंध प्रवाहित हो रही है। कवि अपने आराध्य से कहते हैं कि बेशक आप आसमान में छाए काले बादल के समान हैं और मैं वन में नाचने वाला मोर हूँ। जिस तरह बारिश के दिनों में घुमड़ते बादलों को देखकर मोर खुशी से नाच उठता है, ठीक उसी प्रकार मैं आपके दर्शन पाकर खुशी से फूला नहीं समाता। जिस प्रकार चकोर पक्षी सदा अपने चंद्रमा की ओर निहारता रहता है, ठीक उसी प्रकार मैं भी हमेशा आपके प्रेम और दर्शन की लालसा रखता हूँ। कवि अपने आराध्य (ईश्वर) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आप दीपक हैं और मैं उसकी बाती, जो दिन-रात आपके प्रेम में जलती रहती है। आप मोती हैं और मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ। हमारा मिलन मानो सोने पे सुहागा है। अंतिम पंक्ति में कवि रैदास अपने आराध्य से कहते हैं कि आप मेरे स्वामी हैं और मैं आपका दास मात्र हूँ।

(2)
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढ़रै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियाँ संत कवि रैदास जी द्वारा रचित कविता या पदों से उद्धृत की गई हैं। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से अपने आराध्य (ईश्वर) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! केवल आप ही हैं जो दिन-दुखियों पर कृपा-दृष्टि रखने वाले हैं। आपके सिवा इस संसार में और कौन कृपालु हो सकता है? कवि कहते हैं कि आप ही वह महान ईश्वर हैं जिन्होंने मुझ जैसे अछूत और नीच व्यक्ति के माथे पर भी राजाओं जैसा छत्र रख दिया। आपकी कृपा से ही यह संभव हुआ। वे आगे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि आपकी दया से नामदेव, कबीर जैसे जुलाहे, त्रिलोचन जैसे साधारण व्यक्ति, सधना जैसे कसाई और सैन जैसे नाई भी संसार के बंधनों से मुक्त हो गए और उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। अंतिम पंक्ति में कवि रैदास सभी संतों से कहते हैं कि हे संतजन! सुनो, हरि जी सब कुछ करने में सक्षम और समर्थ हैं। उनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है।

शब्दावली

  • बास: गंध
  • घन: बादल 
  • चितवत: देखना 
  • चकोर: तीतर की जाति का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है।
  • बरै: बढ़ाना या जलना 
  • सुहागा: सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में आने वाला क्षार द्रव्य 
  • लाल: स्वामी 
  • ग़रीब निवाजु: दीन-दुखियों पर दया करने वाला 
  • माथै छत्रु धरै: मस्तक पर स्वामी होने का मुकुट धारन करता है 
  • छोति: छुआछूत 
  • जगत कौ लागै: संसार के लोगों को लगती है 
  • हरिजीऊ: हरि जी से 
  • नामदेव: महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध संत 
  • तिलोचनु: एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य जो ज्ञानदेव और नामदेव के गुरु थे।
  • सधना: एक उच्च कोटि के संत जो नामदेव के समकालीन माने जाते हैं। 
  • सैनु: रामानंद का समकालीन संत।
  • हरिजीउ: हरि जी से
  • सभै सरै: सबकुछ संभव हो जाता है

05. शुक्र तारे के सामान – पाठ का सार

पाठ का सार

आकाश में शुक्रतारे का कोई जोड़ नहीं है। शुक्र को चंद्र का साथी माना जाता है। उसकी आभा-प्रभा बेजोड़ मानी जाती है लेकिन इसके आकाश में ठहरने का समय काफी अल्प होता है। भारत की राजनीति अथवा स्वतंत्राता आंदोलन के क्षेत्रा में शुक्रतारे की भाँति अपनी चमक दिखाने वाले व्यक्तित्व का नाम था महादेव भाई देसाई। महादेव भाई देसाई का गांधी जी से संर्पक सन 1917 में हुआ। इनकी इतनी ख्याति फैली कि देश के कोने-कोने में इनके गुणों की चर्चा होने लगी।

महादेव देसाई को संक्षेप में एम. डी. कहा जाने लगा। गांधी की प्रेम की छाँव में रहने के कारण एक दिन ऐसा भी आया कि एम.डी. सबके लाड़ले बन गए। भारत में उनके अक्षरों का कोई सानी नहीं था। वाइसराय के नाम जाने वाले गांधी जी के पत्रा हमेशा महादेव भाई देसाई की लिखावट में ही जाते थे। उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय लंबी साँस-उसाँस लेते रहते थे। बड़े-बड़े सिविलियन और गवर्नर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखनेवाला खोजने पर भी नहीं मिलता। उनका शुद्ध और सुंदर लेखन पढ़ने वाले को मंत्रा-मुग्ध कर देता था। लेखक कहते हैं “प्रथम-श्रेणी की शिष्ट, संस्कार-संपन्न भाषा और मनोहारी लेखन-शैली की ईश्वरीय देन महादेव जी को मिली थी।”

महादेव भाई देसाई का आदर्श जीवन हमारे लिए अनुकरणीय है। लेखक ने महादेव भाई देसाई के व्यक्तित्व को शब्दबद्ध कर कहा है उनकी निर्मल प्रतिभा उनके संपर्वफ में आने वाले व्यक्ति को चंद्र-शुक्र की प्रभा के साथ दूधों नहला देती थी। उसमें सराबोर होने वाले के मन में उनकी इस मोहिनी का नशा कई-कई दिन तक उतरता न था। महादेव का समूचा जीवन और उनके सारे कामकाज गांधी जी के साथ एक रूप होकर इस तरह गुँथ गए थे कि गांधी जी से अलग करके अकेले उनकी कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती। यह पाठ एक ऐसे व्यक्ति के जीवन-परिचय के लिए तैयार किया गया है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण होते हुए भी गुमनाम रहा, अतः ऐसे चरित्रा को सर्वसमक्ष उजागर करने की अपेक्षा को लेखक ने निश्चित रूप से पूरा किया है।

लेखक परिचय

स्वामी आनंद
इनका जन्म गुजरात के कठियावाड़ जिले के किमड़ी गाँव में सन 1887 को हुआ। इनका मूल नाम हिम्मतलाल था। जब ये दस साल के थे तभी कुछ साधु इन्हें अपने साथ हिमालय की ओर ले गए और इनका नामकरण किया – स्वामी आनंद। १९०७ में स्वामी आनंद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1917 में गाँधे जी के संसर्ग में आने के बाद उन्हीं के निदेशन में ‘ नवजीवन’ और ‘ यंग इंडिया ’ के प्रसार व्यवस्था संभाल ली। इसी बहाने उन्हें गाँधी जी और उनके निजी सहयोगी महादेव भाई देसाई और बाद में प्यारेलाल जी को निकट से जानने का अवसर मिला।

कठिन शब्दों के अर्थ

  • नक्षत्र-मंडल – तारा समूह
  • कलगी रूप – तेज़ चमकने वाला तारा 
  • हम्माल – कुली 
  • पीर – महात्मा
  • बावर्ची – रसोइया 
  • भिश्ती – मसक से पानी ढोने वाला व्यक्ति 
  • खर – गधा
  • आसेतुहिमाचल – सेतुबंध रामेश्वर से हिमाचल तक विस्तीर्ण
  • ब्योरा – विवरण
  • रूबरू – आमने-सामने 
  • धुरंधर – प्रवीण
  • कट्टर – दॄढ़ 
  • चौकसाई – नजर रखना
  • पेशा – व्यवसाय 
  • स्याह – काला
  • सल्तनत – राज्य 
  • अद्यतन – अब तक का
  • गाद – तलछट 
  • सानी – उसी जोड़ का दूसरा
  • अनायास – बिना किसी प्रयास के

04. वैज्ञानिक चेतना के वाहक : चन्द्र शेखर वेंकटरमन – पाठ का सार

पाठ का सार

भारत के महान वैज्ञानिक डाॅ. रामन् के विषय में सबसे पहले सन् 1921 की बात सामने आती है, जब वे एक समुद्री यात्रा पर थे और समुद्र का पानी नीला क्यों होता है, इसकी खोज कर बैठे। यह काम पूरा करते ही रामन् विश्वविख्यात हो गए। 7 नवंबर सन् 1888 में जन्मे रामन् गणित और भौतिकी विषयों के कारण जगत-प्रसिद्ध हुए, जिसका श्रेय उनके पिता को जाता है। रामन् का मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने काॅलेज के जमाने से ही उन्होंने शोध कार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था।

उनका पहला शोधपत्रा फिलाॅसाॅफिकल मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ था। रामन् सर्वप्रथम भारत सरकार के वित्त-विभाग में अफसर बने। उनका कार्यक्षेत्रा कलकत्ता (कोलकाता) रहा। नौकरी करते हुए उन्होंने कलकत्ता की प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था ‘इंडियन एसोसिएशन फाॅर द कल्टीवेशन आॅफ साइंस’ के जरिए शोधकार्य चालू रखा। इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना था। रामन् ने सरकारी नौकरी छोड़कर विश्वविद्यालय में भी नौकरी की। रामन् की खोज भौतिकी के क्षेत्रा में एक क्रांति के समान थी। इसका पहला परिणाम तो यह हुआ कि प्रकाश की प्रकृति के बारे में आइंस्टाइन के विचारों का प्रायोगिक प्रमाण मिल गया। रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज हो

गया। पहले इस काम के लिए इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाता था। यह मुश्किल तकनीक है और इसमें गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थ की आणविक और परमाणविक संरचना के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। रामन् प्रभाव की खोज ने उनको विश्व की चोटी के वैज्ञानिकों की पंक्ति में ला खड़ा किया।

भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अक्षुण्ण रखा। रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र-लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति समर्पित थे। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने ‘करेंट साइंस’ नामक एक पत्रिका का भी संपादन किया।

रामन् वज्ञैानिक चेतना की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने प्रकाश की किरणों की आभा के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी चीज़ें हैं जो अपने पात्रा की तलाश में हैं। शरूरत है, रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और
प्रकृति के बीच छिपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने की।

लेखक परिचय  

धीरंजन मालवे

इनका जन्म बिहार के नालंदा जिले के डुंवरावाँ गाँव में 9 मार्च 1952 को हुआ। ये एम.एससी (सांख्यिकी), एम. बी.ए और एल.एल.बी हैं। वे आज भी वैज्ञानिक जानकारी को आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। मालवे ने कई भरतीय वैज्ञानिकों की संक्षिप्त जीवनियाँ लिखी हैं, जो इनकी पुस्तक ‘विश्व-विख्यात भारतीय वैज्ञानिक’ पुस्तक में समाहित हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. आभा – चमक
  2. जिज्ञासा – जानने के इच्छा
  3. हासिल – प्राप्त
  4. अयिशयोक्ति – किसी बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहना 
  5. रूझान – झुकाव
  6. असंख्य – अनगिनत
  7. उपकरण – साधन
  8. सृजित – रचा हुआ
  9. समक्ष – सामने 
  10. अध्यापन – पढ़ाना
  11. परिणति – परिणाम 
  12. ऊर्जा – शक्ति
  13. फोटॉन – प्रकाश का अंश
  14. नील वर्णीय – नीले रंग का
  15. ठोस रवे – बिल्लौर 
  16. एकवर्णीय – एक रंग का
  17. समृद्ध – उन्नतशील 
  18. भ्रांति – संदेह

प्रश्न उत्तर

03. तुम कब जाओगे, अतिथि – पाठ का सार

पाठ का सार

लेखक के घर एक अतिथि आए। अतिथि के सत्कार में लेखक और उनकी पत्नी की ओर से कोई कमी नहीं की गई। इस उम्मीद से कि अतिथि आते ही हैं शीघ्र जाने के लिए। लेकिन अतिथि जा नहीं रहे हैं। लेखक को अब शंका हो रही है कि अतिथि न जाने कितने दिन ठहरेंगे। लेखक अतिथि के कुछ दिन टिकने और स्थायी होने की आशंका से डर ही रहे थे कि अतिथि ने और अधिक ठहरने का संकेत दिया। अतिथि ने कपड़े गंदे होने की बात कही और उसकी धुलाई के लिए धोबी की चर्चा की। लेखक तिलमिला तेा गए लेकिन लाण्ड्री से कपडे़ धुलाकर घर ला देना उचित समझा। लेकिन अब भी अतिथि चले जाएँगे, इसकी कोई गारंटी न थी। लेखक आरै उनकी पत्नी अतिथि से परेशान हो चुके थे।


कल तक जिस अतिथि के प्रति यह भाव था कि अतिथि देवतुल्य होते हैं, अब यह स्थिति हो गई वही कि अतिथि राक्षस प्रतीत होने लगे। इस व्यंग्य के माध्यय से लेखक ने आज के अतिथियों की निर्लज्जता को स्पष्ट किया है। प्रतिष्ठा माँगने से नहीं मिलती बल्कि जब प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसा आचरण किया जाता है तब उस व्यवहार से मुग्ध होकर अन्य लोग स्वयं ही उस व्यक्ति को प्रतिष्ठा देते हैं।

लेखक ने यह भी दिखाया है कि अल्प अवधि तक के अतिथि शानदार आतिथ्य के भागीदार होते हैं, लेकिन दीर्घकाल तक आतिथ्य का सुख-भोग करने का जिनका इरादा होता है वैसे अतिथि मेजबान के द्वारा अपमानित भी होते हैं। लेखक ने एक और बात स्पष्ट कर दी है कि दूसरों के घर में रहकर सत्कार पाना सबको अच्छा लगता है। इसका यह अर्थ नहीं कि सभी अपना घर छोड़कर दूसरे के घर ही रहना आरम्भ कर दें। 

लेखक ने यह भी बताया है कि इज्जत मिलने का यह मतलब नहीं कि इज्जत जहाँ मिले, वहाँ और सिर चढ़ जाए। इज्जत माँगने से नहीं मिलती है। अगर अतिथि बिना माँगे इज्जत चाहते हैं तो उन्हें यह सावधानी बरतनी होगी कि अल्प समय में ही किसी का दरवाशा छोड़ दें । अतिथि द्वारा फूहड़ आचरण किए जाने का दुष्परिणाम एक दिन यह भी हो सकता है कि मेज़बान द्वारा उन्हें ‘गेट आउट’ भी कह दिया जा सकता है। यह व्यंग्य-रचना सही मायने में मेहमान और मेज़बान की संयुक्त आचार संहिता है।

लेखक परिचय

शरद जोशी

इनका जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में 21 मई 1931 को हुआ। इनका बचपन कई शहरों में बिता। कुछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे फिर इन्होने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इन्होंने व्यंग्य लेख , व्यंग्य उपन्यास , व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। सन  1991 में इनका देहांत हो गया।

प्रमुख कार्य

  •  व्यंग्य-कृतियाँ – परिक्रमा , किसी महाने , जीप पर सवार इल्लियाँ , तिलस्म , रहा किनारे बैठ , दूसरी सतह , प्रतिदिन।
  • व्यंग्य नाटक: अंधों का हाथी और एक था गधा।
  • उपन्यास – मैं,मैं,केवल मैं, उर्फ़ कमलमुख बी.ए.।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. निस्संकोच – बिना संकोच के
  2. सतत – लगातार
  3. आतिथ्य – आवभगत
  4. अंतरंग – घनिष्ठ या गहरा
  5. छोर – किनारा 
  6. आघात – चोट 
  7. मार्मिक – हृदय को छूने वाला
  8. भावभीनी – प्रेम से ओतप्रोत 
  9. अप्रत्याशित – आकस्मिक
  10. सामीप्य – निकटता
  11. कोनलों – कोनों से 
  12. ऊष्मा – गरमी 
  13. संक्रमण – एक स्थिति या अवस्था से दूसरी में प्रवेश 
  14. निर्मूल – मूल रहित 
  15. सौहार्द – मैत्री 
  16. गुँजायमान – गूँजता हुआ 
  17. एस्ट्रॉनाट्‍स – अंतरिक्ष यात्री

प्रश्न उत्तर

01. दुःख का अधिकार – पाठ का सार

लेखक परिचय

इस पाठ के लेखक यशपाल जी है। इनका जन्म फ़िरोज़पुर छावनी में सन 1903 में हुआ। इन्होंने आरंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूल में और उच्च शिक्षा लाहौर में पाई। वे विद्यार्थी काल से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए थे। अमर शहीद भगत सिंह आदि के साथ मिलकर इन्होंने भारतीय आंदोलन में भाग लिया। सन 1976 में इनका देहांत हो गया। इस पाठ में लेखक समाज में होने वाले उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के भेदभाव को दर्शा रहा है। यहाँ लेखक अपने एक अनुभव को साँझा करते हुए कहता है कि दुःख मनाने का अधिकार सभी को होता है फिर चाहे वह समाज के किसी भी वर्ग का हो।

पाठ का सार

लेखक ने कहा है कि मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्राय: पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्ज़ा निश्चित करती है। हम जब झुककर निचली श्रेणियों की अनुभूति को समझना चाहते हैं तो यह पोशाक ही बंधन और अड़चन बन जाती है।

बाज़ार में खरबूजे बेचने आई एक औरत कपड़े में मुँह छिपाए सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रो रही थी। पड़ोस के लोग उसे घृणा की नज़रों से देखते हैं और उसे बुरा-भला कहते हैं। पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर पता चलता है कि उसका तेईस बरस का लड़का परसों सुबह साँप के डसने से मर गया था। जो कुछ घर में था , सब उसे विदा करने में चला गया था। घर में उसकी बहू और पोते भूख से बिल-बिला रहे थे। इसलिए वह बेबस होकर खरबूज़े बेचने आई थी ताकि उन्हें कुछ खिला सके ; परंतु सब उसकी निंदा कर रहे थे , इसलिए वह रो रही थी।

लेखक उसके दुख की तुलना अपने पड़ोस की एक संभ्रांत महिला के दुख से करने लगता है, जिसके दुख से शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र-शोक से द्रवित हो उठे थे। लेखक सोचता चला जा रहा था कि शोक करने, ग़म मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और दु:खी होने का भी एक अधिकार होता है।

संदेश 

गद्य लेखन का मुख्य उद्देश्य भाषा को प्रभावपूर्ण और संप्रेषणीय बनाना है। लेखक अपनी रचनाओं में विविध भाषा प्रयोगों का उपयोग करके इसे सजीव और रोचक बनाता है। गद्य पाठों का पठन-पाठन विद्यार्थियों की लिखित और मौखिक अभिव्यक्ति को बेहतर बनाता है और उन्हें हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न करता है।

कठिन शब्दों के अर्थ

  • अनुभूति – एहसास
  • अधेड़ – ढलती उम्र का 
  • व्यथा – पीड़ा
  • व्यवधान – रुकावत
  • बेहया – बेशर्म
  • नीयत – इरादा
  • बरकत – वृद्धि
  • ख़सम – पति 
  • लुगाई – पत्नी
  • सूतक – छूत
  • कछियारी – खेतों में तरकारियाँ बोना
  • निर्वाह – गुज़ारा
  • मेड़ – खेत के चारों ओर मिट्टी का घेरा
  • तरावत – गीलापन
  • ओझा – झाड़-फूँक करने वाला 
  • छन्नी-ककना – मामूली गहना
  • सहूलियत – सुविधा