03. टोपी शुक्ला- अध्याय समाधान

बोध प्रश्न 

प्रश्न 1: इफ़्फ़न टोपी शुक्ला की कहानी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा किस तरह से है?
उत्तर: इफ़्फ़न और टोपी शुक्ला दोनों गहरे दोस्त थे। एक दूसरे के बिना अधूरे थे परन्तु दोनों की आत्मा में प्यार की प्यास थी। इफ़्फ़न तो अपने मन की बात दादी को या टोपी को कह कर हल्का कर लेता था परन्तु टोपी के लिए इफ़्फ़न और उसकी दादी के अलावा कोई नहीं था। अत इफ़्फ़न वास्तव में टोपी की कहानी का अटूट हिस्सा है।

प्रश्न 2: इफ़्फ़न की दादी अपने पीहर क्यों जाना चाहती थीं?
उत्तर: इफ़्फ़न की दादी मौलवी की बेटी न होकर ज़मीदार की बेटी थी। वह वहाँ दूध, घी, दही खाती थी। लखनऊ आकर वह इसके लिए तरस गई क्योंकि यहाँ मौलविन बन कर रहना पड़ता था। इसलिए उन्हें पीहर जाना अच्छा लगता था।

प्रश्न 3: इफ़्फ़न की दादी अपने बेटे की शादी में गाने-बजाने की इच्छा पूरी क्यों नहीं कर पाई?
उत्तर: दादी का विवाह मौलवी परिवार में हुआ था जहाँ गाना बजाना पसंद नहीं किया जाता था। इसलिए बेचारी दिल मसोस कर रह गईं।

प्रश्न 4: “अम्मी” शब्द पर टोपी के घरवालों की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: “अम्मी” शब्द को सुनते ही सबकी नज़रें टोपी पर पड़ गई। क्योंकि यह उर्दू का शब्द था और टोपी हिंदू था। इस शब्द को सुनकर जैसे परम्पराओं की दीवारें डोलने लगीं। घर में सभी हौरान थे। माँ ने डाँटा, दादी गरजी और टोपी की जमकर पिटाई हुई।

प्रश्न 5: दस अक्तूबर सन् पैंतालीस का दिन टोपी के जीवन में क्या महत्त्व रखता है?
उत्तर: दस अक्तूबर सन् पैंतालिस को इफ़्फ़न के पिता का तबादला हो गया और वे चले गए। अपने प्रिय दोस्त के चले जाने से वह बहुत दुखी हुआ। उसने कसम खाई कि वह कोई ऐसा दोस्त नहीं बनाएगा जिसकी बदली हो जाती है। एक तो इफ़्फ़न की दादी जिससे वह बहुत प्यार करता था वह नहीं रहीं फिर इफ़्फ़न चला गया तो यह दिन उसके लिए महत्वपूर्ण दिन बन गया।

प्रश्न 6: टोपी ने इफ़्फ़न से दादी बदलने की बात क्यों कही?
उत्तर: इफ़्फ़न की दादी टोपी को बहुत प्यार करती थी। उनकी मीठी-मीठी बोली उसे तिल के लडू या शक्कर गुड जैसी लगती थी। टोपी की माँ भी ऐसा ही बोलती थी परन्तु उसकी दादी उसे बोलने नहीं देती थी। उधर इफ़्फ़न के दादा जी व अम्मी को उनकी बोली पंसद नहीं थी। अतःइफ़्फ़न की दादी और टोपी की माँ दोनों एक स्वर की महिलाएँ थीं। यही सोचकर टोपी ने दादी बदलने की बात की।

प्रश्न 7: पूरे घर में इफ़्फ़न को अपनी दादी से विशेष स्नेह क्यों था?
उत्तर: इफ़्फ़न की दादी उसे बहुत प्यार करती थी, हर तरह से उसकी सहायता करती थी। उसके अब्बू अम्मी उसे डाँटते थे, उसकी बाजी औरनुज़हत भी उसको परेशान करती थी। दादी उसको रात में अनार परी, बहराम डाकू, अमीर हमला, गुलब काबली, हातिमताई जैसी अनेक कहानियाँ सुनाती थी। इसी कारण वह अपनी दादी से प्यार करता था।

प्रश्न 8: इफ़्फ़न की दादी के देहान्त के बाद टोपी को उसका घर खाली सा क्यों लगा?
उत्तर: इफ़्फ़न की दादी जितना प्यार इफ़्फ़न को करती उतना ही टोपी को भी करती थी, टोपी से अपनत्व रखती थी। उसे भी कहानियाँसुनाती थी, उसकी माँ का हाल चाल पूछती। उनकी मृत्यु के बाद टोपी को ऐसा लगा मानो उस पर से दादी की छत्रछाया ही खत्म हो गई है। इसलिए टोपी को इफ़्फ़न की दादी की मृत्यु के बाद उसका घर खाली सा लगा।

प्रश्न 9: टोपी और इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग मजहब और जाति के थे पर एक अनजान अटूट रिश्ते से बँधे थे। इस कथन के आलोक में अपने विचार लिखिए।
उत्तर: टोपी हिंदू धर्म का था और इफ़्फ़न की दादी मुस्लिम। परन्तु जब भी टोपी इफ़्फ़न के घर जाता दादी के पास ही बैठता। उनकी मीठी पूरबी बोली उसे बहुत अच्छी लगती थी। दादी पहले अम्मा का हाल चाल पूछतीं। दादी उसे रोज़ कुछ न कुछ खाने को देती परन्तु टोपी खाता नहीं था। फिर भी उनका हर शब्द उसे गुड़ की डली सा लगता था। इसलिए उनका रिश्ता अटूट था।

प्रश्न 10: टोपी नवीं कक्षा में दो बार फ़ेल हो गया। बताइए −
(क) ज़हीन होने के बावजूद भी कक्षा में दो बार फ़ेल होने के क्या कारण थे?
(ख) एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को किन भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
(ग) टोपी की भावात्मक परेशानियों को मद्येनज़र रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक बदलाव सुझाइए?

उत्तर: (क) टोपी बहुत ज़हीन (बुद्धिमान) था परन्तु दो बार फ़ेल हो गया क्योंकि पहली बार जब भी वह पढ़ने बैठता मुन्नी बाबू को कोई न कोई काम निकल आता या रामदुलारी कोई ऐसी चीज़ मँगवाती जो नौकर से नहीं मँगवाई जा सकती। इस तरह वह फेल हो गया। दूसरे साल उसे मियादी बुखार हो गया था और पेपर नहीं दे पाया इसलिए फ़ेल हो गया था।
(ख) पहली बार एक कक्षा छोटे बच्चों के साथ बैठना पड़ा। दूसरे साल सातवीं के बच्चों के साथ बैठना पड़ा था। इसलिए उसका कोई दोस्त नहीं बन पाया था। अध्यापक भी बच्चों को न पढ़ने के कारण फ़ेल होने का उदाहरण टोपी का नाम लेकर देते थे, उसका मज़ाक उड़ाते थे। मास्टरभी उसे नोटिस नहीं करते थे। उससे कोई उत्तर नहीं पूछते बल्कि कहते अगले साल पूछ लेंगे या कहते इतने सालों में तो आ गया होगा। इस तरह सभी उसे भावनात्मक रूप से आहत करते थे। फिर अंत में इन चुनौतियों को स्वीकार कर उसने सफलता प्राप्त की।
(ग) बच्चे फ़ेल होने पर भावनात्मक रूप से आहत होते हैं और मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। वे शर्म महसूस करते हैं। इसके लिए विद्यार्थी के पुस्तकीय ज्ञान को ही न परखा जाए बल्कि उसके अनुभव व अन्य कार्य कुशलता को भी देखकर उसे प्रोत्साहन देने के लिए शिक्षा व्यवस्था में बदलाव किया जा सकता है।

प्रश्न 11: इफ़्फ़न की दादी के मायके का घर कस्टोडियन में क्यों चला गया?
उत्तर: कस्टोडियन पर जाना अर्थात् सरकारी कब्जा होना। दादी के पीहर वाले जब पाकिस्तान में रहने लगे तो भारत में उनके घर की देखभाल करने वाला कोई नहीं रहा। इस पर मालिकाना हक भी न रहा। इसलिए वह घर सरकारी कब्जे में चला गया।

02. सपनों के-से-दिन – अध्याय समाधान

बोध प्रश्न  
प्रश्न 1: कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती− पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता हैं?
उत्तर: पाठ के लेखक श्री गुरदयाल सिंह जी बताते हैं कि बचपन में उनके आधे से अधिक साथी हरियाणा या राजस्थान से व्यापार के लिए आए परिवारों से संबंधित थे। उनके कुछ शब्द सुनकर लेखक व उसके अन्य साथियों को हँसी आ जाती थी। बहुत से शब्द समझ में नहीं आते थे। किंतु जब वे सब मिलकर खेलते थे तब सभी को एक-दूसरे की बातें खूब अच्छी तरह समझ में आ जाती थीं। पाठ के इसी अंश से यह बात सिद्ध होता है कि कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधक नहीं होती है |

प्रश्न 2: पीटी साहब की शाबाश फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पीटी साहब प्रीतमचन्द बहुत सख्त अध्यापक थे। यदि कोई कतार से सिर इधर-उधर हिला लेता या दूसरी पिंडली खुजलाने लगता इस पर वे उसे लड़के की ओऱ बाघ की तरह झपट पड़ते। परन्तु जब बच्चे कोई भी गलती न करते तो पी. टी. साहब उन्हें शाबाश कहते। बच्चे शाबाश शब्द सुनकर खुश होते और उन्हें लगता कि जैसे फौज में सिपाही को तमंगे दिए जाते हैं वैसा ही तमगा उन्हें भी मिल गया है।

प्रश्न 3: नई श्रेणी में जाने और नयी कापियों और पुरानी किताबों से आती विशेष गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?
उत्तर: नई श्रेणी में जाने पर लेखक को हैडमास्टर जी एक अमीर घर के बच्चे की पुरानी किताबें लाकर देते थे। परन्तु इन नयी कापियों और पुरानी किताबों आती विशेष गंध से लेखक का बालमन उदास कर जाती थीं क्योंकि नयी श्रेणी का मतलब और कठिन पढाई और नए मास्टरों से पिटाई का भय होता था। पुराने मास्टरों की भी अपेक्षाएं बढ़ जाती थी। उन्हें लगता था की नयी श्रेणी में आने से बच्चें तेज हो गए हैं और अपेक्षाओं की प्रति न होने पर वे चमड़ी उधेरने में देर न लगाते।

प्रश्न 4: स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्वपूर्ण आदमी फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता था?
उत्तर: स्काउट परेड में लेखक साफ़ सुथरे धोबी के घुले कपड़े, पॉलिश किए हुए बूट, जुराबों को पहन कर जब लेखक ठक-ठक करके चलता था तो वह अपने आपको फ़ौजी से कम नहीं समझता था। अकड़कर चलता तो अपने अंदर एक फ़ौजी जैसी आन-बान-शान महसूस करता था।

प्रश्न 5: हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्यों मुअतल कर दिया?
उत्तर: एक दिन मास्टर प्रीतमचंद ने कक्षा में बच्चों को फ़ारसी के शब्द रूप याद करने के लिए दिए । परन्तु बच्चों से यह शब्द रूप याद नहीं हो सके। इसपर मास्टर जी ने उन्हें मुर्गा बना दिया। बच्चे इसे सहन नहीं कर पाए कुछ ही देर में लुढ़कने लगे। उसी समय नम्र ह्रदय हेडमास्टरजी वहाँ से निकले और बच्चों की हालत देखकर सहन नहींकर पाए और पीटी मास्टर को मुअत्तल कर दिया। 

प्रश्न 6: लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?
उत्तर: ‘सपनों के-से दिन’ पाठ के लेखक गुरदयाल सिंह के अनुसार उन्हें तथा उनके साथियों को बचपन में स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था। चौथी कक्षा तक कुछ लड़के को छोड़कर अन्य सभी साथी रोते-चिल्लाते हुए स्कूल जाया करते थे। स्कूल में धोबी पिटाई तथा मास्टरों की डाँट-फटकार के कारण स्कूल उन्हें एक नीरस व भयानक स्थान प्रतीत होता था, जिसके प्रति उनके मन में एक भय-सी बैठ गया था।
इसके बावजूद कई बार ऐसी स्थितियाँ आती थीं जब उन्हें स्कूल जाना अच्छा भी लगता था। यह मौका तब आता था जब उनके पीटी सर स्काउटिंग का अभ्यास करवाते थे। वे पढ़ाई-लिखाई के स्थान पर लड़कों के हाथों में नीली-पीली झंडियाँ पकड़ा देते थे, वे वन-टू-श्री करके इन झंड़ियों को ऊपर-नीचे करवाते थे। हवा में लहराती यह झंडिया बड़ी अच्छी लगती थीं। अच्छा काम करने पर पीटी सर की शाबाशी भी मिलती थी, तब यही कठोर पीटी सर बच्चों को बड़े अच्छे लगते थे। ऐसे अवसर पर स्कूल आना अच्छा व सुखद प्रतीत होता था।

प्रश्न 7: लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भाँति बहादुर बनने की कल्पना किया करता था?
उत्तर: लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए तरह-तरह की योजनाएँ बनाया करता था। जैसे-हिसाब के मास्टर जी द्वारा दिए गए 200 सवालों को पूरा करने के लिए रोज़ दस सवाल निकाले जाने पर 20 दिन में पूरे हो जाएँगे, लेकिन खेल-कूद में छुट्टियाँ भागने लगतीं, तो मास्टर जी की पिटाई का डर सताने लगता। फिर लेखक रोज़ के 15 सवाल पूरे करने की योजना बनाता, तब उसे छुट्टियाँ भी बहुत कम लगने लगतीं और दिन बहुत छोटे लगने लगते तथा स्कूल का भय भी बढ़ने लगता। ऐसे में लेखक पिटाई से डरने के बावजूद भी उन लोगों की भाँति बहादुर बनने की कल्पना करने लगता, जो छुट्टियों को काम पूरा करने की बजाय मास्टर जी से पिटना ही अधिक बेहतर समझते थे।

प्रश्न 8: पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: पाठ के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि पीटी सर प्रीतमचंद बहुत सरल अध्यापक थे। उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ इस प्रकार हैंI बाह्य व्यक्तित्व-पीटी सर अर्थात् प्रीतमचंद ठिगने कद के थे, उनका शरीर दुबला-पतला पर गठीला था। उनका चेहरा चेचक के दागों से भरा था। उनकी आँखें बाज की तरह तेज़ थीं। वे खाकी वर्दी, चमड़े के पंजों वाले बूट पहनते थे। उनके बूटों की ऊँची एड़ियों के नीचे खुरियाँ लगी रहती थीं। बूटों के अगले हिस्से में पंजों के नीचे मोटी सिरों वाले कील ठुके रहते थे।
आंतरिक व्यक्तित्व

  • कुशल अध्यापक-प्रीतमचंद एक कुशल अध्यापक थे। वे चौथी श्रेणी के बच्चों को फ़ारसी पढ़ाया करते थे। वे मौखिक अभिव्यक्ति एवं याद करने पर बल दिया करते थे। वे छात्रों को दिन-रात एक करके पढ़ाई करने की शिक्षा दिया करते थे।
  • कुशल प्रशिक्षक-वे कुशल प्रशिक्षक थे। वे छात्रों को स्काउट और गाइड की ट्रेनिंग दिया करते थे वे छात्रों से विभिन्न रंग की झंडियाँ पकड़ाकर हाथ ऊपर-नीचे करके अच्छी ट्रेनिंग दिया करते थे। उनके इस प्रशिक्षण कार्य से छात्र सदा प्रसन्न रहा करते थे। वे उस पर छात्रों द्वारा सही काम करने पर शाबाशी भी देते थे।
  • कठोर अनुशासन प्रिय-प्रीतमचंद अनुशासन प्रिय होने के कारण कठोर अनुशासन बनाए रखते थे। वे छात्रों को भयभीत रखते थे। यदि कोई लड़का अपना सिर इधर-उधर हिला लेता था तो वे उस पर बाघ की तरह झपट पड़ते थे। प्रार्थना करते समय भी वह अनुशासनहीन छात्रों को दंडित करते थे।
  • कोमल हृदयी-प्रीतम चंद बाहर से कठोर किंतु अंदर से कोमल थे। उन्होंने अपने घर में तोते पाल रखे थे, वे उससे बात करते थे और उसे भीगे हुए बादाम भी खिलाया करते थे। इसके अलावा वे छात्रों द्वारा सही काम किए जाने पर उन्हें शाबाशी भी देते थे।

प्रश्न 9: विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के संबंध में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर: विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई युक्तियाँ इस प्रकार से हैं—पीटी साहब बिल्ला मार-मारकर बच्चों की चमड़ी तक उधेड़ देते थे। तीसरी-चौथी कक्षाओं के बच्चों से थोड़ा-सा भी अनुशासन भंग हो जाता, तो उन्हें कठोर सज़ा मिलती थी ताकि वे विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन की नींव दृढ़ बना सकें। इसके साथ-साथ विद्यार्थियों को प्रोत्साहित तथा उत्साहित करने के लिए उन्हें ‘शाबाशी’ भी दी जाती थी। लेकिन वर्तमान में स्वीकृत मान्यताएँ इसके विपरीत हैं। शिक्षकों को आज विद्यार्थियों को पीटने का अधिकार नहीं है इसलिए विद्यार्थी निडर होकर अनुशासनहीनता की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि आज पहले की भाँति विद्यार्थी शिक्षकों से डरते नहीं हैं। इसके लिए विद्यालय और माता-पिता दोनों जिम्मेवार हैं। बच्चों में अनुशासन का विकास करने के लिए उन्हें शारीरिक व मानासिक यातना देना उचित नहीं। उन्हें प्रेमपूर्वक नैतिक मूल्य सिखाए जाने चाहिए, जिनसे उनमें स्वानुशासन का विकास हो सके।

प्रश्न 10: बचपन की यादें मन को गुदगुदाने वाली होती हैं विशेषकर स्कूली दिनों की। अपने अब तक के स्कूली जीवन की खट्टी–मीठी यादों को लिखिए।
उत्तर:
 बचपन की और विशेषकर स्कूली जीवन की खट्टी-मीठी यादें मन को गुदगुदाती रहती हैं। ये यादें सभी की निजी होती हैं। मेरी भी कुछ ऐसी यादें मेरे साथ हैं। मैं जब नवीं कक्षा में पढ़ती थी मेरी माँ किसी कारणवश बाहर गई थीं। इसलिए मैं बिना गृहकार्य किए और बिना लंच लिए स्कूल पहुँची। पहले तो अध्यापिका से खूब डॉट पड़ी, फिर आधी छुट्टी में मुझे अध्यापिका ने खिड़की के पास खड़ा पाया तो डॉट लगा दी। अगले पीरियड में मुझे बहुत बेचैनी हुई कि अध्यापिका मेरे बारे में क्या सोच रही होंगी, मैं अध्यापिका कक्ष में उनसे मिलने गई। उन्हें देखते ही मेरा रोना छूट गया। उन्होंने रोने का कारण पूछा तो मैंने रोते-रोते उन्हें कारण बताया कि मेरी माता जी घर पर नहीं हैं। उन्होंने मुझे सांत्वना दी फिर मुझे अपने डिब्बे से खाना खिलाया। आज भी मैं इस घटना को याद करती हूँ तो अध्यापिका के प्रति भाव-विभोर हो उठती हूँ।

प्रश्न 11: प्राय अभिभावक बच्चों को खेल-कूद में ज़्यादा रूचि लेने पर रोकते हैं और समय बरबाद न करने की नसीहत देते हैं बताइए −
(क) खेल आपके लिए क्यों ज़रूरी हैं।
(ख) आप कौन से ऐसे नियम-कायदों को अपनाएँगे जिससे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो।
उत्तर: (क) खेल प्रत्येक उम्र के बच्चे के लिए जरूरी हैं। खेल की बच्चे के शारीरिक-मानसिक विकास में अहम भूमिका होती है। खेल बच्चे की सोच को विस्तृत तथा विकसित करते हैं। इनसे बच्चे में सामूहिक रूप से काम करने की भावना का संचार होता है। बच्चे में प्रतिस्पर्धा तथा प्रतियोगिता हेतु आगे बढ़ने की होड़ और दौड़ में भाग लेने की इच्छा पैदा होती है। खेलों में भाग लेने से बच्चे को अपना तथा अपने देश का नाम रोशन करने का सुअवसर प्राप्त होता है।
(ख) मैं अपने अभिभावकों के लिए वही नियम और कायदों को अपनाऊँगा, जिनसे उनकी भावनाओं को ठेस न पहुँचे इसलिए मैं समय पर खेलूंगा और समय पर खेलकर वापस आऊँगा। खेलने के साथ पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान दूंगा। मैं खेलने में उतना ही समय खर्च करूँगा, जितना आवश्यक होगा। अर्थात् मैं केवल वही नियम और कायदे अपनाऊँगा, जिनसे मेरे अभिभावकों को सुख-शांति मिलेगी।

01. हरिहर काका- अध्याय समाधान

प्रश्न 1: कथावाचक और हरिहर काका के बीच क्या संबंध है और इसके क्या कारण हैं?
उत्तर: कथावाचक जब छोटे थे, तब से ही हरिहर काका उन्हें बहुत प्यार करते थे। जब वे बड़े हो गए, तो हरिहर काका के मित्र बन गए। गाँव में इतनी गहरी दोस्ती और किसी से नहीं हुई। हरिहर काका उनसे खुलकर बातें करते थे। यही कारण था कि कथावाचक को उनके एक-एक पल की खबर थी। शायद अपना मित्र बनाने के लिए काका ने स्वयं ही उन्हें प्यार से बड़ा किया और इंतजार किया।


प्रश्न 2: हरिहर काका को महंत और अपने भाई एक ही श्रेणी के क्यों लगने लगे?
उत्तर: हरिहर काका को अपने भाइयों और महंत में कोई अंतर नहीं लगा। दोनों एक ही श्रेणी के लगे। उनके भाइयों की पत्नियों ने कुछ दिन तक तो हरिहर काका का ध्यान रखा, फिर बची-खुची रोटियाँ दीं, नाश्ता नहीं देती थीं। बीमारी में कोई पूछने वाला भी न था। जितना भी उन्हें रखा जा रहा था, वह उनकी ज़मीन के लिए था। इसी तरह महंत ने एक दिन तो बड़े प्यार से खातिर की, फिर ज़मीन को अपने ठाकुरबाड़ी के नाम करने के लिए कहने लगे। काका के मना करने पर उन्हें अनेक यातनाएँ दी गईं। अपहरण करवाया, मुँह में कपड़ा ठूँसकर एक कोठरी में बंद कर दिया, जबरदस्ती अँगूठे का निशान लिया गया तथा उन्हें मारा-पीटा गया। इस तरह दोनों ही केवल ज़मीन-जायदाद के लिए हरिहर काका से व्यवहार रखते थे। अतः उन्हें दोनों एक ही श्रेणी के लगे।

प्रश्न 3: ठाकुरबारी के प्रति गाँव वालों के मन में अपार श्रद्धा के जो भाव हैं उससे उनकी किस मनोवृत्ति का पता चलता है?
उत्तर: कहा जाता है कि गाँव के लोग भोले होते हैं। असल में, गाँव के लोग अंधविश्वासी और धर्मभीरु होते हैं। मंदिर जैसे स्थान को वे पवित्र, निष्कलंक और ज्ञान का प्रतीक मानते हैं। पुजारी, पुरोहित, महंत जैसे जितने भी धर्म के ठेकेदार हैं, उन पर अगाध श्रद्धा रखते हैं। वे चाहे कितने भी पतित, स्वार्थी और नीच हों, पर उनका विरोध करने से डरते हैं। इसी कारण ठाकुरबाड़ी के प्रति गाँव वालों की अपार श्रद्धा थी। उनका हर सुख-दुख उससे जुड़ा था।

प्रश्न 4: अनपढ़ होते हुए भी हरिहर काका दुनिया की बेहतर समझ रखते हैं? कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: अनपढ़ होते हुए भी हरिहर काका दुनिया की बेहतर समझ रखते हैं। वे जानते हैं कि जब तक उनकी ज़मीन-जायदाद उनके पास है, तब तक सभी उनका आदर करते हैं। ठाकुरबाड़ी के महंत उन्हें इसलिए समझाते हैं क्योंकि वे उनकी ज़मीन ठाकुरबाड़ी के नाम करवाना चाहते हैं। उनके भाई उनका आदर-सत्कार भी ज़मीन के कारण ही करते हैं। हरिहर काका ऐसे कई लोगों को जानते हैं, जिन्होंने अपने जीते-जी अपनी ज़मीन किसी और के नाम लिख दी थी और बाद में उनका जीवन नरक बन गया था। वे नहीं चाहते थे कि उनके साथ भी ऐसा हो।

प्रश्न 5: हरिहर काका को जबरन उठा ले जाने वाले कौन थे? उन्होंने उनके साथ कैसा बरताव किया?
उत्तर: हरिहर काका को जबरन उठा ले जाने वाले लोग महंत के आदमी थे। महंत ने हरिहर काका को कई बार ज़मीन-जायदाद ठाकुरबाड़ी के नाम कर देने को कहा, परंतु वे नहीं मान रहे थे। महंत ने अपने चेले और साधु-संतों के साथ मिलकर उनके हाथ-पैर बाँध दिए, मुँह में कपड़ा ठूँस दिया और जबरदस्ती अँगूठे के निशान ले लिए। फिर उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया। जब पुलिस आई, तो वह स्वयं गुप्त दरवाज़े से भाग गया।

प्रश्न 6: हरिहर काका के मामले में गाँव वालों की क्या राय थी और उसके क्या कारण थे?
उत्तर: कहानी के आधार पर गाँव के लोगों को बिना बताए ही पता चल गया कि हरिहर काका को उनके भाई नहीं पूछते। इसलिए सुख-आराम का प्रलोभन देकर महंत उन्हें अपने साथ ले गया। भाई मन्नतें करके काका को वापस ले आते हैं। इस तरह गाँव के लोग दो पक्षों में बँट गए। कुछ लोग महंत की तरफ़ थे, जो चाहते थे कि काका अपनी ज़मीन धर्म के नाम पर ठाकुरबाड़ी को दे दें ताकि उन्हें सुख-आराम मिले और मृत्यु के बाद मोक्ष व यश प्राप्त हो। महंत ज्ञानी है, वह सब कुछ जानता है। लेकिन दूसरे पक्ष के लोग कहते थे कि ज़मीन परिवारवालों को दी जाए। उनका कहना था कि इससे उनके परिवार का पेट भरेगा, और मंदिर को ज़मीन देना अन्याय होगा। इस तरह दोनों पक्ष अपने-अपने हिसाब से सोच रहे थे, परंतु हरिहर काका के बारे में कोई नहीं सोच रहा था। इन बातों का एक कारण यह भी था कि काका विधुर थे और उनकी कोई संतान भी नहीं थी। पंद्रह बीघा ज़मीन के लिए लोगों का लालच स्वाभाविक था।

प्रश्न 7: कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि लेखक ने यह क्यों कहा, “अज्ञान की स्थिति में ही मनुष्य मृत्यु से डरते हैं। ज्ञान होने के बाद तो आदमी आवश्यकता पड़ने पर मृत्यु को वरण करने के लिए तैयार हो जाता है।”
उत्तर: जब काका को असलियत पता चली और उन्हें समझ में आ गया कि सभी लोग उनकी ज़मीन-जायदाद के पीछे हैं, तो उन्हें वे सभी लोग याद आ गए जिन्होंने परिवारवालों के मोह-माया में आकर अपनी ज़मीन उनके नाम कर दी और मृत्यु तक तिल-तिल करके मरते रहे, दाने-दाने को मोहताज हो गए। इसलिए उन्होंने सोचा कि इस तरह जीने से तो एक बार मरना अच्छा है। जीते-जी ज़मीन किसी को भी नहीं देंगे। ये लोग चाहें तो मुझे एक बार में ही मार दें। अतः लेखक ने कहा कि अज्ञान की स्थिति में मनुष्य मृत्यु से डरता है, परंतु ज्ञान होने पर वह मृत्यु-वरण के लिए तैयार रहता है।

प्रश्न 8: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? इस विषय पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर: आज समाज में मानवीय एवं पारिवारिक मूल्य धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। अधिकतर व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए रिश्ते-नाते निभाते हैं। अब रिश्तों से ज्यादा रिश्तेदारों की कामयाबी और स्वार्थ-सिद्धि की अहमियत है। रिश्ते ही व्यक्ति को अपने-पराए में अंतर करना सिखाते हैं। रिश्तों के माध्यम से व्यक्ति की समाज में विशेष भूमिका निर्धारित होती है। रिश्ते ही सुख-दुख में काम आते हैं। यह दुख की बात है कि आज के इस बदलते दौर में रिश्तों पर स्वार्थ की भावना हावी होती जा रही है। रिश्तों में प्यार और बंधुत्व समाप्त हो गया है। इस कहानी में भी यदि पुलिस न पहुँचती, तो परिवार वाले काका की हत्या कर देते। इंसानियत तथा रिश्तों का खून साफ़ नज़र आता है जब महंत और परिवारवालों को काका के लिए अफसोस नहीं, बल्कि उनकी हत्या न कर पाने का अफसोस है। ठीक इसी प्रकार, आज रिश्तों से ज्यादा धन-दौलत को अहमियत दी जा रही है।

प्रश्न 9: यदि आपके आसपास हरिहर काका जैसी हालत में कोई हो तो आप उसकी किस प्रकार मदद करेंगे?
उत्तर: यदि हमारे आसपास हरिहर काका जैसी स्थिति में कोई व्यक्ति हो, तो हम उसकी सहायता निम्न प्रकार से करेंगे:

  • सबसे पहले हम उसके घरवालों को समझाएँगे कि वे अपने पवित्र कर्तव्य के प्रति सचेत रहें।
  • असहाय व्यक्ति के खान-पान, रहन-सहन, वस्त्र आदि की व्यवस्था समयानुसार करेंगे।
  • उसके परिवार के सदस्यों को समझाएँगे कि यदि तुम असहाय व्यक्ति की सहायता करोगे, तो उसका फल अवश्य मिलेगा। अर्थात् उसकी ज़मीन और संपत्ति स्वतः ही तुम्हें मिल जाएगी।
  • धूर्त महंत, पुजारी और साधुओं के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराएँगे और पुलिस को बताएँगे कि इन्हें लालच ने अंधा कर दिया है। ये असहाय व्यक्ति की ज़मीन पर जबरन कब्जा करना चाहते हैं।
  • भाइयों, महंत, साधु और पुजारियों की खबर मीडिया को देंगे ताकि उनका दुष्प्रचार हो सके और सरकारी हस्तक्षेप से उन्हें उनके किए की सजा मिले। साथ ही, हरिहर काका जैसे व्यक्ति को न्याय मिल सके।

प्रश्न 10: हरिहर काका के गाँव में यदि मीडिया की पहुँच होती तो उनकी क्या स्थिति होती? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: हरिहर काका का जिस प्रकार धर्म और घर, अर्थात् खून के रिश्तों से, विश्वास उठ चुका था, उससे वे मानसिक रूप से बीमार हो गए थे। वे बिल्कुल चुप रहते थे और किसी की भी किसी बात का कोई उत्तर नहीं देते थे। यदि वर्तमान दृष्टिकोण से देखा जाए, तो आज मीडिया की अहम भूमिका है। लोगों को सच्चाई से अवगत कराना उसका मुख्य कार्य है। जनसंचार के माध्यम से घर-घर तक बात पहुँचाई जा सकती है। इसके द्वारा लोगों और समाज तक बात पहुँचाना आसान हो जाता है। यदि हरिहर काका की बात मीडिया तक पहुँच जाती, तो शायद स्थिति कुछ भिन्न होती। वे अपनी बात लोगों के सामने रख पाते और स्वयं पर हुए अत्याचारों के विषय में लोगों को जागरूक कर सकते। मीडिया हरिहर काका को न्याय दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती और उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने की व्यवस्था उपलब्ध करवाने में मदद करती। जिस दबाव में वे जी रहे थे, वैसी स्थिति मीडिया की सहायता मिलने के बाद नहीं रहती।