Chapter 13 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 13 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

वर्णोच्चारण-शिक्षा १


शब्दानां सम्यक् शुद्धं च उच्चारणं नितान्तं महत्त्वपूर्णम् अस्ति इति वयं पूर्वस्मिन् पाठे दृष्टवन्तः। कस्यचित् शब्दस्य सम्यग् – उच्चारणार्थं, तस्य शब्दस्य प्रत्येक-वर्णस्य शुद्धं निर्दुष्टम् उच्चारणं भवेत्। अतः प्रत्येक-वर्णस्य शुद्धम् उच्चारणं कथं भवतीति अत्र ज्ञास्यामः ।
वर्णानां स्वर-व्यञ्जनादीनां विविध-भेद-उपभेदानां विषये वयं पूर्वासु कक्षासु ज्ञातवन्तः । तत्र आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि अपि वयं दृष्टवन्तः ।
परन्तु, वर्णानाम् उच्चारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः भवति इति – न । वर्णानाम् उच्चारणार्थम् आस्येन सह शरीरस्य इतरेषाम् अपि अङ्गानाम् उपयोगः भवति, यथा…

हिंदी अनुवाद:

हमने पिछले पाठ में यह देखा कि शब्दों का सही और शुद्ध उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। किसी भी शब्द का सही उच्चारण तभी संभव होता है जब उसके प्रत्येक वर्ण का शुद्ध और त्रुटिरहित उच्चारण हो। इसलिए, हम यहाँ जानेंगे कि प्रत्येक वर्ण का सही उच्चारण किस प्रकार होता है।

स्वर और व्यंजन आदि वर्णों के विभिन्न भेद और उपभेदों के बारे में हम पहले की कक्षाओं में जान चुके हैं। हमने यह भी देखा था कि मुख के भीतर उच्चारण के लिए छह स्थान होते हैं।

लेकिन यह सोचना कि केवल मुख (आस्य) का ही वर्णों के उच्चारण में उपयोग होता है — यह सही नहीं है। वर्णों के उच्चारण के लिए मुख के साथ शरीर के अन्य अंगों की भी सहायता ली जाती है, जैसे कि…


हिंदी अनुवाद:

संख्यासंस्कृत नामअंग / क्षेत्र (अंग्रेज़ी)तंत्र का नाम (संस्कृत)तंत्र का नाम (हिन्दी)
1नाभि-प्रदेशNavel-region (Abdominal Muscles)मांसपेशी-बल-तन्त्रम्मांसपेशियों के दबाव का तंत्र
2उरःChest (Lungs & Diaphragm)वायु-बल-तन्त्रम्वायु-दाब (प्रेशर) का तंत्र
3कण्ठ-बिलःVoice-box (Larynx / Vocal cords)ध्वनि-तन्त्रम्स्वर एवं प्रतिध्वनि (गूंज) का तंत्र
4आस्यम्Head (Mouth & Nose)उच्चारण-तन्त्रम्उच्चारण का तंत्र

आस्यस्य अभ्यन्तरे   –    (क) मुखम्     –     (Mouth / Oral cavity),

(ख) नासिका – (Nose / Nasal cavity) – च उभौ भवतः ।

हिंदी अनुवाद:

मुख के भीतर दो प्रमुख भाग होते हैं – (क) मुख, जिसे मुखगुहा कहते हैं और (ख) नाक, जिसे नासागुहा कहते हैं। ये दोनों उच्चारण में सहायक होते हैं।


यदा वयं कञ्चित् शब्दं वर्णं वा उच्चारयितुम् इच्छामः, तदा  –

१. सर्वप्रथमं नाभि– प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति ।

उरः पुनः श्वासकोश-स्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति ।

३. सः वायुः ऊर्ध्वं सरन् कण्ठबिलं प्राप्नोति ।

४. ततः, सः वायुः पुनः ऊर्ध्वं सरन् आस्यं प्रविशति ।

आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, मुखे, नासिकायां च स्थितेषु षट्सु उच्चारण-स्थानेषु

वर्णानुसारं स्वकीयं स्थानं प्राप्य, सः वायुः तस्मिन् स्थाने वर्णरूपेण प्रकटीभवति।

हिंदी अनुवाद:

जब हम किसी शब्द या वर्ण का उच्चारण करना चाहते हैं, तब –

  1. सबसे पहले, नाभि-प्रदेश में स्थित मांसपेशियाँ (पेट की मांसपेशियाँ) छाती (उरः) को ऊपर की ओर उठाती हैं।
  2. छाती फिर फेफड़ों में स्थित वायु को ऊपर की ओर बाहर निकालती है।
  3. वह वायु ऊपर की ओर जाते हुए कंठ-गुहा (स्वरयंत्र) में प्रवेश करती है।
  4. वहाँ से वह वायु पुनः ऊपर की ओर मुख (आस्य) में प्रवेश करती है।मुख के अंदर प्रवेश करके, वह वायु मुख और नाक में स्थित छह उच्चारण-स्थान में से किसी एक स्थान को — वर्ण के अनुसार — प्राप्त करती है,
    और उस स्थान पर वह वायु वर्ण (ध्वनि) के रूप में प्रकट होती है

मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया (Voice Production Mechanism in Humans)

आस्यस्य अभ्यन्तरे स्थितेषु षट्सु स्थानेषु सः वायुः वर्णरूपेण कथं प्रकटीभवति ?’इति अग्रे ज्ञास्यामः 

आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं वस्तुतः त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति –

(क) प्रथमम्        –          स्थानम्

(ख) द्वितीयम्       –          करणम्

(ग) तृतीयम्        –           आभ्यन्तर प्रयत्नः

अस्मिन् पाठे ‘स्थानस्य‘, ‘करणस्य च चर्चां कुर्मः । ‘ आभ्यन्तर – प्रयत्नस्य विषये

अग्रिमायां कक्षायां ज्ञास्यामः ।

(क) स्थानम्

वर्णस्य उच्चारण-समये, श्वासकोशतः ऊर्ध्वं सरन् वायुः, कण्ठ-बिल-माध्यमेन

आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, तत्र मुखे नासिकायां वा यस्मिन् स्थले वर्णरूपेण

          प्रकटीभवति, तत्– ‘स्थानम्’ इति उच्यते।

हिंदी अनुवाद:

“मुख के अंदर स्थित छह स्थानों में वायु वर्ण के रूप में कैसे प्रकट होती है?” — इस विषय को हम आगे जानेंगे।

मुख के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए वास्तव में तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं –

(क) प्रथम – स्थान
(ख) द्वितीय – करण
(ग) तृतीय – आभ्यंतर प्रयत्न

इस पाठ में हम ‘स्थान’ और ‘करण’ की चर्चा करेंगे। ‘आभ्यंतर प्रयत्न’ के विषय में हम अगली कक्षा में जानेंगे।


(क) स्थान 

जब हम कोई वर्ण उच्चारित करते हैं, तब फेफड़ों से ऊपर उठती हुई वायु, कंठ-गुहा के माध्यम से मुख के भीतर प्रवेश करती है। मुख या नाक में जिस स्थान पर वह वायु ध्वनि (वर्ण) के रूप में प्रकट होती है, उसे ‘स्थान’ (उच्चारण-स्थान) कहा जाता है।

आस्ये – षट् स्थानानि वयं दृष्टवन्तः;    यथा  —

हिंदी अनुवाद:

मुख (आस्य) में – छह स्थानों को हमने देखा है; जैसे –

नाक में स्थित – नासिका
→ यही छठवाँ (षष्ठं) उच्चारण-स्थान कहलाता है।

मुख के भीतर स्थित –
→ कण्ठ (गला), तालु (पैलेट), मूर्धा (तालु के ऊपर का भाग), दन्त (दाँत), और ओष्ठ (होंठ) —
→ ये पाँच उच्चारण-स्थान कहलाते हैं।

आस्ये वर्णानां षट् उच्चारणस्थानानि

स्थानस्य सम्यक् कार्य-निदर्शनार्थं ‘मुरली’ समुचितम् उदाहरणम् अस्ति। मुरल्याः ‘अङ्गुलिच्छिद्राणि’ आस्यस्य ‘स्थानानि’ इव व्यवहरन्ति । मुरली-नलिकया आगच्छन् वायुः अङ्गुलिच्छिद्रेषु एव विविध-ध्वनि-रूपेण प्रकटीभवति।

हिंदी अनुवाद:

उच्चारण-स्थान (स्थान) के कार्य को समझाने के लिए ‘बाँसुरी (मुरली)’ एक उपयुक्त उदाहरण है। बाँसुरी में जो ‘अँगुलियों के छिद्र (अंगुलिच्छिद्राणि)’ होते हैं,
वे ठीक वैसे ही होते हैं जैसे मुख में स्थित उच्चारण-स्थान (स्थानानि)।

जब वायु बाँसुरी की नली (नलिका) से होकर गुजरती है,
तो वह इन अँगुली-छिद्रों (छेदों) से ही विभिन्न ध्वनियों के रूप में प्रकट होती है।
उसी प्रकार वायु हमारे मुख में विभिन्न स्थानों से होकर विभिन्न वर्णों (ध्वनियों) के रूप में प्रकट होती है।


(ख) करणम्

वर्णस्य उच्चारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा
याति, सः भागः – ‘करणम्’ इति कथ्यते ।

यथा निदर्शने–मुरलींवादयन्त्यः ‘अङ्गुलयः’– आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति ।
अङ्गुलयः यदा अङ्गुलिच्छिद्राणि विविधरूपेण स्पृशन्ति, तेषां समीपं वा यान्ति;
तदा तेषु अङ्गुलिच्छिद्रेषु विविध-ध्वनयः प्रकटीभवन्ति ।

तालु, मूर्धा, दन्तः च – एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘जिह्वा’ करणं भवति ।

तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा – यथाक्रमं
तालु, मूर्धानं, दन्तं च स्थानं स्पृशति, समीपं वा याति, येन यथाक्रमं
तत्-तद्-वर्णानाम् उत्पत्तिः भवति। अतः, एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं
→ जिह्वा – ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति —

हिंदी अनुवाद:

(ख) करणम् 

जब हम कोई वर्ण (ध्वनि) उच्चारित करते हैं,
तो मुख का जो भाग उस स्थान को स्पर्श करता है या उसके पास जाता है,
उसे ‘करण’ (उच्चारण का उपकरण या अंग) कहा जाता है।

उदाहरण के रूप में —
जब कोई व्यक्ति बाँसुरी (मुरली) बजाता है,
तो उसकी अँगुलियाँ ठीक वैसे ही कार्य करती हैं जैसे मुख के करण (उच्चारण-अंग)।

जब अँगुलियाँ बाँसुरी के छिद्रों को छूती हैं या उनके पास आती हैं,
तब उन छिद्रों से होकर विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं।

तालु, मूर्धा और दाँत – इन तीन स्थानों पर उच्चारण करते समय ‘जिह्वा’ (जीभ) ही करण (उपकरण / साधन) होती है।

तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण के लिए —
जिह्वा क्रमशः तालु, मूर्धा और दन्तों को स्पर्श करती है या उनके निकट जाती है,
जिससे उसी क्रम में उन वर्णों की उत्पत्ति होती है।

इसलिए इन तीन प्रकार के वर्णों के उच्चारण में —
‘जिह्वा’ ही करण, अर्थात् उच्चारण में उपयोग होने वाला अंग होती है।


कण्ठः, ओष्ठः, नासिका च – एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘स्व-स्थानम्’ एव करणं भवति ।

कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया
भवति। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः
तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति। अतः, एतेषां त्रिविधानां
वर्णानाम् उच्चारणार्थं → स्व- स्थानं – ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति

हिंदी अनुवाद:

कण्ठ (गला), ओष्ठ (होंठ) और नासिका (नाक) — इन तीन स्थानों पर उच्चारण करते समय,
उन्हीं स्थानों का कोई भाग ही ‘करण’ (उपकरण) बनता है।

कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जिह्वा (जीभ) प्रायः निष्क्रिय (अक्रिय) रहती है।
इन वर्णों के उच्चारण हेतु —
उसी स्थान का कोई विशेष भाग अपने ही अन्य भाग को छूता है या उसके निकट आता है,
जिससे ध्वनि की उत्पत्ति होती है।

इसलिए इन तीन प्रकार के वर्णों के उच्चारण में —
स्वयं वह स्थान ही ‘करण’ अर्थात् उच्चारण में प्रयुक्त अंग होता है।


Chapter 12 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 12 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते



छात्राः – “नमस्ते आचार्य! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छामः। कृपया कथां श्रावयति वा महोदय!”

छात्र: “नमस्ते आचार्य! आज हम एक कहानी सुनना चाहते हैं। कृपया क्या आप हमें कहानी सुनाएंगे, महोदय?”

आचार्यः – “नमस्ते छात्राः! भवतां मनोरञ्जनार्थम् आदौ कथाश्रवणम्। अनन्तरं पाठनम्। तर्हि सावधानं शृण्वन्तु।”

आचार्य: “नमस्ते बच्चों! तुम्हारे मनोरंजन के लिए पहले कहानी सुनना, फिर पाठ पढ़ना। तो ध्यानपूर्वक सुनो।”

देवानां राजा इन्द्रः, असुराणां च राजा आसीत् वृत्रासुरः। देवानाम् असुराणां च मध्ये सर्वदा वैरभावः भवति एव। स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान्। यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत् – ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति। यज्ञावसाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनान् पीडयिष्यति इति विचार्य ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्तितवन्तः। स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः। परिणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम्। बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान्।

देवताओं का राजा इन्द्र था और असुरों का राजा वृत्रासुर। देवताओं और असुरों के बीच सदा ही वैर रहता है। अपने बल को बढ़ाने और इन्द्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने एक यज्ञ कराया। उस यज्ञ में आहुति का मंत्र था – “इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व” अर्थात् “इन्द्र का शत्रु बलवान बने”।

यज्ञ के अंत में जब यह विचार हुआ कि बलशाली वृत्रासुर जनों को पीड़ा देगा, तब ऋत्विजों (हवन करने वालों) ने मंत्र के स्वर को बदल दिया। स्वर परिवर्तन से अर्थ भी बदल गया। परिणामस्वरूप वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। बलवान इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर का वध कर दिया।

बहु सुन्दरी कथा महोदय ! तर्हि वयमपि पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शद्धं च उच्चारण कूर्म: |

बहुत ही सुंदर कथा थी, महोदय! तो अब हम भी पठन और भाषण के समय स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करें।

”त्वं यथार्थं भाषसे हिमानि ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दर्भे एव अधुना एतं विषयं पठामः ।

तुमने सत्य ही कहा, हिमानि! अब हम शुद्ध उच्चारण के सन्दर्भ में यह विषय पढ़ते हैं।


पदच्छेदः – यद्यपि बहु न अधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् स्वजनः श्वजनः मा अभूत् सकलम् शकलम् सकृत् शकृत्।

पदच्छेद: in hindi – यद्यपि (भले ही) बहुत कुछ न पढ़ो, फिर भी पढ़ो, हे पुत्र, व्याकरण। “स्वजन” (अपना संबंधी) “श्वजन” (कुत्ता) न बन जाए, “सकलम्” (पूर्ण) “शकलम्” (टुकड़ा) न बन जाए, “सकृत्” (एक बार) “शकृत्” (गंदगी) न बन जाए।

अन्वयः – पुत्र ! यद्यपि बहु न अधीषे तथापि व्याकरणं पठ। येन स्वजनः श्वजनः (इति) सकलं शकलं (इति ) सकृत् शकृत् (इति) च मा अभूत् ।

अन्वयः in hindi – पुत्र! भले ही तुम बहुत कुछ न पढ़ो, फिर भी व्याकरण पढ़ो, ताकि “स्वजन” शब्द “श्वजन” न बन जाए, “सकलम्” “शकलम्” न बन जाए और “सकृत्” “शकृत्” न बन जाए।

भावार्थः – अयि पुत्र ! यद्यपि भवान् वा बहून् विषयान् पठितुं न पारयति तथापि व्याकरणं तु अवश्यं पठतु। येन उच्चारणसमये स्वजनः (अर्थात् बन्धुः) इत्यस्य स्थाने श्वजनः (अर्थात् शुनकः) इति न भवेत्। एवमेव, सकृत् (अर्थात् एकवारम्) इत्यस्य स्थाने शकृत् (अर्थात् विष्ठा) इति, सकलम् (पूर्णम्) इत्यस्य स्थाने शकलं (खण्डम्) इति दोषपूर्णम् उच्चारणं न भवेत्। अत्र स्वजनः इत्यादीनाम् उदाहरणद्वारा एकस्य वर्णस्य उच्चारणस्य दोषेण कथं समग्रपदस्य अर्थः परिवर्तितः भवति इति दर्शितम् ।

भावार्थ (हिन्दी अनुवाद): हे पुत्र! यदि तुम बहुत अधिक विषय नहीं भी पढ़ सको, तो भी व्याकरण अवश्य पढ़ो। क्योंकि यदि तुम व्याकरण नहीं जानते, तो ‘स्वजन’ (मित्र या स्नेही) के स्थान पर ‘श्वजन’ (कुत्ता), ‘सकलम्’ (पूर्ण) के स्थान पर ‘शकलम्’ (खंडित), और ‘सकृत्’ (एक बार) के स्थान पर ‘शकृत्’ (मल/विष्ठा) जैसे अर्थ का उच्चारण हो जाएगा। इससे अर्थ का अनर्थ हो सकता है। एक मात्र वर्ण की अशुद्धता से पूरा शब्द गलत अर्थ देने लगता है।


पदच्छेदः – व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्याम् न च पीडयेत्, भीता पतनभेदाभ्याम्, तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।

पदच्छेद: in hindi – जैसे बाघिन अपने बच्चों को दाँतों से उठाती है और चोट नहीं पहुँचाती, गिरने और चोट लगने के डर से, वैसे ही वर्णों का प्रयोग करना चाहिए।

अन्वयः – यथा व्याघ्री पतनभेदाभ्यां भीता होकर दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् हरेत्, न च पीडयेत्, तद्वत् वर्णान् प्रयोजयेत्।

अन्वयः in hindi – जैसे बाघिन गिरने और चोट लगने के भय से अपने बच्चों को दाँतों से उठाती है पर उन्हें चोट नहीं पहुँचाती, वैसे ही वर्णों का उच्चारण करना चाहिए।

भावार्थ: – व्याघ्री स्वशिशुं दन्तैः नयति। तस्याः दन्ताः अतीव तीक्ष्णाः भवन्ति। अतः सा शिशुं तथा न गृह्णाति येन शिशुः क्षतः भवेत्। एवमेव तथा न गृह्णाति येन शिशुः पतेत् । वर्णानाम् उच्चारणम् अपि तथैव कर्तव्यम् । वर्णोच्चारणम् अतिकठोररूपेण अतिशैथिल्येन वा न कर्तव्यम् ।

भावार्थ (हिन्दी अनुवाद): जैसे व्याघ्री (बाघिन) अपने बच्चों को दांतों से उठाती है परंतु उन्हें न गिरने देती है, न ही उन्हें चोट पहुँचाती है, वैसे ही वर्णों (अक्षरों) का प्रयोग भी सावधानीपूर्वक करना चाहिए। उच्चारण न तो बहुत कठोर हो और न ही बहुत ढीला।


पदच्छेदः – एवं वर्णाः प्रयोक्तव्याः – न अव्यक्ताः, न च पीडिताः। सम्यग् वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते।

पदच्छेद: in hindi –  इसी प्रकार वर्णों का प्रयोग करना चाहिए — न वे अस्पष्ट हों, न दबे हुए। सही वर्ण प्रयोग से ब्रह्मलोक में सम्मान मिलता है।

अन्वयः – एवं अव्यक्ताः च पीडिताः च वर्णाः न प्रयोक्तव्याः। सम्यक् वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते।

अन्वयः in hindi – अस्पष्ट और दबे हुए वर्णों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सही वर्ण प्रयोग से मनुष्य को ब्रह्मलोक में भी सम्मान प्राप्त होता है।

भावार्थः – वर्णानाम् उच्चारणसमये इदम् अवधेयं यत् वर्णाः स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण च उच्चारणीयाः। एतेन श्रोता वक्तुः भावान् सम्यक्तया अवगच्छति। एवं सावधानम् उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं प्राप्नोति।

भावार्थ (हिन्दी अनुवाद):- इस प्रकार वर्णों (अक्षरों) का न तो अस्पष्ट और न ही अत्यधिक दबावपूर्वक उच्चारण करना चाहिए। जो व्यक्ति स्पष्ट और सुसंस्कृत उच्चारण करता है, वह ब्रह्मलोक (उच्च स्तर) में प्रतिष्ठित होता है, अर्थात समाज में सम्मान पाता है।


पदच्छेदः – माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यं, लयसमर्थं च — षट् एते पाठकाः गुणाः।

पदच्छेद: in hindi – मधुरता, अक्षरों की स्पष्टता, उचित स्थान पर पदों का विभाजन, अच्छा स्वर, धैर्य और लय में सामर्थ्य — ये छह गुण पाठक के होते हैं।

अन्वयः – माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यं, लयसमर्थं च — एते षट् पाठकस्य गुणाः भवन्ति।

अन्वयः in hindi – मधुरता, अक्षर स्पष्टता, उचित पद विभाजन, अच्छा स्वर, धैर्य और लय में सामर्थ्य — ये छह गुण अच्छे पाठक में पाए जाते हैं।

भावार्थ: – मधुरेण स्पष्टम् उच्चारणम्, अपेक्षितस्थाने पदच्छेदः, सर्वेषां श्रवणयोग्येन समुचितस्वरेण कथनम्, सन्देहं विना पठनाय धैर्यं, विषये च तल्लीनता इति एते उत्तमस्य पाठकस्य षड् गुणाः भवन्ति। पठनम् इति कौशलं सम्पादयितुं वयम् एतान् गुणान् वर्धयामः ।

भावार्थ (हिन्दी अनुवाद):- मधुर आवाज, स्पष्ट उच्चारण, सही पदच्छेद (वाक्य-विभाजन), उचित और मनोहारी स्वर, आत्मविश्वास (धैर्य), और उचित लय के साथ पठन करने की क्षमता – ये अच्छे पाठक के छह मुख्य गुण हैं।


पदच्छेदः- गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठः — एते षट् पाठकाधमाः।

पदच्छेद: in hindi – गीत गाने जैसा पढ़ने वाला, बहुत तेज पढ़ने वाला, सिर हिलाकर पढ़ने वाला, केवल लिखकर पढ़ने वाला, अर्थ न जानने वाला और धीमे स्वर वाला — ये छह अधम पाठक हैं।

अन्वयः- गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठः — एते षट् पाठकाधमाः भवन्ति।

अन्वयः in hindi – गीत की तरह पढ़ने वाला, तेज पढ़ने वाला, सिर हिलाकर पढ़ने वाला, लिखकर पढ़ने वाला, अर्थ न जानने वाला और धीमे स्वर वाला — ये छह प्रकार के पाठक अधम कहलाते हैं।

भावार्थः – यः जनः गीतगानम् इव पठति, शीघ्रं शीघ्रं वेगेन वा पठति, मस्तकदोलनं कृत्वा पठति, यः जनः लिखित्वा लिखित्वा पठति, अर्थबोधं विना पठति, मन्दस्वरेण पठति सः अधमपाठकः इति उच्यते। अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् परिष्कृत्य  पठामः चेत् आदर्शपाठकाः भवामः ।

भावार्थ (हिन्दी अनुवाद):- जो व्यक्ति पाठ को गीत की तरह गाता है, बहुत तेजी से पढ़ता है, सिर हिलाता रहता है, केवल लिखा हुआ ही देखकर पढ़ता है, अर्थ नहीं जानता, और जिसकी आवाज बहुत धीमी होती है – वह अधम (निकृष्ट) पाठक कहलाता है। अतः इन दोषों को त्यागकर हमें आदर्श पाठक बनना चाहिए।

Chapter 11 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 11 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)



हिंदी अनुवाद

वीरवर नामक एक राजपुरुष राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त था। उसे वेतन के रूप में प्रतिदिन सौ स्वर्ण मुद्राएं (सुवर्ण शतचतुष्टयम्) प्राप्त होती थीं। वह अपने वेतन का आधा भाग देवकार्य (धार्मिक कार्यों) में लगाता था, एक चौथाई भाग निर्धनों में बाँटता था, और शेष एक चौथाई भाग अपनी पत्नी के हाथ में सौंप देता था।

अपनी तलवार लेकर वह दिन-रात राजप्रवेशद्वार पर एक रक्षक के रूप में खड़ा रहकर सेवा करता था। एक बार रात में राजा के आदेश पर वह किसी करुण क्रंदन (दुख भरे रोने) की आवाज का अनुसरण करते हुए नगर से बाहर गया, वहाँ उसने एक रोती हुई, दिव्य आभूषणों से सुशोभित सुंदर स्त्री को देखा।

जब उसने उस रोदन का कारण पूछा तो उसे ज्ञात हुआ कि वह स्त्री स्वयं राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी (राजमहिषी/रानी) है। उसके वचन से वीरवर को यह पता चलता है कि राजा की आयु केवल तीन दिन ही शेष है। यह सुनकर वह राजा की दीर्घायु के लिए उपाय पूछता है।

तब राजलक्ष्मी एक अत्यंत कठिन उपाय बताती है — यदि वीरवर अपनी सबसे प्रिय वस्तु को देवी सर्वमंगल को उपहार रूप में समर्पित कर दे, तो राजा सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है और राजलक्ष्मी भी उसके साथ सुखपूर्वक रह सकती है।

इस प्रकार कठिन उपाय बताकर राजलक्ष्मी वीरवर को धर्मसंकट में डालकर अदृश्य हो जाती है। चुपचाप पीछे-पीछे आए हुए राजा ने भी उनका यह संवाद सुन लिया।


अथ राजपुत्रो वीरवरो स्वावासं गत्वा निद्रालसां पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत् अखिलराजलक्ष्मीसंवादं च अवर्णयत्।

फिर राजकुमार वीरवर अपने घर गया और नींद से अलसाई हुई पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाया, और राजलक्ष्मी के साथ हुई सारी बातचीत का वर्णन किया।

शक्तिधरः – (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) हे पितः! जानाम्यहम् भवतः सर्वप्रियं वस्तु। तद् अहमेव भवतः प्रियतमः इति सर्वविदितः। धन्योऽहम् स्वामिजीवितरक्षार्थं यदि विनियुक्तः। तत् कोऽधुना विलम्बस्तात? एवंविधे कर्मणि राष्ट्रस्य राज्ञश्च हिताय मम सर्वस्वविनियोगः परमश्लाघ्यः।

शक्तिधर: – (यह सुनकर प्रसन्न होकर) हे पिता! मुझे पता है कि तुम्हारे लिए सबसे प्रिय वस्तु कौन है। वह मैं ही हूँ, जो तुम्हारे लिए सबसे प्रिय हूँ, यह सर्वविदित है। मैं धन्य हूँ यदि मुझे स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए नियुक्त किया जाए। तो अब देर किस बात की, हे पिता? इस प्रकार के कार्य में, जो राष्ट्र और राजा के हित के लिए है, मेरा सर्वस्व समर्पण अत्यंत प्रशंसनीय है।
यतः –

धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।

सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥ १॥

क्योंकि – बुद्धिमान् अपनी संपत्ति और जीवन को भी परोपकार के लिए त्याग देना चाहिए।

जब नाश निश्चित हो, तो उचित कारण से सर्वोत्तम त्याग करना चाहिए।

वेदरता – यद्येवम् अस्मत्कुलोचितं नाचरितव्यं तर्हि गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत्?

वेदरता – यदि ऐसा है, तो हमारे कुल के अनुकूल आचरण न करना चाहिए, तो स्वामी द्वारा दिए गए वेतन का चुकाने का क्या उपाय होगा?

वीरवती – धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च। तत् कथं विलम्ब्यते? एष एव गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारस्य उपायः।

वीरवती – मैं धन्य हूँ जिसका ऐसा पिता और भाई है। तो इसमें देर क्यों की जाए? यही स्वामी द्वारा दिए गए वेतन को चुकाने का उपाय है।

(ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गताः)

(फिर वे सभी सर्वमङ्गला के स्थान पर गए।)

वीरवरः – (देवीपूजां विधाय) भगवति! प्रसीद, विजयतां महाराजः शूद्रकः, गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः।

वीरवर: – (देवी की पूजा करके) हे देवी! प्रसन्न हों, महाराज शूद्रक की विजय हो, यह मेरा अर्पित उपहार ग्रहण करें।

वीरवरः – (स्वगतम्) कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रसमर्पणेन। अधुना पुत्रवियुक्तस्य मे जीवनं निष्फलम्।

वीरवर: – (अपने मन में) मैंने अपने पुत्र के समर्पण से स्वामी द्वारा दिए गए वेतन का निस्तार कर दिया है। अब पुत्र से वियुक्त मेरे जीवन का कोई मूल्य नहीं रहा।

(ततः सः आत्मानमपि देव्यै समर्पितवान्। ततस्तस्य पत्न्या दुहित्रा च तदेवाचरितम्। राजा शूद्रकोऽपि तेषां सर्वेषां सर्वमेतद् आचरितम् तददृश्य एवालोकयत्।)

(फिर उसने अपने आप को भी देवी को समर्पित कर दिया। उसके बाद उसकी पत्नी और पुत्री ने भी वही किया। राजा शूद्रक ने भी सबकी यह क्रिया अदृश्य होकर देखी।)

ततोऽसौ व्यचिन्तयत् –

जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।

अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति॥ २॥

फिर उसने विचार किया –

मेरे जैसे निम्न प्राणी जन्मते हैं और मरते हैं।

इस तरह का कोई लोके में पहले नहीं हुआ और न आगे होगा।

तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम्।

(देवीं प्रति प्रकटयन्) हे मातः! सर्वमङ्गले! गृहाण मे सर्वस्वम्। नेष्टं मे राज्यं न च जीवितं वा।

इस सब को त्याग देने के बाद मेरे राज्य का क्या उपयोग?

(देवी के प्रति प्रकट होकर) हे माता! सर्वमङ्गला! मेरा सब कुछ ग्रहण करें। न मुझे राज्य चाहिए, न जीवन।

देवी – (ततः प्रत्यक्षीभूतया भगवत्या सर्वमङ्गलया राज्ञः करं धृत्वा) वत्स! प्रसन्ना भवामि त्वयि, अलं साहसेन। नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति।

देवी – (फिर प्रत्यक्ष होकर भगवती सर्वमङ्गला ने राजा का हाथ पकड़कर) हे पुत्र! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, अब साहस की आवश्यकता नहीं। अब तुम्हारा राज्यभंग नहीं होगा।

राजा – (साष्टाङ्गं प्रणिपत्य) भगवति! न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा। यदि मयि कृपा भगवत्या जाता, तदा ममायुःशेषेणापि प्रत्यावर्तेत राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च।अन्यथा मया यथाप्राप्ता गतिर्गन्तव्या जगदम्ब!

राजा – (साष्टाङ्ग प्रणाम करके) हे देवी! मुझे न राज्य की इच्छा है, न जीवन की। यदि आप पर मेरी कृपा हुई, तो मेरे शेष जीवन से राजकुमार वीरवर अपने पुत्र, पत्नी और पुत्री के साथ वापस आ जाए। अन्यथा, हे जगदम्ब! मुझे जो गति मिली है, वही स्वीकार करनी पड़ेगी।

देवी – वत्स! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि। तद् गच्छ, विजयी भव। अयमपि सपरिवारो जयतु राजपुत्र आदर्शचरितो वीरवरः।

देवी – हे पुत्र! तुम्हारे साहस और भृत्यप्रेम से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। अब जाओ, विजयी बनो। यह राजकुमार वीरवर भी अपने परिवार के साथ, आदर्श चरित्र वाला, विजयी हो।

ततो देवी गताऽदर्शनम्। ततो वीरवरः सपरिवारो सानन्दं स्वगृहं गतः। नृपतिरपि सर्वेषामदृश्य एव स्वप्रासादं प्राविशत्। अन्येद्युः वीरवरोऽपि पुनः द्वारि सेवानिरतोऽभवत्।

फिर देवी अदृश्य हो गई। फिर वीरवर अपने परिवार के साथ प्रसन्न होकर अपने घर गया। राजा भी सबको अदृश्य होकर अपने प्रासाद में प्रवेश किया। दूसरे दिन वीरवर फिर से द्वार पर सेवा में लग गया।

राजा – (तं वीक्ष्य) का वार्ता राजपुत्र!

राजा – (उसे देखकर) हे राजकुमार! क्या वार्ता है?

वीरवरः – देव! सा रोदनपरा नारी मद्दर्शनाददृश्यतां गता। न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन्!

वीरवर: – हे देव! वह रोती हुई नारी मेरे दर्शन से अदृश्य हो गई। स्वामी! और कोई वार्ता नहीं है।

ततः परमां प्रीतिं गतो महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय।

फिर राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ और राजकुमार वीरवर को समग्र कर्नाटक प्रदेश दे दिया।

Chapter 10 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 10 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)


संस्कृत:

संस्कृतवाङ्मये कथासाहित्यस्य विशिष्टं स्थानम् अस्ति। कथानां द्वारा अतीव

मनोरञ्जकतया जीवनसम्बद्धाः विविधाः उपदेशाः, प्रेरणाः हि एतस्य साहित्यस्य

प्रयोजनम्। संस्कृतस्य कथासाहित्यम् अत्यन्तं समृद्धं वैविध्यपूर्णं च अस्ति।

प्रस्तुतः पाठः ‘हितोपदेशः’ इत्यस्मात् कथाग्रन्थात् स्वीकृतः। राज्ञः शूद्रकस्य

सेवायां नियुक्तस्य कस्यचित् वीरवरनामकस्य कर्तव्यनिष्ठस्य राजपुत्रस्य वैशिष्ट्यस्य वर्णनं

कथायामत्र वर्तते। सः राज्ञः राष्ट्रस्य च रक्षणाय स्वप्राणान् अपि अर्पयितुम् उद्यतः अभवत्।

तस्य स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः। अत्र एषः पाठः भागद्वये अस्ति।

पठनीया इयं वीरवरकथा। अनुकरणीयः अयं वीरवरः। 

हिंदी: अनुवाद 

संस्कृत साहित्य में कथा-साहित्य का विशेष स्थान है। कथाओं के माध्यम से बहुत ही रोचक ढंग से जीवन से जुड़े अनेक उपदेश और प्रेरणाएँ देना ही इस साहित्य का उद्देश्य है। संस्कृत का कथासाहित्य अत्यंत समृद्ध और विविधताओं से परिपूर्ण है। यह प्रस्तुत पाठ ‘हितोपदेश’ नामक कथाग्रंथ से लिया गया है। यहाँ इस कथा में राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त वीरवर नामक कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र की विशेषता का वर्णन है।वह राजा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों को भी अर्पित करने को तत्पर था। उसकी स्वामिभक्ति और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना प्रेरणा देने योग्य है। यह पाठ दो भागों में है। यह वीरवर की पठनीय कथा है। यह वीरवर अनुकरणीय है।


संस्कृत:

आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी। तत्र शूद्रको नाम महापराक्रमी नानाशास्त्रवित्

पूतचरित्रः महीपतिः प्रतिवसति स्म। अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि

देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्। तेन सह वेदरता नाम तस्य पत्नी, शक्तिधरो नाम सुतः, वीरवती

नाम कन्या च समायाताः।

एक शोभावती नाम की नगरी थी। वहाँ शूद्रक नामक अत्यंत पराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता, और पवित्र चरित्र वाला राजा निवास करता था। एक दिन वीरवर नामक एक राजपुत्र आजीविका के लिए किसी देश से राजद्वार पर आया। उसके साथ वेदरता नाम की पत्नी, शक्तिधर नामक पुत्र और वीरवती नाम की कन्या भी आईं।


वीरवरः — (प्रतिहारं वीक्ष्य) भोः प्रतिहार! वृत्त्यर्थम् आगतः राजपुत्रोऽस्मि, तस्मात् नय मां स्वामिनः समीपम्।

वीरवर — (द्वारपाल को देखकर) हे द्वारपाल! मैं आजीविका के लिए आया हुआ एक राजपुत्र हूँ, इसलिए मुझे अपने स्वामी के पास ले चलो।

(ततः दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्)

(तब द्वारपाल उसे राजा के पास ले गया।)

वीरवरः –     (प्रणामपुरस्सरं सविनयम्) देव ! यदि सौभाग्येन अहं भवतः सेवायां नियोजितः तर्हि  यदादिश्यते तत् श्रद्धया पालयिष्यामि ।

वीरवरः — (प्रणाम करके विनम्रता से) देव! यदि सौभाग्य से मैं आपकी सेवा में नियुक्त हो जाता हूँ तो जो भी आज्ञा दी जाएगी, मैं श्रद्धा से उसका पालन करूँगा।

राजा — किं ते वर्तनम्?

राजा — तुम्हारा वेतन कितना है?

वीरवरः — प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव!

वीरवर — प्रतिदिन चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ, देव!

राजा — का ते सामग्री?

राजा — तुम्हारे पास क्या सामग्री है?

वीरवरः — इमौ बाहू, एष खड्गश्च।

वीरवर — ये दोनों बाहें और यह तलवार।

राजा — नैतच्छक्यम्!

राजा — यह संभव नहीं है!

(तत् श्रुत्वा वीरवरः राजानं प्रणम्य राजसभातः निर्गतः)

(यह सुनकर वीरवर राजा को प्रणाम कर सभा से बाहर चला गया।)

मन्त्री — (तदालोक्य) देव! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपम् अस्य वेतनार्थिनः

राजपुत्रस्य, किमुपपन्नम् एतत् वेतनं न वेति। 

अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना। स च

राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम्। स्थितस्य

चार्द्धं दरिद्रेभ्यः ददाति, निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते। ततो

धृतायुधः सः राजद्वारमहर्निशं सेवते । यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम्।

अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्द्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।

(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः ।) 

मंत्री — (यह देखकर) हे देव! पहले चार दिन का वेतन देकर इस वेतन माँगने वाले राजपुत्र के स्वभाव की परीक्षा कर लें, कि वह इस वेतन के योग्य है या नहीं। फिर मंत्रियों के वचन के अनुसार उस राजपुत्र वीरवर को राजा ने ताम्बूल देने के कार्य में नियुक्त किया। और वह राजपुत्र प्रतिदिन प्रातःकाल राजा के दर्शन के बाद अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को अर्पित करता। बाकी का आधा दरिद्रों को देता है, और जो शेष बचता है, उसे अपने भोजन और पत्नी के भोग-विलास के लिए पत्नी को सौंप देता है। वह हथियार धारण करके दिन-रात राजद्वार की सेवा करता है। जब राजा स्वयं आज्ञा देता है, तभी वह अपने घर जाता है। फिर एक दिन कृष्ण चतुर्दशी की अर्धरात्रि में राजा ने किसी करुणा से भरे रोने की आवाज सुनी।

राजा — कोऽत्र द्वारि तिष्ठति?
राजा — इस द्वार पर कौन है?

वीरवरः — सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्तते देव!
वीरवर — सेवक वीरवर इस द्वार पर उपस्थित है, देव!

राजा — क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!
राजा — राजपुत्र! उस रोने की आवाज का अनुसरण करो!

वीरवरः — यथादिशति देवः।
वीरवर — जैसी आज्ञा हो प्रभु!

(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः।)
(तब वह उस रोने की ध्वनि का अनुसरण करते हुए चल पड़ा।)

राजा — (स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्।
राजा — (मन में) यह राजपुत्र अकेला इस सुई की तरह चुभने वाले अंधकार में नहीं जाना चाहिए।

तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतः अस्य, निरूपयामि च किमेतदिति।
इसलिए मैं भी इसके पीछे-पीछे चलता हूँ और देखता हूँ कि यह क्या मामला है।

(ततो नरपतिः खड्गपाणिः तस्य अनुसरणक्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात्। अथ

गच्छता राजपुत्रेण बहिः नगरात् आलोकिता रोदनपरा कापि सुन्दरी दिव्याभरणभूषिता।)

(तब राजा खड्गधारी होकर उसके पीछे-पीछे नगर द्वार से बाहर निकल पड़ा।)

और जाते हुए उस राजपुत्र ने नगर के बाहर एक रोती हुई दिव्य आभूषणों से सजी एक सुंदरी को देखा।

वीरवरः — का त्वम् अम्ब! किमर्थं विलपसि?

वीरवर — हे माता! आप कौन हैं? और क्यों विलाप कर रही हैं?

राजलक्ष्मीः – वत्स! अहमेतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि। चिरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता

सुखेन निवसामि। साम्प्रतं तु देव्या अपराधेन, अद्य प्रभृति तृतीये दिवसे राजा पञ्चत्वं

यास्यति। तदा अहम् अनाथा भविष्यामि। तदिदानीं नात्र स्थास्यामि इति क्रन्दामि।

राजलक्ष्मी – बेटा! मैं इस राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ। मैं लंबे समय से उसकी भुजाओं की छाया में अत्यंत सुखपूर्वक निवास कर रही हूँ। अब रानी के अपराध के कारण आज से तीसरे दिन राजा की मृत्यु हो जाएगी। तब मैं अनाथ हो जाऊँगी। इसलिए मैं अब यहाँ नहीं रहूँगी — ऐसा सोचकर रो रही हूँ।

वीरवरः – (तदाकर्ण्य प्रणिपत्य) भगवति! अस्त्यत्र कश्चिदुपायः येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी?
हे देवी! क्या ऐसा कोई उपाय है जिससे आपको फिर से यहाँ दीर्घकाल तक निवास का अवसर मिले और राजा दीर्घजीवी हो?

राजलक्ष्मीः – अस्ति वत्स! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा च अतीव दुःसाध्या।
है बेटा! एक ही विधि है, लेकिन वह बहुत कठिन है।

वीरवरः – (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) अम्ब! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः?
माँ! बताइए, वह कठिन उपाय क्या है?

राजलक्ष्मीः – श्रूयतां पुत्र! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै

उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रकः वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।

सुनो बेटा! यदि तुम अपने सबसे प्रिय वस्तु को हँसते हुए मन, वाणी और शरीर से भगवती सर्वमंगल को भेंट स्वरूप चढ़ाओ…

…तो राजा शूद्रक फिर से सौ वर्षों तक जीवित रहेगा और मैं भी सुखपूर्वक निवास कर सकूँगी।

(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतांतत्सम्मुखात्।)

(इसके बाद वह तत्काल वहाँ से अदृश्य हो गई।)

Chapter 9 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 9 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?


अम्ब! महती बुभुक्षा बाधते, शीघ्रं भोजनं परिवेषयतु।
माँ! मुझे बहुत भूख लग रही है, जल्दी से भोजन परोस दो।

वत्से, भोजनम् अत्युष्णम् अस्ति, किञ्चित् प्रतीक्षस्व।
बेटे, भोजन बहुत गर्म है, थोड़ा इंतजार करो।

उष्णं भोजन किमर्थं न ददाति?
गर्म भोजन क्यों नहीं देती?

वत्से! मुखे दाहः भवेत्, अपि च ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः।
बेटे! मुंह में जलन हो सकती है, और आयुर्वेद का उपदेश है कि बहुत गर्म भोजन हितकारी नहीं होता।

अम्ब! आयुर्वेदे बहवः आहारनियमाःन्ति इति अस्माकं शिक्षकः अपि बोधयति।
माँ! आयुर्वेद में कई आहार नियम हैं, ऐसा हमारे शिक्षक भी बताते हैं।

सत्यम् उक्तं वत्स! आहारविषये एकः रोचकः प्रसङ्गः अस्ति। युवाम् इच्छथ चेत् श्रावयामि।
सही कहा बेटे! आहार के बारे में एक रोचक प्रसंग है। अगर तुम सुनना चाहते हो तो सुनाऊं।

अस्तु अम्ब! यावत् भोजनं भोक्तुं योग्यं भवति तावत् तं श्रावयतु।
ठीक है माँ! जब तक भोजन खाने लायक न हो जाए, तब तक वह प्रसंग सुनाओ।

अस्तु, श्रूयताम्।
ठीक है, सुनो।


‘भारतवर्षे वैद्याः विभिन्नानां

व्याधीनां शमनं कथं कुर्वन्ति’ इति

ज्ञातुं पुरा भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं

शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत्।

भ्रमणकाले सः बहूनां प्रख्यातवैद्यानां

भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य

‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’

इति ध्वनिम् अकरोत्। किन्तु खगस्य

‘कोऽरुक्’ इति शब्दं प्रति कस्यापि

अवधानं नासीत्।


हिंदी अनुवाद

पहले भगवान धन्वंतरि ने यह जानने के लिए कि भारतवर्ष में वैद्य विभिन्न रोगों का इलाज कैसे करते हैं, सुंदर तोते का रूप धारण करके गाँव-गाँव भ्रमण किया। भ्रमण के समय उन्होंने कई प्रसिद्ध वैद्यों के घर के पास के पेड़ पर बैठकर ‘को अरुक्’ ‘को अरुक्’ ‘को अरुक्’ की आवाज की। लेकिन किसी ने भी तोते की ‘को अरुक्’ की आवाज पर ध्यान नहीं दिया।


अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्। तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं

पुष्पतरुम् आरुह्य मधुरया गिरा ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति शब्दम् अकरोत्।

मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्।

क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्। सार्थकं मानुषध्वनिम् कुर्वन्तं शुकं दृष्ट्वा

विस्मितः वाग्भटः चिन्तितवान् – “नायं लौकिकः खगः। एषः निश्चयेन कश्चन देवविशेषः

अस्ति”। सः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान् परन्तु सः खगः फलानि 

न गृहीत्वा पुनरपि तथैव ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नस्वरेण शब्दमकरोत्।

अथ वैद्यः वाग्भटः अचिन्तयत् यत् यावत् खगः स्वप्रश्नानाम् उत्तराणि न प्राप्नोति तावत्

अयं भोजनं न वाञ्छति इति। ततः सः अचिरादेव सूत्ररूपाणि त्रीणि उत्तराणि प्राददात् –

‘हितभुक्’ ‘मितभुक्’ ‘ऋतुभुक्’ इति। समुचितम् उत्तरं श्रुत्वा अत्यन्तं प्रीतः सः शुकः वाग्भटेन अर्पितानि फलानि खादितवान्।

हिंदी अनुवाद

अंत में वे वैद्य वाग्भट के घर के पास गए। वहाँ बड़े प्रांगण में खड़े फूलों के पेड़ पर चढ़कर मधुर स्वर में ‘को अरुक्’ ‘को अरुक्’ ‘को अरुक्’ की आवाज की। मधुर वाणी सुनकर चिकित्सा में निपुण वाग्भट प्रांगण में आए और चारों ओर देखा। थोड़ी देर में वाग्भट ने उस सुंदर तोते को देखा। अर्थपूर्ण मानव-स्वर में बोलते हुए तोते को देखकर वे चकित हुए और सोचा, “यह साधारण पक्षी नहीं है। यह निश्चित रूप से कोई देवता है।” उन्होंने तुरंत उस पक्षी को मधुर फल अर्पित किए, लेकिन वह तोता फल नहीं लेता और फिर वैसे ही ‘को अरुक्’ ‘को अरुक्’ ‘को अरुक्’ की प्रश्नात्मक आवाज की। तब वैद्य वाग्भट ने सोचा कि जब तक यह तोता अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं पाता, तब तक यह भोजन नहीं चाहता। फिर उन्होंने तुरंत तीन सूत्रात्मक उत्तर दिए – ‘हितभुक्’ ‘मितभुक्’ ‘ऋतुभुक्’। उचित उत्तर सुनकर अत्यंत प्रसन्न होकर वह तोता वाग्भट द्वारा अर्पित फल खाने लगा।


ततः शुकरूपः धन्वन्तरिः वाग्भटम् उक्तवान् – “वत्स! अहं धन्वन्तरिः अस्मि। उत्तमस्य

वैद्यस्य अन्वेषणाय भारतवर्षे सर्वत्र परिभ्रमन् अत्र समागतः। तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन

अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि। त्वम् अवश्यमेव आयुर्वेद-अष्टाङ्गविचार-सारभूतं तन्त्रं

विरचयेः” एतद् उक्त्वा सः अन्तर्हितः।

हिंदी अनुवाद

फिर तोते के रूप में धन्वंतरि ने वाग्भट से कहा, “बेटे! मैं धन्वंतरि हूँ। उत्तम वैद्य की खोज में भारतवर्ष में सर्वत्र भ्रमण करके यहाँ आया हूँ। तुम्हारे उत्कृष्ट आयुर्वेद ज्ञान से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। तुम्हें अवश्य ही आयुर्वेद-अष्टांग विचार का सारभूत तंत्र रचना चाहिए।” ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गए।


एतत् सर्वं दूरात् पश्यन्तः विस्मिताः शिष्याः

आचार्यवाग्भटस्य समीपम् आगत्य अपृच्छन् –

“गुरुवर! शुकः ‘कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्’

इति उक्तवान्, तस्य कोऽर्थः? अपि च भवान् किम्

उत्तरं दत्तवान्?” तदा वाग्भटः छात्राणां जिज्ञासाम्

उपशमयन् कथयति – “छात्राः, शृणुत! एषः शुकः

वदति यत् कः अरुक् अर्थात् कः स्वस्थः नीरोगः वा

वर्तते? तदा मया उक्तम् –

‘यः हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् च, सः एव सर्वदा

स्वस्थः भवति’।” छात्राः पुनः जिज्ञासया अपृच्छन्

“आचार्य! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ इति –

एतेषां कः आशयः?” वाग्भटः वदति – “शिष्याः!

महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः। सः

हितभुक्-विषये कथयति –

हिंदी अनुवाद

यह सब दूर से देखकर चकित शिष्य वाग्भट आचार्य के पास आए और पूछा, “गुरुदेव! तोते ने ‘को अरुक् को अरुक् को अरुक्’ कहा, इसका क्या अर्थ है? और आपने क्या उत्तर दिया?” तब वाग्भट ने शिष्यों की जिज्ञासा शांत करते हुए कहा, “शिष्यो, सुनो! यह तोता कहता है कि कौन अरुक्, अर्थात् कौन स्वस्थ या नीरोग है? तब मैंने कहा, ‘जो हितभुक्, मितभुक् और ऋतुभुक् है, वही हमेशा स्वस्थ रहता है।’” शिष्यों ने फिर जिज्ञासा से पूछा, “आचार्य! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ का क्या अर्थ है?” वाग्भट ने कहा, “शिष्यो! महर्षि चरक का नाम तुमने सुना होगा। उन्होंने हितभुक् के बारे में कहा –

जो आहार स्वास्थ्य का पालन करता है और उत्पन्न न हुए रोगों को होने से रोकता है, उसे नियमित रूप से ग्रहण करना चाहिए।”


अर्थात् यस्य आहारस्य सेवनेन स्वास्थ्यस्य रक्षणं भवेत्, न जातानाम् अर्थात्

अनुत्पन्नानां विकाराणाम् उत्पत्तिः न भवेत्, तादृशः आहारः सेवनीयः।

मितभुक्-विषये कथयति आचार्यः –

हिंदी अनुवाद

अर्थात् जिस आहार के सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा होती है और उत्पन्न न हुए रोगों का उदय नहीं होता, ऐसा आहार ग्रहण करना चाहिए। अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने। मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे। मितभुक् के बारे में आचार्य कहते हैं –

भारी पदार्थों को थोड़ा और हल्के पदार्थों को अधिक सेवन करने से माप के कारण वस्तुओं का भारीपन या हल्कापन तय होता है।


अर्थात् गरिष्ठद्रव्याणि अपि अल्पमात्रं सेवनेन सुपाच्यानि भवन्ति, लघुद्रव्याणि चापि

अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते। अतः मात्रानुसारम् एव खादितव्यम्।

एवमेव ऋतुभुक् विषये उच्यते –

हिंदी अनुवाद

अर्थात् भारी पदार्थ भी थोड़े सेवन से सुपाच्य हो जाते हैं, और हल्के पदार्थ अधिक सेवन से हानिकारक हो जाते हैं। इसलिए माप के अनुसार ही खाना चाहिए। इसी तरह ऋतुभुक् के बारे में कहा जाता है –

उसके खाए गए आहार से बल और वर्ण बढ़ता है, और उसके लिए ऋतु के अनुकूल आहार और व्यवहार का ज्ञान होना चाहिए।


अर्थात् ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति।

यः पुरुषः ऋतूनाम् अनुकूलं स्वास्थ्यप्रदम् आहारसेवनं जानाति तदनुसारम् आचरणं च

करोति तस्य जनस्य अशितम् अर्थात् भुक्तं पीतं च सर्वमपि बलवर्धकं, वर्णकान्तिजनकं,

सुखवर्धकम्, आयुर्वर्धकञ्च भवति। अतः ऋतोः अनुसारं भोक्तव्यम् इति। नियमितरूपेण

समयानुसारं सात्त्विकं भोजनम् आवश्यकमिति ऋतुभुक्-पदेन ज्ञायते।”

हिंदी अनुवाद

अर्थात् ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमंत और वसंत – ये छह ऋतुएँ हैं। जो व्यक्ति ऋतुओं के अनुकूल स्वास्थ्यवर्धक आहार जानता है और उसके अनुसार आचरण करता है, उसके खाए-पीए गए सभी पदार्थ बलवर्धक, वर्ण को निखारने वाले, सुख और आयु बढ़ाने वाले होते हैं। इसलिए ऋतु के अनुसार खाना चाहिए। नियमित रूप से समय के अनुसार सात्विक भोजन आवश्यक है, यह ऋतुभुक् शब्द से समझा जाता है।”


एतत् सर्वं श्रुत्वा कश्चन छात्रः वाग्भटम् अपृच्छत् – “आचार्य! हितभुगादिविषये

वयं तु ज्ञातवन्तः, किन्तु किं सः शुकः सन्तुष्टः अभवत्”? तदा वाग्भटः शुकस्य रहस्यम्

उक्तवान् – “प्रियशिष्याः! अयं विहगः न सामान्यविहगः, अपि तु आयुर्वेदस्य पूज्यः

देवः भगवान् धन्वन्तरिः एव स्वयं शकुरूपेणात्र आगच्छत्। अस्माकं कृते संषेपेण

स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशसन्दे च प्रदत्तवान्, भवन्तः अपि शणृ्वन्तु स्मरन्तु च –

हिंदी अनुवाद

यह सब सुनकर एक शिष्य ने वाग्भट से पूछा, “आचार्य! हितभुक् आदि के बारे में हम जानते हैं, लेकिन क्या वह तोता संतुष्ट हुआ?” तब वाग्भट ने तोते का रहस्य बताया, “प्रिय शिष्यो! यह पक्षी साधारण पक्षी नहीं, बल्कि आयुर्वेद के पूजनीय देव भगवान धन्वंतरि स्वयं तोते के रूप में यहाँ आए। उन्होंने हमारे लिए संक्षेप में स्वास्थ्य रक्षण के लिए सूत्र रूप में संदेश और उपदेश दिए, तुम भी सुनो और याद करो –

प्रातः उठकर व्यायाम, रोज दांत साफ करना, स्वच्छ जल से स्नान, और भूख लगने पर भोजन।”


अस्माकम ऋषयः नित्यं प्रार्थनाम् अपि कुर्वन्ति। वयमपि स्मरामः –

हिंदी अनुवाद

हमारे ऋषि रोज प्रार्थना भी करते हैं। हम भी याद करें – सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी शुभ देखें, कोई दुखी न हो।

Chapter 8 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 8 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्


अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरं, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्डं, त्रिपुरा एवञ्च सिक्किमः इत्येतानि अष्टराज्यानि देशस्य पूर्वोत्तरभागे स्थितानि। एतानि राज्यानि भारतस्य केवलं स्थानविशेषत्वेन न, अपितु सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-विविधतायाः कारणेन विशेषमहत्त्वं वहन्ति। एषां प्रदेशानां प्राकृतिकं सौन्दर्यं, समुदायानां विविधता, भौगोलिक-पर्यावरणीयं वैचित्र्यं च देशस्य अन्येभ्यः भागेभ्यः पृथक् अस्ति। पर्वतैः नदीभिः च सुशोभितानि एतानि राज्यानि पूर्वहिमालय-श्रेणिषु पत्काई-नागपर्वत- प्रदेशे च स्थितानि। एतेषु बराक-ब्रह्मपुत्रादि-नद्यः प्रवहन्ति एवञ्च पर्वतश्रेण्यः, पीठस्थलानि, निम्नपर्वताः, उपत्यकाः च अस्मिन् भू-भागे भू-वैविध्यं धारयन्ति । प्राकृतिक-सम्पदाभिः समृद्धः अयं प्रदेशः पूर्व-दक्षिणपूर्व-एशियायाः द्वारम् अस्ति। तानि राज्यानि अष्टभ्रातृभगिन्यः इति नाम्ना प्रसिद्धानि सन्ति । तानि एव ‘अष्टभगिन्यः’ अथवा ‘सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च’ इति कथ्यन्ते ।

अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा तथा सिक्किम — ये आठ राज्य देश के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित हैं। ये राज्य भारत के लिए केवल स्थान विशेष होने के कारण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और विविधता के कारण विशेष महत्त्व रखते हैं। इन प्रदेशों का प्राकृतिक सौंदर्य, समुदायों की विविधता, भौगोलिक और पर्यावरणीय विचित्रता देश के अन्य भागों से इन्हें अलग बनाती है। पर्वतों और नदियों से सुशोभित ये राज्य पूर्वी हिमालय श्रृंखलाओं, पटकाई और नागा पर्वत क्षेत्रों में स्थित हैं। इन क्षेत्रों में बराक और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ बहती हैं तथा पर्वतश्रेणियाँ, पठार, निम्न पर्वत और घाटियाँ इस भू-भाग को भौगोलिक रूप से विविध बनाती हैं। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध यह क्षेत्र पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक द्वार है। ये राज्य ‘आठ भाई-बहन’ नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हें ‘आठ बहनें’ या ‘सात बहनें और एक भाई’ भी कहा जाता है।

अध्यापिका – सुप्रभातं छात्राः।
शिक्षिका – सुप्रभात बच्चो!

छात्राः – सुप्रभातम् आचार्ये।
छात्र – सुप्रभात, आचार्यवर्य!

अध्यापिका – शुभाशयाः। अद्य किं पठनीयम्?
शिक्षिका – शुभकामनाएँ। आज क्या पढ़ना है?

छात्राः – वयं सर्वे स्वदेशस्य राज्यानां विषये ज्ञातुमिच्छामः।
छात्र – हम सब अपने देश के राज्यों के बारे में जानना चाहते हैं।

अध्यापिका – शोभनम्। वदत, अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?
शिक्षिका – अच्छा! बताओ, हमारे देश में कितने राज्य हैं?

स्वरा – महोदये! मम भगिनी कथयति यत् अस्माकं देशे अष्टाविंशतिः राज्यानि सन्ति इति। एतद् अतिरिच्य अष्ट केन्द्रशासितप्रदेशाः अपि सन्ति।
स्वरा – मैम! मेरी बहन कहती है कि हमारे देश में 28 राज्य हैं। इसके अतिरिक्त 8 केंद्रशासित प्रदेश भी हैं।

अध्यापिका – शोभनं स्वरे! सम्यक् जानाति तव भगिनी। भवतु, अपि यूयं जानीथ यद् एतेषु राज्येषु अष्टराज्यानाम् एकः समवायः अस्ति यः सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च इति नाम्ना प्रथितः अस्ति।
शिक्षिका – अच्छा स्वरा! तुम्हारी बहन अच्छी जानकारी रखती है। बताओ, क्या तुम लोग जानते हो कि इन राज्यों में आठ का एक समूह है जो ‘सात बहनें और एक भाई’ के नाम से जाना जाता है?

सर्वे छात्राः – (परस्परं साश्चर्यं पश्यन्तः) सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च!
सभी छात्र – (आपस में आश्चर्य से देखते हुए) सात बहनें और एक भाई!

श्रीशः – इमानि राज्यानि सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च इति किमर्थं कथ्यन्ते?
श्रीश – इन राज्यों को ‘सात बहनें और एक भाई’ क्यों कहा जाता है?

अध्यापिका – प्रयोगोऽयं प्रतीकात्मको वर्तते। कदाचित् सामाजिक-सांस्कृतिक-परिदृश्यानां साम्याद् भौगोलिकवैशिष्ट्यात् च इमानि उक्तोपाधिना प्रथितानि।
शिक्षिका – यह नाम प्रतीकात्मक है। संभवतः इन राज्यों की सामाजिक-सांस्कृतिक समानता और भौगोलिक विशेषता के कारण इन्हें इस उपाधि से जाना गया है।

सर्वे छात्राः – अहो! अत्यन्तं सुखकरी वार्ता। श्रावयतु तावद् यत् कानि तानि राज्यानि इति?
सभी छात्र – ओह! कितनी रोचक बात है। कृपया बताइए कि वे कौन-कौन से राज्य हैं?

अध्यापिका –

शिक्षिका – “दो, फिर तीन, तीन से एक कम और फिर दो – इस प्रकार यह सात राज्यों का समूह ‘सात बहनें’ कहा गया है।
इसके साथ जो छोटा भाई जुड़ा है, वह सिक्किम राज्य है।
आओ देखो भारत का मनोहर उत्तर-पूर्वी कोना!”
इस प्रकार भाई सिक्किम के साथ सात बहनों के ये राज्य हैं – अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा।
यद्यपि क्षेत्रफल की दृष्टि से ये राज्य छोटे हैं, परंतु विशेषताओं और महत्त्व की दृष्टि से ये बड़े माने जाते हैं।

इत्थं भ्रात्रा सिक्किमेन सह भगिनीसप्तके इमानि राज्यानि सन्ति – अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरम्, मिजोरमः, मेघालयः, नागालैण्डं, त्रिपुरा चेति। यद्यपि क्षेत्रपरिमाणैः इमानि लघूनि वर्तन्ते तथापि गुणगौरवदृष्ट्या बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।

इस प्रकार भाई सिक्किम सहित सात बहनों के ये राज्य हैं – अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा। यद्यपि क्षेत्रफल की दृष्टि से ये राज्य छोटे हैं, परंतु विशेषताओं और महत्त्व की दृष्टि से बड़े माने जाते हैं।

सर्वे छात्राः – कथं मान्ये!
सभी छात्र – कैसे मैम?

अध्यापिका – भ्रात्रा सह इमाः सप्तभगिन्यः स्वीये प्राचीनेतिहासे प्रायः स्वाधीनाः एव दृष्टाः। न केनापि शासकेन इमाः स्वायत्तीकृताः। विविध संस्कृतिविशिष्टायां भारतभूमौ एतासां भ्रातृ-भगिनीनां संस्कृतिः महत्त्वाधायिनी वर्तते।
शिक्षिका – यह सात बहनें और उनका भाई, प्राचीन इतिहास में स्वतंत्र रूप से देखे जाते हैं। किसी भी शासक ने इन्हें अपने अधीन नहीं किया। विभिन्न संस्कृतियों से समृद्ध भारतभूमि में इन भाई-बहनों की संस्कृति विशेष महत्व रखती है।

स्वरा – अन्यत् किमपि वैशिष्ट्यमस्ति एतासाम्?
स्वरा – क्या इनकी कोई और विशेषता भी है?

अध्यापिका – नूनम् अस्ति एव। पर्वत-वृक्ष-पुष्प-प्रभृतिभिः प्राकृतिकसम्पद्भिः सुसमृद्धानि सन्ति इमानि राज्यानि। भारतवृक्षे पुष्प-स्तबकसदृशानि विराजन्ते एतानि। अस्ति तावदेतेषां विषये किञ्चिद् वैशिष्ट्यमपि कथनीयम्। सावहितमनसा शृणुत। जनजातिबहुलप्रदेशोऽयम्। गारो–खासी–नागा–मिजो–लेप्चा–प्रभृतयः बहवः जनजातीयाः अत्र निवसन्ति। शरीरेण ऊर्जस्विनः एतत्प्रादेशिकाः बहुभाषाभिः समन्विताः, पर्वपरम्पराभिः परिपूरिताः, स्वलीला-कलासु च निष्णाताः सन्ति।

शिक्षिका – निश्चय ही है। ये राज्य पर्वतों, वृक्षों, फूलों जैसी प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध हैं। भारत रूपी वृक्ष में ये पुष्पों के गुच्छों के समान सुशोभित हैं। इनके विषय में कुछ और विशेषताएँ भी बताने योग्य हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। यह जनजातियों से भरा क्षेत्र है। गारो, खासी, नागा, मिजो, लेप्चा आदि अनेक जनजातियाँ यहाँ निवास करती हैं। शारीरिक रूप से सबल ये लोग अनेक भाषाओं में निपुण, पर्व-परंपराओं से युक्त और अपने कला-नाट्य में दक्ष हैं।

मालती – महोदये! तत्र तु वंशवृक्षाणां वनानि अपि प्राप्यन्ते?
मालती – मैम! क्या वहाँ बाँस के जंगल भी मिलते हैं?

अध्यापिका – आम्। प्रदेशेऽस्मिन् हस्तशिल्पानां बाहुल्यं वर्तते। आवस्त्राभूषणेभ्यः गृहनिर्माणपर्यन्तं प्रायः वंशवृक्षनिर्मितानां वस्तूनाम् उपयोगः क्रियते। यतो हि अत्र वंशवृक्षाणां प्राचुर्यं विद्यते। साम्प्रतं वंशोद्योगोऽयम् अन्ताराष्ट्रीयख्यातिम् अवाप्तोऽस्ति।

शिक्षिका – हाँ, इस क्षेत्र में हस्तशिल्प की बहुतायत है। वस्त्र, आभूषणों से लेकर घर बनाने तक, प्रायः बाँस से बनी चीजों का प्रयोग होता है। क्योंकि यहाँ बाँस के वृक्ष प्रचुर मात्रा में हैं। आजकल बाँस का उद्योग अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका है।

अभिनवः – भ्रातृ-भगिनीप्रदेशोऽयं बह्वाकर्षकः इति प्रतीयते।
अभिनव – यह भाई-बहन राज्य समूह अत्यंत आकर्षक प्रतीत होता है।

मृदुलः – मान्ये! किं भ्रमणाय भ्रातृ-भगिनीप्रदेशोऽयं समीचीनः?
मृदुल – मैम! क्या भ्रमण के लिए यह भाई-बहन प्रदेश उपयुक्त है?

सर्वे छात्राः – (उच्चैः) महोदये! आगामिनि अवकाशे वयं तत्रैव गन्तुमिच्छामः।
सभी छात्र – (ज़ोर से) मैम! अगले अवकाश में हम वहीं जाना चाहते हैं।

स्वरा – आचार्ये! भवती अपि अस्माभिः सार्द्धं चलतु किल।
स्वरा – मैम! आप भी हमारे साथ चलिए न।

अध्यापिका – रोचते मेऽयं विचारः। एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थं स्वर्गसदृशानि सन्ति।
शिक्षिका – मुझे यह विचार बहुत अच्छा लगा। ये राज्य भ्रमण के लिए स्वर्ग के समान हैं।

Chapter 7 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 7 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

भगिनि ! अद्य श्रावणीं पूर्णिमा अस्ति। वदतु एतस्याः किं वैशिष्ट्यम्?
बहन! आज श्रावणी पूर्णिमा है। बताओ, इसकी क्या विशेषता है?

सत्यम्। किं भवत्याः विद्यालये संस्कृतदिवसम् अधिकृत्य केषाञ्चन विशिष्टकार्यक्रमाणां योजना कृता?
सही है। क्या तुम्हारे विद्यालय में संस्कृत दिवस के अवसर पर कुछ विशेष कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है?

अहं जानामि अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।
मुझे ज्ञात है कि आज संस्कृत दिवस है। हम इसे पूरे सप्ताह मना रहे हैं।

आम् ओमिते! मम विद्यालये अनेकेषां कार्यक्रमाणां योजना रचिता।
हाँ ओमिते! मेरे विद्यालय में कई कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है।

अहो एवम्! किं तत्र भवती भागं ग्रहीष्यति?
अरे, ऐसा है! क्या तुम वहाँ भाग लोगी?

आम् ओमिते! अहं तु गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यामि।
हाँ ओमिते! मैं तो गीत-गायन प्रतियोगिता में भाग लूँगी।

भगिनि! तत्र भवती किं गीतं गास्यति? कृपया मामपि श्रावयतु।
बहन! वहाँ तुम कौन-सा गीत गाओगी? कृपया मुझे भी सुनाओ।

भगिनि! अहमपि आगन्तुम् इच्छामि।
बहन! मैं भी आना चाहती हूँ।

अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छामि।
ज़रूर। मैं अभी तुम्हारे लिए निमंत्रण-पत्र दे रही हूँ।

अस्तु अहं गायामि, भवती अनुगायतु।
ठीक है, मैं गाती हूँ, तुम मेरे साथ गाओ।


पदच्छेदः – मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। अयि मातः! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा।

पदच्छेद: in hindi – हे सुंदर और सुगंधित भाषा! तुम मुनियों द्वारा विकसित और कवियों द्वारा संवर्धित मधुर ज्ञान की पेटी हो।

अन्वयः – (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि)। अयि मातः! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।

अन्वयः in hindi – हे माता! तुम्हारी पोषण शक्ति मेरे वचनों से परे है, हे सुंदर और सुगंधित भाषा!

भावार्थः – संस्कृतभाषा अतीव सुन्दरभाषा देवभाषारूपेण च परिचिता अस्ति। मुनयः अस्याः संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः। एषा भाषा भूयिष्ठानां भारतीयभाषाणां, तथा  विश्वस्य बहूनां भाषाणां च जननी-भाषा (स्रोतो- भाषा) गुरुभाषा (पूरक-भाषा) वा अस्ति । बहवः कवयः काव्यरचनया अस्याः सौन्दर्यं वर्धितवन्तः । कोमलपदावल्या परिपूर्णा एषा ज्ञानपेटिका अस्ति। संस्कृतभाषा स्वपदावलिभिः अन्याः भाषाः ज्ञानं विज्ञानं च परिपोषयति। संस्कृतभाषायाः गौरवं वर्णनातीतम् अस्ति ।

भावार्थ: in hindi : –  संस्कृत भाषा अत्यंत सुंदर और देवताओं की भाषा के रूप में जानी जाती है। मुनियों ने इसकी उन्नति की, और कवियों ने इसके सौंदर्य को बढ़ाया। यह कोमल शब्दों से भरी ज्ञान की पेटी है, जो अन्य भारतीय और विश्व की कई भाषाओं को पोषित करती है। इसका गौरव वर्णन से परे है।


पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनाम् कालिदास-बाणादिकवीनाम् पौराणिक-सामान्य-जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा।

पदच्छेद: in hindi – हे सुंदर और सुगंधित भाषा! तुम वेदव्यास और वाल्मीकि जैसे मुनियों, कालिदास और बाण जैसे कवियों, प्राचीन और साधारण लोगों की जीवन की आशा हो।

अन्वयः – (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि)।

अन्वयः in hindi – तुम वेदव्यास और वाल्मीकि मुनियों के, कालिदास, बाण आदि कवियों के, पौराणिक विद्वानों और सामान्य जनों के जीवन की आशा हो। तुम सुंदर और मधुर भाषा हो।

भावार्थः – संस्कृतभाषा अति रमणीया भाषा अस्ति । वाल्मीकि-वेदव्यास-इत्यादयः मुनयः रामायण-महाभारत-पुराणादीन् ग्रन्थान् रचितवन्तः। कालिदास-बाणभट्ट-प्रभृतयः विशिष्टाः कवयः अपि उपादेयानि काव्यानि रचितवन्तः । प्राचीनकालाद् आरभ्य इदानीं यावत् सामान्यजनानां जीवनं संस्कृतभाषया रचितैः काव्यैः प्रभावितम् अस्ति । संस्कृतभाषा बहूनां लक्ष्याणां प्रापिका अस्ति। अतः संस्कृतभाषा सुन्दरभाषा अस्ति ।

भावार्थ: in hindi : – संस्कृत भाषा अत्यंत रमणीय है। वाल्मीकि और वेदव्यास जैसे मुनियों ने रामायण, महाभारत और पुराण जैसे ग्रंथ लिखे। कालिदास और बाणभट्ट जैसे कवियों ने उत्कृष्ट काव्य रचे। प्राचीन काल से लेकर अब तक साधारण लोगों का जीवन इस भाषा के काव्यों से प्रभावित रहा है। यह कई लक्ष्यों को प्राप्त करने वाली भाषा है।


पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।

पदच्छेद: in hindi – “जो कानों को सुख देने वाली ध्वनि करती है, सबको आनंद देती है, स्मृति के लिए हितकारी है, रस से भरी हुई मनोरंजन करती है, गति और बुद्धि को प्रेरित करने वाले काव्य में निपुण है — वही तुम्हारी यह सुंदर और सुगंधित भाषा, संस्कृत है।”

अन्वयः – हे! श्रुतिसुखनिनदे! सकलप्रमोदे! स्मृतिहितवरदे! सरसविनोदे! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।

अन्वयः in hindi – हे सुनने में सुखद नाद, सभी का आनंद, स्मृति के लिए हितकारी वरदान, सरस मनोरंजन, गति-बुद्धि को प्रेरित करने वाली काव्य की विदुषी! तुम्हारी यह संस्कृति है, हे सुंदर और सुगंधित भाषा!

भावार्थः – वस्तुतः रमणीया देवत्वविधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृतेः जननी सदृश अस्ति। संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति। संस्कृतभाषा वररूपेण संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रयच्छति, सरसं विनोदभावं च प्रकाशयति । मानवजीवने उत्तमां गतिं बुद्धिं च प्रददाति । काव्यशास्त्रपरिपूर्णा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृतिं रक्षति प्रसारयति च।

भावार्थ: in hindi : – यह सुंदर और दिव्य संस्कृत भाषा हमारी संस्कृति की जननी है। इसके सुनने से सुख बढ़ता है, सभी आनंदित होते हैं। यह संस्कारजन्य ज्ञान और सरस मनोरंजन प्रदान करती है। यह मनुष्य के जीवन को उत्तम गति और बुद्धि देती है। काव्य से परिपूर्ण यह हमारी संस्कृति को संरक्षित और प्रसारित करती है।


पदच्छेदः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय-वेदान्त-विचारा। वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।

पदच्छेद: in hindi – “नवरसों से सुशोभित, अलंकारों की धारा से युक्त, वेद-विषयों और वेदान्त के विचारों से सम्पन्न, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र आदि में रमण करने वाली — ऐसी सुंदर और मधुर संस्कृत भाषा पृथ्वी पर विजयी हो।”

अन्वयः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।

अन्वयः in hindi – नव रसों की रुचिकर धारा, अलंकारों से सुशोभित, वेद और वेदांत के विचार, चिकित्सा और आकाश शास्त्र आदि के विहार से, पृथ्वी पर विजय प्राप्त करती है, हे सुंदर और सुगंधित भाषा!

भावार्थः – संस्कृतकाव्यशास्त्रेषु शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति । शब्दार्थपूर्णाः विविधाः अलङ्काराः शोभन्ते।वेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति । चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सह संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति। एवं संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयते।

भावार्थ: in hindi : – संस्कृत काव्य शास्त्र में शृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांति जैसे नौ रस हैं। इसके शब्द और अर्थ से भरे अलंकार शोभायमान हैं। वेद, उपनिषद, वेदांत और पुराण के विचार लोगों को प्रेरित करते हैं। चिकित्सा विज्ञान, खगोल शास्त्र आदि के साथ यह भाषा पृथ्वी पर विजय प्राप्त करती है।

Chapter 6 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 6 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

डिजिभारतम् – युगपरिवर्त



Sanskrit :

अस्माकं देशः भारतं न केवलं सांस्कृतिकक्षेत्रे समृद्धम्,

अपि तु नित्यम् आविष्कारैः कीर्तिं लभते। अद्य सम्पूर्णविश्वे

‘डिजिटल्-भारतम्’ इत्यस्य चर्चा श्रूयते । एकस्यैव पिञ्जस्य

नोदनेन सर्वं नागरिक-सौविध्यं लभ्यते। अनेन भारतीयानां

जीवनम् अधिकं सरलं जायमानम् अस्ति । डिजिटल-पटले

सम्पूर्णा वसुधा कुटुम्बवत् अस्ति। अधुना वयं भारतस्य डिजिटल्-प्रगतेः विषये पठामः।

Hindi Translation

हमारा देश भारत न केवल सांस्कृतिक क्षेत्र में समृद्ध है, बल्कि निरंतर आविष्कारों द्वारा भी विश्वभर में ख्याति प्राप्त कर रहा है। आज पूरे विश्व में ‘डिजिटल भारत’ की चर्चा हो रही है। केवल एक उंगली के स्पर्श से सभी नागरिक सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं। इससे भारतीयों का जीवन और अधिक सरल होता जा रहा है। डिजिटल मंच पर पूरी दुनिया एक परिवार की तरह प्रतीत होती है। अब हम भारत की डिजिटल प्रगति के विषय में पढ़ेंगे।

Sanskrit :

(नवदेहलीस्थः प्रधानमन्त्रिसङ्ग्रहालयः । अत्र विविधाः डिजिटल प्रौद्योगिक्यः प्रदर्शित सन्ति। सर्वे उत्सुकतया सङ्ग्रहालये प्रदर्शितानि वस्तूनि पश्यन्ति ।)

Hindi Translation

(नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय। यहाँ विभिन्न डिजिटल तकनीकों का प्रदर्शन किया गया है। सभी छात्र उत्सुकता से संग्रहालय में प्रदर्शित वस्तुओं को देख रहे हैं।)

Sanskrit :

अध्यापकः – बालाः ! प्रधानमन्त्रिसङ्ग्रहालये युष्माकं सर्वेषां स्वागतम्। अत्र विविधाः डिजिटल्- प्रौद्योगिक्यः प्रयुक्ताः सन्ति। सानन्दं सावधानं च पश्यन्तु। अनन्तरं एतस्योपरि चर्चां करिष्यामः।

(सर्वे बालाः प्रदर्शितानि विविधानि वस्तूनि उत्साहेन पश्यन्ति, अनुभवन्ति, परस्परं चर्चाम् अपि कुर्वन्ति ।)

Hindi Translation

अध्यापक – बच्चों! प्रधानमंत्री संग्रहालय में आप सभी का स्वागत है। यहाँ विभिन्न डिजिटल तकनीकों का प्रयोग किया गया है। सभी ध्यानपूर्वक और प्रसन्नता से देखें। बाद में हम इस पर चर्चा करेंगे।

(सभी छात्र विभिन्न प्रदर्शनों को उत्साहपूर्वक देखते हैं, अनुभव करते हैं और आपस में चर्चा भी करते हैं।)

Sanskrit :

सर्वे छात्राः  – अद्भुतं महोदय ! अत्र हॉलोग्राम्-द्वारा प्रधानमन्त्रिणः भाषणं श्रूयते दृश्यते च । प्रत्यक्षमेव प्रधानमन्त्री अत्र उपविष्टः इति भासते।

Hindi Translation

सभी छात्र – अद्भुत है, महोदय! यहाँ होलोग्राम के माध्यम से प्रधानमंत्री का भाषण सुनाई और दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित हैं।

Sanskrit :

यशिका  ―    सत्यम्, अहम् अपि हॉलोग्रामं दृष्टवती। अनेन दिवङ्गताः नेतारः अपि जीविताः इव दृश्यन्ते।

Hindi Translation

यशिका – सच में, मैंने भी होलोग्राम देखा। इससे दिवंगत नेता भी जीवित जैसे प्रतीत होते हैं।

Sanskrit :

अथर्वः   ―      अत्र ‘वर्धिता-वास्तविकता’ (AR) ‘आभासीया-वास्तविकता’ (VR) च इत्याभ्यां सम्बद्धानि उपकरणानि अपि सन्ति, अनेन ऐतिहासिकवृत्तानि प्रत्यक्षम् इव अनुभूयन्ते । ‘भारतीय-स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामं दृष्ट्वा अस्माकं पूर्वजानां संघर्षः कियान् विशालः आसीत् इति ज्ञायते ।

Hindi Translation

अथर्व – यहाँ ‘वर्धित वास्तविकता’ (AR) और ‘आभासी वास्तविकता’ (VR) से संबंधित उपकरण भी हैं, जिससे ऐतिहासिक घटनाएँ प्रत्यक्ष रूप में अनुभव होती हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को देखकर यह समझ में आता है कि हमारे पूर्वजों का संघर्ष कितना महान था।

Sanskrit :

भास्करः  ―   अहम् अत्र कृत्रिमबुद्धि-आधारितं संवादयन्त्रं दृष्टवान्। एतत् यन्त्रम् अस्माकं सर्वविधप्रश्नानाम् उत्तराणि ददाति ।

Hindi Translation

भास्कर – मैंने यहाँ कृत्रिम बुद्धि आधारित संवाद यंत्र देखा। यह यंत्र हमारे सभी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर देता है।

Sanskrit :

वेदिका    ―    अहो! ‘डिजिटल्-प्रक्षेपण-चलच्चित्रं’ दृष्ट्वा अहं विस्मिता अभवम्। अत्र सम्पूर्णस्य भारतस्य विकास-यात्रा प्रदर्शिता अस्ति|

Hindi Translation

वेदिका – ओह! ‘डिजिटल प्रक्षेपण चलचित्र’ देखकर मैं चकित हो गई। इसमें भारत की पूरी विकास यात्रा प्रदर्शित की गई है।

Sanskrit :

श्रेया     ―     एषः कश्चन अपूर्वः अनुभवः अस्ति। यश्च चिरकालपर्यन्तं स्मरणीयः भविष्यति।

Hindi Translation

श्रेया – यह एक अनोखा अनुभव है, जो लंबे समय तक स्मरणीय रहेगा।

Sanskrit :

सर्वे छात्राः   ―    मान्यवर ! वयं सर्वे एतस्मिन् सन्दर्भे चर्चां कर्तुम् इच्छामः । किं कक्षां प्रति चलामः ?

Hindi Translation

सभी छात्र – आदरणीय! हम इस विषय पर चर्चा करना चाहते हैं। क्या हम कक्षा में चलें?

Sanskrit :

अध्यापकः– उत्तमः विचारः। चलामः तावत् ।

(सर्वे मिलित्वा गच्छन्ति । )

(सर्वे कक्षायाम् उपविष्टाः)

Hindi Translation

अध्यापक – बहुत अच्छा विचार है। चलो, चलते हैं।

(सभी मिलकर कक्षा में जाते हैं।)

(सभी कक्षा में बैठते हैं।)

Sanskrit :

सर्वे छात्राः –  अहो ! सङ्ग्रहालयस्य अद्भुतः अनुभवः प्राप्तः ।

Hindi Translation

सभी छात्र – वाह! संग्रहालय का अद्भुत अनुभव मिला।

Sanskrit :

अध्यापकः  –  बालाः ! अस्मिन् सङ्ग्रहालये उपस्थापितं ज्ञानम् अद्भुतम् एव। ‘डिजिटल्’ योजनायाः प्रभावः दैनन्दिने जीवनेऽपि दृश्यते ।

Hindi Translation

अध्यापक – बच्चों! इस संग्रहालय में जो ज्ञान प्रस्तुत किया गया है, वह अद्भुत है। ‘डिजिटल’ योजना का प्रभाव हमारे दैनिक जीवन में भी दिखाई देता है।

Sanskrit :

सर्वे छात्राः   –  आम्, मान्यवर ! वयम् इमं प्रभावं ज्ञातुम् इच्छामः ।

Hindi Translation

सभी छात्र – हाँ, आदरणीय! हम इस प्रभाव को जानना चाहते हैं।

Sanskrit :

अध्यापकः   – उत्तमम्। अस्माकं दैनिकं जीवनं ‘डिजिटल’ इत्यनेन परिवर्तितं प्रभावितं च भवति। अस्य क्षेत्रं व्यापकम् अस्ति । यथा – ‘डिजिटल्-शासनं, स्वास्थ्यसेवा, शिक्षणं, वित्तीयं समावेशनम्’ इत्यादीनि क्षेत्राणि ।

Hindi Translation

अध्यापक – बहुत अच्छा। हमारा दैनिक जीवन ‘डिजिटल’ के माध्यम से बदल गया है और प्रभावित हुआ है। इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है, जैसे – ‘डिजिटल प्रशासन, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, वित्तीय समावेशन’ आदि।

Sanskrit :

यशिका    –    अहं स्वयं ‘डिजि-लॉकर्’ इत्यस्य उपयोगं करोमि। मम आधारपत्रं विद्यालयीयं प्रमाणपत्रं च तत्र सुरक्षितम् अस्ति।

Hindi Translation

यशिका – मैं स्वयं ‘डिजिलॉकर’ का उपयोग करती हूँ। मेरा आधार कार्ड और विद्यालयीय प्रमाणपत्र उसमें सुरक्षित है।

Sanskrit :

अथर्वः      –    मम पितरौ ‘फ़ास्टॅग्’ इत्यस्य उपयोगं कुरुतः। अनेन राजमार्गेषु स्वचालितविधिना मार्गशुल्कस्य सङ्ग्रहणं शीघ्रं भवति ।

Hindi Translation

अथर्व – मेरे माता-पिता ‘फास्टैग’ का उपयोग करते हैं। इससे राजमार्गों पर स्वतः शुल्क वसूली बहुत शीघ्र हो जाती है।

Sanskrit :

भास्करः    –  अहम् ‘एकीकृत-धनदेयप्रत्यर्पण-अन्तरफलकस्य’ (यूपीआय) उपयोगं करोमि । अनेन मम पितरौ अपि त्वरया मह्यं धनं प्रेषयितुं शक्नुतः ।

Hindi Translation

भास्कर – मैं ‘यूपीआई’ का उपयोग करता हूँ। इससे मेरे माता-पिता भी मुझे तुरंत पैसे भेज सकते हैं।

Sanskrit :

अध्यापकः – उत्तमम् ! वित्तीयसमावेशनस्य क्षेत्रे ‘यूपीआय्, रूपे कार्ड, जनधनयोजना’ इत्यादीनि बहूनि साधनानि सन्ति। अधुना आपणेषु वस्तुक्रयणार्थं साक्षात् मुद्रायाः आवश्यकता नास्ति। मुद्रारहित-विनिमयसन्दर्भे विश्वे भारतस्य अग्रगण्यं स्थानम् अस्ति ।

Hindi Translation

अध्यापक – बहुत अच्छा! वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में ‘यूपीआई, रूपे कार्ड, जनधन योजना’ आदि कई साधन हैं। अब दुकानों पर सामान खरीदने के लिए नकद मुद्रा की आवश्यकता नहीं है। नगद रहित विनिमय के संदर्भ में भारत का स्थान विश्व में अग्रणी है।

Sanskrit :

राघवः   –   डिजिटल्-योजना भारतस्य काचित् महत्त्वाकाङ्क्षिणी योजना अस्ति ।

Hindi Translation

राघव – डिजिटल योजना भारत की एक महत्वाकांक्षी योजना है।

Sanskrit :

अध्यापकः – आम् राघव ! एषा भारतसर्वकारस्य विशिष्टा महत्त्वाकाङ्क्षिणी योजना अस्ति । राष्ट्र डिजिटल्-रूपेण सुशक्तं भवेत् इत्येव अस्याः योजनायाः लक्ष्यम्। डिजिटल्-शक्तिः सर्वजनान् सुशक्तान् कुर्यात् इति अस्माकं ध्येयम् ।

Hindi Translation

अध्यापक – हाँ राघव! यह भारत सरकार की एक विशेष महत्वाकांक्षी योजना है। राष्ट्र डिजिटल रूप से सशक्त बने – यही इस योजना का उद्देश्य है। डिजिटल शक्ति सभी नागरिकों को सशक्त बनाए – यही हमारा लक्ष्य है।

Sanskrit :

श्रेया    –   महोदय ! अस्य स्वरूपं किञ्चित् स्पष्टीकरोतु ।

Hindi Translation

श्रेया – महोदय! कृपया इसका स्वरूप स्पष्ट कीजिए।

Sanskrit :

अध्यापकः   –  अवश्यम् ! पश्य, डिजिटल्-शासन-सेवायाः अन्तर्गतं ‘डिजी-लॉकर्’ आधार-पॅन्-कार्ड् इत्यादीनां डिजिटल्-सङ्ग्रहणम्), ‘ई-शासन- पटलम्’ यथा – ‘उमङ्ग्’ ‘माय्-गव  ‘जेम्’ इत्यादयः। ऑन्-लैन्-टीकाकर पञ्जीकरणार्थं  ‘कोविन्-पटलम्’ अस्ति ।

Hindi Translation

अध्यापक – अवश्य! देखो, डिजिटल प्रशासन सेवा के अंतर्गत ‘डिजिलॉकर’ (आधार, पैन कार्ड आदि का डिजिटल संग्रहण), ‘ई-शासन प्लेटफॉर्म’ जैसे – ‘उमंग’, ‘माई गव’, ‘जेम’ आदि हैं। ऑनलाइन टीका पंजीकरण के लिए ‘कोविन प्लेटफॉर्म’ है।

Sanskrit :

यशिका    –   किन्तु यदि ग्राम्य-क्षेत्रे अन्तर्जालस्य समस्या अस्ति तर्हि तत्र कथम् एतासां सेवानाम् उपयोगः भविष्यति ?

Hindi Translation

यशिका – किंतु यदि ग्रामीण क्षेत्र में इंटरनेट की समस्या हो, तो वहाँ इन सेवाओं का उपयोग कैसे होगा?

Sanskrit :

श्रेया  ―  मान्यवर! मया श्रुतं यत् सर्वकारः अन्तर्जालस्य उत्तरोत्तरं विस्ताराय कार्यं करोति । अनेन ग्राम्य-क्षेत्रे अपि उच्चगतेः जालस्य उपलब्धिः भविष्यति ।

Hindi Translation

श्रेया – आदरणीय! मैंने सुना है कि सरकार इंटरनेट के निरंतर विस्तार के लिए कार्य कर रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेज गति वाला नेटवर्क उपलब्ध हो सकेगा।

Sanskrit :

भास्करः   ―   बहु समीचीनम्। एतासां सेवानाम् उपयोगः शिक्षायाः माध्यमेन अधिकाधिकं प्रचारणीयः ।

Hindi Translation

भास्कर – यह बहुत उचित है। इन सेवाओं का प्रचार शिक्षा के माध्यम से अधिक से अधिक किया जाना चाहिए।

Sanskrit :

अध्यापकः   ―  सत्यम्! शिक्षायाः क्षेत्रे ‘दीक्षा’), ‘स्वयम्’, ‘स्वयं-प्रभा’ , ‘ई-पाठशाला’), ‘भारतीय-राष्ट्रिय-डिजिटल्-पुस्तकालयः’, ‘निष्ठा’), ‘पीएम्-ई-विद्या’), निःशुल्क-डिजिटल्-शैक्षिकमञ्चः इत्यादीनाम्  उपयोगः करणीयः ।

Hindi Translation

अध्यापक – सत्य है! शिक्षा के क्षेत्र में ‘दीक्षा’, ‘स्वयम्’, ‘स्वयम् प्रभा’, ‘ई-पाठशाला’, ‘भारतीय राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय’, ‘निष्ठा’, ‘पीएम ई-विद्या’, जैसे नि:शुल्क डिजिटल शैक्षिक मंचों का उपयोग किया जाना चाहिए।

Sanskrit :

अथर्वः   ―   आचार्य ! किं कृषिक्षेत्रे अपि डिजिटल-भारतस्य योगदानम् अस्ति ?

Hindi Translation

अथर्व – आचार्य! क्या कृषि क्षेत्र में भी डिजिटल भारत का योगदान है?

Sanskrit :

अध्यापकः    ―  आम्! ‘ई-नाम्’ ‘पीएम् – किसान्- अनुप्रयोगः’), ड्रोन्-प्रौद्योगिकी इत्यादीनि पटलानि सन्ति ।

Hindi Translation

अध्यापक – हाँ! ‘ई-नाम’, ‘पीएम किसान एप’, ड्रोन तकनीक आदि प्लेटफॉर्म हैं।

Sanskrit :

यशिका    ―   बहु सम्यक्। किन्तु ‘डिजिटल्’ इत्यस्य वाणिज्ये कीदृशः प्रभावः अस्ति?

Hindi Translation

यशिका – बहुत अच्छा। किंतु ‘डिजिटल’ का व्यापार में क्या प्रभाव है?

Sanskrit :

अध्यापकः     ―  आभासीय-पटलम् अनुप्रयोगः च इत्येतयोः माध्यमेन आभासीयं (ऑन्-लैन्) विक्रयणं भवति। ‘आशु-प्रतिक्रिया-कूट:’ इत्याधारितः विनिमयश्च भवति|

Hindi Translation

अध्यापक – ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और एप्स के माध्यम से ऑनलाइन व्यापार होता है। ‘क्यूआर कोड’ आधारित विनिमय भी होता है।

Sanskrit :

सर्वे   ―   वयं धन्याः मान्यवर ! अस्मिन् सन्दर्भे वयं भवद्भिः पाठिताः। वयम् अपि भारतं डिजिटल्-भारतं कर्तुं प्रयत्नं करिष्यामः।

Hindi Translation

सभी – हम धन्य हैं, आदरणीय! आपने हमें इस विषय में शिक्षित किया। हम भी भारत को डिजिटल भारत बनाने का प्रयास करेंगे।

Sanskrit :

अध्यापकः   ―   उत्तमम्। किन्तु अस्माभिः ‘साङ्गणिक सुरक्षा’ – विषये अपि चिन्तनीयम्। अनेकविधाः साङ्गणिक-अपराधाः भवन्ति। जनाः प्रायशः लोभात् भयात् वा साङ्गणिक-अपराधेन पीडिताः भवन्ति।

Hindi Translation

अध्यापक – बहुत अच्छा। किंतु हमें ‘साइबर सुरक्षा’ के विषय में भी सोचना चाहिए। अनेक प्रकार के साइबर अपराध होते हैं। लोग प्रायः लालच या डर के कारण साइबर अपराध का शिकार हो जाते हैं।

Sanskrit :

भास्करः  ―   एतस्मिन् विषये जनाः जागृताः भवेयुः तदर्थम् अपि उपायाः चिन्तनीयाः ।

Hindi Translation

भास्कर – इस विषय में लोगों को जागरूक बनाना चाहिए और उपायों पर भी विचार करना चाहिए।

Sanskrit :

अध्यापकः   ―   सत्यं कथितम्! अनेन प्रकारेण डिजिटल्-क्रान्तौ भारतम् अग्रगण्यं राष्ट्रं भविष्यति ।

Hindi Translation

अध्यापक – सत्य कहा! इस प्रकार डिजिटल क्रांति में भारत एक अग्रणी राष्ट्र बनेगा।

Sanskrit :

सर्वे    ―  कृतज्ञाः वयं गुरुवर ! वयं डिजिटल भारतं समृद्धं कर्तुं योगदानं करिष्यामः।

(सर्वे मिलित्वा गायन्ति)

Hindi Translation

सभी – हम आभारी हैं, गुरुवर! हम डिजिटल भारत को समृद्ध बनाने में योगदान देंगे।

(सभी मिलकर गाते हैं)


Sanskrit :

सर्व विकसितं भाति डिजिटल – भारतेऽधुना ।

जीवनस्य च सौकर्यं सहसा लभते जनः ॥

Hindi Translation

“आज के डिजिटल भारत में सब कुछ विकसित प्रतीत होता है।
जनता को जीवन की सुविधा सहसा प्राप्त होती है।”

Chapter 5 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 5 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

गीता सुगीता कर्तव्या 


संस्कृत:

कुरुक्षेत्रे श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सवः आचरितः। तत्र बहवः जनाः अगच्छन्। रमेशः अपि स्वजनकेन सह तत्र गतवान्। कथावाचकः गीतायाः विषये वर्णयति स्म –

हिंदी अनुवाद: कुरुक्षेत्र में श्रीगीता-जयंती-महोत्सव मनाया गया। वहाँ बहुत से लोग गए। रमेश भी अपने परिवार के साथ वहाँ गया। कथावाचक गीता के विषय में बता रहे थे –

संस्कृत: गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥

हिंदी अनुवाद: गीता को सुगीता करना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार की क्या आवश्यकता है। जो स्वयं पद्मनाभ (श्रीकृष्ण) के मुख कमल से निकली है।

संस्कृत:

इदं श्रुत्वा रमेशः पितरम् अपृच्छत् – “पितः! गीता का? कथं सुगीता कर्तव्या?”

पिता –

पुत्र! बहुभ्यः वर्षेभ्यः पूर्वं कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये सङ्ग्रामः अभवत्। तस्मिन् युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट्वा अर्जुनः युद्धं कर्तुं न इच्छति स्म। तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति। गीतायाम् अमृततुल्याः उपदेशाः सन्ति।

हिंदी अनुवाद: यह सुनकर रमेश ने अपने पिता से पूछा – “पिताजी! गीता क्या है? इसे सुगीता कैसे करना चाहिए?”

पिता – “पुत्र! बहुत समय पहले कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध हुआ था। उस युद्ध में अपने रिश्तेदारों को देखकर अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध से मुंह मोड़ने वाले अर्जुन को कर्तव्यपालन के लिए उपदेश दिया। श्रीकृष्ण का वही उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता में अमृत जैसे उपदेश हैं।”

संस्कृत:

रमेशः – तर्हि सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः?

पिता – अस्य आशयः अस्ति यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः। गीता उत्तमभावेन पठितव्या। कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः। अस्मिन् पाठे वयं श्रीमद्भगवद्गीतायाः काँश्चन श्लोकान् पठामः। वयं श्लोकान् मिलित्वा गायामः अपि।

हिंदी अनुवाद: रमेश – “फिर सुगीता कर्तव्या का क्या अर्थ है?”

पिता – “इसका अर्थ है कि गीता का अध्ययन ठीक तरह से करना चाहिए। गीता को उत्तम भाव से पढ़ना चाहिए। कार्यक्षेत्र और जीवनक्षेत्र में गीता के उपदेशों का पालन करना चाहिए। इस पाठ में हम श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोक पढ़ेंगे। हम श्लोकों को मिलाकर गाएँगे भी।”


दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ १ ॥

हिंदी अनुवाद:

“जो व्यक्ति दुःखों में मन को विचलित नहीं होने देता, सुखों में जिसकी स्पृहा (लालसा) समाप्त हो चुकी है, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है — वह स्थितप्रज्ञ मुनि कहलाता है।”

पदच्छेद: – दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते।

पदच्छेद: in hindi – दुखों में अविचलित मन वाला, सुखों में इच्छारहित, राग-भय-क्रोध से मुक्त, वह मुनि स्थितप्रज्ञ (इति) कहलाता है।

अन्वय: – दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः मुनिः स्थितधीः (इति) उच्यते।

अन्वयः in hindi – दुखों में अविचलित मन वाला, सुखों में इच्छारहित, राग-भय-क्रोध से मुक्त मुनि स्थितप्रज्ञ (इति) कहलाता है।

भावार्थ: – यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वेगं न अनुभवति। यः सुखप्राप्तये अपि निस्पृहः  (इच्छारहितः) भवति। यः इच्छा, आसक्तिः, भयः, क्रोधः, इत्येतेभ्यः मुक्तः भवति । सः मौनी पुरुषः स्थितप्रज्ञः भवति ।

भावार्थ: in hindi : – जो मनुष्य कठिन समय में उद्वेग नहीं अनुभव करता, जो सुख पाने में भी इच्छारहित होता है, जो राग, आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त होता है, वही मौनी पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है।


क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ २ ॥

हिंदी अनुवाद:

“क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति का भ्रम (भूल) होता है। स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि के नष्ट हो जाने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।”

पदच्छेद: – क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।

पदच्छेद: in hindi – क्रोध से होता है मोह, मोह से स्मृति का भ्रम, स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट, बुद्धि के नाश से प्राणी विनाश को प्राप्त होता है।

अन्वय: – क्रोधात् सम्मोहः भवति। सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (भवति)। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति)। बुद्धिनाशात् (जनः) प्रणश्यति।

अन्वयः in hindi – क्रोध से मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम (होता है), स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट (होती है), बुद्धि के नाश से (मनुष्य) विनाश को प्राप्त होता है।

भावार्थ: – मानवस्य यदा क्रोधः भवति तदा क्रोधात् अविवेकः उत्पद्यते । अविवेकात् आत्मानं विस्मरति। किं योग्यं किञ्च अयोग्यम् इति अविचिन्त्य क्रोधात् व्यामोहं प्राप्नोति। यदा अधिकः व्यामोहः भवति तदा मनुष्यस्य स्मृतिः निष्क्रिया नष्टा च भवति । स्मृतेः नाशात् बुद्धिः नश्यति । बुद्धेः नाशात् सः मनुष्यः विनाशं प्राप्नोति ।

भावार्थ: in hindi : – जब मनुष्य में क्रोध उत्पन्न होता है, तब क्रोध से अविवेक पैदा होता है। अविवेक से वह अपने आपको भूल जाता है। उचित-अउचित पर विचार न करके क्रोध से व्यामोह में पड़ता है। जब अधिक व्यामोह होता है, तब मनुष्य की स्मृति नष्ट और निष्क्रिय हो जाती है। स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नाश से वह मनुष्य विनाश को प्राप्त होता है।


तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ ३ ॥

हिंदी अनुवाद:

इसे प्रणाम, प्रश्न और सेवा से जानो,

तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें ज्ञान देंगे।

पदच्छेद: तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः।

पदच्छेद: in hindi – इसे प्रणाम से, प्रश्न से, सेवा से जानो, तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें ज्ञान देंगे।

अन्वय: तद् प्रणिपातेन सेवया परिप्रश्नेन विद्धि, ते तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति।

अन्वयः in hindi – इसे प्रणाम, सेवा और प्रश्न से जानो, तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें ज्ञान देंगे।

भावार्थ: भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति – हे अर्जुन ! भवान् गुरोः समीपं गत्वा यथार्थज्ञानं प्राप्तुं प्रयासं करोतु । भवान् विनीतः जिज्ञासुः च भूत्वा गुरोः सेवां करोतु। तत्त्वज्ञानी गुरुः भवते ज्ञानं प्रदास्यति । यतः ये सत्यस्य दर्शनं कृतवन्तः ते एव यथार्थज्ञानिनः भवन्ति ।

भावार्थ: in hindi : – भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं – हे अर्जुन! तुम गुरु के पास जाकर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करो। तुम विनम्र और जिज्ञासु बनकर गुरु की सेवा करो। तत्त्वज्ञानी गुरु तुम्हें ज्ञान देंगे, क्योंकि जो सत्य का दर्शन कर चुके हैं, वही यथार्थज्ञानी होते हैं।


श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ ४ ॥

हिंदी अनुवाद:

श्रद्धा वाला, इंद्रियों को वश में रखने वाला, तत्पर मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है,

और ज्ञान प्राप्त कर शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।

पदच्छेद: श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानम् लब्ध्वा पराम् शान्तिम् अचिरेण अधिगच्छति।

पदच्छेद: in hindi – श्रद्धा वाला लभता है ज्ञान, तत्पर, इंद्रियों को वश में रखने वाला, ज्ञान प्राप्त कर परम शांति को शीघ्र प्राप्त होता है।

अन्वय: संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते। तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।

अन्वयः in hindi – इंद्रियों को वश में रखने वाला, तत्पर, श्रद्धा वाला (मनुष्य) ज्ञान प्राप्त करता है, और ज्ञान प्राप्त कर (वह) शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।

भावार्थ: यः श्रद्धालुः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्तुं निरन्तरं प्रयासं करोति । तथैव यः मनुष्यः  इन्द्रियाणि स्ववशे कृतवान्। सः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्स्यति । तादृशं दिव्यं ज्ञानं प्राप्य सः पुरुषः जीवने अनन्तम् आनन्दं प्राप्नोति ।

भावार्थ: in hindi : – जो श्रद्धालु मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करता है और जो अपने इंद्रियों को वश में रखता है, वह मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा दिव्यज्ञान प्राप्त करने पर वह पुरुष जीवन में अनंत आनंद और शांति प्राप्त करता है।


अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ ५ ॥

हिंदी अनुवाद:

जो सभी प्राणियों से बैर नहीं रखता, मित्रता और करुणा वाला,

ममत्व और अहंकार से रहित, सुख-दुख में समभाव और क्षमाशील होता है।

पदच्छेद: अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणः एव च निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।

पदच्छेद: in hindi – जो सभी प्राणियों से बैर नहीं रखता, मित्रता और करुणा वाला, ममत्व और अहंकार से रहित, सुख-दुख में समभाव और क्षमाशील (होता है)।

अन्वय: (यः) सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा मैत्रः च करुणः एव निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी (अस्ति, सः एव मम प्रियः भवति)।

अन्वयः in hindi – (जो) सभी प्राणियों से बैर नहीं रखता, मित्रता और करुणा वाला, ममत्व और अहंकार से रहित, सुख-दुख में समभाव और क्षमाशील (होता है, वही मेरा प्रिय भक्त होता है)।

भावार्थ: हे अर्जुन ! यः कस्यामपि परिस्थितौ विचलितः न भवति । यः ईर्ष्यारहितः समस्तप्राणिनां कृते मित्रभावयुतः दयालुः च भवति। यः ममत्वरहितः, अहङ्कारविहीनः, सुखदुःखेषु समभावयुतः क्षमाशीलः च भवति तादृशः पुरुषः भगवतः अत्यन्तं प्रियः भक्तः भवति।

भावार्थ: in hindi : –

हे अर्जुन! जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, जो ईर्ष्या से मुक्त होकर सभी प्राणियों के प्रति मित्रभाव और दया रखता है, जो ममत्व और अहंकार से रहित, सुख-दुख में समभाव रखने वाला और क्षमाशील होता है, वह पुरुष भगवान के अत्यंत प्रिय भक्त होता है।


सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ६ ॥

हिंदी अनुवाद:

जो सदा संतुष्ट योगी, आत्मा को वश में रखने वाला, दृढ़ निश्चयी,

मुझमें मन-बुद्धि समर्पित, मेरा भक्त है, वही मेरा प्रिय है।

पदच्छेद: सन्तुष्टः सततम् योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पितमनोबुद्धिः यः मद्भक्तः सः मे प्रियः।

पदच्छेद: in hindi – जो सदा संतुष्ट, योगी, आत्मा को वश में रखने वाला, दृढ़ निश्चयी, मुझमें मन-बुद्धि समर्पित, मेरा भक्त, वही मेरा प्रिय (है)।

अन्वय: यः योगी सततं सन्तुष्टः यतात्मा दृढनिश्चयः मयि (च) अर्पितमनोबुद्धिः (भवति) सः मद्भक्तः मे प्रियः (भवति)।

अन्वयः in hindi – जो योगी सदा संतुष्ट, आत्मा को वश में रखने वाला, दृढ़ निश्चयी, मुझ में (च) मन-बुद्धि समर्पित (होता है), वही मेरा भक्त मेरा प्रिय (होता है)।

भावार्थ: हे पार्थ ! यः निरन्तरं सन्तुष्टः भवति । अर्थात् कस्यापि वस्तुनः अभावात् कदापि असन्तुष्टः न भवति। यः मनः इन्द्रियाणि च विजित्य संयमी भवति । यः स्वबुद्ध्या परमेश्वरस्य स्वरूपं स्थिरीकरोति । यश्च मनः बुद्धिं च ईश्वरे समर्पयति। सः मनुष्यः मम अतीव प्रियतमः भक्तः भवति ।

भावार्थ: in hindi : – हे पार्थ! जो निरंतर संतुष्ट रहता है, अर्थात किसी वस्तु के अभाव से कभी असंतुष्ट नहीं होता, जो मन और इंद्रियों को वश में रखकर संयमी होता है, जो अपनी बुद्धि से परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर करता है और जो मन-बुद्धि को ईश्वर में समर्पित करता है, वह मनुष्य मेरा अत्यंत प्रिय भक्त होता है।


यस्मान्नोद्विजते लोकः लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ ७ ॥

हिंदी अनुवाद:

जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता, जो लोक से उद्विग्न नहीं होता,

जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और उद्वेग से मुक्त है, वही मेरा प्रिय है।

पदच्छेद: यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः सः च मे प्रियः।

पदच्छेद: in hindi – जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता, जो लोक से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष-ईर्ष्या-भय-उद्वेग से मुक्त है, वही मेरा प्रिय (है)।

अन्वय: यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः च हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः सः मे प्रियः (भवति)।

अन्वयः in hindi – जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता, जो लोक से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष-ईर्ष्या-भय-उद्वेग से मुक्त है, वही मेरा प्रिय (होता है)।

भावार्थ: हे अर्जुन ! यस्मात् मनुष्यात् कोऽपि मनुष्यः प्राणी वा उद्विग्नः न भवति । यश्च मनुष्यः अन्यस्मात् जनात् प्राणिनः वा उद्विग्नः न भवति । यश्च हर्षेण, ईर्ष्यया, भीत्या, चिन्तया च रहितः भवति । सः मम अतीव प्रियः भक्तः भवति।

भावार्थ: in hindi : – हे अर्जुन! जिस मनुष्य से कोई भी प्राणी या मनुष्य उद्विग्न नहीं होता और जो स्वयं अन्य जनों या प्राणियों से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त होता है, वह मेरा अत्यंत प्रिय भक्त होता है।


अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ ८ ॥

हिंदी अनुवाद:

जो वचन उद्वेगहीन, सत्य, प्रिय और हितकारी हो,

और स्वाध्याय-अभ्यास भी, वह वाणी का तप कहलाता है।

पदच्छेद: अनुद्वेगकरम् वाक्यम् सत्यम् प्रियहितम् च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ्मयम् तपः उच्यते।

पदच्छेद: in hindi – जो वचन उद्वेगहीन, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और स्वाध्याय-अभ्यास भी, वही वाणी का तप (कहलाता है)।

अन्वय: यद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च (तथा) स्वाध्यायाभ्यसनं च एव वाङ्मयं तपः उच्यते।

अन्वयः in hindi – जो वचन उद्वेगहीन, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और स्वाध्याय-अभ्यास भी, वही वाणी का तप कहलाता है।

भावार्थ: यत् अनुद्वेगकरं (भषणम् उद्वेगं न जनयेत्), सत्यं, प्रियकरं, हितकरं, च भाषणं स्यात्, तत् वाङ्मयं तपः इति कथ्यते । शास्त्रादीनां स्वाध्यायः, तेषाम् अभ्यासः च वाचिकं तपः कथ्यते। तथा स्वाध्यायः अभ्यासश्चापि यथाविधि वाङ्मयं तपः इति उच्यते। अतः विद्यार्थिभिः स्मरणीयं यत् |

भावार्थ: in hindi : – जो वचन उद्वेग पैदा नहीं करता, जो सत्य, प्रिय और हितकारी होता है, वह वाणी का तप कहा जाता है। शास्त्रों का स्वाध्याय और उनका अभ्यास भी वाचिक तप माना जाता है।


प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः,
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचनेन का दरिद्रता।

भावार्थ हिंदी: प्रिय वचनों के द्वारा सभी प्राणी संतुष्ट होते हैं,

इसलिए हमें वही कहना चाहिए, वचन में क्या दरिद्रता है।

Chapter 4 Hindi Translation Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 4 हिंदी में अनुवाद Deepakam Sanskrit NCERT

प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः

यह गोपबन्धु, महान मन वाला देशभक्त, वंदन के योग्य है।


Sanskrit:

नमस्ते छात्राः ! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम् ?

Hindi Translation:

नमस्ते छात्रों! कल की खबर सुनी क्या?

Sanskrit:

नमो नमः आचार्य !

ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः। जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता।

Hindi Translation:

नमो नमः आचार्य!

उड़ीसा राज्य के केंद्रपाड़ा जिले में महानदी में भयंकर बाढ़ आई है। बाढ़ के कारण वहाँ बहुत हानि हुई है।

Sanskrit:

आम्, हिमानि ! त्वं सत्यं वदसि ।

जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते। अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते । बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च।

Hindi Translation:

हाँ, हिमानी! तुम सच कहती हो।

बाढ़ के कारण आवास-गृह नष्ट हो गए, कुछ लोग अस्वस्थ होकर चिकित्सालय में मृत्यु से संघर्ष कर रहे हैं। अन्य लोग भोजन के अभाव में कष्ट सह रहे हैं। बहुत से पालतू पशु भी नदी के प्रवाह में बह गए और मर गए।

Sanskrit:

महोदय ! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु?

Hindi Translation:

महोदय! वे लोग अब बहुत दुखी होंगे, निश्चय ही?

Sanskrit:

सत्यम्, अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति ।

अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया । यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।

Hindi Translation:

सच, अशोक! वे सभी बहुत दुख में जी रहे हैं।

हमें ऐसे दुखी लोगों की सहायता करनी चाहिए। जैसे उत्कलमणि गोपबंधु ने बाढ़ से पीड़ित लोगों की निस्संकोच सेवा करके आज भी जनमानस में सम्मानित हैं।

Sanskrit:

महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?

Hindi Translation:

महोदय! यह गोपबंधु कौन हैं?

Sanskrit:

भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु। एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः ।

सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः ।

Hindi Translation:

सभी इस चित्र को देखो। यह हैं दीनबंधु गोपबंधु।

अब हम उनके बारे में जानते हैं।

Sanskrit:

एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्। आमन्त्रिताः सर्वे अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि । हसन् गोपबन्धुरवदत् –

Hindi Translation:

एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादी वन-विद्यालय के सभी शिक्षकों को भोजन के लिए आमंत्रित किया। सभी आमंत्रित अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठ गए। बहुत से स्वादिष्ट व्यंजन केले के पत्तों पर परोसे गए। हँसते हुए गोपबंधु ने कहा:

“भोजन का अत्यधिक अभाव जीवन के लिए सखा प्रदान करता है।

इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया मत करो।”

Sanskrit:

एतच्छ्रुत्वा सर्वे उच्चैः हसितवन्तः। तदानीमेव बहिः कश्चन करुणध्वनिः गोपबन्धोः कर्णयोः अगुञ्जत्

“मातः, मातः ! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि। दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। भोजनं देहि मातः ! भोजनं देहि । आँ आँ …” इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् । किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान् भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।

Hindi Translation:

यह सुनकर सभी जोर से हँसे। उसी समय बाहर से एक करुण ध्वनि गोपबंधु के कानों में गूँजी:

“माँ, माँ! मैं भूखा हूँ, कृपया थोड़ा भोजन दे दो। तीन दिन से कुछ नहीं खाया। भोजन दे दो, माँ! भोजन दे दो। आँ आँ…”

इस रोने की आवाज सुनकर ही दयालु हृदय वाले गोपबंधु की आँखें आँसुओं से भर गईं। बिना कुछ सोचे-विचारे उन्होंने तुरंत अपने लिए परोसा गया भोजन हाथ में लिया, बाहर आए और भिखारी को खाना खिलाया।

Sanskrit:

असौ महान् समाजसेवकः आसीत् गोपबन्धुदासः। असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य अध्यापकः, प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी चासीत्। ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्। अध्ययनकालादेव स दरिद्राणां रोगिणां च सेवामकरोत्। सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्। निरक्षरतादूरीकरणाय सः सततं यतते स्म। कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत् । जन्मभूमेः दुर्दशामवलोक्य स सर्वदा चिन्ताकुलो भवति स्म। महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्।

Hindi Translation:

वे महान समाजसेवी थे, गोपबंधु दास। वे सत्यवादी वन-विद्यालय के शिक्षक, प्रसिद्ध पंचमित्रों में से एक और स्वतंत्रता संग्रामी थे। उड़ीसा राज्य के पुरी जिले के साक्षीगोपाल के समीप सुआंडो ग्राम में उनका जन्म हुआ। पढ़ाई के समय से ही उन्होंने गरीबों और रोगियों की सेवा की। सत्यवादी वन-विद्यालय में उन्होंने छात्रों को निःशुल्क पढ़ाया। निरक्षरता दूर करने के लिए वे निरंतर प्रयास करते थे। सूती वस्त्र निर्माण के लिए उन्होंने स्वयं सूत काता। अपनी जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर वे सदा चिंतित रहते थे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से गोपबंधु ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। उन्हें दो वर्ष तक कारावास हुआ।

Sanskrit:

कारागारेनिवसन्सः ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादीनि बहुप्रेरणादायीनि पुस्तकानि ओडिआभाषया विरचितवान् । सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्। मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् उद्धर्तुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च। देशसेवातत्परस्य गोपबन्धुवर्यस्य प्रसिद्धं प्रेरणादायकं वचनमधुनापि जनमानसेषु राष्ट्रभक्तिं जागरयति।

Hindi Translation:

कारागार में रहते हुए उन्होंने ‘बंदी की आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादि अनेक प्रेरणादायी पुस्तकें उड़िया भाषा में रचीं। उन्होंने सदा स्वदेशी वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग किया। मरणासन्न अपने पुत्र को भी छोड़कर, बाढ़ से पीड़ित भारत माता के हजारों पुत्रों को बचाने के लिए घर से बाहर निकले और समाज की सेवा की। देशसेवा में तत्पर गोपबंधु के प्रसिद्ध प्रेरणादायक वचन आज भी जनमानस में राष्ट्रभक्ति जगाते हैं।

Sanskrit:

Hindi Translation:

स्वदेश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए,

देशवासी मेरे पीछे चलें।

देश के स्वराज्य के मार्ग में जहाँ-जहाँ गड्ढे हों,

वे सभी गड्ढे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ।

Sanskrit:

मिशु मोर देह ए देश माटिरे,

देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे,

देशर स्वराज्य पथे जेते गाड,

पुरु तहिँ पडि मोर मांस हाड ॥

Hindi Translation:

मिशु मोर देह ए देश माटिरे,

देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे,

देशर स्वराज्य पथे जेते गाड,

पुरु तहिँ पडि मोर मांस हाड।

Sanskrit:

भावार्थः

स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु । देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु । देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः छन्, ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु ।

Hindi Translation:

भावार्थ:

स्वदेश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए।

देशवासी मेरे पीछे चलें।

देश की स्वतंत्रता के लिए जहाँ-जहाँ बाधक गड्ढे हैं,

वे सभी गड्ढे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ।

Sanskrit:

असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, सत्यवादि-मुद्रणालयस्य, समाजः इति दैनिक-वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत्। समाजः इति दिनपत्रिका शताधिकवर्षेभ्यः अधुनापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते। समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् ।

Hindi Translation:

वे सत्यवादी वन-विद्यालय, दरीद्रनारायण सेवा संघ, सत्यवादी मुद्रणालय और समाज नामक दैनिक समाचार-पत्र के संस्थापक थे। समाज समाचार-पत्र सौ से अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होता है। समाजसेवा और देशसेवा के लिए उनके असीम त्याग को देखकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय ने गोपबंधु को उत्कलमणि की उपाधि से सम्मानित किया।

Sanskrit:

Hindi Translation:

उत्कलमणि नाम से प्रसिद्ध लोकसेवक,

प्रणम्य देशभक्त यह गोपबंधु महामना।