Chapter 3 Question Answers Deepakam Sanskrit NCERT

दीपकम् Class 8 Chapter 3 Question Answers Deepakam Sanskrit NCERT

सुभाषितस्सं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु


अभ्यासात् जायते सिद्धिः


१. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत


(क) गीतानि के गायन्ति ? (गीत कौन गाते हैं?)

उत्तर: देवाः (देवता)

(ख) कः बलं न वेत्ति ? (कौन बल को नहीं जानता?)

उत्तर: मषूकः (मच्छर)

(ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति ? (वसंत ऋतु का गुण कौन जानता है?)

उत्तर: कविः (कवि)

(घ) मषूकः कस्य बलं न वेत्ति ? (मच्छर किसके बल को नहीं जानता?)

उत्तर: अनिलस्य (वायु का)

(ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति ? (फलों के भार से कौन झुक जाते हैं?)

उत्तर: वृक्षाः (वृक्ष)

(च) केन समसख्यं न करणीयम् ? (किसके साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए?)

उत्तर: दुष्टैः (दुष्टों के साथ)

(छ) केन विना दैवं न सिध्यति ? (किसके बिना दैव सफल नहीं होता?)

उत्तर: पुरुषेण (पुरुष के बिना)


२. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत-


(क) तरवः कदा नम्राः भवन्ति ? (वृक्ष कब झुक जाते हैं?)

उत्तर: तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। (वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं।)

(ख) समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति ? (समृद्धि (संपन्नता) के बाद कौन घमंडी नहीं होते?)

उत्तर: सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः भवन्ति। (सज्जन व्यक्ति समृद्धि पाकर भी घमंडी नहीं होते।)

(ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति ? (सज्जनों का स्वभाव कैसा होता है?)

उत्तर: सत्पुरुषाणां स्वभावः सज्जनता-पूरितः, दयालुः च भवति। (सज्जनों का स्वभाव विनम्र और दयालु होता है।)

(घ) सत्यम् कदा सत्यम् न भवति ? (सत्य कब सत्य नहीं होता?)

उत्तर: हितं विना उक्तं सत्यम् सत्यम् न भवति। (जो सत्य हितकारी नहीं होता, वह सत्य नहीं माना जाता।)

(ङ) दैवं कदा न सिध्यति ? (दैव (भाग्य) कब सफल नहीं होता?)

उत्तर: पुरुषकारं विना दैवं न सिध्यति। (पुरुषार्थ (प्रयास) के बिना दैव (भाग्य) सफल नहीं होता।)


३. स्तम्भयोः मेलनंकुरुत —

संख्या(अ) उक्तिः (संस्कृत में)(आ) भावार्थः (संस्कृत में)हिंदी अनुवाद
गायन्ति देवाः किल गीतकानिभारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम्देवता इस भारतभूमि के गीत गाते हैं – भारत की महिमा का वर्णन।
गुणी गुणं वेत्तिसज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञःगुणों की पहचान सिर्फ गुणी व्यक्ति ही कर सकता है।
भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैःसत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रताजैसे वृक्ष फल आने पर झुक जाते हैं, वैसे ही सज्जनों में स्वाभाविक नम्रता होती है।
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यतेसुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यतेजैसे सोने की परीक्षा चार तरीकों से होती है।
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्तिप्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयःआठ गुण (जैसे बुद्धि, संयम, दान, कृतज्ञता आदि) मनुष्य को चमकाते हैं।
दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशःदुष्टों की संगति जलते अंगारे के समान होती है, इसलिए उनसे मित्रता न करें।
एकेन चक्रेण न रथस्य गतिःकेवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम्जैसे रथ एक पहिए से नहीं चल सकता, वैसे ही प्रयत्न के बिना केवल भाग्य से सफलता नहीं मिलती।

४. अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —

फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सिध्यति, श्रुतम्, शीलेन


(क) गुणी ———— वेत्ति, न वेत्ति निर्गुणः ।

उत्तर: गुणं

हिंदी अनुवाद: गुणी व्यक्ति गुण को पहचानता है, निर्गुण व्यक्ति नहीं।

(ख) भवन्ति नम्राः तरवः ————— ।

उत्तर: फलोद्गमैः

हिंदी अनुवाद: वृक्ष फलों से लदकर नम्र हो जाते हैं।

(ग) पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, —————-, गुणेन, कर्मणा ।

उत्तर: शीलेन

हिंदी अनुवाद: मनुष्य की परीक्षा उसके कुल, आचरण, गुण और कर्म से होती है।

(घ) गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, ————– ।

उत्तर: कृतज्ञता

हिंदी अनुवाद: गुण मनुष्य को प्रकाशित करते हैं – बुद्धि, शील, संयम, और कृतज्ञता।

(ङ) दानं यथाशक्ति —————- च।

उत्तर: श्रुतम्

हिंदी अनुवाद: सामर्थ्यानुसार दान और अध्ययन (श्रवण/ज्ञान) करना चाहिए।

(च) एवं पुरुषकारेण विना दैवं न —————।

उत्तर: सिध्यति

हिंदी अनुवाद: इस प्रकार प्रयत्न के बिना केवल दैव (भाग्य) से सफलता नहीं मिलती।


५. समुचितं विकल्पं चिनुत-


(क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” – इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः ?

उत्तरम्: (ii) भारतभूमेः गौरवम्

🔹 हिंदी अनुवाद: इस श्लोक का मुख्य विषय भारत भूमि का गौरव है।

(ख) “गुणी गुणं वेत्ति” – इत्यत्र कः गुणं न जानाति ?

उत्तरम्: (ii) निर्गुणः

🔹 हिंदी अनुवाद: ‘गुणी गुण को पहचानता है’, इस कथन में निर्गुण व्यक्ति गुण नहीं जानता।

(ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” – इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?

उत्तरम्: (ii) सुजन एव गुणं जानाति

🔹 हिंदी अनुवाद: इस कथन का तात्पर्य है कि सज्जन व्यक्ति ही गुणों को पहचानता है।

(घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” – इत्यस्य अर्थः कः?

उत्तरम्: (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति

🔹 हिंदी अनुवाद: फलों से लदे वृक्ष झुक जाते हैं।

(ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः ” – इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम् ?

उत्तरम्: (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः

🔹 हिंदी अनुवाद: सभा में धर्म का उपदेश देने के लिए ज्ञानी वृद्ध जन आवश्यक होते हैं।

(च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम् ?

उत्तरम्: (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति

🔹 हिंदी अनुवाद: दुष्ट व्यक्ति जलते अंगारे की तरह हानिकारक होता है, इसलिए उससे मित्रता नहीं करनी चाहिए।

Chapter 1 Question Answers Deepakam Sanskrit NCERT

Class 8 दीपकम् Chapter 1 Question Answers Deepakam Sanskrit NCERT

संगच्छध्वं संवदध्वम् (एक साथ मिलें और बात करें)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः


१. संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लिखत च ।


२. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत-


(क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत् ? (सभी का मन कैसा होना चाहिए?)

उत्तरम् :  सर्वेषां मनः सामञ्जस्ययुक्तं सौहार्दपूर्णं च भवेत्। (सभी का मन मेल-जोल से भरा और सौहार्दपूर्ण होना चाहिए।)

(ख) “सङ्गच्छध्वं संवदध्वम्” इत्यस्य कः अभिप्रायः ? (“संगच्छध्वं संवदध्वम्” का क्या अभिप्राय है?)

उत्तरम् : “सङ्गच्छध्वं संवदध्वम्” इत्यस्य अभिप्रायः अस्ति यः मानवः समाजे ऐक्यभावेन मिलित्वा गच्छेत् तथा परस्परं सम्यक् विचारविनिमयं कुर्यात्। (“संगच्छध्वं संवदध्वम्” का अर्थ है कि सभी मनुष्य समाज में एकता के साथ मिलकर चलें और परस्पर अच्छे विचारों का आदान-प्रदान करें।)

(ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः? (सभी लोग किसे त्यागकर एकता के भाव से जिएँ?)

उत्तरम् : सर्वे वैमनस्यं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः। (सभी लोग वैर-भाव को त्यागकर एकता के भाव से जीवन व्यतीत करें।)

(घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति? (इस पाठ में क्या प्रेरणा दी गई है?)

उत्तरम् : अस्मिन् पाठे मानवजातेः ऐक्यभावेन सहकार्यं कृत्वा सुखपूर्वकं जीवनं यापनस्य प्रेरणा अस्ति। (इस पाठ में मानव समाज को एकता के साथ मिलकर कार्य करते हुए सुखपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है।)


३. रेखा‌ङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत


(क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति। (परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है।)

उत्तरम्:  कः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति? (कौन सर्वत्र व्याप्त है?)

(ख) वयम् ईश्वरं नमामः। (हम ईश्वर को नमस्कार करते हैं।)

उत्तरम्: वयं कं नमामः? (हम किसे नमस्कार करते हैं?)

(ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः। (हम एकता के भाव से जीते हैं।)

उत्तरम्: वयं कथं जीवामः? (हम कैसे जीते हैं?)

(घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते। (ईश्वर की प्रार्थना से शांति प्राप्त होती है।)

उत्तरम्: कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते? (किसकी प्रार्थना से शांति प्राप्त होती है?)

(ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि। (मैं समाज के लिए श्रम करता हूँ।)

उत्तरम्: कस्मै अहं श्रमं करोमि? (मैं किसके लिए श्रम करता हूँ?)

(च) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः। (यह पाठ ऋग्वेद से संकलित है।)

उत्तरम्: अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः? (यह पाठ किससे संकलित है?)

(छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः। (वेद का दूसरा नाम श्रुति है।)

उत्तरम्: कस्य अपरं नाम किम्? (किसका दूसरा नाम श्रुति है।)

(ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति। (मंत्र वेदों में होते हैं।)

उत्तरम्: मन्त्राः कुत्र भवन्ति? (मंत्र कहाँ होते हैं?)


४. पट्टिकातः शब्दान् चित्वा अधोलिखितेषु मन्त्रेषु रिक्तस्थानानि पूरयत.

संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहासति, मनांसि

(क)  सङ्गच्छध्वं  संवदध्वं  सं वो  मनांसि  जानताम्।
देवा  भागं  यथा पूर्वे सं  जानाना  उपासते।

हिंदी अनुवाद

एक साथ चलो, एक स्वर में बोलो, तुम्हारे मन एक-दूसरे को जानें।
जैसे प्राचीन काल में देवता अपने-अपने भाग को स्वीकार करके समन्वय के साथ कर्तव्यों का पालन करते थे।

(ख)
समानो मन्त्रः  समितिः  समानी समानं  मनः  सह चित्तमेषाम्।
समानं  मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा  जुहोमि।

हिंदी अनुवाद

इनका विचार समान हो, लक्ष्य की प्राप्ति समान हो, इनका मन सौहार्दपूर्ण हो, और इनका चित्त एक हो।
मैं तुम्हारे सामूहिक विचार को संस्कारित करके प्रचारित करता हूँ और तुम्हारी सामूहिक प्रार्थना से ज्ञान-यज्ञ को सिद्ध करता हूँ।

(ग)
समानी व  आकूतिः  समाना  हृदयानि  वः।
समानमस्तु वो  मनो  यथा वः  सुसहासति

हिंदी अनुवाद

तुम्हारा संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय सामरस्यपूर्ण हों।
तुम्हारा मन एकरूप हो ताकि तुम्हारा संगठन उत्तम और शोभन हो।


4. पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत –

(क) संगछध्वम्                            सेवन्ते
(ख) संवदध्वम्                            चित्तम्
(ग) मनः                                      मिलित्वा चलत
(घ) उपासते                                 सङ्कल्पः
(ङ) वसूनि                                   समस्तानि
(च) विश्वानि                              एकस्वरेण वदत
(छ) आकूतिः                               धनानि

उत्तरम्:

संख्यास्तम्भ (A)स्तम्भ (B)
(क)संगच्छध्वम् (मिलकर चलो)मिलित्वा चलत (साथ मिलकर आगे बढ़ो)
(ख)संवदध्वम् (एक स्वर में बोलो)एकस्वरेण वदत (एकता से बोलना)
(ग)मनः (मन)चित्तम् (चित्त / चेतना / बुद्धि)
(घ)उपासते (उपासना करते हैं)सेवन्ते (सेवा करते हैं)
(ङ)वसूनि (वस्तुएं / धन)धनानि (धन / संपत्ति)
(च)विश्वानि (सारे जगत की वस्तुएँ)समस्तानि (सभी वस्तुएँ)
(छ)आकूतिः (आकांक्षा / इच्छा)सङ्कल्पः (संकल्प / उद्देश्य)

६. उदाहरणानुसारेण लट्-लकारस्य वाक्यानि लोट्-लकारेण परिवर्तयत-

यथा— बालिकाः नृत्यन्ति                      ‘बालिकाः नृत्यन्तु

(क) बालकाः हसन्ति                              —————–
(ख) युवां तत्र गच्छथः                              —————–
(ग) यूयं धावथ                                        —————–
(घ) आवां लिखावः                                  —————–
(ङ) वयं पठामः                                      —————–

उत्तरम्:

संख्यालट्-लकार लोट्-लकार
(क)बालकाः हसन्ति (बालक हँसते हैं। )बालकाः हसन्तु (बालक हँसें। (आज्ञा दी जा रही है))
(ख)युवां तत्र गच्छथः (तुम दोनों वहाँ जाते हो।)युवां तत्र गच्छतम् (तुम दोनों वहाँ जाओ।)
(ग)यूयं धावथ (तुम लोग दौड़ते हो।)यूयं धावत (तुम लोग दौड़ो।)
(घ)आवां लिखावः (हम दोनों लिखते हैं।)आवां लिखाव (हम दोनों लिखें। (संकल्प/प्रस्ताव))
(ङ)वयं पठामः (हम पढ़ते हैं।)वयं पठाम (हम पढ़ें। (संकल्प/आमन्त्रण))

Chapter 2 Question Answers Deepakam

Class 8 दीपकम् Chapter 2 Question Answers Deepakam Sanskrit NCERT

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

(छोटी-छोटी वस्तुओं की एकता भी कार्य को सिद्ध करती है)


अभ्यासात् जायते सिद्धिः


१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत –


(क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति? (मित्र ग्रीष्मावकाश में कहाँ जाते हैं?)

उत्तरम्: उत्तराखंडम्

(ख) सर्वत्र कः प्रसृतः? (हर जगह कौन फैला हुआ है?)

उत्तरम्: वृक्षः। (वृक्ष)

(ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत्? (सबको प्रेरित करते हुए किसने कहा?)

उत्तरम्: शिक्षकः। (शिक्षक)

(घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति? (हितोपदेश की कहानी कौन सुनाता है?)

उत्तरम्: शिक्षकः। (शिक्षक)

(ङ) कपोतराजस्य नाम किम्? (कबूतरों के राजा का नाम क्या है?)

उत्तरम्: चित्रग्रीवः। (चित्रग्रीव)

(च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान्? (शिकारी ने किस पर जाल फैलाया?)

उत्तरम्: कपोतान्। (कबूतरों पर)

(छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम्? (विपत्ति के समय चकित हो जाना किसका लक्षण है?)

उत्तरम्: मूर्खस्य। (मूर्ख का)

(ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति? (चित्रग्रीव का मित्र हिरण्यक कहाँ रहता है?)

उत्तरम्: वने। (जंगल में)

(झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति? (चित्रग्रीव हिरण्यक को किस तरह संबोधित करता है?)

उत्तरम्: प्रियसख। (प्रिय मित्र)

(ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति? (चित्रग्रीव सबसे पहले किनके बंधन काटने को कहता है?)

उत्तरम्: शिशूनाम्। (बच्चों के)


२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत –


(क) प्रश्न: यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत्?
हिंदी अनुवाद: जब वे लोग केदार क्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे, तब क्या हुआ था?

उत्तरम्: यदा ते केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन्, तदा पर्वतेषु हिमवृष्टिः अभवत्।
हिंदी अनुवाद: जब वे लोग केदार क्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे, तब पर्वतों पर बर्फ़ गिरने लगी थी।

(ख) प्रश्न: सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त?
हिंदी अनुवाद: सभी लोग ऊँचे स्वर में क्या प्रार्थना कर रहे थे?

उत्तरम्: सर्वे जनाः उच्चस्वरेण “ईश्वरः रक्षतु” इति प्रार्थयन्त।
हिंदी अनुवाद: सभी लोग ऊँचे स्वर में “ईश्वर रक्षा करें” ऐसा प्रार्थना कर रहे थे।

(ग) प्रश्न: असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान्?
हिंदी अनुवाद: असंभव कार्य को कैसे किया जा सकता है — ऐसा नायक ने क्या कहा?

उत्तरम्: नायकः उक्तवान् – “यत्र इच्छा तत्र मार्गः”, इत्यनेन असम्भव कार्यं अपि सम्भवम् भवति।
हिंदी अनुवाद:नायक ने कहा – “जहाँ इच्छा है, वहाँ रास्ता है”, जिससे असंभव कार्य भी संभव हो सकता है।

(घ) प्रश्न: निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति?
हिंदी अनुवाद: निर्जन वन में चावल के दानों को देखकर चित्रग्रीव क्या बताता है?

उत्तरम्: चित्रग्रीवः निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा तान् जालस्य संकेतः इति निरूपयति।
हिंदी अनुवाद: चित्रग्रीव चावल के दानों को देखकर उन्हें जाल का संकेत बताता है।

(ङ) प्रश्न: किं नीतिवचनं प्रसिद्धम्?
हिंदी अनुवाद: कौन-सा नीतिवचन प्रसिद्ध है?

उत्तरम्: “विपत्तौ विवेकः आवश्यकः” इति नीतिवचनं प्रसिद्धम्।
हिंदी अनुवाद: “विपत्ति के समय विवेक आवश्यक होता है” यह नीति-वचन प्रसिद्ध है।

(च) प्रश्न: व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान्?
हिंदी अनुवाद: शिकारी से बचने के लिए चित्रग्रीव ने किसे आदेश दिया?

उत्तरम्: चित्रग्रीवः हिरण्यकं आदेशं दत्तवान् यत् सः व्याधस्य जालं छिन्तु।
हिंदी अनुवाद: चित्रग्रीव ने हिरण्यक को यह आदेश दिया कि वह शिकारी के जाल को काटे।

(छ) प्रश्न: हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः?
हिंदी अनुवाद: हिरण्यक चुपचाप क्यों खड़ा रहा?

उत्तरम्: हिरण्यकः दुःखितं मित्रं दृष्ट्वा करुणया तूष्णीं स्थितः।
हिंदी अनुवाद: हिरण्यक अपने दुःखी मित्र को देखकर करुणा से चुपचाप खड़ा रहा।

(ज) प्रश्न: पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति?
हिंदी अनुवाद: पुलकित हिरण्यक चित्रग्रीव की कैसे प्रशंसा करता है?

उत्तरम्: पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं साहसी, धैर्यशीलः इति प्रशंसति।
हिंदी अनुवाद: पुलकित होकर हिरण्यक चित्रग्रीव को साहसी और धैर्यवान कहकर उसकी प्रशंसा करता है।

(झ) प्रश्न: कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः?
हिंदी अनुवाद: कबूतरों ने आत्मरक्षा कैसे की?

उत्तरम्: कपोताः एकत्र मिलित्वा समवेतबलस्य उपयोगेन आत्मरक्षणं कृतवन्तः।
हिंदी अनुवाद: कबूतरों ने मिलकर, सामूहिक बल का उपयोग करके आत्मरक्षा की।

(ञ) प्रश्न: नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन्?
हिंदी अनुवाद: नायक के प्रेरक वचनों से सभी ने क्या किया?

उत्तरम्: नायकस्य प्रेरकवचनैः प्रेरिताः सर्वेऽपि कठिन कार्ये अपि साहसं कृतवन्तः।
हिंदी अनुवाद: नायक के प्रेरणादायक वचनों से सभी ने कठिन कार्य में भी साहस किया।


अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप् प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत –


(क) छात्रः कक्षां प्रविशति । संस्कृतं पठति ।        “कक्ष प्रविश्य संस्कृतं पठति ।

(ख) भक्तः मन्दिरम् आगच्छति। पूजां करोति ।   ——————-

(ग) माता भोजनं निर्माति । पुत्राय ददाति ।       ——————-

(घ) सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति। देवं नमति ।        ——————-

(ङ) रमा पुस्तकं स्वीकरोति। विद्यालयं गच्छति।   ——————-

(च) अहं गृहम् आगच्छामि। भोजनं करोमि।   ——————-

(छ) तण्डुलकणान् विकिरति। जालं विस्तारयति। ——————-

(ज) व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते। भूमौ अवतरति । ——————

उत्तरम्:

ल्यप् प्रत्यय के साथ संस्कृत वाक्यों का हिंदी अनुवाद

मूल संस्कृतपरिवर्तित संस्कृत
छात्रः कक्षां प्रविशति। संस्कृतं पठति। (छात्र कक्षा में प्रवेश करता है। संस्कृत पढ़ता है।)कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति। (कक्षा में प्रवेश करके संस्कृत पढ़ता है।)
भक्तः मन्दिरम् आगच्छति। पूजां करोति। (भक्त मंदिर में आता है। पूजा करता है।)मन्दिरम् आगम्य पूजां करोति। (मंदिर में आकर पूजा करता है।)
माता भोजनं निर्माति। पुत्राय ददाति। (माता भोजन बनाती है। पुत्र को देती है।)भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति। (भोजन बनाकर पुत्र को देती है।)
सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति। देवं नमति। (सुरेश प्रातः उठता है। देव को नमस्कार करता है।)प्रातः उत्थाय देवं नमति। (प्रातः उठकर देव को नमस्कार करता है।)
रमा पुस्तकं स्वीकरोति। विद्यालयं गच्छति। (रमा पुस्तक स्वीकार करती है। विद्यालय जाती है।)पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति। (पुस्तक स्वीकार करके विद्यालय जाती है।)
अहं गृहम् आगच्छामि। भोजनं करोमि। (मैं घर आता हूँ। भोजन करता हूँ।)गृहम् आगम्य भोजनं करोमि। (घर आकर भोजन करता हूँ।)
तण्डुलकणान् विकिरति। जालं विस्तारयति। (वह चावल के दाने बिखेरता है। जाल फैलाता है।)तण्डुलकणान् विकीर्य जालं  विस्तारयति। (चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाता है।)
व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते। भूमौ अवतरति। (शिकारी चावल के दानों को देखता है। भूमि पर उतरता है।)तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति। (चावल के दानों को देखकर भूमि पर उतरता है।)

उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वास्थाने ल्यप्प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत


सम्उपउत्विप्र

(क) छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करोति । “छात्रः गृहम् आगत्य (आ+ गम् + ल्यप्) भोजनं करोति ।
(ख) माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति।  ———————————-
(ग) शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति । ———————————-
(घ) रमा स्थित्वा गीतं गायति ।   ———————————-
(ङ) शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति । ———————————-
(च) लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति ।———————————-

ल्यप् प्रत्यय और उपसर्ग के साथ संस्कृत वाक्यों का हिंदी अनुवाद

मूल संस्कृत (Original Sanskrit)परिवर्तित संस्कृत (Converted Sanskrit)
(क) छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करोति। (छात्र घर जाकर भोजन करता है।)छात्रः गृहम् आगत्य (आ + गम् + ल्यप्) भोजनं करोति। (छात्र घर आकर भोजन करता है।)
(ख) माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति। (माता वस्त्र धोकर भोजन बनाती है।)माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य (प्र + क्षल् + ल्यप्) पचति। (माता वस्त्र प्रक्षालन करके भोजन बनाती है।)
(ग) शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति। (शिक्षक श्लोक लिखकर पढ़ाता है।)शिक्षकः श्लोकं संलिख्य (सम् + लिख् + ल्यप्) पाठयति। (शिक्षक श्लोक संकलन करके पढ़ाता है।)
(घ) रमा स्थित्वा गीतं गायति। (रमा खड़े होकर गीत गाती है।)रमा उपस्थाय (उप + स्था + ल्यप्) गीतं गायति। (रमा उपस्थित होकर गीत गाती है।)
(ङ) शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति। (शिष्य हमेशा गुरु को नमस्कार करके पढ़ता है।)शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य (प्र + नम् + ल्यप्) पठति। (शिष्य हमेशा गुरु को प्रणाम करके पढ़ता है।)
(च) लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति। (लेखक आलोचना करके लिखता है।)लेखकः आलोचनं विकृत्य (वि + कृ + ल्यप्) लिखति। (लेखक आलोचना विश्लेषण करके लिखता है।)

पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत


(क) सर्वैः एकचित्तीभूय———————उड्डीयताम्।

उत्तर: आकृष्टाः (आकर्षित होकर)

हिंदी अनुवाद: सभी एक मन होकर आकर्षित होकर उड़ चले।

(ख) जालापहारकान् तान् ——————— पश्चाद् अधावत्।

उत्तर: दृष्ट्वा (देखकर)

हिंदी अनुवाद: जाल ले जा रहे उन कबूतरों को देखकर वह पीछे दौड़ा।

(ग) अस्माकं मित्रं ——————— नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति ।

उत्तर: हिरण्यकः (चूहे का नाम)

हिंदी अनुवाद: हमारा मित्र हिरण्यक नामक मूषकराज गण्डकी नदी के तट पर चित्रवन में रहता है।

(घ) हिरण्यकः कपोतानाम् ——————— चकितस्तूष्णीं स्थितः ।

उत्तर: अवस्थाम् (स्थिति / अवस्था)

हिंदी अनुवाद: हिरण्यक कबूतरों की अवस्था देखकर चकित होकर चुपचाप खड़ा रहा।

(ङ) यतोहि विपत्काले ———————एव कापुरुषलक्षणम्।

उत्तर: विस्मयः (चकित होना / आश्चर्य करना)

हिंदी अनुवाद: क्योंकि विपत्ति के समय चकित रह जाना ही कायर व्यक्ति का लक्षण होता है।


पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत –


(विकीर्य                                                                जालम्
(
विस्तीर्य                                                             जालापहारकान्
(
अवतीर्य                                                              उड्डीयताम्
(
अवलोक्य                                                           तद्वचनम्
(ङएकचित्तीभूय                                                         भूमौ
(प्रत्यभिज्ञाय                                                       तण्डुलकणान्

संस्कृत (ल्यप् पद)उपयुक्त पदम्हिंदी अनुवाद
(क) विकीर्यजालम्जाल को बिखेरकर
(ख) विस्तीर्यजालापहारकान्जाल ले जा रहे पक्षियों की ओर फैलकर
(ग) अवतीर्यभूमौभूमि पर उतरकर
(घ) अवलोक्यतद्वचनम्उस कथन को देखकर
(ङ) एकचित्तीभूयउड्डीयताम्एक मन होकर उड़ चलो
(च) प्रत्यभिज्ञायतण्डुलकणान्चावल के दानों को पहचानकर

समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत –


(क) गण्डक्याः तीरम्  = गण्डकीतीरम्         तस्मिन् = गण्डकीतीरे

(ख) तण्डुलानां कणाः = ——————-                तान् = ——————-

(ग) जालस्य अपहारकाः = ——————            तान् = ——————-

(घ) अवपाताद् भयम् = ——————–               तस्मात् = ——————-

(ङ) कापुरुषाणां लक्षणम्  = ——————–         तस्मिन् = ———————

उत्तरम्:

(क) गण्डक्याः तीरम् = गण्डकीतीरम्

तस्मिन् = गण्डकीतीरे

हिंदी : गण्डकी नदी का तट = गण्डकीतीरम्, उसमें = गण्डकीतीरे

(ख) तण्डुलानां कणाः = तण्डुलकणाः

तान् = तण्डुलकणान्

हिंदी : चावल के कण = तण्डुलकणाः, उन्हें = तण्डुलकणान्

(ग) जालस्य अपहारकाः = जालापहारकाः

तान् = जालापहारकान्

हिंदी : जाल के चोर/ले जाने वाले = जालापहारकाः, उन्हें = जालापहारकान्

(घ) अवपाताद् भयम् = अवपातभयम्

तस्मात् = अवपातभयात्
हिंदी : गिरने का डर = अवपातभयम्, उस डर से = अवपातभयात्

(ङ) कापुरुषाणां लक्षणम् = कापुरुषलक्षणम्

तस्मिन् = कापुरुषलक्षणे

हिंदी : कायरों का लक्षण = कापुरुषलक्षणम्, उसमें = कापुरुषलक्षणे


सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत


(इत्याकर्ण्य       =     इति   +   आकर्ण्य ।

(चित्रग्रीवोऽवदत्     = चित्रग्रीवः + अवदत् 

(बालकोऽत्र  = ————– + ————— + 

(धैर्यमथाभ्युदये = ————– + ————— + —————–

(भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = ————– + ————— + —————–

(नमस्ते                  =—————- + ——————

(उपायश्चिन्तनीयः          =————— + ——————

(व्याधस्तत्र                 =————— + ——————

(हिरण्यकोऽप्याह                 = ————— +  ———— + ——————

(मूषकराजो गण्डकीतीरे   =  ————— +  – ———— + ——————

(अतस्त्वाम् =  ————— + ————

(ठ) कश्चित्  =  ————–  + ————     

उत्तरम्:

(क) इत्याकर्ण्य = इति + आकर्ण्य
(ख) चित्रग्रीवोऽवदत् = चित्रग्रीवः + अवदत्
(ग) बालकोऽत्र = बालकः + अत्र
(घ) धैर्यमथाभ्युदये = धैर्यम् + अथ + अभ्युदये
(ङ) भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = भोजने + अपि + अप्रवर्तनम्
(च) नमस्ते = नमः + ते
(छ) उपायश्चिन्तनीयः = उपायः + चिन्तनीयः
(ज) व्याधस्तत्र = व्याधः + तत्र
(झ) हिरण्यकोऽप्याह = हिरण्यकः + अपि + आह
(ञ) मूषकराजो गण्डकीतीरे = मूषकराजः + गण्डकी + तीरे
(ट) अतस्त्वाम् = अतः + त्वाम्
(ठ) कश्चित् = कः + चित्