02. स्मृति – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?
उत्तर: कहीं से झरबेरी से बेर तोड़ने के अपराध से आज उनकी पिटाई न हो जाये।

प्रश्न 2: मक्खनपुर जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में पत्थर क्यों फेंका करती थी?
उत्तर: उन्हें साँप के फुसकारने की आवाज को सुनने की इच्छा थी।

प्रश्न 3: ठंड कौन से समय की थी?
उत्तर: ठंड दिसंबर के आखिर और जनवरी के आरंभ की थी।

प्रश्न 4: लेखक और उसके साथी क्या तोड़ के खा रहे थे?
उत्तर: वे झरबेरी से बेर तोड़ के खा रहे थे।

प्रश्न 5: लेखक को किसने पुकारा था?
उत्तर: एक व्यक्ति ने, उनके बड़े भाई के कहने पर लेखक को पुकारा था।

प्रश्न 6: घर पहुंचने पर लेखक का डर कम हुआ। क्यों?
उत्तर: बड़े भाई साहब को पत्र लिखते देख लेखक का डर कम हुआ।

प्रश्न 7: स्मृति पाठ के लेखक का क्या नाम है?
उत्तर: स्मृति पाठ के लेखक का नाम श्रीराम शर्मा है।

प्रश्न 8: श्रीराम शर्मा का जन्म कब हुआ था?
उत्तर: श्रीराम शर्मा का जन्म 1896 में हुआ था।

प्रश्न 9: बड़े भाई साहब ने लेखक से क्या कहा?
उत्तर: बड़े भाई साहब ने लेखक को बुलाया और कहा कि वह ये चिट्ठियाँ जल्दी से मक्खनपुर के डाकघर में डाल आए क्योंकि ये चिट्ठियाँ पहुँचना बहुत ज़रूरी है।

प्रश्न 10: लेखक की मां ने भूंजने के लिए क्या दिया था?
उत्तर: लेखक की मां ने भूँजने के लिए कुछ चने दिए थे।

प्रश्न 11: लेखक और उसके भाई का डंडा किस पेड़ की लकड़ी का बना हुआ था?
उत्तर: लेखक और उसके भाई का डंडा बबूल पेड़ की लकड़ी का बना हुआ था।

प्रश्न 12: लेखक का डंडा सजीव सा प्रतीत होता था क्यों?
उत्तर: लेखक द्वारा प्रतिवर्ष उससे आम झुरे जाते थे, इस कारण वह मूक डंडा सजीव-सा प्रतीत होता था।

प्रश्न 13: लेखक ने चिट्ठियाँ को कहां रखी थीं और क्यों?
उत्तर: लेखक ने चिट्ठियाँ अपनी टोपी में रख लिया था, क्योंकि कुर्ते में जेबें नहीं थी।

प्रश्न 14: चिट्ठियाँ ले जाते वक्त लेखक और उसके छोटे भाई ने कुएँ में क्या देखना चाहा?
उत्तर: चिट्ठियाँ ले जाते वक्त लेखक और उसके छोटे भाई ने कुएँ में साँप को देखना चाहा और उसकी पुरस्कार सुननी चाही।

प्रश्न 15: साँप का कुएँ में होने का ज्ञान लेखक और उसके सहपाठियों को कितने महीनों से था?
उत्तर: साँप का कुएँ में होने का ज्ञान लेखक और उसके सहपाठियों को करीब दो महीनों से था।

प्रश्न 16: लेखक और लेखक के साथियों का साँप से भेंट कैसे हुई?
उत्तर: एक दिन जब लेखक और उसके साथी स्कूल से लौट रहे थे, तब उन्हें साँप के फुसकारने की आवाज सुनाई दी, और वे सभी साँप से फुसकारने के लिए कुएँ में पत्थर फेंकते हैं।

प्रश्न 17: लेखक और उनके साथियों को क्या करने में बड़ा मजा आता था?
उत्तर: उन्हें कुएँ में पड़े साँप पर पत्थर फेंकने में बहुत मजा आता था, और वे सभी साँप से फुसकारने के लिए कुएँ में पत्थर फेंकते हैं।

प्रश्न 18: लेखक और उनके साथियों को किसे तंग करने में बड़ा मजा आता था?
उत्तर: उन्हें साँप को तंग करने के लिए कुएँ में पड़े साँप पर पत्थर फेंकने में बहुत मजा आता था, और वे सभी साँप से फुसकारने के लिए कुएँ में पत्थर फेंकते हैं।

प्रश्न 19: टोपी के हाथ में लेते ही लेखक की टोपी से क्या चीज़ कुएँ में जा गिरती है?
उत्तर: टोपी के हाथ में लेते ही लेखक की टोपी से रखी चिट्ठियां कुएँ में जा गिरती हैं।

प्रश्न 20: कुएँ के पाट पर बैठे-बैठे लेखक और उसका भाई क्या कर रहे थे?
उत्तर: कुएँ में गिरी चिट्ठियां निकालने के पश्चात् लेखक और उसका भाई कुएँ के पाट पर बैठे-बैठे रो रहे थे।

01. गिल्लू – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: कौवों की चोंच गिलहरी के बच्चे को लगी थी कि नहीं?
उत्तर:
 हाँ! कुछ चोंचे उसे छू गई थीं, जिससे वह और भी घायल हो गया।

प्रश्न 2: कौवे की चोंच लगने की वजह से अब यह बच नहीं सकता, कौन कहता है?
उत्तर:
 पड़ोस के लोग कहते हैं।

प्रश्न 3: लेखिका ने गिलहरी के बच्चे को किस से पोंछा?
उत्तर: 
लेखिका ने गिलहरी के बच्चे को रूई से पोंछा।


प्रश्न 4: गिलहरी के बच्चे को किस चीज से दूध पिलाने का प्रयत्न किया गया?
उत्तर:
 रूई की पतली बत्ती बनाकर दूध पिलाया गया।

प्रश्न 5: पहली बार गिल्लू ने क्या पिया?
उत्तर: 
पहली बार गिल्लू ने पानी की एक बूँद पिया।

प्रश्न 6: उसे पूर्णतः ठीक होने में कितने दिन लग गए?
उत्तर: 
उसे पूर्णतः ठीक होने में तीन-चार महीने लग गए।

प्रश्न 7: गिलहरी के बच्चे ने पहली बार लेखिका को किस प्रकार स्पर्श किया?
उत्तर: 
लेखिका की उंगली पकड़कर उसने पहली बार लेखिका को स्पर्श किया।

प्रश्न 8: गिलहरी के बच्चे की आंखों का रंग कैसा था?
उत्तर:
 नीले कांच के मोतियों जैसा।


प्रश्न 9: गिलहरी के बच्चे की झब्बेदार रोए, पूंछ और चंचल चमकीली आंखें क्या करती थीं?
उत्तर:
 उसकी झब्बेदार रोएँ, पूँछ और चंचल चमकीली आँखें सबको विस्मित करने लगीं।

प्रश्न 10: गिलहरी के बच्चे को क्या नाम दिया गया?
उत्तर:
 गिलहरी के बच्चे को गिल्लू नाम दिया गया।

प्रश्न 11: गिल्लू का घर किस चीज का बना था?
उत्तर:
 गिल्लू का घर फूल की दलिया से बना था, जिसमें लेखिका ने रूई बिछाकर बनाया था।

प्रश्न 12: फूल रखने की डलिया गिल्लू का घर कितने बरस तक रही?
उत्तर: 
फूल रखने की डलिया लगभग दो वर्षों तक गिल्लू के घर में रही।

प्रश्न 13: गिल्लू झूला झूलने के लिए क्या करता था?
उत्तर: 
गिल्लू स्वयं डलिया को हिलाकर अपने घर में झूलता था।

प्रश्न 14: गिल्लू खिड़की से बाहर क्या देखा करता था?
उत्तर: 
वह अपनी काँच जैसी आँखों से कमरे के भीतर और खिड़की से बाहर न जाने क्या देखता-समझता रहता था।

प्रश्न 15: लेखिका गिल्लू को लिफाफे में क्यों बंद कर देती थी?
उत्तर:
 गिल्लू की हरकतों से ध्यान भटकता था, इसलिए लेखिका उसे लिफाफे में इस तरह रखती थीं कि वह खड़ा रहकर उन्हें देख सके और वह अपने कार्य में ध्यान लगा सकें।

04. मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय – Short Questions answer

प्रश्न 1: लेखक को स्कूल क्यों नहीं भेजा गया?
उत्तर:
 लेखक को स्कूल नहीं भेजा गया था, शुरू की पढ़ाई के लिए घर पर मास्टर रखे गए थे। पिता नहीं चाहते थे कि नासमझ उम्र में वह गलत संगति में पड़कर गाली-गलौच सीखे, बुरे संस्कार ग्रहण करे। अतः नाम तभी लिखाया गया, जब वह कक्षा दो तक की पढ़ाई घर पर कर चुका था।

प्रश्न 2: लेखक के प्राण कहाँ रहते थे और क्यों ?
उत्तर: 
लेखक को लगता था कि उसकी स्थिति बिल्कुल उस राजा की तरह है जिसके प्राण तोते में थे और उसके अपने पुस्तकालय में रखी किताबों में थे। इसी कारण लेखक बीमारी के बाद अपने निजी पुस्तकालय में रहना चाहता था। वह इन किताबों के बिना अपने जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था।

प्रश्न 3: डॉक्टर बोर्जेस ने लेखक को शॉक्स क्यों दिए ? उससे लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
 सन् 1989 में लेखक को तीन हार्ट अटैक हुए। सभी डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। डॉक्टर बोर्जेस ने हिम्मत नहीं हारी। उसने लेखक की धड़कन लौटाने के लिए नौ सौ वाल्ट्स के शॉक्स दिए। उसका मत था कि यदि शरीर मृत है तो उसे दर्द महसूस ही नहीं होगा किंतु यदि एक कण प्राण भी शेष होंगे तो हार्ट रिवाइव कर सकता है। डॉक्टर बोर्जेस के इस प्रयोग से लेखक के प्राण तो लौटे किंतु उसका साठ प्रतिशत हार्ट सदा के लिए नष्ट हो गया।

प्रश्न 4: पुस्तकों द्वारा किन मूल्यों को अपनाकर जीवन को समृद्ध बनाया जा सकता है? पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर:
 पुस्तकों से मानव के व्यक्तिगत ज्ञान में वृद्धि होती है। मानव स्वभावतः क्रियाशील होता है उसकी जिज्ञासु वृत्ति के कारण वह नित नए-नए आयाम खोजता है। रचनाकार मानव की प्रवृत्तियों के आधार पर नई रचना करता है। महान रचनाएँ शाश्वत मानव मूल्यों का वर्णन करती हैं। पाठक इन कृतियों को पढ़कर अनेक समस्याओं का समाधान पा सकता है। वह अपनी कमियों को भी दूर कर सकता है। पुस्तकें बौद्धिक मनोरंजन का साधन भी है। यह अकेलेपन का साथी है।

प्रश्न 5: अस्पताल से घर आकर लेखक कहाँ रहा और उसने क्या महसूस किया ?
उत्तर:
 लेखक अस्पताल से अर्धमृत हालत में घर लाया गया और उसे पूर्ण रूप से विश्राम करने के लिए कहा गया। उसके चलने, बोलने और पढ़ने पर मनाही थी। अस्पताल से घर लाकर उसे किताबों वाले कमरे में रखा गया। वहाँ वह दिन-भर खिड़की के बाहर हवा में झूलते सुपारी के पेड़ के पत्ते और कमरे में रखी किताबों से भरी अलमारियों को देखता रहता। लेखक ने महसूस किया कि बचपन में पढ़ी परी – कथाओं में जिस प्रकार राजा के प्राण तोते में रहते थे, उसी प्रकार उसके प्राण भी मानो कमरे में रखी इन किताबों में बसे हैं। इन किताबों को लेखक ने बड़ी कठिनाई से एक-एक करके इकट्ठे किए थे।

प्रश्न 6: मराठी के वरिष्ठ कवि विंदा करंदीकर ने लेखक की लाइब्रेरी देखकर लेखक से क्या कहा था ?
उत्तर: 
मराठी के वरिष्ठ कवि विंदा करंदीकर ने लेखक से कहा था- ” भारती, ये सैकड़ों महापुरुष जो पुस्तक रूप में तुम्हारे चारों ओर विराजमान हैं, इन्हीं के आशीर्वाद से तुम बचे हो। इन्होंने तुम्हें पुनर्जीवन दिया है। ” तब लेखक ने कवि विंदा तथा पुस्तकों के महान लेखकों को मन-ही-मन प्रणाम किया था।

प्रश्न 7: लेखक के माता-पिता क्या काम करते थे ?
उत्तर: 
लेखक के पिता सरकारी नौकरी में थे। उन्होंने बर्मा रोड बनाते समय बहुत पैसा बनाया था। गाँधी जी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। बाद में उनके पिता आर्य समाज रानीमंडी के प्रधान बने। उनकी माता ने स्त्री-शिक्षा के लिए आदर्श कन्या पाठशाला की स्थापना की थी।

प्रश्न 8: जुलाई, 1989 में लेखक के साथ क्या हुआ? वह कैसे बचा ?
उत्तर: 
जुलाई, 1989 में लेखक को तीन-तीन जबरदस्त हार्ट अटैक आए। एक तो ऐसा कि नब्ज बंद, साँस बंद, धड़कन बंद डॉक्टरों ने घोषित कर दिया कि अब प्राण नहीं रहे, पर डॉक्टर बोर्जेस ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी थी। उन्होंने नौ सौ वॉल्ट के शॉक्स दिए। यह भयानक प्रयोग था, लेकिन वे बोले की यदि यह मृत शरीर मात्र है तो दर्द महसूस ही नहीं होगा, पर यदि कहीं भी शरीर में एक कण प्राण शेष होंगे तो हार्ट रिवाइव कर सकता है। प्राण तो लौटे, पर इस प्रयोग में साठ प्रतिशत हार्ट सदा के लिए नष्ट हो गया। केवल चालीस प्रतिशत बचा।

प्रश्न 9: लेखक के पिता ने उन्हें आरंभ में स्कूल क्यों नहीं भेजा ?
उत्तर: 
लेखक के पिता ने उन्हें बचपन में स्कूल नहीं भेजा था। उनके विचार में छोटे बच्चे स्कूल में ग़लत बातें सीखते हैं। पिता के अनुसार वे ग़लत संगत में पड़कर कहीं गाली-गलौच करना न सीख ले या फिर कहीं बुरे संस्कार न ग्रहण कर लें, इसलिए उन्हें पढ़ाने के लिए घर में ही अध्यापक रखा गया था।

प्रश्न 10: लेखक के पिता ने उनसे क्या वचन लिया ?
उत्तर: 
लेखक ने कक्षा दो तक की पढ़ाई घर पर की थी। तीसरी कक्षा में उन्हें स्कूल भेजा गया। स्कूल के पहले दिन उनके पिता ने उनसे वचन लिया कि वे स्कूल में मन लगाकर पढ़ेंगे। अन्य किताबों की तरह पाठ्यक्रम की किताबें भी ध्यान से पढ़ेंगे और अपनी माँ की उनके भविष्य को लेकर हो रही चिंताओं को दूर करेंगे।

प्रश्न 11: तीसरे दर्जे में भर्ती होने पर पिता ने लेखक को क्या कहा? उसका क्या परिणाम हुआ?
उत्तर: 
तीसरे दर्जे में लेखक स्कूल में भरती हुआ। उस दिन शाम को पिता उँगली पकड़कर उन्हें घुमाने ले गए। लोकनाथ की एक दुकान से ताज़ा अनार का शरबत पिलाया और सिर पर हाथ रखकर बोले कि वादा करो कि पाठ्यक्रम की किताबें भी इतने ही ध्यान से पढ़ोगे, माँ की चिंता मिटाओगे। यह पिताजी का आशीर्वाद था या उनका जी-तोड़ परिश्रम कि पाँचवें दर्जे में तो वे फर्स्ट आए। माँ ने आँसू भरकर गले लगा लिया।

प्रश्न 12: क्या लेखक ने अपना निजी पुस्तकालय का सपना पूरा किया ?
उत्तर:
 हाँ, लेखक ने अपना निजी पुस्तकालय का सपना पूरा किया। लेखक को पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए वह मोहल्ले की लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ता था। कई बार कोई उपन्यास अधूरा रह जाता तो वह सोचता कि पैसे होते, तो वह खरीदकर पढ़ लेता। धीरे-धीरे उसने बचत करके अपने लिए किताबें खरीदनी शुरू की और अपना सपना पूरा किया।

प्रश्न 13: ऑपरेशन के बाद मराठी कवि ने लेखक को क्या कहा था?
उत्तर:
 मराठी के वरिष्ठ कवि विंदा करंदीकर ने ऑपरेशन सफल होने के बाद कहा कि भारती, ये सैकड़ों महापुरुष जो पुस्तक रूप में तुम्हारे चारों ओर विराजमान हैं, इन्हीं के आशीर्वाद से तुम बचे हो। इन्होंने तुम्हें पुनर्जीवन दिया है। लेखक ने इन महापुरुषों को मन-ही-मन प्रणाम किया।

03. कल्लू कुम्हार की उनाकोटी – Short Questions answer

प्रश्न 1: त्रिपुरा की भौगोलिक स्थिति के बारे में बताइए।
उत्तर: 
त्रिपुरा भारत के सबसे छोटे राज्यों में से एक है। यह चारों ओर बांग्लादेश से घिरा हुआ है, और उत्तर-पूर्वी सीमा में मिजोरम और असम से मिलता है। इसका मुख्य शहर अगरतला है और यह भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित है।

प्रश्न 2: लेखक की दिनचर्या दूसरों से किस प्रकार अलग है?
उत्तर: 
लेखक की दिनचर्या आमतौर पर सुन्दर स्थलों की सैर, गीतों की गायन, चाय का स्वयं तैयार करना, और शांति पूर्ण बिताने की ओर दिखती है। उन्होंने अपने जीवन को सुंदरता और सुकून से भर दिया है और यह उनके लेखन में भी प्रकट होता है।

प्रश्न 3: लेखक के त्रिपुरा जाने का उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
 लेखक त्रिपुरा जाने का उद्देश्य अपनी टीवी श्रृंखला “ऑन द रोड” के लिए त्रिपुरा की जानकारी और त्रिपुरा के राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के साथ उसके विकास के संबंध में जानकारी प्राप्त करना था।

प्रश्न 4: उनाकोटी में शूटिंग करते समय शाम का मौसम अचानक कैसा हो गया?
उत्तर: 
शूटिंग के दौरान उनाकोटी में शाम के समय में अचानक बादल आए और तेज हवाओं ने गरज की आवाज़ लगाई। यह समय बहुत ही अद्भुत था और उसके लेखक को यह लगा कि बादलों की गरज सुनकर मानो शिव का तांडव शुरू हो गया हो।

प्रश्न 5: त्रिपुरा के आदिवासियों के असंतोष का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: 
त्रिपुरा में आदिवासियों के असंतोष का मुख्य कारण बाहरी लोगों के आक्रमण और त्रिपुरा में अवैध ढंग से प्रवासित लोगों की वृद्धि थी, जिससे स्थानीय लोगों का सांस्कृतिक और आर्थिक संकट बढ़ गया था।

प्रश्न 6: लेखक ने अगरतला के विषय में क्या कहा है?
उत्तर: 
अगरतला त्रिपुरा की राजधानी है और यहाँ का मुख्य आदर्श और शक्तिशाली स्थान है। इसे त्रिपुरा की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्वपूर्णता के साथ जोड़ा जाता है, और उज्जयंत महल इसकी शोभा का प्रतीक है।

प्रश्न 7: लेखक त्रिपुरा कब गए? इस यात्रा के पीछे क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
 लेखक दिसंबर 1999 में त्रिपुरा गए थे और उनका उद्देश्य अपनी टीवी श्रृंखला “ऑन द रोड” के लिए त्रिपुरा की जानकारी प्राप्त करना और राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के साथ त्रिपुरा के विकास से जुड़ी जानकारी देना था।

प्रश्न 8: डूबते सूरज में मनु नदी का दृश्य कैसा लग रहा था?
उत्तर:
 मनु नदी का दृश्य डूबते सूरज के साथ सोने की किरनों से भरा हुआ था, और उस समय लेखक को ऐसा लगा कि सूर्य मनु नदी के जल में खिल रहा हो। यह दृश्य बहुत ही रोमांचक और सुंदर था।

प्रश्न 9: उज्जयंत महल के बारे में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
 उज्जयंत महल त्रिपुरा का प्रमुख महल है, जिसका महत्व ऐतिहासिक और सांस्कृतिक है। यह महल अगरतला में स्थित है और यहाँ पर त्रिपुरा की विधानसभा भी सम्हाली जाती है।

प्रश्न 10: लेखक की शांतिपूर्ण दिनचर्या में खलल पड़ने का क्या कारण था?
उत्तर:
 लेखक की शांतिपूर्ण दिनचर्या में एक दिन खलल पड़ने का कारण गरजने वाली बादलों की आवाज़ और तेज हवाओं की आवृत्ति थी, जिनके कारण वे उठ गए थे। यह कारण खलल पड़ने के बावजूद अद्भुत और रोमांचक था।

प्रश्न 11: ज़िला परिषद ने लेखक और उसकी शूटिंग यूनिट के लिए किस प्रकार का आयोजन किया था?
उत्तर: 
ज़िला परिषद ने लेखक और उनकी शूटिंग यूनिट के लिए एक सामान्य भोज का आयोजन किया था, जिसमें उन्हें सम्मान और आदर के साथ खाना परोसा गया था।

प्रश्न 12: त्रिपुरा में संगीत की जड़ें काफ़ी गहरी हैं। कैसे?
उत्तर: 
त्रिपुरा में संगीत की जड़ें काफ़ी गहरी हैं क्योंकि यह स्थान संगीतकारों और गायकों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत है। यहाँ से कई प्रमुख संगीतकार उत्पन्न हुए हैं, जैसे कि एस. डी. बर्मन और हेमंत कुमार जमातियाँ।

प्रश्न 13: उत्तरी त्रिपुरा किस कार्य के लिए लोकप्रिय है?
उत्तर: 
उत्तरी त्रिपुरा अपनी घरेलू उद्योगिता के लिए प्रसिद्ध है, जैसे कि वनस्पति सीकों की तैयारी जो अगरबत्तियों के लिए उपयोग होती है। यहाँ के लोग इसे कमाई का एक स्रोत मानते हैं।

02. स्मृति – Short Questions answer

प्रश्न 1. भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?
उत्तरः भाई के बुलाने पर, घर लौटते समय लेखक को भाई से पिटने का डर था। जब लेखक को भाई का बुलावा आया तब वह और उसके दोस्त बेर तोड़कर खा रहे थे। उसे लगा शायद इसी बात की भनक भाई को लग गई हो और उन्होंने उसे बुलावा भेजा हो।


प्रश्न 2. मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढेला क्यों फेंकती थी?
उत्तरः एक दिन बच्चों की टोली ने कुएँ में ढेला फेंककर जानना चाहा कि उसकी प्रतिध्वनि कैसी होती है। जैसे ही कुएँ में ढेला फेंका गया, वैसे ही उसमें से साँप की फुसकार सुनाई पड़ी। (यह सुनकर वे चकित रह गए) उसके बाद वे प्रतिदिन, साँप की फुसकार सुनने के लिए, कुएँ में ढेला फेंकने लगे।


प्रश्न 3. ‘साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’-यह कथन लेखक की किस मनोदशा को स्पष्ट करता है?
उत्तरः उपर्युक्त कथन से लेखक की बदहवास मनोदशा स्पष्ट होती है। जिस समय लेखक कुएँ में ढेला फेंक रहा था, उसी समय उसने अपने एक हाथ से टोपी भी उतारी जिससे उसकी चिट्ठियाँ कुएँ में गिर गईं। चिट्ठियों के कुएँ में गिरने के कारण, लेखक का डर के मारे बुरा हाल हो गया था। इसी डर की वजह से उसे पता ही नहीं चला और न ही स्मरण रहा कि साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं।


प्रश्न 4. किन कारणों से लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया?
उत्तरः लेखक के बड़े भाई ने लेखक को चिट्ठियाँ डाकखाने में डालने को दी थी, लेकिन लेखक से वे कुएँ में गिर गईं। लेखक अपने बड़े भाई से बहुत डरते थे। अगर घर पहुँचकर सच बोलते तो बड़े भाई से रूई की तरह धुने जाने (बहुत पिटाई होना) का डर था। इस ख्याल से ही लेखक का शरीर ही नहीं, मन भी काँप रहा था और झूठ बोलकर चिट्ठियों के न पहुँचने की जिम्मेदारी के बोझ से भी वह दबा जा रहा था। इसलिए उसने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया।


प्रश्न 5. साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या-क्या युक्तियाँ अपनाईं?
उत्तरः साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने कई युक्तियाँ अपनाईं। जैसे-साँप के पास पड़ी चिट्ठियों को उठाने के लिए डंडा बढ़ाया, साँप डंडे पर कूदा और डंडा छूट गया लेकिन इससे साँप का आसन भी बदल गया। लेखक चिट्ठियाँ उठाने में सफल रहा।
डंडा उठाने के लिए उसने साँप की दाईं ओर एक मुट्ठी मिट्टी लेकर फेंकी। जैसे ही साँप का ध्यान ऊपर गया, लेखक ने डंडा उठा लिया। डंडा बीच में होने के कारण साँप उस पर वार न कर पाया।


प्रश्न 6. ”जब जीवन होता है, तब हजारों ढंग बचने के निकल आते हैं।“ इस पंक्ति से किस भाव का पता चलता है?
उत्तरः इस पंक्ति में ईश्वर के प्रति भक्ति और विश्वास की भावना परिलक्षित हुई है। एक कहावत भी प्रसिद्ध है-जाको राखे साईंयाँ, मार सके न कोय।


प्रश्न 7. लेखक जब कुएँ में घुसने लगा तब छोटा भाई रोने क्यों लगा?
उत्तरः लेखक को कुएँ में घुसते देख भाई को आशंका हुई कि कुएँ में बैठा विषधर भाई को जीवित बाहर नहीं आने देगा। उस समय मौत सजीव और नग्न रूप लिए कुएँ में बैठी थी। इसलिए छोटा भाई रोने लगा। उसका रोना बिना कारण के नहीं था। इससे उसके भ्रातृ प्रेम, सहृदयता, दया, संरक्षण की भावना प्रकट होती है।


प्रश्न 8. माँ ने लेखक को अपनी गोद में क्यों व किस तरह से बिठा लिया?
उत्तरः माँ ने लेखक को ममता व वात्सल्य से अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया जैसे चिड़िया अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे छिपा लेती है।


प्रश्न 9. लेखक व उसका भाई कुएँ की पाट पर बैठे रो क्यों रहे थे?
उत्तरः चिट्ठियाँ कुएँ में गिरने के बाद लेखक और उसका भाई निराशा, पिटने के भय, बेचैनी और घबराहट के मारे कुएँ की पाट पर बैठकर रो रहे थे।


प्रश्न 10. ‘फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है’- पाठ के संदर्भ में इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः लेखक यह सोचकर कुएँ में उतर गया था कि या तो वह चिट्ठियाँ उठाने में सफल होगा या साँप द्वारा काट लिया जाएगा। उसने फल की चिंता नहीं की। अतः फल की चिंता किए बिना दृढ़-विश्वास के साथ हमें कर्म करना चाहिए। फल देने वाला तो ईश्वर है। यह उसकी इच्छा है कि हमें मनचाहा फल मिलता है या नहीं, लेकिन दृढ़विश्वास व निश्चय से कर्म करने वाले व्यक्ति का ईश्वर भी साथ देता है।

(प्रत्येक 3 अंक)

प्रश्न 1. इस पाठ को पढ़ने के बाद किन-किन बाल-सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है ? अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तरः बच्चे बाल्यावस्था में पेड़ों पर चढ़ते हैं और उस पेड़ के फल तोड़कर खाते हैं, कुछ फल फेंक देते हैं तथा बच्चों को पेड़ों से बेर आदि फल तोड़कर खाने में मजा आता है। बच्चे स्कूल जाते समय रास्ते में शरारतें करते हुए तथा शोर करते हुए जाते हैं। तथा बच्चे जीव-जन्तुओं को तंग करके खुश होते हैं। रास्ते में कुत्ते, बिल्ली या किसी कीड़े को पत्थर मारकर सताते हैं क्योंकि वे नासमझ होते हैं। उन्हें उनके दर्द व पीड़ा के बारे में पता नहीं चलता। वे नासमझी व बाल-शरारतों के कारण ऐसा करते हैं।


प्रश्न 2. दोनों भाइयों ने मिलकर कुएँ में नीचे उतरने की क्या युक्ति अपनाई?
उत्तरः कुएँ में चिट्ठियाँ गिर जाने पर दोनों भाई सहम गए और डरकर रोने लगे। छोटा भाई जोर-जोर से और लेखक आँख डबडबा कर रो रहा था। तभी उन्हें एक युक्ति सूझी। उनके पास एक धोती में चने बँधे थे, दो धोतियाँ उन्होंने कानों पर बाँध रखी थीं और दो धोतियाँ वह पहने हुए थे। उन्होंने पाँचों धोतियाँ मिलाकर कसकर गाँठ बाँध कर रस्सी बनाई। धोती के एक सिरे पर डंडा बाँधा, तो दूसरा सिरा चरस के डेंग पर कसकर बाँध दिया और उसके चारों ओर चक्कर लगाकर एक और गाँठ लगाकर छोटे भाई को पकड़ा दिया। लेखक धोती के सहारे कुएँ के बीचों-बीच उतरने लगा। छोटा भाई रो रहा था पर लेखक ने उसे विश्वास दिलाया
कि वह साँप को मारकर चिट्ठियाँ ले आएगा। नीचे साँप फन फैलाए बैठा था। लेखक ने बुद्धिमतापूर्वक साँप से लड़ने या मारने की बात त्याग कर डंडे से चिट्ठियाँ सरका ली और साँप को चकमा देने में कामयाब हो गया।


प्रश्न 3. कभी-कभी दृढ़ संकल्प के साथ तैयार की गई योजना भी प्रभावी नहीं हो पाती है। कुएँ से चिट्ठी निकालने के लिए लेखक द्वारा बनाई गई पूर्व-योजना क्यों सफल नहीं हुई?
उत्तरः चिट्ठियाँ कुएँ में गिर जाने पर लेखक बहुत भारी मुसीबत में फँस गया। पिटने का डर और जिम्मेदारी का अहसास उसे चिट्ठियाँ निकालने के लिए विवश कर रहा था। लेखक ने धोतियों में गाँठ बाँध कर रस्सी बनाकर कुएँ में उतरने की योजना बना ली।
लेखक को स्वयं पर भरोसा था कि वह नीचे जाते ही डंडे से दबाकर साँप को मार देगा और चिट्ठियाँ लेकर ऊपर आ जाएगा क्योंकि वह पहले भी कई साँप मार चुका था। उसे अपनी योजना में कमी नहीं दिखाई दे रही थी, परन्तु लेखक द्वारा बनाई गई यह पूर्व योजना सफल नहीं हुई, क्योंकि योजना की सफलता परिस्थिति पर निर्भर करती है। कुएँ में स्थान की कमी थी और साँप भी व्याकुलता से उसको काटने के लिए तत्पर था। ऐसे में डंडे का प्रयोग करना संभव नहीं था।


प्रश्न 4. लेखक ने इस पाठ में भ्रातृ स्नेह के ताने-बाने को चोट लगने की बात कही है। भाई-से-भाई के स्नेह का कोई अन्य उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लेखक के इस कथन का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तरः लेखक के वर्णन के अनुसार जब कुएँ में साँप से उसका सामना हुआ तो साँप और लेखक के आपसी द्वंद्व में होने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप लेखक के छोटे भाई को, जो कुएँ के ऊपर खड़ा था, ऐसा प्रतीत हुआ कि उसके बड़े भाई को साँप ने काट लिया। छोटा भाई यह सोचकर चीख पड़ा। लेखक उसकी चीख को उसके मन में अपने प्रति उपस्थित स्नेह-भाव के कारण उठी चीख मानता है। वास्तव में स्नेह या प्रेम ऐसा ही सकारात्मक मनोविकार है। इसमें अपने स्नेह-पात्र के अमंगल की आशंका से उसे स्नेह करने वाले का मन व्यथित हो उठता है। लेखक के छोटे भाई का चीखना इसी का उदाहरण है। ऐसा उदाहरण हम राम और लक्ष्मण के इतिहास प्रसिद्ध ‘भ्रातृ-स्नेह’ में देख सकते हैं, जब ‘युद्ध-भूमि’ में लक्ष्मण के मूच्र्छित हो जाने पर उनके वियोग

की आशंका से राम जैसा मर्यादित और वीर पुरुष भी विलाप करने लगा। वस्तुतः भ्रातृ-प्रेम का ऐसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। लेखक ने इसी कारण भ्रातृ-स्नेह के ताने-बाने को चोट लगने की बात कहते हुए भाई-भाई के पास्परिक प्रेम को सामान्य लोकानुभव से जोड़कर देखा है।


प्रश्न 5. ”अपनी शक्ति के अनुसार योजना बनाने वाला ही सफल होता है“-स्मृति पाठ के अनुसार इस कथन की विवेचना कीजिए। 
उत्तरः विद्यार्थियों की समझ तथा अभिव्यक्ति के आधार पर।
व्याख्यात्मक हल:
लेखक ने कुएँ में चिट्ठियाँ गिर जाने के बाद बहुत ही बुद्धिमानी, चतुरता एवं साहस का परिचय दिया। कठिन परिस्थिति में भी उसने हिम्मत नहीं हारी। कुएँ में जहरीला साँप होने के बावजूद वह साहसपूर्ण युक्ति से अपने पास मौजूद सभी धोतियों को आपस में बाँधता है, ताकि वे नीचे तक चली जाएँ। सर्प के डसे जाने से बचने के लिए उसने पहले कुएँ की बगल की मिट्टी गिराई। फिर डंडे से चिट्ठियों को सरकाया। डंडा छूट जाने पर उसने साँप का ध्यान दूसरी ओर बँटाया, फिर डंडे को उठा लिया।
साँप का आसन बदला तो उसने चिट्ठियाँ भी उठा लीं और उन्हें धोतियों में बाँध दिया। इस प्रकार लेखक ने अपनी बुद्धि का पूरा सदुपयोग करके तथा युक्तियों का सहारा लेकर कुएँ में गिरी हुई चिट्ठियों को निकाला। यह उसकी साहसिकता का स्पष्ट परिचय देता है।


प्रश्न 6. ‘स्मृति’ कहानी बाल मनोविज्ञान को किस प्रकार प्रकट करती है? बच्चों के स्वभाव उनके विचारों के विषय में हमें इससे क्या जानकारी मिलती है? 
उत्तरः बाल मस्तिष्क हर समय सूझ-बूझ से कार्य करने में सक्षम नहीं होता। बच्चे शरारतों का ध्यान आते ही अपने चंचल मन को रोक नहीं पाते। खतरे उठाने, जोखिम लेने, साहस का प्रदर्शन करने में उन्हें आनन्द आता है वे अपनी जान को खतरे में डालने से भी नहीं चूकते। लेकिन बच्चों का हृदय बहुत कोमल होता है। बच्चे मार व डाँट से बहुत डरते हैं। जिस तरह लेखक बड़े भाई की डाँट व मार के डर से तथा चिट्ठियों को समय पर पहुँचाने की जिम्मेदारी की भावना के कारण जहरीले साँप तक से भिड़ गया। बच्चे अधिकतर ईमानदार होते हैं वे बड़ों की भाँति न होकर छल व कपट से दूर होते हैं। मुसीबत के समय बच्चों को सबसे अधिक अपनी माँ की याद आती है। माँ के आँचल में वे स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं।


प्रश्न 7. लेखक कुएँ से चिट्ठी निकालने का काम टाल सकता था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। ‘स्मृति’ कहानी से उसके चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं? 
उत्तरः लेखक के द्वारा कुएँ से चिट्ठी निकालने का काम टल सकता था। लेकिन बड़े भाई की डाँट के डर से उसने ऐसा नहीं किया। इसके साथ ही लेखक बहुत ईमानदार भी था वह अपने भाई से झूठ बोलना अथवा बहाना लगाना नहीं चाहता था। चिट्ठियों को पहुँचाने की जिम्मेदारी, कर्तव्यनिष्ठा की भावना उसे कुएँ के पास से जाने नहीं दे रही थी। लेखक ने पूरे साहस व सूझ-बूझ के साथ कुएँ में नीचे उतरकर एकाग्रचित हो साँप की गतिविधियों को ध्यान में रखकर चिट्ठियाँ बाहर निकाल लीं। इस तरह हमें लेखक की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसके साहस, दृढ़ निश्चय, एकाग्रचित्ता व सूझ-बूझ की जानकारी भी मिलती है।


प्रश्न 8. लेखक ने भय, निराशा और उद्वेग के मन में आने तथा माँ की गोद याद आने का वर्णन किस प्रसंग में किया है
अथवा
लेखक की माँ ने घटना सुनकर लेखक को गोद में क्यों बिठा लिया? ‘स्मृति’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः लेखक जब अपने बड़े भाई द्वारा दी गई चिट्ठियों को मक्खनपुर के डाकखाने में डालने के लिए अपने छोटे भाई के साथ जा रहा था, तब रास्ते में कुएँ वाले साँप को ढेले मारकर उसकी फुँफकार सुनने का विचार पुनः उसके मन में आया। लेखक के इसी प्रयास के दौरान उसकी टोपी में रखी चिट्ठियाँ कुएँ में जा गिरीं। लेखक का उपर्युक्त कथन इसी घटना के संदर्भ में है क्योंकि कुएँ के बहुत अधिक गहरा होने, अपनी उम्र कम होने और सबसे ज्यादा कुएँ में पड़े विषैले साँप के डर से लेखक चिट्ठियों को निकालने का कोई उपाय नहीं समझ पा रहा था। चिट्ठियाँ न मिलने का परिणाम बड़े भाई द्वारा दिया जाने वाला दंड था।
इसलिए लेखक निराशा, भय और उद्वेग अर्थात् घबराहट के मनोभावों के बीच फँस गया था। स्वाभाविक रूप से बचपन में कोई कार्य गलत हो जाता है तो बच्चे अपने अपराध- निवारण या उससे संबंधित दंड से बचने हेतु माँ के लाड़-प्यार और उसकी गोद का आश्रय लेना स्वभावतः पसंद करते हैं। माँ की ममता बच्चों के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण की भाँति कार्य करती है इसी कारण लेखक ने ऐसा कहा है।


प्रश्न 9. ”दृढ़संकल्प से तो दुविधा की बेड़ियाँ कट जाती हैं।“ उपर्युक्त कथन से क्या आप सहमत हैं
उत्तरः जीवन में किसी भी सफलता का मूल मंत्र व्यक्ति की दृढ़ इच्छा-शक्ति, दृढ़ संकल्प होता है। जिसके मन में दृढ़संकल्प सबसे प्रबल और अधिक होता है, वही सफल होता है। दृढ़-संकल्प में अद्भुत शक्ति होती है। उससे प्रेरित व्यक्ति दृढ़ता व लगन के साथ आगे बढ़ता है। दृढ़ संकल्प पीछे लौटने के सभी रास्तों को बंद कर देता है और आगे की जो भी दुविधा हो, बाधाएँ हों, उनको रौंद डालता है। युद्ध में नैपोलियन की सफलता का सबसे बड़ा कारण निश्चित लक्ष्य (दृढ़ संकल्प) होना था। अपने दृढ़ संकल्प के कारण ही नैपोलियन ने अपने समय की स्थिति को थाम लिया था। कोई भी व्यक्ति जो दृढ़ संकल्प होकर, सारी शक्ति लगाकर, लगन के साथ कार्य करता है उसकी कठिनाइयाँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। अतः हम इस बात से सहमत हैं कि “दृढ़संकल्प से तो दुविधा की बेड़ियाँ कट जाती हैं।”


प्रश्न 10. ‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’-का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः मनुष्य किसी कठिन काम को करने के लिए अपनी बुद्धि से कई योजनाएँ तो बनाता है किंतु यह आवश्यक नहीं कि वे योजनाएँ सफल भी रहें। क्योंकि जब वास्तविक समस्याओं से सामना होता है तब हमें समझ में आता है कि हमारी योजनाएँ कितनी उचित हैं। तब हमें यथार्थ स्थिति के अनुसार अपनी योजनाओं में फेरबदल करना पड़ता है। हम जानते हैं कि कल्पना और वास्तविकता में बहुत अंतर होता है। हमें भूत की योजनाओं से सबक लेते हुए वर्तमान के साथ चलना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार ही योजनाएँ बनानी चाहिए अन्यथा वे मिथ्या और उलटी निकलती हैं।

01. गिल्लू – Short Questions answer

प्रश्न 1. सोन जुही में लगी पीली कली को देख लेखिका के मन में कौन से विचार उमड़ने लगे?
उत्तरः सोन जुही की पीली कली देखकर लेखिका को उस छोटे जीव (गिलहरी) की याद आई जो इस लता की घनी हरियाली में छिपा रहता था, और उसका नाम गिल्लू था।

प्रश्न 2. लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए गिल्लू क्या करता था?
उत्तरः गिल्लू लेखिका का ध्यान खींचने के लिए उनके पैरों के पास खेलता रहता। फिर वह तेजी से परदे पर चढ़ता और उसी तेजी से उतरता। वह तब तक भाग-दौड़ करता रहता जब तक लेखिका उसे पकड़ने के लिए नहीं उठ जाती।

प्रश्न 3. गिल्लू किन अर्थों में परिचारिका की भूमिका निभा रहा था?
उत्तरः जब लेखिका मोटर दुर्घटना में घायल होकर अस्वस्थ हो गई, तो गिल्लू उनके सिरहाने बैठ जाता और अपने नन्हे पंजों से उनके सिर और बालों को सहलाता। इस प्रकार वह परिचारिका की भूमिका में था।

प्रश्न 4. ‘प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया’-का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः इस कथन का अर्थ है कि सुबह होते ही गिल्लू की मृत्यु हो गई। ऐसा लगा मानो वह किसी अन्य जीवन में जागने के लिए चिर निद्रा में सो गया है। अगले जन्म में शायद वह किसी अन्य प्राणी के रूप में जन्म लेगा।

प्रश्न 5. सोनजुही की लता के नीचे बनी गिल्लू की समाधि से लेखिका के मन में किस विश्वास का जन्म होता है?
उत्तरः लेखिका को विश्वास है कि गिल्लू बसंत ऋतु के किसी दिन जुही के छोटे-से पीले फूल के रूप में जन्म लेकर उसके आँगन में वापस आएगा।

प्रश्न 6. लेखिका की अनुपस्थिति होने पर गिल्लू किस प्रकार अपना समय व्यतीत करता था?
उत्तरः लेखिका की अनुपस्थिति में गिल्लू प्रकृति के बीच अपना जीवन व्यतीत करता था। वह खिड़की से बनी जाली उठाकर बाहर चला जाता और दूसरी गिलहरियों के झुंड में शामिल हो जाता। वह झुंड का नेता बनता और हर डाल पर कूदता रहता। जब लेखिका लौटती, तो वह वापस कमरे में आ जाता।

प्रश्न 7. गिल्लू को क्या खाना प्रिय था? अगर वह उसे न मिलता तो वह क्या करता?
उत्तरः गिल्लू को काजू खाना बहुत प्रिय था। वह इसे अपने दाँतों से पकड़कर चबाता रहता। जब उसे काजू नहीं मिलता, तो वह अन्य खाने की चीजें लेना बंद कर देता या उन्हें झूले से नीचे फेंक देता।

प्रश्न 8. संस्मरण ‘गिल्लू’ से हमें मूक प्राणियों के प्रति कौन से जीवन-मूल्यों का ज्ञान होता है?
उत्तरः ‘गिल्लू’ संस्मरण के माध्यम से हमें यह जानने को मिलता है कि हमें पशु-पक्षियों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए। हमें उन्हें प्रेम और सुरक्षा देनी चाहिए और उनकी गतिविधियों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करना चाहिए ताकि उनका स्वाभाविक विकास हो सके। उन्हें स्वतंत्र रखकर हम उन्हें खुश रख सकते हैं।

प्रश्न 9. ”मेरे पास से बहुत से पशु-पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है।“ उपर्युक्त पंक्ति से आप क्या निष्कर्ष निकाल सकते  हैं?
उत्तरः इस पंक्ति के अनुसार, लेखिका पशु-पक्षी प्रेमी हैं। वह उनके प्रति सहृदय और संवेदनशील हैं। वह उन्हें स्वतंत्र रखते हैं। पशु-पक्षी भी संवेदनशील होते हैं और लेखिका के प्रेम का उत्तर वे लगाव दिखाकर देते हैं।

प्रश्न 10. ‘गिल्लू’ संस्मरण में लेखिका का पशु-पक्षियों के प्रति अटूट लगाव, वात्सल्य दर्शाया गया है।’ एक मानव होने के नाते, पशु-पक्षियों के प्रति हमारे क्या कर्त्तव्य हैं?
उत्तरः पशु-पक्षी भी समाज का हिस्सा हैं। उनसे हमें बहुत लाभ होता है। एक मानव होने के नाते हमारा कर्त्तव्य है कि हम उनके साथ हिंसा न करें, उन्हें हानि न पहुँचाएँ। उन्हें स्वतंत्र वातावरण में रहने दें, उनका स्वाभाविक विकास करने में मदद करें, और उन्हें संरक्षण दें।(प्रत्येक 3 अंक)

प्रश्न 1. ‘गिल्लू’ पाठ के आधार पर बताइए कि कौए को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी क्यों कहा गया है ?
उत्तरः कौए को समादरित और अनादरित प्राणी इसलिए कहा गया है क्योंकि यह एक विचित्र प्राणी है। कभी इसका आदर किया जाता है और कभी इसका अपमान। श्राद्ध पक्ष में लोग इसे आदर से बुलाते हैं और पितृपक्ष में हमारे पूर्वजों को आने के लिए कौआ बनना पड़ता है। यह अतिथि के आने की सूचना भी देता है, इसलिए यह समादरित है। लेकिन जब यह अपनी कर्कश आवाज में काँव-काँव करता है, तो यह अनादरित हो जाता है।

प्रश्न 2. ‘पितर पक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर अवतीर्ण होना पड़ता है।’ अपने विचार लिखिए।
उत्तरः हिन्दू धर्म की मान्यताओं व परम्पराओं के अनुसार क्वार के महीने में श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों व पितरों को भोजन खिलाने के प्रथा है। इस प्रथा के तहत ब्राह्मणों को भोजन खिलाया जाता है। परन्तु पहले कौओं को भोजन कराया जाता है, कौए के भोजन खाने से पितरों की आत्मा तृप्त मानी जाती है। इसलिए पितरों को कुछ पाने के लिए काक बनकर आना पड़ता है।

प्रश्न 3. ‘‘घायलों की सहायता के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है’’-गिल्लू के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि किसी घायल के प्र ति आपके व्यवहार में क्या विशेषता होगी। 
उत्तरः

  • गिल्लू के घायल होने पर लेखिका द्वारा सेवा
  • धैर्य से सेवा करने पर सुखद परिणाम 

व्याख्यात्मक हल:
लेखिका को गिल्लू निश्चेष्ट अवस्था में गमले की संधि में मिला था। उसके शरीर पर कौओं की चोंच के जख्म थे। लेखिका ने उसे उठाया और धैर्यपूर्वक उसके घावों को साफ किया और मरहम लगाया। उन्होंने रूई की बत्ती बनाकर उसे दूध भी पिलाने की कोशिश की, उन्होंने बडे़ धैर्य के साथ के साथ रात-दिन उसकी सेवा की। उनकी इसी धैर्यपूर्ण सेवा के कारण गिल्लू एकदम स्वस्थ हो गया।

प्रश्न 4. लेखिका महादेवी वर्मा गिल्लू को अत्यधिक स्नेह करने के बावजूद लिफाफे में बंद क्यों कर देती थी?
उत्तरः गिल्लू का महादेवी वर्मा से बहुत लगाव था वह लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की शरारते तब तक किया करता जब तक लेखिका उसे पकड़ने के लिए न उठती। इसलिए कभी-कभी लेखिका गिल्लू की शरारतों से परेशान हो उसे एक लम्बे लिफाफे में इस तरह रख देतीं कि सिर के अतिरिक्त उसका शेष शरीर लिफाफे के अंदर रहे। गिल्लू इसी स्थिति में मेज पर दीवार के सहारे घंटो खड़ा रहकर लेखिका के कार्यों को देखता। काजू या बिस्कुट देने पर उसी स्थिति में लिफाफे के बाहर वाले पंजो से पकड़कर उन्हे कुतर-कुतर कर खाता।

प्रश्न 5. गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झाॅंकते देखकर लेखिका ने इसे मुक्त करना आवश्यक क्यों माना? तीन कारणों सहित स्पष्ट कीजिए।
अथवा

गिल्लू को मुक्त कराने की आवश्यकता क्यों समझी गयी और उसके लिए लेखिका ने क्या उपाय किए
उत्तरः

  • गिल्लू की भावनाओं को समझने के कारण
  • बंधन से मुक्ति
  • जीवों के प्रति दया तथा उनकी इच्छा का सम्मान 

व्याख्यात्मक हल:
जब गिल्लू के जीवन का पहला बंसत आया तब बाहर की गिलहरियाॅं खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक की आवाज करके मानो कुछ कहने लगीं। गिल्लू भी जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झाँकता रहता। तब लेखिका को लगा कि इसे मुक्त करना आवश्यक है। इसलिए कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया। ऐसे लगा कि गिल्लू ने इससे बाहर जाकर जैसे मुक्ति की साॅंस ली।
लेखिका के हृदय में जीवों के प्रति दया का भाव था। वह उनकी इच्छाओं का सम्मान करती थी। वह पशु-पक्षियों को किसी बंधन या कैद में नहीं रखना चाहती थी। जब उन्हें महसूस हुआ कि गिल्लू बाहर जाना चाहता है तो उन्होंने उसे बाहर जाने के लिए स्वयं रास्ता दे दिया।

प्रश्न 6. अस्वस्थ लेखिका का ध्यान गिल्लू किस तरह रखता? इस कार्य से गिल्लू की कौन-सी विशेषता का पता चलता है?
उत्तरः लेखिका को एक मोटर दुर्घटना में आहत होकर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा था। लेखिका की अनुपस्थिति में गिल्ली का किसी काम में भी मन नहीं लगता था। यहाँ तक कि उसने अपना मनपसंद भोजन काजू खाना भी कम कर दिया था। वह हमेशा लेखिका का इंतजार करता रहता और किसी के भी आने की आहट सुनकर लेखिका के अस्पताल से लौट आने की उसकी उम्मीदें बढ़ जातीं। लेखिका के घर वापस आने के बाद गिल्ली तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हें-नन्हें पंजों से लेखिका का सिर एवं बाल धीरे-धीरे सहलाता रहता था। लेखिका को उसकी उपस्थिति एक परिचारिका की उपस्थिति महसूस होती। इन्हीं कारणों से लेखिका ने गिल्ली के लिए परिचारिका शब्द का प्रयोग किया है।

प्रश्न 7. गिल्लू लेखिका से बहुत प्रेम करता था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः गिल्लू वास्तव में एक अत्यधिक संवेदनशील प्राणी था और उसे महादेवी से गहरा लगाव था। पाठ के अंतर्गत इसके कई प्रमाण विद्यमान हैं
(i) जब भी लेखिका अपना कमरा खोलकर अंदर घुसती थीं, तो गिल्लू उनके शरीर पर ऊपर से नीचे झूलने लगता था, लेकिन यदि कोई अन्य व्यक्ति अंदर आता तो वह ऐसा नहीं करता था।
(ii) गर्मियों के दिनों में वह लेखिका के पास रहने के लालच में उनके पास रखी सुराही के साथ चिपका रहता था
(iii) गिल्लू ने लेखिका के अस्वस्थ रहने के दौरान एक परिचारिका की तरह उपचार में अपनी ओर से यथासंभव भूमिका निभाई।
(iv) लेखिका की अस्वस्थ स्थिति में अस्पताल में रहने के दौरान गिल्लू ने अपना मनपसंद भोजन काजू खाना कम कर दिया।
(v) अपने अंतिम समय में गिल्लू ने लेखिका की उंगली पकड़ ली।

प्रश्न 8. गिल्लू की किन चेष्टाओं से आभास मिलने लगा कि अब उसका समय समीप है? 
उत्तरः सामान्यतः गिलहरी का जीवनकाल दो वर्ष का माना जाता है। जब गिल्ली की जीवन यात्रा का अंत आया तो उसने दिनभर कुछ भी नहीं खाया और वह बाहर भी घूमने नहीं गया। वह अपने झूले से नीचे उतरा और लेखिका के बिस्तर पर आकर उसकी उंगली पकड़कर चिपक गया। इन सभी चेष्टाओं से लेखिका को लगा कि उसका (गिल्ली का) अंत समीप है और सुबह की पहली किरण के साथ ही वह हमेशा के लिए सो गया।

प्रश्न 9. गिलहरी के घायल बच्चे का उपचार किस प्रकार किया गया?
उत्तरः लेखिका गिलहरी का घायल बच्चा उठाकर अपने कमरे में ले आई। फिर गिलहरी का घायल बच्चा के घाव पर लगे खून को पहले रूई के फाहे से साफ किया। उसके बाद उसके घाव पर पेंसिलिन का मरहम लगाया। उसके बाद लेखिका ने रूई के फाहे से दूध पिलाने की असफल कोशिश की। लगभग ढाई घंटे के उपचार के बाद गिलहरी का घायल बच्चा के मुँह में पानी की कुछ बूँदें जा सकीं। तीन दिन बाद उसने आँखें खोलीं और धीरे-धीरे स्वस्थ हुआ।

प्रश्न 10. लेखिका महादेवी वर्मा द्वारा गिलहरी के घायल बच्चे को बचाना व उसका उपचार करना, उनकी कौन-सी भावनाओं को प्रदर्शित करता है? क्या हम इसे उचित मान सकते हैं?
उत्तरः लेखिका महादेवी वर्मा ने गिलहरी के घायल बच्चे का उपचार किया, उसकी देखभाल कर उसे जीवन-दान दिया। यह उनकी पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, सहृदयता तथा संरक्षण की भावना थी। पशु-पक्षियों को भी ईश्वर ने हमारी ही तरह इस संसार में उत्पन्न किया है। उन्हें भी प्राकर्तिक वातावरण में स्वच्छंद होकर विचरण करने का पूर्ण अधिकार है। कुछ लोगों ने पशु-पक्षियों का जीना दुश्वार कर रखा है। अगर उनको संरक्षण नहीं दिया जाएगा तो पृथ्वी पर उनकी संख्या घटती जाएगी। अतः महादेवी वर्मा द्वारा गिलहरी के बच्चे को दिया गया संरक्षण उचित है।

प्रश्न 11. क्या पशु-पक्षियों को पालतू बनाना, मानवता की भावना के विरुद्ध है? अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः पशु-पक्षी हमारी ही तरह के जीव होते हैं उनमें भी हमारी तरह ही भावनाएँ होती हैं। वे खुश भी होते हैं, दुःखी भी। कष्टों का अनुभव करते हैं और सुख का भी। अगर हम उनको पालतू बनाकर रखेंगे तो इसका अर्थ यह हुआ कि उन्हें हम एक तरह से बंधक बनाकर रख रहे हैं, उनकी प्राकर्तिक स्वतंत्रता छीन रहे है। क्योंकि परतंत्र रहना या अपने निजी जीवन में हस्तक्षेप किसी को पसंद नहीं होता। अतः हमें इन मूक प्रणियों की भावनाओं को समझना होगा। इन्हें प्रकृति प्रदत्त जो कार्य मिला है, उसे करने के लिए इन्हें स्वच्छंद छोड़ना चाहिए नहीं तो ये केवल एक शोभा की वस्तु बन जाते हैं, निष्क्रिय होकर। अतः इनको पालतू बनाना मानवता के विरुद्ध है। इनकी स्वच्छंदता तथा संतुलन बना रहे, इसके लिए इन्हें स्वंतत्र छोड़ देना ही उचित रहता है।

04. मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय – Long Question answer

प्रश्न 1: लेखक को किताबें इकट्ठी करने की सनक क्यों सवार हुई ?
उत्तर:
 लेखक को किताबें इकट्ठी करने की सनक के पीछे बचपन का एक अनुभव है। इलाहाबाद भारत के प्रख्यात शिक्षा-केंद्रों में एक रहा है। ईस्ट इंडिया द्वारा स्थापित पब्लिक लाइब्रेरी से लेकर महामना मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित भारती भवन तक विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी तथा अनेक कॉलेजों की लाइब्रेरियाँ तो हैं ही, लगभग हर मुहल्ले में एक अलग लाइब्रेरी वहाँ हाईकोर्ट है, अतः वकीलों की निजी लाइब्रेरियाँ भी हैं। अध्यापकों की निजी लाइब्रेरियाँ हैं। अपनी लाइब्रेरी वैसी कभी होगी, यह तो स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था, पर उसके मुहल्ले में एक लाइब्रेरी थी ‘हरि भवन’ स्कूल से छुट्टी मिली कि मैं उसमें जाकर जम जाता था। पिता दिवंगत हो चुके थे, लाइब्रेरी का चंदा चुकाने का पैसा नहीं था, अतः वहीं बैठकर किताबें निकलवाकर पढ़ता रहता था। उन दिनों हिंदी उपन्यासों के खूब अनुवाद हो रहे थे। उन अनूदित उपन्यासों को पढ़कर बड़ा सुख मिलता था। अपने छोटे से ‘हरि भवन’ में खूब उपन्यास थे। वहीं बकिमचंद्र चटोपाध्याय की ‘दुर्गेशनोंदिनी’, ‘कपाल कुंडला’ और ‘आनंदमठ’ से टॉलस्टॉय की ‘अन्ना करेनिना’, विक्टर ह्यूगो का ‘पेरिस का कुबड़ा ‘, हचबैक ऑफ नात्रोदायद्ध, गोर्की की ‘मदर’, अलेक्जेंडर कुप्रिन का ‘गाड़ीवालों का कटरा’, (यामा द पिटद्ध) और सबसे मनोरंजक सर्वा-रीश का ‘विचित्र वीर’ यानी डॉन क्विक्शोटद्ध हिंदी के ही माध्यम से सारी दुनिया के कथा-पात्रों से मुलाकात करना कितना आकर्षक था। लाइब्रेरी खुलते ही पहुँच जाता और जब शुक्ल जी लाइब्रेरियन कहते कि बच्चा, अब उठो, पुस्तकालय बंद करना है, तब बड़ी अनच्छिा से उठता। जिस दिन कोई उपन्यास अधूरा छूट जाता, उस दिन मन में कसक होती कि काश इतने पैसे होते कि सदस्य बनकर किताब इश्यू करा लाता या काश! इस किताब को खरीद पाता तो घर में रखता, एक बार पढ़ता, दो बार पढ़ता, बार-बार पढ़ता, पर जानता था कि यह सपना ही रहेगा, भला कैसे पूरा हो पाएगा।

प्रश्न 2: लेखक की प्रिय पुस्तक कौन-सी थी और क्यों?
उत्तर: 
लेखक की प्रिय पुस्तक श्री स्वामी दयानंद की एक जीवनी रोचक शैली में लिखी हुई, अनेक चित्रों से सुसज्जित। वे तत्कालीन पाखंडों के विरुद्ध अदम्य साहस दिखाने वाले अद्भुत व्यक्तित्व थे। उनके जीवन की कितनी ही रोमांचक घटनाएँ थीं, जो बहुत प्रभावित करती थीं। चूहे को भगवान का भोग खाते देखकर मान लेना कि प्रतिमाएँ भगवान नहीं होतीं, घर छोड़कर भाग जाना, तमाम तीर्थों, जंगलों, गुफाओं, हिमशिखरों पर साधुओं के बीच घूमना और हर जगह इसकी तलाश करना कि भगवान क्या है? सत्य क्या है? जो भी समाज-विरोधी, मनुष्य-विरोधी मूल्य हैं, रूढ़ियाँ हैं, उनका खंडन करना और अंत में अपने से हारे को क्षमा कर उसे सहारा देना। यह सब बालमन को बहुत रोमांचित करता।

प्रश्न 3: पुस्तकें इकट्ठी करना तथा उन्हें क्रमबद्ध रूप में अलमारी में सजाकर रखना मानव की आदत में है। अपने विवेक के आधार पर बताइए कि क्या पुस्तकों को इकट्ठा करना या उन्हें सजाकर रखना ही उनका सही प्रयोग है या उनके अंदर के ज्ञान को आत्मसात् करना उसका प्रयोग है?
उत्तर:
 हाँ, यह अक्सर देखा जाता है कि बहुत से लोग किताबे खरीदते हैं। उन्हें अलमारी में सजाकर रखते हैं किंतु पुस्तक के अंदर के ज्ञान को समझ नहीं पाते। वे ऐसे लोग होते हैं जो पुस्तकें इकट्ठी करने के तो शौकीन होते हैं किंतु उन्हें पढ़कर उनके ज्ञान को आत्मसात् नहीं करना चाहते। आज समाज के अधिकतर लोग दिखावे और प्रदर्शनी हेतु पुस्तकों का संचय करते हैं। पुस्तकें धूल चाटती रहती हैं किंतु उनके पास उन्हें पढ़ने का समय नहीं होता। वे उस ज्ञान से वंचित हो जाते हैं जिसे वे अपने साथ पुस्तक के रूप में घर तो ले आए किंतु उन्हें पढ़कर आत्मसात् नहीं कर पाए।
सच्चा ज्ञान पुस्तक के अंदर निहित उस शब्दावली में है जो मानव को कल्याणकारी बनाने का संदेश देती है, उसे सन्मार्ग पर आने के लिए प्रेरित करती है, उसकी इच्छा-शक्ति तथा आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करती है। अतः स्पष्ट है कि पुस्तकों को इकट्ठा करना इतना आवश्यक नहीं जितना आवश्यक पुस्तकों में निहित ज्ञान को आत्मसात् करना है।

प्रश्न 4: ‘मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय’ पाठ के आलोक में अपने विद्यालय के पुस्तकालय का वर्णन कीजिए।
उत्तर: 
हमारे विद्यालय का पुस्तकालय विद्यालय के प्रथम तल पर एक बहुत बड़े सभा भवन में स्थित है। इसमें विभिन्न विषयों की पुस्तकों और संदर्भ ग्रंथों से अलमारियाँ भरी हुई हैं। बीच में समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ आदि पढ़ने के लिए मेज़ – कुर्सियाँ लगी हुई हैं। प्रवेश-द्वार के पास पुस्तकालयाध्यक्ष अपने सहयोगियों के साथ बैठते हैं। यहाँ विभिन्न भाषाओं के समाचार-पत्र तथा अनेक विषयों से संबंधित पत्रिकाएँ आती हैं, जिनसे हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है तथा मनोरंजन भी होता है। हमें घर पर पढ़ने के लिए पंद्रह दिनों के लिए दो पुस्तकें भी मिलती हैं। हमें हमारे पुस्तकालय से ज्ञान – प्राप्ति में बहुत सहायता मिलती है।

प्रश्न 5: पुस्तकालय अपने आपमें ज्ञान का संचित कोष होता है। वहाँ अथाह पुस्तकों का भंडार होता है। अपने विवेक के आधार पर बताइए कि पुस्तकालय का मानव जीवन में क्या स्थान है?
उत्तर:
 पुस्तकालय आज जीवन का एक आवश्यक अंग बन गए हैं। इनमें अपार ज्ञान का कोष है। आज के आधुनिक तथा प्रतिस्पर्धा-युक्त वातावरण में इसका और भी अधिक महत्व है। व्यक्ति पुस्तकालय में जाकर उसमें रखी पुस्तकों का अध्ययन करता है। एक व्यक्ति इतनी अधिक मात्रा एवं संख्या में पुस्तकों को न खरीद सकता है और संजोकर रख सकता है। यह विद्यार्थियों तथा आम जन मानस के लिए शिक्षक, थियेटर, आदर्श तथा उत्प्रेरक है।
यह परामर्शदाता तथा उनका साथी भी है। सही अर्थों में पुस्तकालय जनता तथा विद्यार्थियों को विवेकशील तथा ज्ञानवान बनाने का काम करता है तथा कर रहा है। इनमें लेखकों के लेख, नेताओं के भाषण, व्यापार और मेलों की सूचनाएँ, स्त्रियों और बच्चों के उपयोग की अनेक पत्र-पत्रिकाएँ, नाटक, कहानी, उपन्यास हास्य व्यंग्यात्मक लेख आदि विशेष सामग्री रहती हैं। अतः इनके प्रयोग से व्यक्ति ज्ञानवान बनता है। यदि यह कहा जाए कि पुस्तकालय आज सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में बड़ा सहायक है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी।

प्रश्न 6: ‘मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय’ में लेखक फ़िल्म न देखकर पुस्तक क्यों खरीदता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लेखक को किताबें पढ़ने और इकट्ठा करने का बहुत शौक था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह किताबें खरीद नहीं पाता था। एक बार वह शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘देवदास’ उपन्यास पर आधारित फ़िल्म का गीत गुनगुना रहा था। लेखक की माँ ने उसे फ़िल्म देखने की स्वीकृति दे दी। लेखक सिनेमाघर में फ़िल्म देखने चला गया। पहला शो छूटने में समय बाकी था, इसलिए वह आस-पास टहलने लगा।
वहीं उसके एक परिचित की पुस्तकों की दुकान थी। उसने उसके काउंटर पर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित ‘देवदास’ उपन्यास पड़ा देखा। लेखक के पास दो रुपये थे। दुकानदार उसे उस पुस्तक को दस आने में देने के लिए तैयार हो गया। फ़िल्म देखने में डेढ़ रुपया लगता था। तब लेखक ने दस आने में ‘देवदास’ उपन्यास खरीदने का निर्णय लिया। यह उसके द्वारा अपने पैसों से खरीदी गई पहली पुस्तक थी। इस प्रकार वह पैसों की बचत कर लेता है और देवदास फ़िल्म जिस पुस्तक पर आधारित थी, वह भी उसे प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न 7: आपको कौन-सी पुस्तक अच्छी लगती अच्छी लगती है और क्यों ?
उत्तर: 
मेरी प्रिय पुस्तक तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस है क्योंकि उसमें केवल राम की कथा ही नहीं है बल्कि अनेक आदर्शों की स्थापना भी की गई है, जिनसे हमें अपना जीवन सँवारने की प्रेरणा मिलती है। हनुमान जैसा सेवक – धर्म, भरत लक्ष्मण का भाई के प्रति प्रेम, राम का मर्यादित स्वरूप, सुग्रीव – राम की मित्रता, शबरी के प्रति राम की भावनाएँ तथा राम-राज्य की परिकल्पना, रावण के वध द्वारा बुराई पर अच्छाई की विजय आदि सभी इन सब घटनाओं से जीवन को सद्आचरण से युक्त बनाने की प्रेरणा मिलती है तथा इनका अनुपालन करके देश और समाज को आदर्श बनाया जा सकता है।

03. कल्लू कुम्हार की उनाकोटी – Long Question answer

प्रश्न 1. प्रस्तुत पाठ में त्रिपुरा के विषय में दी गई जानकारी को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर: 
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने बताया है कि दिसंबर 1999 में ‘ ऑन द रोड’ शीर्षक से तीन खंडों वाली एक टी०वी० श्रृंखला बनाने के सिलसिले में वह त्रिपुरा की राजधानी अगरतला गया था। उसने बताया कि त्रिपुरा भारत के सबसे छोटे राज्यों में से एक है। इसकी जनसंख्या वृद्धि की दर चौंतीस प्रतिशत से भी अधिक है। यह तीन ओर से बाँग्लादेश और एक ओर से भारत के मिज़ोरम व असम राज्य से जुड़ा हुआ है। यहाँ बाँग्लादेश के लोगों का गैर-कानूनी ढंग से आना-जाना लगा रहता है। असम और पश्चिम बंगाल के लोग भी यहाँ खूब रहते हैं।
यहाँ बाहरी लोगों के लगातार आने से जनसंख्या का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ा हुआ है। यह त्रिपुरा में आदिवासी असंतोष का भी मुख्य कारण है। इसके साथ-साथ त्रिपुरा अनेक धर्मों के लोगों के यहाँ बस जाने के कारण बहुधार्मिक समाज का उदाहरण भी बना हुआ है। त्रिपुरा में महात्मा बुद्ध और भगवान शिव की अनेक मूर्तियाँ हैं। यहाँ के उनाकोटी क्षेत्र को तो शैव तीर्थ के रूप में जाना जाता है। यहाँ का पूरा इलाका देवी – देवताओं की मूर्तियों से भरा पड़ा है। उनाकोटी में भगवान शिव की एक करोड़ से एक कम मूर्तियाँ हैं।

प्रश्न 2: त्रिपुरा में आदिवासी असंतोष के पीछे क्या कारण है?
अथवा
किसी भी राज्य में बाहरी लोगों के आने से कुछ समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तो कुछ अच्छा भी होता है । – इस कथन के संदर्भ में त्रिपुरा की स्थिति स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: 
बांग्लादेश से लोगों की अवैध आवक यहाँ जबरदस्त है और इसे यहाँ सामाजिक स्वीकृति भी हासिल है। यहाँ की असाधारण जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण यही है । असम और पश्चिम बंगाल से भी लोगों का प्रवास यहाँ होता ही है। कुल मिलाकर बाहरी लोगों की भारी आवक ने जनसंख्या संतुलन को स्थानीय आदिवासियों के खिलाफ ला खड़ा किया है। यह त्रिपुरा में आदिवासी असंतोष की मुख्य वजह है । इसके बावजूद त्रिपुरा राज्य बहुधार्मिक समाज का उदाहरण बन गया है। यहाँ 19 अनुसूचित जनजातियाँ तथा विश्व के चारों बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व है।

प्रश्न 3: किस घटना के कारण लेखक त्रिपुरा के उनाकोटी क्षेत्र की यादों में खो गया ?
उत्तर:
 एक दिन प्रातःकाल आकाश काले बादलों से भर गया। चारों ओर अँधेरा छा गया था। उस दिन सुबह – सुबह आकाश बिल्कुल ठंडा और भूरा दिखाई दे रहा था। बादलों की तेज़ गर्जना और बीच-बीच में बिजली का कड़क कर चमकना प्रकृति के तांडव के समान दिखाई दे रहा था। तीन साल पहले ठीक ऐसा ही लेखक के साथ त्रिपुरा के उनाकोटी क्षेत्र में हुआ था। वहाँ भी अचानक घनघोर बादल घिर आए थे और गर्जन–तर्जन के साथ प्रकृति का तांडव शुरू हो गया था। तीन साल पहले और उस दिन के वातावरण में पूर्ण समानता होने के कारण ही लेखक त्रिपुरा के उनाकोटी क्षेत्र की यादों में खो गया।

02. स्मृति – Long Question answer

प्रश्न 1: लेखक और लेखक का छोटा भाई जब चिट्ठियाँ डालने जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते के लिए क्या प्रबंध किए?
उत्तर: 
लेखक और उसका छोटा भाई जब चिट्ठियाँ डालने जा रहे थे, वे दिन जाड़े के दिन तो थे। साथ ही साथ ठंडी हवा के कारण उन दोनों को कॅंप-कँपी भी लग रही थी। हवा इतनी ठंडी थी कि हड्डी के भीतर भरा मुलायम पदार्थ तक ठण्ड से ठिठुरने लगा था, इसलिए लेखक और लेखक के भाई ने ठण्ड से बचने के लिए अपने कानों को धोती से बाँधा। लेखक की माँ ने रास्ते में दोनों के खाने के लिए थोड़े से भुने हुए चने एक धोती में बाँध दिए थे। दोनों भाई अपना-अपना डंडा लेकर घर से निकल पड़े। उस समय उस बबूल के डंडे से उन लोगों को इतना प्यार था, जितना लेखक आज की उम्र में रायफल से भी नहीं करता था।

प्रश्न 2: कभी-कभी दृढ़ संकल्प के साथ तैयार की गई योजना भी प्रभावी नहीं हो पाती है। कुएँ से चिट्ठी निकालने के लिए लेखक द्वारा बनाई गई पूर्व-योजना क्यों सफल नहीं हुई? ‘स्मृति’ पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: चिट्ठियाँ कुएँ में गिर जाने पर लेखक बहुत भारी मुसीबत में फँस गया। पिटने का डर और जिम्मेदारी का अहसास उसे चिट्ठियाँ निकालने के लिए विवश कर रहा था। लेखक ने धोतियों में गाँठ बाँध कर रस्सी बनाकर कुएँ में उतरने की योजना बना ली। लेखक को स्वयं पर भरोसा था कि वह नीचे जाते ही डंडे से दबाकर साँप को मार देगा और चिट्ठियाँ लेकर ऊपर आ जाएगा क्योंकि वह पहले भी कई साँप मार चुका था।
उसे अपनी योजना में कमी नहीं दिखाई दे रही थी, परन्तु लेखक द्वारा बनाई गई यह पूर्व योजना सफल नहीं हुई, क्योंकि योजना की सफलता परिस्थिति पर निर्भर करती है। कुएँ में स्थान की कमी थी और साँप भी व्याकुलता से उसको काटने के लिए तत्पर था। ऐसे में डंडे का प्रयोग करना संभव नहीं था।

प्रश्न 3: “अपनी शक्ति के अनुसार योजना बनाने वाला ही सफल होता है”–स्मृति पाठ के अनुसार इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर: लेखक ने कुएँ में चिट्ठियाँ गिर जाने के बाद बहुत ही बुद्धिमानी, चतुरता एवं साहस का परिचय दिया। कठिन परिस्थिति में भी उसने हिम्मत नहीं हारी। कुएँ में जहरीला साँप होने के बावजूद वह साहसपूर्ण युक्ति से अपने पास मौजूद सभी धोतियों को आपस में बाँध आता है, ताकि वे नीचे तक चली जाएँ।
सर्प के डसे जाने से बचने के लिए उसने पहले कुएँ की बगल की मिट्टी गिराई। फिर डंडे से चिट्ठियों को सरकाया। डंडा छूट जाने पर उसने साँप का ध्यान दूसरी ओर बँटाया, फिर डंडे को उठा लिया। साँप का आसन बदला तो उसने चिट्ठियाँ भी उठा लीं और उन्हें धोतियों में बाँध दिया। इस प्रकार लेखक ने अपनी बुद्धि का पूरा सदुपयोग करके तथा युक्तियों का सहारा लेकर कुएँ में गिरी हुई चिट्ठियों को निकाला। यह उसकी साहसिकता का स्पष्ट परिचय देता है।

प्रश्न 4: जब लेखक ने कुएँ के धरातल की ओर ध्यान से देखा तो लेखक क्यों हैरान हो गया?
उत्तर: 
जब लेखक ने कुएँ के धरातल की ओर ध्यान से देखा तो लेखक ने जो देखा उसे देखकर वह हैरान हो गया क्योंकि कुँए के धरातल पर साँप अपना फन फैलाए धरातल से एक हाथ ऊपर उठा हुआ लहरा रहा था। साँप की पूँछ और पूँछ के समीप का भाग ही पृथ्वी पर था, बाकी का आधा आगे का भाग हवा में ऊपर उठा हुआ था और वह साँप लेखक के निचे आने की ही प्रतीक्षा कर रहा था। धोती के नीचे डंडा बँधा था, जो लेखक के उतरने की गति से इधर-उधर हिल रहा था।
शायद उसी के कारण लेखक को उतरते देख साँप घातक चोट करने के आसन पर बैठा था अर्थात फन फैलाए लेखक को डँसने के लिए तैयार बैठा था। सँपेरा जैसे बीन बजाकर काले साँप को खिलाता है और साँप क्रोधित हो कर अपना फन फैलाकर खड़ा होता है और फुँकार मारकर चोट करता है, ठीक उसी तरह यह कुँए का साँप भी तैयार बैठा था। उसका शत्रु लेखक उससे कुछ हाथ ऊपर धोती पकड़े लटक रहा था।

प्रश्न 5: दोनों भाइयों ने मिलकर कुएँ में नीचे उतरने की क्या युक्ति अपनाई? स्मृति पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: 
कुएँ में चिट्ठियाँ गिर जाने पर दोनों भाई सहम गए और डरकर रोने लगे। छोटा भाई जोर-जोर से और लेखक आँख डबडबा कर रो रहा था। तभी उन्हें एक युक्ति सूझी। उनके पास एक धोती में चने बँधे थे, दो धोतियाँ उन्होंने कानों पर बाँध रखी थीं और दो धोतियाँ वह पहने हुए थे। उन्होंने पाँचों धोतियाँ मिलाकर कसकर गाँठ बाँध कर रस्सी बनाई। धोती के एक सिरे पर डंडा बाँधा, तो दूसरा सिरा चरस के डेंग पर कसकर बाँध दिया और उसके चारों ओर चक्कर लगाकर एक और गाँठ लगाकर छोटे भाई को पकड़ा दिया। लेखक धोती के सहारे कुएँ के बीचों-बीच उतरने लगा। छोटा भाई रो रहा था पर लेखक ने उसे विश्वास दिलाया कि वह साँप को मारकर चिट्ठियाँ ले आएगा। नीचे साँप फन फैलाए बैठा था। लेखक ने बुद्धिमतापूर्वक साँप से लड़ने या मारने की बात त्याग कर डंडे से चिट्ठियाँ सरका ली और साँप को चकमा देने में कामयाब हो गया।

प्रश्न 6: लेखक कुएँ से चिट्ठी निकालने का काम टाल सकता था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। ‘स्मृति’ कहानी से उसके चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं?
उत्तर: 
लेखक के द्वारा कुएँ से चिट्ठी निकालने का काम टल सकता था। लेकिन बड़े भाई की डाँट के डर से उसने ऐसा नहीं किया। इसके साथ ही लेखक बहुत ईमानदार भी था वह अपने भाई से झूठ बोलना अथवा बहाना लगाना नहीं चाहता था। चिट्ठियों को पहुँचाने की जिम्मेदारी, कर्तव्यनिष्ठा की भावना उसे कुएँ के पास से जाने नहीं दे रही थी ।
लेखक ने पूरे साहस व सूझ-बूझ के साथ कुएँ में नीचे उतरकर एकाग्रचित हो साँप की गतिविधियों को ध्यान में रखकर चिट्ठियाँ बाहर निकाल लीं। इस तरह हमें लेखक की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसके साहस, दृढ़ निश्चय, एकाग्रचित्ता व सूझ-बूझ की जानकारी भी मिलती है।

प्रश्न 7: ‘स्मृति’ कहानी बाल मनोविज्ञान को किस प्रकार प्रकट करती है? बच्चों के स्वभाव उनके विचारों के विषय में हमें इससे क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर:
 बाल मस्तिष्क हर समय सूझ-बूझ से कार्य करने में सक्षम नहीं होता। बच्चे शरारतों का ध्यान आते ही अपने चंचल मन को रोक नहीं पाते। खतरे उठाने, जोखिम लेने, साहस का प्रदर्शन करने में उन्हें आनन्द आता है वे अपनी जान को खतरे में डालने से भी नहीं चूकते। लेकिन बच्चों का हृदय बहुत कोमल होता है। बच्चे मार व डाँट से बहुत डरते हैं।
जिस तरह लेखक बड़े भाई की डाँट व मार के डर से तथा चिट्ठियों को समय पर पहुँचाने की जिम्मेदारी की भावना के कारण जहरीले साँप तक से भिड़ गयी। बच्चे अधिकतर ईमानदार होते हैं वे बड़ों की भाँति न होकर छल व कपट से दूर होते हैं। मुसीबत के समय बच्चों को सबसे अधिक अपनी माँ की याद आती है। माँ के आँचल में वे स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं।

प्रश्न 8: जब लेखक और उसका छोटा भाई उस कुएँ की ओर से निकले, जिसमें साँप गिरा हुआ था, तब उनके साथ कौन सी घटना घटी जिससे लेखक पर बिजली-सी गिर पड़ी?
उत्तर:
 जब लेखक और उसका छोटा भाई उस कुएँ की ओर से निकले, जिसमें साँप गिरा हुआ था तब लेखक के मन में कुएँ में पत्थर फेंककर साँप की फुसकार सुनने की उसकी इच्छा जाग गई। लेखक कुएँ  पत्थर डालने के लिए कुँए की ओर बढ़ा। छोटा भाई भी लेखक के पीछे इस तरह चल पड़ा जैसे बड़े हिरन के बच्चे के पीछे छोटा हिरन का बच्चा चल पड़ता है।
लेखक ने कुएँ के किनारे से एक पत्थर उठाया और उछलकर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर पत्थर गिरा दिया, परन्तु लेखक पर तो बिजली-सी गिर पड़ी क्योंकि उस समय जो घटना घटी उस घटना के कारण लेखक को यह भी याद नहीं कि साँप ने फुसकार मारी या नहीं, पत्थर साँप को लगा या नहीं। यह घटना थी टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिठियाँ चक्कर काटती हुई कुएँ में गिर जाने की।

प्रश्न 9: लेखक ने भय, निराशा और उद्वेग के मन में आने तथा माँ की गोद याद आने का वर्णन किस प्रसंग में किया है? ‘स्मृति’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लेखक अपने वर्णन में बताता है कि बच्चों की टोली स्कूल के रास्ते में पड़ने वाले सूखे कुएँ में पड़े एक साँप को ढेले मारकर उसकी फुसकार सुनने की अभ्यस्त हो गई थी। वास्तव में लेखक जब अपने बड़े भाई द्वारा दी गई चिट्ठियों को मक्खनपुर के डाकखाने में डालने के लिए अपने छोटे भाई के साथ जा रहा था, तब रास्ते में कुएँ वाले साँप को ढेले मारकर उसकी हुँफकार सुनने का विचार पुनः उसके मन में आया। लेखक के इसी प्रयास के दौरान उसकी टोपी में रखी चिट्ठियाँ कुएँ में जा गिरी।
लेखक का उपर्युक्त कथन इसी घटना के संदर्भ में है क्योंकि कुएँ के बहुत अधिक गहरा होने, अपनी उम्र कम होने और सबसे ज्यादा कुएँ में पड़े विषैले साँप के डर से वह चिट्ठियों को निकालने का कोई उपाय नहीं समझ पा रहा था। चिट्ठियाँ न मिलने का परिणाम बड़े भाई द्वारा दिया जाने वाला दंड था। इसलिए लेखक निराशा, भय और उद्वेग अर्थात् घबराहट के मनोभावों के बीच फंस गया था। स्वाभाविक रूप से बचपन में कोई कार्य गलत हो जाता है तो बच्चे अपने अपराध- निवारण या उससे संबंधित दंड से बचने हेतु माँ के लाड़-प्यार और उसकी गोद का आश्रय लेना स्वभावतः पसंद करते हैं। माँ की ममता बच्चों के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण की भाँति कार्य करती है इसी कारण लेखक ने ऐसा कहा है।

प्रश्न 10: जब लेखक ने साँप को साक्षात् देखा तो उसने साँप को मारने की अपनी योजना और आशा को असंभव क्यों
उत्तर: 
जब लेखक ने साँप को साक्षात् देखा तो उसने साँप को मारने की अपनी योजना और आशा को असंभव पाया। क्योंकि कुँए के निचे साँप को मारने के लिए डंडा चलाने के लिए पूरी जगह ही नहीं थी। और लाठी या डंडा चलाने के लिए काफी जगह चाहिए होती है जिसमें वे घुमाए जा सकें। एक तरीका और था कि साँप को डंडे से दबाया जा सकता था, पर ऐसा करना मानो तोप के मुहाने पर खड़ा होना था। यदि फन या उसके समीप का भाग न दबा, तो फिर वह साँप पलटकर जरूर काटता, और अगर हिम्मत करके लेखक फन के पास दबा भी देता तो फिर उसके पास पड़ी हुई दो चिठियों को वह कैसे उठाता? दो चिठियाँ साँप के पास उससे सटी हुई पड़ी थीं और एक लेखक की ओर थी। लेखक तो चिठियाँ लेने ही कुँए में उतरा था। लेखक और साँप दोनों ही अपनी-अपनी स्थितियों पर डटे हुए थे।

01. गिल्लू – Long Question answer

प्रश्न 1: लेखिका ने लघु जीव की जान किस तरह बचाई?
उत्तर: 
उस गिलहरी के बच्चे की खराब हालत देख कर सबने कहा, कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद यह नहीं बच सकता, इसलिए इसे ऐसे ही रहने दिया जाए। परंतु लेखिका का मन नहीं माना लेखिका ने उसे धीरे से उठाया और अपने कमरे में ले गई, फिर रुई से उसका खून साफ़ किया और उसके जख्मों पर पेंसिलिन नामक दवा का मरहम लगाया।
फिर लेखिका ने रुई की पतली बत्ती बनाई और उसे दूध से भिगोकर जैसे-जैसे उसके छोटे से मुँह में दूध पिलाने के लिए लगाई तो लेखिका ने देखा कि वह मुँह नहीं खुल पा रहा था और दूध की बूँदें मुँह के दोनों ओर ढुलक कर गिर गईं। कई घंटे तक इलाज करने के बाद उसके  मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और निश्चिन्त हो गया कि वह लेखिका की उँगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर और अपनी नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इधर-उधर देखने लगा। लेखिका ने उसका अच्छे से ध्यान रखा जिसके परिणाम स्वरूप तीन-चार महीनों में उसके चिकने रोएँ, झब्बेदार पूँछ और चंचल चमकीली आँखें सबको हैरान करने लगी थी। अर्थात वह बहुत आकर्षक बन गया था।

प्रश्न 2: लेखिका महादेवी वर्मा गिल्लू को अत्यधिक स्नेह करने के बावजूद लिफाफे में बंद क्यों कर देती थी?
उत्तर: जब वह लिखने बैठती थी तब अपनी ओर लेखिका का ध्यान आकर्षित करने की गिल्लू की इतनी तेज इच्छा होती थी कि उसने एक बहुत ही अच्छा उपाय खोज निकाला था। वह लेखिका के पैर तक आता था और तेज़ी से परदे पर चढ़ जाता था और फिर उसी तेज़ी से उतर जाता था। उसका यह इस तरह परदे पर चढ़ना और उतरने का क्रम तब तक चलता रहता था जब तक लेखिका उसे पकड़ने के लिए नहीं उठती थी। लेखिका गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लिफ़ाफ़े में इस तरह से रख देती थी कि उसके अगले दो पंजों और सिर के अलावा उसका छोटा सा पूरा शरीर लिफ़ाफ़े के अंदर बंद रहता था। इस तरह बंद रहने के कारण वह फिर से उछाल-कूद करके लेखिका को परेशान नहीं कर पाता था। इस अनोखी स्थिति में भी कभी-कभी घंटों मेज पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर गिल्लू अपनी चमकीली आँखों से लेखिका को देखता रहता था कि लेखिका क्या-क्या काम कर रही है। जब गिल्लू को उस लिफ़ाफ़े में बंद पड़े-पड़े भूख लगने लगती तो वह चिक-चिक की आवाज करके मानो लेखिका को सूचना दे रहा होता कि उसे भूख लग गई है और लेखिका के द्वारा उसे काजू या बिस्कुट मिल जाने पर वह उसी स्थिति में लिफ़ाफ़े से बाहर वाले पंजों से काजू या बिस्कुट पकड़कर उसे कुतरता।

प्रश्न 3: ‘पितर पक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर अवतीर्ण होना पड़ता है।’ अपने विचार लिखिए।
उत्तर: हिन्दू धर्म की मान्यताओं व परम्पराओं के अनुसार अश्विन के महीने में श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों व पितरों को भोजन खिलाने के प्रथा है। इस प्रथा के तहत ब्राह्मणों को भोजन खिलाया जाता है। परन्तु पहले कौओं को भोजन कराया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति मर कर सबसे पहले कौए का जन्म लेता है और ऐसी मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है।
इसी कारण श्राद्ध पक्ष में कौओं का विशेष महत्त्व है और प्रत्येक श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है। इसी कारण लेखिका ने भी प्रस्तुत पाठ में कहा है कि ‘हमारे पितरों को हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर अवतीर्ण होना पड़ता है।

प्रश्न 4: लेखिका को गिल्लू की किन चेष्टाओं से आभास मिलने लगा कि अब उसका समय समीप है?
उत्तर: सामान्यतः गिलहरी का जीवनकाल दो वर्ष का माना जाता है। जब गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत आया तो उसने दिन भर न कुछ खाया न बाहर गया। रात में अपने जीवन के अंतिम क्षण में भी वह अपने झूले से उतरकर लेखिका के बिस्तर पर आया और अपने ठंडे पंजों से लेखिका की वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया,
जिसे उसने अपने बचपन में पकड़ा था जब वह मृत्यु के समीप पहुँच गया था। गिल्लू के पंजे इतने ठंडे हो रहे थे कि लेखिका ने जागकर हीटर जलाया और उसके पंजों को गर्मी देने का प्रयास किया। परंतु सुबह की पहली किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया। अर्थात उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 5: ‘गिल्लू’ पाठ के आधार पर बताइए कि कौए को एक साथ समादरित और अनादरित प्राणी क्यों कहा गया है?
उत्तर: कौए को समादरित और अनादरित प्राणी इसलिए कहा गया है, क्योंकि यह एक विचित्र प्राणी है। विचित्र इसलिए क्योंकि एक साथ ही दो तरह का व्यवहार सहता है, कभी तो इसे बहुत आदर मिलता है और कभी बहुत ज्यादा अपमान सहन करना पड़ता है। जैसे हमारे बेचारे पुरखे न गरुड़ के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के, न हंस के। श्राद्ध पक्ष में लोग कौए को आदर सहित बुलाते हैं।
पितरों को पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए कौवा बनकर ही प्रकट होना पड़ता है। इतना ही नहीं हमारे दूर रहने वाले रिश्तेदारों को भी अपने आने का सुखद संदेश इनके कानों को न भाने वाली आवाज में ही देना पड़ता है। वही जहाँ एक ओर कौवे को इतना आदर मिलता है वहीं दूसरी ओर हम कौवा और काँव-काँव करने को अपशगुन के अर्थ में भी प्रयोग करते हैं। और कौवे को अपने आँगन से भगा कर उसका अपमान भी करते है एवं यह गंदगी भी ख़ाता है, जिस कारण लोग इसे भगा देते हैं यही वजह है कि यह अनादरित भी हो जाता है।

प्रश्न 6: गिल्लू को मुक्त कराने की आवश्यकता क्यों समझी गयी और उसके लिए लेखिका ने क्या उपाय किए।
उत्तर: जब गिल्लू के जीवन का पहला बंसत आया तब बाहर की गिलहरियाँ खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक की आवाज़ करके मानो कुछ कहने लगीं। उन्हें ऐसा करता देख गिल्लू भी जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झाँकता रहता था। गिल्लू को खिड़की से बाहर देखते हुए देखकर उसने खिड़की पर लगी जाली की कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस रास्ते से गिल्लू जब बाहर गया तो उसे देखकर ऐसा लगा जैसे बाहर जाने पर सचमुच ही उसने आजादी की साँस ली हो।
पाठ के इस भाग से लेखिका के हृदय में जीवों के प्रति दया की भावना का भी ज्ञान होता है। वह उनकी इच्छाओं का सम्मान करती थी। वह पशु-पक्षियों को किसी बंधन या कैद में नहीं रखना चाहती थी। जब उन्हें महसूस हुआ कि गिल्लू भी अन्य गिलहरियों की तरह बाहर जाना चाहता है तो उन्होंने उसे बाहर जाने के लिए स्वयं रास्ता दे दिया।

प्रश्न 7: अस्वस्थ लेखिका का ध्यान गिल्लू किस तरह रखता है? इस कार्य से गिल्लू की कौन सी विशेषता का पता चलता है?
उत्तर: लेखिका को एक मोटर दुर्घटना में आहत होकर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा था। लेखिका की अनुपस्थिति में गिल्लू का किसी काम में भी मन नहीं लगता था। यहाँ तक कि उसने अपना मनपसंद भोजन काजू खाना भी कम कर दिया था। वह हमेशा लेखिका का इंतजार करता रहता और किसी के भी आने की आहट सुनकर लेखिका के अस्पताल से लौट आने की उसकी उम्मीदें बढ़ जाती थी।
लेखिका के घर वापस आने के बाद गिल्लू तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हें-नन्हें पंजों से लेखिका का सिर एवं बाल धीरे-धीरे सहलाता रहता था। लेखिका को उसकी उपस्थिति किसी परिचारिका की उपस्थिति की तरह महसूस होती थी, क्योंकि उसने लेखिका का ध्यान किसी सेविका की ही तरह रखा था। इन्हीं कारणों से लेखिका ने गिल्लू के लिए परिचारिका शब्द का प्रयोग किया है।