12. संस्कृति – पाठ का सार

लेखक परिचय

भदंत आनंद कौसल्यायन

इनका जन्म सन 1905 में पंजाब के अम्बाला जिले के सोहाना गाँव में हुआ। इनके बचपन का नाम हरनाम दास था। इन्होने लाहौर के नेशनल कॉलिज से बी.ए. किया। ये बौद्ध भिक्षु थे और इन्होने देश-विदेश की काफी यात्राएँ की तथा बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। वे गांधीजी के साथ लम्बे अरसे तक वर्धा में रहे। सन 1988 में इनका निधन हो गया। 

प्रमुख कार्य

पुस्तक: भिक्षु के पत्र, जो भूल ना सका, आह! ऐसी दरिद्रता, बहानेबाजी, यदि बाबा ना होते, रेल का टिकट, कहाँ क्या देखा।

पाठ का संक्षिप्त परिचय
प्रस्तुत पाठ बौद्ध भिक्षु भदतं आनदं कौसल्यायन द्वारा लिखित ‘संस्कृति’ नामक शीषर्क से अवतरित है। इसमें लेखक ने ‘सभयता’ और ‘सस्ं कृति’ शब्दों की व्यावहारिकता का उल्लेख करते हएु इसे अनेक उद्धरणों द्वारा समझाने का प्रयास किया है। लेखक ने इसके लिए काफी सरल, सुबोध एवं प्रभावोत्पादक भाषा का प्रयोग किया है। लैखक द्वारा लिखा या यह लेख उर्पयुक्त दोनों शब्दों की व्यापकता को रेखाकिंत करता ह।

पाठ का सार
लेखक ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ शब्दों को समझाने के क्रम में बता रहा है कि ये दोनों ऐसे शब्द हैं, जो सर्वाध्कि प्रयोग तो किए जाते हैं किंतु समझे कम जाते हैं। इनके साथ कुछेक विशेषण लगा देने से इन्हें समझना और भी कठिन हो जाता है। कभी-कभी दोनों को एक समझ लिया जाता है तो कभी अलग। आखिर वे दोनों एक हैं अथवा अलग। लेखक अपने ढंग से समझाने का प्रयास करता है। सर्वप्रथम वह आग के आविष्कर्ता की बात कहकर व्यक्ति विशेष की योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा को व्यक्ति विशेष की संस्कृति कहता है, जिसके बल पर आविष्कार किया गया। इसी प्रकार से वह सुई-धागे का भी उदाहरण देता है।

लेखक ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ के अंतर को समझाते हुए सुई-धगे और आग के आविष्कार से जुड़ी प्रारंभिक प्रयत्नशीलता और बाद में हुई उन्नति के उदाहरण देता है। लोहे के टुकड़े को घिसकर छेद बना और धगा पिरोकर दो अलग-अलग टुकड़ों को सिलकर जोड़ने की सोच ही संस्कृति है। इन खोजों को आधर बनाकर आगे जो इन क्षेत्रों में विकास हुआ, वह सभ्यता कहलाता है। एक सुसंस्कृत व्यक्ति की पहचान उसकी योग्यता, प्रवृत्ति और प्रेरणा के रूप से होती है। अपनी बुद्धि अथवा  विवेक के आधर पर नए निश्चित तथ्य को खोज आगामी पीढ़ी को सौंपने वाला संस्कृत होता है, जबकि उसी तथ्य को आधर बनाकर आगे बढ़ने वाला सभ्यता का विकास करने वाला होता है। न्यूटन अपने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धंत के आगे कुछ न जान सका, परंतु फिर भी संस्कृत कहलाया, जबकि इस सिद्धंत से अन्य ऐसे तथ्यों को जिन्हें न्यूटन नहीं जानता था, जोड़ने वाले लोग सभ्यता में आते हैं।

लेखक के अनुसार भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु खोजे सुई-धगे और आग के आविष्कार करते तथ्य संस्कृत होने या बनने के आधर नहीं बनते, बल्कि मनुष्य में सदा बसने वाली सहज चेतना भी इसकी उत्पत्ति या बनने का कारण बनती है। इस सहज चेतना का प्रेरक अंश हमें अपने मनीषियों से भी मिला है। मुँह के कौर का दूसरे के मुँह में डाला जाना और रोगी बच्चे को रात-रात भर गोदी में लेकर माता का बैठे रहना, इसी चेतना से प्रेरित होता है। ढाई हशार वर्ष पूर्व बुद्ध का मनुष्य को तृष्णा से मुक्ति के लिए उपायों को खोजने में गृह त्यागकर कठोर तपस्या करना, कार्ल माक्र्स का मज़दूरों के सुखद जीवन के सपने देखने के लिए अपने जीवन को दुःखपूर्ण बिता देना और लेनिन का मुश्किल से मिले डबल रोटी के टुकड़ों को दूसरों को खिला देना इस चेतना से प्रेरित हो संस्कृत बनने के उदाहरण हैं।

लेखक के अनुसार खाने-पीने, पहनने-आढे़ने के तरीके, आवागमन के साधन, यहाँ तक कि परस्पर मर-कटने के तरीके भी संस्कृति का ही परिणाम सभ्यता के उदाहरण हैं। मानव हित में काम न करने वाली संस्कृति असंस्कृति है। इसे संस्कृति नहीं कहा जा सकता। इसके उदाहरण हमारे परस्पर मर कटने के तरीके, आत्मविनाश के बढ़ते साधन हैं। यह निश्चित ही असभ्यता को जन्म देती है।

मानव हित में निरंतर परिवर्तनशीलता का ही नाम संस्कृति है। संस्कृति बुद्धि और विवेक से बना एक ऐसा नया तथ्य है, जिसकी कभी दल बाँधकर रक्षा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। संस्कृति का कल्याणकारी अंश अकल्याणकारी की तुलना में सदा श्रेष्ठ और स्थायी है। इसी अर्थ में यह अविभाजित अर्थात अखंड भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. आध्यात्मिक – परमात्मा या आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला
  2. साक्षात – आँखों के सामने
  3. अनायास – आसानी से
  4. तृष्णा – लोभ
  5. परिष्कृत – सजाया हुआ
  6. कदाचित – कभी
  7. निठल्ला – बेकार
  8. मिनिषियों – विद्वानों
  9. शीतोष्ण – ठंडा और गरम
  10. वशीभूत –  वश में होना
  11. अवश्यंभावी – अवश्य होने वाला
  12. पेट की ज्वाला – भूख
  13. स्थूल – मोटा
  14. तथ्य – सत्य
  15. पुरस्कर्ता – पुरस्कार देने वाला
  16. ज्ञानेप्सा – ज्ञान प्राप्त करने की लालसा
  17. सर्वस्व – स्वयं को सब कुछ
  18. गमना गमन – आना-जाना
  19. प्रज्ञा – बुद्धि
  20. दलबंदी – दल की बंदी
  21. अविभाज्य – जो बाँटा ना जा सके

11. नौबतखाने में इबादत – पाठ का सार

पाठ का संक्षिप्त परिचय

प्रस्तुत पाठ श्री यतींद्र मिश्र द्वारा लिखित ‘नौबतखाने में इबादत’ शीर्षक से उद्धत है। इसमें लेखक ने विश्व प्रसिद्ध् शहनाई वादक भारत रत्न से विभूषित स्व. श्री बिस्मिल्लाह खाँ की बाल्यावस्था से लेकर उनकी उपलब्ध्यिों तक का बड़ा ही मार्मिक एवं साहित्यिक चित्राण प्रस्तुत किया है। यत्रा-तत्रा प्रसंगवश भारत के अनेक लोकवाद्यों का भी वर्णन है। लेखक ने बड़ी ईमानदारी से लेखक केस्वभाव, रुचियों एवं उनके उदार मन को उकेरा है, जो लेखक की विद्वत्ता में चार चाँद लगा देता है।

पाठ का सार

अम्मीरुद्दीन उर्फ़ बिस्मिल्लाह खाँ का जन्म बिहार में डुमराँव के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ। इनके बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था जो उम्र में उनसे तीन वर्ष बड़े थे। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम पैग़म्बरबख़्श खाँ तथा माँ मिट्ठन थीं। पांच-छह वर्ष होने पर वे डुमराँव छोड़कर अपने ननिहाल काशी आ गए। वहां उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबक्श तथा नाना रहते थे जो की जाने माने शहनाईवादक थे।  वे लोग बाला जी के मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाकर अपनी दिनचर्या का आरम्भ करते थे। वे विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने का काम करते थे।

ननिहाल में 14 साल की उम्र से ही बिस्मिल्लाह खाँ ने बाला जी के मंदिर में रियाज़ करना शुरू कर दिया। उन्होंने वहां जाने का ऐसा रास्ता चुना जहाँ उन्हें रसूलन और बतूलन बाई की गीत सुनाई देती जिससे उन्हें ख़ुशी मिलती। अपने साक्षात्कारों में भी इन्होनें स्वीकार किया की बचपन में इनलोगों ने इनका संगीत के प्रति प्रेम पैदा करने में भूमिका निभायी। भले ही वैदिक इतिहास में शहनाई का जिक्र ना मिलता हो परन्तु मंगल कार्यों में इसका उपयोग प्रतिष्ठित करता है अर्थात यह मंगल ध्वनि का सम्पूरक है। बिस्मिल्लाह खाँ ने अस्सी वर्ष के हो जाने के वाबजूद हमेशा पाँचो वक्त वाली नमाज में शहनाई के सच्चे सुर को पाने की प्रार्थना में बिताया। मुहर्रम के दसों दिन बिस्मिल्लाह खाँ अपने पूरे खानदान के साथ ना तो शहनाई बजाते थे और ना ही किसी कार्यक्रम में भाग लेते। आठवीं तारीख को वे शहनाई बजाते और दालमंडी से फातमान की आठ किलोमीटर की दुरी तक भींगी आँखों से नोहा बजाकर निकलते हुए सबकी आँखों को भिंगो देते।

फुरसत के समय वे उस्ताद और अब्बाजान को काम याद कर अपनी पसंद की सुलोचना गीताबाली जैसी अभिनेत्रियों की देखी फिल्मों को याद करते थे। वे अपनी बचपन की घटनाओं को याद करते की कैसे वे छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनाता तथा बाद में उनकी ‘मीठी शहनाई’ को ढूंढने के लिए एक-एक कर शहनाई को फेंकते और कभी मामा की शहनाई पर पत्थर पटककर दाद देते। बचपन के समय वे फिल्मों के बड़े शौक़ीन थे, उस समय थर्ड क्लास का टिकट छः पैसे का मिलता था जिसे पूरा करने के लिए वो दो पैसे मामा से, दो पैसे मौसी से और दो पैसे नाना से लेते थे फिर बाद में घंटों लाइन में लगकर टिकट खरीदते थे। बाद में वे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री सुलोचना की फिल्मों को देखने के लिए वे बालाजी मंदिर पर शहनाई बजाकर कमाई करते। वे सुलोचना की कोई फिल्म ना छोड़ते तथा कुलसुम की देसी घी वाली दूकान पर कचौड़ी खाना ना भूलते।

काशी के संगीत आयोजन में वे अवश्य भाग लेते। यह आयोजन कई वर्षों से संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर हो रहा था जिसमे शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन-वादन की सभा होती है। बिस्मिल्लाह खाँ जब काशी के बाहर भी रहते तब भी वो विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की तरफ मुँह करके बैठते और अपनी शहनाई भी उस तरफ घुमा दिया करते। गंगा, काशी और शहनाई उनका जीवन थे। काशी का स्थान सदा से ही विशिष्ट रहा है, यह संस्कृति की पाठशाला है। बिस्मिल्लाह खाँ के शहनाई के धुनों की दुनिया दीवानी हो जाती थी।

सन 2000 के बाद पक्का महाल से मलाई-बर्फ वालों के जाने से, देसी घी तथा कचौड़ी-जलेबी में पहले जैसा स्वाद ना होने के कारण उन्हें इनकी कमी खलती। वे नए गायकों और वादकों में घटती आस्था और रियाज़ों का महत्व के प्रति चिंतित थे। बिस्मिल्लाह खाँ हमेशा से दो कौमों की एकता और भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देते रहे। नब्बे वर्ष की उम्र में 21 अगस्त 2006 को उन्हने दुनिया से विदा ली । वे भारतरत्न, अनेकों विश्वविद्यालय की मानद उपाधियाँ व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा पद्मविभूषण जैसे पुरस्कारों से जाने नहीं जाएँगे बल्कि अपने अजेय संगीतयात्रा के नायक के रूप में पहचाने जाएँगे।

लेखक परिचय

यतीन्द्र मिश्र
इनका जन्म 1977 में अयोध्या, उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी में एम.ए  किया। ये आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अर्धवार्षिक सहित पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। सन 1999 में साहित्य और कलाओं के संवर्ध्दन और अनुशलीन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन भी कर रहे हैं।

प्रमुख कार्य
काव्य संग्रह – यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप।
पुस्तक – गिरिजा
पुरस्कार – भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, ऋतुराज पुरस्कार आदि।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. अज़ादारी – दुःख मनाना
  2. ड्योढ़ी – दहलीज
  3. सजदा – माथा टेकना
  4. नौबतखाना – प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान
  5. रियाज़- अभ्यास
  6. मार्फ़त – द्वारा
  7. श्रृंगी – सींग का बना वाद्ययंत्र
  8. मुरछंग – एक प्रकार का लोक वाद्ययंत्र
  9. नेमत – ईश्वर की देन, सुख, धन, दौलत
  10. इबादत – उपासना
  11. उहापोह – उलझन
  12. तिलिस्म – जादू
  13. बदस्तूर – तरीके से
  14. गमक – महक
  15. दाद – शाबाशी
  16. अदब – कायदा
  17. अलहमदुलिल्लाह – तमाम तारीफ़ ईश्वर के लिए
  18. जिजीविषा – जीने की इच्छा
  19. शिरकत – शामिल
  20. रोजनामचा – दिनचर्या
  21. पोली – खाली
  22. बंदिश – धुन
  23. परिवेश – माहौल
  24. साहबज़ादे – बेटे
  25. मुराद – इच्छा
  26. निषेध – मनाही
  27. ग़मज़दा – दुःख से पूर्ण
  28. माहौल – वातावरण
  29. बालसुलभ – बच्चों जैसी
  30. पुश्तों – पीढ़ियों
  31. कलाधर – कला को धारण करने वाला
  32. विशालाक्षी – बड़ी आँखों वाली
  33. बेताले – बिना ताल के
  34. तहमद – लुंगी
  35. परवरदिगार – ईश्वर
  36. दादरा – एक प्रकार का चलता गाना।

10. एक कहानी यह भी – पाठ का सार

पाठ का संक्षिप्त परिचय

यह पाठ आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है, किंतु आत्मकथा नहीं है। इसमें लेखिका ने अपने पारिवारिक वातावरण के उन पहलुओं को चित्रित किया है, जिनका प्रभाव उनके व्यक्तित्व निर्माण पर पड़ा है। अपनी सहज अभिव्यक्ति में आपने अपने माता-पिता का बेबाकी से वर्णन करके अपनी ईमानदारी का परिचय दिया है। कहानी का प्रारंभ अजमेर (राजस्थान) के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के अपने मकान के वर्णन से किया है, जो आपकी ईमानदारी की झलक प्रस्तुत करता है।

पाठ का सार

आरंभ में लेखिका के पिता इंदौर में रहते थे। वे संपन्न और प्रतिष्ठित होने के साथ कोमल और संवेदनशील भी थे। शिक्षा और समाजसेवा की उनकी विशेष रुचि को आठ-दस विद्यार्थियों के सदा उनके घर रहकर पढ़ने से समझा जा सकता था। एक बार किसी करीबी व्यक्ति के धेखा दिए जाने पर वे आर्थिक मुसीबत में पँफसकर अजमेर आ गए। एक अंग्रेज़ी-हिंदी कोश पूरा करने पर भी जब धन नहीं मिला, तो उनकी सकारात्मकता घटती चली गई और वे सदा के लिए बेहद क्रोधी, शक्की, जिद्दी और अहंवादी हो गए।

लेखिका का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था, परंतु उसकी यादें अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के एक दो-मंजिला मकान में पिता की बिगड़ी मनःस्थिति के साथ शुरू हुईं। पिता जी उपर की मंजिल पर बिखरी काॅपी-किताबों में उलझे रहते थे और वह अपनी माँ और पाँच भाई-बहनों के साथ नीचे रहती थी। नवाबी आदतों के आदी पिता त्यागमयी पत्नी और ममतामयी अनपढ़ माँ पर जब-तब बरसते और सभी पर शक करते रहते। परिस्थितियों को किस्मत समझने वाली माँ को लेखिका कभी अपना आदर्श नहीं बना सकीं। लेखिका की बड़ी बहन की शादी लेखिका की छोटी उम्र में होने के कारण उसकी धुँधली-सी याद ही थी। बचपन में घर के पड़ोस की संस्कृति ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने अपनी आरंभिक कहानियाँ उन्हीं पर लिखीं। वर्तमान शहरी जीवन में पड़ोस की कमी उसे दुखी और चिंतित बनाती है। पिता के द्वारा उससे बड़ी बहन सुशीला के गोरेपन और सुंदरता की प्रशंसा से जगे हीनबोध् ने उसमें विशेष बनने की लगन उत्पन्न की, परंतु लेखकीय उपलब्ध्यिों के मिलने पर भी वह उससे उबर न सकी। सुशीला के विवाह और भाइयों के पढ़ने के लिए बाहर जाने पर पिता ने उसे रसोई में समय खराब न कर देश-दुनिया का हाल जानने को पे्ररित किया। घर में राजनीतिक पार्टियों की बहसों को सुनकर उसमें देशभक्ति की भावना जगी।

सन 1945 में सावित्राी गल्र्स  कालेजॅ के प्रथम वर्ष में हिंदी प्रधयापिका शीला अग्रवाल ने लेखिका में न केवल हिंदी साहित्य के प्रति रुचि जगाई, बल्कि साहित्य के सच को जीवन में उतारने के लिए भी प्रेरित किया। सन 1946-47 के दिनों में लेखिका ने घर से बाहर निकलकर देशसेवा में सक्रिय भूमिका निभाई। हड़तालों, जुलूसों व भाषणों में भाग लेने से छात्राएँ भी प्रभावित होकर काॅलेजों का बहिष्कार करने लगीं। प्रिंसिपल ने काॅलेज से निकाले जाने का नोटिस देने से पहले पिता को बुलाकर शिकायत की, तो वे क्रोधित होने के बदले लेखिका की नेतृत्वशक्ति देख गद्गद हो गए। एक बार जब पिता ने अजमेर के व्यस्त चैराहे पर बेटी के साथियों के बीच अकेले धाराप्रवाह क्रांतिकारी भाषण की खबर मित्र से सुनी तो पिता को लेखिका, घर की मर्यादा लाँघती लगी। दूसरे मित्र से उसी भाषण की प्रशंसा सुनकर वे गद्गद भी हो उठे। बेटी में वे अपने देखे सपनों को पूरा होते देखने लगे। लेखिका को भी इसका अहसास था कि उसमें पिता के अनेक गुण-अवगुण स्वाभाविक रूप से आ गए हैं। फिर भी पिता के स्वभाव की विशेषता-विशिष्ट बनने की चाह और सामाजिक छवि को न बिगड़ने देने के अंतविर्रोध को वह पूर्णतः न समझ पाई। देश की आजादी की खुशी से वह फूली नहीं समाई।

लेखक परिचय

मन्नू भंडारी
इनका जन्म सन 1931 में गाँव भानपुरा, जिला मंदसौर, मध्य प्रदेश में हुआ था। इनकी इंटर तक की शिक्षा  शहर में हुई। बाद में इन्होने हिंदी से एम.ए किया। दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन कार्य से अवकाश प्राप्ति के बाद आजकल दिल्ली में ही रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं।

प्रमुख कार्य
कहानी संग्रह – एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, यही सच है, त्रिशंकु
उपन्यास – आपका बन्टी, महाभोज।
पुरस्कार – हिंदी अकादमी का शिखर सम्मान, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान इत्यादि।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. अहंवादी – अहंकारी
  2. आक्रांत – संकटग्रस्त
  3. भग्नावशेष – खंडहर
  4. वर्चस्व – दबदबा
  5. विस्फारित – फैलाकर
  6. महाभोज – मन्नू भंडारी का चर्चित उपन्यास
  7. निहायत – बिल्कुल
  8. विवशता – मज़बूरी
  9. आसन्न अतीत – थोड़ा पहले ही बिता भूतकाल
  10. यशलिप्सा – सम्मान की चाह
  11. अचेतन – बेहोश
  12. शक्की – वहमी
  13. बेपढ़ी – अनपढ़
  14. ओहदा – पद
  15. हाशिया – किनारा
  16. यातना – कष्ट
  17. लेखकीय – लेखन से सम्बंधित
  18. गुंथी – पिरोई
  19. भन्ना-भन्ना – बार बार क्रोधित होना
  20. प्रवाह – गति
  21. प्राप्य – प्राप्त
  22. दायरा – सीमा
  23. वजूद – अस्तित्व
  24. जमावड़े – बैठकें
  25. शगल – शौक
  26. अहमियत – महत्व
  27. बाकायदा – विधिवत
  28. दकियानूसी – पिछड़े
  29. अंतर्विरोध – द्वंदव
  30. रोब – दबदबा
  31. भभकना – अत्यधिक क्रोधित होना
  32. धुरी – अक्ष
  33. छवि – सुंदरता
  34. चिर – सदा
  35. प्रबल – बलवती
  36. लू उतारना – चुगली करना
  37. थू-थू – शर्मसार होना
  38. मत मारी जाना – अक्ल काम ना करना
  39. गुबार निकालना – मन की भड़ास निकालना
  40. चपेट में आना – चंगुल में आना
  41. आँख मूंदना – मृत्यु को प्राप्त होना
  42. जड़ें जमाना – अपना प्रभाव जमाना
  43. भट्टी में झोंकना – अस्तित्व मिटा देना
  44. अंतरंग – आत्मिक
  45. आह्वान – पुकार

9. लखनवी अंदाज़ – पाठ का सार

लेखक परिचय

यशपाल
इनका जन्म सन 1903 में पंजाब के फिरोजपुर छावनी में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा काँगड़ा में ग्रहण करने के बाद लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. किया। वहाँ इनका परिचय भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा से जुड़ाव के कारण ये जेल भी गए। इनकी मृत्यु सन 1976 में हुई।

प्रमुख कार्य
कहानी संग्रह: ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजरे की उड़ान, वा दुलिया, फूलों का कुर्ता।
उपन्यास: झूठा सच, अमिता, दिव्या, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड, मेरी तेरी उसकी बात।

पाठ का संक्षिप्त परिचय

वैसे तो यशपाल जी ने ‘ लखनवी अंदाश ‘ , जो की एक व्यंग्य है , यह साबित करने के लिए लिखा था कि बिना किसी कथ्य के कहानी नहीं लिखी जा सकती परंतु फिर भी एक स्वतंत्र रचना के रूप में इस रचना को पढ़ा जा सकता है। यशपाल जी उस पतन की ओर जाने वाला सामंती वर्ग पर तंज़ करते हैं जो असलियत से अनजान एक बनावटी जीवन शैली का आदी है। इस बात को नकारा नहीं सकता कि आज के समय में भी ऐसे दूसरों पर निर्भर रहने वाली संस्कृति को देखा जा सकता है।

पाठ का सार

लेखक अपने सफ़र की शुरुआत का हिस्सा बताते हुए कहते हैं कि लोकल ट्रेन के चलने का समय हो गया था इसलिए ऐसा लग रहा था जैसे वह लोकल ट्रेन चल पड़ने की हड़बड़ी या बेचैनी में फूंक मार रही हो। आराम से अगर लोकल ट्रेन के सेकंड क्लास में जाना हो तो उसके लिए कीमत भी अधिक लगती है। लेखक को बहुत दूर तो जाना नहीं था। लेकिन लेखक ने टिकट सेकंड क्लास का ही ले लिया ताकि वे अपनी नयी कहानी के संबंध में सोच सके और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य का नज़ारा भी ले सकें , इसलिए भीड़ से बचकर , शोरगुल से रहित ऐसा स्थान जहाँ कोई न हो , लेखक ने चुना। लेखक जिस लोकल ट्रेन से जाना चाहता था , किसी कारण थोड़ी देरी होने के कारण लेखक से वह गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर , लेखक ज़रा दौड़कर उसमें चढ़ गए। लेखक ने अंदाज़ा लगाया था कि लोकल ट्रेन का वह सेकंड क्लास का छोटा डिब्बा खाली होगा परन्तु लेखक के अंदाज़े के विपरीत वह डिब्बा खाली नहीं था। 

उस डिब्बे के एक बर्थ पर लखनऊ के नवाबी परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक सज्जन व्यक्ति बहुत सुविधा से पालथी मार कर बैठे हुए थे। उन सज्जन ने अपने सामने दो ताज़े – चिकने खीरे तौलिए पर रखे हुए थे। लेखक के उस डिब्बे में अचानक से कूद जाने के कारण उन सज्जन के ध्यान में बाधा या अड़चन पड़ गई थी , जिस कारण उन सज्जन की नाराज़गी साफ़ दिखाई दे रही थी। लेखक उन सज्जन की नाराज़गी को देख कर सोचने लगे कि , हो सकता है , वे सज्जन भी किसी कहानी के लिए कुछ सोच रहे हों या ऐसा भी हो सकता है कि लेखक ने उन सज्जन को खीरे – जैसी तुच्छ वस्तु का शौक करते देख लिया था और इसी हिचकिचाहट के कारण वे नाराज़गी में हों। उन नवाब साहब ने लेखक के साथ सफ़र करने के लिए किसी भी प्रकार की कोई ख़ुशी जाहिर नहीं की। लेखक भी बिना नवाब की ओर देखते हुए उनके सामने की सीट पर जा कर बैठ गए। लेखक की पुरानी आदत है कि जब भी वे खाली बैठे होते हैं अर्थात कोई काम नहीं कर रहे होते हैं , तब वे हमेशा ही कुछ न कुछ सोचते रहते हैं और अभी भी वे उस सेकंड क्लास की बर्थ पर उस नवाब के सामने खाली ही बैठे थे , तो वे उस नवाब साहब के बारे में सोचने लगे। 

लेखक उस नवाब साहब के बारे में अंदाजा लगाने लगे कि उन नवाब साहब को किस तरह की परेशानी और हिचकिचाहट हो रही होगी। लेखक सोचने लगे कि हो सकता है कि , नवाब साहब ने बिलकुल अकेले यात्रा करने के अंदाजे से और  बचत करने के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया होगा और अब उनको यह सहन नहीं हो रहा होगा कि शहर का कोई सफेद कपड़े पहने हुए व्यक्ति उन्हें इस तरह बीच वाले दर्जे में सफर करता देखे , कहने का तात्पर्य यह है कि नवाब लोग हमेशा प्रथम दर्ज़े में ही सफर करते थे और उन नवाब साहब को लेखक ने दूसरे दर्ज़े में सफ़र करते देख लिया था तो लेखक के अनुसार हो सकता है कि इस कारण उनको हिचकिचाहट हो रही हो। या फिर हो सकता है कि अकेले सफर में वक्त काटने के लिए ही उन नवाब साहब ने खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफेद कपड़े पहने हुए व्यक्ति अर्थात लेखक के सामने खीरा कैसे खाएँ , यह सोच कर ही शायद उन्हें परेशानी हो रही हो ? लेखक बताते हैं कि वे नवाब साहब के सामने वाली बर्थ पर आँखें झुकाए तो बैठे थे किन्तु वे आँखों के कोनों से अर्थात तिरछी नजरों से छुप कर नवाब साहब की ओर देख रहे थे। 

नवाब साहब कुछ देर तक तो गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर वर्तमान स्थिति पर गौर करते रहे थे , अचानक से ही नवाब साहब ने लेखक को पूछा कि क्या लेखक भी खीरे खाना पसंद करेंगे ? इस तरह अचानक से नवाब साहब के व्यवहार में हुआ परिवर्तन लेखक को कुछ अच्छा नहीं लगा। नवाब साहब के खीरे के शौक को लेखक ने देख लिया था और खीरा एक साधारण वस्तु माना जाता है , जिस कारण नावाब साहब हिचकिचाने लगे थे और लेखक को लग रहा था कि इसी हिचकिचाहट को छुपाने के लिए और साधारण वस्तु का शौक रखने के कारण वे लेखक से खीरा खाने के बारे में पूछ रहे हैं। लेखक ने भी नवाब साहब को शुक्रिया कहते हुए और सम्मान में किबला शब्द से सम्मानित करते हुए जवाब दिया कि वे ही अपना खीरे को खाने का शौक पूरा करें। लेखक का जवाब सुन कर नवाब साहब ने फिर एक पल खिड़की से बाहर देखकर स्थिति पर गौर किया और दृढ़ निश्चय से खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़ा और अपने सामने बिछा लिया। फिर अपनी सीट के नीचे रखा हुआ लोटा उठाया और दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिए से पोंछ कर सूखा लिया। फिर अपनी जेब से एक चाकू निकाला। दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें चाकू से गोदकर उनका झाग निकाला , जिस तरह से हम भी खीरे खाने से पहले काटते हैं। यह सब करने के बाद फिर खीरों को बहुत सावधानी से छीलकर लंबाई में टुकड़े करते हुए बड़े तरीक़े से तौलिए पर सजाते गए। लेखक हम सभी पाठकों को लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले लोगों के खीरे के इस्तेमाल का तरीका बताते हुए कहते हैं कि हम सभी लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले लोगों के खीरे के इस्तेमाल का तरीका तो जानते ही हैं। 

वे अपने ग्राहक के लिए जीरा – मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च को कागज़ आदि में विशेष प्रकार से लपेट कर ग्राहक के सामने प्रस्तुत कर देते हैं। नवाब साहब ने भी उसी तरह से बहुत ही तरीके से खीरे के लम्बे – लम्बे टुकड़ों पर जीरा – मिला नमक और लाल मिर्च की लाली बिखेर दी। लेखक बताते हैं कि नवाब साहब की हर एक क्रिया – प्रक्रिया और उनके जबड़ों की कंपन से यह स्पष्ट था कि उन खीरों को काटने और उस पर जीरा – मिला नमक और लाल मिर्च की लाली बिखेरने की सारी प्रक्रिया में उनका मुख खीरे के रस का स्वाद लेना की कल्पना मात्र से ही जल से भर गया था। जिस तरह जब हम अपनी पसंदीदा खाने की किसी चीज़ को देखते हैं तो हमारे मुँह में पानी आ जाता है उसी तरह नवाब साहब के मुँह में भी खीरों को खाने के लिए तैयार करते समय पानी भर आया था। लेखक आँखों के कोनों से अर्थात तिरछी नज़रों से नवाब साहब को यह सब करते हुए देखकर सोच रहे थे , नवाब साहब ने सेकंड क्लास का टिकट ही इस ख़याल से लिया होगा ताकि कोई उनको खीरा खाते न देख लें लेकिन अब लेखक के ही सामने इस तरह खीरे को खाने के लिए तैयार करते समय अपना स्वभाविक व्यवहार कर रहे हैं। अपना काम कर लेने के बाद नवाब साहब ने फिर एक बार लेखक की ओर देख लिया और फिर उनसे एक बार खीरा खाने के लिए पूछ लिया , और साथ – ही – साथ उन खीरों की खासियत बताते हुए कहते हैं कि वे खीरे लखनऊ के सबसे प्रिय खीरें हैं। 

लेखक बताते हैं कि नमक – मिर्च छिड़क दिए जाने से उन ताज़े खीरे की पानी से भरे लम्बे – लम्बे टुकड़ों को देख कर उनके मुँह में पानी ज़रूर आ रहा था , लेकिन लेखक पहले ही इनकार कर चुके थे , जिस कारण लेखक ने अपना आत्मसम्मान बचाना ही उचित समझा , और उन्होंने नवाब साहब को शुक्रिया देते हुए उत्तर दिया कि इस वक्त उन्हें खीरे खाने की इच्छा महसूस नहीं हो रही है , और साथ ही साथ लेखक ने अपनी पाचन शक्ति कमज़ोर होने का बहाना बनाते हुए नवाब साहब को ही खीरे खाने को कहा। लेखक का जबाव पाते ही नवाब साहब ने लालसा भरी आँखों से नमक – मिर्च के संयोग से चमकती खीरे के लम्बे – लम्बे टुकड़ों की ओर देखा। फिर खिड़की के बाहर देखकर एक लम्बी साँस ली। लेखक बताते हैं कि नवाब साहब ने खीरे के एक टुकड़े को उठाया और अपने होंठों तक ले गए , फिर उस टुकड़े को सूँघा , नवाब साहब केवल खीरे को सूँघ कर उसके स्वाद का अंदाजा लगा रहे थे। खीरे के स्वाद के अंदाज़े से नवाब साहब के मुँह में भर आए पानी का घूँट उनके गले से निचे उतर गया। यह सब करने के बाद नवाब साहब ने खीरे के टुकड़े को बिना खाए ही खिड़की से बाहर छोड़ दिया। 

नवाब साहब ने खीरे के सभी टुकड़ों को खिड़की के बाहर फेंककर तौलिए से अपने हाथ और होंठ पोंछ लिए और बड़े ही गर्व से आँखों में खुशी लिए लेखक की ओर देख लिया , ऐसा लग रहा था मानो वे लेखक से कह रहे हों कि यह है खानदानी रईसों का तरीका। नवाब साहब ने जो खीरे की तैयारी और इस्तेमाल किया था उससे वे थक गए थे और थककर अपनी बर्थ में लेट गए। लेखक सोच रहे थे कि जिस तरह नवाब साहब ने खीरे का इस्तेमाल किया उससे केवल खीरे के स्वाद और खुशबू का अंदाजा ही लगाया जा सकता है , उससे पेट की भूख शांत नहीं हो सकती। परन्तु नवाब साहब की ओर से ऊँचे डकार का शब्द ऐसे सुनाई दिया , जैसे उनका पेट भर गया हो। और नवाब साहब ने लेखक की ओर देखकर कहा कि खीरा होता तो बहुत स्वादिष्ट है लेकिन जल्दी पचने वाला नहीं होता , और साथ – ही – साथ बेचारे बदनसीब पेट पर बोझ डाल देता है।  नवाब साहब की ऐसी बातें सुन कर लेखक कहते हैं कि उनके ज्ञान – चक्षु खुल गए अर्थात लेखक को जो बात समझ नहीं आ रही थी अब समझ में आ रही थी ! नवाब साहब की बात सुन कर लेखक ने मन ही मन कहा कि ये हैं नयी कहानी के लेखक ! क्योंकि लेखक के अनुसार अगर खीरे की सुगंध और स्वाद का केवल अंदाज़ा लगा कर ही पेट भर जाने का डकार आ सकता है तो बिना विचार , बिना किसी घटना और पात्रों के , लेखक के केवल इच्छा करने से ही ‘ नयी कहानी ’ क्यों नहीं बन सकती?

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. मुफ़स्सिल – केंद्र में स्थित नगर के इर्द-गिर्द स्थान
  2. उतावली – जल्दबाजी
  3. प्रतिकूल – विपरीत
  4. सफ़ेदपोश – भद्र व्यक्ति
  5. अपदार्थ वस्तु – तुच्छ वस्तु
  6. गवारा ना होना – मन के अनुकूल ना होना
  7. लथेड़ लेना – लपेट लेना
  8. एहतियात – सावधानी
  9. करीने से – ढंग से
  10. सुर्खी – लाली
  11. भाव-भंगिमा – मन के विचार को प्रकट करने वाली शारीरिक क्रिया
  12. स्फुरन – फड़कना
  13. प्लावित होना – पानी भर जाना
  14. पनियाती – रसीली
  15. तलब – इच्छा
  16. मेदा – पेट
  17. सतृष्ण – इच्छा सहित
  18. तसलीम – सम्मान में
  19. सिर ख़म करना – सिर झुकाना
  20. तहजीब – शिष्टता
  21. नफासत – स्वच्छता
  22. नफीस – बढ़िया
  23. एब्सट्रैक्ट – सूक्ष्म
  24. सकील – आसानी से ना पचने वाला
  25. नामुराद – बेकार चीज़
  26. ज्ञान चक्षु – ज्ञान रूपी नेत्र

8. बालगोबिन भगत – पाठ का सार

लेखक परिचय

रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन् 1899 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ था। उनके माता-पिता का निधन बचपन में ही हो गया था, जिससे उनका बचपन बहुत कठिनाइयों और संघर्षों में बीता। वे पढ़ाई में होशियार थे और 15 साल की उम्र से ही उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और कई बार जेल भी गए। वे एक अच्छे लेखक और पत्रकार थे। उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन किया और कहानियाँ, नाटक, यात्रा-वृत्तांत और संस्मरण जैसे कई रूपों में लिखा। उनकी भाषा की शैली इतनी प्रभावशाली थी कि लोग उन्हें “कलम का जादूगर” कहते थे। उनका निधन सन् 1968 में हुआ।

रामवृक्ष बेनीपुरी

मुख्य बिंदु

  • सरल जीवन: बालगोबिन भगत बहुत सादा जीवन जीते थे। वे कबीर के भक्त थे और हमेशा सच्चाई, ईमानदारी और सादगी से रहते थे।
  • कर्मठ गृहस्थ: वे साधु जैसे थे लेकिन गृहस्थ जीवन में रहते थे – खेती करते थे, परिवार पालते थे, फिर भी उनका मन सदा भक्ति में लगा रहता था।
  • संगीत प्रेमी: उन्हें कबीर के भजन गाने का बहुत शौक था। उनका गाना सुनकर लोग भाव-विभोर हो जाते थे। गाँव का माहौल उनके गीतों से जगमग रहता था।
  • धैर्यवान और दृढ़: बेटे की मौत के समय भी वे संयमित रहे और भजन गाते रहे। उन्होंने बहू को भी माया-मोह से ऊपर उठने की प्रेरणा दी।
  • सच्चे संत: उन्होंने कभी भी धर्म का दिखावा नहीं किया, बल्कि भक्ति को जीवन में उतारा। उनकी मृत्यु भी उसी तरह शांत और भक्ति में लीन होकर हुई।
  • प्रेरणादायक जीवन: बालगोबिन भगत का जीवन सच्ची भक्ति, सेवा, ईमानदारी और आत्मबल का उदाहरण है।

पाठ का सार

बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे। उनकी उम्र साठ वर्ष से ऊपर थी और बाल पक गए थे। वे लंबी दाढ़ी नहीं रखते थे और कपड़े बिल्कुल कम पहनते थे। कमर में लंगोटी पहनते और सिर पर कबीरपंथियों की सी कनफटी टोपी। सर्दियों में ऊपर से कंबल ओढ़ लेते। वे गृहस्थ होते हुए भी सही मायनों में साधु थे। माथे पर रामानंदी चंदन का टीका और गले में तुलसी की जड़ों की बेडौल माला पहने रहते। उनका एक बेटा और पतोहू थी। वे कबीर को साहब मानते थे। किसी दूसरे की चीज़ नहीं छूते और न बिना वजह झगड़ा करते। उनके पास खेती-बाड़ी थी तथा साफ-सुथरा मकान था। खेत से जो भी उपज होती, उसे पहले सिर पर लादकर कबीरपंथी मठ ले जाते और प्रसाद स्वरूप जो भी मिलता, उसी से गुज़र-बसर करते।

वे कबीर के पद का बहुत मधुर गायन करते। आषाढ़ के दिनों में जब समूचा गाँव खेतों में काम कर रहा होता तब बालगोबिन पूरा शरीर कीचड़ में लपेटे खेत में रोपनी करते हुए अपने मधुर गानों को गाते। भादो की अंधियारी में उनकी खँजरी बजती थी, जब सारा संसार सोया होता तब उनका संगीत जागता था। कार्तिक मास में उनकी प्रभातियाँ शुरू हो जातीं। वे अहले सुबह नदी-स्नान को जाते और लौटकर पोखर के ऊँचे भिंडे पर अपनी खँजरी लेकर बैठ जाते और अपना गाना शुरू कर देते। गर्मियों में अपने घर के आँगन में आसन जमा बैठते। उनकी संगीत साधना का चरमोत्कर्ष तब देखा गया जिस दिन उनका इकलौता बेटा मरा। 

बड़े शौक से उन्होंने अपने बेटे की शादी करवाई थी, बहू भी बड़ी सुशील थी। उन्होंने मरे हुए बेटे को आँगन में चटाई पर लिटाकर एक सफेद कपड़े से ढक रखा था तथा उस पर कुछ फूल बिखेरे थे। सामने बालगोबिन ज़मीन पर आसन जमाए गीत गा रहे थे और बहू को रोने के बजाय उत्सव मनाने को कह रहे थे, चूँकि उनके अनुसार आत्मा परमात्मा के पास चली गई है — यह आनंद की बात है। उन्होंने बेटे की चिता को आग भी बहू से दिलवाई। जैसे ही श्राद्ध की अवधि पूरी हुई, बहू के भाई को बुलाकर उसका दूसरा विवाह करने का आदेश दिया। बहू जाना नहीं चाहती थी, वह साथ रहकर उनकी सेवा करना चाहती थी, परंतु बालगोबिन के आगे उसकी एक न चली। उन्होंने दलील दी कि अगर वह नहीं गई, तो वे घर छोड़कर चले जाएँगे।

बालगोबिन भगत की मृत्यु भी उनके अनुरूप ही हुई। वे हर वर्ष गंगा स्नान को जाते। गंगा तीस कोस दूर पड़ती थी, फिर भी वे पैदल ही जाते। घर से खाकर निकलते तथा वापस आकर ही खाते थे, बाकी दिन उपवास पर रहते। किन्तु अब उनका शरीर बूढ़ा हो चुका था। इस बार लौटे तो तबीयत खराब हो चुकी थी, किन्तु वे नियम-व्रत छोड़ने वाले न थे — वही पुरानी दिनचर्या शुरू कर दी। लोगों ने मना किया, परन्तु वे टस से मस न हुए। एक दिन संध्या में गाना गया, परन्तु भोर में किसी ने गीत नहीं सुना। जाकर देखा तो पता चला — बालगोबिन भगत नहीं रहे।

कहानी से शिक्षा

“बालगोबिन भगत” कहानी हमें सच्चे भक्ति भाव, त्याग, अनुशासन और आत्मिक शांति की प्रेरणा देती है। बालगोबिन भगत ने परिवार और खेती करते हुए भी अपने जीवन को पूरी तरह ईश्वर को समर्पित कर दिया था। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला, किसी का नुकसान नहीं किया और सच्चाई की राह पर डटे रहे। अपने बेटे की मृत्यु पर भी उन्होंने दुख की जगह भक्ति और विश्वास को महत्व दिया। इस कहानी से हमें सिखने को मिलता है कि यदि हमारा मन शुद्ध हो और हमारा विश्वास मजबूत हो, तो हम हर दुख को शांति से सह सकते हैं और सच्चा जीवन जी सकते हैं।

शब्दार्थ

  • मँझोला: ना बहुत बड़ा ना बहुत छोटा
  • कमली जटाजूट: कंबल
  • खामखाह: अनावश्यक
  • रोपनी: धान की रोपाई
  • कलेवा: सवेरे का जलपान
  • पुरवाई: पूर्व दिशा से बहने वाली हवा
  • मेड़: खेत की सीमा पर बनी मिट्टी की ऊँची लकीर
  • अधरतिया: आधी रात
  • झिल्ली: झींगुर
  • दादुर: मेंढक
  • खँझरी: छोटा ढपली जैसा वाद्य
  • निस्तब्धता: सन्नाटा
  • पोखर: तालाब
  • टेरना: सुरीला गाना या अलापना
  • आवृत: ढका हुआ
  • श्रमबिंदु: मेहनत से आया पसीना
  • संझा: शाम का भजन-पूजन
  • करताल: हाथ में बजाया जाने वाला वाद्य
  • सुभग: सुंदर
  • कुश: नुकीली घास
  • बोदा: कम समझदार
  • सम्बल: सहारा

7. नेताजी का चश्मा – पाठ का सार

पाठ का संक्षिप्त परिचय

‘नेताजी का चश्मा’ कहानी केप्टन चश्मेवाले के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों के योगदान को रेखांकित करती है, जो इस देश के निर्माण में अपने-अपने तरीके से योगदान देते हैं। कहानी के अनुसार बड़े ही नहीं, बच्चे भी इसमें शामिल हैं। देश बनता है उसमें रहने वाले सभी नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों से और इन सबसे प्रेम करने तथा इनकी सुख-समृद्धि के लिए प्रयास करने की भावना का नाम देशभक्ति है।

पाठ का सार

  • हालदार साहब को हर पन्द्रहवें दिन कम्पनी के काम से एक छोटे कस्बे से गुजरना पड़ता था। उस कस्बे में एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का कारखाना, दो ओपन सिनेमा घर तथा एक नगरपालिका थी।
  • नगरपालिका थी तो कुछ ना कुछ करती रहती थी, कभी सड़के पक्की करवाने का काम तो कभी शौचालय तो कभी कवि सम्मेलन करवा दिया।
  • एक बार नगरपालिका के एक उत्साही अधिकारी ने मुख्य बाज़ार के चैराहे पर सुभाषचन्द्र बोस की संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। चूँकि बजट ज्यादा नही था इसलिए मूर्ति बनाने का काम कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के शिक्षक को सौंपा गया।
  • मूर्ति सुन्दर बनी थी बस एक चीज़ की कमी थी, नेताजी की आँख पर चश्मा नहीं था। एक सचमुच के चश्मे का चौड़ा काला फ्रेम मूर्ति को पहना दिया गया। जब हालदार साहब आये तो उन्होंने सोचा वाह भई! यह आईडिया ठीक है। मूर्ति पत्थर की पर चश्मा रियल।
  • दूसरी बार जब हालदार साहब आये तो उन्हें मूर्ति पर तार का फ्रेम वाले गोल चश्मा लगा था। तीसरी बार फिर उन्होंने नया चश्मा पाया। इस बार वे पान वाले से पूछ बैठे कि नेताजी का चश्मा हरदम बदल कैसे जाता है।
  • पानवाले ने बताया की यह काम कैप्टन चश्मेवाला करता है। हालदार साहब को समझते देर न लगी की बिना चश्मे वाली मूर्ति कैप्टन को ख़राब लगती होगी इसलिए अपने उपलब्ध फ्रेम में से एक को वह नेताजी के मूर्ति पर फिट कर देता होगा।
  • जब कोई ग्राहक वैसे ही फ्रेम की मांग करता जैसा मूर्ति पर लगा है तो वह उसे मूर्ति से उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर नया फ्रेम लगा देता चूँकि मूर्ति बनाने वाला मास्टर चश्मा भूल गया।
  • हालदार साहब ने पान वाले जानना चाहा कि कैप्टन चश्मेवाला नेताजी का साथी है या आजाद हिन्द फ़ौज का कोई भूतपूर्व सिपाही? पान वाले बोला कि वह लंगड़ा क्या फ़ौज में जाएगा, वह पागल है इसलिए ऐसा करता है।
  • हालदार साहब को एक देशभक्त का मजाक बनते देखना अच्छा नही लगा। कैप्टन को देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ चूँकि वह एक बूढ़ा मरियल- लंगड़ा सा आदमी था जिसके सिर पर गांधी टोपी तथा चश्मा था, उसके एक हाथ में एक छोटी-सी संदूकची और दूसरे में एक बांस में टंगे ढेटों चश्मे थे।
  • वह उसका वास्तविक नाम जानना चाहते थे परन्तु पानवाले ने इससे ज्यादा बताने से मना कर दिया दो साल के भीतर हालदार साहब ने नेताजी की मूर्ति पर कई चश्मे लगते हुए देखे।
  • एक बार जब हालदार साहब कस्बे से गुजरे तो मूर्ति पर कोई चश्मा नही था।
  • पूछने पर पता चला की कैप्टन मर गया, उन्हें बहुत दुःख हुआ।
  • पंद्रह दिन बाद कस्बे से गुजरे तो सोचा की वहाँ नही रुकेंगे, पान भी नही खायेंगे, मूर्ति की ओर देखेंगे भी नहीं। परन्तु आदत से मजबूर हालदार साहब की नजर चौराहे पर आते ही आँखे मूर्ति की ओर उठ गयीं।
  • वे जीप से उतरे और मूर्ति के सामने जाकर खड़े हो गए। मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना हुआ छोटा सा चश्मा रखा था, जैसा बच्चे बना लेते हैं। यह देखकर हालदार साहब की आँखे नम हो गयीं।

लेखक परिचय

स्वंय प्रकाश: इनका जन्म सन 1947 में इंदौर (मध्य प्रदेश) में हुआ। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढाई कर एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी करने वाले स्वंय प्रकाश का बचपन और नौकरी का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बिता। फिलहाल वे स्वैछिक सेवानिवृत के बाद भोपाल में रहते हैं और वसुधा सम्पादन से जुड़े हैं।

प्रमुख कार्य

कहानी संग्रह – सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी, संधान।
उपन्यास – बीच में विनय और ईंधन।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. कस्बा – छोटा शहर
  2. लागत – खर्च
  3. उहापोह – क्या करें, क्या ना करें की स्थिति
  4. शासनाविधि – शासन की अविधि
  5. कमसिन – कम उम्र का
  6. सराहनीय – प्रशंसा के योग्य
  7. लक्षित करना – देखना
  8. कौतुक – आश्चर्य
  9. दुर्दमनीय – जिसको दबाना मुश्किल हो
  10. गिराक – ग्राहक
  11. किदर – किधर
  12. उदर – उधर
  13. आहत – घायल
  14. दरकार – आवश्यकता
  15. द्रवित – अभिभूत होना
  16. अवाक् – चुप
  17. प्रफुल्लता – ख़ुशी
  18. हृदयस्थली – विशेष महत्व रखने वाला स्थान

6. संगतकार – पाठ का सार

कविता का सार

इस कविता में कवि ने गायन में मुख्य गायक का साथ देने वाले संगतकार की महत्ता का स्पष्ट किया है। कवि कहते हैं कि मुख्य गायक के गंभीर आवाज़ का साथ संगतकार अपनी कमजोर किन्तु मधुर आवाज़ से देता है। अधिकांशत ये मुख्य गायक का छोटा भाई, चेला या कोई रिश्तेदार होता है जो की शुरू से ही उसके साथ आवाज़ मिलाता आ रहा है। जब मुख्य गायक गायन करते हुए सुरों की मोहक दुनिया में खो जाता है, उसी में रम जाता है तब संगतकार ही स्थायी इस प्रकार गाकर समां बांधे रखता है जैसे वह कोई छूटा हुआ सामान सँजोकर रख रहा हो। वह अपनी टेक से गायक को यह उन दिनों की याद दिलाता है जब उसने सीखना शुरू किया था।

कवि कहते हैं बहुत ऊँची आवाज़ में जब मुख्य गायक का स्वर उखड़ने लगता है और गला बैठने लगता है तब संगतकार अपनी कोमल आवाज़ का सहारा देकर उसे इस अवस्था से उबारने का प्रयास करता है। वह मुख्य गायक को स्थायी गाकर हिम्मत देता है की वह इस गायन जैसे अनुष्ठान में अकेला नहीं है। वह पुनः उन पंक्तियों को गाकर मुख्य गायक के बुझते हुए स्वर को सहयोग प्रदान करता है। इस समय उसके आवाज़ में एक झिझक से भी होती है की कहीं उसका स्वर मुख्य गायक के स्वर से ऊपर ना पहुँच जाए। ऐसा करने का मतलब यह नही है की उसके आवाज़ में कमजोरी है बल्कि वह आवाज़ नीची रखकर मुख्या गायक को सम्मान देता है। इसे कवि ने महानता बताया है।

कवि परिचय

मंगलेश डबराल
इनका जन्म सन 1948 में टिहरी गढ़वाल, उत्तरांचल के काफलपानी गाँव में हुआ और शिक्षा देहरादून में। दिल्ली आकर हिंदी पेट्रियट, प्रतिपक्ष और आसपास में काम करने के बाद ये पूर्वग्रह सहायक संपादक के रूप में जुड़े। इलाहबाद और लखनऊ से प्रकाशित अमृत प्रभात में भी कुछ दिन नौकरी की, बाद में सन 1983 में जनसत्ता अखबार में साहित्य संपादक का पद संभाला। कुछ समय सहारा समय में संपादक रहने के बाद आजकल नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हैं।

प्रमुख कार्य
कविता संग्रह – पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं और आवाज़ भी एक जगह है।
पुरस्कार – साहित्य अकादमी पुरस्कार, पहल सम्मान।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. संगतकार – मुख्य गायक के साथ गायन करने वाला या वाद्य बजाने वाला कलाकार।
  2. गरज – उँची गंभीर आवाज़
  3. अंतरा – स्थायी या टेक को को छोड़कर गीत का चरण
  4. जटिल – कठिन
  5. तान – संगीत में स्वर का विस्तार
  6. सरगम – संगीत के सात स्वर
  7. अनहद – योग अथवा  साधन की आनन्दायक स्थिति
  8. स्थायी – गीत का वह चरण जो बार-बार गाय जाता है, टेक
  9. नौसिखिया – जिसने अभी सीखना आरम्भ किया हो।
  10. तारसप्तक – काफी उँची आवाज़
  11. राख जैसा गिरता हुआ – बुझता हुआ स्वर
  12. ढाँढस बँधाना – तसल्ली देना

5. यह दंतुरहित मुस्कान और फसल – पाठ का सार

कविताओं की व्याख्या

यह दंतुरित मुस्कान 

1. यह दंतुरित मुसकान
(i) तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात…
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेपफालिका के पूफल
बाँस था कि बबूल?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
देखते ही रहोगे अनिमेष!
थक गए हो?
आँख लूँ मैं फेर?


शब्दार्थ: दंतुरित = बच्चों के छोटे-छोटे नए-नए दाँतों से युक्त, धूलि-धूसर = धूल-मिट्टी से सना, गात = शरीर, तन, जलजात = कमल का फूल, परस = स्पर्श, पाषाण = पत्थर, शेपफालिका = एक विशेष फूल, अनिमेष = अपलक, बिना पलक झपकाए लगातार देखना।
व्याख्या: अपने शिशु पुत्र को संबोधित करते हुए कवि कहते हैं कि छोटे-छोटे दाँतों से सुशोभित तुम्हारा यह मुखड़ा और तुम्हारी निश्छल मुसकान इतनी मनमोहक और सुंदर है कि वह निर्जीव व्यक्ति में भी प्राण फूँक देगी। कवि कहना चाहते हैं कि इस दंतुरित मुसकान को देखकर मानो मृतक भी जी उठेगा। कवि इतने भावुक हो उठते हैं कि धूल-मिट्टी से सने उसके कोमल शरीर को देखकर उन्हें कमल की प्रतीति हो रही है। वे अचानक कह उठते हैं कि तालाब को छोड़कर कमल मानो मेरी झोंपड़ी में पुत्र के रूप में खिल रहा है और तुम्हारे कोमल स्पर्श को पाकर पत्थर भी पिघलकर मानो जल बन गया है। कवि कहना चाहते हैं कि तुम्हारे सुदंर मुख को देख कर और कोमल स्पर्श को पाकर भला किस पत्थर-हृदय मनुष्य का दिल न पिघलेगा! कवि का मन बाँस और बबूल की भाँति नीरस, शुष्क, ठूँठ जैसा हो गया था। वे घर छोड़कर संन्यासी बन गए थे और इधर-उधर घूम रहे थे, किंतु घर पर सुखद आश्चर्य के रूप में उनका शिशु पुत्र अपनी मोहक दंतुरित मुसकान के साथ उन्हें लगातार देखे जा रहा था। उसका कोमल स्पर्श पाकर कवि का ठूँठ जैसा पाषाण हृदय भी शेफालिका के फूलों की भाँति झरने लगा। उनके हृदय में वात्सल्य रस की धार बह निकली। अनायास ही वे अपने पुत्र से कहते हैं कि तुमने आज से पूर्व मुझे कभी देखा ही नहीं, इसलिए शायद तुम मुझे पहचान नहीं पा रहे हो। लेकिन इस प्रकार एकटक देखते रहने से तुम थक गए होगे। कवि भी लगातार उसे देख रहे थे, किंतु अपने शिशुपुत्र को थकान से उबारने के लिए वे अपनी आँखें फेर लेने का प्रस्ताव रखते हैं। वे कहते हैं कि अगर मैं अपनी दृष्टि घुमा लूँगा तो तुम भी आसानी से अपनी नशर घुमा लोगे और एकटक देखते रहने के श्रम से बच जाओगे।
विशेष
1. प्रस्तुत काव्यांश के प्रत्येक शब्द में कवि का ममत्व झलक रहा है।
2. भाषा सरल खड़ी बोली है, किंतु पाषाण, जलजात, शेफालिका जैसे तत्सम शब्दों का भी कवि ने सुंदर प्रयोग किया है। ‘धूल-धूसरित’ में अनुप्रास अलंकार है।
3. शिशु के धूल-धूसरित गात में ‘जलजात’ का आरोप किया गया है। अतः यहाँ रूपक अलंकार है।
4. ‘तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान, मृतक में भी डाल देगी जान’ में अतिशयोक्ति अलंकार है।
5. ‘परस पाकर तुम्हारा ही प्राण, पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण’ इसमें उत्प्रेक्षा अलंकार है।
6. बाँस या बबूल के समान नीरस शुष्क ठूँठ रूपी कवि- हृदय में शेफालिका के झरने की कल्पना कवि के अंतर की सुखानुभूति को स्पष्ट करती है।
7. आँख पेफर लेना – मुहावरेदार भाषा का सुंदर प्रयोग।

2. क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्वफ
उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्वफ
देखते तुम इधर कनखी मार
और होतीं जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगती बड़ी ही छविमान!


शब्दार्थ: परिचित = जिससे जान-पहचान हो, माध्यम = मध्य का, साधन, जिसके द्वारा कोई कार्य या उद्देश्य संपन्न हो। चिर प्रवासी = बहुत दिनों तक कहीं और रहने वाला, इतर = अन्य, दूसरा, संपर्वफ = संबंध, मधुपर्वफ = दही, घी, शहद, जल और दूध के मिश्रण से बना भगवान को भोग के रूप में चढ़ाया जाने वाला प्रसाद, जिसे अतिथियों में भी बाँटा जाता है। लोग इसे पंचामृत भी कहते हैं, कविता में इसका प्रयोग बच्चे को जीवन देने वाला आत्मीयता की मिठास से युक्त माँ के प्यार के रूप में हुआ है, कनखी = तिरछी निगाह से देखना, छविमान= सुंदर, आँखें चार होना = परस्पर देखना।
व्याख्या: शिशु अपनी दंतुरित मुसकान के साथ एकटक अपने पिता की ओर देख रहा है, किंतु अबोध बालक अपने पिता को नहीं पहचानता। आज प्रथम बार वह उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो रहा है। कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उसकी आँखों में जिज्ञासा है, पहचानने की चेष्टा व व्याकुलता है। कवि उसे संबोधित करते हुए कहते हैं कि अरे बेटे! यदि पहली बार देखकर मुझे पहचान न सके तो कोई बात नहीं। मैं ही कभी तुम्हारे सामने न आया तो भला तुम मुझे केसे पहचानोगे? अगर तुम्हारी माँ न होतीं तो आज तुम्हें मैं देख भी नहीं पाता। मैं घर पर नहीं रहा। आज अतिथि जैसे मुझे देखकर शायद तुम मेरा परिचय पाना चाहते हो। तुमसे मेरा क्या संबंध है, यह तुम नहीं जानते किंतु तुम धन्य हो और तुम्हारी माँ भी धन्य हैं, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और अब तक तुम्हारी देखभाल की। मैं ही गैर जैसा घर से बाहर इधर-उधर भटकता रहा। तुम्हारे साथ तुम्हारी माँ का स्नेह-संपर्वफ सदा बना रहा क्योंकि उन्होंने अपने हाथों से तुम्हें सदा खिलाया-पिलाया, कवि इसमें अपनी पत्नी का आभार मानते हैं।
कवि अपने पुत्र से कहते हैं कि मेरी तरपफ देखते हुए जब-जब हम दोनों की निगाहें मिल जाती हैं तब-तब तुम मुसकरा देते हो और तुम्हारे छोटे-छोटे नए दाँत मुझे बरबस आकर्षित कर लेते हैं। तुम्हारी वह मुसकान मुझे इतनी सुंदर लगती है कि मैं उस दिव्य शोभा का वर्णन नहीं कर सकता।
कवि भावावेग में अपना हृदय खोलकर रख देते हैं। शिशु के प्रति पिता के कर्तव्य और दायित्व का यथोचित पालन न कर पाने का दुख उन्हें विह्वल कर देता है। अतः अपने आपको केवल अतिथि जैसा उल्लेख करते हैं। और इतर, अन्य कहकर अपने मन का क्षोभ व्यक्त करते हैं।
विशेष
1. सहज-सरल खड़ीबोली में कवि ने अपने मनोभावों का सजीव चित्राण किया है।
2. ‘उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क’ पंक्ति ने माँ के वात्सल्य, कर्तव्यबोध और गरिमा की अभिव्यक्ति की।
3. ‘कनखी मार देखना’ और ‘आँखें चार होना’ आदि मुहावरों का सटीक प्रयोग हुआ है।
4. ‘मैं इतर, मैं अन्य’ कहकर कवि ने अपने मन की हीन भावना और क्षोभ को व्यक्त किया है। शायद इस समय उन्हें चिर-प्रवासी होने का दुख साल रहा है।
5. पत्नी और पुत्र के प्रति उनके मन में अपार कृतज्ञता का भाव है।
6.  शिशु की दंतुरित मुसकान का सहज, स्वाभाविक वर्णन कविता को अतुलनीय बना देता है।

फसल

1. एक के नहीं,
दो के नहीं,
ढेर सारी नदियों के पानी का जादू:
एक के नहीं,
दो के नहीं,
लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा:
एक की नहीं,
दो की नहीं,
हशार-हशार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म :


शब्दार्थ: कोटि-कोटि = करोड़ों, स्पर्श = छूना, संपर्क, गरिमा = गौरव।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि फसल उगाने के लिए बीज, मिट्टी, पानी, हवा, सूरज की किरणों आदि की आवश्यकता होती है। ये सब तो प्राकृतिक तत्व हैं। इनके अतिरिक्त किसानों का अथक परिश्रम भी आवश्यक है। इसलिए कवि कहते हैं एक या दो व्यक्ति के हाथों के नहीं अपितु लाखों-करोड़ों यानी असंख्य लोगों के हाथों के स्पर्श से फसल उगती है, बढ़ती है और लहलहाती है। कवि कहते हैं कि किसान लाख यत्न से बीज मिट्टी में बो दें, किंतु यदि उसमें पानी का छिड़काव न हो तो बीज पनप ही नहीं सकता। इसलिए बीज कु उगने में आरै फसल तैयार होने में पानी एक अत्यावश्यक तत्व है। कवि ने यहाँ कहा है कि किसी एक या दो नदियों का पानी नहीं बल्कि ढेर सारी नदियों के पानी का जादू इसमें होता है। इसका तात्पर्य यह है कि अनगिनत नदियों का पानी भाप बनकर उड़ जाता है जो फिर बादल बनकर धरती पर बरसता है। भीषण गर्मी से तपती धरती को, झुलसते पेड़-पौधों को, समग्र प्राणिजगत को यही पानी नया जीवन दान देता है। इसलिए पानी जब बरसता है तो फसल लहलहाने लगती है। अब कवि मिट्टी के गुण-धर्म की बात करते हैं। अलग-अलग मिट्टी की अलग-अलग विशेषता होती है। सभी मिट्टियाँ एक समान नहीं होतीं। उनके रूप, गुण, वैशिष्ट्य सब अलग-अलग होते हैं और इस प्रकार अलग-अलग गुण-धर्म वाली मिट्टी में अलग-अलग प्रकार की पैदावार होती है। संक्षेप में, लाल, काली, भूरी, पीली, चिकनी या रेतीली मिट्टी में अलग-अलग प्रकार की फसल उगती है।
विशेष
1. प्रस्तुत काव्यांश की भाषा सरल खड़ी बोली है और इसमें स्पर्श, गरिमा और कोटि-कोटि जैसे तत्सम शब्दों का पुट है।
2. लाख-लाख, कोटि-कोटि, हशार-हशार में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
3. ‘एक के नहीं, दो के नहीं’- इन पदों की बार-बार आवृत्ति से कविता में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो गया है।
प्राकृतिक तत्वों और मनुष्य के परिश्रम के सहयोग से ही फसल रूपी सृजन संभव है कवि यह बताना चाहते हैं।

2. फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!


शब्दार्थ: महिमा = महत्ता, रूपांतर = परिवर्तित रूप, बदला हुआ रूप, सिमटा हुआ संकोच = सिमटकर मंद हो गया, थिरकन = नाच, गति।
व्याख्या: खेतों में लहलहाती फसल को देखकर कवि पूछते हैं कि आखिर यह फसल है क्या? अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं देते हुए वे कहते हैं कि फसल बहुत सारी चीज़ों का सम्मिलित रूप है, जैसे कि नदियों के पानी का जादू, किसानों के मेहनती हाथों की महिमा, विभिन्न प्रकार की मिट्टी का गुण-धर्म, सूर्य की किरणों और वायु की मंद गति का प्रभाव, कहने का तात्पर्य यह है उपर्युक्त इन सब चीजों का समुचित योगदान न होने से फसल कभी पककर तैयार नहीं हो सकती। विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए विभिन्न रूप और गुण वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है। जैसे-धन की फसल के लिए चिकनी मिट्टी, गेहूँ के लिए दोमट उपजाउ मिट्टी, कपास के लिए काली मिट्टी और चाय के लिए पहाड़ी ढलान की आवश्यकता होती है। लाख यत्न से उपयुक्त मिट्टी में बीेज बोने पर भी यदि उसकी समुचित सिंचाई न हो तो बीज पनप हीं सकते। अतः मिट्टी के साथ-साथ नदियों के पानी और किसानों की अथक मेहनत की भी आवश्यकता है। ‘नदियों के पानी का जादू’ का तात्पर्य यह है कि किसी एक या दो नदियों का पानी नहीं, बल्कि छोटी-बड़ी ढेर सारी नदियों का पानी भाप बनकर उड़ जाता है जो आगे बादल बनकर प्यासी ध्रती पर बरसता है और समस्त प्राणिजगत तथा वनस्पतिजगत को नया जीवनदान देता है। इसीलिए कवि फसल के साथ पानी के जादू की बात कहते हैं। आगे कवि कहते हैं कि सूरज की धूप और प्रकाश में पौधे अपना भोजन तैयार करते हैं और व्रफमशः फलते-फूलते हैं। पर्याप्त धूप से फसल पककर तैयार होती है। साथ ही मंद-मंद बहती हवा फसल को तैयार होने में सहायता पहुँचाती है, वरना तेश हवा के झोंकों से फसल को नुकसान पहुँच सकता है। इस प्रकार इन सबके सम्मिलित योगदान से फसल तैयार होती है।
विशेष
1. प्रस्तुत काव्यांश की भाषा सरल खड़ी बोली है, जिसमें स्पर्श, महिमा, रूपांतर, संकोच आदि तत्सम शब्दों का समुचित प्रयोग हुआ है।
2. प्राकृतिक उपादानों के साथ-साथ फसल तैयार होने में मानव-श्रम की भी आवश्यकता है-इस बात को कवि कहना चाहते हैं।

4. उत्साह और अट नहीं रही – पाठ का सार

भावार्थ :

उत्साह

प्रस्तुत कविता एक आह्वाहन गीत है। इसमें कवि बादल से घनघोर गर्जन के साथ बरसने की अपील कर रहे हैं। बादल बच्चों के काले घुंघराले बालों जैसे हैं। कवि बादल से बरसकर सबकी प्यास बुझाने और गरज कर सुखी बनाने का आग्रह कर रहे हैं। कवि बादल में नवजीवन प्रदान करने वाला बारिश तथा सबकुछ तहस-नहस कर देने वाला वज्रपात दोनों देखते हैं इसलिए वे बादल से अनुरोध करते हैं कि वह अपने कठोर वज्रशक्ति को अपने भीतर छुपाकर सब में नई स्फूर्ति और नया जीवन डालने के लिए मूसलाधार बारिश करे।
आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादल को देखकर कवि को लगता है की वे बेचैन से हैं तभी उन्हें याद आता है कि समस्त धरती भीषण गर्मी से परेशान है इसलिए आकाश की अनजान दिशा से आकर काले-काले बादल पूरी तपती हुई धरती को शीतलता प्रदान करने के लिए बेचैन हो रहे हैं। कवि आग्रह करते हैं की बादल खूब गरजे और बरसे और सारे धरती को तृप्त करे।

अट नहीं रही

प्रस्तुत कविता में कवि ने फागुन का मानवीकरण चित्र प्रस्तुत किया है। फागुन यानी फ़रवरी-मार्च के महीने में वसंत ऋतू का आगमन होता है। इस ऋतू में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और नए पत्ते आते हैं। रंग-बिरंगे फूलों की बहार छा जाती है और उनकी सुगंध से सारा वातावरण महक उठता है। कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो फागुन के सांस लेने पर सब जगह सुगंध फैल गयी हो। वे चाहकर भी अपनी आँखे इस प्राकृतिक सुंदरता से हटा नही सकते।
इस मौसम में बाग़-बगीचों, वन-उपवनों के सभी पेड़-पौधे नए-नए पत्तों से लद गए हैं, कहीं यहीं लाल रंग के हैं तो कहीं हरे और डालियाँ अनगिनत फूलों से लद गए हैं जिससे कवि को ऐसा लग रहा है जैसे प्रकृति देवी ने अपने गले रंग बिरंगे और सुगन्धित फूलों की माला पहन रखी हो। इस सर्वव्यापी सुंदरता का कवि को कहीं ओऱ-छोर नजर नही आ रहा है इसलिए कवि कहते हैं की फागुन की सुंदरता अट नही रही है।

कवि परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

इनका जन्म बंगाल के महिषादल में सन 1899 में हुआ था। ये मूलतः गढ़ाकोला, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। इनकी औपचारिक शिक्षा नवीं तक महिषादल में ही हुई। इन्होने स्वंय अध्ययन कर संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की विचारधारा ने इनपर गहरा प्रभाव डाला। सन 1961 में इनकी मृत्यु हुई।

प्रमुख कार्य

काव्य-रचनाएं – अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. धराधर – बादल
  2. उन्मन – अनमनापन
  3. निदाघ – गर्मी
  4. सकल – सब
  5. आभा – चमक
  6. वज्र – कठोर
  7. अनंत – जिसका अंत ना हो
  8. शीतल – ठंडा
  9. छबि – सौंदर्य
  10. उर – हृदय
  11. विकल – बैचैन
  12. अट – समाना
  13. पाट-पाट – जगह-जगह
  14. शोभा श्री – सौंदर्य से भरपूर
  15. पट – समा नही रही

3. आत्मकथ्य – पाठ का सार

भावार्थ :

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्‍य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्‍यंग्‍य मलिन उपहास
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

अर्थ – इस कविता में कवि ने अपने अपनी आत्मकथा न लिखने के कारणों को बताया है। कवि कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का मन रूपी भौंरा प्रेम गीत गाता हुआ अपनी कहानी सुना रहा है। झरते पत्तियों की ओर इशारा करते हुए कवि कहते हैं कि आज असंख्य पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं यानी उनकी जीवन लीला समाप्त हो रही है। इस प्रकार अंतहीन नील आकाश के नीचे हर पल अनगिनित जीवन का इतिहास बन और बिगड़ रहा है। इस माध्यम से कवि कह रहे हैं की इस संसार में हर कुछ चंचल है, कुछ भी स्थिर नही है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के मज़ाक बनाने में लगे हैं, हर किसी को दूसरे में कमी नजर आती है। अपनी कमी कोई नही कहता, यह जानते हुए भी तुम मेरी आत्मकथा जानना चाहते हो। कवि कहता है कि यदि वह उन पर बीती हुई कहानी वह सुनाते हैं तो लोगों को उससे आनंद तो मिलेगा, परन्तु साथ ही वे यह भी देखेंगे की कवि का जीवन सुख और प्रसन्नता से बिलकुल ही खाली है।

भावार्थ :

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
उज्‍ज्‍वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिलाकर हँसतने वाली उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्‍वप्‍न देकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्‍या कर जो भाग गया।

अर्थ – कवि कहते हैं कि उनका जीवन स्वप्न के समान एक छलावा रहा है। जीवन में जो कुछ वो पाना चाहते हैं वह सब उनके पास आकर भी दूर हो गया। यह उनके जीवन की विडंबना है। वे अपनी इन कमज़ोरियों का बखान कर जगहँसाई नही करा सकते। वे अपने छले जाने की कहानी नहीं सुनाना चाहता। जिस प्रकार सपने में व्यक्ति को अपने मन की इच्छित वस्तु मिल जाने से वह प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार कवि के जीवन में भी पएक बार प्रेम आया था परन्तु वह स्वपन की भांति टूट गया। उनकी सारी आकांक्षाएँ महज मिथ्या बनकर रह गयी चूँकि वह सुख का स्पर्श पाते-पाते वंचित रह गए। इसलिए कवि कहते हैं कि यदि तुम मेरे अनुभवों के सार से अपने जीवन का घड़ा भरने जा रहे हो तो मैं अपनी उज्जवल जीवन गाथा कैसे सुना सकता हूँ।

भावार्थ :

जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्‍दर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्‍मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़े कथाएँ आज कहूँ?
क्‍या यह अच्‍छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्‍या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्‍मकथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्‍यथा।

अर्थ – इन पंक्तियों में कवि अपने सुन्दर सपनों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उनके जीवन में कुछ सुखद पल आये जिनके सहारे वे वर्तमान जीवन बिता रहे हैं। उन्होंने प्रेम के अनगनित सपने संजोये थे परन्तु वे सपने मात्र रह गए, वास्तविक जीवन में उन्हें कुछ ना मिल सका। कवि अपने प्रेयसी के सुन्दर लाल गालों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मानो भोर अपनी लाली उनकी प्रेयसी के गालों की लाली से प्राप्त करती है परन्तु अब ऐसे रूपसी की छवि अब उनका सहारा बनकर रह गयी है क्योंकि वास्तविक जीवन वे क्षण कवि को मिलने से पहले ही छिटक कर दूर चले गए। इसलिए कवि कहते हैं कि मेरे जीवन की कथा को जानकर तुम क्या करोगे, अपने जीवन को वे छोटा समझ कर अपनी कहानी नही सुनाना चाहते। इसमें कवि की सादगी और विनय का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। वे दूसरों के जीवन की कथाओं को सुनने और जानने में ही अपनी भलाई समझते हैं। वे कहते हैं कि अभी उनके जीवन की कहानी सुनाने का वक़्त नही आया है। मेरे अतीतों को मत कुरेदो, उन्हें मौन रहने दो।

कवि परिचय

जयशंकर प्रसाद

इनका जन्म सन 1889 में वाराणसी में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में वे पढ़ने गए परन्तु स्थितियां अनुकूल ना होने के कारण आँठवी से आगे नही पढ़ पाए। बाद में घर पर ही संस्कृत, हिंदी, फारसी का अध्ययन किया। छायावादी काव्य प्रवृति के प्रमुख कवियों में ये एक थे। इनकी मृत्यु सन  1937 में हुई।

प्रमुख कार्य

काव्य-कृतियाँ – चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आंसू, लहर, और कामायनी।
नाटक – अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
उपन्यास – कंकाल, तितली और इरावती।
कहानी संग्रह – आकाशदीप, आंधी और इंद्रजाल।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. मधुप – मन रूपी भौंरा
  2. अनंत नीलिमा – अंतहीन विस्तार
  3. व्यंग्य मलिन – खराब ढंग से निंदा करना
  4. गागर-रीती – खाली घड़ा
  5. प्रवंचना – धोखा
  6. मुसक्या कर – मुस्कुरा कर
  7. अरुण-कोपल – लाल गाल
  8. अनुरागिनी उषा – प्रेम भरी भोर
  9. स्मृति पाथेय – स्मृति रूपी सम्बल
  10. पन्था – रास्ता
  11. कंथा – अंतर्मन