2. राम–लक्ष्मण–परशुराम संवाद – पाठ का सार

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

शिवधनुष टूटने के साथ सीता स्वयंवर की खबर मिलने पर परशुराम जनकपुरी में स्वयंवर स्थान पर आ जाते है। हाथ में फरसा लिए क्राेिधत हो धनुष तोड़ने वाले को सामने आने,  सहस्त्रबाहु की तरह दडिंत होने और न आने पर वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को मारे जाने की धमकी देते हैं। उनके क्रोध को शांत करने के लिए राम आगे बढ़कर कहते हैं कि धनुष-भंग करने का बड़ा काम उनका कोई दास ही कर सकता है। परशुराम इस पर और क्रोधित होते हैं कि दास होकर भी उसने शिवधनुष को क्यों तोड़ा। यह तो दास के उपयुक्त काम नहीं है। लक्ष्मण परशुराम को यह कहकर और क्रोधित कर देते हैं कि बचपन में शिवधनुष जैसे छोटे कितने ही धनुषों को उन्होंने तोड़ा, तब वे मना करने क्यो  नहीं आए आरै अब जब पुराना आरै कमजाोर धनुष् श्रीराम के हाथों में आते ही टूट गया तो क्यों क्रोधित हो रहे हैं। परशुराम जब अपनी ताकत से ध्रती को कई बार क्षत्रियों से हीन करके बा्र ह्मणों को दान देने और गर्भस्थ शिशुओं तक के नाश करने की बात बताते हैं तो लक्ष्मण उन पर शूरवीरों से पाला न पड़े जाने  का व्यंग्य करते हैं। वे अपने कुल की परंपरा में स्त्राी, गाय और ब्राह्मण पर वार न करके अपकीर्ति से बचने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ स्वयं को पहाड़ और परशुराम को एक  फूँक सिद्ध् करते हैं। ऋषि विश्वामित्रा परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए लक्ष्मण को बालक समझकर माफ करने का आगह्र करते है। वे समझाते है। कि राम आरै लक्ष्मण की शक्ति का परशुराम को अंदाजा नहीं है। अंत में लक्ष्मण के द्वारा कही गई गुरुऋण उतारने की बात सुनकर वे अत्यंत क्रुद्ध् होकर फरसा सँभाल लेते हैं। तब सारी सभा में हाहाकार मच जाता है आरै तब श्रीराम अपनी मधुर वाणी से परशुराम की क्रोध रूपी अग्नि को शांत करने का प्रयास करते हैं।

काव्यांशों की व्याख्या

नाथ संभुध्नु भंजनिहारा।
होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयेसु काह कहिअ किन मोही।
सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई
अरिकरनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा।
सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।
न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने।
बोले परसुधरहि अवमाने।।
बहु धनुही तोरी लरिकाईं।
कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
येहि धनु पर ममता केहि हेतू।
सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।

व्याख्या

स्वयंवर सभा में उपस्थित होकर जब परशुराम यह जानना चाहते हैं कि शिवधनुष को किसने तोड़ा है तो श्रीराम विनयपूर्वक अपने स्वाभाविक कोमल वचनों से उन्हें शांत करने की चेष्टा करते हैं। श्रीराम कहते हैं कि हे नाथ! आपके किसी दास के अलावा भला और कौन हो सकता है जो शिवजी के ध्नुष को तोड़ सकता है? इस प्रकार वे अपने आप को उनका सेवक कहते हैं, किंतु उनका क्रोध फिर भी शांत नहीं होता। तो उन्हें खुश करने के लिए श्रीराम पुनः कहते हैं कि यदि आज्ञा हो तो आप जो कुछ कहना चाहते हैं, मुझसे कहें। इस पर परशुराम अत्यंत क्राेिधत होकर बोले- ‘सेवक तो वही होता है जो सवेा का र्काइे कार्य करे, किंतु जो सेवक शत्राु समान कार्य करता है, उसके साथ तो लड़ाई करनी पड़ेगी। सुन लो राम! जिसने भी शिवधनुष तोड़ा है, सहस्रबाहु के समान ही मेरा शत्राु है। वह तुरंत समाज (सभा) से अलग बाहर हो जाए अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएंगे।’ परशुराम के इन क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर  लक्ष्मण मकुसराने लगे। अब लक्ष्मण ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘हे गोसाईं! बचपन में खेल-खेल में न जाने कितनी धनुहियाँ तोड  डालीं, तब तो आपको गुस्सा नहीं आया, पर अब ऐसी कौन-सी खास बात हो गई जिसके कारण आप इतने क्रोध्ति हो रहे हैं? आखिर इस धनुष की क्या विशेषता है जिसके कारण आपको इससे इतना प्रेम और लगाव है?’ लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण वचनों को सुनकर भृगुवंश की ध्वजा स्वरूप्परशुराम अत्यंत क्रोध्ति होकर बोले- ‘अरे  राजकुमार! तू काल के वश में होकर इस प्रकार की बात बोल रहा है। तुझे तो बोलने का होश भी नहीं है, तू अपने आप को सँभाल। भगवान शंकर का धनुष समस्त विश्व में प्रसिद्ध् है और तू इसकी तुलना सामान्य धनुहियों के साथ कर रहा है? अरे! अबोध् बालक, यह कोई सामान्य धनुष नहीं है।’

विशेष

  1.  यह काव्यांश अवधी भाषा में लिखित है।
  2.  इस चापैाई में शुरू में शातं रस आरै बाद में रादै्र रस का पय्रोग हुआ है।
  3.  काह कहिअ किन, सेवकु सो, करि करिअ, सहसबाहु सम सो, बिलगाउ बिहाइ में अनुप्रास अलंकार की छटा दिखाई देती है।
  4.  ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ और ‘धनुही सम त्रिपुरारिधनु’ में उपमा अलंकार है।

लखन कहा हसि हमरे जाना।
सुनहु देव सब धनुष समाना।।
का छति लाभु जून धनु तोरें।
देखा राम नयन के भोरें।।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू।
मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू । ।
बोले चितै परसु की ओरा।
रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
बालकु बोलि बधैं नहि तोही।
केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही।
बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही।
बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
सहसबाहुभुज छेदनिहारा।
परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

व्याख्या

जब लक्ष्मण ने परशुराम से हँसकर कहा, हे दवे ! सुनिए, हमारे लिए तो सभी धनुष समान हैं। पुराने और कमजोर धनुष के टूटने से क्या दोष और क्या लाभ? रामचंद्र जी ने तो इसे नया समझकर छुआ था और छूते ही वह धनुष टूट गया, उन्हें तो दृष्टि का धेखा हो गया, भला इसमें उनका क्या दोष? अतएव हे मुनिवर! आप व्यर्थ ही क्रोधित हो रहे हैं। 

अब परशुरामजी ने अपने फरसे की ओर देखते हुए कहा – ‘अरे शठ! तूने मेरे स्वभाव के बारे में नहीं सुना है। मैं तो भला तुझे बालक समझकर नहीं मार रहा और तू मुझे निरा सीध-सादा मुनि समझ रहा है। तो सुन ले – मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और अत्यंत क्रोधी हूँ। सारा संसार जानता है कि मैं क्षत्रियों का घोर शत्रु हूँ। मैंने इस पृथ्वी को क्षत्रिय-शून्य कर दिया, फिर इस क्षत्रिय-रहित पृथ्वी को ब्राह्मणों को दे दिया’ कहने का तात्पर्य यह है कि परशुराम ने अपनी शक्ति से असंख्य क्षत्रियों का नाश करके पृथ्वी पर ब्राह्मणों का आधिपत्य स्थापित कर दिया। आगे परशुराम लक्ष्मण को संबोध्ति करते हुए कहते हैं कि, ‘हे राजकुमार! सहस्रबाहु की भुजाओं को काट डालने वाले मेरे इस फरसे की ओर शरा देखो। मेरा फरसा गर्भस्थ शिशु को नष्ट करने की क्षमता रखता है। अतः हे राजपुत्रा! तू अपने माता-पिता को चिंतित मत कर, उन्हें सोचने के लिए मजबूर मत कर।’

विशेष

  1. इसमें अवधी भाषा का और चैपाई छंद का प्रयोग हुआ है।
  2. इसमें मुख्य रूप से रौद्र रस की प्रधनता है।
  3. इसमें तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘सठ सुनेहि सुभाउ’, ‘बालकु बोलिबधौं’, ‘बाल बह्र्मचारी’, ‘भुजबल भूमि भूप’ तथा ‘बिपुल बार’ में अनुप्रास अलंकार की निराली छटा है।
     

1. पद – पाठ का सार

कवि परिचय: सूरदास

सूरदास हिंदी साहित्य में भक्ति-काल के एक बड़े कवि हैं, जिन्हें सगुण भक्ति के महानायक माना जाता है। उनका जन्म लगभग सन् 1478 में हुआ और निधन 1583 में पारसौली में हुआ। सूरदास ने कई किताबें लिखीं, जिनमें “सूरसागर,” “साहित्य लहरी,” और “सूर सारावली” शामिल हैं, और “सूरसागर” सबसे प्रसिद्ध है। उन्होंने अपनी रचनाओं में वात्सल्य, श्रृंगार, और शांत रस को प्रमुखता से दर्शाया। उनकी कविता में ब्रजभाषा का सुंदर और निखरा हुआ रूप मिलता है। उनके अनुसार, सच्ची भक्ति ही मोक्ष पाने का सही रास्ता है, और उन्होंने भक्ति को ज्ञान से भी महत्वपूर्ण समझा। उनके काव्य में भक्ति, प्रेम, वियोग, और श्रृंगार की भावनाओं को बहुत सुंदरता से चित्रित किया गया है।

सूरदास

पद का सार

इस कविता में सूरदास जी ने भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के बीच के प्रेम और विरह को बहुत भावुकता से दिखाया है। जब कृष्ण मथुरा चले गए तो वे खुद नहीं लौटे, बल्कि अपने दोस्त उद्धव को संदेश देने भेजा। उद्धव ने गोपियों को ज्ञान और योग की बातें बताईं, लेकिन गोपियों को यह सब सुनकर दुख हुआ। वे तो बस कृष्ण के प्रेम में डूबी हुई थीं और उन्हें उनकी याद सताती थी। इसलिए गोपियाँ उद्धव से नाराज़ होकर उलटे-सीधे ताने मारने लगीं। उन्होंने कहा कि अगर उद्धव ने कभी सच्चा प्रेम किया होता, तो वे हमारी पीड़ा समझते। गोपियाँ कहती हैं कि उनका सारा प्यार मन में ही रह गया, और अब उद्धव का योग उन्हें कड़वे ककड़ी जैसा लगता है। अंत में वे कहती हैं कि कृष्ण अब राजनीति सीख गए हैं, इसलिए उन्होंने अपने पुराने प्यार को भुला दिया है। लेकिन वे याद दिलाती हैं कि सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा का दुख न बढ़ाए। यह कविता दिखाती है कि गोपियों का प्रेम सच्चा, गहरा और निस्वार्थ था।

सूरदास के पद: व्याख्या

पद 1

उधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी में पाँव न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।

व्याख्या: इन पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव से हँसी-हँसी में कहती हैं कि तुम बहुत ही किस्मत वाले हो जो कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से दूर रह गए। तुम ऐसे हो जैसे कमल का पत्ता जो पानी में तो होता है, पर गीला नहीं होता। जैसे तेल की घड़ी पानी में डाली जाए तो भी उस पर पानी की बूँद नहीं टिकती, वैसे ही तुम कृष्ण के साथ रहकर भी उनके प्रेम को नहीं समझ पाए। तुमने कभी प्रेम की नदी में पैर भी नहीं रखा। तुम तो बड़े समझदार हो, इसलिए प्रेम में नहीं डूबे। लेकिन हम तो भोली-भाली और सीधी-सादी हैं, इसलिए हम कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह खो गई हैं, जैसे चींटियाँ गुड़ की तरफ खिंचती हैं।

पद 2

मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि असार आस आवन की,तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि,बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उर तैं धार बही ।
‘सूरदास’अब धीर धरहिं क्यौं,मरजादा न लही।।

व्याख्या: इस पद में गोपियाँ कहती हैं कि उनके दिल की बात उनके दिल में ही रह गई, क्योंकि अब वे कृष्ण से अपनी बात खुद नहीं कह सकतीं। वे उद्धव को यह बात कहने के लिए ठीक नहीं मानतीं और साफ कहती हैं कि वे सिर्फ कृष्ण से ही अपना मन कहना चाहती थीं, किसी और से नहीं। वे बताती हैं कि उन्होंने बहुत समय तक कृष्ण के लौटने की उम्मीद में अपने दुख और विरह की पीड़ा को सहा, लेकिन अब जब कृष्ण ने खुद आने की बजाय सिर्फ ज्ञान और योग की बातें भेजीं, तो उनका दुख और बढ़ गया। वे कहती हैं कि जो इंसान दुख में होता है, वह अपने सहारे को याद करता है, लेकिन हमारे अपने ही (कृष्ण) आज हमारे दुख का कारण बन गए हैं। अब हमें धैर्य नहीं होता, क्योंकि जिस उम्मीद पर हम जी रहे थे, वह भी टूट गई। सच्चे प्रेम में बदले में प्रेम ही मिलना चाहिए, पर कृष्ण ने हमें धोखा दिया है और प्रेम की मर्यादा तोड़ दी है।

पद 3

हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम  बचन नंद -नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस – निसि, कान्ह- कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौपौं, जिनके मन चकरी ।।

व्याख्या: इस पद में गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके जीवन का सहारा हैं, जैसे हारिल पक्षी एक लकड़ी के टुकड़े को पकड़कर जीता है। उन्होंने अपने मन, बोल और कर्म से कृष्ण को ही अपना सब कुछ मान लिया है। वे बताती हैं कि दिन हो या रात, जागते हों या सपने में – हर समय उनका मन बस कृष्ण में ही लगा रहता है। उन्हें उद्धव का ज्ञान और योग का संदेश बिलकुल अच्छा नहीं लगता, वह उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा लगता है। गोपियाँ कहती हैं कि हमें तो पहले ही कृष्ण के प्रेम का रोग लग चुका है, अब हम तुम्हारे कहने पर योग वाला रास्ता नहीं अपना सकते क्योंकि हमने इसे कभी जाना ही नहीं। वे कहती हैं कि यह संदेश जाकर उन लोगों को दो जिनका मन चंचल हो, क्योंकि हमारा मन तो पहले ही पूरी तरह कृष्ण में लग चुका है।

पद 4

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं हीं, अब गुरु ग्रंथ पढाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपने  मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।

व्याख्या: इस पद में गोपियाँ हँसी में कहती हैं कि लगता है श्रीकृष्ण ने अब राजनीति सीख ली है। वे कहती हैं कि कृष्ण तो पहले से ही बहुत चालाक थे, लेकिन अब उन्होंने बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ लिए हैं जिससे उनकी समझ और तेज हो गई है। इसलिए उन्होंने हमारी हालत सब कुछ जानते हुए भी हमारे पास उद्धव को भेजा और योग का संदेश भिजवाया। गोपियाँ कहती हैं कि इसमें उद्धव का कोई दोष नहीं है, वे तो अच्छे इंसान हैं जो दूसरों की मदद करना चाहते हैं। फिर वे कहती हैं कि उद्धव, जब मथुरा लौटो तो कृष्ण से कह देना कि जब वे मथुरा जा रहे थे तब वे हमारा मन भी साथ ले गए थे, अब उसे वापस कर दें। वे तो मथुरा में बुरे लोगों को सज़ा देने गए हैं, लेकिन खुद ही हमारे साथ अन्याय कर रहे हैं। गोपियाँ कहती हैं कि एक अच्छा राजा वही होता है जो अपनी प्रजा का ख्याल रखे और उन्हें दुख न दे, यही असली राजधर्म है।

पद से शिक्षा

इन चार पदों से हमें यह सिखने को मिलता है कि सच्चा प्रेम दिल से होता है, न कि केवल बुद्धि या ज्ञान से। गोपियाँ कृष्ण से बहुत प्रेम करती थीं, इसलिए वे कृष्ण के द्वारा भेजे गए योग और ज्ञान के संदेश को पसंद नहीं करतीं। उन्हें लगता है कि जो खुद कभी प्रेम में नहीं पड़ा, वह विरह (जुदाई) का दुख नहीं समझ सकता। वे कहती हैं कि उन्होंने अपने मन, वचन और कर्म से सिर्फ कृष्ण को ही चाहा है और उसी प्रेम में जी रही हैं। गोपियाँ यह भी मानती हैं कि कृष्ण अब राजनीति सीख गए हैं और प्रेम की भावनाओं को भूल गए हैं। वे उद्धव को याद दिलाती हैं कि सच्चा धर्म वही है जो दूसरों का भला करे और किसी को दुख न दे। इन पदों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा प्रेम त्याग, धैर्य और समर्पण से भरा होता है, और जो दूसरों की भावनाओं को समझता है वही वास्तव में महान होता है।

शब्दार्थ

  • ऊधौ: उद्धव (श्रीकृष्ण के मित्र)
  • अति: बहुत / अत्यधिक
  • बड़भागी: भाग्यवान, खुशकिस्मत
  • अपरस: अछूता, अनासक्त
  • सनेह: प्रेम
  • तगा: धागा / बंधन
  • नाहिन: नहीं
  • अनुरागी: प्रेमी, प्रेम करने वाला
  • पुरइनि पात: कमल का पत्ता
  • दागी: दाग लगाना
  • ज्यौं: जैसे
  • माहँ: के अंदर
  • गागरि: मटका
  • ताकौं: उसको
  • प्रीति नदी: प्रेम की नदी
  • पाउँ: पैर
  • बोरयौ: डुबोया
  • दृष्टि: नजर
  • परागी: मोहित होना
  • अबला: कमजोर नारी
  • भोरी: भोली
  • गुर चाँटी ज्यौं पागी: जैसे चींटी गुड़ से चिपक जाती है
  • माँझ: के अंदर
  • जाइ: जाकर
  • कौन पै: किससे
  • अवधि: समय
  • अधार: सहारा
  • आस: आशा
  • आवन: आना
  • बिथा: पीड़ा
  • जोग सँदेसनि: योग के संदेश
  • बिरहिनि: वियोगिनी, विरह में रहने वाली
  • बिरह दही: विरह की अग्नि में जलना
  • हुतीं: होतीं
  • गुहारि: पुकार
  • जितहि तैं: जहाँ से
  • उत तैं: वहाँ से
  • धार: प्रवाह / धारा
  • धीर: धैर्य
  • धरहिं: रखें
  • मरजादा: मर्यादा
  • लही: मिली
  • हरि: श्रीकृष्ण
  • हारिल: एक पक्षी जो लकड़ी पकड़कर उड़ता है
  • लकरी: लकड़ी
  • क्रम: कर्म / कार्य
  • नंदन: नंद का पुत्र (श्रीकृष्ण)
  • उर: हृदय
  • दृढ़: मजबूत
  • पकरी: पकड़ी
  • जागत: जागना
  • सोवत: सोना
  • स्वप्न: सपना
  • दिवस: दिन
  • निसि: रात
  • जक री: रटती हूँ
  • जोग: योग
  • करुई: कड़वी
  • ककरी: ककड़ी
  • सु: वह
  • ब्याधि: रोग
  • तिनहिं: उन्हें
  • चकरी: चंचल
  • राजनीति पढ़ि आए: राजनीति सीखकर आए
  • मधुकर: भौंरा (यहाँ उद्धव के लिए कहा गया है)
  • समुझी: समझ कर
  • पाए: पाया
  • अति चतुर: बहुत बुद्धिमान
  • पठाए: भेजे
  • बढ़ी बुद्धि: बढ़ी हुई समझ
  • जानी: समझा
  • पर हित: दूसरों का भला
  • डोलत धाए: घूमते फिरते थे
  • पाइहैं: पाएँगे
  • आपुन: अपने
  • अनीति: अन्याय
  • राज धरम: राजा का धर्म (प्रजा की रक्षा करना)
  • न जाहिं सताए: न सताई जाए