9. लखनवी अंदाज़ – Short Questions answer

“लखनवी अंदाज” नामक पाठ के माध्यम से लेखक यह संदेश देना चाहता है कि हमें अपना व्यावहारिक दृष्टिकोण विस्तृत करते हुए दिखावेपन से दूर रहना चाहिए। हमें वर्तमान के कठोर यथार्थ का सामना करना चाहिए तथा काल्पनिकता को छोड़कर वास्तविकता को अपनाना चाहिए जो हमारे व्यवहार और आचरण में भी दिखना चाहिए। कक्षा 10 के लिए EduRev के इस document की मदद से आप लखनवी अंदाज़ पाठ पर आधारित लघु उत्तरीय प्रश्नों को देख सकते हैं।

प्रश्न 1: ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के आधार पर बताइये कि लेखक ने यात्रा करने के लिये सेकंड क्लास का टिकट क्यों खरीदा?
उत्तरः
 लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट इसलिए खरीदा क्योंकि लेखक का अनुमान था कि सेकंड क्लास का डिब्बा खाली होगा, जिससे वे भीड़ से बचकर नई कहानी के विषय में एकांत में चिंतन करने के साथ-साथ प्राकृतिक दृश्यों की शोभा भी निहार सकेंगे।

प्रश्न 2: लखनवी अंदाज़ पाठ के अनुसार बताइए कि नवाब साहब ने खीरे किस उद्देश्य से खरीदे थे? वे कितने खीरे थे और लेखक के उस डिब्बे में दाखिल होते समय वे किस स्थिति में रखे रहे ? इस दृश्य से किस बात का अनुमान किया जा सकता है?
उत्तरः नवाब साहब ने खीरे सफर का समय बिताने के उद्देश्य से खरीदे थे। खीरे दो थे, जिन्हें वे बड़े सलीके से एक तौलिये पर रखे हुए थे। जब लेखक उनके डिब्बे में दाखिल हुआ, उस समय तक वे खीरे वैसे ही तौलिये पर सजे हुए थे और नवाब साहब उन्हें खाने की कोई जल्दी नहीं दिखा रहे थे। इस पूरे दृश्य से नवाब साहब की नाजुक तबीयत, सलीका पसंद स्वभाव और लखनवी तहज़ीब की झलक मिलती है, जिसमें हर काम को शिष्टता और ठाठ के साथ करने की परंपरा है।

प्रश्न 3: ‘लखनवी अंदाज’ पाठ के आधार पर बताइए कि लखनऊ के नवाबों और रईसों के बारे में लेखक की क्या धारणा थी?
उत्तरः
 लखनऊ के नवाबों और रईसों के बारे में लेखक की धारणा व्यंग्यपूर्ण और नकारात्मक थी। वह उनकी जीवन-शैली की कृत्रिमता को, दिखावे को पसंद नहीं करता था। उसने आरंभ में ही डिब्बे में बैठे सज्जन को ‘नवाबी नस्ल का सफेदपोश’ कहा है।

प्रश्न 4: लेखक ने नवाब साहब के सामने की बर्थ पर बैठकर भी आँखें क्यों चुराईं? ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तरः लेखक के डिब्बे में कदम रखते ही नवाब साहब की आँखों में असंतोष झलकने लगा तथा संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। लेखक ने इसे अपना अपमान समझा। नवाब के हाव-भावों में स्वयं के प्रति अनादर और मैत्री की अनिच्छा पाकर उन्होंने भी आत्मसम्मान में सामने की बर्थ पर बैठकर आँखें चुरा लीं।

प्रश्न 5: नवाब साहब का कैसा भाव-परिवर्तन लेखक को अच्छा नहीं लगा और क्यों? ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तरः
 लेखक को डिब्बे में आया देखकर नवाब साहब ने असंतोष, संकोच तथा बेरुखी दिखाई, लेकिन थोड़ी देर बाद उन्होंने अभिवादन कर खीरा खाने के लिए आमंत्रित किया। लेखक को उनका यही भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा, क्योंकि अभिवादन सदा मिलते ही होता है। पहले अरुचि का प्रदर्शन और कुछ समय बाद अभिवादन – इसका कोई औचित्य नहीं। लेखक को यह भी लगा कि नवाब शराफ़त का भ्रमजाल बनाए रखने के लिए उन्हें मामूली व्यक्ति की हरकत में लथेड़ लेना चाहते हैं।


प्रश्न 6: लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए उत्सुक नहीं हैं?
उत्तरः (1) लेखक ने जैसे ही ट्रेन के सेकंड क्लास के डिब्बे में प्रवेश किया, वहाँ उसने बर्थ पर पालथी मारकर बैठे हुए एक नवाब साहब को देखा। लेखक को देखते ही उनकी आँखों में असंतोष का भाव आ गया।
(2) नवाब साहब बिना बातचीत किए कुछ देर तक गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते रहे। नवाब साहब के इन हाव-भावों से लेखक ने महसूस किया कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं।

प्रश्न 7: नवाब साहब ने खीरा खाने की जो तैयारी की, उस प्रक्रिया को अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी करने का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिये। 
उत्तरः नवाब साहब ने खीरों को अच्छी तरह से धोया और तौलिए से पोंछकर तौलिए पर रखा। उन्होंने जेब से चाकू निकाला और उससे दोनों खीरों के सिर काटकर झाग निकाले। फिर बहुत सावधानी से उन्हें छीलकर फाँकों में काटा और इन फाँकों को तौलिए पर सुंदर ढंग से सजाया। अंत में नवाब साहब ने खीरे की फाँकों पर जीरा मिलाकर नमक और मिर्च बुरक दी।

प्रश्न 8: यद्यपि लेखक के मुँह में पानी भर आया फिर भी उसने खीरा खाने से इंकार क्यों किया ?
उत्तरः खीरे को देखकर लेखक के मुँह में पानी आ गया था और वह उसे खाने के लिए उत्सुक भी था, परंतु उसने पहले ही नवाब साहब को खीरा खाने से मना कर दिया था। इसलिए अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने और पहले किए गए इंकार को निभाने के लिए उसने खीरा खाने से इंकार कर दिया।

प्रश्न 9: नवाब साहब खीरों की फाँकों को खिड़की से बाहर फेंकने से पहले नाक के पास क्यों ले गए? उनके इस कार्यकलाप का क्या उद्देश्य था ?
उत्तरः नवाब साहब खीरों की फाँकों को खिड़की से बाहर फेंकने से पहले उन्हें नाक के पास इसलिए ले गए ताकि उनकी खुशबू से रसास्वादन कर सकें। उनका उद्देश्य यह दिखाना था कि वह एक खानदानी रईस हैं, जो खाने की वस्तु को भी शिष्टता और ठाठ-बाट के साथ त्यागते हैं।

प्रश्न 10: नवाब साहब ने अपने तरीके से खीरा खाने के बाद क्या किया और क्यों?
उत्तरः नवाब साहब खीरा खाने के बाद लेट गए और ज़ोर से डकार ली, जैसे कि बहुत खा लिया हो। वे यह दिखाना चाहते थे कि खीरा खाने में बहुत मेहनत लगी, इसलिए अब उन्हें आराम करना है।

प्रश्न 11: नवाब साहब ने अपनी नवाबी का परिचय किस प्रकार दिया? ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तरः नवाब साहब ने अपनी नवाबी का परिचय देने के लिए खीरा खाने के बजाय उसकी फाँकों को बार-बार सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया। फिर वे इस काम से थक जाने का नाटक करते हुए लेट गए और लेखक को दिखाने के लिए ज़ोर से डकार भी ली। इस तरह उन्होंने खानदानी नवाबी अंदाज़ में सादगी और शान का दिखावा किया।

प्रश्न 12: ‘नवाब साहब खीरे खाने की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए’-इस पंक्ति में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः लेखक ने इस कथन में नवाबी जीवन में भरी नज़ाकत पर गहरा व्यंग्य किया है। ऐसे लोग यथार्थ जीवन की उपेक्षा कर बनावटी ज़िंदगी जीते हैं। उन्हें लगता है कि छोटी-छोटी बातों में नाज़-नखरे दिखाना ही खानदानी रईसी का प्रमाण है।

प्रश्न 13: नवाब का व्यवहार क्या दर्शाता है? ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तरः नवाब का व्यवहार यह दर्शाता है कि वे बनावटी जीवन-शैली के अभ्यस्त हैं। उनमें दिखावे की प्रवृत्ति है। वे वास्तव में रईस नहीं हैं, बल्कि रईस होने का ढोंग करते हैं। उनका आचरण हास्य और व्यंग्य का विषय बन जाता है।

प्रश्न 14: ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के नवाब साहब पतनशील सामन्ती वर्ग के जीते-जागते उदाहरण हैं। टिप्पणी लिखिए।
उत्तरः जीवन शैली बनावटी, वास्तविकता से बेखबर, सामाजिकता से दूर, दूसरों की संगति के लिए उत्साह नहीं, ट्रेन में उनकी भाव-भंगिमा बनावटी, खानदानी रईस बनने का अभिनय, खीरा खाने में भी नज़ाकत, खाने की कल्पना मात्र से पेट भरने वाले ये सभी बातें नवाब साहब के पतनशील सामन्ती वर्ग का जीता-जागता उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

प्रश्न 15: ‘लखनवी अंदाज़’ व्यंग्य किस सामाजिक वर्ग पर कटाक्ष करता है?
उत्तरः ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ का व्यंग्य पतनशील सामंती वर्ग पर कटाक्ष करता है, जो आधुनिक समय में भी अपनी झूठी शान और बनावटी रईसी को बनाए रखना चाहता है।

प्रश्न 16: लेखक नवाब साहब के जबड़ों के स्फुरण को देखकर क्या अनुभव कर रहे थे? अपने सामने खीरों को देखकर मुँह में पानी आने पर भी उन्होंने खीरे खाने के लिये नवाब साहब के अनुरोध को स्वीकृत क्यों नहीं किया ?
उत्तरः लेखक नवाब साहब के जबड़ों के स्फुरण को देखकर यह अनुभव कर रहे थे कि नवाब साहब खीरा खाने की तीव्र इच्छा को दबा रहे हैं। लेखक नवाब साहब की बनावटी रईसी और उनकी वास्तविक स्थिति को भली-भाँति समझ चुके थे। उन्होंने पहले ही खीरा खाने से मना कर दिया था, इसलिए मुँह में पानी आने पर भी उन्होंने आत्म-सम्मान और संकोचवश खीरा नहीं खाया।

प्रश्न 17: ‘लखनवी अंदाज़’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर संक्षेप में प्रकाश डालिये।
उत्तरः ‘लखनवी अंदाज़’ कहानी का शीर्षक पूर्णतः सार्थक है क्योंकि संपूर्ण कथानक लखनऊ के एक नवाब के झूठे रईसी व्यवहार और बनावटी जीवनशैली के इर्द-गिर्द घूमता है। नवाब साहब का बोलचाल, खानपान, चाल-ढाल, दिखावा और शिष्टाचार सभी कुछ लखनवी तहज़ीब के पुराने और पतनशील स्वरूप को दर्शाते हैं। उनका प्रत्येक व्यवहार झूठी शान, नज़ाकत और नवाबी तौर-तरीकों का दिखावा करता है, जो लखनवी अंदाज़ का प्रतीक है। इसलिए इस कहानी के लिए यह शीर्षक अत्यंत उपयुक्त और सार्थक है।

इस वीडियो की मदद से लखनवी अंदाज़ को समझें।

लखनवी अंदाज़ पाठ के सार को यहाँ से समझें। 


प्रश्न 18: किन-किन चीजों का रसास्वादन करने के लिये आप किस प्रकार की तैयारी करते हैं ?
उत्तरः विभिन्न खाद्य वस्तुओं का रसास्वादन करने के लिए अलग-अलग प्रकार की तैयारियाँ करनी पड़ती हैं:

  • फल खाने के लिए उन्हें पहले अच्छी तरह धोना पड़ता है, फिर काटकर उन पर मसाला छिड़का जाता है।
  • सब्ज़ी बनाने के लिए उसे साफ कर धोना, काटना और फिर तेल या घी में छौंककर पकाना पड़ता है।
  • फलों का रस (जूस) पीने के लिए पहले फल को काटकर उसका रस निकाला जाता है।
  • रोटी खाने के लिए आटे को पानी के साथ गूंथना पड़ता है, फिर लोई बनाकर बेलना और तवे पर सेंकना होता है।

इन सभी तैयारियों के बाद ही हम स्वादपूर्वक इन चीज़ों का रसास्वादन कर सकते हैं।


प्रश्न 19: बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है? यशपाल के विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तरः
 बिना विचार, घटना और पात्रों के कहानी लिखना सम्भव नहीं है। यशपाल का यह विचार पूर्णतः उचित है कि कथ्य (विचार, घटना और पात्र) के बिना कहानी केवल शब्दों का खेल बनकर रह जाती है। कहानी की आत्मा उसके पात्रों, उनकी परिस्थितियों और घटनाओं में निहित होती है। यदि इनमें से कोई भी घटक न हो, तो कहानी प्रभावहीन हो जाती है। इसलिए मैं यशपाल के विचार से पूर्णतः सहमत हूँ।

प्रश्न 20: नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूंघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?
उत्तर:
 नवाब साहब अपनी नफ़ासत और नवाबी दिखाने के लिए खीरे को सूंघकर फेंक देते हैं। यह एक दिखावा था जिससे वे लेखक के सामने अपनी शान और अंदाज़ ज़ाहिर करना चाहते थे।

8. बालगोबिन भगत – Short Questions answer

पाठ पर आधारित लघु-उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
अथवा
भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए। 
उत्तरः भगत का समग्र व्यक्तित्व साधु की सब परिभाषाओं पर खरा उतरने वाला था। वे कबीर के दोहों तथा पदों को गाते और उन्हीं के बताए हुए मार्ग पर चलते थे। वे झूठ कभी नहीं बोलते और न ही झगड़ा करते थे। उनकी सब चीज ‘साहब’ की थी। खेत में पैदा होने वाली हर फसल को ‘साहब’ के दरबार में भेंट करके ‘प्रसाद’ रूप में जो मिलता उसे घर लाते, वे कमर में लँगोटी, सिर पर टोपी, जाड़ों में काली कमली ओढ़ते थे और मस्तक पर चन्दन का तिलक तथा गले में तुलसी की माला धारण करते थे।

प्रश्न 2. बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।
अथवा
पाठ के आधार पर बालगोबिन के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तरः प्रायः कबीर के पदों को ही गाया करते थे। सुनने वाले मंत्रमुग्ध से होकर उनका साथ देने लग जाते। गायन सुनकर, स्त्री, पुरुष, बालक, किसान और हलवाहे सभी गीत की लय के साथ झूम उठते थे उनके गीत समय, )तु और मास के अनुरूप होते थे।
व्याख्यात्मक हल:
बालगोबिन प्रायः कबीर के पदों को ही गाया करते थे। जिसे सुनने वाले मंत्रमुग्ध से होकर उनका साथ देने लग जाते थे। उनका गायन सुनकर, स्त्री, पुरुष, बालक, किसान और हलवाहे सभी गीत की लय के साथ झूम उठते थे। उनके गीत समय, ऋतू और मास के अनुरूप होते थे।

प्रश्न 3. बालगोबिन भगत गृहस्थ होते हुये भी भगत क्यों कहलाते थे ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः बालगोबिन भगत खेतीबाड़ी करने वाले गृहस्थ थे। फिर भी उनका आचरण साधुओं जैसा था। इसलिये गृहस्थ होते हुए भी साधु कहलाते थे।

प्रश्न 4. आपकी दृष्टि से भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के क्या कारण रहे होंगे ?
उत्तरः कबीर अपने समय के एक महान समाज-सुधारक थे। उन्होंने समाज में जन्मी अनेक बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। जाति-पाति, ऊँच-नीच, बाह्य-आडम्बर आदि। कबीर किसी एक जाति, धर्म तथा देश का कल्याण नहीं करना चाहते थे वरन समूची मानव जाति का कल्याण करना चाहते थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण भगत जी को उन पर अगाध श्रद्धा हो गई थी।

प्रश्न 5. बालगोबिन भगत पाठ में चित्रित ग्रामीण परिवेश को अपने शब्दों में प्रस्तुत करते हुए उस पर बालगोबिन भगत पर संगीत के प्रभाव एवं महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः ग्रामीण परिवेश में आषाढ़ की रिमझिम बारिश के शुरू होते ही सारा जन समुदाय खेतों की ओर उमड़ पड़ता है। प्रस्तुत पाठ में भी समूचा गाँव हल-बैल लेकर खेतों में निकल पड़ा था। उनके कानों में एक मधुर संगीत लहरी सुनाई देती है। बालगोबिन भगत बरसात में धान रोपते समय कीचड़ से लथपथ जब गाते थे तब हलवाहे मुग्ध होते तथा उनके पग ताल के साथ उठने लगते थे। रोपाई वालों की धान रोपती उँगलियों की गति बदल जाती थी तथा नारियों के होठों में स्पंदन होता था। इस प्रकार से सारा वातावरण संगीतमय जादूभरा हो जाता है।

प्रश्न 6. भादों की अँधेरी रात्रि में भी बालगोबिन भगत की संगीत साधना किस प्रकार उन्हें तथा अन्य लोगों को प्रभावित करती थी?
उत्तरः भादों की अँधेरी रात्रि में अर्धरात्रि के समय बालगोबिन भगत गाते हुए जब संगीत साधना में लीन हो जाते थे तब बिजली की तड़प तथा बादलों की गर्जन में भी उनका स्वर गूँजते हुए सभी को जगा देता था। उनकी खंजड़ी की आवाज तथा उनके द्वारा गाए जाने वाले गीत दार्शनिक विचारों से इतने ओत-प्रोत थे कि वे सभी को मोहित कर लेते थे।

प्रश्न 7. बालगोबिन भगत के संगीत को लेखक ने जादू कहा है ? पाठ के आधार पर इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः इसलिये जादू कहा है उससे सभी आनंदित हो उठते थे मेंड़ पर खड़ी औरतें, धान रोपते लोग मग्न होकर गाने लगते थे।
व्याख्यात्मक हल:
बालगोबिन भगत का स्वर इतना मनमोहक, ऊँचा और आरोही था कि उसे सुनकर खेतों में उछलकूद मचाते बच्चों में एक मस्ती आ जाती थी। मेड़ों पर बैठी औरतों के होंठ गाने के लिये बेचैन हो जाते और किसान संगीत की थाप पर धान रोपते मग्न हो गाने लगते थे।

प्रश्न 8. बालगोबिन भगत की दिनचर्या इस प्रकार की थी कि उसे देखकर लोगों को आश्चर्य होता था। इसका क्या कारण था ?
अथवा
बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी ?
उत्तरः
 सुबह बहुत जल्दी उठकर दो मील दूर नदी पर स्नान करने जाना, दोनों समय ईश्वर के गीत गाना। हर वर्ष गंगा स्नान के लिए जाना और संत समागम में भाग लेना। ईश्वर की साधना करते हुए भी गृहस्थी के कार्यों से विरत न होना।

प्रश्न 9. गर्मियों की उमस भरी शाम को बालगोबिन भगत किस प्रकार शीतल कर देते थे ?
उत्तरः उमस भरी शाम में भी भगत अपने घर में आसन जमाकर बैठ जाते और खंजड़ियों व करतालों के साथ जोर-जोर से गीत गाते। पूरी टोली ही भजन-कीर्तन में मस्त हो जाती वे सभी नाचते, गाते और भक्ति में लीन होकर गर्मी को भी भूल जाते थे।

प्रश्न 10. मोह और प्रेम में अन्तर होता है। बालगोबिन भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन को सत्य सिद्ध करेंगे?
उत्तरः इकलौते पुत्र की मृत्यु होने पर उसकी मृत्यु के दुःख को प्रकट न करके इसे प्रकृति का एक नियम मानकर उसे आत्मा और परमात्मा का मिलन मानकर शोक मनाने के स्थान पर गीत गा रहे थे और श्राद्ध अवधि पूरी होने पर अपनी पुत्रवधू को उसके भाई के साथ पुनर्विवाह के आदेश के साथ भेज देना ऐसी ही घटना है।

प्रश्न 11. बालगोबिन भगत पतोहू के पुनर्विवाह के रूप में समाज की किस समस्या का समाधान प्रस्तुत करना चाहते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
 समाज की विधवा-विवाह की समस्या का समाधान। भारतीय समाज में विधवा-विवाह की स्वीकृति नहीं। भगत के माध्यम से लेखक  इस मान्यता का समाधान प्रस्तुत कर रहा है।

प्रश्न 12. लड़के के देहान्त के बाद बालगोबिन भगत ने पतोहू को किस बात के लिये बाध्य किया ? उनका यह व्यवहार उनके किस प्रकार के विचार का प्रमाण है ?
उत्तरः लड़के के देहांत के बाद पतोहू को उसके भाई को बुलाकर उसके साथ भेज दिया। उसे निर्देश दिया कि उसकी दूसरी शादी कर देना। यह कार्य भी उनकी रूढ़ि विरोधी प्रगतिशील विचारधारा का परिचायक है। विधवा-विवाह के समर्थक।

प्रश्न 13. बालगोबिन भगत की पुत्र-वधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी ?
उत्तरः उनका दुनिया में कोई और न था। बहू के अलावा उनका ध्यान कौन रखेगा, बीमारी में कौन देखेगा, यह सोचकर वह उन्हें नहीं छोड़ती थी।
व्याख्यात्मक हल:
बालगोबिन भगत की पतोहू अपने बूढ़े ससुर को अकेले छोड़कर इसलिये नहीं जाना चाहती थी, वह कहती वृद्धावस्था में इनका खाना कौन बनाएगा व इनकी सेवा कौन करेगा? बीमारी में कोई दवा देने वाला भी नहीं होगा।

प्रश्न 14. ”उनका बेटा बीमार है, इसकी खबर रखने की लोगों को कहाँ फुरसत?“ पंक्ति में आधुनिक युग के मानव की किस मानसिकता पर व्यंग्य किया गया है?
उत्तरः इस पंक्ति द्वारा लेखक ने मानव की स्वार्थी प्रवृत्ति की मानसिकता पर व्यंग्य किया है। आधुनिक युग में सभी लोग अपने व्यक्तिगत क्रियाकलापों में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास दूसरे के बारे में सोचने व जानने का समय ही नहीं है। इसी कारण आज के मानव में संवेदनहीनता का भाव उत्पन्न हो गया है।

प्रश्न 15. भगत की कथनी-करनी में एकरूपता थी। पाठ के आधार पर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः 
भगत ने अपने बेटे की मृत्यु के बाद भी गीत गाया और पुत्रवधू को पुनर्विवाह के लिए प्रेरित किया इससे सिद्ध होता है कि वे लोगों को जो उपदेश देते थे उन्हें स्वयं भी करनी में उतारते थे।

प्रश्न 16. पुत्रवधू के पुनर्विवाह के सम्बन्ध में अन्तिम परिणाम क्या निकला? ‘बालगोबिन भगत’ पाठ के आधार पर उत्तर लिखिए।
उत्तरः
 पुत्रवधू भगत जी की सेवा करते हुए अपना वैधव्य गुजार देना चाहती थी। पर भगत जी पुनर्विवाह न करने पर घर छोड़ने की बात कहने लगे। परिणामस्वरूप उसे पुनर्विवाह के लिए राजी होना पड़ा।

प्रश्न 17. हर वर्ष गंगा स्नान जाते समय भगत के मन में क्या विचार होते थे ? 
उत्तरः हर वर्ष गंगा स्नान जाते, भिन्न विचारधारा को अपने अंदर धारण करना, तीस कोस तक पैदल चलना, साधु के रूप में कोई सहारा या सामान न लेना और गृहस्थ के रूप में भिक्षा न माँगना, पाँच दिन तक केवल पानी पीकर ही रहते थे। संत समागम को ही प्रमुखता देते।

प्रश्न 18. ‘बालगोबिन भगत की मौत उन्हीं के अनुरूप हुई’ कथन को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः 
प्रतिदिन नहाते, खेती का काम करते, गीत ध्यान दोनों वक्त नियम से ही करते, नेम-धरम का पूरा पालन करते रहे। बुखार में लोगों ने मना किया कि वे न नहाएँ पर माने ही नहीं। भगत के शान्त, सौम्य, निरीह स्वभाव के अनुरूप अन्तिम क्षण मौत के क्षण।
व्याख्यात्मक हल:

बालगोबिन भगत प्रतिदिन नहाते, खेती का काम करते व दोनों वक्त नियम से गीत ध्यान करते थे। जीवन भर
उन्होंने ‘नेम-धरम’ का पूरा पालन किया। उनको बुखार आ जाने पर लोगों ने नहाने के लिए मना किया, परन्तु वे नहीं माने।

7. नेताजी का चश्मा – Short Questions answer

प्रश्न 1: हालदार साहब जिस कस्बे से गुजरा करते थे उसका संक्षेप में वर्णन कीजिए। 
उत्तरः
 ‘नेताजी का चश्मा’ कहानी में उल्लिखित कस्बा ज़्यादा बड़ा नहीं था। वहाँ थोड़े-बहुत पक्के मकान, एक छोटा बाज़ार, एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का छोटा-सा कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक नगरपालिका थी। कस्बे के चौराहे पर नेताजी की मूर्ति प्रतिष्ठापित थी।


प्रश्न 2: कस्बों, शहरों, महानगरों के चैराहों पर किसी-न-किसी क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति की मूर्ति लगाने का प्रचलन-सा हो गया है। इस तरह की मूर्ति लगाने के क्या उद्देश्य हो सकते हैं?
उत्तरः
 देश की एकता, अखण्डता, स्वतंत्रता आदि के लिए कार्य करने वाले महापुरुषों के प्रति आदर व कृतज्ञता प्रकट करना। देश की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता को बढ़ाने वाले तथा सामाजिक बुराइयों को मिटाने के लिए अपना सारा जीवन लगाने वालों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना।

प्रश्न 3: हालदार साहब को नेताजी की मूर्ति को देखकर कैसा अनुभव हुआ था और क्यों? पहली बार में पान के पैसे चुकाकर जब वे चलने लगे तो वे किसके प्रति नतमस्तक हुए थे?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति पर असली चश्मा देखकर हालदार साहब को बड़ा विचित्र और कौतुकपूर्ण अनुभव हुआ। उन्हें नेताजी का मजाक उड़ाना अच्छा नहीं लगा। जब उन्हें चश्मा लगाने वाले की देशभक्ति का पता चला, तो वे कैप्टन की भावना के प्रति नतमस्तक हो गए।

प्रश्न 4: नेताजी की प्रतिमा की आँखों पर कैसा चश्मा लगा था ? प्रतिमा वाले पत्थर का चश्मा न लगा होने के संभावित कारणों पर पठित पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः नेताजी की प्रतिमा की आँखों पर काँच का असली चश्मा लगा था। प्रतिमा पर पत्थर का चश्मा न होने के संभावित कारण ये हो सकते हैं — नगरपालिका को देश के मूर्तिकारों की जानकारी नहीं थी, अच्छी मूर्ति के लिए बजट की कमी थी, शासनावधि समाप्त हो रही थी, इसलिए जल्दीबाज़ी में स्थानीय स्कूल मास्टर मोतीलाल (मान लें) को ही मूर्ति बनाने का काम सौंपा गया होगा। उन्होंने एक महीने में मूर्ति पूरी करने का विश्वास दिलाया होगा। इसी जल्दी में पत्थर का चश्मा नहीं बन पाया होगा।


प्रश्न 5: नेताजी की मूर्ति में कौन-सी कमी थी और क्यों?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति में चश्मे की कमी थी। मूर्ति बनाते समय शायद असमंजस की स्थिति रही होगी कि पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए। इस कारण, या चश्मा बनाते समय किसी बारीकी के कारण वह टूट गया होगा, अथवा उसे अलग से फिट किया गया होगा जो कि बाद में निकल गया होगा।

प्रश्न 6: हालदार साहब हमेशा चैराहे पर रुककर नेताजी की मूर्ति को क्यों निहारते थे ?
उत्तरः हालदार साहब के मन में देशभक्ति और नेताजी की प्रतिमा के प्रति लगाव था। वे प्रतिमा पर चश्मा देखने की उत्सुकता के कारण हमेशा चौराहे पर रुककर नेताजी की मूर्ति को निहारा करते थे।

प्रश्न 7: ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ में वर्णित नेताजी की मूर्ति को चश्मा पहनाने वाला व्यक्ति किस नाम से पुकारा जाता था? उसका पेशा और आर्थिक स्थिति कैसी थी? उसके व्यक्तित्व के किस गुण ने आपको प्रभावित किया है?
उत्तरः ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ में नेताजी की मूर्ति को चश्मा पहनाने वाला व्यक्ति कैप्टन नाम से पुकारा जाता था। उसका पेशा फेरी लगाकर चश्मा बेचना था और उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत साधारण थी। उसकी देशभक्ति की भावना ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है।

प्रश्न 8: हालदार साहब को मूर्ति में कौन-सी कमी खटकती थी ?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति की आँखों पर चश्मा नहीं था। यद्यपि इस कमी को असली चश्मा पहनाकर ढकने का प्रयास किया गया था, लेकिन हालदार साहब का मानना था कि संगमरमर की मूर्ति पर चश्मा भी संगमरमर का ही होना चाहिए था। यही कमी उन्हें खटकती थी।

प्रश्न 9: कैप्टन (चश्मेवाला) मूर्ति का चश्मा बार-बार क्यों बदल देता था ? ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तरः
 कैप्टन नेताजी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए अपने चश्मों में से एक फ्रेम मूर्ति को पहना देता था। जब कोई ग्राहक वैसा ही चश्मा माँगता, तो वह मूर्ति से चश्मा उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर दूसरा चश्मा लगा देता था।

प्रश्न 10: कैप्टन को साक्षात् देखने से पहले हालदार साहब के मानस पटल पर कैप्टन का कैसा चित्र रहा होगा ?
उत्तरः वह सोचते होंगे कि कैप्टन अवश्य ही अत्यंत बलिष्ठ और गठीले शरीर वाला होगा। वह देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत तथा दूसरों को देशभक्ति की सीख देने वाला कोई भूतपूर्व सिपाही होगा।

प्रश्न 11: हालदार साहब के विचार से देश को स्वतंत्र कराने वाले लोग कैसे थे और उनका उपहास करने वाले आज के देशवासी कैसे हो गए हैं? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः हालदार साहब के अनुसार, देश को स्वतंत्र कराने वाले लोग त्यागी, बलिदानी और देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। उन्होंने अपने जीवन की सारी खुशियाँ, युवावस्था और घर-गृहस्थी देश के लिए कुर्बान कर दी। वे निस्वार्थ भाव से देश की सेवा में लगे रहे।
इसके विपरीत, आज के देशवासी स्वार्थी, भौतिकवादी और अवसरवादी हो गए हैं। वे देशहित की भावना से विमुख हो चुके हैं और देशभक्तों के बलिदान का उपहास करते हैं। उदाहरणस्वरूप, नेताजी जैसी महान विभूतियों की मूर्तियों पर ध्यान न देकर लोग केवल दिखावे के लिए देशभक्ति जताते हैं।

प्रश्न 12: देशप्रेम की भावना किसी भी व्यक्ति में हो सकती है उसके लिए हथियार उठाना जरूरी नहीं है ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः चश्मेवाला कभी सेनानी नहीं था, वह गरीब और अपाहिज था, लेकिन उसके मन में देशभक्ति की असीम भावना थी। नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति को देखकर उसका दुःखी होना और अपने पैसे से नया चश्मा लगवाना, उसकी गहरी देशभक्ति को दर्शाता है।

प्रश्न 13: हालदार साहब ने नेताजी की मूर्ति को देखकर उनके असली चश्मे के विषय में मूर्तिकार की सोच के विषय में क्या-क्या अनुमान लगाए थे ? स्पष्ट रूप से समझाइए। 
उत्तरः हालदार साहब ने अनुमान लगाया कि शायद मूर्तिकार यह तय नहीं कर पाया होगा कि पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए, या उसने काँच वाला चश्मा बनाने की कोशिश की होगी लेकिन असफल रहा होगा। यह भी हो सकता है कि बारीकी में चश्मा टूट गया हो या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया गया हो और वह गिर गया हो।

प्रश्न 14: पानवाला एक हँसोड़ स्वभाव वाला व्यक्ति है, परन्तु उसके हृदय में संवेदना भी है। इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तरः पानवाला एक हँसोड़ स्वभाव वाला व्यक्ति है, परन्तु उसके हृदय में संवेदना भी है क्योंकि हालदार साहब ने जब मूर्ति के चेहरे पर कोई चश्मा नहीं देखा तो उसके बारे में पानवाले से पूछा। इस पर उसने उदास होकर अपनी आँखें पोंछते हुए कैप्टन की मृत्यु की सूचना दी। सामान्यतः पानवाला गंभीर बात भी हँसकर बताता था क्योंकि वह हँसकर निकटता का भाव प्रकट करता था।

प्रश्न 15: हालदार साहब को पानवाले की कौन-सी बात अच्छी नहीं लगी और क्यों ? 
उत्तरः कैप्टन के बारे में पूछने पर उसने कहा कि “कैप्टन तो लँगड़ा है, वह भला फौज में क्या जाएगा! वह तो पागल है!” पानवाले द्वारा एक देशभक्त का मज़ाक उड़ाया जाना हालदार साहब को अच्छा नहीं लगा क्योंकि कैप्टन देशभक्तों का सम्मान करता था।

प्रश्न 16: हालदार साहब के द्वारा कैप्टन के बारे में पूछने पर पानवाला अपनी आँखें क्यों पोंछने लगा?
उत्तरः
 पानवाला बताना चाहता था कि कैप्टन की मृत्यु हो गई है। अतः उसके प्रति सहानुभूति के कारण उसकी आँखों में आँसू आ गए, जिन्हें वह पोंछने लगा।

प्रश्न 17: हालदार साहब एक भावुक देशप्रेमी इंसान हैं- उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।
उत्तरः हालदार साहब के मन में देशभक्तों के लिए अत्यंत सम्मान था। वे कस्बे में लगी नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाने वाले कैप्टन जैसे साधारण व्यक्ति की देशभक्ति की भावना को श्रद्धा से देखते थे। साथ ही, देशभक्तों का मज़ाक उड़ाने वालों की आलोचना करते थे और इससे दुःखी हो जाते थे। इससे सिद्ध होता है कि वे एक भावुक देशप्रेमी इंसान हैं।

प्रश्न 18: ‘‘क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी -ञजदगी सब कुछ होम कर देने वालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढती है।’’ हालदार साहब के इस कथन को स्पष्ट करते हुए बताइए कि उनके इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
अथवा
आशय स्पष्ट कीजिए-
”बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-जिंदगी सब कुछ होम कर देने वालें पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढती है।“
उत्तरः आशय यह है कि उस कौम या समाज का भविष्य अंधकारमय होता है, जो अपने देश के लिए सब कुछ बलिदान कर देने वाले लोगों का उपहास उड़ाता है और खुद अवसर आने पर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बिकने को तैयार रहता है। हालदार साहब के इस कथन में आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता और समाज की चिंता झलकती है। मैं उनके इस विचार से पूरी तरह सहमत हूँ क्योंकि देशभक्ति का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सच्ची शक्ति होती है।

प्रश्न 19: ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ में वर्णित कैप्टन के चरित्र पर प्रकाश डालिए तथा बताइए कि उसके व्यक्तित्व की किस विशेषता ने आपको प्रभावित किया है?
उत्तरः कैप्टन एक गंभीर, देशभक्त, परिश्रमी और त्यागी व्यक्ति था। वह शारीरिक रूप से विकलांग (‘लंगड़ा’) होने पर भी हर समय सक्रिय और कर्मठ था। उसने नेताजी की मूर्ति पर अपने हाथों से सरकंडे का चश्मा बनाकर लगाया, जिससे उसकी देशभक्ति और सेवा-भावना झलकती है। उसकी सादगी, समर्पण और देश के प्रति निष्ठा ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया।

प्रश्न 20: हालदार साहब की आँखें भर आने का क्या कारण रहा होगा ? ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
अथवा
मूर्ति पर लगे सरकंडे के चश्मे ने हालदार साहब को द्रवित क्यों कर दिया? 
अथवा
हालदार साहब इतनी सी बात पर भावुक क्यों हो गए?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति पर एक साधारण से सरकंडे के चश्मे को देखकर हालदार साहब भावुक हो गए। उन्हें यह देखकर आशा की किरण दिखाई दी कि देशभक्ति की भावना अभी भी जीवित है। यह छोटी-सी बात उनके मन को छू गई, इसलिए उनकी आँखें भर आईं।

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1. पद – Short Questions answer – ||

लघु-उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. सूरदास द्वारा रचित तथा आपके द्वारा पठित पदों की भाषा तथा प्रमुख रचना के नाम लिखकर उनकी एक-एक विशेषता बताइए। 
उत्तर: ब्रजभाषा, सूरसागर, भाषा मधुर तथा कोमल भावों की सृजिका तथा सूरसागर वात्सल्य तथा शृंगार का अनूठा काव्य
व्याख्यात्मक हल:
सूरदास ने ब्रजभाषा में पदों की रचना की। उनकी रचनाएँ सूरसागर, सूरसारावली व साहित्य लहरी हैं जिनमें सूरसागर सबसे प्रमुख है। सूरसागर में सूरदास जी ने कृष्ण व गोपियों के प्रेम की सहज मानवीय प्रेम के रूप में प्रतिष्ठा स्थापित की है।

प्रश्न 2. आपके द्वारा पठित सूरदास के पदों में किस रस की प्रधानता है? इसमें कौन-कौन प्रमुख पात्र हैं?
उत्तर:
 सूरदास के पदों में शृंगार और वात्सल्य रस की प्रधानता है। इनमें कृष्ण, गोपियाँ तथा माता यशोदा आदि प्रमुख पात्र हैं।

प्रश्न 3. गोपियों के अनुसार प्रीति की नदी में किसने पैर नहीं रखा है और उन्हें उसकी दृष्टि में क्या अभाव दिखाई दे रहा है?
उत्तर:
 उद्भव ने, रूप तथा प्रेम के रहस्य से अनभिज्ञ तथा अनजान हैं।
व्याख्यात्मक हल:
गोपियों के अनुसार योग का संदेश देने वाले उद्धव ने प्रेम की नदी में पैर नहीं रखा है। उद्धव कृष्ण के अति निकट रहते हुए भी उनके प्रेम व सौन्दर्य पर मुग्ध नहीं हुए। उद्धव प्रेम के महत्व से अनजान हैं।

प्रश्न 4. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किससे की गई है?
उत्तर:
 जल के भीतर भी जल से अप्रभावित रहने वाले कमल के पत्ते से।
व्याख्यात्मक हल:
उद्धव के व्यवहार की तुलना पानी के ऊपर तैरते हुए कमल के पत्ते और पानी में डूबी हुई तेल की गागर से की गयी है।

प्रश्न 5. सूरदास की गोपियाँ स्वयं को ‘भोली’ क्यों कहती हैं ?
उत्तर:
 कृष्ण से एकनिष्ठ प्रेम करने वाली गोपियाँ जब उनके हाथों छली जाती हैं तब उन्हें अहसास होता है कि अपने भोलेपन के कारण वे कृष्ण को समझ नहीं पाईं। भोलेपन में कृष्ण के प्रति ऐसे समर्पित हुईं जैसे गुड़ के साथ चींटी। कृष्ण ने प्रेम का उत्तर नहीं दिया बल्कि कटु संदेश भिजवाया।

प्रश्न 6. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान (बड़भागी) कहने के पीछे क्या व्यंग्य निहित है ?
उत्तर:
 उद्धव कृष्ण के निकट रहते हुए भी उनके प्रेम से वंचित हैं, उन्हें कृष्ण में अनुराग उत्पन्न नहीं है इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा। प्रेम की पीड़ा न सहन करने के कारण वे भाग्यशाली हो सकते हैं।

प्रश्न 7. गोपियाँ उद्धव को भाग्यवान क्यों कहती हैं?
उत्तर:
 गोपियाँ उद्धव को श्रीकृष्ण के निकट होने के कारण भाग्यवान कहती हैं। इसके साथ वे उद्धव पर भाग्यवान कहकर व्यंग्य भी करती हैं।

प्रश्न 8. ”चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही“ पंक्ति का भाव सूरदास के पद के आधार पर प्रसंग सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
गोपियाँ श्रीकृष्ण से ही अपने प्रेम के प्रतिकार रूप ब्रज अपने की गुहार (टेर) लगा रही थीं, उधर से योग धारा बह गई जो अनर्थ हैं। उनके साथ न्याय नहीं हुआ।

प्रश्न 9. अब इन ”जोग सँदेसनि सुनि सुनि बिरहिनि बिरह दही।“ पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि बिरहिनि कौन है जो विरह में दग्ध हो रही हैं?
उत्तर: भाव यह है कि अब इन योग के संदेशों को पाकर तथा सुनकर विरहिणी गोपियाँ विरह में तप्त हो रही हैं। यहाँ विरहिणी गोपियाँ हैं जो कृष्ण की याद में विरहिणी होकर जल रही हैं।

प्रश्न 10. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर: 
 कृष्ण के प्रति प्रेम के कारण गोपियों को विश्वास था कि कृष्ण भी उनके प्रति उसी प्रेम का व्यवहार करेंगे किंतु कृष्ण ने प्रेम-संदेश के स्थान पर योग-संदेश भेजकर प्रेम की मर्यादा को नहीं रखा।

प्रश्न 11. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया ?
उत्तर:
 गोपियाँ कृष्ण के वियोग की पीड़ा में जल रही थीं, लौट आने की आशा थी, किन्तु कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव के हाथों योग संदेश भेजा जिससे उनके वियोग की पीड़ा बढ़ गई।

प्रश्न 12. गोपियाँ उद्धव की बातों से निराश क्यों हो उठीं?
उत्तर:
 गोपियाँ उद्धव से श्रीकृष्ण के प्रेम का सकारात्मक उत्तर सुनने को विचलित हो रही थीं, किन्तु उद्धव ने ज्ञान और योग का संदेश देना आरम्भ कर दिया, जिसे सुनकर वे निराश हो उठीं।
प्रश्न 13. गोपियाँ योग का संदेश किसे देने को कहती हैं और क्यों? उनके मन में कौन रमा हुआ है? ‘पद’ के
आधार पर लिखिए।
अथवा
गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तर:
  जिनके मन आज किसी को भजते हैं और कल किसी और की बात सोचते हैं अर्थात् चलायमान चरित्र हैं। गोपियों को तो श्रीकृष्ण को ही मजबूती से पकड़ रखा है, रात-दिन उन्हीं को भजती हैं।

प्रश्न 14. ‘सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी’ पंक्ति में गोपियों के कैसे मनोभाव दर्शाए गए हैं?
अथवा
गोपियों ने योग की शिक्षा को किस-किस के समान बताया है और क्यों?
उत्तर:
 गोपियाँ योग के प्रति उपेक्षित रवैया अपनाती हैं। उन्हें योग कड़वी ककड़ी जैसा प्रतीत होता है। कृष्ण प्रेम की मिठास के समक्ष योग में उन्हें कड़वाहट नजर आती है।

प्रश्न 15. गोपियों ने कृष्ण के प्रति अपने प्रेमभाव की गहनता को किस प्रकार प्रकट किया है? सूरदास-रचित पदों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
उत्तर
: (क) कृष्ण के प्रेम में ऐसी अनुरक्त हैं जैसे गुड़ में चींटी।
(ख) अपने आपको हारिल पक्षी के समान कहना जिसने कृष्ण रूपी लकड़ी को मज़बूती से पकड़ रखा है।
(ग) मन, क्रम, वचन से कृष्ण को मन में धारण करना।
(घ) दिन-रात, उठते-बैठते, सोते-जागते श्रीकृष्ण का नाम रटना।
(ङ) योग-संदेश को सुनकर व्याकुल हो जाना।

प्रश्न 16. गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण कैसा है?
अथवा
सूरदास के पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 गोपियों के अनुसार योग-साधना एक कड़वी ककड़ी के समान व एक ऐसी व्याधि के समान माना है जिसे पहले कभी न देखा, न सुना और न भोगा है। वे उसे निरर्थक एवं अरुचिकर मानती हैं।

प्रश्न 17. कृष्ण को ‘हारिल की लकड़ी’ कहने से गोपियों का क्या आशय है?
उत्तर: 
गोपियों ने कृष्ण को हारिल की लकड़ी कहकर प्रेम की दृढ़ता एवं एकनिष्ठा को प्रकट किया है। हारिल पक्षी सदैव अपने पंजे में कोई लकड़ी या तिनका पकड़े रहता है, किसी भी दशा में नहीं छोड़ता। इसी प्रकार गोपियों ने भी कृष्ण के प्रेम को अपने हृदय में दृढ़तापूर्वक बसाया हुआ है, जो किसी भी प्रकार निकल नहीं सकता।

प्रश्न 18. ‘जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी’। इस पंक्ति द्वारा गोपियों की किस मनः स्थिति का वर्णन किया गया है ?
उत्तर:
 गोपियों द्वारा कृष्ण को दिन-रात याद करना।
कृष्ण के अतिरिक्त और कोई बात अच्छी न लगना।

प्रश्न 19. गोपियों ने ‘व्याधि’ और ‘करुई ककरी’ जैसे शब्दों का प्रयोग किसके लिए और क्यों किया?
उत्तर: 
योग-साधना के लिए प्रयोग किया गया है, क्योंकि वे योग-साधना को निरर्थक, नीरस एवं अनुपयोगी मानती हैं जिसमें निरत व्यक्ति प्रेम-आनंद से वंचित रहता है और यह चंचल मन वाले के लिए होता है।

प्रश्न 20. गोपियों का मन किसने चलते समय चुरा लिया था? अब वे क्या चाहती हैं?
उत्तर: 
गोपियों का मन श्रीकृष्ण ने ब्रज से चलते समय चुरा लिया था। उनका मन उनके वश में नहीं रहा, अब वे उसे फिर से प्राप्त करना चाहती हैं।

प्रश्न 21. गोपियाँ किसकी प्रतीक हैं? श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम-भाव क्या सिद्ध करता है?
उत्तर: 
गोपियाँ ‘जीवात्मा’ का प्रतीक हैं। कृष्ण के प्रति उनका प्रेम-भाव परमात्मा के प्रति जीवात्मा का प्रेम है। आत्मा-परमात्मा का ही अंश है। उससे बिछुड़कर रहना आत्मा के लिए कठिन है।

प्रश्न 22. दूसरों को नीति की सीख देने वाले कृष्ण स्वयं अनीति का आचरण करने लगे। गोपियों ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर:
 ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि वे श्रीकृष्ण स्वयं आदर्श और प्रेम की मूरत हैं और वे उद्धव के हाथ प्रेम के बदले योग का संदेश भेजते हैं जो नीति नहीं अनीति है।

प्रश्न 23. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए, जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं ?
उत्तर: 
मथुरा जाने से सोच में परिवर्तन।
प्रेम की उपेक्षा, योग से प्रभावित होना।
कुशल राजनीतिज्ञ होकर छल-प्रपंच का सहारा लेना।
नीति की अपेक्षा, अनीति का सहारा लेना।

प्रश्न 24. गोपियों के अनुसार एक अच्छे राजा का धर्म क्या होना चाहिए ?
उत्तर:
 राजा का धर्म है कि प्रजा का अहित न करे और न किसी को करने दे। प्रजा की भलाई हेतु सदैव प्रयत्नशील रहे।

11. नौबतखाने में इबादत – Short Questions answer

पाठ पर आधारित लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. उस्ताद बिस्मिला खाँ को बालाजी के मंदिर पर रोज क्यों जाना पड़ता था? वहाँ वे किस रास्ते से गुज़रते थे और क्यों?
उत्तर-
 उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ को बालाजी के मंदिर पर रोजाना नौबत खाने रियाज़ के लिए जाना पड़ता था। वेरसूलन बाई और बतूलन बाई के यहाँ से होकर गुज़रने वाले रास्ते से जाते हैं क्योंकि इस रास्ते से जाना उन्हें अच्छा लगता है। उन्हें अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं गायिका बहनों को सुनकर मिली।

प्रश्न 2. जीवन के आरंभिक दिनों में संगीत के प्रति बिस्मिल्ला खाँ की आसक्ति क्यों और कैसे हुई ? ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के आधार पर लिखिए।
अथवा
बिस्मिला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया।
उत्तर- (i) रसूलन और बतूलन दोनों गायिका बहनों के गीतों को सुनकर संगीत के प्रति आसक्ति।
(ii) बालाजी मंदिर जाने का एक रास्ता इन दोनों बहनों के घर से होकर जाता, उन्हें मधुर गायकी सुनने को मिलती।

प्रश्न 3. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है ? ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- डुमराँव गाँव के एक संगीत प्रेमी परिवार में बिस्मिल्ला जी का जन्म हुआ। शहनाई बजाने में रीड का प्रयोग होता है। यह रीड जिस घास से बनाई जाती है वह घास सडुमराॅव गाँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।

प्रश्न 4. काशी से बिस्मिल्ला खाँ का पुश्तैनी सम्बन्ध है। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- बिस्मिल्ला खाँ का काशी के प्रति पुश्तैनी सम्बन्ध है, क्योंकि उनके पूर्वज काशी में रचे-बसे थे। उन्होंने काशी के विश्वनाथ मंदिर और बालाजी की ड्योढ़ी में शहनाई बजाई थी। बचपन से ही वे गंगा को मैया कहते आए थे। वे वहीं पले-बढ़े तथा सीखे थे। इसलिए उनका काशी के प्रति स्वाभाविक अनुराग था।

प्रश्न 5. बिस्मिल्ला खाँ जीवन भर ईश्वर से क्या माँगते रहे, और क्यों? इससे उनकी किस विशेषता का पता चलता है?
अथवा
बिस्मिल्ला खाँ जीवन भर ईश्वर से क्या माँगते रहे और क्यों ? 
उत्तर-

  • सच्चे सुर की नेमत। क्योंकि सच्चे कलाकार थे, हमेशा सीखते रहते थे, पूर्णता पाने की ललक / इच्छा रहती थी।
  • विनम्रता, ईश्वर पर आस्था, सच्चे संगीत के साधक थे।

अथवा
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना अर्थोपार्जन का ज़रिया नहीं थी। वे ईश्वर से प्रार्थना करते समय कभी भी धन-सम्पत्ति की चाह प्रकट नहीं करते थे। वे सदैव ईश्वर से सच्चे सुर का वरदान माँगते थे।

प्रश्न 6. बिस्मिल्ला खाँ कचौड़ी को घी में खौलते देख क्या अनुभव करते थे ?
उत्तर– उन्हें खौलते घी में संगीत के आरोह-अवरोह सुनाई देते। छन से उठने वाली आव़ाज उन्हें संगीतमय कचैड़ी लगती।

व्याख्यात्मक हल:
बिस्मिल्ला खाँ मुहर्रम के गमज़दा माहौल से अलग कभी सुकून के क्षणों में वे अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं। अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी वाली दुकान को ज्यादा याद करते हैं।

प्रश्न 7. बिस्मिल्ला खाँ हमेशा ख़ुदा से क्या दुआ करते ? उसके साथ लुंगी का स्मरण क्यों जुड़ा है ?

उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ खुदा से यही दुआ करते कि वे उन्हें फटा सुर न बख्शे। लुंगी तो सिली जा सकती है अगर सुर फट गया तो गज़ब हो जाएगा।
व्याख्यात्मक हल:
बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना अर्थोपार्जन का साधन नहीं थी। उन्होंने ईश्वर से कभी भी धन-सम्पत्ति की चाह प्रकट नहीं की। वे हमेशा सच्चे सुर का वरदान माँगते थे। एक दिन उनकी शिष्या ने फटी लुंगी देखकर टोका तो, सुनकर बोले, धत्! पगली ई भारतरत्न हमकों शहनईया से मिला है, लुंगियाँ पे नाहीं। इससे सिद्ध होता है कि खाँ साहब को सादगी बहुत पसंद थी। 

प्रश्न 8. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
अथवा
काशी में हो रहे किन परिवर्तनों से बिस्मिल्ला खाँ व्यथित रहते थे ? किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • खानपान में बदलाव।
  • पुरानी परंपराओं का लुप्त होना।
  • सांप्रदायिक स्वभाव में कमी।
  • संगतकारों के प्रति सम्मान में कमी।
  • रियाज़ में कमी। 

व्याख्यात्मक हल:
काशी में हो रहे निम्न बदलाव बिस्मिला खाँ को व्यथित करते रहते थे-
(क) वहाँ होता खानपान में बदलाव।
(ख) पुरानी परंपराओं का धीरे-धीरे लुप्त होता जाना।
(ग) काशी में पहले सभी सद्भाव और प्रेम से रहते थे किंतु समय के साथ उनके सांप्रदायिक स्वभाव में कमी आने लगी।
(घ) काशी में पहले की अपेक्षा संगतकारों को कम महत्व दिया जाने लगा जिससे रियाज़ में भी कमी आने लगी।

प्रश्न 9. बिस्मिल्ला खाँ काशी क्यों नहीं छोड़ना चाहते थे। कोई दो कारण लिखिए। 
उत्तर:

  • गंगा मइया, काशी विश्वनाथ और बालाजी के मंदिर के प्रति उनकी अगाध श्रृद्धा के कारण
  • अपने खानदान की कई पुश्तों द्वारा यहाँ शहनाई बजाने के कारण
  • काशी से ही उन्हें अदब और तालीम प्राप्त होने के कारण
  • काशी के लोगों से अपार स्नेह प्राप्त हाने के कारण। 

व्याख्यात्मक हल:

बिस्मिल्ला खाँ को काशी में गंगा मइया, काशी विश्वनाथ और बालाजी के मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा थी। उनके पूर्वजों ने काशी में इन्हीं स्थानों पर शहनाई बजाई थी। स्वयं बिस्मिल्ला खाँ ने काशी में ही अदब, तालीम और लोगों का अपार स्नेह प्राप्त हुआ था। यही कारण थे कि बिस्मिला खाँ काशी नहीं छोड़ना चाहते थे।

प्रश्न 10. बिस्मिल्ला खाँ हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे, कैसे ?
अथवा
बिस्मिल्ला खाँ को मिली-जुली संस्कृति का प्रतीक क्यों कहा जा सकता है ? 
उत्तर: बालाजी के मंदिर में, काशी विश्वनाथ के मंदिर में तथा मुहर्रम के दिनों में शहनाई बजाने के कारण। सबका समान रूप से आदर।

प्रश्न 11. ‘बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे।’ ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के आलोक में उत्तर दीजिए।
उत्तर
(1) बिस्मिल्ला खाँ शहनाई बजाने वाले एक महान कलाकार थे। वे घंटों रियाज़ करते हुए अपनी कला की उपासना करते थे।
(2) जब कभी लोग उनकी कला की प्रशंसा करते तो वे उसे अपनी नहीं बल्कि ईश्वर की प्रशंसा मानते थे।
(3) वे अपनी कला को ईश्वरीय देन मानते थे और उसका उपयोग ईश्वर की आराधना एवं हज़रत इमाम हुसैन के प्रति शोक मनाने में करते थे।
(4) उन्होंने सदैव अपनी कला को महत्व दिया, धन-दौलत या पहनावे को नहीं। इसी कारण एक शिष्या द्वारा फटी लुंगी पहनने से मना किए जाने पर उन्होंने कहा कि यह भारत-रत्न मुझे शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं।
(5) संगीत को संपूर्णता और एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा उनके अंदर अंत तक विद्यमान थी।

प्रश्न 12. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक क्यों कहा जाता है ?
उत्तर: शहनाई को मंगल ध्वनि का वाद्य माना जाता है। इसका प्रयोग मांगलिक-विधि-विधानों के अवसर पर ही होता है तथा बिस्मिल्ला खाँ शहनाई वादन के क्षेत्र में अद्वितीय स्थान रखते हैं। इसलिये उन्हें शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक कहा गया है।

प्रश्न 13. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तर- मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ का अत्यधिक जुड़ाव था। मुहर्रम के महीने में खाँ साहब हजरत इमाम हुसैन एवं उनके वंशजों के प्रति पूरे दस दिनों तक शोक मनाते थे।
मुहर्रम की आठवीं तारीख को बिस्मिल्ला खाँ खड़े होकर शहनाई बजाते थे। वे दाल मंडी में फातमान के लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तक रोते हुए नौहा बजाते पैदल ही जाते थे। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में भीगी रहती थीं। उन दिनों में वे न तो शहनाई बजाते थे और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में शामिल होते थे। उस समय एक महान संगीतकार का सहज मानवीय रूप देखकर, उनके प्रति अपार श्रद्धा उत्पन्न हो जाती थी।

प्रश्न 14. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की दो विशेषताओं लिखिए। 
उत्तरः 

(1) बिस्मिल्ला खाँ का स्वभाव निश्छल था। उनकी हँसी बच्चों जैसी भोली और स्वाभाविक थी। उनका जीवन सादगी से परिपूर्ण था, भारत-रत्न मिलने के बाद भी वे फटी लुंगी पहनने में संकोच नहीं करते थे।
(2) बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना अर्थोपार्जन का ज़रिया नहीं थी। वे ईश्वर से प्रार्थना करते समय कभी भी धन-सम्पत्ति की चाह प्रकट नहीं करते थे। वे सदैव ईश्वर से सच्चे सुर का वरदान माँगते थे।

प्रश्न 15. बिस्मिल्ला खाँ का जीवन क्या संदेश देता है ? 

अथवा
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया? आप इनमें से किन विशेषताओं को अपनाना चाहेंगे ? कारण सहित किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए।

उत्तरः व्यक्तित्व की सादगी और सरलता, सांप्रदायिक सद्भावना, संगीत के प्रति लगन और समर्पण।

व्याख्यात्मक हल:
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से हमें धार्मिक सौहार्द, अहंकारशून्यता, सरलता-सादगी तथा कला-प्रेम की प्रेरणा मिलती है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि व्यक्ति को कभी अपनी कला पर अहंकार नहीं करना चाहिए तथा कभी यह नहीं समझना चाहिए कि उसकी कला-साधना का अंत हो गया। उनके जीवन से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें सांप्रदायिकता से दूर रहना चाहिए तथा बड़ी से बड़ी सफलता पाकर भी अभिमान नहीं करना चाहिए।

11. नौबतखाने में इबादत – Short Questions answer ( Passage)

गद्यांशों पर आधारित अतिलघु/लघु उत्तरीय प्रश्न

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़िए और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। रीड, नरकट (एक प्रकार की घास) से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। इतनी ही महत्ता है इस समय डुमराँव की जिसके कारण शहनाई जैसा वाद्य बजता है। फिर अमीरुद्दीन जो हम सबके प्रिय हैं, अपने उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ साहब है। उनका जन्म-स्थान भी डुमराँव ही है। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव निवासी थे। बिस्मिल्ला खाँ उस्ताद पैगंबरबख्श खाँ और मिट्ठन के छोटे साहबजादे हैं।

प्रश्न (क)-अमीरुद्दीन के माता-पिता कौन थे? 
उत्तरः उस्ताद पैंगबरबख्श खाँ और मिट्ठन।
व्याख्यात्मक हल:
अमीरुद्दीन की माता मिट्ठन बाई तथा पिता उस्ताद पैंगबरबख्श खाँ थे।

प्रश्न (ख)-यहाँ रीड के बारे में क्या-क्या जानकारियाँ मिलती हैं?
उत्तरः
 

  • रीड नरकट नाम की घास से बनाई जाती है।
  • रीड अंदर से पोली होती है। उसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है।

व्याख्यात्मक हल:
रीड सोन नदी के तट पर पायी जाने वाली नरकट घास से बनाई जाती है, जिससे शहनाई बजाने में प्रयुक्त होने वाली रीड बनती है। यह अन्दर से पोली होती है। फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य जिनमें रीड का प्रयोग होता है। ‘नय’ कहे जाते हैं। अतः इस वाद्य को ‘शाहेनय’ अर्थात् ‘वाद्यों का शाह’ कहा जाता है। इसी से शहनाई शब्द की भी उत्पत्ति हुई।

प्रश्न (ग)-शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के पूरक हैं, कैसे?
उत्तरः शहनाई बजाने में प्रयुक्त ‘रीड’ डुमराँव में सोन नदी के किनारे पाई जाने वाली ‘नरकट घास’ से बनाई जाती है। शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान डुमराँव ही है।
व्याख्यात्मक हल:
शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। डुमराँव हमारे शहनाई-सम्राट बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि है। इसके अतिरिक्त डुमराँव में सोन नदी के किनारें पर नरकट नाम की घास मिलती है जिससे शहनाई बजाने में प्रयुक्त होने वाली रीड बनती हैं।

2. वही पुराना बालाजी का मंदिर जहाँ बिस्मिल्ला खाँ को नौबतखाने रियाज के लिए जाना पड़ता है। मगर एक रास्ता है बालाजी मंदिर तक जाने का। यह रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता है। इस रास्ते से अमीरुद्दीन को जाना अच्छा लगता है। इस रास्ते न जाने कितने तरह के बोल-बनाव कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा के मार्फत ड्योढ़ी तक पहुँचते रहते हैं। रसूलन और बतूलन जब गाती हैं तब अमीरुद्दीन को खुशी मिलती है। अपने ढेरों साक्षात्कारों में बिस्मिल्ला खाँ साहब ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है। एक प्रकार से उनकी अबोध उम्र में अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला रसूलनबाई और बतूलनबाई ने उकेरी है।

प्रश्न (क)-‘रियाज़’ से क्या तात्पर्य है? 
उत्तरः शहनाई वादन का अभ्यास
व्याख्यात्मक हल:
‘रियाज़’ शब्द का तात्पर्य है, शहनाई बजाने का अभ्यास करना।

प्रश्न (ख)-रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर बालाजी के मंदिर जाना बिस्मिल्ला खाँ को क्यों अच्छा लगता था? 
उत्तरः
 

  • रसूलन और बतूलन बाई का गाना सुनकर खाँ साहब को खुशी मिलती थी।
  • उन्हें वहाँ कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा अलग-अलग प्रकार के बोल-बनाव सुनने को मिलते थे।

व्याख्यात्मक हल:
बिस्मिल्ला खाँ प्रतिदिन बालाजी मंदिर में शहनाई के रियाज़ के लिए जाते थे। वे उस रास्ते से जाते थे, जिस पर रसूलनबाई और बतूलनबाई का घर था। इस रास्ते में जाते समय बिस्मिल्ला खाँ को इन दोनों बहनों का गायन ठमरी, कभी टप्पे कभी दादरा अलग-अलग सुनने का अवसर मिलता था। इसी कारण उनको इस रास्ते से मंदिर जाना अच्छा लगता था।

प्रश्न (ग)-बिस्मिल्ला खाँ कौन थे? बालाजी मंदिर से उनका क्या संबंध है? 
उत्तरः 

  • बिस्मिल्ला खाँ विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक थे।
  • बालाजी मंदिर वे प्रतिदिन रियाज़ के लिए जाते थे। 

व्याख्यात्मक हल:
बिस्मिल्ला खाँ विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक थे। वे प्रतिदिन बालाजी मंदिर में शहनाई के रियाज़ के लिए जाते थे।
अथवा
प्रश्न (क)-ठुमरी, दादरा क्या हैं ?
उत्तरः ठुमरी, दादरा गायन शैलियाँ है।

प्रश्न (ख)-बिस्मिल्ला खाँ को अपने आरम्भिक दिनों में संगीत के प्रति लगाव किससे मिला ? 
उत्तरः 
अपने बहुत सारे साक्षात्कारों में बिस्मिल्ला खाँ ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है।

प्रश्न (ग)-अमीरुद्दीन को कब अत्यधिक प्रसन्नता मिलती थी ? 
उत्तरःबिस्मिल्ला खाँ को बालाजी मन्दिर पर रोजाना नौबतखाने रियाज़ के लिए जाना पड़ता है। वे रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से जाते हैं। इस रास्ते से अमीरुद्दीन को जाना अच्छा लगता है। क्योंकि रसूलन और बतूलन के गाने से उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता मिलती है।
अथवा
प्रश्न (क)-बिस्मिल्ला खाँ का असली नाम क्या था ? उनका बचपन कहाँ गुजरा ?
उत्तरः
असली नाम अमीरुद्दीन था और काशी में बचपन गुजरा।

प्रश्न (ख)-बिस्मिल्ला खाँ का काशी से इतना जुड़ाव क्यों था ? 
उत्तरः 
बिस्मिल्ला खाँ का काशी के प्रति पुश्तैनी सम्बन्ध है। क्योंकि उनके पूर्वज काशी में रचे-बसे थे। उन्होंने काशी के विश्वनाथ मंदिर और बालाजी की ड्योढ़ी में शहनाई बजाई थी।

प्रश्न (ग)-अमीरुद्दीन का सामान्य परिचय क्या है ? 
उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ का ही बचपन का नाम अमीरुद्दीन है। जिनका जन्म ‘डुमराँव’ बिहार के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। 5-6 वर्ष के बाद वे अपने नाना के घर काशी आ गए थे।

3. मुहर्रम के ग़मज़दा माहौल से अलग, कभी सुकून के क्षणों में वे अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं। वे अपने रियाज़ को कम, उन दिनों के अपने जुनून को अधिक याद करते हैं। अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी वाली दुकान व गीताबाली और सुलोचना को ज्यादा याद करते हैं। कैसे सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन रही थी, बड़ी रहस्यमय मुस्कराहट के साथ गालों पर चमक आ जाती है। खाँ साहब की अनुभवी आँखों और जल्दी ही खिस्स से हँस देने की ईश्वरीय कृपा आज भी बदस्तूर क़ायम है। इसी बाल सुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं। वे जब उनका ज़िक्र करते हैं तब फिर उसी नैसर्गिक आनंद में आँखें चमक जाती हैं।

अमीरुद्दीन तब सिर्फ चार साल का रहा होगा। वह नाना को शहनाई बजाते हुए सुनता था, रियाज़ के बाद जब अपनी जगह से चले जाएँ, तब जाकर ढेरों छोटी-बड़ी शहनाइयों की भीड़ से अपने नाना वाली शहनाई को ढूँढ़ता और एक-एक शहनाई को फेंक कर ख़ारिज करता जाता,-सोचता-‘लगता है मीठी वाली शहनाई दादा कहीं और रखते हैं।’

प्रश्न (क)-वे जब उनका ज़िक्र करते हैं तब फिर उसी नैसर्गिक आनंद से आँखें चमक जाती हैं, वाक्य किस प्रकार का है ?
उत्तरः
मिश्रित वाक्य है।

प्रश्न (ख)-मुहर्रम का महीना क्या होता है ? 
उत्तरः 
मुहर्रम के महीने में शिया सम्प्रदाय हज़रत इमाम हुसैन के प्रति शोक मनाता है। उनके परिवार की शहादत के शोक में कोई राग नहीं बजाया जाता?

प्रश्न (ग)-बिस्मिल्ला खाँ अपने जवानी के दिनों में क्या-क्या याद करते ? 
उत्तरः बिस्मिल्ला खाँ कभी सुकून के क्षणों में अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं। अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचैड़ी वाली दुकान व गीताबाली और सुलोचना को ज्यादा याद करते हैं।

4. काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है। यह आयोजन पिछले कई बरसों से संकट मोचन मंदिर में होता आया है। यह मंदिर शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित है व हनुमान जयन्ती के अवसर पर यहाँ पाँच दिनों तक शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायन-वादन की उत्कृष्ट सभा होती है। इसमें बिस्मिल्ला खाँ अवश्य रहते हैं। अपने मज़हब के प्रति अत्यधिक समपिर्त उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है। वे जब भी काशी से बाहर रहते हैं तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते हैं, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता है।

प्रश्न (क)-बिस्मिल्ला खाँ का वादक यंत्र कौन-सा है ? 
उत्तरःशहनाई।

प्रश्न (ख)-संकट मोचन में संगीत आयोजन की क्या विशेषता है ? 
उत्तरः 
हनुमान जयन्ती के अवसर पर लंका स्थित मंदिर में पाँच दिनों तक इसमें बिस्मिल्ला खाँ की उपस्थिति विशिष्ट होती है।

प्रश्न (ग)-काशी में किस प्राचीन परंपरा का आयोजन कहाँ होता रहा है ? 

उत्तरः काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परम्परा है। यह आयोजन पिछले कई वर्षों से शहर के दक्षिण में लंका स्थित संकटमोचन मंदिर में होता आया है।

5. काशी संस्कृति की पाठशाला है। शास्त्रों में आनंदकानन के नाम से प्रतिष्ठित। काशी में कलाधर हनुमान व नृत्य-विश्वनाथ हैं। काशी में बिस्मिल्ला खाँ है। काशी में ह़ज़ारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित कंठे महाराज हैं, विद्याधरी हैं, बडे़ रामदास जी हैं, मौजुद्दीन खाँ हैं व इन रसिकों से उपकृत होने वाला अपार जन-समूह है। यह एक अलग काशी है जिसकी अलग तह़ज़ीब है, अपनी बोली और अपने विशिष्ट लोग हैं। इनके अपने उत्सव हैं, अपना ग़म। अपना सेहरा – बन्ना और अपना नौहा। आप यहाँ संगीत को भक्ति से, भक्ति का किसी भी धर्म के कलाकार से कजरी को चैती से, विश्वनाथ को विशालाक्षी से, बिस्मिल्ला खाँ को गंगाद्वार से अलग करके नहीं देख सकते।

प्रश्न (क)-कजरी और चैती क्या है ?
उत्तरःदो रागों के नाम 

व्याख्यात्मक हल:

कजरी और चैती दो रागों के नाम।

प्रश्न (ख)-काशी को किन मंदिरों के कारण याद किया जाता है ? 
उत्तरः कलाधर हनुमान तथा नृत्य विश्वनाथ
व्याख्यात्मक हल:
काशी मंदिरों की नगरी हैं लेकिन काशी में कलाधर हनुमान व नृत्य-विश्वनाथ मंदिर हैं जिनके लिए काशी जानी जाती है।

प्रश्न (ग)-गद्यांश में काशी का कौन सा रूप अलग है ? 
उत्तरः
मिली-जुली संस्कृति
व्याख्यात्मक हल:
काशी अपनी तहजीब, बोली, उत्सवों तथा संगीत के लिए अपना विशिष्ट स्थान रखती है। यहाँ की परम्पराएँ, आयोजन, सहेरा-कथा गायन-वादन अन्य स्थानों से अलग हैं। यहाँ के लोग भी विशिष्ट हैं।
अथवा
प्रश्न (क)-काशी के लोगों की विशिष्ट पहचान क्या है ? 
उत्तरः 
तहज़ीब और बोली ही विशिष्ट पहचान है।

प्रश्न (ख)-काशी को क्यों जाना जाता है ? 
उत्तरः
काशी में हज़ारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित कंठे महाराज हैं, वि़द्याधर हैं, बड़े रामदास हैं, मौजुद्दीन खाँ है।

प्रश्न (ग)-शास्त्रों में काशी किस नाम से प्रसि) है ? 
उत्तरः 
संस्कृति की पाठशाला काशी को शास्त्रों में आनंदकानन के नाम से जाना जाता है। यहीं विश्वनाथ मंदिर, कलाधर हनुमान मंदिर है।
अथवा

प्रश्न (क)-‘तहज़ीब’ शब्द का क्या अर्थ है ? 
उत्तरः ‘तहज़ीब’ शब्द से तात्पर्य ‘सभ्यता’ से है।

प्रश्न (ख)-काशी के प्राचीन इतिहास से जुडे़ विशिष्ट लोग कौन-कौन हैं ? 
उत्तरः 
काशी में हज़ारों सालों का इतिहास है जिसमें कंठे महाराज हैं, विद्याधरी हैं, बडे़ रामदास जी हैं, मौजुद्दीन खाँ हैं व इन रसिकों से उपकृत होने वाला अपार जन-समूह है।

प्रश्न (ग)-काशी को संस्कृति की पाठशाला क्यों कहा गया है ? 

उत्तरःयहाँ भारतीय संस्कृति से जुड़ी अनेक परम्पराओं के दर्शन होते हैं। अनेक कला शिरोमणि यहाँ निवास करते हैं। यह हनुमान और विश्वनाथ की नगरी है। कला, धर्म एवं संस्कृति का यहाँ अनोखा संगम है।

6. किसी दिन एक शिष्या ने डरते-डरते खाँ साहब को टोका, ”बाबा! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी। अब तो आपको भारतरत्न भी मिल चुका है, यह फटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं।“ खाँ साहब मुसकराए, लाड़ से भरकर बोले, ”धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई। तब क्या ख़ाक रियाज़ हो पाता। ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर इतना बताए देते हैं कि मालिक से यही दुआ है, फटा सुर न बख्शे। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो

कल सी जाएगी।“

प्रश्न (क)-शिष्या के टोकने को बिस्मिल्ला खाँ ने बुरा क्यों नहीं माना? 
उत्तरः शिष्या के टोकने में व्यंग्य या अपमान का नहीं अपितु अपनत्व का भाव था। 

व्याख्यात्मक हल:
शिष्या के टोकने को बिस्मिल्ला खाँ ने बुरा नहीं माना, बल्कि बड़े लाड़ से मुस्कराते हुए कहा कि ‘भारत रत्न’ का सम्मान उन्हें शहनाई वादन पर मिला है न कि लुंगी पर, क्योंकि विचारों और व्यवहार में उदारता व अपनत्व का भाव था।

प्रश्न (ख)-किसी भी कला या कार्य की सफलता में रियाज का कितना योगदान होता है, गद्यांश के आधार पर लिखिए।
उत्तरःअभ्यास के बिना कला या कार्य के स्तर और गुणवत्ता में कमी आने लगती है इसी करण बिस्मिल्ला खाँ आजीवन अभ्यास करते रहे।
व्याख्यात्मक हल:

बिस्मिल्ला खाँ शहनाई बजाने वाले एक महान कलाकार थे। वे घंटों रियाज़ करते हुए अपनी कला की उपासना करते थे। किसी भी कला या कार्य की सफलता के लिए अभ्यास होना बहुत ही आवश्यक है। अभ्यास के बिना कला या कार्य के स्तर और गुणवत्ता में कमी आने लगती है, इसी कारण बिस्मिला खाँ आजीवन अभ्यास करते रहे।

प्रश्न (ग)- ‘तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई।’ उपर्युक्त कथन में युवावर्ग के लिए क्या संदेश है? 
उत्तरः बनाव-शृंगार पर ध्यान न देकर अपने लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठता और एकाग्रता का संदेश।
व्याख्यात्मक हल:
एक दिन उनकी एक शिष्या ने डरते-डरते बाबा को टोका-उसने कहा कि उनकी सारे संगीत-जगत में भारी प्रतिष्ठा है और उन्हें ‘भारत रत्न’ जैसा सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हो चुका है। अतः फटी लुंगी पहने लोगों से मिलना उनके स्तर वाले व्यक्ति को शोभा नहीं देता। तब उन्होंने शिष्या को समझाया। इस कथन में युवावर्ग के लिए यह संदेश है कि बनाव-शृंगार पर ध्यान न देकर अपने लक्ष्य (उद्देश्य) के प्रति एकनिष्ठता और एकाग्रता रखनी चाहिए। तभी वे अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

7. काशी में जिस तरह बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, उसी तरह मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति भी एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। अभी जल्दी ही कुछ इतिहास बन चुका है। अभी आगे कुछ इतिहास बन जाएगा। फिर भी कुछ बचा है जो सिर्फ काशी में है। काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना गया है। काशी आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज़ सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होने व आपस में भाई-चारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।

प्रश्न (क)-‘‘काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की धामों पर सोती है’’-वाक्य का भेद है। 
उत्तरः संयुक्त वाक्य है।

प्रश्न (ख)-संगीत-साधना के क्षेत्र में बिस्मिल्ला खाँ की क्या विशेषता थी ? 
उत्तरः 
काशी संगीत साधना के क्षेत्र में इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। बड़ी विशेषता यह है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज़ सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है।

प्रश्न (ग)-मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर किसके पूरक माने गए हैं ? 
उत्तरः 
काशी में जिस तरह बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, उसी तरह मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति भी एक-दूसरे के पूरक रहे हैं।

10. एक कहानी यह भी – Short Questions answer

कक्षा 10  के पाठ “एक कहानी यह भी” में लेखिका “मन्नू भंडारी” ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण तथ्यों को उभारा है। लेखिका का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था परन्तु उनकी यादें अजमेर के ब्रह्मापुरी मोहल्ले के एक दो-मंज़िला मकान में पिता के बिगड़ी हुई मानसिक स्थिति से शुरू हुई। इस दस्तावेज़ की मदद से “एक कहानी यह भी” के पाठ पर आधारित लघु उत्तरीय प्रश्नों को समझा जा सकता है।  

प्रश्न 1: मन्नू भंडारी ने अपने पिताजी के इंदौर के दिनों के बारे में क्या जानकारी दी है?
उत्तरः मन्नू भंडारी ने अपने पिताजी के बारे में इंदौर के दिनों की जानकारी देते हुए कहा कि वहाँ उनकी (पिताजी की) समाज में बड़ी प्रतिष्ठा थी, उनका सम्मान था और नाम था। कांग्रेस के साथ-साथ वे समाज सुधार के कामों से भी जुड़े हुए थे। ये पिताजी की खुशहाली के दिन थे और उन दिनों उनकी दरियादिली के चर्चे भी खूब थे।

प्रश्न 2: मन्नू भंडारी ने अपनी माँ के किन गुणों की चर्चा अपनी आत्मकथा में की है? 
उत्तरः
 मन्नू भंडारी की माँ धैर्य और सहन-शक्ति में धरती से कुछ ज़्यादा ही थीं। ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि वे पिताजी की हर ज्यादती को अपना प्राप्य और बच्चों की हर ज़िद को अपना फ़र्ज़ समझकर बड़े सहज भाव से स्वीकार करती थीं। उन्होंने ज़िंदगी भर अपने लिए कुछ नहीं माँगा, कुछ नहीं चाहा, केवल दिया ही दिया। इसीलिए लेखिका के भाई-बहनों का सारा लगाव भी माँ के साथ था।

प्रश्न 3: लेखिका मन्नू भंडारी की कहानियों के अधिकांश पात्र कहाँ के थे ? इससे किस तथ्य का बोध होता है ?
उत्तरः
 लेखिका की कहानियों के अधिकांश पात्र गली-मोहल्ले के थे। इससे यह पता चलता है कि उनका अपने पड़ोसियों से आत्मीय संबंध था। उनके अनुसार, मोहल्ले में खेलता बच्चा भी घर के समान सुरक्षित महसूस करता है।


प्रश्न 4: ‘एक कहानी यह भी’ पाठ में पिताजी के शक्की स्वभाव की लेखिका पर क्या प्रतिक्रिया हुई ? बताइए।
उत्तरः पिताजी के शक्की स्वभाव का प्रभाव लेखिका पर भी पड़ा। वह खुद भी शक्की स्वभाव की हो गईं और अपनी उपलब्धियों पर विश्वास नहीं कर पाती थीं। इससे उनका आत्मविश्वास कमजोर होता गया और मानसिक पीड़ा बढ़ती रही।

प्रश्न 5: काॅलेज से पिताजी के लौटने पर लेखिका उनके किस व्यवहार को देखकर आश्चर्यचकित रह गईं थीं ? ‘एक कहानी यह भी’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः 
लेखिका को आशा के विपरीत पिताजी का व्यवहार देखकर आश्चर्य हुआ। वह डाँटने की बजाय लेखिका की प्रशंसा करने लगे। जब कॉलेज से अनुशासनहीनता की शिकायत पर पिताजी को बुलाया गया, तो वह पहले बहुत नाराज़ हुए। लेकिन प्रिंसिपल से मिलकर लौटने पर गर्व से बोले कि “मेरी लड़की जो कर रही है, वह पूरे देश की पुकार है।” यह सुनकर लेखिका हैरान रह गई।

प्रश्न 6: मन्नू भंडारी के व्यक्तित्व में उनके पिताजी का क्या प्रभाव दिखाई पड़ता है ? 
उत्तरः
 मन्नू भंडारी के व्यक्तित्व में पिताजी की अनेक अच्छाइयों और बुराइयों ने प्रवेश पा लिया था। बचपन में लेखिका दुबली और मरियल थीं, इसलिए उनके पिताजी उनकी बड़ी और गोरी बहन सुशीला की खूब प्रशंसा करते थे, जिससे लेखिका के भीतर गहराई में हीन-भावना की ग्रंथि ने जन्म ले लिया था। इसीलिए आज लेखिका में पिताजी के शक्की स्वभाव की झलक दिखलाई देती है।

प्रश्न 7: लेखिका मन्नू भंडारी का अपने पिता से वैचारिक टकराहट का सिलसिला कब से और क्यों चला ?
अथवा
लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तरः 
लेखिका मन्नू भंडारी को उनके पिता के व्यक्तित्व ने जाने-अनजाने में प्रभावित किया। पिताजी से उनकी टकराहट का सिलसिला होश संभालने के बाद ही शुरू हो गया था — कहीं कुंठाओं के रूप में, कहीं प्रतिक्रिया के रूप में, तो कहीं प्रतिच्छाया के रूप में।

प्रश्न 8: लेखिका मन्नू भंडारी और उसके भाई-बहनों का सारा लगाव किसके साथ था और क्यों ?
उत्तरः लेखिका और उनके सभी भाई-बहनों का सारा लगाव माँ के साथ था क्योंकि माँ स्वभाव से बहुत सरल और शांत थीं। उनकी त्याग और सहिष्णुता की भावना, तथा घर में होती उनकी उपेक्षा को देखकर भी सभी का लगाव माँ की ओर था।

प्रश्न 9: ‘पड़ोस कल्चर’ छूट जाने से आज की पीढ़ी को क्या हानि हुई है-‘एक कहानी यह भी’ पाठ में लिखित इस कथन को स्पष्ट करें। 
उत्तरः ‘पड़ोस कल्चर’ छूट जाने से आज की पीढ़ी संस्कारविहीन होती जा रही है। पहले पड़ोस के बच्चों को डाँटना-डपटना या स्नेह करना सभी का अधिकार होता था। परंतु अब पड़ोस कल्चर समाप्त होता जा रहा है। आपसी संबंधों में आत्मीयता और अपनापन कम होता जा रहा है।

प्रश्न 10: उस घटना का उल्लेख कीजिए जिसके बारे में ‘एक कहानी यह भी’ की लेखिका को न अपने कानों पर विश्वास हो पाया और न आँखों पर।
अथवा
वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?
उत्तरः जब लेखिका को कॉलेज में बुलाया गया और उनके पिता वहाँ से लौटकर बड़े गर्व से बोले कि “मेरी लड़की जो कर रही है, वह पूरे देश की पुकार है। इस पर कोई कैसे रोक लगा सकता है।” पिताजी का यह बदला हुआ रूप देखकर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हुआ और न ही अपने कानों पर।


प्रश्न 11: मन्नू भंडारी के लेखकीय व्यक्तित्व निर्माण में शीला अग्रवाल की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः शीला अग्रवाल लेखिका के कॉलेज में हिन्दी की अध्यापिका थीं तथा खुले विचारों वाली एक प्रबुद्ध महिला थीं। उनके संपर्क में आकर मन्नू भंडारी की समझ का दायरा विस्तृत हुआ। वे लेखिका को चुन-चुनकर अच्छी पुस्तकें पढ़ने को देतीं और उन पर लंबी चर्चाएँ भी करतीं, जिससे लेखिका की सोच विकसित हुई। इसके अतिरिक्त वे देश-दुनिया की राजनीतिक स्थिति से भी लेखिका को अवगत करातीं और अपनी जोशीली बातों से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा देतीं। लेखिका के व्यक्तित्व निर्माण में निःसंदेह शीला अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

प्रश्न 12: शीला अग्रवाल जैसी प्राध्यापिका किसी भी विद्यार्थी के जीवन को कैसे सँवार सकती हैं?
उत्तरः शीला अग्रवाल जैसी प्राध्यापिका किसी भी विद्यार्थी के जीवन को इस प्रकार सँवार सकती हैं – वे विद्यार्थी का सही मार्गदर्शन करती हैं, उसकी सोच-समझ का दायरा बढ़ाती हैं, उसकी रुचियों के विकास का अवसर देती हैं और अपने आचरण से स्वयं को एक आदर्श रूप में प्रस्तुत करती हैं। चूँकि बचपन और किशोरावस्था में विद्यार्थियों में पूर्ण समझदारी नहीं होती, इसलिए उन्हें सही दिशा देने के लिए ऐसे प्रेरणादायक शिक्षकों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 13: ‘एक कहानी यह भी’ की लेखिका मन्नू भंडारी के पिता ने रसोई को ‘भटियार खाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है? यह उनकी किस सोच का परिचायक है?
अथवा
इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है ? 

उत्तरः उन्होंने रसोई को ‘भटियारखाना’ इसलिए कहा क्योंकि वे मानते थे कि वहाँ कार्य करने से मन्नू की प्रतिभा और क्षमता नष्ट हो जाएगी और उसका व्यक्तित्व विकास नहीं हो पाएगा। यह उनके आधुनिक और प्रगतिशील सोच का परिचायक है।

प्रश्न 14: मन्नू भंडारी के पिता की कौन-कौन सी विशेषताएँ अनुकरणीय हैं? 
उत्तरः उनके पिता आधुनिक सोच वाले, समाजसेवी, देशभक्त, संवेदनशील और शिक्षा को महत्व देने वाले व्यक्ति थे। वे बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते थे।

प्रश्न 15: ‘एक कहानी यह भी’ पाठ के आधार पर मन्नू भंडारी के काॅलेज से शिकायती पत्र आने पर भी उनके पिता उनसे नाराज़ क्यों नहीं हुए ? 
उत्तरः
 शिकायती पत्र मिलने पर भी पिता ने नाराज़गी इसलिए प्रकट नहीं की क्योंकि यह कार्यवाही देश की आज़ादी के लिए थी, जिस पर उन्हें गर्व था।

प्रश्न 16: ‘मन्नू भंडारी की माँ त्याग और धैर्य की पराकष्ठा थी-फिर भी लेखिका के लिए आदर्श न बन सकी।’
उत्तरः 
लेखिका की दृष्टि में माँ का स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं था। माँ का त्याग, धैर्य और सहिष्णुता विवशता से उत्पन्न थे। लेखिका स्वयं स्वतंत्र विचारों वाली थी, अपने अधिकार और कर्तव्यों को समझने वाली। परंतु माँ पिताजी की हर ज्यादती को अपना प्राप्य समझकर सहन करती थीं। माँ की मजबूरी में लिपटा उनका त्याग और सहनशीलता कभी भी लेखिका का आदर्श नहीं बन सके।

प्रश्न 17: मन्नू भंडारी की हिन्दी अध्यापिका को काॅलेज वालों ने क्यों और क्या नोटिस दिया था ? ‘एक कहानी यह भी’ पाठ के आधार पर समझाइए।
उत्तरः मन्नू भंडारी की हिन्दी अध्यापिका शीला अग्रवाल को कॉलेज वालों ने नोटिस दिया, क्योंकि उनके अनुसार उन्होंने छात्रों को भड़काया था। इससे उन पर अनुशासन बिगाड़ने का आरोप लगा था।

प्रश्न 18: मन्नू भंडारी की ऐसी कौन सी खुशी थी जो 15 अगस्त, 1947 की खुशी में समाकर रह गई ?
उत्तरः मन्नू भंडारी और उनकी सहपाठियों पर काॅलेज का अनुशासन भंग करने का आरोप लगा, जिसके कारण थर्ड ईयर की कक्षाएँ बंद कर दी गईं और उनका काॅलेज में प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया। इसके विरोध में छात्राओं ने जमकर प्रदर्शन और हुड़दंग किया। अंततः काॅलेज प्रशासन को झुकना पड़ा और अगस्त में फिर से थर्ड ईयर की कक्षाएँ शुरू कर दी गईं। यह निर्णय लेखिका के लिए अत्यंत खुशी का कारण था, लेकिन यह खुशी 15 अगस्त, 1947 को भारत की स्वतंत्रता मिलने की अपार खुशी में समाकर रह गई।

प्रश्न 19: स्त्री होने के बाद भी लेखिका के लिए माँ का त्याग आदर्श क्यों नहीं बन पाया ? ‘एक कहानी यह भी’ के आधार पर लिखिए। 
उत्तरः माँ अनपढ़ थीं, दबे रहते थे, पिता की हर इच्छा पूरी करती थीं, उसे ही अपना धर्म मानती थीं। बच्चों की हर जिद पूरी करती थीं, अपनी स्वेच्छा कभी प्रकट नहीं की। उन्होंने केवल दिया, कुछ चाहा नहीं।

प्रश्न 20: माँ में इतनी विशेषताएँ होते हुए भी लेखिका मन्नू भंडारी अपनी माँ को अपना आदर्श क्यों नहीं बना सकीं?
उत्तरः लेखिका स्वयं स्वतंत्र विचारों वाली, अपने अधिकार और कर्तव्य को समझने वाली थीं, पर माँ पिताजी की हर ज्यादती को अपना प्राप्य समझकर सहन करती थीं। माँ की मजबूरी में लिपटा उनका त्याग और सहनशीलता कभी भी लेखिका का आदर्श नहीं बन सके।

“एक कहानी यह भी” पाठ का सार यहां देखें।
“एक कहानी यह भी” पाठ को इस वीडियो से समझें  

10. एक कहानी यह भी – Short Questions answer ( Passage)

कक्षा 10  के पाठ “एक कहानी यह भी” में लेखिका “मन्नू भंडारी” ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण तथ्यों को उभारा है। लेखिका का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव हुआ था परन्तु उनकी यादें अजमेर के ब्रह्मापुरी मोहल्ले के एक-दो मंजिला मकान में पिता के बिगड़ी हुई मनःस्थिति से शुरू हुई। इस दस्तावेज़ की मदद से “एक कहानी यह भी” के गद्यांशों पर आधारित Short Question Answers समझ सकते हैं। 

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़िए और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. इसने उन्हें यश और प्रतिष्ठा तो बहुत दी, पर अर्थ नहीं और शायद गिरती आर्थिक स्थिति ने ही उनके व्यक्तित्व के सारे सकारात्मक पहलुओं को निचोड़ना शुरू कर दिया। सिकुड़ती आर्थिक स्थिति के कारण और अधिक विस्फारित उनका अंह उन्हें इस बात तक की अनुमति नहीं देता था कि वे कम-से-कम अपने बच्चों को तो अपनी आर्थिक विवशताओं का भागीदार बनाएँ। नवाबी आदतें, अधूरी महत्त्वाकांक्षाएँ, हमेशा शीर्ष पर रहने के बाद हाशिए पर सरकते चले जाने की यातना क्रोध बनकर हमेशा माँ को कँपाती-थरथराती रहती थीं। अपनों के हाथों विश्वासघात की जाने केसी गहरी चोटें होंगी वे जिन्होंने आँख मूँदकर सबका विश्वास करने वाले पिता को बाद के दिनों में इतना शक्की बना दिया था कि जब-तब हम लोग भी उसकी चपेट में आते ही रहते।

प्रश्न (क)-मन्नू के पिता का स्वभाव शक्की क्यों हो गया था?
उत्तरः मन्नू के पिता का स्वभाव शक्की हो गया था क्योंकि उन्होंने अपनों से विश्वासघात का सामना किया था। यह उनके व्यवहार में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया और वे किसी को भरोसा करने में हिचकिचाते थे।
प्रश्न (ख)-पहले इन्दौर में उनकी आर्थिक स्थिति कैसी रही होगी? 
उत्तरः इन्दौर में लेखिका के पिता के आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी और नवाबी ठाठ-बाट थे। वे समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे।
प्रश्न (ग)-मन्नू भंडारी के पिता की गिरती आर्थिक स्थिति का उन पर क्या प्रभाव पड़ा?
गिरती आर्थिक स्थिति के कारण मन्नू भंडारी के पिता बहुत चिड़चिडे़ हो गए थे। उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक गुण समाप्त हो गए, जिसके कारण वह बहुत शक्की और क्रोधी स्वभाव के हो गए।

2. पर यह पितृ-गाथा मैं इसलिए नहीं गा रही कि मुझे उनका गौरव-गान करना है, बल्कि मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्तित्व की कौन-सी खूबी और खामियाँ मेरे व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुँथी हुई हैं या कि अनजाने-अनचाहे किए उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया। मैं काली हूँ। बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिताजी की कमजोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और उनकी प्रशंसा ने ही, क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीन-भाव की ग्रंथि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई ? आज भी परिचय करवाते समय जब कोई कुछ विशेषता लगाकर मेरी लेखकीय उपलब्धियों का जिक्र करने लगता है तो मैं संकोच से सिमट ही नहीं जाती बल्कि गड़ने को हो आती हूँ।

प्रश्न (क)-‘उपलब्धि’ का समानार्थक शब्द है।
उत्तरः ‘प्राप्ति’ समानार्थक शब्द है।

प्रश्न (ख)-लेखिका की हीन-भावना का कारण क्या था ? 
उत्तरः 
लेखिका बचपन में कमजोर थी, उनका रंग भी काला था जिस कारण उनके पिताजी उनकी गोरे रंग की खूबसूरत बहन को चाहते थे और लेखिका की उपेक्षा करते थे।

प्रश्न (ग)-लेखिका द्वारा अपने पिता के व्यक्तित्व के विषय में लिखने का क्या उद्देश्य है ? 
उत्तरः 
लेखिका यह बताना चाह रही है कि पिता के कौन-कौन से गुण और दोष उसके अन्दर समाए और कौन-सी ऐसी बातें थीं जिन्होंने उनके अन्दर हीनता की ग्रंथि को उत्पन्न किया।

3. अपनी जिंदगी खुद जीने के इस आधुनिक दबाव ने महानगरों के फ्लैट में रहने वालों को हमारे इस परंपरागत ‘पड़ोस-कल्चर’ से विच्छिन्न करके हमें कितना संकुचित, असहाय और असुरक्षित बना दिया है। मेरी कम-से-कम एक दर्जन आरंभिक कहानियों के पात्र इसी मोहल्ले के हैं जहाँ मैंने अपनी किशोरावस्था गुजार अपनी युवावस्था का आरंभ किया था। एक-दो को छोड़कर उनमें से कोई भी पात्र मेरे परिवार का नहीं है। बस इनको देखते-सुनते, इनके बीच ही मैं बड़ी हुई थी लेकिन इनकी छाप मेरे मन पर इतनी गहरी थी, इस बात का अहसास तो मुझे कहानियाँ लिखते समय हुआ। इतने वर्षों के अंतराल ने भी उनकी भाव-भंगिमा, भाषा, किसी को भी धुंधला नहीं किया था और बिना किसी विशेष प्रयास के बड़े सहज भाव से वे उतरते चले गए थे।

प्रश्न (क)-बिना किसी विशेष प्रयास के बड़े सहज भाव से वे उतरते चले गए थे। इस पंक्ति का संदर्भ स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः
 जब वे कहानियाँ-उपन्यास लिखने लगीं तो उनकी स्मृतियों के झरोखे से बचपन के साथी उनके लेखन में स्थान पाने लगे।

प्रश्न (ख)-मन्नू भंडारी अपने मोहल्ले से केसे प्रभावित हुईं?
उत्तरः बचपन में उनके मोहल्ले के लोगों का प्रभाव उनके मन पर इतना गहरा था कि सहज ही कहानी के पात्रों के रूप में उतर आए।

प्रश्न (ग)-परंपरागत पड़ोस कल्चर की कोई एक अच्छाई और कोई एक बुराई लिखिए। 

उत्तरः अच्छाई – एक दूसरे के आड़े वक्त काम आना तथा सुरक्षा की भावना। बुराई – कभी-कभी अपना निजत्व खत्म हो जाना।
अथवा
प्रश्न (क)-‘यातना’ का समानार्थक नहीं है। 
उत्तरःसंवेदना।

प्रश्न (ख)-लेखिका की माँ के प्रति उसके पिता के क्रोध का कारण क्या था ? 

उत्तरःनवाबी आदतों, अधूरी महत्वाकांक्षाओं के कारण पिताजी का क्रोध हमेशा आसमान पर चढ़ा रहता। उस क्रोध का प्रभाव लेखिका की माँ पर पड़ता।

प्रश्न (ग)-पिता के व्यक्तित्व में सकारात्मक पहलू न रहने के पीछे कारण क्या थे ? 
उत्तरःपिता जी की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उनके व्यक्तित्व के सारे सकारात्मक पहलू सिकुड़ते गए। सिकुड़ती आर्थिक स्थिति और फैलते हुए अहं भाव ने अपने बच्चों को आर्थिक विवशताओं का भागीदार नहीं बनाया।
अथवा
प्रश्न (क)- लेखिका का कौन सा प्रसिद्ध उपन्यास है ?
उत्तरः लेखिका ने ‘महाभोज’ नामक उपन्यास लिखा।

प्रश्न (ख)-‘उपन्यास में पात्र जीवित होने’ का अर्थ है।
उत्तरःलेखिका ने कम-से-कम एक दर्जन पात्र इसी मुहल्ले के बनाए हैं। पात्र के चरित्र को लेखिका ने साकार किया है।

प्रश्न (ग)-महानगरीय फ्लैट कल्चर ने जीवन को कैसा बना दिया है ? 

उत्तरः लेखिका को बड़ी शिद्दत के साथ यह महसूस होता है कि अपनी ज़िन्दगी खुद जीने के इस आधुनिक दबाव ने महानगरों के फ्लैट में रहने वाले को हमारे इस परंपरागत पड़ोस कल्चर से विच्छिन्न करके हमें कितना संकुचित, असहाय और असुरक्षित बना दिया है।

4. उस समय तक हमारे परिवार में लड़की के विवाह के लिए अनिवार्य योग्यता थी-उम्र में सोलह वर्ष और शिक्षा में मैट्रिक। सन् 44 में सुशीला ने यह योग्यता प्राप्त की और शादी करके कोलकाता चली गई। दोनों बड़े भाई भी आगे पढ़ाई के लिए बाहर चले गए। इन लोगों की छत्र-छाया के हटते ही पहली बार मुझे नए सिरे से अपने वजूद का एहसास हुआ। पिताजी का ध्यान भी पहली बार मुझ पर केन्द्रित हुआ। लड़कियों को जिस उम्र में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुघड़ गृहिणी और कुशल पाक-शास्त्री बनने के नुस्खे जुटाए जाते थे, पिताजी का आग्रह रहता था कि मैं रसोई से दूर ही रहूँ। रसोई को वे भटियारखाना कहते थे और उनके हिसाब से वहाँ रहना अपनी क्षमता और प्रतिभा को भट्टी में झोंकना था।

प्रश्न (क)- ‘‘इन लोगों की छत्रछाया हटते ही ‘कथन में’ इन लोगों’’ से तात्पर्य है।
उत्तरः इन लोगों की छत्रछाया हटते ही, कथन में ‘इन लोगों’ से तात्पर्य बड़े ‘भाई-बहनों’ से है। बड़ी बहन की शादी हो जाने पर तथा दोनों बडे़ भाइयों के बाहर चले जाने पर लेखिका को अपने वजूद का एहसास हुआ।

प्रश्न (ख)-लेखिका की बहन की शादी कब हुई थी ?
उत्तरः लेखिका की बहन सुशीला ने जब सन् 1944 में शादी की योग्यता प्राप्त कर ली तब शादी हुई और शादी करके कोलकाता चली गई।

प्रश्न (ग)-लेखिका के अनुसार लड़की की वैवाहिक योग्यता थी ?
उत्तरःलेखिका ने बताया है कि उनके परिवार की लड़कियाँ जब सोलह वर्ष की हो जाती थीं और दसवीं पास कर लेती थीं तो उस समय शादी कर दी जाती थी।

5. आए दिन विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के जमावडे़ होते थे और जमकर बहसें होती थीं। बहस करना पिता जी का प्रिय शगल था। चाय-पानी या नाश्ता देने जाती तो पिता जी मुझे भी वहीं बैठने को कहते। वे चाहते थे कि मैं भी वहीं बैठूँ, सुनूँ और जानूँ कि देश में चारों ओर क्या कुछ हो रहा है। देश में हो भी तो कितना कुछ रहा था। सन्’ 42 के आंदोलन के बाद से तो सारा देश जैसे खौल रहा था, लेकिन विभिन्न राजनैतिक पार्टियों की नीतियाँ उनके आपसी विरोध या मतभेदों की तो मुझे दूर-दूर तक कोई समझ नहीं थी। हाँ, क्रांतिकारियों और देशभक्त शहीदों के रोमानी आकर्षण, उनकी कुर्बानियों से ज़रूर मन आक्रांत रहता था।

प्रश्न (क)-देश में उस समय क्या-कुछ हो रहा था ? 
उत्तरः 
देश में उथल-पुथल मची थी। अंग्रेजी शासन का अंत निकट दिखाई दे रहा था। जगह-जगह जलसे, हड़तालें हो रही थीं और प्रभात फेरियां निकाली जा रही थीं।

प्रश्न (ख)-घर के ऐसे वातावरण का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा ? 

उत्तरः

  • उनमें देशभक्ति की भावना जागी।
  • वे राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने लगीं। 

प्रश्न (ग)-लेखिका के पिता लेखिका को घर में होने वाली बहसों में बैठने को क्यों कहते थे ?

व्याख्यात्मक हल:
घर के ऐसे वातावरण का लेखिका पर गहरा प्रभाव पड़ा उनमें देशभक्ति की भावना जागी और वे राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने लगीं।

उत्तरः देश में होने वाली राजनैतिक गतिविधियों और परिस्थितियों को जानने, समझने और परिचित होने के लिए।
व्याख्यात्मक हल:
लेखिका के पिता लेखिका को घर में होने वाली बहसों में बैठने के लिए इसलिए कहते थे, जिससे उन्हें देश में होने वाली राजनैतिक गतिविधियों और परिस्थितियों को जानने, समझने और परिचित होने का अवसर मिले।

6. जैसे ही दसवीं पास करके मैं ‘फस्र्ट इयर’ में आई, हिन्दी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय हुआ। सावित्री गर्ल्स हाईस्कूल-जहाँ मैंने ककहरा सीखा, एक साल पहले ही काॅलेज बना था और वे इसी साल नियुक्त हुई थी। उन्होंने बाकायदा साहित्य की दुनिया में प्रवेश करवाया। मात्र पढ़ने को, चुनाव करके पढ़ने में बदला, खुद चुन-चुनकर किताबें दीं ….. पढ़ी हुई किताबों पर बहसें की तो दो साल बीतते-न-बीतते साहित्य की दुनिया शरत चन्द्र, प्रेमचंद से बढ़कर जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा तक फैल गई और फिर तो फैलती ही चली गई।

प्रश्न (क)-‘बाकायदा’ शब्द का यहाँ अर्थ है। 

उत्तरः ‘बाकायदा’ शब्द का अर्थ है-पूरी तरह।

प्रश्न (ख)-लेखिका के लिए साहित्य की दुनिया का विस्तार कैसे हुआ ? 
उत्तरः 
लेखिका की साहित्य की दुनिया शरतचन्द्र, प्रेमचन्द से बढ़कर जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा तक फैल गई और फिर तो फैलती ही चली गई।

प्रश्न (ग)-बाकायदा साहित्य की दुनिया में किसमें प्रवेश कराया ? 

उत्तरः ‘फस्र्ट ईयर’ में आने पर हिन्दी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय हुआ। उन्होंने ही लेखिका के मात्र पढ़ने को, चुनाव करके पढ़ने में बदला, खुद चुन-चुनकर किताबें दीं। तब उन्होंने बाकायदा साहित्य की दुनिया में प्रवेश कराया।

7. प्रभात फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस भाषण हर शहर का चरित्र था और पूरे दमखम और जोश-खरोश के साथ इन सबसे जुड़ना हर युवा का उन्माद। मैं भी युवा थी और शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने रगों में बहते खून को लावे में बदल दिया था। स्थिति यह हुई कि एक बवंडर शहर में मचा हुआ था और एक घर में। पिताजी की आजादी की सीमा यही तक थी कि उनकी उपस्थिति में घर में आए लोगों के बीच उठूँ – बैठूँ, जानूँ – समझूँ। हाथ उठा-उठाकर नारे लगाती, हड़तालें करवाती, लड़कों के साथ शहर की सड़कें नापती लड़की को अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था तो किसी की दी हुई आजादी के दायरे में चलना मेरे लिए। जब रगों में लहू की जगह लावा बहता हो तो सारे निषेध, सारी वर्जनाएँ और सारा भय कैसे ध्वस्त हो जाता है, यह तभी जाना।

प्रश्न (क)-शीला अग्रवाल की बातों का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तरः शीला अग्रवाल की जोशीली बातों से लेखिका नारे लगाने और हड़ताल कराने के लिए सड़कों पर उतर आई।

प्रश्न (ख)-पिताजी के लिए क्या बर्दाशत करना मुश्किल हो रहा था ?
उत्तरः पिताजी की आज़ादी की सीमा यहीं तक थी कि उनकी उपस्थिति में आए लोगों के बीच उठूँ, बैठूँ-समझू। हाथ उठा-उठाकर नारे लगवाना, लड़कों के साथ शहर की सड़कें नापना सारी आधुनिकता के बावजूद बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था।

प्रश्न (ग)-शहर में कौन-सा बवंडर मचा हुआ था ? 
उत्तरः 
देश की आज़ादी के लिए पूरे दमखम और जोश-खरोश के साथ प्रभात फेरियों, हड़तालों और जुलूस-भाषणों आदि से जुड़ना हर युवा का उन्माद था। स्थिति यह हुई कि एक बवंडर शहर में और एक लेखिका के घर में मचा हुआ था।

8. हाथ उठा-उठा कर नारे लगाती, हड़तालें करवाती, लड़कों के साथ शहर नापती लड़की को अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था तो किसी की दी हुई आज़ादी के दायरे में रहना मेरे लिए। जब रगों में लहू की जगह लावा बहता हो तो सारे निषेध, सारी वर्जनाएँ और सारा भय कैसे ध्वस्त हो जाता है, यह तभी जाना।

प्रश्न (क)-‘रगों में लहू बहना’ का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरःलेखिका के खून में उबाल था, जोश था। इसलिए उसने पिता की वर्जनाओं की परवाह किये बिना आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

प्रश्न (ख)-लेखिका के लिए स्वयं क्या करना कठिन था? क्यों ?
उत्तरःलेखिका के लिए किसी की दी हुई आज़ादी के दायरे में रहना मुश्किल हो रहा था। इस के लिए सारे निषेध, वर्जनाएँ ध्वस्त हो चुकी थीं। बंधनों में रह पाना लेखिका के लिए मुश्किल हो रहा था। इसलिए वह आन्दोलनों में भाग लेने लगीं।

प्रश्न (ग)-‘उनके लिए’ सर्वनाम किसके लिए आया है ? उन्हें क्या कठिनाई थी ? 
उत्तरः 
‘उनके लिए’ सर्वनाम पिता जी के लिए आया है। स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदार बनना तथा घर के बाहर चलने वाले क्रिया-कलापों को पिताजी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे।

9. यश-कामना बल्कि कहूँ कि यश-लिप्सा, पिताजी की सबसे बड़ी दुर्बलता थी और उनके जीवन की धुरी थी यह सिद्धांत कि व्यक्ति को कुछ विशिष्ट बनकर जीना चाहिए ….. कुछ ऐसे काम करने चाहिए कि समाज में उसका नाम हो सम्मान हो प्रतिष्ठा हो, वर्चस्व हो। इसके चलते ही मैं दो-एक बार उनके कोप से बच गई थी। एक बार काॅलेज से प्रिंसिपल का पत्र आया कि पिताजी आकर मिलें और बताएँ कि मेरी गतिविधियों के कारण मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए ? पत्र पढ़ते ही पिता जी आग-बबूला। ”यह लड़की मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रखेगी ….. पता नह° क्या-क्या सुनना पड़ेगा वहाँ जाकर। चार बच्चे पहले भी पढ़े, किसी ने ये दिन नहीं दिखाया।“ गुस्से से भन्नाते हुए ही वे गए थे। लौटकर क्या कहर बरपेगा, इसका अनुमान था, सो मैं पड़ोस की एक मित्र के यहाँ जाकर बैठ गई। माँ को कह दिया कि लौटकर बहुत कुछ गुबार निकल जाए, तब बुलाना।

प्रश्न (क)-लेखिका पड़ोस की एक मित्र के घर जाकर क्यों बैठ गई ?
उत्तरःमालूम था कि पिताजी काॅलेज से लौटकर आयेंगे, क्रोध में भरे होंगे इसलिए डर के कारण वहाँ जाकर बैठ गई।

प्रश्न (ख)-”यह लड़की मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रखेगी।“ पिताजी ने यह वाक्य क्यों कहा 
उत्तरः एक बार काॅलेज के प्रिंसिपल का पत्र लेखिका पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के सम्बन्ध में आया। पत्र पढ़ते ही पिताजी आग-बबूला हो गये। मन में सोचने लगे कि इस लड़की के कारण न जाने मुझे वहाँ जाकर क्या-क्या सुनना पडे़गा।

प्रश्न (ग)-लेखिका के पिताजी के जीवन का सिद्धन्त क्या था ? 
उत्तरः 
यश-लिप्सा पिता जी की सबसे बड़ी दुर्बलता थी और उनके जीवन की यह धुरी थी कि व्यक्ति को कुछ विशिष्ट बनकर जीना चाहिए ………… कुछ ऐसे काम करने चाहिए जिससे समाज में मान-सम्मान, प्रतिष्ठा का कारण हो।

10. शाम को अजमेर का पूरा विद्यार्थी-वर्ग चौपड़ (मुख्य बाजार का चैराहा) पर इकट्ठा हुआ और फिर हुई भाषणबाजी। इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्र ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी, ‘‘अरे उस मन्नू की तो मत मारी गई है पर भंडारी जी आपको क्या हुआ ? ठीक है, आपने लड़कियों को आज़ादी दी, पर देखते आप, जाने कैसे-कैसे उलटे-सीधे लड़कों के साथ हड़तालें करवाती, हुड़दंग मचाती फिर रही है वह। हमारे-आपके घरों की लड़कियों को शोभा देता है यह सब ? कोई मान-मर्यादा, इज्ज़त-आबरू का ख्याल भी रह गया है आपको या नहीं ?’’

प्रश्न (क)-लेखिका के पिताजी के मित्र कैसे विचारों वाले थे ?
उत्तरः पिताजी के मित्र दकियानूसी विचारों वाले थे।

प्रश्न (ख)-विद्यार्थी वर्ग ने भाषण के लिए कौन-सा स्थान चुना ? 
उत्तरः 
आजाद-हिन्द फ़ौज के मुकद्दमे के सिलसिले में शाम को अजमेर का पूरा विद्यार्थी वर्ग चौपड़ (मुख्य बाजार का चैराहा) पर इकट्ठा हुआ और फिर हुई भाषणबाजी।

प्रश्न (ग)-घटना का सम्बन्ध किस दौर से है ? 

उत्तरःआज़ाद हिन्द फौज़ के मुकदमे का सिलसिला था। सभी काॅलेज, स्कूलों, दुकानों के लिए हड़ताल का आह्वान था। जो नहीं कर रहे थे, छात्रों का समूह वहाँ जा-जाकर करवा रहा था।

11. एक घटना और। आज़ाद हिंद फ़ौज के मुकदमे का सिलसिला था। सभी काॅलेजों, स्कूलों, दुकानों के लिए हड़ताल का आह्नान था। जो-जो नहीं कर रहे थे, छात्रों का एक बहुत बड़ा समूह वहाँ जा-जाकर हड़ताल करवा रहा था। शाम को अजमेर का पूरा विद्यार्थी – वर्ग चौपड़ (मुख्य बाज़ार का चैराहा) पर इकट्ठा हुआ और फिर हुई भाषणबाज़ी। इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्र ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी, ”अरे उस मन्नू की तो मत मारी गई है पर भंडारी जी आपको क्या हुआ ? ठीक है, आपने लड़कियों को आज़ादी दी, पर देखते आप, जाने कैसे-कैसे उल्टे-सीधे लड़कों के साथ हड़तालें करवाती, हुड़दंग मचाती फिर रही है वह। हमारे-आपके घरों की लड़कियों को शोभा देता है यह सब ? कोई मान-मर्यादा, इज़्ज़त-आबरू का खयाल भी रह गया है आपको या नहीं ?“ वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे, ”बस, अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू-थू करके चले जाएँ। बंद करो अब इस मन्नू का घर से बाहर निकलना।“

प्रश्न (क)-पिता जी ने क्या निर्णय लिया ? 
उत्तरः लेखिका को घर से न निकलने देने का।
व्याख्यात्मक हल:
जब लेखिका के पिता भंडारी जी के मित्र लेखिका के विरु( भड़काकर चले गये और वे सारे दिन भभकते रहे, तब पिता ने निर्णय लिया कि ‘बंद करो अब इस मन्नू का घर से बाहर निकलना’।

प्रश्न (ख)-‘मन्नू की तो मत मारी गई है पर भंडारी जी आपको क्या हुआ’ कथन से किसने कान भरे ? 
उत्तरःदकियानूसी मित्र ने।
व्याख्यात्मक हल:
आज़ाद हिन्द फौज के मुकदमे के सिलसिले में हड़ताल का आह्नान होने पर अजमेर का पूरा विद्यार्थी वर्ग चौपड़ (मुख्य बाजार का चैराहा) पर इकट्ठा हुआ, वहाँ दिए गए भाषण के खिलाफ पिताजी के किसी दकियानूसी मित्र ने उन्हें लेखिका के भाषण के विरुद्ध भड़का दिया।

प्रश्न (ग)-स्कूल-काॅलेज बंद करवाने का मुख्य कारण क्या था ?
उत्तरःआज़ाद-हिंद फ़ौज का मुकदमा।
व्याख्यात्मक हल:
लेखिका ने सन् 1946-47 के उन दिनों को याद किया है जब देश में स्वाधीनता आन्दोलन जोरों पर था, जिसके कारण प्रभात फेरियाँ, जुलूस आदि निकला करते थे हड़तालें और आन्दोलन हुआ करते थे तथा अनेक लोग, युवक-युवतियाँ बहुत जोश के साथ उनमें भाग लेते थे। स्कूल-काॅलेज बंद करवाने का यही मुख्य कारण था।

12. आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो इतना तो समझ में आता ही है क्या तो उस समय मेरी उम्र थी और क्या मेरा भाषण रहा होगा। यह तो डाॅक्टर साहब का स्नेह था जो उनके मुँह से प्रशंसा बनकर बह रहा था यह भी हो सकता है कि आज से पचास साल पहले अजमेर जैसे शहर में चारों ओर से उमड़ती भीड़ के बीच एक लड़की का बिना किसी संकोच और झिझक के यों धुँआधार बोलते चले जाना ही उसके मूल में रहा हो। पर पिताजी! कितनी तरह के अंतर्विरोधों के बीच जीते थे वे! एक ओर ‘विशिष्ट’ बनने और बनाने की प्रबल लालसा तो दूसरी ओर अपनी सामाजिक छवि के प्रति भी उतनी ही सजगता।

प्रश्न (क)-‘क्या तो मेरी उम्र थी और क्या मेरा भाषण रहा होगा।’ वाक्य किस का प्रकार है। 
उत्तरः संयुक्त वाक्य।

प्रश्न (ख)-लेखिका के पिताजी के अन्तर्विरोध क्या थे ?
उत्तरः पिता जी का जीवन द्वन्द्वग्रस्त था। वे सामाजिक छवि बनाए रखने के साथ-साथ समाज में अपना विशेष स्थान भी बनाए रखना चाहते थे। किन्तु पुत्री विशिष्ट बन गई थी, पर मर्यादा को ताक पर रखकर।

प्रश्न (ग)-डाक्टर साहब लेखिका के प्रशंसक क्यों थे ? 
उत्तरः 
अजमेर के सम्माननीय डाॅक्टर अंबालाल जी बैठे लेखिका की तारीफ कर रहे थे। साथ ही पिताजी को बधाई देते हुए यह बता रहे थे कि उन्होंने लेखिका का भाषण न सुनकर बहुत कुछ खो दिया है।

“एक कहानी यह भी” पाठ का सार यहां देखें।
“एक कहानी यह भी” पाठ को इस वीडियो से समझें 

9. लखनवी अंदाज़ – Short Questions answer ( Passage)

गद्यांशों पर आधारित अतिलघु/लघु-उत्तरीय प्रश्न 

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए.

1. गाड़ी छूट रही थी। सेकण्ड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर जरा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिन्तन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सूझ की चिन्ता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों। नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्म-सम्मान में आँखें चुरा लीं। खाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। सम्भव है, नवाब साहब ने बिलकुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफ़ायत के विचार से सेकण्ड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफ़ेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफ़र करता देखे।

प्रश्न (क).लेखक सेकंड क्लास के डिब्बे में क्यों जा रहे थे?
उत्तरः 
लेखक सेकंड क्लास के डिब्बे में इसलिए जा रहे थे, क्योंकि सेकंड क्लास के डिब्बे में लेखक को एकांत मिल सकता था।

प्रश्न (ख).लेखक ने नवाब साहब के असुविधा और संकोच के कारणों का क्या अनुमान लगाया?
उत्तरः 
लेखक ने नवाब साहब के असुविधा और संकोच के कारणों का यह अनुमान लगाया कि नवाब साहब ने अकेले यात्रा करने के उद्देश्य से सेकंड क्लास का टिकट खरीदा होगा।

प्रश्न (ग).डिब्बे में चढ़ने पर लेखक ने नवाब साहब के मूड को देखकर क्या किया?
उत्तरः 
डिब्बे में चढ़ने पर लेखक ने नवाब साहब के उपेक्षा भाव को देखकर उसने भी उन्हें अनदेखा कर दिया।

2. ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफ़ायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफर करता देखे। …. अकेले सफर का वक्त काटने के लिये ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएँ? हम कनखियों से नवाब साहब की ओर देख रहे थे। नवाब साहब कुछ देर गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर स्थिति पर गौर करते रहे।
‘ओह’, नवाब साहब ने सहसा हमें संबोधित किया, ‘आदाब-अर्ज़, जनाब, खीरे का शौक फरमाएँगे?

प्रश्न (क). सहसा नवाब साहब ने लेखक से क्या कहा और उनके इस कथन में आप उनके किस भाव का अनुभव करते हैं?
उत्तरः
 आदाब अर्ज़ (नमस्कार), जनाब खीरे का शौक फरमाएँगे, शराफ़त तथा तहज़ीब से युक्त बात, सभ्यतापूर्ण बर्ताव।
व्याख्यात्मक हल:
नवाब साहब ने लेखक को आदाब-अर्ज़ कर खीरा खाने के लिये कहा। इस कथन से नवाब साहब की शराफत और तहज़ीब का पता चलता है।

प्रश्न (ख).गद्यांश में वर्णित लेखक के स्वभाव की विशेषता का उल्लेख कीजिये। उसके अनुसार नवाब साहब ने खीरे क्यों खरीदे होंगे ?
उत्तरः कल्पनाशील, विचारवान, समय काटने के उद्देश्य से, अकेले सफर करना चाहते थे।
व्याख्यात्मक हल:
लेखक एक कल्पनाशील व विचारवान व्यक्ति है। वह अनुमान लगाता है कि नवाब साहब ने अकेले सफर का वक्त काटने के लिये ही खीरे खरीदे होंगे।

प्रश्न (ग). लेखक-अपनी आदत के अनुसार नवाब साहब के विषय में क्या सोचने लगा ?
उत्तरः
 कल्पना करने की आदत, नवाब साहब असुविधा और संकोच का कारण खोजने लगे। किफ़ायत के लिये सेकंड क्लास का टिकट, समय-काटने के लिये खीरे, खरीदना।
व्याख्यात्मक हल:
खाली समय में लेखक को कल्पना करने की आदत थी। वह नवाब साहब की असुविधा व संकोच के कारण का अनुमान लगाते हुए सोचता है कि किफ़ायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीदा होगा।

3. नवाब साहब ने फिर एक पल खिड़की से बाहर देखकर गौर किया और दृढ़ निश्चय से खीरों के नीचे रखा, तौलिया झाड़कर सामने बिछा लिया। सीट के नीचे से लोटा उठाकर दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिये से पोंछ लिया। जेब से चाकू निकाला। दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला। फिर खीरों को बहुत एहतियात से छीलकर फाँकों को करीने से तौलिये पर सजाते गये। लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं। ग्राहक के लिये जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाजिर कर देते हैं।

प्रश्न (क).‘एहतियात’ शब्द का क्या अभिप्राय है ?
उत्तरः
 ‘एहतियात’ शब्द उर्दू भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है.सावधानी।

प्रश्न (ख).लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं?
उत्तरः
 लेखक ने ऐसा इसलिये कहा है, क्योंकि लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाजिर कर देते हैं।

प्रश्न (ग).खीरों को काटने से पहले नवाब साहब ने क्या किया ?
उत्तरः 
खीरों को काटने से पहले नवाब साहब ने खीरों को धोकर तौलिये से पोंछा फिर दोनों के सिर काटकर, उनका झाग निकाला।

4. लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं। ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाज़िर कर देते हैं। नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फाँकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरक दी। उनकी प्रत्येक भाव-भंगिमा और जबड़ों के स्फुरण से स्पष्ट था कि उस प्रक्रिया में उनका मुख खीरे के रसास्वादन की कल्पना से प्लावित हो रहा था।
हम कनखियों से देखकर सोच रहे थे, मियाँ रईस बनते हैं, लेकिन लोगों की नजरों से बच सकने के ख्याल में अपनी असलियत पर उतर आए हैं।
नवाब साहब ने फिर एक बार हमारी ओर देख लिया, ‘वल्लाह, शौक कीजिए, लखनऊ का बालम खीरा है।’
नमक-मिर्च छिड़क दिए जाने से ताजे़ खीरे की पनियाती फाँकें देखकर पानी मुँह में ज़रूर आ रहा था, लेकिन इनकार कर चुके थे।
आत्मसम्मान निबाहना ही उचित समझा, उत्तर दिया, ‘शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही, मेदा भी जरा कमज़ोर है, किबला शौक फरमाएँ।’

प्रश्न (क). कैसे कहा जा सकता है कि लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका भी जानते हैं?
उत्तरः
 लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं, क्योंकि वे ग्राहकों को जीरा मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया खीरों के साथ देते हैं।

प्रश्न (ख). नवाब साहब की भाव-भंगिमा देखकर लेखक के मन में क्या विचार आया? 
उत्तरः
 नवाब साहब की भाव-भंगिमा देखकर लेखक के मन में यह विचार आया कि नवाब साहब का मुँह खीरे के स्वाद की कल्पना से ही भर गया है।

प्रश्न (ग).लेखक ने खीरा खाने से इनकार क्यों कर दिया?
उत्तरः लेखक एक बार खीरे के लिए इनकार कर चुका था इसलिए आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उसने खीरा खाने से इनकार कर दिया।

5. नमक-मिर्च छिड़क दिये जाने से खीरे की पनियाती फाँकें देखकर मुँह में पानी जरूर आ रहा था, लेकिन इंकार कर चुके थे। आत्म-सम्मान निबाहना ही उचित समझा। उत्तर दिया, “शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही है, मेदा भी जरा कमजोर है, किबला शौक फरमाएँ।” नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निःश्वास लिया। खीरे की एक फाँक उठाकर होठों तक ले गये। फाँक को सूँघा। स्वाद के आनन्द में पलकें मुंँद गई। मुँह में भर आए पानी का घूँट गले से उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गये।

प्रश्न (क).लेखक के मुँह में पानी क्यों आ रहा था ?
उत्तरः नमक-मिर्च छिड़क दिये जाने से खीरे की पनियाती फाँकें देखकर लेखक के मुँह में पानी आ रहा था।

प्रश्न (ख).नवाब साहब ने खीरे का रसास्वादन करने से पूर्व क्या किया तथा रसास्वादन कैसे किया ?
उत्तरः नवाब साहब ने खीरे की चमकती फाँक को उठाकर होठों तक ले गये। फाँक को सूँघ कर वासना से रसास्वादन किया।

प्रश्न (ग). लेखक ने नवाब साहब को क्या जवाब दिया ? इसका क्या कारण था ?
उत्तरः
 लेखक ने उत्तर दिया कि इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही है, मेदा भी कमज़ोर है। इसका कारण यह था कि लेखक पहले ही मना कर चुका था इसलिये आत्म-सम्मान निबाहना उचित था।

6. नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा-यह है खानदानी तहज़ीब, नफ़ासत और नज़ाकत! हम गौर कर रहे थे, खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, नफीस या एब्स्ट्रैक्ट तरीका ज़रूर कहा जा सकता है, परन्तु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती है?
नवाब साहब की ओर से भरे पेट के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देखकर कह दिया, ‘खीरा लज़ीज होता है, लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है’ ज्ञान-चक्षु खुल गए। पहचाना.ये हैं नई कहानी के लेखक!

प्रश्न (क). ‘लज़ीज’ शब्द का क्या अर्थ है? 

उत्तरः ‘लज़ीज’ का अर्थ है-स्वादिष्ट।

प्रश्न (ख). नवाब साहब के खीरे के इस्तेमाल के तरीके को क्या कहा जा सकता है और इसमें क्या कमी थी? 
उत्तरः 
नवाब साहब के खीरे के इस्तेमाल के तरीके को सूक्ष्म, नफ़ीस या एब्सट्रैक्ट अवश्य कहा जा सकता है पर ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति नहीं हो सकती।

प्रश्न (ग). खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से नवाब साहब थककर क्यों लेट गए? 
उत्तरः
 खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से नवाब साहब अपनी नवाबी का प्रदर्शन करने के लिए थककर लेट गए जैसे उन्होंने कोई बहुत मेहनत का काम किया हो।

8. बालगोबिन भगत – Short Questions answer ( passage)

कक्षा 10  के पाठ “बालगोबिन भगत” में  लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी  ने बालगोबिन भगत के बारे में बताया है। बालगोबिन भगत कबीर के पक्के भक्त थे। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और हमेशा खरा व्यवहार करते थे। आइये इस डॉक्यूमेंट में पाठ के कुछ गद्यांशों पर आधारित अतिलघु/लघु उत्तरीय प्रश्न देखें।

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़िए और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
1. ‘बालगोबिन भगत’ मँझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे। साठ से उपर के ही होंगे। बाल पक गए थे। लम्बी दाढ़ी या जटाजूट तो नहीं रखते थे, किन्तु हमेशा उनका चेहरा सफेद बालों से ही जगमग किए रहता। कपड़े बिलकुल कम पहनते। कमर में एक लंगोटी-मात्र और सिर में कबीरपंथियों की-सी कनफटी टोपी। जब जाड़ा आता, एक काली कमली उपर से ओढ़े रहते। मस्तक पर हमेशा चमकता हुआ रामानंदी चंदन, जो नाक के एक छोर से ही, औरतों के टीके की तरह शुरू होता। गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला बाँधे रहते।

प्रश्न (क)-बालगोबिन भगत की आयु कितनी थी ? 
उत्तरः बालगोबिन भगत की आयु साठ वर्ष से अधिक रही होगी। उनके सफेद बाल उनकी वृद्धावस्था का प्रमाण थे।

प्रश्न (ख)-‘उनका चेहरा सफेद बालों से ही जगमग किए रहता’-से लेखक का क्या आशय है?
उत्तरः 
इस पंक्ति में लेखक ने बताया है कि बालगोबिन भगत के बाल सफेद हो गए थे। वह साधुओं जैसे लम्बे बाल तो नहीं रखते थे किन्तु उनके सफेद बाल उनके चेहरे की आभा को बढ़ाते थे। सफेद बालों के कारण उनका मुख अत्यन्त प्रभावशाली लगता था।

प्रश्न (ग)-बालगोबिन कौन थे, वह कैसे वस्त्र पहनते थे? 
उत्तरः बालगोबिन मध्यम लम्बाई वाले अत्यन्त गोरे ईश्वर-भक्ति में विश्वास रखने वाले आदमी थे। वह केवल एक लँगोटी ही पहनते थे। सर्दियों में शरीर पर एक छोटा-हल्का काले रंग का कम्बल ओढ़ लेते थे।

2. खेतीबारी करते, परिवार रखते भी, बालगोबिन भगत साधु थे-साधु की सब परिभाषाओं में खरे उतरने वाले। कबीर को ‘साहब’ मानते थे, उन्हीं के गीतों को गाते, उन्हीं के आदेशों पर चलते। कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते। किसी से भी दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते, न किसी से खामखाह झगड़ा मोल लेते। किसी की चीज नहीं छूते, न बिना पूछे व्यवहार में लाते। इस नियम को कभी-कभी इतनी बारीकी तक ले जाते कि लोगों को कुतूहल होता! -कभी वह दूसरे के खेत में शौच के लिये भी नहीं बैठते!

प्रश्न (क)-गृहस्थ होते हुये भी भगत को साधु क्यों कहा जाता था ? 
उत्तरः गृहस्थ होते हुये भी भगत को उनके चरित्र और व्यवहार के कारण साधु कहा जाता था। भगत कबीर को साहब मानकर उनकी शिक्षाओं का पालन करते-कभी झूठ नहीं बोलते थे, खरा व्यवहार करते थे, किसी से झगड़ा नहीं करते थे और बिना पूछे दूसरों की चीजो का प्रयोग नहीं करते थे। साधु के समान आचरण करने के कारण वे गृहस्थ होते हुए भी साधु थे।

प्रश्न (ख) यह किस आधार पर कहा जा सकता है कि बालगोबिन भगत कबीर को ‘साहब’ मानते थे ?
उत्तरः 
बालगोबिन भगत के जीवन एवं आचरण के आधार पर कहा जा सकता है कि वे कबीर को ‘साहब’ अर्थात ईश्वर मानते थे। वे कबीर के गीतों को गाते, कबीर के आदेशों और शिक्षाओं का व्यावहारिक रूप से पालन करते थे।

प्रश्न (ग)-भगत के किस व्यवहार पर लोगों को हैरानी होती थी ?
उत्तरः भगत किसी की चीज को नहीं छूते थे। वे बिना पूछे किसी की चीज का प्रयोग नहीं करते थे। इस नियम का कभी-कभी इतनी बारीकी से पालन करते कि बिना पूछे दूसरे के खेत में शौच के लिये भी नहीं बैठते थे। इस प्रकार के नियम-पालन पर लोगों को हैरानी होती थी।

3. आषाढ़ की रिमझिम है। समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ा है। कहीं हल चल रहे हैं कहीं रोपनी हो रही है। धान के पानी भरे खेतों में बच्चे उछल रहे हैं। औरतें कलेवा लेकर मेंड़ पर बैठी हैं। आसमान बादलों से घिराऋ धूप का नाम नहीं। ठंडी पुरवाई चल रही। ऐसे ही समय आपके कानों में एक स्वर-तरंग झंकार-सी कर उठी। यह क्या है-यह कौन है! यह पूछना न पड़ेगा। बालगोबिन भगत समूचा शरीर कीचड़ में लिथड़े, अपने खेत में रोपनी कर रहे हैं। उनकी अँगुली एक-एक धान के पौधे को, पंक्तिबद्ध, खेत में बिठा रही है। उनका कंठ एक-एक शब्द को संगीत के जीने पर चढ़ाकर कुछ को ऊपर, स्वर्ग की ओर भेज रहा है और कुछ को इस पृथ्वी की मिट्टी पर खड़े लोगों के कानों की ओर! बच्चे खेलते हुए झूम उठते हैं, मेंड़ पर खड़ी औरतों के होंठ काँप उठते हैं वे गुनगुनाने लगती हैं हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते हैं रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगती हैं! बालगोबिन भगत का यह संगीत है या जाूद!

प्रश्न (क)-आषाढ़ की रिमझिम में समूचा गाँव खेतों में क्यों उतर पड़ा ?
उत्तरः आषाढ़ की रिमझिम में समूचा गाँव धान की रोपाई करने के लिए खेतों में उतर पड़ा।

प्रश्न (ख)-‘एक स्वर तरंग झंकार-सी कर उठी’ का तात्पर्य क्या है ?
उत्तरः इसका आशय यह है बालगोबिन भगत की मधुर संगीत लहरी की आवाज हवा में फैल गई।

प्रश्न (ग)-साधु-सा जीवन व्यतीत करने वाले भगतजी खेत में क्या कर रहे थे ? 
उत्तरःसाधु-सा जीवन व्यतीत करने वाले भगत जी उँगली से धान के एक-एक पौधे को खेत में पंक्तिबद्ध रूप में बैठा रहे थे।

4. गर्मियों में उनकी ‘संझा’ कितनी उमस भरी शाम को न शीतल करती! अपने घर के आँगन में आसन जमा बैठते। गाँव के उनके कुछ प्रेमी भी जुट जाते। खँजड़ियों और करतालों की भरमार हो जाती। एक पद बालगोबिन भगत कह जाते, उनकी प्रेमी-मंडली उसे दुहराती-तिहराती। धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होने लगता-एक निश्चित ताल, एक निश्चित गति से। उस ताल-स्वर के चढ़ाव के साथ श्रोताओं के मन भी ऊपर उठने लगते। धीरे-धीरे मन-तन पर हावी हो जाता। होते-होते, एक क्षण ऐसा आता कि बीच में खँजड़ी लिए बालगोबिन भगत नाच रहे हैं और उनके साथ ही सबके तन और मन नृत्यशील हो उठे हैं। सारा आँगन नृत्य और संगीत से ओतप्रोत है!

प्रश्न (क)-उनके गायन तथा वादन का श्रोताओं पर कैसा प्रभाव पड़ता था और वे बालगोबिन भगत के साथ क्या करने लगते थे?
उत्तरः श्रोताओं के मन, गायन-वादन के अनुसार ही ऊपर उठते, और वे आनंद लेते, नृत्य करने लगते।

व्याख्यात्मक हल:
श्रोताओं के मन, गायन-वादन के अनुसार ही ऊपर उठते। वे संगीत का आनंद लेते हुए मग्न हो जाते और बालगोबिन के साथ ही नृत्य करने लगते।

प्रश्न (ख)-संगीत के कार्यक्रम में भगत और उनकी मंडली किन-किन वाद्यों को बजाया करती थी और उनके वादन-गायन की गति कैसी होती थी? 
उत्तरः खँजड़ी, करतालें, लेकर अनेक लोग जुटते। धीरे-धीरे स्वर ऊँचा उठता, निश्चित गति से निश्चित ताल तक। श्रोताओं के मन भी ताल के अनुसार ऊपर उठते। 

व्याख्यात्मक हल:
संगीत के कार्यक्रम में भगत और उनकी मंडली खॅंजड़ी और करताल बजाया करती। उनका स्वर धीरे-धीरे एक निश्चित ताल तक ऊपर उठता। संगीत के स्वरों के साथ ही श्रोताओं के मन भी ताल के साथ ऊपर उठते थे।

प्रश्न (ग)-बालगोबिन भगत की संझा उमस भरी शाम को किस तरह शीतल करती थी ? उस समय उनके साथी लोग कौन होते थे ?
उत्तरः खँजड़ियों, करतालों, ध्वनि से युक्त स्वर लहरी से गाँव के प्रेमीजन अपने-अपने वाद्य लेकर आ जाते।

व्याख्यात्मक हल:
बालगोबिन भगत की संझा उमस भरी शाम को खँजड़ियों, करतालों, ध्वनि से युक्त संगीत की स्वर लहरी से शीतल करती थी। गाँव के प्रेमीजन अपने-अपने वाद्य लेकर आ जाते।

5. बालगोबिन भगत की संगीत-साधना का चरम उत्कर्ष उस दिन देखा गया, जिस दिन उनका बेटा मरा। इकलौता बेटा था वह! कुछ सुस्त और बोदा-सा था, किन्तु इसी कारण बालगोबिन भगत उसे और भी मानते। उनकी समझ में ऐसे आदमियों पर ही ज्यादा नजर रखनी चाहिए या प्यार करना चाहिए, क्योंकि ये निगरानी और मुहब्बत के ज्यादा हकदार होते हैं। बड़ी साध से उसकी शादी कराई थी, पतोहू बड़ी ही सुभग और सुशील मिली थी। घर की पूरी प्रबन्धिका बनकर भगत को बहुत कुछ दुनियादारी से निवृत्त कर दिया था उसने। उनका बेटा बीमार है, इसकी खबर रखने की लोगों को कहाँ फुर्सत! किन्तु मौत तो अपनी ओर सबका ध्यान खींचकर ही रहती है।

प्रश्न (क)-बालगोबिन भगत के अनुसार कैसे लोग निगरानी और मुहब्बत के ज़्यादा हकदार होते हैं ?
उत्तरः बालगोबिन भगत के अनुसार जो लोग शारीरिक रूप से अक्षम और मानसिक रूप से शिथिल होते हैं उनका अधिक ध्यान रखा जाना चाहिए।

प्रश्न (ख)-बीमारी और मृत्यु की खबर में क्या अन्तर देखा जाता है ? 
उत्तरः किसी के बीमार होने का समाचार पाकर सामान्य लोग अधिक ध्यान नहीं देते। केवल बीमार व्यक्ति के सुपरिचित तथा संबंधी ही देखने पहुँचते हैं, लेकिन मृत्यु की खबर सभी का ध्यान आकर्षित कर लेती है। परिचित-अपरिचित सभी लोग संवेदना प्रकट करने पहुँच जाते हैं।

प्रश्न (ग)-बालगोबिन भगत की संगीत साधना का उत्कर्ष किस दिन देखा गया ?
उत्तरः बालगोबिन भगत ने संगीत को ईश्वर की कृपा-प्राप्ति का साधन बनाया था। पुत्र की मृत्यु जैसे-हृदय-विदारक अवसर पर भी बालगोबिन का गायन बंद नहीं हुआ। यह उनकी संगीतरूपी साधना का सच्चा और श्रेष्टतम स्वरूप था।

6. बालगोबिन भगत गाए जा रहे हैं! हाँ गाते-गाते कभी-कभी पतोहू के नजदीक भी जाते और उसे रोने के बदले उत्सव मनाने को कहते। आत्मा, परमात्मा के पास चली गई, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली, भला इससे बढ़कर आनन्द की कौन-सी बात ? मैं कभी-कभी सोचता, यह पागल तो नहीं हो गए। किन्तु नहीं, वह जो कुछ कह रहे थे उसमें उनका विश्वास बोल रहा था-वह चरम विश्वास जो हमेशा ही मृत्यु पर विजयी होता आया है।
बेटे के क्रिया-कर्म में तूल नहीं कियाऋ पतोहू से ही आग दिलाई उसकी। किन्तु ज्यों ही श्राद्ध की अवधि पूरी हो गई, पतोहू के भाई को बुलाकर उसके साथ कर दिया, यह आदेश देते हुए कि इसकी दूसरी शादी कर देना। इधर पतोहू रो-रोकर कहती-मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में कौन आपके लिए भोजन बनाएगा, बीमार पड़े तो कौन एक चुल्लू पानी भी देगा ? मैं पैर पड़ती हूँ, मुझे अपने चरणों से अलग नहीं कीजिए।
प्रश्न (क)- भगत जी पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को क्यों कह रहे थे ?
उत्तरः भगत जी पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को इसलिए कह रहे थे, क्योंकि वे मृत्यु को आत्मा-परमात्मा का मिलन मानते थे।

प्रश्न (ख)- भगत जी पुत्रवधू को अपने पास क्यों नहीं रखना चाहते थे ?
उत्तरः भगत जी पुत्रवधू को अपने पास इसलिए नहीं रखना चाहते थे, क्योंकि वह उसका पुनर्विवाह कर सुखी देखना चाहते थे।

प्रश्न (ग)- श्राद्ध की अवधि पूर्ण होने पर भगत ने क्या किया ?
उत्तरः श्राद्ध की अवधि पूर्ण होने पर भगत ने दूसरी शादी के लिए पुत्रवधू को उसके भाई के साथ भेज दिया।

7. बेटे के क्रिया-कर्म में तूल नहीं कियाऋ पतोहू से ही आग दिलाई उसकी। किन्तु ज्योंही श्राद्ध की अवधि पूरी हो गई, पतोहू के भाई को बुलाकर उसके साथ कर दिया, यह आदेश देते हुए कि इसकी दूसरी शादी कर देना। इधर पतोहू रो-रोकर कहती-मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में कौन आपके लिए भोजन बनाएगा, बीमार पड़े तो कौन एक चुल्लू पानी भी देगा ? मैं पैर पड़ती हूँ, मुझे अपने चरणों से अलग नहीं कीजिए। लेकिन भगत का निर्णय अटल था। तू जा, नहीं तो मैं ही इस घर को छोड़कर चल दूँगा-यह थी उनकी आखिरी दलील और इस दलील के आगे बेचारी की क्या चलती ?

प्रश्न (क)-बालगोबिन भगत द्वारा पुत्र का दाह-संस्कार पतोहू से ही कराने तथा विधवा बहू की दूसरी शादी रचाने के निर्देश में उनकी किस विचारधारा का परिचय मिलता है? 
उत्तरः बालगोबिन भगत द्वारा पुत्र का दाह-संस्कार पतोहू से ही कराने तथा विधवा बहू की दूसरी शादी रचाने के निर्देशों के साथ भाई के साथ भेजने में उनका रूढ़िवादिता का विरोध करते हुए प्रगतिशील विचारधारा का परिचय मिलता है।

प्रश्न (ख)-पुत्रवधू ने बालगोबिन भगत से घर छोड़ने से पहले क्या प्रार्थना की थी तथा भगत जी ने उसे क्या कहकर अनसुना कर दिया था?
उत्तरः बालगोबिन भगत की पुत्रवधू ने रो-रोकर उन्हें अकेले न छोड़ने का आग्रह किया। उनकी सेवा करते रहने के लिए वहीं रहने की प्रार्थना की, पर भगत जी ने उसकी न सुनी तथा उस स्थिति में घर छोड़ देने की धमकी दे डाली जिससे वह विवश हो गई।

प्रश्न (ग)-बालगोबिन भगत ने पुत्र की मृत्यु के बाद अपनी पुत्रवधू को कहाँ भेज दिया और किस उद्देश्य से? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
 बालगोबिन भगत ने पुत्र की मृत्यु के बाद अपनी पुत्रवधू को उसके भाई को बुलाकर उसकी दूसरी शादी कर देने के उद्देश्य से उसके साथ भेज दिया था।
अथवा
प्रश्न (क)-भगत जी के समक्ष पतोहू की विवशता का कारण बताइए।
उत्तरः भगत जी के समक्ष पतोहू की विवशता का कारण भगत जी द्वारा घर से चले जाने की धमकी देना थी।

प्रश्न (ख)-बालगोबिन भगत की पतोहू ने भाई के साथ उनसे घर से न जाने के लिए क्या प्रार्थना की थी? इस प्रसंग में बहू के व्यवहार को आप कैसा मानते हैं ?
उत्तरः बालगोबिन भगत की पतोहू ने भाई के साथ उनके घर से न जाने उनकी सेवा करने के लिए घर में रहने की प्रार्थना करते हुए कहा कि उनके लिए भोजन कौन बनाएगा तथा बीमारी की दशा में उनकी देखभाल कौन करेगा? इस प्रसंग में बहू का व्यवहार उत्तम तथा सभी प्रकार से प्रशंसनीय है।

प्रश्न (ग)-श्राद्ध की अवधि पूरी होने पर बालगोबिन भगत ने पतोहू के साथ कैसा व्यवहार किया? आप इसे कहाँ तक उचित मानते हैं?
उत्तरः श्राद्ध की अवधि पूरी होने पर बालगोबिन भगत ने पतोहू के साथ सर्वथा उचित व्यवहार किया। उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाकर पुत्रवधू को उसके साथ भेजकर दूसरी शादी कर देने का आदेश दिया।

8. बालगोबिन भगत की मौत उन्हीं के अनुरूप हुई। वह हर वर्ष गंगा-स्नान करने जाते। स्नान पर उतनी आस्था नहीं रखते, जितना संत-समागम और लोक-दर्शन पर। पैदल ही जाते। करीब तीस कोस पर गंगा थी। साधु को संबल लेने का क्या हक? और, गृहस्थ किसी से भिक्षा क्यों माँगे? अतः घर से खाकर चलते, तो फिर घर पर ही लौटकर खाते। रास्ते भर खँजड़ी बजाते, गाते जहाँ प्यास लगती, पानी पी लेते। चार-पाँच दिन आने-जाने में लगते, किंतु इस लंबे उपवास में भी वही मस्ती! अब बुढ़ापा आ गया था, किंतु टेक वही जवानी वाली। इस बार लौटे तो तबीयत कुछ सुस्त थी। खाने-पीने के बाद भी तबीयत नहीं सुधरी, थोड़ा बुखार आने लगा।
किंतु नेम-व्रत तो छोड़ने वाले नहीं थे। वहीं दोनों जून गीत, स्नानध्यान, खेतीबारी देखना। दिन-दिन छीजने लगे। लोगों ने नहाने-धोने से मना किया, आराम करने को कहा। किंतु, हँसकर टाल देते रहे। उस दिन भी संध्या में गीत गाए, कितु मालूम होता जैसे तागा टूट गया हो, माला का एक-एक दाना बिखरा हुआ। भोर में लोगों ने गीत नहीं सुना, जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे सिर्फ उनका पंजर पड़ा है!

प्रश्न (क)- भगत के गंगा-स्नान का मुख्य उद्देश्य क्या होता था?
उत्तरः भगत प्रतिवर्ष गंगा स्नान करने जाते थे। इस स्नान का मुख्य उद्देश्य था- संत समागम और लोक-दर्शन। अर्थात् संतों के साथ सत्संग और लोगों से मिलने की प्रबल इच्छा।

प्रश्न (ख)- गंगा-स्नान को आते-जाते वे किसी से न सहारा लेते थे और न किसी से कुछ माँगते थे। इससे उनके किस गुण की अभिव्यक्ति होती है?
उत्तरः भगत गंगा स्नान के लिए आते-जाते न कुछ माँगते थे और न किसी से सहारा लेते थे। इससे उनके स्वाभिमानी और स्वावलंबी होने का पता चलता है।

प्रश्न (ग)- इस बार का गंगा-स्नान पिछले गंगा-स्नानों से किस प्रकार भिन्न था? 
उत्तरः भगत को गंगा-स्नान के लिए आने-जाने में चार-पाँच दिन लगते थे, पर उनके स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं होता था। किंतु इस बार जब भगत गंगा स्नान से लौटे तो उनकी तबीयत खराब रहने लगी।

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