7. नेताजी का चश्मा – Short Questions answer ( Passage)

प्रश्न 1: हालदार साहब जिस कस्बे से गुजरा करते थे उसका संक्षेप में वर्णन कीजिए। 
उत्तरः
 ‘नेताजी का चश्मा’ कहानी में उल्लिखित कस्बा ज़्यादा बड़ा नहीं था। वहाँ थोड़े-बहुत पक्के मकान, एक छोटा बाज़ार, एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का छोटा-सा कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक नगरपालिका थी। कस्बे के चौराहे पर नेताजी की मूर्ति प्रतिष्ठापित थी।


प्रश्न 2: कस्बों, शहरों, महानगरों के चैराहों पर किसी-न-किसी क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति की मूर्ति लगाने का प्रचलन-सा हो गया है। इस तरह की मूर्ति लगाने के क्या उद्देश्य हो सकते हैं?
उत्तरः
 देश की एकता, अखण्डता, स्वतंत्रता आदि के लिए कार्य करने वाले महापुरुषों के प्रति आदर व कृतज्ञता प्रकट करना। देश की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता को बढ़ाने वाले तथा सामाजिक बुराइयों को मिटाने के लिए अपना सारा जीवन लगाने वालों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना।

प्रश्न 3: हालदार साहब को नेताजी की मूर्ति को देखकर कैसा अनुभव हुआ था और क्यों? पहली बार में पान के पैसे चुकाकर जब वे चलने लगे तो वे किसके प्रति नतमस्तक हुए थे?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति पर असली चश्मा देखकर हालदार साहब को बड़ा विचित्र और कौतुकपूर्ण अनुभव हुआ। उन्हें नेताजी का मजाक उड़ाना अच्छा नहीं लगा। जब उन्हें चश्मा लगाने वाले की देशभक्ति का पता चला, तो वे कैप्टन की भावना के प्रति नतमस्तक हो गए।

प्रश्न 4: नेताजी की प्रतिमा की आँखों पर कैसा चश्मा लगा था ? प्रतिमा वाले पत्थर का चश्मा न लगा होने के संभावित कारणों पर पठित पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः नेताजी की प्रतिमा की आँखों पर काँच का असली चश्मा लगा था। प्रतिमा पर पत्थर का चश्मा न होने के संभावित कारण ये हो सकते हैं — नगरपालिका को देश के मूर्तिकारों की जानकारी नहीं थी, अच्छी मूर्ति के लिए बजट की कमी थी, शासनावधि समाप्त हो रही थी, इसलिए जल्दीबाज़ी में स्थानीय स्कूल मास्टर मोतीलाल (मान लें) को ही मूर्ति बनाने का काम सौंपा गया होगा। उन्होंने एक महीने में मूर्ति पूरी करने का विश्वास दिलाया होगा। इसी जल्दी में पत्थर का चश्मा नहीं बन पाया होगा।


प्रश्न 5: नेताजी की मूर्ति में कौन-सी कमी थी और क्यों?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति में चश्मे की कमी थी। मूर्ति बनाते समय शायद असमंजस की स्थिति रही होगी कि पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए। इस कारण, या चश्मा बनाते समय किसी बारीकी के कारण वह टूट गया होगा, अथवा उसे अलग से फिट किया गया होगा जो कि बाद में निकल गया होगा।

प्रश्न 6: हालदार साहब हमेशा चैराहे पर रुककर नेताजी की मूर्ति को क्यों निहारते थे ?
उत्तरः हालदार साहब के मन में देशभक्ति और नेताजी की प्रतिमा के प्रति लगाव था। वे प्रतिमा पर चश्मा देखने की उत्सुकता के कारण हमेशा चौराहे पर रुककर नेताजी की मूर्ति को निहारा करते थे।

प्रश्न 7: ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ में वर्णित नेताजी की मूर्ति को चश्मा पहनाने वाला व्यक्ति किस नाम से पुकारा जाता था? उसका पेशा और आर्थिक स्थिति कैसी थी? उसके व्यक्तित्व के किस गुण ने आपको प्रभावित किया है?
उत्तरः ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ में नेताजी की मूर्ति को चश्मा पहनाने वाला व्यक्ति कैप्टन नाम से पुकारा जाता था। उसका पेशा फेरी लगाकर चश्मा बेचना था और उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत साधारण थी। उसकी देशभक्ति की भावना ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है।

प्रश्न 8: हालदार साहब को मूर्ति में कौन-सी कमी खटकती थी ?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति की आँखों पर चश्मा नहीं था। यद्यपि इस कमी को असली चश्मा पहनाकर ढकने का प्रयास किया गया था, लेकिन हालदार साहब का मानना था कि संगमरमर की मूर्ति पर चश्मा भी संगमरमर का ही होना चाहिए था। यही कमी उन्हें खटकती थी।

प्रश्न 9: कैप्टन (चश्मेवाला) मूर्ति का चश्मा बार-बार क्यों बदल देता था ? ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तरः
 कैप्टन नेताजी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए अपने चश्मों में से एक फ्रेम मूर्ति को पहना देता था। जब कोई ग्राहक वैसा ही चश्मा माँगता, तो वह मूर्ति से चश्मा उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर दूसरा चश्मा लगा देता था।

प्रश्न 10: कैप्टन को साक्षात् देखने से पहले हालदार साहब के मानस पटल पर कैप्टन का कैसा चित्र रहा होगा ?
उत्तरः वह सोचते होंगे कि कैप्टन अवश्य ही अत्यंत बलिष्ठ और गठीले शरीर वाला होगा। वह देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत तथा दूसरों को देशभक्ति की सीख देने वाला कोई भूतपूर्व सिपाही होगा।

प्रश्न 11: हालदार साहब के विचार से देश को स्वतंत्र कराने वाले लोग कैसे थे और उनका उपहास करने वाले आज के देशवासी कैसे हो गए हैं? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः हालदार साहब के अनुसार, देश को स्वतंत्र कराने वाले लोग त्यागी, बलिदानी और देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। उन्होंने अपने जीवन की सारी खुशियाँ, युवावस्था और घर-गृहस्थी देश के लिए कुर्बान कर दी। वे निस्वार्थ भाव से देश की सेवा में लगे रहे।
इसके विपरीत, आज के देशवासी स्वार्थी, भौतिकवादी और अवसरवादी हो गए हैं। वे देशहित की भावना से विमुख हो चुके हैं और देशभक्तों के बलिदान का उपहास करते हैं। उदाहरणस्वरूप, नेताजी जैसी महान विभूतियों की मूर्तियों पर ध्यान न देकर लोग केवल दिखावे के लिए देशभक्ति जताते हैं।

प्रश्न 12: देशप्रेम की भावना किसी भी व्यक्ति में हो सकती है उसके लिए हथियार उठाना जरूरी नहीं है ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः चश्मेवाला कभी सेनानी नहीं था, वह गरीब और अपाहिज था, लेकिन उसके मन में देशभक्ति की असीम भावना थी। नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति को देखकर उसका दुःखी होना और अपने पैसे से नया चश्मा लगवाना, उसकी गहरी देशभक्ति को दर्शाता है।

प्रश्न 13: हालदार साहब ने नेताजी की मूर्ति को देखकर उनके असली चश्मे के विषय में मूर्तिकार की सोच के विषय में क्या-क्या अनुमान लगाए थे ? स्पष्ट रूप से समझाइए। 
उत्तरः हालदार साहब ने अनुमान लगाया कि शायद मूर्तिकार यह तय नहीं कर पाया होगा कि पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए, या उसने काँच वाला चश्मा बनाने की कोशिश की होगी लेकिन असफल रहा होगा। यह भी हो सकता है कि बारीकी में चश्मा टूट गया हो या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया गया हो और वह गिर गया हो।

प्रश्न 14: पानवाला एक हँसोड़ स्वभाव वाला व्यक्ति है, परन्तु उसके हृदय में संवेदना भी है। इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तरः पानवाला एक हँसोड़ स्वभाव वाला व्यक्ति है, परन्तु उसके हृदय में संवेदना भी है क्योंकि हालदार साहब ने जब मूर्ति के चेहरे पर कोई चश्मा नहीं देखा तो उसके बारे में पानवाले से पूछा। इस पर उसने उदास होकर अपनी आँखें पोंछते हुए कैप्टन की मृत्यु की सूचना दी। सामान्यतः पानवाला गंभीर बात भी हँसकर बताता था क्योंकि वह हँसकर निकटता का भाव प्रकट करता था।

प्रश्न 15: हालदार साहब को पानवाले की कौन-सी बात अच्छी नहीं लगी और क्यों ? 
उत्तरः कैप्टन के बारे में पूछने पर उसने कहा कि “कैप्टन तो लँगड़ा है, वह भला फौज में क्या जाएगा! वह तो पागल है!” पानवाले द्वारा एक देशभक्त का मज़ाक उड़ाया जाना हालदार साहब को अच्छा नहीं लगा क्योंकि कैप्टन देशभक्तों का सम्मान करता था।

प्रश्न 16: हालदार साहब के द्वारा कैप्टन के बारे में पूछने पर पानवाला अपनी आँखें क्यों पोंछने लगा?
उत्तरः
 पानवाला बताना चाहता था कि कैप्टन की मृत्यु हो गई है। अतः उसके प्रति सहानुभूति के कारण उसकी आँखों में आँसू आ गए, जिन्हें वह पोंछने लगा।

प्रश्न 17: हालदार साहब एक भावुक देशप्रेमी इंसान हैं- उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।
उत्तरः हालदार साहब के मन में देशभक्तों के लिए अत्यंत सम्मान था। वे कस्बे में लगी नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाने वाले कैप्टन जैसे साधारण व्यक्ति की देशभक्ति की भावना को श्रद्धा से देखते थे। साथ ही, देशभक्तों का मज़ाक उड़ाने वालों की आलोचना करते थे और इससे दुःखी हो जाते थे। इससे सिद्ध होता है कि वे एक भावुक देशप्रेमी इंसान हैं।

प्रश्न 18: ‘‘क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी -ञजदगी सब कुछ होम कर देने वालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढती है।’’ हालदार साहब के इस कथन को स्पष्ट करते हुए बताइए कि उनके इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
अथवा
आशय स्पष्ट कीजिए-
”बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-जिंदगी सब कुछ होम कर देने वालें पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढती है।“
उत्तरः आशय यह है कि उस कौम या समाज का भविष्य अंधकारमय होता है, जो अपने देश के लिए सब कुछ बलिदान कर देने वाले लोगों का उपहास उड़ाता है और खुद अवसर आने पर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बिकने को तैयार रहता है। हालदार साहब के इस कथन में आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता और समाज की चिंता झलकती है। मैं उनके इस विचार से पूरी तरह सहमत हूँ क्योंकि देशभक्ति का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सच्ची शक्ति होती है।

प्रश्न 19: ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ में वर्णित कैप्टन के चरित्र पर प्रकाश डालिए तथा बताइए कि उसके व्यक्तित्व की किस विशेषता ने आपको प्रभावित किया है?
उत्तरः कैप्टन एक गंभीर, देशभक्त, परिश्रमी और त्यागी व्यक्ति था। वह शारीरिक रूप से विकलांग (‘लंगड़ा’) होने पर भी हर समय सक्रिय और कर्मठ था। उसने नेताजी की मूर्ति पर अपने हाथों से सरकंडे का चश्मा बनाकर लगाया, जिससे उसकी देशभक्ति और सेवा-भावना झलकती है। उसकी सादगी, समर्पण और देश के प्रति निष्ठा ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया।

प्रश्न 20: हालदार साहब की आँखें भर आने का क्या कारण रहा होगा ? ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
अथवा
मूर्ति पर लगे सरकंडे के चश्मे ने हालदार साहब को द्रवित क्यों कर दिया? 
अथवा
हालदार साहब इतनी सी बात पर भावुक क्यों हो गए?
उत्तरः नेताजी की मूर्ति पर एक साधारण से सरकंडे के चश्मे को देखकर हालदार साहब भावुक हो गए। उन्हें यह देखकर आशा की किरण दिखाई दी कि देशभक्ति की भावना अभी भी जीवित है। यह छोटी-सी बात उनके मन को छू गई, इसलिए उनकी आँखें भर आईं।

नेताजी का चश्मा पाठ को इस वीडियो की मदद से पूरा समझें।

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6. संगतकार – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
निम्नांकित काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1. निम्नलिखित काव्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीनकाल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपनी ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है

जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था

प्रश्न (क)- ‘वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीनकाल से’ का भाव स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
पुराने समय से ही संगतकार मुख्य गायक के स्वर में अपनी गूँज मिलाता रहा है।
प्रश्न (ख)- मुख्य गायक के अंतरे की जटिल-तान में खो जाने पर संगतकार क्या करता है 
उत्तर: 
मुख्य गायक के अंतरा की जटिल तान जब खो जाती हो तब संगतकार ही अपने स्वर से उसे साधता (संचालता) है।

प्रश्न (ग)- संगतकार, मुख्य गायक को क्या याद दिलाता है? 
उत्तर:
 संगतकार मुख्य गायक को जैसे याद दिलाता है उसका बचपन जब वह नौसिखिया था।

2. निम्नलिखित काव्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
तार सप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाँढस बँधाता
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ

प्रश्न (क)- ‘बैठने लगता है उसका गला’ का क्या आशय है? 

उत्तर: जब मुख्य गायक का गला कमजोर पड़ने लगता है।

प्रश्न (ख)- मुख्य गायक को ढाँढस कौन बँधाता है और क्यों? 
उत्तर: 
मुख्य गायक को संगतकार का सुर ही ढाँढस बँधाता है।

प्रश्न (ग)- तार सप्तक क्या है? 

उत्तर: तार सप्तक संगीत में सात सुरों को कहते है।

3. मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीनकाल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है।

प्रश्न (क)- ‘मुख्य गायक की गरज में वह अपनी गूँज मिलाता आया है’: आशय स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
 मुख्य गायक का स्वर चट्टान जैसा भारी था।

प्रश्न (ख)- संगतकार मुख्य गायक को उसका बचपन किस प्रकार याद दिलाता है ? 
उत्तर:
 संगतकार गायक को अपने सुर से भटकने नहीं देता और भटकाव की स्थिति होने पर मुख्य गायक को सही सुर पर लाकर उसे उसके बचपन की याद दिला देता है जब वह गीत गाते-गाते प्रायः सुर से भटक जाया करता था।

प्रश्न (ग)- ‘जटिल तानों के जंगल’ से कवि का क्या आशय है ? 

उत्तर: ‘जटिल तानों के जंगल’ से कवि का आशय है कि मुख्य गायक कभी-कभी किसी गीत के चरण को गाते हुए उसके अलापों और कठिन तानों में खो जाता है, सुर से भटक जाता है।

अथवा

प्रश्न (क)- मुख्य गायक का साथ देने वाला कौन हो सकता है? 

उत्तर: मुख्य गायक का साथ देने वाला संगतकार उसका छोटा भाई है। शिष्य हो सकता है।

प्रश्न (ख)- किसी भी क्षेत्र में मुख्य व्यक्ति की भूमिका कब सार्थक होती है और क्यों? 
उत्तर: 
जब गायक की आवाज़ संतोषी तानों के अतंर में खो जाता है तब संगतकार की भूमिका प्रारम्भ होती है।

प्रश्न (ग)- उपर्युक्त पंक्तियों में किस प्राचीन परंपरा की ओर संकेत किया गया है? वर्तमान में यह परंपरा किस रूप में मिलती है? 
उत्तर:
 संगतकार अपनी आवाज़ की गूँज को मुख्य गायक के साथ मिलाकर उसकी आवाज़ को बल प्रदान करते हैं और ‘स्थायी’ (मूलपंक्ति) को खोने नहीं देते। जब मुख्य गायक का गला बैठने लगता है और आवाज टूटने लगती है तब वे अपनी आवाज़ मिलाकर मुख्य गायक को सहयोग देते हैं।

4. गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है।
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था।

प्रश्न (क)- संगतकार की भूमिका का महत्व कब सामने आता है ? 
उत्तर:
 मुख्य गायक की कमज़ोर पड़ती आवाज़ को संगतकार बिना जताए सहारा देता है।

प्रश्न (ख)- यहाँ नौसिखिया किसे कहा गया है और किस संदर्भ में ? 

उत्तर:

  • मुख्य गायक को
  • जब मुख्य गायक सुरों से दूर चला जाता है। 

प्रश्न (ग)- भटके स्वर को संगतकार कब सँभालता है और मुख्य गायक पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ? 

उत्तर:

  • जब मुख्य गायक जटिल तानों में खो कर सुर से भटक जाता है, तब संगतकार स्थायी को सँभाले रहता है।
  • मुख्य गायक की आवाज़ को सहारा मिलता है और उसे अकेलेपन का अहसास नहीं होता।

5. तार सप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज में राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाँढस बँधाता

कहीं  से चला आता है संगतकार का स्वर

कभी-कभी वह यों ही देता है उसका साथ

यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं  है

और यह कि फिर से गाया जा सकता है

गाया जा चुका राग।

प्रश्न (क)- ‘तार सप्तक’ से कवि का क्या अभिप्राय है ? 
उत्तर: ‘तार सप्तक’ का अर्थ है सरगम के ऊँचे स्वर ;किसी गीत को ऊँची आवाज में गाया जानाद्ध।

प्रश्न (ख)- कवि संगतकार के किस व्यवहार को उसकी मनुष्यता मानता है और क्यों ? 
उत्तर: संगतकार में भी मुख्य गायक की तरह गायन-कौशल होता है, वह भी मुख्य गायक की तरह गा सकता है, परंतु गायक का साथ देने पर वह इस बात का विशेष ध्यान रखता है कि उसका सुर मुख्य गायक के सुर से नीचा ही रहे। ऊँचा गाने की प्रतिभा होने पर भी वह मुख्य गायक के स्वर से अपना स्वर नीचा रखकर उसका सम्मान करता है, इसे संगतकार की कमजोरी नहीं कहा जा सकता।

यह तो उसकी मनुष्यता है कि वह मुख्य गायक का सम्मान करता है तथा उसके सुर से ऊँचा नहीं गाता।

प्रश्न (ग)- संगतकार मुख्य गायक की सहायता कैसे करता है ? 

उत्तर: संगतकार मुख्य गायक की बहुत सहायता करता है। सुर से भटकने पर उसे पुनः मूल सुर पर ले आता है। उसका गला बैठने पर जब मुख्य गायक की आवाज़ जवाब दे जाती है तथा वह निराश हो जाता है, तो संगतकार उसे निराशा से उबार लेता है, उसके सुर में अपना सुर मिलाकर उसे पुनः गाने की प्रेरणा देता है।

6.कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज में जो हिचक साफ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

प्रश्न (क)- ‘यों ही’ में निहित अर्थ को स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
‘यों ही’ का अर्थ है:बिना किसी प्रयोजन के।

प्रश्न (ख)- संसार में इस प्रकार की ‘मनुष्यता’ की क्या उपयोगिता है ? 
उत्तर: 
संसार में तमाम लोग ऐसे हैं जो अवसर का लाभ उठाते हैं पर संगतकार ऐसा नहीं करता, यह उसकी मनुष्यता है। संसार में ऐसी मनुष्यता दूसरों को प्रेरणा देती है।

प्रश्न (ग)- आवाज़ की हिचक को विफलता क्यों नहीं कहा जा सकता ? 
उत्तर:
 संगतकार की आवाज़ में जो हिचक है वह इसलिए कि वह स्वयं को महत्त्व न देकर मुख्य गायक को ही महत्त्व दिलाना चाहता है अतः यह उसकी विफलता नहीं अपितु मनुष्यता है।लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संगतकार कौन होता है और क्या करता है? 
उत्तर:
 संगतकार मुख्य गायक का सहायक कलाकार होता है। प्राचीनकाल से उसका यही काम है कि वह अपनी आवाज़ की गूँज को मुख्य गायक की गरजदार आवाज़ में मिलाकर उसकी आवाज़ को बल प्रदान करें। उसकी आवाज की गूँज मुख्य गायक के स्वर को कोमलता प्रदान करती है।

प्रश्न 2. जब मुख्य गायक की ताने जटिल हो जाती है और वह उनमें खोने लगता है। तब संगतकार उसे किससे भटकने नहीं देता?
उत्तर:
 जब मुख्य गायक-स्थायी से गीत आरंभ करता है, तो अंतरा के शुरू होते ही ताने जटिल हो जाती हैं, आपस में उलझ जाती हैं तब तानों की जटिलता में मुख्य गायक खोने लगता है, तो संगतकार उसे सुर से भटकने नहीं देता उसे सहारा देता है।

प्रश्न 3. संगतकार मुख्य गायक को किसकी याद दिलाता हैं की टेक गाते हुए कैसे प्रतीत होते है?
उत्तर:
 संगतकार, मुख्य गायक को उसका बचपन याद दिलाता है, जब वह नौसिखिया था अर्थात् जब उसने संगीत सीखना आरम्भ किया था। संगतकार गीत की टेक को गाते हुए ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे मुख्य गायक के द्वारा रास्ते में छोड़े हुए सामान को समेटते हुए वह आगे बढ़ रहा हो या मुख्य गायक को संगतकार उसके बचपन की याद दिलाता हैं।

प्रश्न 4. मुख्य गायक के साथ संगतकार की क्या भूमिका होती है ? 
उत्तर:
 संगतकार दूसरों को शीर्ष पर पहुँचाने का कार्य करते हैं। संगतकार के बिना मुख्य कलाकार असफल ही रहता है। संगतकार के माध्यम से कवि, नाटक, संगीत, फिल्म तथा नृत्य आदि कलाओं में काम करने वाले सहायक कलाकारों तथा किसी भी क्षेत्र में कार्यरत सहायक कर्मचारियों की ओर संकेत करता है। ये अपने मानवतावादी दृष्टिकोण से मुख्य व्यक्ति की भूमिका को विशिष्ट बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

प्रश्न 5. ‘संगतकार’ कविता के आधार पर बताइए कि संगतकार किन-किन रूपों में मुख्य गायक-गायिकाओं की मदद करते हैं ?
अथवा
संगतकार किन-किन रूपों में मुख्य गायक-गायिकाओं की मदद करते हैं ? 
उत्तर:
 संगतकार कभी वादक के रूप में कभी स्वर लहरियों को सँभालने में तो कभी मुख्य गायक के थके स्वर को विश्राम देने के लिए संगतकार मदद करता है।

प्रश्न 6. मुख्य गायक के साथ संगतकार का होना क्यों आवश्यक है ? 
उत्तर: 
मुख्य गायक को गायन के सुरताल के लिए वाद्य यंत्रों की आवश्यकता होती है। गायक को थकान के समय सुर की आरोह-अवरोह इत्यादि के लिए संगतकार की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 7. ‘संगतकार’ की आवाज को कमज़ोर, काँपती हुई आवाज़ क्यों कहा गया है ? 
उत्तर:
 मुख्य गायक गायन कला में निपुण । मुख्य गायक के समक्ष अपनी लघुता का बोध ही उसमें हीन-भावना ले आता है तभी संगतकार की आवाज कमज़ोर और काँपती। 

प्रश्न 8. ‘संगतकार’ कविता में कवि ने अंतरे को ‘जटिल तान का जंगल’ क्यों कहा है ? गायक उसमें कैसे खो जाता है ?
उत्तर:
 स्थायी से गीत आरम्भ, अंतरा शुरू होते ही सुर कठिन होने लगते हैं, तानें जटिल हो जाती हैं, आपस में उलझ जाती हैं। जब जटिल तानों में मुख्य गायक खोने लगता है तब संगतकार सहारा देता है। 

प्रश्न 9. गायक सरगम को लाँघकर कहाँ चला जाता है ? वह वापस कैसे आता है ? 
उत्तर:
 गायक अपने सरगम को लाँघकर अनहद में चला जाता है, एक अलग लोक में पहुँच जाता है। संगतकार स्थायी टेक के साथ उसे सहारा देकर उसका साथ देता है और तब मुख्य गायक वापस लौट आता है। 

प्रश्न 10. संगतकार की आवाज़ में एक हिचक-सी क्यों प्रतीत होती है?
उत्तर:
 संगतकार निस्वार्थ रूप से स्वयं को पृष्ठभूमि में रखकर मुख्य गायक की सफलता में योगदान देता है। उसे अपने योगदान का श्रेय लेने की कोई इच्छा नहीं होती। इसी कारण स्वयं को पीछे रखने की कोशिश में उसकी आवाज़ में हिचक-सी प्रतीत होती है।
व्याख्यात्मक हल:
संगतकार अपनी आवाज़ को पूरा खोलकर नहीं गाता, क्योंकि वह यह नहीं चाहता कि मुख्य गायक के सामने उसकी आवाज़ तेज हो जाये। उसे मालूम है कि यदि उसकी आवाज़ तेज होगी तो मुख्य गायक की आवाज़ का प्रभाव कम हो जायेगा। मुख्य गायक के प्रति उसके मन में श्रद्धा भी है, इसलिए उसकी आवाज़ में एक हिचक-सी प्रतीत होती है।

प्रश्न 11. संगतकार द्वारा अपने स्वर को उळँचा न उठाने की कोशिश को कवि ने मनुष्यता क्यों रहा है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
संगतकार मुख्य गायक को प्रतिष्ठित करता है और स्वयं पृष्ठभूमि में रहता है उसका यह कार्य उसकी मनुष्यता का परिचायक है क्योंकि वह अपने साथी मुख्य गायक को ही प्रकाश में लाना चाहता है, स्वयं को नहीं अन्यथा उसका कार्य धोखा, छल, कपट कहा जाना जो इंसानियत के विरूद्ध है।

प्रश्न 12. सांसारिक जीवन में संगतकार जैसे व्यक्ति की सार्थकता पर विचार कीजिए। 
अथवा
संगतकार जैसे व्यक्ति की जीवन में क्या उपयोगिता होती है, स्पष्ट रूप से समझाइए।
उत्तर:
 संगतकार जैसे व्यक्ति स्वयं पृष्ठभूमि में रहकर मुख्य गायक को प्रसिद्धि यश दिलवाते हैं। ऐसे व्यक्ति गायन का श्रेय (या श्रम का श्रेय) स्वयं नहीं लेते अपितु जिनका वह साथ देते हैं, उन्हें ही प्रकाश में लाना उनका ध्येय होता है अतः ऐसे समर्पित व्यक्ति जीवन में बहुत उपयोगी माने जाते हैं।

प्रश्न 13. मुख्य गायक की सफलता का श्रेय संगतकार को न दिया जाना समाज की किस प्रवृत्ति का परिचायक है ? इस प्रवृत्ति से क्या हानियाँ हैं ? 
उत्तर:
 मुख्य गायक की सफलता का श्रेय संगतकार को न दिया जाना समाज की स्वार्थी प्रवृत्ति का परिचायक है। संगतकार कभी आगे नहीं  बढ़ पाता। उसकी कला दूसरे के नाम से जानी जाती है। मन में हीन भावना जाग सकती है।

प्रश्न 14. ‘संगतकार’ कविता में ‘नौसिखिया’ से क्या अभिप्राय है ? उसका गला कब रुँध जाता है ? 
उत्तर:
 नौसिखिया से आशय है- गायन को नया-नया सीखने वाला। जब उत्साह गिरने का प्रभाव उस पर पड़ता है तो उसका गला बंद हो जाता है।
व्याख्यात्मक हल:
सहयोगी गायक गीत की टेक को गाते हुए ऐसे लगते हैं जैसे गायक के द्वारा रास्ते में छोड़े हुए सामान को समेटते हुए आगे बढ़ रहे हों। या फिर ऐसे लगता है जैसे संगतकार मुख्य गायक को बचपन की वह याद दिलाते हैं जब उसने संगीत सीखना आरम्भ किया था।

प्रश्न 15. संगतकार जैसे व्यक्ति सर्वगुण-सम्पन्न होकर भी समाज की दृष्टि में महत्त्वपूर्ण क्यों नहीं माने जाते ? 2
उत्तर:
 सर्वगुण सम्पन्न होने पर भी मुख्य गायक के पीछे रहकर सहयोगी बने रहते हैं। प्रिय कलाकार की सफलता में अपनी सफलता देखते हैं। वे भी अत्यधिक प्रतिभाशाली, कर्तव्यनिष्ठ तथा परोपकारी होते हैं। 

5. यह दंतुरहित मुस्कान और फसल – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
निम्नांकित काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-


1. तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात…….
छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण

प्रश्न (क)- बच्चे के स्पर्श भर से कवि को कैसा अनुभव हो रहा है? 
उत्तर: कवि अनुभव करता है कि बच्चे के स्पर्श से निष्ठुर हृदय भी अपनी निष्ठुरता छोड़कर सहृदय बन जाएगा।

प्रश्न (ख)- शिशु का शरीर कवि को कैसा लग रहा है और उन्हें वह उनकी झोंपड़ी में किस रूप में आया हुआ अभास करवा रहा है? 
उत्तर: शिशु का धूल-धूसरित शरीर देखकर कवि को लगता है कि मानो शिशु के रूप में कमल, तालाब को छोड़कर उसकी झोंपड़ी में खिल गया हो।

प्रश्न (ग)- “पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण” का भाव स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: इसका भाव है कि पत्थरवत् हृदय भी शिशु की मुसकान देखकर, स्पर्श पाकर भावुक हो जाते हैं।

2. तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात…….
छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल ?

प्रश्न (क)- किसकी मुसकान मृतक में भी जान डाल देती है ? 
उत्तर: कोमल शिशु की मधुर मुसकान मृतक में जान डालकर जीवन का संचार कर देती है।

प्रश्न (ख)- कवि ‘शिशु के स्पर्श से पाषाण का पिघलना’ कहकर क्या स्पष्ट करना चाहता है ? 
उत्तर: पत्थर के समान कठोर हृदय वाले व्यक्ति भी शिशु की मुसकान देखकर उसका स्पर्श पाकर पिघल जाते हैं, भावुक हो जाते हैं।

प्रश्न (ग)- ‘बाँस’ या ‘बबूल’ से ‘शेफालिका के फूल झरने’ में निहित भाव क्या है ? 
उत्तर: कवि का स्पर्श बबूल और बाँस के समान कठोर है। उस कठोरता के स्पर्श से बच्चे की आँखों से अश्रु ऐसे झरने लगे जैसे शेफालिका के फूल झर रहे हों।

3. यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा सम्पर्क
अँगुलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
और होतीं जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगती बड़ी ही छविमान!

प्रश्न (क) ‘कनखी मारना’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
 ‘कनखी मारना’ का अर्थ है तिरछी निगाहों से देखना।

प्रश्न (ख)- कवि ने अपने लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है और क्यों ? 
उत्तर:
 कवि यायावरी प्रवृत्ति का है इसलिए उसने अपने लिए प्रवासी सा अनजान, इतर व अतिथि आदि विशेषणों का प्रयोग किया है।

प्रश्न (ग)- कवि किसके माध्यम से बच्चे की दंतुरित मुसकान देखने में सफल हुआ ? 
उत्तर:
 शिशु की मुसकान से कवि का परिचय शिशु की माँ के माध्यम से हुआ। यदि वह सहायता नहीं करती तो कवि आनन्ददायक कोमल व मधुर मुसकान न देख पाता।

अथवा

प्रश्न (क)- कविता तथा कवि का नाम लिखिए। 
उत्तर: कविता-‘यह दंतुरित मुसकान,’ ‘कवि-नागार्जुन’।

प्रश्न (ख)- मधुपर्क क्या होता है ? 
उत्तर: दूध, घी, शहद, दही और गंगाजल को मिलाकर बनाया गया पेय जिसे ‘पंचामृत’ कहते हैं। यह शिशु को स्वस्थ रखता है तथा शिशु का यह सम्पूर्ण आहार है। इसे ही यहाँ मधुपर्क कहा गया है।

प्रश्न (ग)- शिशु की दंतुरित मुसकान कवि को कब शोभायमान लगती है ?
उत्तर:
 कवि का बच्चे के साथ आँखें मिलना, उसके चेहरे पर मुसकान तैर जाना। मुसकान कवि को शोभायमान लगना और उसके हृदय में शिशु के प्रति प्रेम का उमड़ना।

4. एक के नहीं,
दो के नहीं,
ढेर सारी नदियों के पानी का जादू
एक के नहीं,
दो के नहीं,
लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा
एक की नहीं,
दो की नहीं,
हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म 

प्रश्न (क)- “ढेर सारी नदियों के पानी का जादू” का भाव स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: फसल में एक नहीं सारे देश की अनेक नदियों का पानी जाता है तब अन्न का उत्पादन होता है।

प्रश्न (ख)- कवि बार-बार कहता है ‘एक के नहीं, दो के नहीं, हज़ार-हज़ार के’ ? कारण स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: यह बताने के लिए कि कृषक द्वारा उगाई गई फसल यों ही नहीं पक जाती, उसमें हज़ारों करोड़ों, हाथों, जल तथा अन्य तत्वों का योग होता है। यहाँ कवि अन्न के दाने का महत्व प्रतिपादित करता हैं।

प्रश्न (ग)- “हज़ार-हज़ार खेतों” का अर्थ स्पष्ट कीजिए और बताइए हज़ारों खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म किसके लिए सहायक होता है।
उत्तर: अनेक एवं असंख्य खेत, ‘फसल’ की जमीन जीवन के लिए अन्न देती है।

5. फसल क्या है ?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुणधर्म है
रूपान्तर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का।।

प्रश्न (क)- नदियों का पानी फसल के लिए क्या करता है ? 
उत्तर: नदियों का पानी उसे बढ़ाता है तथा जीवन देता है।

प्रश्न (ख)- फसल को उगाने में हाथों के स्पर्श की महिमा किस तरह है ? 
उत्तर: फसल को उगाने में करोड़ों किसानों के श्रम का गौरव शामिल होता है।

प्रश्न (ग)- मिट्टी के गुण-धर्म का आशय स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: हज़ारों-हज़ारों खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म फसल में विद्यमान है।लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘यह दंतुरित मुसकान’ को स्पष्ट करते हुए बताइए कि वह मरे हुए में भी जान कैसे डाल देती है?
उत्तर: 
‘दंतुरित मुसकान’ का अर्थ, नए-नए दाँतों वाले बच्चे की मुसकराहट है, इसे देखकर निराश और दुःखी व्यक्ति भी उस मनोहर छवि पर आकृष्ट होता है। यह मृतक का भी जीवित होना है।
व्याख्यात्मक हल:
जब बच्चा अपने नन्हे-नन्हे दाँतों से मुसकाता है, तब उसकी सुन्दरता अद्वितीय हो जाती है। वह मुसकान इतनी प्यारी होती है कि मरणासन्न व्यक्ति भी उसे देखकर अपने सारे दुःख दर्द भूल जाता है और प्रसन्नता से झूम उठता है। इस प्रकार वह दन्तुरित मुसकान जीवन का संदेश देती है।

प्रश्न 2. ”छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात“ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 शिशु के मुसकाते मुख और उसके धूल-धूसरित कोमल अंगों को देखकर कवि उल्लसित है उसे लग रहा है मानो कमल तालाब को छोड़कर उसकी झोंपड़ी में खिल रहे हैं।

प्रश्न 3. ‘यह दंतुरित मुसकान’ पाठ के अनुसार पत्थर भी पिघलकर जल कब बन जाता है? इस उक्ति का अर्थ स्पष्ट करते हुए टिप्पणी कीजिए। 
उत्तर: पाषाण का पिघलकर जल बन जाने का भाव है कि बच्चे की मनोहर छवि को देखकर कठोर से कठोर हृदय भी पिघल जाता है। बच्चे की दंतुरित मुसकान का प्रभाव अद्भुत होता है। 

प्रश्न 4. “यह दंतुरित मुस्कान” कविता में कवि ने मानव जीवन के किस सत्य को प्रकट किया है?
उत्तर:
 शिशु की मधुर दंतुरित मुसकान को देखकर कवि का मन सरसता तथा स्निग्धता से भरकर आनंदित हो उठता है। पारिवारिक जीवन अच्छा है इससे मनुष्य के मन में आनन्द और उत्साह का संचार होता है तथा वह अनेक कठिनाइयों को सरलता से पार कर लेता है। 

प्रश्न 5. ”यह दंतुरित मुसकान“ कविता में ”शेफालिका के फूल“ झरने का क्या आशय है और ऐसा क्यों हुआ?
उत्तर:
 इसका आशय बच्चे की आँखों से आँसू टपकने से है। ऐसा कवि की कठोर हथेलियों के स्पर्श से हुआ।

प्रश्न 6. बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अन्तर है ?
उत्तर: बच्चे की मुसकान में निश्छलता और मासूमियत होती है। दिल में किसी के लिए दुर्भावना नहीं होती, जबकि बड़े व्यक्ति की मुसकान में चालाकी, स्वार्थ किसी के प्रति दुर्भावना भी छिपी हो सकती है।

प्रश्न 7. घर में आए अतिथि को देखकर बच्चे के मन में क्या-क्या भाव उत्पन्न होते हैं ? ‘दंतुरित मुसकान’ के आधार पर उत्तर दीजिए। 
उत्तर:
 परिचित को देखकर शिशु की प्रसन्नता, उत्सुकता, कौतुक आदि तथा अतिथि को देखकर डरना, रोना, मंद हँसी, कनखियों से देखना आदि भाव उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 8. बच्चा अनजान व्यक्ति की ओर किस प्रकार देखता रहता है? ”यह दंतुरित मुसकान“ कविता के अनुसार उसे देखकर कवि नागार्जुन क्या कहकर आँखें फेर लेना चाहते हैं?
उत्तर:
 बिना पलक झपकाए, ताकि बच्चा थक न जाए, यदि माँ ने न परिचित कराया होता तो वे जान ही नहीं पाते, तुम और तुम्हारी माता दोनों धन्य हैं। बच्चा अनजान व्यक्ति की ओर बिना पलक झपकाए लगातार देख रहा है। वह उसे पहचानने का प्रयास कर रहा है। कवि यह कहकर कि कहीं बच्चा उन्हें एकटक देखते हुए थक न जाये, आँखें फेर लेना चाहते हैं।

प्रश्न 9. बच्चे का परिचय संसार से करवाने में मुख्य रूप से किसकी भूमिका होती है ? 
उत्तर:
 बच्चे का परिचय संसार से करवाने में माँ की मुख्य भूमिका होती है। वह नौ माह तक बच्चे को गर्भ में रखकर तथा जन्म देकर प्यार देती है और संसार में सबसे उसका परिचय कराती है।

प्रश्न 10. फसल नदियों के पानी का जादू, हाथों के स्पर्श की गरिमा और महिमा तथा मिट्टी का गुण धर्म किस प्रकार है? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
 फसल बिना पानी के न तो उग सकती है, न बढ़ सकती है और न पक सकती है। इसमें एक नहीं अनेक व्यक्तियों का परिश्रम तथा उनके हाथों का श्रम के साथ-साथ बीज-खाद व मिट्टी का भी योगदान होता है। यदि ये सब नहीं होगा तो बीज का न तो अंकुर बनेगा, न फसल और न दाना। अतः फसल इनकी गरिमा एवं महिमा के साथ-साथ मिट्टी का गुण धर्म है।

प्रश्न 11. ”नदियों के पानी का जादू“ और ”हाथों के स्पर्श की गरिमा“ किसको कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
 पानी के संपर्क में आते ही बीज में अंकुर फूटता है, पानी ही उसे बढ़ाता और पोषित करता है, पानी प्राप्त होने के मूल साधन किसान के परिश्रम के बिना फसल नहीं बन सकती। 

प्रश्न 12. कवि के अनुसार फसल क्या है ? 
उत्तर:
 कवि के अनुसार फसलें पानी, मिट्टी, धूप, हवा और मानव श्रम के मेल से बनी हैं। इनमें सभी नदियों के पानी का जादू समाया हुआ है। सभी प्रकार की मिट्टियों का गुण-धर्म है। सूरज और हवा का प्रभाव समाया है। इन सबके साथ किसानों और मजदूरों का श्रम भी सम्मिलित है।

प्रश्न 13. कवि ने फसल को हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म कहा है। मिट्टी द्वारा अपना गुण-धर्म छोड़ने की स्थिति में क्या किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना की जा सकती है ? 
उत्तर: मिट्टी के अनेक प्रकार के गुण-धर्म के कारण फसल का पैदा होना। मिट्टी द्वारा गुण-धर्म छोड़ने की स्थिति में मनुष्य का जीवन बुरी तरह प्रभावित होना। उसका परिणाम भुखमरी, अनेक प्रकार की बीमारियाँ तथा तनाव आदि के रूप में सामने आना।

प्रश्न 14. ‘फसल’ कविता में फसल के उत्पादन में किन-किन तत्वों का योगदान बताया गया है ?
अथवा
फसल उगाने के लिए कौन से तत्व आवश्यक माने गए हैं ?
उत्तर:
 नदियों का पानी, मनुष्य का परिश्रम, भूरी-काली संदली मिट्टी, सूर्य की किरणों तथा हवा का योगदान।

प्रश्न 15. फसल को ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा और महिमा’ कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहता है ?
उत्तर:
 फसल नदियों के पानी, प्रकाश, हवा, धूप तथा मिट्टी के तत्वों का परिणाम है, किन्तु मनुष्य के परिश्रम के परिणामस्वरूप फलती-फूलती है। मनुष्य के हाथों के परिश्रम के बिना अपना रूप ग्रहण नहीं कर पाती। मनुष्य के परिश्रम का विशेष महत्व होने के कारण इसे हाथों के स्पर्श की गरिमा और महिमा कहा है।

प्रश्न 16. कवि ने ‘फसल’ के निर्माण में कृषक को अधिक महत्व दिया है, क्यों ? 
उत्तर:
 कृषक का जीवन कृषि पर आधारित है। वह दिन-रात, समय-असमय, दुःख की चिंता न करते हुए अपने परिश्रम से बीज बोने से लेकर फसल तैयार होने तक का धैर्य रखता है अतः उसके धैर्य और अथक परिश्रम की पराकाष्ठा को देखकर कृषक को अधिक महत्व दिया गया है।

प्रश्न 17. ‘रूपांतर है सूरज की किरणों का सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का।’ पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 फसल उत्पन्न करने में प्राकृतिक उपादानों जैसे-सूर्य का प्रकाश और हवा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। पेड़-पौधे में सूर्य की किरणों का परिवर्तित रूप मानता है। उसे फसल में थिरकती हवा का संकोच समाया हुआ दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 18. फसल मिट्टी का गुण धर्म कैसे है ? 
उत्तर: मिट्टी ही फसल का मूल आधार है। मिट्टी, अपने रस से बीज को अंकुरित कर उसका पोषण कर फसल के रूप में तैयार करती है। वह जननी के रूप में सृजन का कार्य करती है।

4. उत्साह और अट नहीं रही – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

निम्नांकित काव्याशों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. बादल, गरजो!
घेर घर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित ललित, काले घुँघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विद्युत-छवि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता
फिर भर दो-
बादल, गरजो।

प्रश्न (क)-प्रस्तुत गीत में किसे सम्बोधित किया गया है ? 
उत्तर:
 बादलों को।

प्रश्न (ख)-प्रस्तुत गीत में बादलों की तुलना बाल कल्पना से क्यों की गई है ? 
उत्तर:
 बच्चों की कल्पनाएँ मधुर होती हैं तथा बदलती रहती हैं। बादल भी बार-बार अपना रूप बदलते रहते हैं।

प्रश्न (ग)-बादलों के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए। 
उत्तर: बादल सुन्दर, काले-घुँघराले बालों वाले हैं। वे अपने हृदय में बिजली छिपाए हुए तथा नया जीवन प्रदान करने वाले हैं।

2. बादल, गरजो!
विकल विकल, उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो-
बादल, गरजो!

प्रश्न (क)-विश्व के सभी लोग विकल और उन्मन क्यों थे ? 
उत्तर:
 विश्व के सभी लोग ग्रीष्म ऋतु की गर्मी की अधिकता के कारण बहुत विकल और उन्मन थे।

प्रश्न (ख)-कवि ने यह क्यों कहा कि ‘आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन’ ? 
उत्तर: 
कवि ने यह इसलिए कहा कि गर्मी से तपती धरती को राहत प्रदान करने के लिए बादल अनजानी दिशा से आकर आकाश में छा गए थे।

प्रश्न (ग)-कवि ने बादलों का आह्नान किसलिए किया है ? 
उत्तर: कवि ने बादलों का आह्नान मानवता को और धरती को गर्मी के प्रभाव से बचाने के लिए किया है।

3. अट नहीं रही है आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है। कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो, उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो, आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है। पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल, कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल, पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।

प्रश्न (क)-कवि ने किस महीने की सुन्दरता का वर्णन किया है ? 
उत्तर: फागुन के।

प्रश्न (ख)-‘पाट-पाट शोभा-श्री पट नहीं रही है’ पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: फागुन में प्राकृतिक  सौन्दर्य व मस्ती सँभाले नहीं सँभल रही है।

प्रश्न (ग)-साँस लेना किस स्थिति का परिचायक है ? 
उत्तर:
 सुगंधित हवाओं का चलना।

4. कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।
पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है

प्रश्न (क)-”पाट-पाट शोभा-श्री पट नहीं रही है“ में निहित काव्यगत विशेषता बताइए।
उत्तर:
 काव्यांश में अनुप्रास, अनुकरणनात्मकता तथा नाद-सौन्दर्य व्यंजित है।

प्रश्न (ख)-काव्यांश में किस ऋतु का वर्णन है तथा उसकी क्या-क्या विशेषताएँ कविता में अंकित हुई हैं? 
उत्तर:
 बसंत का; चारों ओर हरियाली, फूलों-पत्तों से डालियों का लद जाना। चारों ओर सुगंधित वातवरण, हरे-भरे खेत आदि का प्राकृतिक  सौन्दर्य।
व्याख्यात्मक हल:
काव्यांश में बसंत ऋतु का वर्णन है। इस ऋतु में चारों ओर हरियाली फैली हुई है। पेड़ों की डालियाँ फूल-पत्तों से लदी हुई हैं, जिससे चारों ओर का वातावरण सुगंधित हो रहा है।

प्रश्न (ग)-कवि की आँख हटाने पर भी क्यों नहीं हट रही है? उन्हें कौन-कौन-सी चीजें आकर्षित  कर रही हैं? 
उत्तर: प्रकृति की शोभा-श्री जिससे आनंदानुभूति हो रही है। हरे व लाल पत्तों से लदी डालें, फूलों से लदी डालियाँ, सुगंधित वातावरण।
व्याख्यात्मक हल:
प्रकृति की शोभा को देखकर कवि को अत्यधिक आनंद की अनुभूति हो रही है, जिसके कारण कवि की आँख उस प्राकृतिक शोभा से हटाने से भी नहीं हट रही है। उन्हें हरे व लाल पत्तों से लदी डालें, फूलों से लदी डालियाँ, सुगंधित वातावरण आकर्षित कर रहा है।

5. पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट-शोभा-श्री
पट नहीं रही है।

प्रश्न (क)-बसंत ऋतु में वृक्षों और पौधों में क्या परिवर्तन हो जाता है ? 
उत्तर: बसंत ऋतु में वृक्षों और पौधों की डालियाँ पत्तों से भर जाती हैं। उन पर नए-नए पत्ते आते हैं। उनमें कहीं हरी और कहीं लाल कोपलें फूटी हैं।

प्रश्न (ख)-विविध रंग के पुष्प कैसे प्रतीत होते हैं ? 
उत्तर:
 प्रकृति में विविध रंग के खिले पुष्प ऐसे प्रतीत होते हैं मानो प्रकृति के हृदय पर फूलों की माला शोभायमान हो रही है।

प्रश्न (ग)-‘पाट-पाट शोभा-श्री, पट नहीं रही है’-कथन से कवि का क्या आशय है ? 
उत्तर:
 बसंत ऋतु में प्राकृतिक सौन्दर्य हर स्थान पर व्याप्त है और वह सौन्दर्य इतना अधिक है कि किसी भी सीमा में नहीं समा पाता।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. कवि ने ‘उत्साह’ कविता बादलों को क्यों सम्बोधित की है ? 
उत्तर:
 उत्साह कविता में कवि ने बादलों लोगों के अंदर उत्साह का संचार लाने के लिए संबोधित किया है , क्योंकि बादल गजरते है , तब सोए हुए लोग नींद से जाग जाते है | बादल धरती के सभी प्राणियों को नया जीवन प्रदान करते हैं और यह हमारे अंदर के सोये हुए साहस को भी जगाते है। बादलों की आवाज़ से वह लोगों के अंदर नई उमंगे भरना चाहता है |

प्रश्न 2.  कविता का शीर्षक ‘उत्साह’ क्यों रखा गया है ? 
उत्तर:
 कविता का शीर्षक ‘उत्साह’ इसलिए रखा गया है, क्योंकि कवि ने बादलों की गर्जना को उत्साह का प्रतीक माना है । प्रस्तुत कविता में ओज गुण विद्यमान है। बादलों की गर्जना नवजीवन का प्रतीक है। मनुष्य में उत्साह होना ही उसकी उन्नति का कारण है, जिसमें उत्साह है, उसी में जीवन है।

प्रश्न 3. ‘बाल कल्पना के से पाले’ पंक्ति का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
पंक्ति का भाव यह है कि जिस प्रकार बच्चे अनेक कल्पनाएँ करते तथा मिटाते हैं, उसी प्रकार बादल अचानक थोड़े समय के लिए छा गए हैं और तिरोहित भी होने लग जाते हैं।

प्रश्न 4. ”घेर घेर घोर गगन तथा काले घुँघराले“ शब्द चित्र को ‘उत्साह’ कविता के आधार पर अपने शब्दों में स्पष्ट कर समझाइए। 
उत्तर: बादल जो काले-काले घुँघराले हैं तथा वायु के साथ घोर करते हुए चारों ओर से घिर आए हैं।
व्याख्यात्मक हल:
बादल आकाश को घेरकर, भयानक गर्जना करते हुए बरसते हैं तथा वे सुन्दर और काले-घुँघराले बालों के समान लग रहे हैं।

प्रश्न 5. निराला जी बादलों से फुहारों, रिमझिम तथा अन्य प्रकार से बरसने की न कहकर ‘गरजते हुए’ बरसने की याचना क्यों करते हैं? बताइए। 
अथवा
कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर गरजने के लिए कहता है, क्यों? 
उत्तर:
 कवि निराला बादल को क्रांतिदूत मानते हैं। अतः वे गर्जना करते हुए बरसने की याचना करते हैं, दुःखी लोगों के दुःख दूर करने के लिए वे क्रांति के समर्थक हैं, चुपके से परिवर्तन की बात न वे सोचते हैं और न उन्हें संभव प्रतीत होता है।

प्रश्न 6. ‘उत्साह’ कविता में ‘नवजीवन वाले’ किसके लिए प्रयुक्त किया गया है और क्यों ?
उत्तर: बादलों के लिए, क्योंकि गर्मी से संतप्त धरती के ताप को शान्त कर नवजीवन व चेतना प्रदान करना। प्रकृति का प्रफुल्ल वातावरण पशु-पक्षी तथा मानव में उत्साह और जोश का संचार करता है। कवि भी बादलों की गर्जना से उत्साहित होकर अपने जीवन में निराशा में आशा का संचार देखता है और वह समाज में क्रान्ति का सूत्रपात करने में सक्षम है। अतः नवजीवन वाले कहना सार्थक है।

प्रश्न 7. ”कहीं साँस लेते हो, घर-घर भर देते हो“ पंक्ति में किसकी विशिष्टता व्यंजित हुई है? बताइए कि वह उसकी कौन-सी खूबी है जिससे घर-घर भर जाता है? ‘अट नहीं रही है’ कविता के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर:
 मंद-मंद बहने वाला पवन घर-उपवन, वन सभी को आनंदित कर देता है। बसंत में पवन की विशिष्टता का वर्णन। शीतल मंद पवन, सृष्टि में नयापन, नवीनता आदि विशेषताएँ।
व्याख्यात्मक हल:
इस पंक्ति में बसंत ऋतु में बहने वाली पवन की विशिष्टता का वर्णन हुआ है। बसंत में बहने वाली शीतल मंद सुगंधित पवन से सारा घर महक उठता है। वातावरण में ताजगी व उत्साह का आभास होता है।

प्रश्न 8. कवि निराला की आँख फागुन की सुन्दरता से क्यों नहीं हट रही है?
उत्तर:
 फागुन मास की प्राकृतिक शोभा इतनी विविध और मनोहारी है कि घर-घर को महकाती पवन, आकाश में अठखेलियाँ करते पक्षी, पत्तों से लदी डालियों और मंद सुगंध से परिपूर्ण पुष्प समूह के इन सारे दृश्यों ने मंत्रमुग्ध सा कर दिया।

प्रश्न 9. ‘उड़ने को नभ में तुम, पर-पर कर देते हो’-कथन में कवि क्या कहना चाहता है ?
उत्तर: 
फागुन के सौन्दर्य को देखकर भावुक हृदय कल्पनाओं के पंख लगाकर उड़ने लगते हैं। अर्थात् फागुन के सौन्दर्य को देख मन प्रसन्न हो उठता है।

प्रश्न 10. फागुन मास की मादकता का व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ? 
उत्तर: फागुन मास की मादकता का व्यक्ति पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है-
(क) फागुन की मादकता व्यक्ति को कल्पना लोक में ले जाती है।
(ख) कल्पना के पंख लगाकर आकाश में उड़ना।
(ग) फागुन की शोभा सर्वव्यापक होना।
(घ) सारा वातावरण पुष्पित एवं सुगंधित होना।
(ङ) मन में उल्लास भरना, सर्वत्र फागुन का सौन्दर्य झलकना।

प्रश्न 11. ‘पाट-पाट शोभा-श्री पट नहीं रही है।’-पंक्ति किस सन्दर्भ में लिखी गई है ?
अथवा
‘पट नहीं रही’-पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है? ‘अट नहीं रही’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 फागुन में प्रकृति सौन्दर्यशालिनी नजर आती है, कण-कण में सौन्दर्य बिखरा नजर आता है, यह सुन्दरता इतनी अधिक है कि भीतर समा नहीं पा रही है। प्रकृति के माध्यम से प्रकट हो रही है।

प्रश्न 12: ‘अट नहीं रही है’ कविता में कवि क्या संदेश देना चाहता है ? 
उत्तर:
 फागुन का सौन्दर्य चारों दिशाओं में व्याप्त है। प्रकृति में आनन्द की अनुभूति के साथ उन्माद है, थके लोगों में नवजीवन प्रफुल्लता का सन्देश है, खुशियों की अनंतता है, यही सन्देश देना चाहता है।

2. राम–लक्ष्मण–परशुराम संवाद – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

निम्नलिखित काव्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1. बिहँसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।।
पुनि-पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।
इहाँ कुम्हड़बतियाँ कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कुछ कहहु सहौं रिस रोकी।।
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।।
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहू पा परिअ तुम्हारे।।
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।

प्रश्न (क)-काव्यांश में से कोई मुहावरा अथवा लोकोक्ति चुनकर उसके सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए। 
उत्तर: काव्यांश में ‘फूँक से पहाड़ उड़ाना’ मुहावरे का अत्यंत सार्थक प्रयोग किया गया है।

प्रश्न (ख)-लक्ष्मण ने अपने कुल की किस परपंरा का उल्लेख किया है ? 
उत्तर: लक्ष्मण ने अपने कुल (रघुकुल) की उस परपंरा का उल्लेख किया है जिसके अनुसार देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गाय-इन चारों पर वीरता नहीं दिखाई जाती, क्योंकि उनका वध करना या उनसे हारना दोनों ही ठीक नहीं माने जाते। इनका वध करने से पाप का भागीदार बनना पड़ता है तथा इनसे हारने पर अपयश फैलता है।

प्रश्न (ग)-किस कारण से लक्ष्मण क्रोध को रोककर परशुराम के कटु-वचनों को सहन कर रहे हैं ? 
उत्तर:
 लक्ष्मण ने परशुराम के कटु-वचनों को इसलिए सहन कर लिया क्योंकि उन्हें पता चल गया कि परशुराम ब्राह्मण हैं (भृगु ऋषि के पुत्र हैं।) रघुकुल में ब्राह्मणों पर कटु-वचन व शस्त्र-प्रयोग वर्जित होता है।

2. कौसिक सुनहु मंद येहु बालक। कुटिलु काल बस निज कुल घातक।।
भानुबंस राकेश कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असूंक।।
कालकवलु होइहि छन माही। कहौं पुकारि खोरि मोहि नाहीं ।।
तुम्ह हटकहु जो चहहु उबारा। कहि प्रताप बल रोषु हमारा।।

प्रश्न (क)-‘कौसिक’ कौन हैं ? उन्हें क्या करने को कहा गया है ? 
उत्तर:
 कौसिक विश्वामित्र हैं। क्रोध के बारे में बताने के लिए कहा गया है।

प्रश्न (ख)-लक्ष्मण के लिए क्या-क्या कहा गया है ? 
उत्तर: लक्ष्मण को कुबुद्धि, कुटिल, कुलघातक, कलंकी, उद्दंड, मूर्ख आदि कहा गया है।

प्रश्न (ग)-काव्यांश की पृष्ठभूमि की घटना क्या थी ? यह कथन किसका है ? 
उत्तर: श्रीराम द्वारा शिवजी का धनुष तोड़े जाने और क्रोधित अवस्था में परशुराम जी के आने के बाद परशुराम और लक्ष्मण के संवाद का वर्णन किया गया है। यह परशुराम का कथन है।

3. कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।
माता पितहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें।।
सो जनु हमरेहि माथें-काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा।।
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।
सुनि कटु वचन कुठार सुधारा। हाय-हाय सब सभा पुकारा।।
भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिप्र बिचारि बचैं नृपद्रोही।।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विजदेवता घरहि के बाढ़े।।
अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सयनहि लखनु नेवारे।।

प्रश्न (क)-उपर्युक्त काव्यांश के आधार पर परशुराम लक्ष्मण और राम के स्वभाव की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: परशुराम अत्यंत उग्र स्वभाव के क्रोधी तथा अहंकारी हैं। लक्ष्मण अत्यंत निर्भीक, साहसी तथा वाकपटु हैं पर राम अत्यंत शांत एवं सौम्य स्वभाव के हैं।

प्रश्न (ख)-गुरु का ऋण चुकाने के लिए लक्ष्मण ने परशुराम को क्या युक्ति बताई ? 
उत्तर: 
गुरु का ऋण चुकाने के लिए लक्ष्मण ने परशुराम से कहा कि काफी समय से गुरु का ऋण आप पर चढ़ा हुआ है अब तो उस पर ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अतः आप किसी हिसाब-किताब करने वाले व्यक्ति को बुला लीजिए। मैं थैली खोलकर आपके गुरु का ऋण चुकता कर दूँगा।

प्रश्न (ग)-‘कहेऊ लखन मुनि सील तुम्हारा, को नहि जान विदित संसारा’ पंक्ति द्वारा लक्ष्मण ने परशुराम पर क्या व्यंग्य किया? 
उत्तर: 
उपर्युक्त पंक्ति द्वारा लक्ष्मण ने परशुराम पर करारा व्यंग्य किया है कि आपके शील स्वभाव को कौन नहीं जानता है, वह किसी से छिपा नहीं है। लक्ष्मण के कहने का आशय यही है कि आप कितने क्रोधी हैं तथा आपको अपनी वीरता पर कितना अहंकार है, यह किसी से छिपा नहीं है।

4. तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू । कटुबादी बालकु बधजोगू।।
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा।।

प्रश्न (क)-परशुराम क्यों क्रोधित हो गए ? 
उत्तर: 
लक्ष्मण द्वारा बार-बार व्यंग्योक्तियों से उनके अभिमान को चोट पहुँचाने व उनका अपमान करने के कारण।

प्रश्न (ख)-परशुराम ने सभा से किस कार्य का दोष उन्हें न देने के लिए कहा ? 
उत्तर:
 यदि वे कटु वचन बोलने वाले बालक लक्ष्मण का वध कर दें तो सभा उन्हें इसका दोष न दे।

प्रश्न (ग)-लक्ष्मण के किस कथन से उनकी निडरता का परिचय मिलता है ? 
उत्तर: वध करने की धमकी सुन कर लक्ष्मण जब परशुराम से कहते हैं कि आप तो बार-बार काल को इस प्रकार आवाज लगा रहे हैं, मानो उसे मेरे लिए ही बुला रहे हैं।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. धनुष को तोड़ने वाला कोई आपका ही सेवक होगा-के आधार पर राम के स्वभाव पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: 
परशुराम के क्रोध को शांत करने का प्रयास करते हुए राम ने कहा कि शिव धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास होगा-ऐसा कहने से यह पता चलता है कि राम शांत, विनम्र स्वभाव के हैं। उनकी वाणी में मधुरता का गुण विद्यमान है।

प्रश्न 2. पद्यांश के आधार पर परशुराम के स्वभाव की विशेषताओं पर कोई दो टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
 परशुराम के चरित्र की दो विशेषताएँ है-
(i) परशुराम क्रोधी स्वभाव के है।
(ii) परशुराम अत्यंत अहंकारी ऋषि है।

प्रश्न 3. परशुराम ने शिव धनुष तोड़ने वाले को अपना शत्रु किसके समान बताया ? तब लक्ष्मण ने उन्हें क्या उत्तर दिया?
उत्तर: राजा जनक की इच्छा और विश्वामित्र की आज्ञा से जब राम ने शिव धनुष को भंग किया तो परशुराम ने शिव धनुष तोड़ने वाले को सहस्रबाहु के समान अपना शत्रु बताया और राम-लक्ष्मण दोनों पर क्रोधित हो गये तब लक्ष्मण ने मुस्कुराते हुए परशुराम से कहा- कि बचपन में हमने ऐसे बहुत से धनुष तोड़े हैं।

प्रश्न 4. लक्ष्मण ने शूर वीरों के कौन से गुण परशुराम को बताए है?
उत्तर:
 लक्ष्मण ने शूर वीरों के गुण बताते हुए कहा कि-वीर योद्धा कभी भी धैर्य को नहीं छोड़ता, वह युद्ध भूमि में अपनी वीरता का प्रदर्शन शत्रु से युद्ध करके करता है, बुद्धिमान योद्धा रणभूमि में शत्रु का वध करता है, वह कभी अपनी बड़ाई अपने मुख से नहीं करता।

प्रश्न 5. परशुराम की बात सुनकर राम क्या प्रयास करते हैं? इससे राम के किन गुणों का पता चलता है?
उत्तर:
 परशुराम की बात सुनकर राम उन्हें शांत करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि राम का स्वभाव शांत, विनम्र, ऋषि मुनियों के प्रति अपार श्रद्धा तथा मर्यादाशीलता आदि गुणों से परिपूर्ण हैं।

प्रश्न 6. परशुराम का स्वभाव किस प्रकार का है ? वे लक्ष्मण को क्या कहकर धमकाते हैं?
उत्तर: परशुराम का स्वभाव क्रोधी है और वे सदैव ही वीर योद्धा की तरह बात करते हैं-जब राजा जनक की सभा में सीता स्वयंवर के समय राम द्वारा धनुष तोड़ने के बाद परशुराम-लक्ष्मण से संवाद करते हुए कहते हैं-यदि वे कटु वचन बोलने वाले बालक लक्ष्मण का वध कर दें, तो सभा उन्हें इसका दोष न दे।

प्रश्न 7. लक्ष्मण ने परशुराम से किस प्रकार क्षमा-याचना की और क्यों ? 
उत्तर:
 परशुराम को भृगुवंशी और ब्राह्मण जानकर क्षमा-याचना थी। आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिए। धनुष-बाण और कुठार तो आपके लिए व्यर्थ हैं।
व्याख्यात्मक हल:
लक्ष्मण ने कहा कि देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गाय-इन पर हमारे कुल में वीरता नहीं  दिखाई जाती है। क्योंकि इन्हें मारने पर पाप लगता है और इनसे हारने पर अपयश होता है। अतः आप मारें भी तो आपके पैर ही पड़ना चाहिए। हे महामुनि! मैंने कुछ अनुचित कहा हो तो धैर्य धारण करके मुझे क्षमा करना।

प्रश्न 8. परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिये कौन-कौन से तर्क दिए ?
उत्तर: बचपन में अनेक धनुष तोड़ने पर आप कभी क्रोधित नहीं  हुए। हमें सभी धनुष समान लगते हैं, यह धनुष पुराना था राम के छूते ही टूट गया।
व्याख्यात्मक हल:
परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए निम्न तर्क दिए-
(1) हमने बचपन मैं तो बहुत-से धनुष तोड़े हैं, किन्तु हे मुनि! तब तो कभी किसी ने क्रोध नहीं किया।
(2) हमारी दृष्टि में तो सभी धनुष एक समान हैं। इस धनुष से आपका इतना मोह क्यों है ?
(3) एक धनुष के टूट जाने से क्या हानि और क्या लाभ ?
(4) श्रीराम जी ने तो इसे नए धनुष के धोखे में देखा था। यह तो रामजी के छूते ही टूट गया। इसमें उनका क्या दोष है ?

प्रश्न 9. धनुर्भंग के पक्ष में परशुराम के समक्ष लक्ष्मण ने क्या तर्क दिये ? 
उत्तर: 
लक्ष्मण ने कहा
(1) बचपन में कई धनुष तोड़े, किसी से क्रोध नहीं  किया।
(2) हमारी दृष्टि में तो सभी धनुष एक समान हैं, इस धनुष से आपका इतना मोह क्यों है।
(3) श्रीराम जी ने इसे नए धनुष के धोखे में देखा था। यह रामजी के छूने से ही टूट गया तो इसमें उनका क्या दोष है।

प्रश्न 10. परशुराम द्वारा सहस्रबाहु से शिव धनुष तोड़ने वाले की तुलना करना कहाँ तक उचित है ? अपने विचारानुसार लिखिए। 
उत्तर:
 सहस्रबाहु से धनुष को तोड़ने वाले की तुलना परशुराम की वास्तविकता से अवगत न होने की अवस्था थी। फिर भी ‘सहस्रबाहु ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण’ किया। राम ने जनक की इच्छा और विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष -भंग किया था। राम का दोष नहीं  था, सहस्रबाहु अपराधी था।

प्रश्न 11. धनुष टूटने के बाद परशुराम ने फरसे की तरफ देख कर लक्ष्मण को न मारने का क्या तर्क दिया ? 
उत्तर:
 परशुराम ने लक्ष्मण को न मारने का तर्क दिया कि वह उन्हें बालक समझते रहे इसलिए मारा नहीं । परशुराम ने अपने फरसे की प्रशंसा की कि वह सहस्रबाहु की भुजाओं को काट देने वाला है। वह गर्भ के बच्चों का नाश करने वाला है। यह छोटे-बड़े की भी परवाह नहीं  करता।

प्रश्न 12. लक्ष्मण ने सीता स्वयंवर में किस मुनि को चुनौती दी ? क्यों और कैसे ? 
उत्तर:
 परशुराम को। परशुराम बार-बार क्रोधित हो फरसे से भय दिखा रहे थे। लक्ष्मण ने कहा वीर लोग मैदान में वीरता सिद्ध करते हैं, कहते नहीं , करते हैं, अपने प्रताप का गुणगान नहीं  करते। 

प्रश्न 13. लक्ष्मण ने संतोष की बात किससे और क्यों कही ? पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
अपनी वीरता का बखान करने पर भी परशुराम को संतोष न होना। लक्ष्मण ने परशुराम को पुनः आत्मप्रशंसा करने को कहा।

प्रश्न 14.‘आपकी दृष्टि में परशुराम का क्रोध करना उचित है या अनुचित ? तर्कसहित स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
 हमारी दृष्टि में परशुराम का क्रोध करना अनुचित है। बिना कारण जाने राम को दोषी ठहराना अनुचित है, सामने वाला विनम्रता से झुक जाए तो भी क्रोध करना अनुचित है जैसा राम की विनम्रता न देखते हुए परशुराम ने किया। (भिन्न उत्तर भी संभव)

प्रश्न 15. लक्ष्मण-परशुराम संवाद के आधार पर लक्ष्मण के स्वभाव की दो विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
 लक्ष्मण जी के स्वभाव में उग्रता है, प्रतिवाद करने की भावना है। उन्होंने क्रोध और व्यंग्य से परिपूर्ण व्यवहार किया।

प्रश्न 16. लक्ष्मण परशुराम संवाद में तुलनात्मक दृष्टि से इन दोनों में से आपको किसका स्वभाव अच्छा लगता है। तर्क सम्मत उत्तर दीजिए। 
उत्तर:
 इस संवाद में मुझे लक्ष्मण का स्वभाव अधिक अच्छा लगता है। परशुराम क्रोधी, अहंकारी, उग्र प्रतीत होते हैं जबकि लक्ष्मण ने शिष्ट, मृदु किन्तु वीर भाव से उनके प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने परशुराम का उपहास भी शालीनता से किया। राम के कहने पर वे चुप भी हो गए।

प्रश्न 17. लक्ष्मण के अनुसार वीर और कायर के स्वभाव में क्या अन्तर है ? 
उत्तर:
 वीर योद्धा कभी भी धैर्य को नहीं  छोड़ता, वह युद्धभूमि में वीरता का प्रदर्शन शत्रु से युद्ध करके करता है, वीर योद्धा रणभूमि में शत्रु का वध करता है, कायरों की भाँति अपने प्रताप का केवल बखान नहीं  करता।

प्रश्न 18. राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद में लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बतलाई हैं ? 
अथवा
लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बताईं ? 
उत्तर:
 लक्ष्मण ने वीर योद्धा की विशेषता बताते हुए कहा है कि वीर योद्धा कभी भी धैर्य को नहीं छोड़ता, वह युद्ध भूमि में अपनी वीरता का प्रदर्शन शत्रु से युद्ध करके करता है। बुद्धिमान योद्धा रणभूमि में शत्रु का वध करता है। वह कभी भी अपने मुख से अपनी बड़ाई नहीं करता है।

प्रश्न 19. परशुराम की स्वभावगत विशेषताएँ क्या हैं? पाठ के आधार पर लिखिए।
अथवा
परशुराम के चरित्र की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
 वीर, क्रोधी, बाल-ब्रह्मचारी, अहंकारी, क्षत्रिय कुल के विरोधी, कठोर वाणी।
व्याख्यात्मक हल:
परशुराम वीर योद्धा, क्रोधी, बाल-ब्रह्मचारी, अहंकारी तथा क्षत्रिय कुल के विरोधी हैं तथा उनकी वाणी अत्यंत कठोर है। शिवधनुष तोड़ने पर वे लक्ष्मण को फरसा दिखाकर उन्हें डराने का प्रयास करते है। वे क्षत्रियों के प्रबल शत्रु थे।
अथवा
परशुराम क्रोधी एवं वीर योद्धा की तरह बात कर रहे थे। उनके चरित्र की यही विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 20. परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुई उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए। 
उत्तर: राम शांत स्वभाव के तो लक्ष्मण उग्र स्वभाव के हैं। परशुराम की बात सुनकर राम उन्हें शांत करने का प्रयास करते हैं और लक्ष्मण उन्हें अपनी व्यंग्यपूर्ण वाणी से उकसाते हैं। 

1. पद – Short Questions answer – |

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1: निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

ऊधौ, तुम हो अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी में पाउँ न बोस्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।

(क) इस पद में किस भाषा का प्रयोग हुआ है? 
उत्तर: इस पद में ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।

(ख) गोपियों ने स्वयं को ‘अबला’ और ‘भोली’ बताकर उद्धव पर क्या कटाक्ष किया है? 
उत्तर: गोपियाँ स्वयं को ‘अबला’ और ‘भोली’ कहकर उद्धव के ज्ञान के घमंड पर व्यंग्य करती हैं। वे यह दिखाना चाहती हैं कि बिना किसी ज्ञान के भी वे कृष्ण के प्रेम में डूबी हैं, जबकि उद्धव जैसे ज्ञानी भी उस प्रेम को नहीं समझ सके।

(ग) गोपियों ने उद्धव को ‘बड़भागी’ क्यों कहा है? 
उत्तर: गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक उद्धव को ‘बड़भागी’ कहती हैं क्योंकि वे कृष्ण के समीप रहकर भी उनके प्रेम में नहीं डूबे। वे कभी प्रेम की पीड़ा से नहीं गुज़रे, इसीलिए गोपियाँ उन्हें प्रेम के सौंदर्य से वंचित और वास्तव में अभागा मानती हैं।

अथवा

(क) ‘गुर चाँटी ज्यौं पागी’ में किस भाव की अभिव्यक्ति हुई है? 
उत्तर: दीवानगी का भाव। गोपियाँ कृष्ण पर पूरी तरह समर्पित हैं।

(ख) उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है? 
उत्तर: कमल के पत्ते और तेल की गागर से तुलना की गई है।

(ग) ‘अति बड़भागी’ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:
 गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं कि उद्धव बहुत बड़भागी हैं क्योंकि वे प्रेम के बंधन में नहीं बंधे। दरअसल, वे उन्हें अभागा मानती हैं क्योंकि उन्होंने कृष्ण के प्रेम का अनुभव ही नहीं किया।

अथवा

(क) गोपियों ने ‘बड़भागी’ कहकर उद्धव के व्यवहार पर कौन-सा व्यंग्य किया है? 
उत्तर: गोपियों द्वारा व्यंग्य-उद्धव का इतना ज्ञानी होना कि कृष्ण के साथ रहते हुए भी उनके प्रेम से न बँध सकना।

(ख) उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किससे की गई है? 
उत्तर: पानी के अन्दर रहने वाले कमल के पत्ते से की गई है जो कीचड़ और जल से अछूता रहता है। तेल से चुपड़ी गगरी से जिसके ऊपर पानी की एक बूँद भी नहीं ठहरती है।

(ग) अंतिम पंक्तियों में गोपियों ने स्वयं को ‘अबला’ और ‘भोरी’ क्यों कहा है?
उत्तर: गोपियाँ स्वयं को ‘अबला’ और ‘भोली’ इसलिए कहती हैं क्योंकि वे ज्ञानी नहीं हैं, और पूरी तरह प्रेम में डूबी हुई हैं। जैसे चींटी गुड़ में चिपक जाती है, वैसे ही वे कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह समर्पित हो गई हैं।

प्रश्न 2: निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।

(क) गोपियाँ किस मर्यादा की बात कर रही हैं? 
उत्तर:
 गोपियाँ कृष्ण के द्वारा किए गए वादे (प्रेम, पुनः मिलने आदि) को निभाए न जाने पर दुखी हैं। उनका धैर्य टूट रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा नहीं निभाई।

(ख) उद्धव के संदेश को सुनकर गोपियों की व्यथा घटने के स्थान पर बढ़ गई, ऐसा क्यों हुआ? 
उत्तर: गोपियाँ पूर्ण रूप से कृष्ण के प्रति समर्पित थीं, वे कृष्ण विरह में जी रही थीं। उद्धव ने गोपियों को कृष्ण को भूलकर निर्गुण की उपासना का संदेश दिया, जिसे सुनकर गोपियों की व्यथा बढ़ गई।

(ग) गोपियों के हृदय की इच्छाएँ हृदय में ही क्यों रह गईं? 
उत्तर:
 गोपियों को इस बात की पूरी आशा थी कि एक दिन कृष्ण ब्रज अवश्य आएँगे, परन्तु कृष्ण ने गोपियों को ज्ञान का उपदेश देने के लिए उद्धव को ब्रज भेज दिया। उद्धव को आया देखकर उनकी आशा निराशा में बदल गई।


प्रश्न 3: निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम वचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

(क) ‘नंद-नंदन’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? 
उत्तर: 
‘नंद-नंदन’ शब्द का प्रयोग नन्द बाबा के पुत्र श्रीकृष्ण के लिए किया गया है।

(ख) गोपियों को योग व ज्ञान की बातें कैसी लगती हैं? 
उत्तर:
 गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम में पूर्णरूप से आसक्त हैं, उद्धव द्वारा दिया गया संदेश उन्हें कड़वी ककड़ी के समान निरर्थक लगता है, जिसके बारे में गोपियों ने न कभी देखा न कभी सुना।

(ग) गोपियों ने श्रीकृष्ण की तुलना किससे की है और क्यों? 
उत्तर:
 गोपियों ने कृष्ण को हारिल की लकड़ी के समान कहा है। जैसे हारिल पक्षी अपने पंजों से लकड़ी को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार गोपियों ने मन, कर्म व वचन से श्रीकृष्ण की भक्ति को दृढ़ता से पकड़ रखा है, उसे वे छोड़ नहीं सकतीं।

प्रश्न 4: निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए – 

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।,
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जु और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।

(क) गोपियों की दृष्टि में पहले के लोगों का आचरण कैसा था ? 
उत्तर:
 पूर्व के लोग परापकारी थे, परोपकार हेतु कष्ट सहते थे। 

(ख) गोपियों के अनुसार राजधर्म क्या है जिसका श्रीकृष्ण निर्वाह नहीं कर रहे हैं ? 
उत्तर: गोपियों के अनुसार, प्रजा को कष्ट न देना ही राजधर्म है। श्रीकृष्ण इस धर्म का पालन नहीं कर रहे क्योंकि उन्होंने उद्धव के माध्यम से योग-संदेश भेजकर उन्हें मानसिक पीड़ा दी है।

(ग) गोपियाँ श्रीकृष्ण द्वारा योग-संदेश भेजे जाने को उनकी राजनीति बताते हुए क्या तर्क प्रस्तुत करती हैं ? बताइए।
उत्तर:
 गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण पहले से ही चतुर थे, अब उन्होंने गुरु ग्रंथ (राजनीति) भी पढ़ ली है। वे अब अनीति करने लगे हैं जबकि वे तो अनीति छुड़ाने वाले थे। इससे प्रतीत होता है कि अब उनके मन में गोपियों के प्रति प्रेम की जगह योग-संदेश और तर्क आ गया है।

अथवा

(क) राजधर्म में क्या बताया गया है? 
उत्तर: प्रजा को न सताना ही राजा का धर्म बताया गया। राजा प्रजा के साथ अन्याय न करे।

(ख) ‘इक अति चतुर हेतु पहिलैं ही अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए’ में कौन-सा व्यंग्य निहित है? 
उत्तर: इसमें श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का स्नेहपुष्ट व्यंग्य है कि कृष्ण तो पहले ही चतुर थे अब उन्होंने राजनीति भी सीख ली है। कृष्ण ने उद्धव के द्वारा गोपियों को योग-साधना का संदेश भिजवाकर इसका प्रमाण दे दिया है।

(ग) गोपियाँ उद्धव को क्या ताना मार रही हैं?
उत्तर:
 गोपियाँ उद्धव को नहीं अपितु उसके बहाने से श्रीकृष्ण को ताना मार रही हैं कि श्रीकृष्ण ने अब राजनीति पढ़ ली है अर्थात् अब वे गोपियों के प्रति भी राजनीति का प्रयोग करने लगे हैं।