3. टोपी शुक्ला – पाठ का सार

लेखक परिचय

टोपी शुक्ला पाठ के लेखक राही मासूम रज़ा जी हैं | इनका जन्म 1 सितम्बर 1927 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर के गंगौली गाँव में हुआ था। इन्होंने गाँव में ही शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद अलीगढ़ विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में अपनी PhD पूर्ण की। वहीं पर कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य भी करते रहे। फिर रज़ा साहब मुंबई चले गए, जहाँ पर उन्होंने सैंकड़ों फिल्म स्क्रीप्टस , संवाद और लिरिक्स लिखे। भारत के प्रसिद्ध धारावाहिक ‘महाभारत’ की स्क्रिप्ट , डायलॉग और लिरिक्स ने उन्हें इस क्षेत्र में कभी न मिटने वाली प्रतिष्ठा दिलाई।

राही साहब ने अपने लेखन के माध्यम से जनता को बाँटने वाली ताकतों, राजनैतिक पार्टियां, विभिन व्यक्ति तथा संस्थानों का खुलकर विरोध किया है। उन्होंने अहंकार, अंधविश्वास, और राजनीती के स्वार्थी गठबंधन आदि को भी बेनकाब किया है| राही साहब एक ऐसे कवी-कथाकार थे, जिनके लिए भारतीय मानवता हमेशा अधिक महत्वपूर्ण रही। राही साहब की लेखन भारतीयों की परेशानियों पर आधारित थीं। इनकी मृत्यु 15 मार्च 1992 को हुई थी।

पाठ प्रवेश

  • ‘टोपी शुक्ला’कहानी के लेखक ‘राही मासूम रजा’हैं। इस कहानी के माध्यम से लेखक बचपन की बात करता है। बचपन में बच्चे को जहाँ से अपनापन और प्यार मिलता है वह वहीं रहना चाहता है।
  • यह नामों का जो चक्कर होता है वह बहुत ही अजीब होता है। परन्तु खुद देख लीजिए कि केवल नाम बदल जाने से कैसी-कैसी गड़बड़ हो जाती है। यदि नाम कृष्ण हो तो उसे अवतार कहते हैं और अगर नाम मुहम्मद हो तो पैगम्बर (अर्थात पैगाम देने वाला)। कहने का अर्थ है की एक को ईश्वर और दूसरे को ईश्वर का पैगाम देने वाला कहा जाता है। नामों के चक्कर में पड़कर लोग यह भूल जाते हैं कि दोनों ही दूध देने वाले जानवरों को चराया करते थे। दोनों ही पशुपति, गोवर्धन और ब्रज में रहने वाले कुमार थे।
  • प्रस्तुत पाठ में भी लेखक ने दो परिवारों का वर्णन किया है जिसमें से एक हिन्दू और दूसरा मुस्लिम परिवार है। दोनों परिवार समाज के बनाए नियमों के अनुसार एक दूसरे से नफ़रत करते हैं परन्तु दोनों परिवार के दो बच्चों में गहरी दोस्ती हो जाती है। ये दोस्ती दिखती है कि बच्चों की भावनाएँ किसी भेद को नहीं मानती।
  • आज के समाज के लिए ऐसी ही दोस्ती की आवश्यकता है। जो धर्म के नाम पर खड़ी दीवारों को गिरा सके और समाज का सर्वांगीण विकास कर सके।

पाठ का संक्षिप्त सार

‘टोपी शुक्ला’ कहानी राही मासूम रजा द्वारा लिखे उपन्यास का एक अंश है। इस कहानी के माध्यम से लेखक  ने बताया है कि बचपन में बच्चे को जहाँ से अपनापन और प्यार मिलता है, वह वहीं रहना चाहता है। टोपी को बचपन में अपनापन अपने परिवार की नौकरानी और अपने मित्र की दादी माँ से मिलता है। वह उन्हीं लोगों के साथ रहना चाहता है।
कहानी ‘टोपी’ के इर्द-र्गिद  घूमती है। वह इस कहानी का मुख्य पात्र है। टोपी के पिता डाक्टर हैं। उनका परिवार भरा-पूरा है। यह परिवार अत्यधिक संस्कारवादी है। घर में किसी भी वस्तु की कमी नहीं है। टोपी का एक दोस्त है – इफ़्फ़न। टोपी हमेशा उसे इफ़्फ़न कह कर पुकारता था। इफ़्फ़न को बुरा अवश्य लगता था, परंतु फिर भी वह उससे बात करता था क्योंकि दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे थे। दोनों के घर अलग-अलग थे। दोनों के मज़हब अलग थे। फिर भी दोनों में गहरी दोस्ती थी। दोनों में प्रेम का रिश्ता था।
इस कहानी के दो पात्र हैं- बलभद्र नारायण शुक्ला यानी टोपी आरै सययद ज़रगाम मुर्तुज़ा यानी इफ़्फ़न। इफ़्फ़न के दादा आरै परदादा प्रसिद्ध् मौलवी थे। इफ्फन के दादा-परदादा मौलवी थे। वे जीवित रहते हुए हिन्दुस्तान में रहे थे, परंतु उनकी लाश को करबला ले जाकर दफनाया गया। इफ्फन के पिताजो उनके खानदान में पहले बच्चे थे, जो हिंदुस्तानी थे। इफ्फन को दादी मौलवी परिवार से नहीं थी। वह एक ज़मींदार परिवार की तथा पूरब की रहने वाली थी। उनकी ससुराल लखनऊ में थी, जहाँ गाना-बजाना बुरा समझा जाता था। इफ्फन के पिता की शादी पर उनके मन में विवाह के गीत गाने की इच्छा थी, परंतु इफ्फन के दादा के डर से नहीं गा पाई। उन्हें इफ्फन के दादा से केवल एक शिकायत थी कि वे सदा मौलवी बने रहते थे।
इफ्फन की दादी जब मरने लगीं, तो उसे अपनी माँ का घर याद आने लगा। इफ्फन उस समय स्कूल गया हुआ था। उसे अपनी दादी से बहुत प्यार था। वह उसे रात के समय कहानियाँ सुनाया करती थी। दादी पूरबिया भाषा बोलती थी, जो उसे अच्छी लगती थी। टोपी को भी उसकी दादी की भाषा अच्छी लगती थी। टोपी को इफ्फन को दादी अपनी माँ जैसी लगती थी। उसे अपनी दादी से नफ़रत थी। वह इफ्फन के घर जाकर उसकी दादी से बात करता था।

एक दिन टोपी ने अपने घर में जैसे ही अपनी माँ के लिए अम्मी शब्द का प्रयोग किया, उसी क्षण उनके यहाँ तूफ़ान आ गया। माँ से ज्यादा उसकी दादी भड़क गई। बाद में उसकी माँ से बहुत पिटाई हुई। उसके भाई मुन्नी बाबू ने माँ से झूठ कह दिया था कि उसने कबाब खाए हैं, जबकि कबाब मुन्नी बाबू ने खाए थे। सबने मुन्नी बाबू के झूठ को सच समझ लिया। टोपी के पास अपनी सफाई देने का कोई रास्ता नहीं था।
अगले दिन टोपी स्कूल गया तब उसने इफ़्फ़न को सारी घटना बताई। भूगोल के चौथे पीरियड में दोनों स्कूल से भाग गए। उन्होनें पचंम की दुकान से केले खरीदे। टोपी केवल फल खाता था। टोपी इफ्फन से कहता है कि क्यों न वह अपनी दादी बदल लें। इफ्फन ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी दादी उसके पिताजी की माँ भी थी। इफ्फन ने उसे दिलासा देते हुए कहा कि फ़िक्र मत करो, तुम्हारी दादी जल्दी मर जाएगी क्योंकि बूढ़े लोग जल्दी मर जाते हैं। इतने में नौकर ने आकर सूचना दी कि  इफ़्फ़न की दादी मर गई हैं। शाम को जब टोपी इफ़्फ़न के घर गया तो वहाँ सन्नाटा पसरा पडा़ था। वहाँ लोगों की भीड़ जमा थी। टोपी के लिए सारा घर मानो खाली हो चुका था। टोपी ने इफ़्फ़न से कहा तोरी दादी की जगह हमरी दादी मर गई होती तब ठीक भया होता।
जल्दी ही इफ्फन के पिता का तबादला हो गया। उस दिन टोपी ने कसम खाई कि आगे से किसी ऐसे लड़के से मित्रता नहीं करेगा, जिसके पिता की नौकरी बदलने वाली हो। इफ्फन के जाने के बाद टोपी अकेला हो गया। उस शहर के अगले कलेक्टर हरिनाम सिंह थे। उनके तीन लड़के थे। तीनों लड़कों में से कोई उसका दोस्त न बन सका। डब्बू बहुत छोटा था। बीलू बहुत बड़ा था। गुड्डू केवल अंग्रेज़ी बोलता था। उनमें से किसी ने टोपी को अपने पास फटकने न दिया। माली और चपरासी टोपी को जानते थे इसलिए वह बँगले में घुस गया। उस समय तीनों लड़के क्रिकेट खेल रहे थे। उनके साथ टोपी का झगड़ा हो गया। डब्बू ने अलसेशियन कुत्ते को टोपी के पीछे लगा दिया। टोपी के पटे में सात सइुयाँ लगीं तो उसे होश आया। फिर उसने कभी कलेक्टर के बँगले का रुख नहीं किया।
इसके बाद टोपी ने अपना अकेलापन घर की बूढ़ी नौकरानी सीता से दूर किया। सीता उसे बहुत प्यार करती थी। वह उसका दुख-दर्द समझती थी। घर के सभी सदस्य उसे बेकार समझते थे। घर में सभी के लिए सर्दी में गर्म कपड़े बने, परंतु टोपी को मुन्नी बाबू का उतरा कोट मिला। उसने इसे लेने से इनकार कर दिया। उसने वह कोट घर की नौकरानी केतकी को दे दिया। उसकी इस हरकत पर दादी क्रोधित हो गई। उन्होंने उसे बिना गर्म कपड़े के सर्दी बिताने का आदेश दे दिया।
टोपी नवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया था, जिस कारण उसे घर में और अधिक डाँट पड़ने लगी थी। जिस समय वह पढ़ने बैठता था, उसी समय घर के सदस्यों को बाहर से कुछ-न-कुछ मँगवाना होता था। स्कूल में भी उसे अध्यापकों ने सहयोग नहीं दिया। अध्यापकों ने उसके नवीं में लगातार तीन साल फेल होने पर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था। पिछले दर्जे के छात्रों के साथ बैठना उसे अच्छा नहीं लगता था। कोई भी ऐसा नहीं था, जो उसके साथ सहानुभूति रखता; उसे परीक्षा में पास होने के लिए प्रेरित करता। घर और स्कूल में किसी ने भी उससे अपनापन नहीं दिखाया। उसने स्वयं ही मेहनत की और तीसरी श्रेणी में नवीं पास कर ली। उसके नवीं पास करने पर दादी ने कहा कि उसकी रफ्तार अच्छी है। तीसरे वर्ष में तीसरी श्रेणी में पास तो हो गए हो।

कठिन-शब्दों के अर्थ

  • घपला – गड़बड़
  • मौलवी – इस्लाम धर्म का आचार्य
  • काफ़िर – गैर मुस्लिम
  • वसीयत – अपनी मृत्यु से पहले ही अपनी सम्पति या उपभोग की वस्तुओं को लिखित रूप से विभाजित कर देना
  • करबला – इस्लाम का एक पवित्र स्थान
  • नमाजी – नियमित रूप से नमाज पढ़ने वाला
  • हाँडियाँ – मिट्टी का वह छोटा गोलाकार बरतन
  • मियाँ – पति
  • कस्टोडियन – जिस सम्पति पर किसी का मालिकाना हक़ न हो उसका सरक्षण करने वाला विभाग
  • बीजू पेड़ – गुठली की सहायता से उगाया गया पेड़
  • बेशुमार – बहुत सारी
  • अमावट – पके आम के रस को सूखाकर बनाई गई मोटी परत
  • तिलवा – तिल के बने व्यंजन
  • चुभलाना – मुँह में कोई खाद्य पदार्थ रखकर उसे जीभ से बार-बार हिलाकर इधर-उधर करना
  • जुग़राफ़िया – भूगोल शास्त्र
  • सरक गए – निकल गए
  • अय्यसा – ऐसा
  • तोहरी – तुम्हारी
  • सकत्यो – सकता
  • फ़िकर – चिंता
  • मसहूर – प्रसिद्ध
  • क्लम्ज़ी – भद्दा
  • अकड़ – घमंड
  • लप्पड़ – थपड़
  • शुशकार – कुत्ते को किसी के पीछे लगाने के लिए नीलाले जाने वाली आवाज़
  • भुकीं – चुभी
  • रुख – चेहरा

2. सपनों के–से दिन – पाठ का सार

पाठ का परिचय

यह पाठ प्रसिद्ध लेखक गुरदयाल सिंह की आत्मकथा से लिया गया एक अंश है। इसमें उन्होंने अपने बचपन की शरारतों, कठिनाइयों, खेल-कूद, स्कूल जीवन, और उस समय के सामाजिक माहौल को सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। यह पाठ बचपन की उन भावनाओं को उजागर करता है जिन्हें हम सबने कभी न कभी जिया है, पर शब्दों में ढाल नहीं पाए। लेखक की शैली इतनी आत्मीय है कि पाठक को लगता है जैसे यह उसकी अपनी ही कहानी हो।

गुरदयाल सिंह

मुख्य बिंदु

  • बचपन के खेल: बच्चे नंगे पाँव, फटे कपड़ों में लकड़ी के ढेर पर खेलते, गिरते, चोट खाते, फिर भी अगले दिन खेलने आते।
  • परिवार और मुहल्ला: ज़्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से, गाँवों से आए, स्कूल नहीं जाते थे, दुकानदारी सीखते।
  • स्कूल का डर: बच्चे स्कूल को “कैद” मानते, मास्टरों की पिटाई से डरते, छुट्टियों में भी होमवर्क का डर।
  • प्रकृति की यादें: घास, फूल, और नीम जैसे पत्तों की खुशबू बचपन में बहुत अच्छी लगती थी।
  • छुट्टियों का मज़ा: ननिहाल में दूध-मक्खन, तालाब में नहाना, रेत पर खेलना, पर छुट्टियाँ खत्म होने का डर।
  • मास्टरों का डर: मास्टर प्रीतम चंद सख्त, पिटाई करते; हेडमास्टर शर्मा जी दयालु, बच्चों को बचाते।
  • स्कूल की यादें: स्काउटिंग, परेड, और मास्टर की “शाबाश” बच्चों को फौजी जैसा महसूस कराती।
  • पुरानी किताबें: नई कक्षा में पुरानी किताबों की गंध उदासी लाती, मास्टरों की मार का डर रहता।
  • प्रीतम चंद की सजा: फारसी पढ़ाने में सख्ती, सजा दी, पर शर्मा जी ने रोका, उन्हें निलंबित किया।
  • प्रीतम चंद का व्यवहार: स्कूल में सख्त, पर घर में तोतों से प्यार से बात करते, जो बच्चों को अजीब लगता।

पाठ का सार

इस आत्मकथा के अंश में लेखक अपने बचपन की यादें बताते हैं। वे कहते हैं कि जब वह अपने दोस्तों के साथ खेलते थे, तो सब बच्चे एक जैसे दिखते थे—नंगे पाँव, मैले-फटे कपड़ों में और बिखरे बालों के साथ। खेलते-खेलते वे गिर जाते, जिससे उन्हें चोट लग जाती। लेकिन घर पर उनकी चोट देखकर कोई दया नहीं करता, बल्कि माँ-बाप डाँटते या मारते थे। फिर भी बच्चे अगली सुबह बिना डरे फिर से खेलने निकल जाते। लेखक उस समय यह सब नहीं समझ पाए थे, पर जब वे शिक्षक बनने की ट्रेनिंग में गए और बाल मनोविज्ञान पढ़ा, तब उन्हें यह समझ आया कि बच्चों को खेलना कितना जरूरी और प्रिय लगता है। लेखक बताते हैं कि उनके ज़्यादातर दोस्त स्कूल नहीं जाते थे, या फिर उन्हें पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी। उनके माँ-बाप भी पढ़ाई को ज़रूरी नहीं मानते थे और सोचते थे कि बच्चों को व्यापार या दुकानदारी के काम सिखा देना ही काफी है। लेखक के कुछ साथी राजस्थान और हरियाणा से आए हुए थे। उनकी भाषा थोड़ी अलग थी, इसलिए उनकी बातों पर पहले हँसी आती थी, पर खेलते समय सब एक-दूसरे की बातें समझने लगते थे।

बचपन में लेखक को लगता था कि घास ज़्यादा हरी होती है और फूलों की खुशबू बहुत प्यारी लगती है। उन्हें अब भी उस समय के फूलों की खुशबू याद है। स्कूल के साल की शुरुआत में एक-डेढ़ महीने पढ़ाई होती थी और फिर डेढ़-दो महीने की छुट्टियाँ लग जाती थीं। लेखक हर साल अपनी माँ के साथ ननिहाल जाते थे। अगर कभी ननिहाल नहीं जा पाते, तो घर के पास तालाब पर चले जाते और वहाँ दोस्तों के साथ खूब नहाते। तालाब में कूदते समय कभी-कभी बच्चों के मुँह में गंदा पानी चला जाता था। छुट्टियाँ धीरे-धीरे खत्म होने लगतीं और स्कूल जाने का डर बढ़ने लगता। मास्टर जी बहुत सारे सवाल हल करने के लिए देते थे, इसलिए बच्चे छुट्टियों के काम का हिसाब लगाने लगते थे। दिन छोटे लगने लगते और स्कूल की सख़्ती याद आकर डराने लगती थी। कुछ लड़के ऐसे भी थे जिन्हें काम करने से बेहतर लगता था कि मास्टर से पिटाई ही खा लें। इन बच्चों का नेता ओमा था, जो सबसे अलग और अनोखा था। उसका सिर बहुत बड़ा था, जैसे किसी बिल्ली के बच्चे के माथे पर तरबूज रखा हो। वह हाथ-पाँव से नहीं, बल्कि सिर से लड़ता था। जब वह किसी के पेट या छाती में सिर मारता, तो वह लड़का दर्द से चिल्ला उठता। उसकी इस टक्कर को सबने ‘रेल-बम्बा’ नाम दे रखा था।

लेखक का स्कूल बहुत छोटा था। उसमें केवल नौ कमरे थे, जो अंग्रेज़ी के अक्षर ‘H’ की तरह बने हुए थे। सबसे पहला कमरा हेडमास्टर श्री मदनमोहन शर्मा जी का था। वे हर दिन प्रेयर के समय बाहर आते थे। पी.टी. के अध्यापक प्रीतम चंद बच्चों को लाइन में खड़ा करते थे। वे बहुत सख्त थे और कभी-कभी बच्चों को सज़ा भी देते थे। लेकिन हेडमास्टर जी का स्वभाव बिल्कुल अलग था। वे पाँचवीं और आठवीं कक्षा को अंग्रेज़ी पढ़ाते थे और कभी किसी बच्चे को नहीं मारते थे। सिर्फ कभी-कभी गुस्से में हल्की चपत लगा देते थे। कुछ बच्चों को छोड़कर बाकी सभी बच्चे रोते हुए स्कूल जाते थे। फिर भी स्कूल कभी-कभी अच्छा लगता था, खासकर जब पी.टी. टीचर हमें रंग-बिरंगी झंडियाँ देकर स्काउटिंग का अभ्यास करवाते थे। अगर हम अच्छा काम करते, तो वे ‘शाबाश’ कहकर हमारी तारीफ भी करते थे।

लेखक को हर साल अगली कक्षा में जाने पर पुरानी किताबें मिल जाती थीं। हमारे हेडमास्टर एक अमीर लड़के को उसके घर जाकर पढ़ाते थे। वह लड़का लेखक से एक कक्षा आगे था, इसलिए उसकी पुरानी किताबें लेखक को मिल जाती थीं। इन्हीं किताबों की मदद से लेखक अपनी पढ़ाई जारी रख पाया। बाकी चीज़ों पर पूरे साल में सिर्फ एक-दो रुपये खर्च होते थे। उस समय एक रुपये में एक सेर घी और दो रुपये में एक मन गेहूं मिल जाता था। इसलिए ज़्यादातर अच्छे घरों के ही बच्चे स्कूल जाते थे। लेखक अपने परिवार का पहला लड़का था जो स्कूल गया।

यह समय दूसरे विश्व युद्ध का था। नाभा रियासत के राजा को अंग्रेज़ों ने सन् 1923 में गिरफ़्तार कर लिया था। युद्ध शुरू होने से पहले उनकी मृत्यु तमिलनाडु के कोडैकनाल में हो गई थी। उनका बेटा उस समय इंग्लैंड में पढ़ रहा था। उन दिनों अंग्रेज़ लोग गाँव-गाँव जाकर नौजवानों को फौज में भर्ती करने के लिए नौटंकी वालों को साथ ले जाते थे। वे फौज की अच्छी ज़िंदगी दिखाकर युवाओं को फौज में जाने के लिए आकर्षित करते थे। जब लेखक स्काउटिंग की वर्दी पहनकर परेड करते थे, तो उन्हें भी वैसा ही गर्व और उत्साह महसूस होता था।

लेखक ने मास्टर प्रीतमचंद को कभी हँसते हुए नहीं देखा। उनका पहनावा ऐसा था कि बच्चे उन्हें देखकर डर जाते थे। सभी उनसे डरते और उन्हें पसंद नहीं करते थे क्योंकि वे बहुत सख्त सज़ा देते थे। वे चौथी कक्षा में फ़ारसी पढ़ाते थे। एक बार बच्चों को एक शब्द ठीक से याद न होने पर उन्होंने सभी को मुर्गा बना दिया। जब हेडमास्टर शर्मा जी ने यह देखा तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। वे प्रीतम सिंह पर चिल्लाए और बोले, “तुम क्या कर रहे हो? क्या ऐसे छोटे बच्चों को सज़ा दी जाती है? अभी के अभी इसे बंद करो!” वे गुस्से से काँपते हुए अपने कमरे में चले गए। इस घटना के बाद प्रीतम सिंह कई दिनों तक स्कूल नहीं आए। शायद हेडमास्टर ने उन्हें नौकरी से हटा दिया था। अब फ़ारसी पढ़ाने का काम शर्मा जी या मास्टर नाहरिया राम जी ने संभाल लिया। पी.टी. मास्टर स्कूल की बजाय अपने घर में आराम करते रहते थे। उन्हें अपनी नौकरी की कोई चिंता नहीं थी। वे अपने दो पिंजरे वाले तोतों को रोज़ कई बार भीगे बादाम खिलाते और उनसे प्यार से बातें करते। यह सब लेखक और उनके दोस्तों को बहुत अजीब लगता था। वे सोचते थे कि इतना सख्त पी.टी. मास्टर तोतों से इतनी प्यार भरी बातें कैसे कर सकता है! यह बात उनकी समझ से बाहर थी, इसलिए वे उन्हें किसी जादुई इंसान जैसा मानते थे।

पाठ से शिक्षा

यह पाठ हमें बचपन की यादों के जरिए यह सिखाता है कि बच्चे खेलना बहुत पसंद करते हैं, चाहे उन्हें मार ही क्यों न पड़ जाए। गरीब बच्चों का बचपन कठिनाइयों से भरा होता है, फिर भी वे छोटे-छोटे पलों में खुशी ढूँढ ही लेते हैं। स्कूल और पढ़ाई कभी-कभी बच्चों के लिए डर और बोझ बन जाते हैं, खासकर जब पढ़ाई कठिन हो या शिक्षक सख्त हों। लेकिन जब कोई शिक्षक प्यार और समझदारी से पेश आता है, तो बच्चे उनसे सच्चा सम्मान और लगाव महसूस करते हैं। यह पाठ यह भी बताता है कि शिक्षक का व्यवहार बच्चों पर बहुत गहरा असर डालता है। साथ ही, यह भी सिखाता है कि अनुशासन जरूरी है लेकिन उसमें दया और समझ भी होनी चाहिए। बचपन के दिनों की सादगी, मासूमियत और संघर्ष हमें जीवन की सच्ची कीमत समझाते हैं।

शब्दार्थ

  • नंगे पाँव: बिना जूते-चप्पल के
  • फटी-मैली सी कच्छी: फटी और गंदी अंडरवियर
  • तार-तार हो जाना: बहुत बुरी तरह फट जाना
  • पिटाई करतीं: मार लगाना
  • गुस्सैल: जो बहुत जल्दी गुस्सा हो जाए
  • बस्ता तालाब में फेंक आए: स्कूल का बैग तालाब में फेंक दिया
  • तहसीलदार: सरकारी अफसर
  • लंडा पढ़वाकर: बाजार की लिपि (शॉर्टहैंड) सिखवाकर
  • मुनीमी: हिसाब-किताब लिखने का काम
  • अलिफ बे जीम-च: उर्दू और फ़ारसी के अक्षरों के नाम
  • एह खेडण दे दिन चार: खेलने-कूदने के दिन बहुत जल्दी बीत जाते हैं (लोक कहावत)
  • डंडियाँ: रास्ते में उगे झाड़ीनुमा पौधे
  • मोतिया: सफेद रंग का खुशबूदार फूल
  • चपड़ासी: स्कूल में काम करने वाला सहायक व्यक्ति
  • बहियाँ: हिसाब-किताब की बही (कॉपी)
  • गंध: महक या खुशबू
  • गाल पर चपत: गाल पर हल्की मार
  • ‘गुड’ झे: “Good” शब्द का बहुवचन (गुड़ियों की तरह कई गुड)
  • फौज के तमगे: सेना में मिलने वाले मेडल या सम्मान
  • हरफनमौला: जो हर काम में माहिर हो
  • चमड़ी उधेड़ना: बहुत बुरी तरह मारना
  • डिसिप्लिन: अनुशासन
  • खुरियाँ: जूतों के नीचे लगी धातु की कीलें (जैसे घोड़े की नाल)
  • मोच आना: मांसपेशियों में खिंचाव आ जाना
  • मुअत्तल करना: कुछ समय के लिए नौकरी से हटाना
  • बहाल करना: नौकरी पर दोबारा वापस लाना
  • डायरेक्टर: विभाग का उच्च अधिकारी
  • महकमाए तालीम: शिक्षा विभाग
  • चौबारा: ऊपर की मंज़िल या छोटा कमरा जो ऊपर हो
  • तोतों को बादाम की गिरियाँ: तोतों को बादाम खिलाना
  • रेल-बम्बा: बहुत ज़ोर से सिर मारने की ताकत (रेल इंजन जैसा टक्कर)
  • पीठ ऊँची करो: झुककर कान पकड़ते समय पीठ सीधी करने का आदेश
  • फुंकारना: गुस्से में साँड़ की तरह आवाज़ करना
  • टाँगों में जलन: पैर में दर्द या थकान महसूस होना
  • मुस्कराते न देखा: कभी हँसते नहीं देखा
  • सतिगुर के भय से प्रेम: डर से सम्मान और लगाव पैदा होना

1. हरिहर काका  – पाठ का सार

कहानी का परिचय

“हरिहर काका” एक हिंदी कहानी है जो एक गाँव के बुजुर्ग व्यक्ति हरिहर काका के जीवन और उनकी मुश्किलों के बारे में बताती है। हरिहर काका एक साधारण किसान हैं जो अपने परिवार और गाँव की ठाकुरबारी (मंदिर) के बीच फंस जाते हैं। उनके पास कुछ जमीन है, जिसे उनके भाई और ठाकुरबारी के लोग अपने नाम करवाना चाहते हैं। इस वजह से उन्हें बहुत दबाव और अन्याय का सामना करना पड़ता है। 

कहानी में दिखाया गया है कि हरिहर काका को उनके भाइयों और ठाकुरबारी के साधुओं द्वारा परेशान किया जाता है। उनकी जमीन के लिए उन पर दबाव डाला जाता है और यहाँ तक कि उन्हें बंधक भी बनाया जाता है। कहानी यह दर्शाती है कि समाज में लालच और सत्ता की वजह से कैसे एक साधारण व्यक्ति को परेशान किया जा सकता है। साथ ही, यह हरिहर काका की हिम्मत और उनकी सच्चाई की लड़ाई को भी दिखाती है। यह कहानी सामाजिक अन्याय, परिवारिक रिश्तों, और धार्मिक संस्थानों के दुरुपयोग को उजागर करती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में सही और गलत के बीच की लड़ाई कितनी जटिल हो सकती है।

मुख्य बिंदु

  • हरिहर काका की स्थिति: हरिहर काका एक गाँव में रहते हैं और उनकी जमीन को लेकर विवाद है। उनके भाई और ठाकुरबारी (मंदिर) वाले उनकी जमीन हड़पना चाहते हैं।
  • परिवार और ठाकुरबारी का दबाव: हरिहर काका के भाई उन्हें जमीन अपने नाम करने के लिए दबाव डालते हैं। ठाकुरबारी के लोग भी उनके अंगूठे के निशान लेकर जमीन हड़पने की कोशिश करते हैं।
  • हरिहर काका का अपहरण: ठाकुरबारी के लोगों ने हरिहर काका को बंधक बनाकर उनके अंगूठे के निशान लिए, लेकिन पुलिस ने उन्हें बचा लिया।
  • काका का दुख और विश्वास: हरिहर काका को अपने भाइयों और ठाकुरबारी वालों पर भरोसा नहीं रहा। वे अपनी जमीन किसी को नहीं देना चाहते, चाहे कुछ भी हो जाए।
  • गाँव का माहौल: गाँव में ठाकुरबारी का बहुत प्रभाव है। लोग वहाँ पूजा करते हैं, लेकिन कुछ लोग इसे लालच और धोखे का केंद्र मानते हैं।
  • हरिहर काका का फैसला: काका अपनी जमीन न भाइयों को देते हैं, न ठाकुरबारी को। वे डर के बावजूद अपनी बात पर अडिग रहते हैं।
  • सामाजिक अन्याय: कहानी में लालच, धोखे और परिवार में विश्वासघात की समस्या दिखाई गई है। हरिहर काका समाज और परिवार के अन्याय का शिकार हैं।
  • पुलिस और सुरक्षा: पुलिस ने काका को बचाया, और अब उनकी सुरक्षा के लिए पहरा है। लेकिन गाँव में जमीन को लेकर तनाव बना हुआ है।

पाठ का सार

कहानी ‘हरिहर काका’ गाँव में रहने वाले एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की कहानी है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन सादगी से बिताया, लेकिन जीवन के अंतिम समय में उन्हें बेबसी और अकेलेपन का सामना करना पड़ा। उनके अपने परिवार के लोग स्वार्थी हो गए थे और हर कोई अपनी फायदेमंदी में लगा हुआ था।

कहानी में लेखक हरिहर काका से गहराई से जुड़ा हुआ है। बचपन में हरिहर काका लेखक को बहुत प्यार करते थे, उसे कंधे पर बैठाकर घुमाते थे। बड़े होने पर लेखक और हरिहर काका अच्छे दोस्त बन गए। अब जब हरिहर काका बूढ़े हो गए हैं, उन्होंने बोलना बंद कर दिया है और शांत रहते हैं। लेखक के अनुसार उनके जीवन की कहानी जानना ज़रूरी है। वे उसी गाँव के रहने वाले हैं जहाँ लेखक रहता है।

गाँव आरा नामक कस्बे से 40 किलोमीटर दूर है। गाँव में ठाकुर जी का एक बड़ा मंदिर है, जिसे ठाकुरबारी कहा जाता है। यहाँ लोग मन्नत माँगते हैं और विश्वास करते हैं कि मन्नत ज़रूर पूरी होती है। मंदिर के पास बहुत सी ज़मीन है। पहले हरिहर काका मंदिर में नियमित जाते थे, पर अब उन्होंने वहाँ जाना बंद कर दिया है।

हरिहर काका के चार भाई हैं। सब विवाहित हैं और उनके बच्चे भी बड़े हो गए हैं। हरिहर काका के खुद के बच्चे नहीं हैं। वे अपने भाइयों के साथ रहते हैं। उनके पास 60 बीघा खेत हैं, जिनमें से 15-15 बीघा हर भाई के हिस्से में आता है। सभी खेती पर निर्भर हैं। भाइयों ने अपनी पत्नियों को हरिहर काका की सेवा करने को कहा, और कुछ समय तक बहुएँ उनकी सेवा करती रहीं, लेकिन बाद में सेवा में लापरवाही होने लगी। एक दिन ऐसा भी आया जब उन्हें पीने के लिए पानी देने वाला भी कोई नहीं था। बचा-खुचा खाना उनकी थाली में परोसा जाने लगा।

एक दिन उनके भतीजे का मित्र शहर से आया। उसके लिए स्वादिष्ट खाना बनाया गया, लेकिन काका को वही रूखा-सूखा खाना मिला। वे गुस्से में थाली उठाकर आँगन में फेंक देते हैं और बहुओं को डाँटते हैं। उस समय मंदिर के पुजारी वहीं मौजूद थे। उन्होंने जाकर महंत को सारी बात बताई। महंत ने इसे अच्छा संकेत मानते हुए काका को मंदिर बुलवाया।

महंत ने हरिहर काका को समझाया कि वे अपनी ज़मीन मंदिर के नाम कर दें ताकि उन्हें बैकुंठ (मोक्ष) की प्राप्ति हो और लोग उन्हें हमेशा याद रखें। काका थोड़े परेशान हो जाते हैं और सोचने लगते हैं। महंत ने मंदिर में उनके रहने-खाने की व्यवस्था कर दी। जैसे ही यह बात भाइयों को पता चली, वे उन्हें मनाने ठाकुरबारी आए लेकिन काका वापस नहीं गए। फिर अगली सुबह वे फिर आए, उनके पाँव पकड़ कर रोने लगे, माफ़ी माँगी। काका को दया आ गई और वे घर लौट आए।

अब घर में उनकी बहुत सेवा होने लगी। उन्हें जो भी चाहिए होता, तुरंत मिल जाता। गाँव में उनकी चर्चा होने लगी। घर के लोग अब ज़मीन अपने नाम करवाना चाहते थे। लेकिन हरिहर काका ने ऐसे कई उदाहरण देखे थे जिनमें लोग ज़मीन लिखवाकर बाद में पछताए थे। महंत भी बार-बार उन्हें ज़मीन मंदिर को देने के लिए समझाते रहते थे, लेकिन काका पर कोई असर नहीं हुआ।

इसके बाद महंत चिंता करने लगे और एक योजना बनाई। उन्होंने अपने लोगों को हथियारों से लैस कर काका का अपहरण करवा दिया। भाइयों और गाँव वालों को जब यह पता चला तो वे मंदिर पहुँचे, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। फिर उन्होंने पुलिस बुला ली। अंदर महंत ने ज़बरदस्ती काका से सादे कागज़ों पर अँगूठा लगवा लिया। काका बहुत हैरान थे कि महंत ऐसा कर सकते हैं।

पुलिस ने जैसे-तैसे दरवाज़ा खुलवाया। एक कमरे में काका रस्सियों से बँधे मिले, मुँह में कपड़ा ठूँसा हुआ था। उन्हें छुड़ाया गया और भाई उन्हें घर ले गए। अब उनकी बहुत निगरानी होने लगी। रात में दो-तीन लोग उनके पास सोते और दिन में हथियारों से लैस लोग उनके साथ चलते।

फिर उन पर ज़मीन देने का दबाव बनने लगा। एक दिन भाइयों ने उन्हें धमकाया कि अगर ज़मीन नहीं दी तो मारकर घर में गाड़ देंगे। काका ने साफ इनकार किया तो उन्होंने काका की पिटाई कर दी और मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। काका ने चिल्लाने की कोशिश की। गाँव वाले इकट्ठा हुए। महंत को खबर मिली, वह पुलिस के साथ पहुँचे। पुलिस ने काका को छुड़ाया और उनका बयान लिया। उन्होंने बताया कि भाइयों ने ज़बरदस्ती उनसे कागज़ों पर अँगूठा लगवाया है।

अब काका ने पुलिस सुरक्षा की माँग की। वे अब अकेले रहने लगे हैं। उन्होंने एक नौकर रख लिया है। कुछ पुलिसकर्मी उनकी रक्षा करते हैं और उनके पैसों से ऐश करते हैं। एक नेता ने उन्हें ज़मीन पर स्कूल खोलने का सुझाव दिया, पर काका ने मना कर दिया। गाँव में तरह-तरह की बातें हो रही हैं। लोग सोचते हैं कि उनकी मौत के बाद महंत साधुओं को बुलाकर ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेगा।

अब हरिहर काका गूंगे जैसे हो गए हैं। वे चुपचाप बैठे रहते हैं और खाली आँखों से आसमान की ओर देखा करते हैं।

कहानी से शिक्षा

“हरिहर काका” कहानी हमें यह सिखाती है कि जब लोग लालची हो जाते हैं और अपनों के साथ धोखा करते हैं, तो बहुत दुख होता है। हरिहर काका एक सीधे-सादे और अच्छे इंसान थे, लेकिन उनके अपने भाइयों और मंदिर वालों ने उनकी ज़मीन हथियाने के लिए उन्हें धोखा दिया और जबरदस्ती की। इस कहानी से हमें यह समझ आता है कि हमें हमेशा ईमानदार रहना चाहिए और जब हमारे साथ गलत हो, तो उसका विरोध करना चाहिए, चाहे सामने अपने ही परिवार वाले हों या ताकतवर लोग। यह कहानी यह भी दिखाती है कि लालच रिश्तों को बिगाड़ देता है और हमें अपने हक की रक्षा करनी चाहिए।

शब्दार्थ

  • यंत्रणाओं: यातनाओं
  • आसक्ति: लगाव
  • मझधार: बीच में
  • ठाकुरबारी: देवस्थान
  • संचालन: चलाना
  • दवनी: गेहूँ/धान निकालने की प्रक्रिया
  • अगउम: प्रयोग में लाने से पहले देवता के लिए निकाला गया अंश
  • प्रवचन: उपदेश
  • मशगूल: व्यस्त
  • तत्क्षण: उसी पल
  • अकारथ: बेकार
  • बय: वसीयत
  • वय: उम्र
  • महटिया: टाल जाना
  • छल, बल, कल: धोखा, शक्ति, बुद्धि
  • आच्छादित: ढका हुआ