3. टोपी शुक्ला – Long Question answer

प्रश्न 1: एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को किन भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा? मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
 टोपी नवीं कक्षा में दो बार फ़ेल हो गया। एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को अनेक भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वह अकेला पड़ गया था क्योंकि उसके दोस्त दसवीं कक्षा में थे और नई कक्षा में से कोई उसका दोस्त न बन सका था। वह अध्यापकों की हँसी का पात्र बनता चला गया। अध्यापक जब भी किसी न पढ़ने वाले बच्चे को टोकते तो हमेशा उसी का उदाहरण देते, ‘क्यों क्या बात है? राम अवतार (या कोई भी बच्चा ) बलभद्र की तरह इसी दर्जे में टिके रहना चाहते हो। इस पर वह शर्म से बिल्कुल पानी-पानी हो जाता और बाकी बच्चे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगते। अपनी कक्षा में वह अच्छा खासा बूढ़ा नज़र आता था। अपने भरे-पूरे घर की तरह अब वह स्कूल में भी बिल्कुल अकेला हो गया था। मानवीय मूल्यों की दृष्टि से देखा जाए, तो किसी की भावनाओं को इस प्रकार से ठेस पहुँचाना, उसे प्रताड़ित करना सर्वथा अनुचित है। ऐसे समय में माता-पिता ही नहीं समाज और शिक्षकवर्ग सभी को एक सकारात्मक भूमिका निभानी पड़ेगी। सफलता या असफलता जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। किसी एक परीक्षा में असफल होने से हमारा जीवन रुकता नहीं, वहाँ से तो जीवन को एक नई दिशा और अधिक सुदृढ़ता के साथ देने की आवश्यकता है । आज विद्यार्थियों के दिलों-दिमाग़ में यह बात और अधिक सुदृढ़ता से स्थापित करने की आवश्यकता है। तभी परीक्षा परिणामों के बाद होने वाली आत्महत्याओं को रोकने में समाज एक सकारात्मक पहल कर सकेगा।

प्रश्न 2: ‘अलग-अलग धर्म और जाति मानवीय रिश्तों में बाधक नहीं होते।’ ‘टोपी शुक्ला’ पाठ के आलोक में प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर: 
‘अलग-अलग धर्म और जाति मानवीय रिश्तों में बाधक नहीं होते।’ लेखक डॉ० राही मासूम रज़ा ने अपने उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ में इसी विचारधारा को प्रतिपादित किया है । लेखक ने बताया है कि टोपी कट्टर हिंदू परिवार से तथा इफ़्फ़न कट्टर मौलवी परिवार से संबंध रखता था, किंतु फिर भी टोपी और इफ़्फ़न की दादी में एक अटूट मानवीय रिश्ता था । दोनों आपस में स्नेह के बंधन में बँधे थे। टोपी अपने घर में उपेक्षित था उसे इफ़्फ़न के घर में अपनापन मिलता था। दादी के आँचल की छाँव में बैठकर वह स्नेह का अपार भंडार पाता था। उसके लिए रीति-रिवाज, सामाजिक हैसियत, खान-पान आदि कोई महत्त्व नहीं रखता था। इफ़्फ़न की दादी भी भरे घर में अकेली थी, उनकी भावनाओं को समझने वाला भी घर में कोई नहीं था । अतः दोनों का रिश्ता धर्म और जाति की सीमाएँ पार कर प्रेम के बंधन में बँध गया। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे थे। लेखक ने हमें समझाया है कि जब मन की भावनाएँ मेल खा जाती हैं तो मज़हब और जाति के बंधन बेमानी हो जाते हैं। अतः स्पष्ट हो जाता है कि टोपी व इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग मज़हब और जाति के होने पर भी परस्पर प्रेम व स्नेह की अदृश्य डोर में बँधे हुए थे।

प्रश्न 3. टोपी एक सुविधा – संपन्न परिवार से था, फिर भी इफ़्फ़न की हवेली की तरफ उसके खिंचे चले जाने के क्या कारण थे? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
 टोपी एक सुविधा संपन्न परिवार से था, फिर भी इफ़्फ़न की हवेली की तरफ़ वह बरबस खिंचा चला जाता था क्योंकि अपने भरे-पूरे घर में वह बिल्कुल अकेला था। उसकी भावनाओं को घर में कोई नहीं समझता था। दादी तो उसकी हर बात में कमी निकालती थीं। दादी उसकी भाषा पर भी उसे डाँटती थीं। माँ को उसकी इफ़्फ़न से दोस्ती पर नाराज़गी थी। बड़े भाई मुन्नी बाबू ने भी स्वयं कबाब खाकर उसका इल्ज़ाम टोपी पर लगाकर उसकी पिटाई करवा दी थी । छोटा भाई भैरव भी अक्सर उसे तंग करता रहता था । इन सबके विपरीत इफ़्फ़न और उसकी दादी से उसे अपनेपन का एहसास मिलता था। दादी तो उसे बहुत प्यार करती थी। वह जब भी इफ़्फ़न के घर जाता, दादी के पास ही बैठता था । टोपी की पूरबी बोली पर यदि इफ़्फ़न के परिवार का कोई सदस्य उसे छेड़ता, तो भी दादी टोपी का ही पक्ष लेती थीं। वे स्वयं भी पूरबी बोली बोलती थीं और इफ़्फ़न के साथ टोपी को भी कहानियाँ सुनाया करती थीं। इसी कारण टोपी ने बार-बार मना करने पर भी इफ़्फ़न की हवेली में जाना नहीं छोड़ा।

प्रश्न 4: इफ़्फ़न के घर जाने के लिए मना करने पर भी टोपी नहीं माना और पिटता रहा। क्यों? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 टोपी एक सुविधा-संपन्न परिवार से था, फिर भी इफ़्फ़न की हवेली की तरफ़ वह बरबस खिंचा चला जाता था क्योंकि अपने भरे-पूरे घर में वह बिल्कुल अकेला था। उसकी भावनाओं को घर में कोई नहीं समझता था। दादी तो उसकी हर बात में कमी निकालती थीं। दादी उसकी भाषा पर भी उसे डाँटती थीं। माँ को उसकी इफ़्फ़न से दोस्ती पर नाराज़गी थी। बड़े भाई मुन्नी बाबू ने भी स्वयं कबाब खाकर उसका इल्ज़ाम टोपी पर लगाकर उसकी पिटाई करवा दी थी । छोटा भाई भैरव भी अक्सर उसे तंग करता रहता था । इन सबके विपरीत इफ़्फ़न और उसकी दादी से उसे अपनेपन का एहसास मिलता था। दादी तो उसे बहुत प्यार करती थी। वह जब भी इफ़्फ़न के घर जाता, दादी के पास ही बैठता था । टोपी की पूरबी बोली पर यदि इफ़्फ़न के परिवार का कोई सदस्य उसे छेड़ता, तो भी दादी टोपी का ही पक्ष लेती थीं। वे स्वयं भी पूरबी बोली बोलती थीं और इफ़्फ़न के साथ टोपी को भी कहानियाँ सुनाया करती थीं। इसी कारण टोपी ने बार-बार मना करने पर भी इफ़्फ़न की हवेली में जाना नहीं छोड़ा।

प्रश्न 5: प्रेम मानवीय रिश्तों की बुनियाद है।’ इसमें उभरने वाले जीवन मूल्यों को टोपी शुक्ला पाठ के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 टोपी शुक्ला नामक पाठ से ज्ञात होता है कि टोपी के घर में उसकी दादी उसके माता-पिता के अलावा एक बड़ा और एक छोटा भाई भी है। उसके घर में काम करने वाली सीता और केतकी नामक दो नौकरानियाँ हैं पर टोपी के लिए इस घर में कोई प्रेम नहीं है। टोपी को यह प्रेम अपने मित्र इफ़्फ़न उसकी दादी और अपने घर की नौकरानी सीता से मिलता है।
इस प्रेम के कारण जाति, धर्म, उम्र, पद, मालिक-नौकरानी का भेद नहीं आने पाता है। प्रेम के अभाव में वह अपने घरवालों से रिश्ता नहीं बना पाता है जबकि जहाँ उसे प्रेम मिलता है वहाँ नए रिश्ते बन जाते हैं। टोपी का अपने परिवार के सदस्यों से खून का रिश्ता है पर वहाँ प्रेम नहीं है और जहाँ रिश्ता नहीं है वहाँ प्रेम के कारण नए रिश्ते का अंकुरण हो जाता है। इस प्रकार नि:संदेह कहा जा सकता है कि प्रेम मानवीय रिश्तों की बुनियाद है।

प्रश्न 6: टोपी और इफ्फ़न की दादी के उस प्रेममयी आत्मीय संबंध का वर्णन कीजिए, जिसके कारण टोपी ने इफ्फ़न से कहा कि तुम्हारी दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती तो अच्छा होता।
उत्तर: 
टोपी और इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग जाति-धर्म से संबंध रखती थी, पर उनमें इतना गहरा प्रेम और आत्मीय भाव था कि जाति-धर्म का बंधन इसके आगे कहीं ठहर न सका। दोनों ही एक-दूसरे का दुख-दर्द समझते थे। टोपी और दादी के संबंध को इफ्फ़न के दादा जीवित होते तो वह भी इस संबंध को बिलकुल उसी तरह न समझ पाते जैसे टोपी के घरवाले न समझ पाए थे।
दोनों अलग-अलग अधूरे थे। एक ने दूसरे को पूरा कर दिया था। दोनों प्यासे थे। एक ने दूसरे की प्यास बुझा दी थी। दोनों अपने घरों में अजनबी और भरे घर में अकेले थे। दोनों ने एक-दूसरे का अकेलापन मिटा दिया था। इसी प्रेममयी आत्मीय संबंध के कारण टोपी ने कहा कि तुम्हारी दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती तो अच्छा रहता।

प्रश्न 7: बच्चे प्यार के भूखे होते हैं। वे उसी के बनकर रह जाते हैं जिनसे उन्हें प्यार मिलता है। इससे आप कितना सहमत हैं? इफ्फ़न और उसकी दादी के संबंधों के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
इफ्फ़न के परिवार में उसकी दादी, उसके अब्बू-अम्मी और दो बहनें थीं। इफ़्फ़न को अपने अब्बू, अपनी अम्मी, अपनी बाजी और छोटी बहन नुजहत से भी प्यार था ही परंतु दादी से वह जरा ज्यादा प्यार किया करता था। अम्मी तो कभीकभार डाँट मार लिया करती थीं। बाजी का भी यही हाल था। अब्बू भी कभी-कभार घर को कचहरी समझकर फैसला सुनाने लगते थे।
नुजहत को जब मौका मिलता उसकी कापियों पर तसवीरें बनाने लगती थीं। बस एक दादी थी जिन्होंने कभी उसका दिल नहीं दुखाया। वह रात को भी उसे बहराम डाकू, अनार परी, बारह बुर्ज, अमीर हमजा, गुलबकावली, हातिमताई, पंच फुल्ला रानी की कहानियाँ सुनाया करती थीं। मैं इससे पूर्णतया सहमत हूँ कि बच्चे प्यार के भूखे होते हैं। और वे उसी के होकर रह जाते हैं, जिनसे उन्हें प्यार मिलता है।

प्रश्न 8: कुछ बच्चों को अपने माता-पिता के पद और हैसियत का कुछ ज्यादा ही घमंड हो जाता है। इसका मानवीय संबंधों पर क्या असर पड़ता है? इसे रोकने के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे? ‘टोपी शुक्ला’ पाठ के आलोक में लिखिए।
उत्तर:
 इफ्फ़न के पिता कलेक्टर थे। उनका तबादला हो जाने के कारण उनके स्थान पर नए कलेक्टर हरनाम सिंह आए। वे उसी बँगले में रहने लगे जिसमें इफ़्फ़न का परिवार रहता था। जब इफ़्फ़न को याद करके टोपी उस बँगले में पहुँचा तो चौकीदार ने उसे अंदर जाने दिया। वहाँ नए कलेक्टर के तीनों बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। उन्होंने टोपी से अभद्रता से बातचीत ही नहीं की बल्कि मारपीट भी की।
इतना ही नहीं, उन्होंने टोपी पर अपना अलसेशियन कुत्ता भी छोड़ दिया जिसके कारण टोपी को सात सुइयाँ लगवानी पड़ीं। ऐसा उन्होंने अपने कलेक्टर पिता के पद और हैसियत के घमंड में किया। मानवीय संबंधों पर इसका यह असर होता है कि वे चूर-चूर हो जाते हैं।
ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति और बढ़ते घमंड को रोकने के लिए बच्चों को प्रेम, सद्भाव, भाई-चारा, पारस्परिक सद्भाव, सभी को समान समझने की भावना, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए तथा इन मूल्यों को बनाए रखते हुए उनके सामने अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत करना चाहिए।

प्रश्न 9: टोपी शुक्ला के विचारों का समाज पर क्या प्रभाव था? उनके विचारों ने समाज में कैसे बदलाव लाया?
उत्तर: 
टोपी शुक्ला के विचार समाज में गहरा प्रभाव डाले। उनके विचारों ने समाज में सामाजिक जागरूकता बढ़ाई और लोगों को समाज में सुधार की दिशा में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने सामाजिक अन्याय, शोषण और दरिद्रता के खिलाफ आवाज उठाई, जिससे लोगों की सोच में बदलाव आया और समाज में सामाजिक सुधार की दिशा में कदम बढ़े।

प्रश्न 10: टोपी शुक्ला की कहानी से कैसे स्वानुभूति और आत्म-प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है? उनके व्यक्तिगत अनुभवों से कुछ उदाहरण दें।
उत्तर:
 टोपी शुक्ला की कहानी से स्वानुभूति और आत्म-प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है। उनके व्यक्तिगत अनुभवों में उनकी संघर्षों और संघर्षों के परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान की महत्वपूर्ण उपयोगिता होती है। उन्होंने अपने जीवन में उठे मुश्किलातों का सामना किया और उन्हें पार करने के लिए आत्म-संयम, संघर्षशीलता, और आत्म-नियंत्रण की महत्वपूर्णता सिखाई। उनके उदाहरण से हम यह सिख सकते हैं कि समस्याओं का सामना कैसे किया जा सकता है और आत्म-विश्वास कैसे बढ़ाया जा सकता है।

2. सपनों के–से दिन – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘सपनों के से दिन’ पाठ में लेखक को स्कूल जाने के नाम से उदासी क्यों आती थी? फिर भी कब और क्यों उसे स्कूल जाना अच्छा लगने लगा ?
उत्तर:
 ‘सपनों के से दिन’ पाठ में लेखक गुरदयाल सिंह कहते हैं कि उन्हें और उनके मित्रों को स्कूल जाना कभी अच्छा नहीं लगता था। पहली कच्ची श्रेणी से लेकर चौथी श्रेणी तक केवल कुछ लड़कों को छोड़कर लेखक और उसके साथी रोते-चिल्लाते ही स्कूल जाया करते थे। उनके मन में स्कूल के प्रति एक प्रकार का भय – सा बैठा हुआ था । उन्हें मास्टरों की डाँट फटकार का भय भी सताता रहता था। स्कूल उन्हें नीरस प्रतीत होता था। इसके बावजूद यही स्कूल उन्हें कुछ विशेष अवसरों पर अच्छा भी लगने लगता था । यह अवसर होता था स्काउटिंग के अभ्यास का । तब पीटी साहब अपना कठोर रूप भूलकर लड़कों के हाथों में नीली-पीली झंडियाँ पकड़ा देते थे। वे इन झंडियों को हवा में लहराने को कहते । हवा में लहराती ये झंडिया बड़ी अच्छी लगती थीं। जब पी०टी० साहब ‘शाबाश’ कहते, तब वे पी०टी० साहब लड़कों को बड़े अच्छे लगते थे। ऐसे अवसर पर लेखक और उनके साथियों को स्कूल जाना अच्छा लगने लगता था।

प्रश्न 2: ‘सपनों के-से दिन’ पाठ के आधार पर बताइए कि बच्चों का खेलकूद में अधिक रुचि लेना अभिभावकों को अप्रिय क्यों लगता था? पढ़ाई के साथ खेलों का छात्र जीवन में क्या महत्त्व है और इससे किन जीवन-मूल्यों की प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: 
‘सपनों के-से दिन’ पाठ में जिस समय का वर्णन हुआ है उस समय अधिकांश अभिभावक अनपढ़ थे। वे निरक्षर होने के कारण शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझते थे। इतना ही नहीं वे खेलकूद को समय आँवाने से अधिक कुछ नहीं मानते थे। अपनी इसी सोच के कारण, बच्चे खेलकूद में जब चोटिल हो जाते और कई जगह छिला पाँव लिए आते तो उन पर रहम करने की जगह पिटाई करते। वे शारीरिक विकास और जीवन-मूल्यों के उन्नयन में खेलों की भूमिका को नहीं समझते थे, इसलिए बच्चों को खेलकूद में रुचि लेना उन्हें अप्रिय लगता था।
छात्रों के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेलों का भी विशेष महत्त्व है। ये खेलकूद एक ओर हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक हैं, तो दूसरी ओर सहयोग की भावना, पारस्परिकता, सामूहिकता, मेल-जोल रखने की भावना, हार-जीत को समान समझना, त्याग, प्रेम-सद्भाव जैसे जीवन-मूल्यों को उभारते हैं तथा उन्हें मजबूत बनाते हैं। इन्हीं जीवन-मूल्यों को अपना कर व्यक्ति अच्छा इनसान बनता है।

प्रश्न 3: मास्टर प्रीतमचंद को स्कूल से निलंबित क्यों कर दिया गया ? निलंबन के औचित्य और उस घटना से उभरने वाले जीवन-मूल्यों पर अपने विचार लिखिए ।
उत्तर:
 एक दिन मास्टर प्रीतमचंद ने चौथी कक्षा के बच्चों को फ़ारसी का शब्द रूप याद करने के लिए दिया था। जब अगले दिन बच्चे उस शब्द-रूप को नहीं सुना पाए, तो प्रीतमचंद ने गुस्से में भरकर उन्हें मुर्गा बना दिया और बर्बरतापूर्वक उनकी पिटाई करने लगे, ऐसा करते हुए उन्हें हेडमास्टर शर्मा जी ने देख लिया। उनसे उनकी यह बर्बरता सहन नहीं हुई और उन्होंने उन्हें निलंबित कर दिया।
मेरे विचार में हेडमास्टर शर्मा जी वैसे बहुत अच्छे इंसान थे, किंतु इस घटना में उन्हें मास्टर प्रीतमचंद को निलंबित न करके इस बात का अहसास करवाना चाहिए था कि बच्चों के साथ इतनी क्रूरता बिलकुल भी उचित नहीं है । विद्यार्थियों के प्रति उनके इस क्रूर व्यवहार के लिए यदि पहले से ही उन्हें समझाया जाता या चेतावनी दी जाती, तो संभवतः वे ऐसा नहीं करते। ऐसा करने से हेडमास्टर शर्मा जी के क्षमाशीलता, सहानुभूति, उदारता जैसे जीवन मूल्यों का पता चलता और हो सकता है कि उनकी चेतावनी से ही मास्टर प्रीतमचंद सुधर जाते तथा उन्हें अपना सच्चा मार्गदर्शक मानने लगते।

प्रश्न 4: मास्टर प्रीतमचंद से डरने और नफरत करने के चार कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 मास्टर प्रीतमचंद से अधिकतर बच्चे डरते थे और कहीं-न-कहीं उनके मन में पी०टी० सर के लिए घृणा की भावना भी थी। उसके बहुत सारे कारण थे। मास्टर प्रीतमचंद का स्वभाव अत्यंत कठोर था । अनुशासन स्थापित करने के नाम पर वे अत्यंत क्रूर हो जाते थे। बच्चों को शारीरिक दंड देना उनके लिए साधारण बात थी । यदि कोई बच्चा हलका सा हिल भी जाए तो मास्टर जी ‘चमड़ी उधेड़ देना’ वाला मुहावरा सही सिद्ध कर देते थे। पढ़ाते समय भी उनमें सहनशीलता का सर्वथा अभाव रहता था । पाठ याद न कर पाने की स्थिति में प्रायः छात्र उनकी क्रूरता के शिकार बन जाते थे। बच्चों के मन में उनके प्रति भय बैठ गया था। छोटे बच्चे तो उनकी कठोरता को झेल ही नहीं पाते थे । वे बच्चों को यमराज जैसे लगते थे। उनके इसी क्रूरतापूर्ण व्यवहार के कारण हेडमास्टर साहब ने उन्हें नौकरी से भी निकलवा दिया था । उनकी यह स्वभावगत थी कि वे न तो अपनी गलती को मानते थे और न ही उसके लिए क्षमा माँगने जाते थे। बच्चों के प्रति त्रुटि स्नेह और प्रेम का उनमें सर्वथा अभाव था। उनकी शाबाशी भी बस पी०टी० परेड के समय ही मिल पाती थी, अन्यथा वे छात्रों को प्रोत्साहित नहीं करते थे।

प्रश्न 5: ‘सपनों के-से दिन’ पाठ में हेडमास्टर शर्मा जी की, बच्चों को मारने-पीटने वाले अध्यापकों के प्रति क्या धारणा थी? जीवन-मूल्यों के संदर्भ में उसके औचित्य पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
 ‘सपनों के-से दिन’ पाठ में वर्णित हेडमास्टर शर्मा जी बच्चों से प्यार करते थे। वे बच्चों को प्रेम, अपनत्व, पुरस्कार आदि के माध्यम से बच्चों को अनुशासित रखते हुए उन्हें पढ़ाने के पक्षधर थे। वे गलती करने वाले छात्र की भी पिटाई करने के पक्षधर न थे। जो अध्यापक बच्चों को मारने-पीटने या शारीरिक दंड देने का तरीका अपनाते थे, उनके प्रति उनकी धारणा अच्छी न थी। ऐसे अध्यापकों के विरुद्ध वे कठोर कदम उठाते थे। ऐसे अध्यापकों को स्कूल में आने से रोकने के लिए वे उनके निलंबन तक की सिफ़ारिश कर देते थे।
हेडमास्टर शर्मा जी का ऐसा करना पूरी तरह उचित था, क्योंकि बच्चों के मन से शिक्षा का भय निकालने के लिए मारपीट जैसे तरीके को बच्चों से कोसों दूर रखा जाना चाहिए। मारपीट के भय से अनेक बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं तो बहुत से डरे-सहमें कक्षा में बैठे रहते हैं और पढ़ाई के नाम पर किसी तरह दिन बिताते हैं। ऐसे बच्चों के मन में अध्यापकों के सम्मान के नाम पर घृणा भर जाती है।

प्रश्न 6: मास्टर प्रीतमचंद को स्कूल से क्यों निलंबित कर दिया गया? निलंबन के औचित्य और उस घटना से उभरने वाले जीवन-मूल्यों पर विचार कीजिए।
उत्तर: 
मास्टर प्रीतमचंद सख्त अध्यापक थे। वे छात्रों की जरा-सी गलती देखते ही उनकी पिटाई कर देते थे। वे छात्रों को फ़ारसी पढ़ाते थे। छात्रों को पढ़ाते हुए अभी एक सप्ताह भी न बीता था कि प्रीतमचंद ने उन्हें शब्द रूप याद करके आने को कहा। अगले दिन जब कोई भी छात्र शब्द रूप न सुना सका तो उन्होंने सभी को मुरगा बनवा दिया और पीठ ऊँची करके खड़े होने के लिए कहा। इसी समय हेडमास्टर साहब वहाँ आ गए। उन्होंने प्रीतमचंद को ऐसा करने से तुरंत रोकने के लिए कहा और उन्हें निलंबित कर दिया।
प्रीतमचंद का निलंबन उचित ही था, क्योंकि बच्चों को इस तरह फ़ारसी क्या कोई भी विषय नहीं पढ़ाया जा सकता है। शारीरिक दंड देने से बच्चों को ज्ञान नहीं दिया जा सकता है। इससे बच्चे दब्बू हो जाते हैं। उनके मन में अध्यापकों और शिक्षा के प्रति भय समा जाता है। इससे पढ़ाई में उनकी रुचि समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 7: ‘सपनों के से दिन’ पाठ के आधार पर लिखिए कि अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई में रुचि क्यों नहीं थी? पढ़ाई को व्यर्थ समझने में उनके क्या तर्क थे? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: 
‘सपनों के से दिन’ पाठ में लेखक ने बताया कि उस समय अधिकांश अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई में कोई विशेष रुचि नहीं थी क्योंकि ज़्यादातर परिवार आर्थिक दृष्टि से विपन्न थे । वे पढ़ाई पर ज़्यादा खर्च नहीं कर सकते थे। उस समय में कॉपियों, पैंसिलों, होल्डरों और स्याही पर साल भर में एक-दो रुपए खर्च होते थे, लेकिन एक रुपए में एक सेर घी या एक मन गंदम (गेहूँ) आ जाता था इसलिए गरीब घरों के लोग पढ़ाई के स्थान पर बच्चों को अपने साथ काम करवाने लग जाते थे। साथ ही वे लोग यह भी सोचते थे कि स्कूल की पढ़ाई धीमी है और जीवन में किसी काम नहीं आएगी। इस पढ़ाई से तो अच्छा यही होगा कि वे अपने बच्चों को हिसाब-किताब सिखाकर मुनीमगिरी करवाएँ या फिर बच्चे खेती या दुकान में उनका हाथ बँटवाएँ।

प्रश्न 8: लेखक ने अपने विद्यालय को हरा-भरा बनाने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन किया है। इससे आपको क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: 
लेखक के विद्यालय में अंदर जाने के रास्ते के दोनों ओर अलियार के बडे ढंग से कटे-छाँटे झाड उगे थे। उसे उनके नीम जैसे पत्तों की गंध अच्छी लगती थी। इसके अलावा उन दिनों क्यारियों में कई तरह के फूल उगाए जाते थे। इनमें गुलाब, गेंदा और मोतिया की दूध-सी कलियाँ होती थीं जिनकी महक बच्चों को आकर्षित करती थी। ये फूलदार पौधे विद्यालय की सुंदरता में वृद्धि करते थे। इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें भी अपने विद्यालय को स्वच्छ बनाते हुए हरा-भरा बनाने का प्रयास करना चाहिए। हमें तरह-तरह के पौधे लगाकर उनकी देखभाल करना चाहिए और विद्यालय को हरा-भरा बनाने में अपना योगदान देना चाहिए।

प्रश्न 9: आज की शिक्षा-व्यवस्था में विद्यार्थियों को अनुशासित बनाए रखने के लिए क्या तरीके निर्धारित हैं? ‘सपनों के से दिन’ पाठ में अपनाई गई विधियाँ आज के संदर्भ में कहाँ तक उचित लगती हैं? जीवन-मूल्यों के आलोक में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए ।
उत्तर: 
‘सपनों के से दिन’ पाठ के अनुसार विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए उन्हें डराया जाता था। छात्र पी०टी० के अध्यापक से बहुत डरते थे । वे छात्रों को बुरी तरह मारते-पीटते थे उनकी डाँट सुनकर छात्र थर-थर काँपते थे । उनके व्यवहार को दिखाने के लिए पाठ में ‘खाल खींचने’ जैसे मुहावरे का प्रयोग किया गया है उस समय की शिक्षा पद्धति में डाँट फटकार की बहुत अहमियत थी । शिक्षा भय की वस्तु समझी जाती थी । मुर्गा बनाना, थप्पड़ मारना, झिड़कना और डंडे मारना, उस समय ऐसे कठोर दंड थे कि जिनसे बालकों को न केवल शारीरिक कष्ट होता था, बल्कि उन्हें मानसिक यंत्रणा भी दी जाती थी ।
इन सबसे हटकर वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इस प्रकार के दंड का कोई प्रावधान नहीं है। अब छात्रों को मारना या पीटना कानूनी अपराध है । आजकल बच्चों को सुधारने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाए जाते हैं। इन तरीकों से उनके अंदर अनुशासन, आदर-भाव, सहयोग, परस्पर प्रेम, कर्मनिष्ठा आदि गुणों का विकास होता है । उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को पुरस्कार दिए जाते हैं। जो अपने आप में शिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया एक उत्तम कदम है। यूँ भी मारने-पीटने से बच्चों के मन में शिक्षा के प्रति अरुचि ही पैदा होती है। तनाव मुक्त एवं शांत सौहार्दपूर्ण वातावरण में दी गई शिक्षा अधिक जीवनोपयोगी सिद्ध होगी।

प्रश्न 10: लेखक और उसके साथियों द्वारा गरमी की छुट्टियाँ बिताने का ढंग आजकल के बच्चों द्वारा बिताई जाने वाली छुट्टियों से किस तरह अलग होता था?
उत्तर:
 लेखक और उसके साथी गरमी की छुट्टियाँ खेलकूद कर बिताते थे। वे घर से कुछ दूर तालाब पर चले जाते, कपड़े उतार पानी में कूद जाते और कुछ समय बाद, भागते हुए एक रेतीले टीले पर जाकर, रेत के ऊपर लेटने लगते। गीले शरीर को गरम रेत से खूब लथपथ कर उसी तरह भागते, किसी ऊँची जगह से तालाब में छलाँग लगा देते। रेत को गंदले पानी से साफ़ कर फिर टीले की ओर भाग जाते।
याद नहीं कि ऐसा, पाँच-दस बार करते या पंद्रह-बीस बार करते हुए आनंदित होते। आजकल के बच्चों द्वारा ग्रीष्मावकाश पूरी तरह अलग ढंग से बिताया जाता है। अब तालाब न रहने से वहाँ नहाने का आनंद नहीं लिया जा सकता। बच्चे घर में रहकर लूडो, चेस, वीडियो गेम, कंप्यूटर पर गेम जैसे इंडोर गेम खेलते हैं। वे टीवी पर कार्टून और फ़िल्में देखकर अपना समय बिताते हैं। कुछ बच्चे माता-पिता के साथ ठंडे स्थानों या पर्वतीय स्थानों की सैर के लिए जाते हैं।

1. हरिहर काका – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘हरिहर काका’ नामक पाठ में लेखक ने ठाकुरबारी की स्थापना एवं उसके बढ़ते कलेवर के बारे में क्या बताया है?
उत्तर:
 ‘हरिहर काका’ नामक पाठ में लेखक ने ठाकुरबारी की स्थापना एवं उसके विशाल होते कलेवर के बारे में बताया है कि पहले जब गाँव पूरी तरह बसा नहीं था तभी कहीं से एक संत आकर इस स्थान पर झोंपड़ी बना रहने लगे थे। वह सुबहशाम यहाँ ठाकुर जी की पूजा करते थे। लोगों से माँगकर खा लेते थे और पूजा-पाठ की भावना जाग्रत करते थे। बाद में लोगों ने चंदा करके यहाँ ठाकुर जी का एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया। फिर जैसे-जैसे गाँव बसता गया और आबादी बढ़ती गई, मंदिर के कलेवर में भी विस्तार होता गया। लोग ठाकुर जी को मनौती मनाते कि पुत्र हो, मुकदमे में विजय हो, लड़की की शादी अच्छे घर में तय हो, लड़के को नौकरी मिल जाए। फिर इसमें जिनको सफलता मिलती, वह खुशी में ठाकुर जी पर रुपये, जेवर, अनाज चढ़ाते। अधिक खुशी होती तो ठाकुर जी के नाम अपने खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा लिख देते। यह परंपरा आज तक जारी है। इससे ठाकुरबारी का विकास हज़ार गुना अधिक हो गया।

प्रश्न 2: ठाकुरबारी से घर लौटने पर हरिहर काका के प्रति घर वालों का व्यवहार क्यों बदल गया ?
उत्तर: 
ठाकुरबारी से घर लौटने पर हरिहर काका के प्रति घरवालों का व्यवहार बदल गया क्योंकि उनके भाई उनकी जायदाद लेना चाहते थे इसलिए उनके भाई काका का अचानक आदर-सम्मान और सुरक्षा प्रदान करने लगे थे । हरिहर काका को अब दालान में नहीं, बल्कि एक बहुमूल्य वस्तु की तरह सँजोकर, छिपाकर घर के अंदर रखा गया था। उनकी सुरक्षा के लिए अपने रिश्तेदारों के यहाँ से अनेक सूरमाओं को बुला लिया गया । हथियार जुटा लिए गए थे। चौबीसों घंटे पहरे दिए जाने लगे थे क्योंकि उन्हें डर था कि किसी भी समय ठाकुरबारी के लोग हमला करके हरिहर काका को उठा न ले जाएँ। अगर किसी आवश्यक काम से हरिहर काका घर से बाहर गाँव में निकलते तो चार-पाँच लोग हथियारों से लैसे होकर उनके आगे-पीछे चलते। रात में चारों तरफ़ से घेरकर सोते । भाइयों ने डयूटी बाँट ली थीं। आधे लोग सोते तो आधे लोग जागकर पहरा देते रहते थे। रिश्ते-नाते के लोग उनको समझाने भी लगे थे कि अपनी ज़मीन अपने भतीजों के नाम लिख दें।

प्रश्न 3: ‘हरिहर काका के गाँव के लोग ठाकुरबारी और ठाकुर जी के प्रति अगाध भक्ति-भावना रखते हैं।’ हरिहर काका पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 यूँ तो ठाकुरबारी में सदा ही भजन-कीर्तन होता रहता है, पर बाढ़ या सूखा जैसी आपदा की स्थिति में वहाँ तंबू लग जाता है और अखंडकीर्तन शुरू हो जाता है। इसके अलावा गाँव में पर्व-त्योहार की शुरुआत ठाकुरबारी से ही होती है। होली में सबसे पहले गुलाल ठाकुरजी को ही चढ़ाया जाता है। दीवाली का पहला दीप ठाकुरबारी में ही जलता है। जन्म, शादी और जनेऊ के अवसर पर अन्न-वस्त्र की पहली भेट ठाकुर जी के नाम की जाती है। ठाकुरबारी के ब्राह्मण-साधु व्रत-कथाओं के दिन घर-घर घूमकर कथावाचन करते हैं। लोगों के खलिहान में जब फ़सल की मड़ाई होकर अनाज की ढेरी’ तैयार हो जाती है, तब ठाकुर जी के नाम का एक भाग’ निकालकर ही लोग अनाज अपने घर ले जाते हैं।

प्रश्न 4: महंत द्वारा हरिहर काका का अपहरण महंत के चरित्र की किस सच्चाई को सामने लाता है तथा आपके मन में इससे ठाकुरबारी जैसी संस्थाओं के प्रति कैसी धारणा बनती है? बताइए ।
उत्तर: 
महंत द्वारा हरिहर काका का अपरण करवाना उसकी दबंगाई, मौकापरस्ती, लालची, और अनैतिक कार्य करने के लिए तत्पर रहने वाले व्यक्ति की छवि हमारे सामने उभरती है। जो साधु के वेश में ठग है। ऐसे धूर्त लोगों को देख कर, हमारे मन में ठाकुरबारी सदृश संस्थाओं के लिए यही धारणा बनती है कि बदलते परिवेश के साथ ये भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं। अब यहाँ जाकर मनुष्य की आत्मा धैर्य, सुख, शांति प्राप्त नहीं करती। वह इस बात से भयभीत रहती है कि कहीं हरिहर काका जैसी स्थिति हमारी भी न हो जाए। लोभ-लालच और षड्यंत्रों में फँसे साधु-संतों के आचरण से युवा पीढ़ी पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। धार्मिक संस्थाओं और समाज की उच्च आदर्शवादिता से उनका विश्वास उठने लगता है जो किसी भी समाज के लिए हितकारी नहीं है।

प्रश्न 5: लोभी महंत एक ओर हरिहर काका को यश और बैकुंठ का लोभ दिखा रहा था तो दूसरी ओर पूर्व जन्म के उदाहरण द्वारा भय भी दिखा रहा था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
हरिहर काका को समझाते हुए लोभी महंत कह रहा था कि तुम अपने हिस्से की जमीन ठाकुरबारी के नाम लिखकर स्वर्ग प्राप्त करोगे। तुम्हारी कीर्ति तीनों लोकों में फैल जाएगी और सूरज-चाँद के रहने तक तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। इससे साधु-संत भी तुम्हारे पाँव पखारेंगे। सभी तुम्हारा यशोगान करेंगे और तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाएगा। ठाकुर जी के साथ ही तुम्हारी भी आरती गाई जाएगी। महंत उनसे कह रहा था कि पता नहीं पूर्वजन्म में तुमने कौन-सा पाप किया था कि तुम्हारी दोनों पत्नियाँ अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं। तुमने औलाद का मुँह तक नहीं देखा। अपना यह जन्म तुम अकारथ न जाने दो। ईश्वर को एक भर दोगे तो दस भर पाओगे। मैं अपने लिए तो तुमसे माँग नहीं रहा हूँ। तुम्हारा यह लोक और परलोक दोनों बन जाएँ, इसकी राह तुम्हें बता रहा हूँ।

प्रश्न 6: हरिहर काका के साथ उनके भाइयों तथा ठाकुरवाड़ी के महंत ने कैसा व्यवहार किया? क्या आप इसे उचित मानते हैं। तर्क सहित लिखिए ।
उत्तर:
 काका के साथ उनके भाइयों ने तथा ठाकुरवारी के महंत ने बहुत बुरा व्यवहार किया। उनकी नज़र काका की ज़मीन पर थी । पहले तो उन दोनों ने काका की देखभाल की, काका की आवभगत की, परंतु उन्हें जब यह यकीन हो गया कि काका जीते-जी अपनी ज़मीन किसी के नाम नहीं करेंगे, तो वे दोनों काका की जान के दुश्मन बन गए।
ठाकुरवारी के महंत ने काका को मारा और ज़बरदस्ती सादे तथा कुछ लिखे हुए कागज़ों पर उनके अंगूठे के निशान ले लिए। इसी प्रकार काका के भाइयों व उनकी पत्नियों ने काका के साथ हाथापाई की। अगर पुलिस नहीं आती, तो परिवार वाले काका की हत्या भी कर देते । अतः यह स्पष्ट कहा जा सकता है। कि उन दोनों का ही व्यवहार क्रूर व संवेदनहीन था और काका के प्रति उनका व्यवहार निंदनीय, अमानवीय अनुचित था ।

प्रश्न 7: हरिहर काका के लिए उनकी ज़मीन जी का जंजाल कैसे बन गई?
उत्तर: 
हरिहर काका के पास पंद्रह बीघे ज़मीन थी । हरिहर काका की अपनी कोई संतान नहीं थी इसलिए सबकी नज़र हरिहर काका की ज़मीन पर थी । हरिहर काका के तीनों भाइयों एवं उनके परिवार वालों की बुरी नज़र हरिहर काका की ज़मीन पर थी। उन सभी लोगों की लालच की भावना इतनी बढ़ गई थी कि वे सभी हरिहर काका की लम्बी उम्र की दुआ करने के बजाए उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे । हरिहर काका उन्हें बोझ लगने लगे । अवसर देखकर गाँव के ठाकुरबारी के महंत ने हरिहर काका को बुरी तरह मारा-पीटा और अनेक कागज़ों पर ज़बरन अंगूठे के निशान ले लिए।
इस घटना के दौरान ठाकुरबारी के साधु संतों ने हरिहर काका का अपहरण कर लिया, उनको कमरे में बाँध कर भूखा-प्यासा रखा। उन साधु संतों ने हरिहर काका की ज़मीन को हड़पने के लिए गोलियाँ तक चलाई। बड़ी मुश्किल से हरिहर काका जी जान बची। वे वहाँ से किसी प्रकार छूटकर भाइयों के पास आए । उनके भाइयों की भी कुदृष्टि (बुरीनज़र ) काका के हिस्से वाली ज़मीन पर थी। उसी ज़मीन को हथियाने के लिए उनके भाइयों ने हरिहर काका को बहुत मारा-पीटा। यहाँ तक कि उन्हें जान से मारने की कोशिश की और ज़बरदस्ती उनके अंगूठे के निशान अनेक कागज़ों पर ले लिए। यहाँ भी हरिहर काका की जान बाल-बाल बची। इन्हीं कारणों से सारे गाँव में हरिहर काका चर्चा का विषय बन गए थे। गाँव के लोगों की नज़र भी हरिहर काका की ज़मीन पर थी। उपरोक्त कथनों के आधार पर यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि उनकी ज़मीन ही उनके जी का जंजाल बन चुकी थी ।

प्रश्न 8: महंत की बातें सुनकर हरिहर काका किस दुविधा में फँस गए? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
महंत की बातें सुनकर हरिहर काका अपनी जमीन किसे दें-भाइयों को या ठाकुर जी के नाम लिखें; इस दुविधा में फैंस गए। वे सोचने लगे कि पंद्रह बीघे खेत की फ़सल भाइयों के परिवार को देते हैं, तब तो कोई पूछता नहीं, अगर कुछ न दें तब क्या हालत होगी? उनके जीवन में तो यह स्थिति है, मरने के बाद कौन उन्हें याद करेगा? सीधे-सीधे उनके खेत हड़प जाएँगे। ठाकुर जी के नाम लिख देंगे तो पुश्तों तक लोग उन्हें याद करेंगे। अब तक के जीवन में तो ईश्वर के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। अंतिम समय तो यह बड़ा पुण्य कमा लें, लेकिन यह सोचते हुए भी हरिहर काका का मुँह खुल नहीं रहा था। भाई का परिवार तो अपना ही होता है। उनको न देकर ठाकुरबारी में दे देना उनके साथ धोखा और विश्वासघात होगा।

प्रश्न 9: आप हरिहर काका के भाई की जगह होते तो क्या करते?
उत्तर:
 यदि मैं हरिहर काका के भाई की जगह पर होता तो हरिहर काका से पूर्णतया सहानुभूति रखता। मैं मन में यह सदा बिठाए रखता कि हरिहर काका की पत्नी इस दुनिया में नहीं हैं और न उनकी अपनी कोई संतान । परिवार का सदस्य और सहोदर भाई होने के कारण मैं उनके मन में यह भावना आने ही न देता कि वे भरे-पूरे परिवार में अकेले होकर रह गए हैं। मैं उनके खाने और उनकी हर सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखता। ऐसा मैं उनकी ज़मीन-जायदाद के लोभ में नहीं करता, बल्कि पारिवारिक सदस्य सहोदर भाई होने के अलावा मानवता के आधार पर भी करता। मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों से काका के साथ अच्छा व्यवहार करने के लिए कहता ताकि उन्हें ठाकुरबारी जैसी जगह जाने और महंत जैसे ढोंगियों के बहकावे में आने की स्थिति ही न आती। मैं उन्हें खाना-खिलाकर स्वयं खाता तथा उनके साथ कोई भेदभाव न होने देता।

प्रश्न 10: महंत जी ने हरिहर काका को एकांत कमरे में बैठाकर प्रेम से क्या समझाया ? अपने शब्दों में लिखिए ।
उत्तर:
 महंत जी ने एकांत कमरे में हरिहर काका को बैठाकर यह समझाया कि ये रिश्ते-नाते स्वार्थ पर टिके होते हैं। महंत ने हरिहर काका की खूब सेवा की, खूब आवभगत की। महंत ने विभिन्न प्रकार का लालच देकर काका से ज़मीन हथियाने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाए, ताकि काका अपनी ज़मीन ठाकुरवारी के नाम कर दें। महंत ने काका से कहा कि ठाकुरबारी के नाम ज़मीन करने से उन्हें पुण्य मिलेगा और वे सीधा स्वर्ग सिधारेंगे। जब यह ठाकुरबारी रहेगी तब तक आपका नाम भी इसके साथ जुड़ा होगा और इसका फल तुम्हें अगले जन्मों तक मिलेगा इस तरह से महंत ने काका से ज़बरदस्ती कागज़ पर अंगूठे के निशान ले लिए।