14. कारतूस – पाठ का सार

लेखक परिचय

हबीब तनवीर (1923-2009) का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। उन्होंने 1944 में नागपुर से स्नातक किया और ब्रिटेन की नाटक अकादमी से नाट्य-लेखन का अध्ययन किया। वे नाटककार, कवि, पत्रकार, नाट्य निर्देशक, और अभिनेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। हबीब तनवीर को लोकनाट्य के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए जाना जाता है। उन्हें कई पुरस्कारों और पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके प्रमुख नाटकों में “आगरा बाज़ार”, “चरनदास चोर”, और “हिरमा की अमर कहानी” शामिल हैं।

पाठ प्रवेश

अंग्रेज शुरू में इस देश में व्यापारी बनकर आए थे। ताकि किसी को शक न हो, वे पहले सिर्फ व्यापार ही कर रहे थे। लेकिन उनका असली इरादा सिर्फ व्यापार करना नहीं था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई और धीरे-धीरे देश की रियासतों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। जब देशवासियों को इसका एहसास हुआ, तो उन्होंने अंग्रेजों को बाहर निकालने की कोशिशें शुरू कर दीं।

इस पाठ में भी एक ऐसे ही वीर व्यक्ति की कहानी बताई गई है, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजों से लड़ाई की। उसका एक ही मकसद था – अंग्रेजों को देश से निकालना। उसने कंपनी के अफसरों की नींद उड़ा दी थी। वह इतना बहादुर था कि खतरे को खुद बुलाकर अंग्रेज अफसरों के सामने जा पहुंचा। उसने कर्नल को इतनी हिम्मत से जवाब दिया कि कर्नल भी उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सका।

पाठ सार

यह पाठ हबीब तनवीर द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण नाट्य रूपक है, जो भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के समय पर आधारित है। इसमें 1799 की घटनाओं का वर्णन किया गया है, जब अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान में अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए अलग-अलग रियासतों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था।

पाठ में मुख्य रूप से अवध के वज़ीर अली की बहादुरी और अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष को दिखाया गया है। वज़ीर अली अंग्रेज़ों से गहरी नफरत करते थे और उन्हें देश से बाहर निकालने के लिए कई योजनाएँ बना रहे थे। अंग्रेज़ उनसे इतना डरते थे कि उन्हें पकड़ने के लिए जंगलों में अपनी सेना भेज चुके थे, लेकिन वज़ीर अली बार-बार उनकी पकड़ से बच निकलते थे।

कर्नल और लेफ्टिनेंट आपस में वज़ीर अली की बहादुरी की चर्चा करते हैं। वे कहते हैं कि वज़ीर अली ने अंग्रेजों को परेशान कर रखा है और उन्हें देखकर रॉबिनहुड की याद आती है। कर्नल अपने साथी को बताता है कि वज़ीर अली के चाचा, सआदत अली, अंग्रेजों के मित्र बन गए थे और अवध का सिंहासन बचाने के लिए उन्होंने अंग्रेजों को अपनी आधी दौलत और दस लाख रुपये दिए थे।

लेफ्टिनेंट को यह जानकर चिंता होती है कि कई हिंदुस्तानी राजा और नवाब अफगानिस्तान के नवाब को दिल्ली पर हमला करने के लिए बुला रहे हैं। कर्नल भी इस बात से सहमत होता है और कहता है कि अगर ऐसा हुआ, तो अंग्रेजों को हिंदुस्तान में जो कुछ मिला है, वह सब गंवाना पड़ेगा।

कर्नल यह भी बताता है कि वज़ीर अली अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं, क्योंकि उन्होंने कंपनी के एक वकील की हत्या भी कर दी थी। जब वकील ने वज़ीर अली की शिकायतों को अनसुना कर दिया और उन्हें बुरा-भला कहने लगा, तो वज़ीर अली ने गुस्से में आकर चाकू से उसकी हत्या कर दी।

अंग्रेजों को पता था कि वज़ीर अली नेपाल जाना चाहते हैं और वहाँ से अपनी ताकत बढ़ाकर सआदत अली को हटाकर अवध पर कब्ज़ा करना और अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना चाहते हैं। इसलिए अंग्रेजों और नवाब सआदत अली की सेना बहुत सख्ती से वज़ीर अली का पीछा कर रही थी।

पाठ का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य तब आता है जब एक घुड़सवार अंग्रेजी खेमे में आता है और कर्नल से कारतूस माँगता है। कर्नल उसे वज़ीर अली का दुश्मन समझकर दस कारतूस दे देता है। लेकिन जैसे ही कर्नल उसका नाम पूछता है, वह खुद को वज़ीर अली बताता है और कहता है कि चूँकि कर्नल ने उसे कारतूस दिए हैं, इसलिए वह उसकी जान बख्श रहा है। इतना कहकर वह वहाँ से चला जाता है। कर्नल यह देखकर हैरान रह जाता है कि वज़ीर अली कितना बहादुर और चालाक है।

यह पाठ वज़ीर अली के साहस, बुद्धिमानी और अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष को दर्शाता है।

पाठ का निष्कर्ष

यह पाठ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन साहसी योद्धाओं की कहानियों को उजागर करता है, जिन्होंने अंग्रेज़ों की सत्ता को चुनौती दी। वज़ीर अली जैसे नायक इस संघर्ष के प्रतीक थे, जो अपनी बहादुरी और स्वतंत्रता की चाह में हर जोखिम उठाने को तैयार थे।

13. पतझर में टूटी पत्तियाँ – पाठ का सार

कवि परिचय

रवींद्र केलेकर (1925-2010) एक प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक और लेखक थे, जिनका जन्म 7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में हुआ था। वह छात्र जीवन से ही गोवा मुक्ति आंदोलन से जुड़े और अपने लेखन के माध्यम से जन-जीवन, समाज और व्यक्तिगत विचारों को प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में मौलिक चिंतन और मानवीय सत्य की गहरी तलाश दिखाई देती है। केलेकर कोंकणी और मराठी के शीर्ष लेखक माने जाते हैं, और उनकी कई पुस्तकें इन भाषाओं के अलावा हिंदी और गुजराती में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – उजवाढाचे सूर, समिधा, सांगली (कोंकणी), कोंकणीचें राजकरण, जापान जसा दिसला (मराठी), और पतझर में टूटी पत्तियाँ (हिंदी)। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था, जिनमें गोवा कला अकादमी का साहित्य पुरस्कार प्रमुख है।

पाठ प्रवेश

कविता का प्रमुख गुण यह माना जाता है कि वह थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह देती है। जब गद्य रचना में भी यह गुण दिखाई देता है, तो यह अपनी सहजता और सार्थकता के कारण अलग पहचान बनाती है। सरल और संक्षिप्त लेखन आसान नहीं होता, लेकिन फिर भी इसे लेखन की उच्च कला माना जाता है। इस प्रकार की गद्य रचनाएँ सूक्ति, जातक कथाएँ और पंचतंत्र की कहानियों में मिलती हैं। कोंकणी में रवींद्र केलेकर ने भी इसी प्रकार के लेखन का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

प्रस्तुत पाठ के प्रसंग थोड़े में अधिक समझने की प्रेरणा देते हैं। पहला प्रसंग ‘गिन्नी का सोना’ उन लोगों को प्रस्तुत करता है जो अपने जीवन में सुख-साधन जुटाने की बजाय इस दुनिया को जीने और रहने योग्य बनाते हैं। दूसरा प्रसंग ‘झेन की देन’ बौद्ध ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है, जो जापानियों को व्यस्त जीवन के बीच में भी शांति और सुकून के कुछ पल प्रदान करती है।

पाठ का सार

इस पाठ में दो प्रसंग सम्मिलित हैं।1. गिन्नी का सोना

गिन्नी का सोना और शुद्ध सोना दोनों में फर्क होता है। गिन्नी का सोना, जिसमें थोड़ा ताँबा मिलाया जाता है, मज़बूती और चमक दोनों में शुद्ध सोने से बेहतर होता है। इसी प्रकार, आदर्श भी होते हैं। शुद्ध आदर्शों में कुछ व्यावहारिकता मिलाकर लोग उन्हें ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ कहते हैं। लेकिन, जब आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर लाया जाता है, तो आदर्श पीछे हटने लगते हैं और व्यावहारिकता आगे आती है।

गांधीजी को ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर ऊँचा उठाया और व्यावहारिकता को आदर्शों की ऊँचाई पर ले गए। वे ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे, न कि सोने में ताँबा मिलाकर उसकी चमक।

व्यवहारवादी लोग जीवन में लाभ-हानि का हिसाब लगाते हैं और इसलिए वे सफलता प्राप्त करते हैं। हालांकि, आदर्शवादी लोग ही समाज को ऊँचाइयों पर ले जाते हैं और शाश्वत मूल्यों को समाज के लिए प्रदान करते हैं, जबकि व्यवहारवादी लोग समाज को गिराने का काम करते हैं।2. झेन की देन

जापान में मानसिक बीमारियाँ बढ़ने का कारण है जीवन की तेजी और प्रतिस्पर्धा। लोग तेजी से दौड़ते हैं और काम को समय से पहले पूरा करने की कोशिश करते हैं, जिससे दिमाग का तनाव बढ़ता है और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।

एक दिन, लेखक को एक ‘टी-सेरेमनी’ में ले जाया गया, जो जापानी चाय-पीने की विधि है। यहाँ वातावरण अत्यंत शांत और गरिमापूर्ण था। चाय पीने की यह विधि तीन लोगों के बीच शांति बनाए रखने पर आधारित थी, और चाय के प्याले में केवल दो घूँट होते थे।

लेखक ने महसूस किया कि चाय पीते समय दिमाग की रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ती है और वह पूर्ण शांति का अनुभव करता है। भूतकाल और भविष्य के विचार उसकी मन से मिट गए और केवल वर्तमान क्षण का अनुभव हुआ, जो अनंतकाल जितना विस्तृत था। इस अनुभव ने लेखक को सिखाया कि जीने का सही तरीका क्या है, और यह झेन परंपरा की बड़ी देन है।

12. अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले – पाठ का सार

लेखक परिचय

निदा फ़ाज़ली (12 अक्टूबर 1938 – 8 फरवरी 2016) एक प्रसिद्ध उर्दू कवि और लेखक थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ और बचपन ग्वालियर में बीता। वे साधारण और बोलचाल की भाषा में ऐसी​​​​​ कविताएँ लिखते थे, जो हर किसी के दिल को छू लेती थीं। उनकी लेखनी में गहरी बातों को आसान और कम शब्दों में कहने की खासियत थी। उनकी पहली कविता पुस्तक “लफ़्ज़ों का पुल” थी। उनकी शायरी की किताब “खोया हुआ सा कुछ” के लिए 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। उन्होंने अपनी आत्मकथा “दीवारों के बीच” और “दीवारों के पार” में लिखी। निदा फ़ाज़ली फिल्म उद्योग से भी जुड़े थे। उनकी रचनाएँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।

निदा फ़ाज़ली

मुख्य बिंदु

  • प्रकृति और मानव का रिश्ता: धरती सभी जीवों के लिए बनी थी, लेकिन इंसान ने इसे अपनी जागीर बना लिया और दूसरों को बेघर कर दिया।
  • इंसान की लालच: इंसान ने न सिर्फ़ जानवरों को, बल्कि अपनी ही जात को भी नुकसान पहुँचाया, बिना किसी के सुख-दुख की परवाह किए।
  • पौराणिक कहानियाँ: सुलेमान (सोलोमन) और नूह की कहानियाँ बताती हैं कि पुराने समय में लोग सभी जीवों का सम्मान करते थे।
  • प्रकृति का असंतुलन: इंसान की हरकतों से प्रकृति नष्ट हो रही है, जिससे गर्मी, बाढ़, तूफान और बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
  • संवेदनशीलता की कमी: पहले लोग दूसरों के दुख को समझते थे, जैसे लेखक की माँ ने कबूतरों के लिए दुखी होकर रोज़ा रखा। अब ऐसी संवेदना कम हो गई है।
  • आधुनिक बदलाव: बढ़ती आबादी और शहरीकरण ने प्रकृति और जीवों के घर छीन लिए, जैसे लेखक के घर में कबूतरों का घोंसला हटाया गया।
  • संदेश: सभी जीवों और प्रकृति का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि धरती सबकी साझा है।

पाठ का सार 

इस पाठ में बताया गया है कि इंसान नाम का जीव बहुत स्वार्थी हो गया है। वह हर चीज़ को अपने पास रखना चाहता है और उसकी यह लालच कभी खत्म नहीं होती। पहले उसने जानवरों और पक्षियों से उनका घर छीन लिया, अब वह अपने ही जैसे इंसानों को भी बेघर करने से नहीं डरता। वह अब इतना खुदगर्ज़ हो गया है कि उसे न तो किसी के दुख-सुख की परवाह है और न ही किसी की मदद करने की इच्छा।

लेखक इस पाठ में ऐसे लोगों के उदाहरण देते हैं जो सभी जीवों की रक्षा को अपना कर्तव्य मानते थे। पहला उदाहरण सुलेमान का है। सुलेमान, ईसा से 1025 साल पहले एक राजा थे। वे सभी पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे। एक बार जब वह अपनी सेना के साथ जा रहे थे, तो कुछ चींटियों ने घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी और डरकर एक-दूसरे से कहा, “जल्दी अपने-अपने बिलों में छिप जाओ।” सुलेमान ने उनकी बात सुन ली और उन्हें समझाया कि घबराओ नहीं, खुदा ने मुझे सबकी रक्षा के लिए भेजा है, मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। 

इसी तरह की एक और घटना सिंधी भाषा के मशहूर कवि शेख अयाज़ ने अपनी आत्मकथा में लिखी है। एक दिन उनके पिता कुएँ से नहाकर लौटे और जैसे ही रोटी खाने बैठे, उन्होंने अपनी बाजू पर एक काले चींटे को चलते देखा। उन्होंने तुरंत खाना छोड़ दिया। माँ ने पूछा कि क्या खाना पसंद नहीं आया? तो उन्होंने कहा, “ऐसी बात नहीं है, मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। मैं अब उसे उसके घर, यानी कुएँ के पास छोड़ने जा रहा हूँ।” 

शेख अयाज़

लेखक ने नूह का भी उदाहरण दिया है। नूह एक पैगंबर थे, जिनका असली नाम लश्कर था। अरब में लोग उन्हें नूह इसलिए कहते थे क्योंकि वे दूसरों के दुःख में हमेशा दुखी रहते और सारी उम्र रोते रहे। वे बहुत ही भावुक और करुणा से भरे हुए इंसान थे।

लेखक कहता है कि जब धरती बनी थी, तब पूरा संसार एक परिवार की तरह था। सब मिल-जुलकर रहते थे। लेकिन अब दुनिया बंट गई है और लोग एक-दूसरे से दूर हो गए हैं। वातावरण में भी बहुत बदलाव आ गया है। अब गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है, बरसात समय पर नहीं होती, और आए दिन भूकंप, बाढ़, तूफ़ान और नई-नई बीमारियाँ फैलती रहती हैं। ये सब इस कारण हो रहा है क्योंकि इंसान ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की है।

लेखक आगे कहता है कि जो जितना बड़ा होता है, उसे गुस्सा कम आता है, लेकिन जब आता है तो वह बहुत भयानक होता है। यही बात समुद्र के साथ भी हुई। जब समुद्र को गुस्सा आया, तो एक रात उसने अपनी लहरों पर दौड़ते हुए तीन जहाजों को ऐसे उठाकर फेंक दिया जैसे कोई बच्चा गेंद फेंकता है।

लेखक बताता है कि बचपन में उसकी माँ हमेशा समझाया करती थीं कि हमें प्रकृति और जानवरों के साथ प्यार और आदर से पेश आना चाहिए। माँ कहती थीं कि शाम के समय पेड़ों से पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए क्योंकि उस समय पेड़ दुखी होते हैं। पूजा के समय फूल नहीं तोड़ने चाहिए क्योंकि उस वक्त फूलों को तोड़ना अपशकुन माना जाता है और ऐसा करने से वे श्राप देते हैं। माँ यह भी कहती थीं कि जब नदी के पास जाओ तो उसे नमस्कार करना चाहिए, इससे वह खुश होती है। साथ ही, कबूतरों और मुर्गों को कभी तंग नहीं करना चाहिए क्योंकि वे भी हमारे लिए खास और पूजनीय माने जाते हैं।

लेखक बताता है कि ग्वालियर में उनके पुराने मकान के बरामदे में दो रोशनदान थे, जहाँ एक कबूतर जोड़े ने घोंसला बनाया था। एक दिन बिल्ली ने उनका एक अंडा तोड़ दिया। लेखक की माँ ने दूसरा अंडा बचाने की कोशिश की, लेकिन वह अंडा भी उनके हाथ से गिरकर टूट गया। जब माँ ने कबूतरों की आँखों में उनके बच्चे खोने का दुःख देखा, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्हें लगा कि उन्होंने एक गलती की है, इसलिए उन्होंने पूरे दिन उपवास रखा और खुदा से माफ़ी माँगी। 

पर अब समय बदल गया है। लेखक एक नए फ्लैट में रहते हैं। वहाँ दो कबूतरों ने ऊँचाई पर घोंसला बना लिया था। उनके छोटे बच्चे थे, जिनकी देखभाल के लिए बड़े कबूतर बार-बार आते-जाते थे। लेकिन उनके आने-जाने से घर की चीज़ें गिरती थीं और नुकसान होता था। इससे परेशान होकर लेखक की पत्नी ने वहाँ जाली लगा दी और बच्चों को वहाँ से हटा दिया। खिड़की, जिससे वे आते थे, बंद कर दी गई। अब वे दोनों कबूतर खिड़की के बाहर चुपचाप और उदास बैठे रहते हैं।

लेखक कहता है कि अब न तो सुलेमान जैसा कोई है जो उनके दुःख को समझे, न ही उनकी माँ जैसी कोई है जो उनके दुःख पर दुआ करे। इससे यह समझ आता है कि समय के साथ इंसानों की भावनाएँ बदल गई हैं और अब उनमें पहले जैसी संवेदनशीलता नहीं रही।

अंत में लेखक यह संदेश देना चाहता है कि हमें भी नदी और सूरज की तरह दूसरों के भले के लिए काम करना चाहिए। जैसे नदी खेतों को पानी देती है और सूरज सभी को रोशनी और गर्मी देता है, वैसे ही हमें भी बिना भेदभाव के सबकी मदद करनी चाहिए। साथ ही, तोते की तरह सभी को एक जैसा समझना चाहिए, किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। जब हम सभी जीवों को बराबर मानेंगे और एक-दूसरे की भलाई के लिए काम करेंगे, तभी दुनिया के सभी जीव सुखी और खुशहाल रह सकेंगे।

पाठ से शिक्षा

यह पाठ हमें सिखाता है कि हमें प्रकृति और सभी जीव-जंतुओं का सम्मान करना चाहिए। हर प्राणी का इस धरती पर उतना ही अधिकार है जितना इंसान का। हमें अपनी सुविधा के लिए दूसरों का घर नहीं उजाड़ना चाहिए, चाहे वह इंसान हो, पक्षी हो, या कोई और जीव। हमें दूसरों के दुख को समझना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना जरूरी है, वरना प्रकृति का गुस्सा हमें भारी पड़ सकता है। हमें प्यार, दया और सहानुभूति के साथ जीना चाहिए, ताकि दुनिया सभी के लिए खूबसूरत बनी रहे।

शब्दार्थ

  • कुदरत: प्रकृति, सृष्टि, ईश्वर की रचना।
  • अता फरमाई: दी गई, प्रदान की गई।
  • अजीम: महान, बड़ा, शानदार।
  • करिश्मा: चमत्कार, अद्भुत कार्य।
  • जागीर: संपत्ति, स्वामित्व, विशेष रूप से भूमि पर अधिकार।
  • दरबदर: भटकते हुए, बेघर, इधर-उधर।
  • नस्लें: प्रजातियाँ, वंश।
  • आशियाना: घर, घोंसला, ठिकाना।
  • बेदखल: बेघर करना, निकाल देना।
  • परहेज: हिचक, संकोच, बचना।
  • मुहब्बत: प्रेम, स्नेह।
  • दुआ: प्रार्थना, आशीर्वाद की माँग।
  • पैगंबर: नबी, ईश्वर का दूत।
  • लकब: उपनाम, विशेष नाम।
  • दुत्कारना: डाँटना, भगाना, तिरस्कार करना।
  • प्रतीकात्मक: प्रतीक के रूप में, सांकेतिक।
  • वजूद: अस्तित्व, होना।
  • हिस्सेदारी: भागीदारी, हिस्सा।
  • सिमटना: सिकुड़ना, सीमित होना।
  • विनाशलीला: विनाशकारी कार्य, तबाही।
  • जलजला: भूकंप।
  • सैलाब: बाढ़।
  • नमूना: उदाहरण, नमूना।
  • हथियाना: हड़पना, कब्जा करना।
  • उकड़ूँ: उकड़ू बैठना, सिकुड़कर बैठना।
  • बावजूद: इसके बावजूद, फिर भी।
  • रोशनदान: खिड़की या छेद जिससे रोशनी आती हो।
  • फड़फड़ाना: पंख फड़फड़ाना, व्याकुल होना।
  • मुआफ़: माफ़ करना, क्षमा करना।
  • मचान: ऊँचा स्थान, ताखा, शेल्फ।
  • ठौर-ठिकाना: रहने की जगह, आश्रय।

11. तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेन्द्र – पाठ का सार

कवि परिचय

प्रहलाद अग्रवाल (1947) का जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ। इन्होंने हिंदी में एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त की और किशोर वय से हिंदी फ़िल्मों के इतिहास तथा फ़िल्मकारों के जीवन पर गहरी रुचि और अध्ययन किया। वर्तमान में, सतना के शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत, अग्रवाल फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विषयों पर कई महत्वपूर्ण लेखन कर चुके हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ में ‘सातवाँ दशक’, ‘तानाशाह’, ‘मैं खुशबू’, ‘सुपर स्टार’, ‘राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना’, ‘कवि शैलेंद्र : ज़िंदगी की जीत में यकीन’, ‘प्यासा : चिर अतृप्त गुरुदत्त’, ‘उत्ताल उमंग : सुभाष घई की फ़िल्मकला’, ‘ओ रे माँझी : बिमल राय का सिनेमा’, और ‘महाबाज़ार के महानायक : इक्कीसवीं सदी का सिनेमा’ शामिल हैं।

पाठ प्रवेश

साल के किसी भी महीने का शुक्रवार लगभग हमेशा हिंदी फ़िल्मों की प्रदर्शनी का दिन होता है। कुछ फ़िल्में सफल होती हैं, जबकि कुछ दर्शकों के मन में छाप छोड़ने में असफल रहती हैं। जब एक फ़िल्मकार किसी साहित्यिक कृति को पूरी लगन और ईमानदारी से पर्दे पर उतारता है, तो उसकी फ़िल्म न केवल यादगार बनती है, बल्कि दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कृति ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’ को सिनेमा में लाना एक ऐसा ही उदाहरण है, जिसे आज भी हिंदी सिनेमा की अमर फ़िल्मों में गिना जाता है। यह फ़िल्म राजकपूर और वहीदा रहमान की बेहतरीन अदाकारी और संगीतमयता के साथ एक उत्कृष्ट कृति है।

पाठ सार

फिल्मी गीतकार शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु की अमर कृति ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’ को सिनेमा परदे पर उतारा, और यह फिल्म एक मील का पत्थर साबित हुई। यह फिल्म साबित करती है कि हिंदी फिल्म जगत में सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फिल्म बनाना कितना कठिन और जोखिम भरा कार्य है।
फिल्म ‘संगम’ की सफलता के बाद राजकपूर ने एक साथ चार फिल्मों में काम करने का विचार किया, जिनमें ‘तीसरी कसम’ भी शामिल थी। ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र की पहली और अंतिम फिल्म थी, और इस फिल्म को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। यह फिल्म कला से परिपूर्ण थी और इसमें शैलेंद्र की भावनाओं का सुंदर चित्रण था।
राजकपूर, जो अपनी आँखों से अभिनय में माहिर थे, ने शैलेंद्र की भावनाओं को बड़े खूबसूरती से फिल्म में जीवंत किया। शैलेंद्र ने अपनी कविता और फिल्म की कहानी में उन भावनाओं को शब्द रूप दिया, जिन्हें राजकपूर ने अभिनय में ढाला।
शैलेंद्र को कभी भी धन या नाम की इच्छा नहीं थी, वह बस अपने काम से संतुष्ट थे। ‘तीसरी कसम’ फिल्म को बड़े मुश्किल से प्रदर्शित किया गया क्योंकि इसके भावनात्मक पहलुओं को समझना मुनाफे की उम्मीद रखने वालों के लिए आसान नहीं था। फिल्म के गीतों को भी शैलेंद्र ने बड़ी गहरी समझ से लिखा, और उनके गीतों का अर्थ अक्सर गहरे और शांत होते हुए भी विशाल होता था, जैसे नदी का गहरा समुद्र।
फिल्म की खासियत यह थी कि दुःख को जीवन की सही परिस्थितियों की तरह प्रस्तुत किया गया था, बिना किसी ओवरड्रामा के। ‘तीसरी कसम’ फिल्म साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय करती है, और इसका मुख्य लेखन फणीश्वरनाथ रेणु का था, जिसका हर छोटा-से-छोटा हिस्सा फिल्म में सटीक रूप से दिखाई दिया।

पाठ का परिप्रेक्ष्य

‘तीसरी कसम’ केवल एक फ़िल्म नहीं है, बल्कि यह साहित्य और सिनेमा के बीच एक महत्वपूर्ण पुल है। शैलेंद्र की संवेदनशीलता और राजकपूर की अदाकारी ने इस फ़िल्म को एक अनमोल कृति बना दिया। यह फ़िल्म एक आदर्शवादी कवि की दृष्टि और एक महान अभिनेता की क्षमता को दर्शाती है, जिन्होंने मिलकर एक ऐसी कृति बनाई, जो न केवल दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें गहराई से प्रभावित भी करती है। ‘तीसरी कसम’ ने यह साबित किया कि कला के हर रूप को ईमानदारी और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है।

10. तताँरा–वामीरो कथा – पाठ का सार

कवि परिचय

लीलाधर मंडलोई का जन्म 1954 में जन्माष्टमी के दिन छिंदवाड़ा जिले के गुढ़ी गाँव में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई भोपाल और रायपुर में पूरी की। 1987 में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लंदन के कॉमनवेल्थ रिलेशंस ट्रस्ट से बुलाया गया। अभी वे प्रसार भारती दूरदर्शन के महानिदेशक हैं। मंडलोई जी मुख्य रूप से एक कवि हैं, और उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ की भाषा और लोगों का जीवन साफ़ दिखता है। उनकी प्रसिद्ध किताबें हैं – घर-घर घूमा, रात-बिरात, मगर एक आवाज़, देखा-अनदेखा और काला पानी।

पाठ प्रवेश

प्राचीन सभ्यताओं के साथ कई कहानियाँ और किस्से जुड़े होते हैं, जिनमें कोई न कोई संदेश छिपा होता है। अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में भी ऐसी कई कहानियाँ प्रचलित हैं। लीलाधर मंडलोई ने अपनी रचनाओं में कुछ ऐसी ही कहानियों को दोबारा लिखा है। ‘तताँरा-वामीरो कथा’ भी इसी द्वीपसमूह की एक लोककथा है, जो प्यार और नफरत के असर को दिखाती है।

पाठ सार

‘तताँरा-वामीरो कथा’ लिटिल अंदमान और कार-निकोबार द्वीपों की एक पुरानी कहानी है, जो बताती है कि ये दोनों द्वीप अलग कैसे हुए। इस कहानी का नायक तताँरा एक अच्छा और बहादुर युवक था। गाँव के लोग मानते थे कि उसकी लकड़ी की तलवार में खास शक्ति है। वह हमेशा अपनी तलवार कमर में बांधकर रखता था और जरूरतमंदों की मदद करता था। इसलिए गाँव के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे।
एक दिन तताँरा समुद्र किनारे टहल रहा था, तभी उसने वामीरो को गाना गाते सुना। उसकी मीठी आवाज सुनकर वह बहुत खुश हुआ और उसे पसंद करने लगा। धीरे-धीरे, दोनों एक-दूसरे से मिलने लगे और उनके बीच प्यार हो गया। लेकिन वे अलग-अलग जातियों से थे, इसलिए उनका शादी करना नियमों के खिलाफ था। फिर भी, वे हर दिन मिलते और उनका प्यार गहरा होता गया।

एक दिन, तताँरा को बहुत गुस्सा आ गया। उसने अपनी तलवार से ज़मीन को काट दिया, जिससे द्वीप दो हिस्सों में बँट गया। इस वजह से तताँरा और वामीरो अलग-अलग द्वीपों पर रह गए। तताँरा ने वामीरो तक पहुँचने के लिए समुद्र में छलांग लगाई, लेकिन वह डूब गया। वामीरो बहुत दुखी हो गई और उसने खाना-पीना छोड़ दिया।
उनकी प्रेम कहानी का असर निकोबारी समाज पर पड़ा। इसके बाद, अलग-अलग गाँवों के लोग आपस में शादी करने लगे। आज भी यह कहानी लोककथा के रूप में सुनाई जाती है और इसने द्वीपों के लोगों को और करीब ला दिया।

पाठ का परिप्रेक्ष्य

लीलाधर मंडलोई की ‘तताँरा-वामीरो कथा’ एक अमर प्रेम और बलिदान की कहानी है, जो द्वीपसमूह के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को दिखाती है। यह कहानी बताती है कि प्रेम और बलिदान से समाज में अच्छे बदलाव आ सकते हैं। तताँरा और वामीरो की कहानी न केवल उनके प्रेम को अमर बनाती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्चे प्रेम के लिए सामाजिक परंपराओं को चुनौती देना भी संभव है।

शब्दार्थ

  • श्रृंखला: कम्र
  • आदिम: प्रारम्भिक
  • विभक्त: बँटा हुआ
  • लोककथा: जन-समाज में प्रचलित कथा
  • आत्मीय: अपना
  • विलक्षण: साधारण
  • बयार: शीतल मंद हवा
  • तंद्रा: ऊँघ
  • चैतन्य: चेतना
  • विकल: बैचैन
  • संचार: उत्पन्न होना
  • असंगत: अनुचित
  • सम्मोहित: मुग्ध
  • झुंझुलाना: चिढ़ना
  • अन्यमनस्कता: जिसका चित्त कहीं और हो
  • निनिर्मेष: बिना पलक झपकाये
  • अचम्भित: चकित
  • रोमांचित: पुलकित
  • निश्चल: स्थिर
  • अफवाह: उड़ती खबर
  • उफनना: उबलना
  • शमन: शांत करना
  • घोंपना: भोंकना

9. डायरी का एक पन्ना – पाठ का सार

लेखक परिचय

सीताराम सेकसरिया का जन्म 1892 में राजस्थान के नवलगढ़ में हुआ और वे कोलकाता में रहे। वे व्यापारी थे और साहित्य, संस्कृति और नारी शिक्षा से जुड़े कई संस्थानों के संस्थापक व प्रेरक रहे। उन्होंने महात्मा गांधी के बुलावे पर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और सत्याग्रह के दौरान जेल भी गए। वे रवींद्रनाथ टैगोर, गांधीजी और सुभाषचंद्र बोस के करीबी थे। वे कुछ समय के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज में मंत्री भी रहे। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया। उन्हें स्कूली शिक्षा नहीं मिली, लेकिन स्वयं पढ़कर उन्होंने लिखना-पढ़ना सीखा। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं: स्मृतिकण, मन की बात, बीता युग, नयी याद और एक कार्यकर्ता की डायरी (दो भागों में)।

सीताराम सेकसरिया

मुख्य बिंदु

  • सीताराम सेकसरिया का परिचय: 1892 में राजस्थान के नवलगढ़ में जन्मे, कोलकाता में जीवन बिताया। स्वाध्याय से पढ़ना-लिखना सीखा, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय, गांधी, नेताजी और रवींद्रनाथ ठाकुर के करीबी। 1962 में पद्मश्री सम्मान प्राप्त।
  • 26 जनवरी 1931 का स्वतंत्रता दिवस: कोलकाता में दूसरा स्वतंत्रता दिवस जोश के साथ मनाया गया। राष्ट्रीय झंडे फहराए गए, सजावट की गई, जुलूस निकाले गए।
  • पुलिस का दमन: पुलिस ने सख्ती की, जुलूस रोके, लाठीचार्ज किया, कई लोग घायल हुए, सुभाषचंद्र बोस और 105 महिलाओं सहित कई कार्यकर्ता गिरफ्तार।
  • महिलाओं की भागीदारी: महिलाओं ने झंडोत्सव और जुलूस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, पुलिस की मार झेली, फिर भी हिम्मत नहीं हारी।
  • संगठन और उत्साह: लोगों में आजादी का जोश था, संगठित होकर पुलिस के दमन का मुकाबला किया।

पाठ का सार 

सीताराम सेकसरिया की डायरी का यह अंश 26 जनवरी 1931 को कोलकाता में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस के उत्साह और संघर्ष का चित्रण करता है। यह पाठ आज़ादी के आंदोलन में लोगों की भागीदारी, उनके जोश और अंग्रेज़ी शासन की सख्ती को दर्शाता है। लेखक ने उस दिन के अनुभवों को अपनी डायरी में दर्ज किया है, जिसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस और अन्य कार्यकर्ताओं की भूमिका, विशेष रूप से महिलाओं की बहादुरी और पुलिस की बर्बरता का वर्णन किया गया है। यह पाठ स्वतंत्रता संग्राम की भावना और एकजुट समाज की ताकत को उजागर करता है।

26 जनवरी 1931 को कोलकाता में स्वतंत्रता दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। लोगों ने पहले से ही इसकी तैयारी शुरू कर दी थी, और प्रचार के लिए लगभग 2000 रुपये खर्च किए गए थे। शहर के प्रमुख बाज़ारों और अन्य हिस्सों में राष्ट्रीय झंडे फहराए गए, और मकानों को इस तरह सजाया गया जैसे वास्तव में आज़ादी मिल गई हो। लोगों में उत्साह और नई ऊर्जा देखने को मिली। दूसरी ओर, अंग्रेज़ी पुलिस ने कड़ी सख्ती बरती। पुलिस की गाड़ियाँ, घुड़सवार, और सैनिक हर जगह तैनात थे। पार्कों और मैदानों को सुबह से ही घेर लिया गया, ताकि लोग एकत्र न हो सकें।

फिर भी, लोग डरे नहीं। सुबह से ही कोलकाता के कई स्थानों पर झंडा फहराया गया। श्रद्धानंद पार्क में अविनाश बाबू ने झंडा फहराया, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और वहां मौजूद कुछ लोगों के साथ मारपीट भी की। तारा सुंदरी पार्क में भी इसी तरह की हिंसा हुई और कई लोग घायल हुए। गुजराती सेविका संघ की लड़कियों ने भी एक जुलूस निकाला, परंतु उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। मारवाड़ी बालिका विद्यालय की छात्राओं ने झंडोत्सव मनाया, जिसमें जानकीदेवी और मदालसा जैसी प्रसिद्ध कार्यकर्ताएँ शामिल थीं।

दोपहर होते-होते कई कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए, जिनमें पूर्णोदास और पुरुषोत्तम राय प्रमुख थे। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकाला गया, जिसे चौरंगी पर रोकने की कोशिश की गई। भीड़ अधिक होने के कारण पुलिस उसे पूरी तरह से रोक नहीं पाई। मैदान के पास पहुँचते ही पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें सुभाष बाबू और कई अन्य घायल हो गए। घायल अवस्था में भी सुभाष बाबू “वंदे मातरम्” के नारे लगाते रहे और लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे।

इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। वे मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा फहरा रही थीं और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ रही थीं। पुलिस ने उन पर भी लाठियाँ चलाईं और 105 महिलाओं को गिरफ्तार कर लालबाजार लॉकअप में बंद कर दिया गया। हालांकि, उन्हें रात 9 बजे रिहा कर दिया गया। इस दिन लगभग 200 लोग घायल हुए, जिनमें से 160 को अस्पताल ले जाना पड़ा।

कुल मिलाकर, यह दिन कोलकाता के इतिहास में एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक दिन बन गया। इस दिन आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं की बहादुरी और देशभक्ति ने यह साबित कर दिया कि कोलकाता में स्वतंत्रता संग्राम की भावना कितनी प्रबल थी और एकजुट जनता किसी भी संघर्ष को पार कर सकती है।

पाठ से शिक्षा

यह पाठ हमें सिखाता है कि देश की आज़ादी के लिए लोगों ने कठिन संघर्ष और बड़े-बड़े बलिदान किए। स्त्री और पुरुष दोनों ने मिलकर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाई। उनके साहस, देशभक्ति और त्याग से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें भी अपने देश के प्रति ईमानदारी, एकता और समर्पण भाव से कार्य करना चाहिए। जब लोग एकजुट होते हैं, तो कोई भी बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

शब्दार्थ

  • पुनरावृत्ति: फिर से आना
  • गश्त: पुलिस कर्मचारी का पहरे के लिए घूमना
  • सार्जेंट: सेना में एक पद
  • मोनुमेंट: स्मारक
  • कौंसिल: परिषद
  • चौरंगी: कलकत्ता के एक शहर का नाम
  • वालेंटियर: स्वयंसेवक
  • संगीन: गंभीर
  • मदालसा: जानकी देवी और जमना लाल बजाज की पुत्री का नाम

8. बड़े भाई साहब – पाठ का सार

लेखक परिचय

प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय था। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही गाँव में हुआ था। वे उर्दू में नवाब राय और हिंदी में प्रेमचंद नाम से लिखते थे। उन्होंने स्कूल में शिक्षक, इंस्पेक्टर और पत्रिका संपादक का काम भी किया। कुछ समय उन्होंने फिल्मी दुनिया में भी काम किया, लेकिन उन्हें वहाँ अच्छा नहीं लगा। प्रेमचंद आम लोगों की परेशानियों को अपनी कहानियों और उपन्यासों में दिखाते थे। उन्हें कथा सम्राट कहा जाता है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं – गोदान, गबन, सेवासदन, निर्मला आदि। उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 को हुआ।

मुख्य बिंदु

  • बड़े भाई साहब का स्वभाव:
    • लेखक के बड़े भाई साहब उससे 5 साल बड़े हैं, लेकिन स्कूल में सिर्फ 3 कक्षा आगे।
    • वे पढ़ाई को बहुत महत्व देते थे और जल्दबाजी नहीं करते थे।
    • शिक्षा की नींव मजबूत करने के लिए एक कक्षा में 2-3 साल भी लगाते थे।
  • लेखक का स्वभाव:
    • लेखक को पढ़ाई में मन नहीं लगता था, उसे खेलकूद पसंद था।
    • वह मैदान में कंकरियाँ उछालता, तितलियाँ उड़ाता, या दोस्तों के साथ खेलता था।
    • भाई साहब की डाँट से डरता था, लेकिन खेलना नहीं छोड़ता था।
  • भाई साहब की डाँट और उपदेश:
    • भाई साहब लेखक को हमेशा पढ़ाई के लिए डाँटते और मेहनत की सलाह देते।
    • वे कहते कि अंग्रेजी पढ़ना आसान नहीं, इसके लिए बहुत मेहनत चाहिए।
    • वे अपनी मेहनत का उदाहरण देते और लेखक को आलसी कहते।
  • लेखक का समय सारणी बनाने का प्रयास:
    • भाई साहब की डाँट के बाद लेखक समय सारणी बनाता, जिसमें खेल का समय नहीं होता।
    • लेकिन वह इसे फॉलो नहीं कर पाता और खेलने चला जाता।
    • मैदान की हरियाली और खेल उसे पढ़ाई भुला देते।
  • परीक्षा का परिणाम:
    • सालाना परीक्षा में भाई साहब फेल हो गए, लेकिन लेखक पास होकर अपनी कक्षा में प्रथम आया।
    • अब दोनों के बीच सिर्फ 2 कक्षा का अंतर रह गया।
    • लेखक को अपने ऊपर घमंड हुआ, और वह भाई साहब से कम डरने लगा।
  • भाई साहब का घमंड पर उपदेश:
    • भाई साहब ने लेखक के घमंड को भाँप लिया और उसे डाँटा।
    • उन्होंने रावण, शैतान, और शाहेरूम जैसे उदाहरण देकर बताया कि घमंड से नुकसान होता है।
    • कहा कि लेखक की सफलता मेहनत से नहीं, बल्कि किस्मत से हुई।
  • शिक्षा प्रणाली पर व्यंग्य:
    • भाई साहब ने शिक्षा प्रणाली की आलोचना की, जैसे जामेट्री और इतिहास की कठिनाई।
    • कहा कि परीक्षक बेकार की चीजें रटवाते हैं, जो बिना मतलब की हैं।
    • समय की पाबंदी जैसे विषय पर 4 पन्ने लिखना बेवकूफी है, क्योंकि यह समय का दुरुपयोग है।
  • भाई साहब की सलाह:
    • भाई साहब ने लेखक को चेतावनी दी कि उनकी कक्षा में पढ़ाई बहुत कठिन है।
    • उन्होंने अनुभव के आधार पर सलाह दी कि लेखक उनकी बात माने, नहीं तो पछताएगा।

पाठ का सार

इस पाठ में दो भाइयों की कहानी है – एक बड़े भाई साहब हैं और एक उनके छोटे भाई (जो खुद लेखक हैं)। भाई साहब थोड़े ही बड़े हैं, लेकिन लोग उनसे बहुत उम्मीदें रखते हैं। खुद भाई साहब भी चाहते हैं कि उनका व्यवहार छोटे भाई के लिए एक मिसाल बने। वे लेखक से पाँच साल बड़े हैं लेकिन केवल तीन कक्षा ही आगे हैं, क्योंकि वे हर कक्षा को अच्छी तरह से समझना चाहते थे। इसलिए कभी-कभी एक कक्षा में दो या तीन साल भी लगा देते थे। वे हमेशा किताबों में डूबे रहते थे।

लेखक का पढ़ाई में मन बिल्कुल नहीं लगता था। वह एक घंटे भी पढ़ ले, तो उसे पहाड़ चढ़ने जैसा लगता था। जैसे ही मौका मिलता, वह खेलने चला जाता। लेकिन जैसे ही वह कमरे में वापस आता, भाई साहब का गुस्सा देखकर डर जाता। भाई साहब उसे डाँटते और कहते कि वह उनसे कुछ नहीं सीखता। अगर उसे ऐसे ही समय खराब करना है तो घर चला जाए और वहाँ मजे से खेलता रहे। कम से कम दादाजी की मेहनत की कमाई तो बर्बाद नहीं होगी।

भाई साहब बहुत अच्छे उपदेश देते थे। उनकी बातें दिल को छूती थीं। लेकिन उनका असर ज्यादा देर तक नहीं रहता था। लेखक हर बार सोचता कि अब वह मन लगाकर पढ़ाई करेगा और एक समय-सारणी भी बना लेता, लेकिन उस पर अमल करना मुश्किल था।

जब वार्षिक परीक्षा हुई तो भाई साहब फेल हो गए और लेखक पास होकर अपनी कक्षा में प्रथम आया। अब दोनों के बीच केवल दो कक्षा का अंतर रह गया था। इससे लेखक को घमंड हो गया और आत्मविश्वास भी बढ़ गया। भाई साहब ने लेखक को समझाया कि आगे की कक्षाएँ बहुत कठिन होती हैं, जहाँ अलजेबरा, ज्योमेट्री, इतिहास याद करना पड़ता है। परीक्षा में ‘समय की पाबंदी’ जैसे विषय पर लंबा निबंध भी लिखना होता है।

लेखक सोचने लगा कि जब पास होकर भी भाई साहब इतना डाँटते हैं, तो अगर वह फेल हो जाता तो शायद जान ही ले लेते। फिर भी, उसे पढ़ाई में कोई खास रुचि नहीं हुई। उसे तो खेल-कूद का हर मौका भाता था। वह बस इतना पढ़ता कि कक्षा में शर्मिंदगी न हो।

फिर सालाना परीक्षा हुई। संयोग से लेखक फिर पास हो गया और भाई साहब फिर फेल हो गए। भाई साहब रोने लगे और लेखक को भी रोना आ गया। अब भाई साहब का स्वभाव थोड़ा नरम हो गया। वे अब लेखक को पहले जैसा नहीं डाँटते थे, शायद उन्हें लगने लगा था कि अब डाँटने का हक़ भी कम रह गया है। इससे लेखक को और आज़ादी मिल गई, लेकिन उसने इसका गलत फायदा उठाया। अब वह सोचने लगा कि वह बिना पढ़े भी पास हो जाएगा, क्योंकि उसकी किस्मत अच्छी है। पहले वह भाई साहब के डर से थोड़ा-बहुत पढ़ लेता था, अब वह भी नहीं पढ़ता था।

अब लेखक को पतंगबाज़ी का नया शौक लग गया। वह ज़्यादातर समय पतंग उड़ाने में बिताने लगा। हालांकि वह अब भी भाई साहब की इज्जत करता था, इसलिए उनसे छिपकर पतंग उड़ाता था। एक दिन शाम को वह हॉस्टल से दूर एक कटी हुई पतंग पकड़ने के लिए दौड़ रहा था कि तभी उसका सामना भाई साहब से हो गया, जो शायद बाज़ार से लौट रहे थे। भाई साहब ने वहीं उसका हाथ पकड़ लिया और गुस्से से बोले कि क्या उसे शर्म नहीं आती कि वह इतने बड़े होकर भी बच्चों की तरह पतंग पकड़ने दौड़ रहा है? अब वह आठवीं कक्षा में है, और बस एक कक्षा नीचे है। उसे अपनी पदवी का ख्याल रखना चाहिए।

भाई साहब ने समझाया कि समझदारी किताबों से नहीं, दुनिया देखने से आती है। उन्होंने लेखक को घमंड निकालने को कहा और बताया कि वे उसे सही रास्ते पर रखने के लिए ज़रूरत पड़ी तो थप्पड़ भी मार सकते हैं। लेखक यह सुनकर चुपचाप सिर झुकाकर खड़ा रहा। उसे अब सच में अहसास हुआ कि वह उम्र और मन से छोटा है, और भाई साहब के लिए उसके मन में इज्जत और बढ़ गई।

लेखक ने नम आँखों से स्वीकार किया कि भाई साहब जो कह रहे हैं वह बिल्कुल सही है और उन्हें ऐसा कहने का पूरा हक़ है। भाई साहब ने लेखक को गले लगा लिया और कहा कि वे उसे पतंग उड़ाने से मना नहीं कर रहे हैं, उनका भी मन करता है, लेकिन वे खुद सही रास्ते पर नहीं रहेंगे तो लेखक की देखभाल कैसे करेंगे?

उसी समय एक कटी हुई पतंग उनके ऊपर से गुज़री। भाई साहब लंबे थे, उन्होंने उछलकर डोर पकड़ ली और हॉस्टल की ओर भागे। लेखक भी उनके पीछे-पीछे दौड़ पड़ा।

पाठ से शिक्षा

इस पाठ से हमें यह सीख मिलती है कि पढ़ाई में मेहनत और अनुशासन बहुत जरूरी है। लेखक के बड़े भाई साहब अपनी पढ़ाई को बहुत गंभीरता से लेते थे और चाहते थे कि छोटा भाई भी ऐसा ही करे। वे बताते हैं कि बिना मेहनत और समय की पाबंदी के सफलता नहीं मिलती। साथ ही, हमें घमंड से बचना चाहिए, क्योंकि घमंड इंसान को बर्बाद कर सकता है, जैसे रावण और शैतान का हुआ। लेखक की कहानी से पता चलता है कि खेलकूद और मस्ती के साथ-साथ पढ़ाई पर ध्यान देना भी जरूरी है। अगर हम मेहनत करें और समय का सही उपयोग करें, तो सफलता जरूर मिलेगी। इसके अलावा, हमें बड़ों की सलाह को मानना चाहिए, क्योंकि उनके अनुभव से हमें सही रास्ता मिल सकता है।

शब्दार्थ

  • तालीम: शिक्षा
  • पुख्ता: मजबूत
  • तम्बीह: डाँट-डपट
  • सामंजस्य: तालमेल
  • मसलन: उदाहरणतः
  • इबारत: लेख
  • चेष्टा: कोशिश
  • जमात: कक्षा
  • हर्फ़: अक्षर
  • मिहनत (मेहनत): परिश्रम
  • लताड़: डाँट-डपट
  • सूक्ति-बाण: तीखी बातें
  • स्कीम: योजना
  • अमल करना: पालन करना
  • अवहेलना: तिरस्कार
  • नसीहत: सलाह
  • फजीहत: अपमान
  • इम्तिहान: परीक्षा
  • लज्जास्पद: शर्मनाक
  • शरीक: शामिल
  • आतंक: भय
  • अव्वल: प्रथम
  • आधिपत्य: प्रभुत्व
  • स्वाधीन: स्वतंत्र
  • महीप: राजा
  • मुमतहीन: परीक्षक
  • प्रयोजन: उद्देश्य
  • खुराफात: व्यर्थ की बातें
  • हिमाकत: बेवकूफी
  • किफ़ायत: बचत
  • टास्क: कार्य
  • जलील: अपमानित
  • प्राणांतक: प्राण का अंत करने वाला
  • कांतिहीन: चेहरे पे चमक ना होना
  • सहिष्णुता: सहनशीलता
  • कनकौआ: पतंग
  • अदब: इज्जत
  • जहीन: प्रतिभावान
  • तजुरबा: अनुभव
  • बदहवास: बेहाल
  • मुहताज (मोहताज): दूसरे पर आश्रित

7. आत्मत्राण – पाठ का सार

कवि परिचय
– रवीन्द्रनाथ ठाकुर

इनका जन्म 6 मई 1861 को धनी परिवार में हुआ है तथा शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। ये नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रथम भारतीय हैं। छोटी उम्र में ही स्वाध्याय से अनेक विषयों का ज्ञान इन्होने अर्जित किया। बैरीस्ट्री पढ़ने के लिए विदेश भेजे गए लेकिन बिना परीक्षा दिए ही लौट आये। इनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित होता है। प्रकृति से इनका गहरा लगाव था।

आत्मत्राण पाठ प्रवेश
यदि कोई तैरना सीखना चाहता है तो कोई उसे पानी में उतरने में मदद तो कर सकता है, ताकि उसे डूबने का डर न रहे; परन्तु जब तैरना सीखने वाला पानी में हाथ – पैर चलाएगा तभी वो तैराक बनेगा। परीक्षा जाते समय व्यक्ति बड़ों के आशीर्वाद की कामना करता ही है ,और बड़े आशीर्वाद देते भी हैं लेकिन परीक्षा तो उसे खुद ही देनी होती है। इसी तरह जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तब उनका उत्साह तो सभी लोग बढ़ाते हैं जिससे उनका मनोबल अर्थात हौंसला बढ़ता है। मगर कुश्ती तो उन्हें खुद ही लड़नी पड़ती है।
प्रस्तुत पाठ में कविगुरु मानते हैं कि प्रभु में सबकुछ संभव करने की ताकत है फिर भी वह बिलकुल नहीं चाहते कि वही सब कुछ करे। कवि कामना करते हैं कि किसी भी आपदा या विपदा में ,किसी भी परेशानी का हल निकालने का संघर्ष वो स्वयं करे ,प्रभु को कुछ भी न करना पड़े। फिर आखिर वो अपने प्रभु से चाहते क्या हैं।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रस्तुत कविता का बंगला से हिंदी अनुवाद श्रद्धेय आचार्य हरी प्रसाद द्विवेदी ने किया है। द्विवेदी जी का हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने में बहुत बड़ा योगदान है। यह अनुवाद बताता है कि अनुवाद कैसे मूलतः  रचना की ‘आत्मा ‘ को ज्यों का त्यों  बनाये रखने में सक्षम है। 

कविता का सार
आत्मत्राण’ मूलतः बांग्ला में लिखी गई है। इस कविता का हिंदी अनुवाद ‘आचार्य हरि प्रसाद द्विवेदी’ ने किया है।
यह कविता अन्य प्रार्थनाओं से भिन्न है। कवि इस कविता के माध्यम से ईश्वर से शक्ति पाने की कामना करता है। वह नहीं चाहते कि ईश्वर उसके हर मार्ग, हर विपत्ति को सरल बना दें। वह ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि विपत्ति के समय मुझमें इतनी शक्ति भर दो कि मैं सभी मुसीबतों का सामना कर सकूँ। यदि मुझे कोई सहायक न मिले तो भी मेरा पौरुष बल न डगमगाए पाए। यदि मुझे जीवन-संग्राम में धोखा ही उठाना पड़े, तब भी मैं हार न मानूँ। तुम मुझे भय से छुटकारा न दिलाओ, मुझे सांत्वना न दो। पर इतनी कृपा करना कि मैं निडर होकर सब कुछ सहन कर सकूँ। मैं सुख के दिनों में शीश झुकाकर तुम्हें नमन करना चाहता हूँ। मैं क्षण-क्षण तुम्हारा मुख पहचानना चाहता हूँ। दुख रूपी रात में जब मुझे धोखा खाना पड़े, तब भी मैं तुम पर संदेह न करूँ। हे ईश्वर! मुझे इतनी शक्ति प्रदान करो।

कविता की व्याख्या

1. 
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
 केवल इतना हो (करुणामय)
 कभी न विपदा में पाऊँ भय।
 दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
 पर इतना होवे (करुणामय)
 दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
 कोई कहीं सहायक न मिले
 तो अपना बल पौरुष न हिले
 हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
 तो भी मन में ना मानूँ क्षय।।

शब्दार्थ:

  • विपदा – विपत्ति ,मुसीबत
  • करुणामय – दूसरों पर दया करने वाला
  • दुःख-ताप – कष्ट की पीड़ा
  • व्यथित – दुःखी
  • चित्त – मन
  • सांत्वना – दिलासा
  • सहायक – मददगार
  • पौरुष – पराक्रम
  • वंचना – वंचित
  • क्षय – नाश

व्याख्या:  प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कविता आत्मत्राण से उद्धृत हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि मैं स्वयं को कष्टों से दूर रखने की विनती नहीं कर रहा हूँ | बल्कि आप मुझे उन तमाम कष्टों को सहने की शक्ति प्रदान करें | कवि ठाकुर जी अपने कष्ट भरे वक़्त में ईश्वर की सहायता नहीं चाहते, बल्कि वे कष्टों पर विजय हासिल करने के लिए आत्मविश्वास और हौसला की कामना करते हैं | कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं कि चाहे जितना भी तकलीफ़ क्यों न आ जाए, मगर हमारा पुरुषार्थ डगमगा न सके | कवि कहते हैं कि यदि हमें नुकसान उठाना पड़े, तो भी मुझे इतनी शक्ति देना की हम उस चुनौती का सामना सरलतापूर्वक कर सकें | 

काव्य-सौंदर्य:

भाव पक्ष: 1. कवि ईश्वर से विपदाओं वेफ समय में पौरुष एवं शक्ति देने की प्रार्थना कर रहे हैं।
2. संघर्षमय समय में व्यथित न होने वेफ लिए वह ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं।

कला पक्ष: 1. भाषा सहज एवं सरल है। भाषा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
2. ‘कोई कहीं’ में अनुप्रास अलंकार है।

2. मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
 बस इतना होवे (करुणामय)
 तरने की हो शक्ति अनामय।
 मेरा भार अगर लघु करवेफ न दो सांत्वना नहीं सही।
 केवल इतना रखना अनुनय –
 वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
 नत शिर होकर सुख के दिन में
 तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
 दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही।
 उस दिन ऐसा हो करुणामय,
 तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।

शब्दार्थ: 

  • त्राण – भय निवारण ,बचाव
  • अनुदिन  – प्रतिदिन
  • तरने – पार करना
  • अनामय – रोग रहित
  • लघु – कम
  • सांत्वना – हौसला ,तसली देना
  • अनुनय- विनय
  • वहन  – सामना करना
  • निर्भय – बिना डर के
  • नत शिर – सिर झुका कर
  • दुःख-रात्रि  – दुःख से भरी रात
  • निखिल – सम्पूर्ण
  • संशय – संदेह

व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कविता आत्मत्राण से उद्धृत हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कहते हैं कि हे प्रभु ! मेरी यह विनती नहीं है कि आप हर रोज मुझे डर से मुक्ति दिलाओ | मेरी रक्षा करो | बस आप मुझे रोग मुक्त और स्वस्थ रखें, ताकि मैं अपने बलबूते इस संसार के तमाम कष्टों को पार कर सकूँ | कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए आगे कहते हैं कि आप मेरी तकलीफ़ों को कम करें और मेरा ढाढ़स बंधाएँ | आप मुझमें निडरता पैदा करें, ताकि मैं हर कष्टों से डटकर मुकाबला कर सकूँ | कवि कहते हैं कि दुःखों से भरी रात में जब पूरी दुनिया मुझे धोखा दे, मेरी सहायता करने से इनकार कर दे | फिर भी मेरे अंदर आपके (ईश्वर) प्रति संदेह न उत्पन्न हो | हे प्रभु ! कुछ ऐसी ही शक्ति मुझमें भरना | 

काव्य-सौंदर्य:

भाव पक्ष:1. कवि ईश्वर से विशेष शक्ति पाने की प्रार्थना कर रहा है।
2. कवि क्षण-क्षण ईश्वर के दर्शन करने की कामना कर रहा है।
3. उदार हृदय व्यक्ति के गुणों का बखान किया गया है।

भाषा: 1. सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग किया गया है। भाषा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
2. ‘छिन-छिन’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
3. छंदमुक्त कविता है।

6. कर चले हम फ़िदा – पाठ का सार

कवि परिचय

अतहर हुसैन रिज़वी का जन्म 19 जनवरी 1919 को आज़मगढ़ जिले में मजमां गाँव में हुआ। ये आगे चलकर कैफ़ी आज़मी के रूप में मशहूर हुए। कैफ़ी आज़मी की गणना प्रगतिशील उर्दू कवियों की पहली पंक्ति में की जाती है। इनकी कविताओं में एक ओर सामाजिक और राजनितिक जागरूकता का समावेश है तो दूसरी ओर हृदय कोमलता भी है। उन्होंने 10 मई 2002 को इस दुनिया को अलविदा कहा।

कविता का सार

प्रस्तुत कविता में देश के सैनिकों की भावनाओं का वर्णन है। सैनिक कभी भी देश के मानसम्मान को बचाने  से पीछे नहीं हटेगा। फिर चाहे उसे अपनी जान से ही हाथ क्यों ना गवांना पड़े। भारत – चीन युद्ध के दौरान सैनिकों को गोलियाँ लगने के कारण उनकी साँसें रुकने वाली थी ,ठण्ड के कारण उनकी नाड़ियों में खून जम रहा था परन्तु उन्होंने किसी चीज़ की परवाह न करते हुए दुश्मनों का बहादुरी से मुकाबला किया और दुश्मनों को आगे नहीं बढ़ने दिया। 

सैनिक गर्व से कहते हैं कि सैनिक गर्व से कहते हैं कि यदि हमें अपना सिर भी कटवाना पड़े, तो हम खुशी-खुशी कटवा देंगे पर हमारे गौरव के प्रतीक हिमालय को कभी नहीं झुकने देंगे अर्थात हिमालय पर दुश्मनों के कदम नहीं पड़ने देंगे। लेकिन देश के लिए प्राणों की आहुति देने की खुशी कुछ ही लोगों को मिल पाती है अर्थात सैनिक देश पर मर मिटने का एक भी मौका नहीं खोना चाहते। 
जिस तरह से दुल्हन को लाल जोड़े में सजाया जाता है उसी तरह सैनिकों ने भी अपने प्राणों का बलिदान दे कर धरती को खून से लाल कर दिया है सैनिक कहते हैं कि हम देश के लिए बलिदान दे रहे हैं, लेकिन हमारे बाद भी यह सिलसिला चलता रहना चाहिए। जब भी जरुरत हो तो इसी तरह देश की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना चाहिए। सैनिक अपने देश की धरती को सीता के आँचल जैसा मानते हैं और कहते हैं कि अगर कोई हाथ आँचल को छूने के लिए बढ़े, तो उसे तोड़ दो।अपने वतन की रक्षा के लिए तुम राम हो और लक्ष्मण भी तुम हो अब इस देश की रक्षा का दायित्व तुम पर है।

कविता की व्याख्या

काव्यांश 1

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सैनिक अपने आखिरी सन्देश में कह रहें है कि वो अपने प्राणों को देश हित के लिए न्योछावर कर रहें है ,अब यह देश हम जाते जाते आप देशवासियों को सौंप रहें हैं। सैनिक उस दृश्य का वर्णन कर रहें है जब दुश्मनों ने देश पर हमला किया था। सैनिक कहते है कि जब हमारी साँसे हमारा साथ नहीं दे रही थी और हमारी नाड़ियों में खून जमता जा रहा ,फिर भी हमने अपने बढ़ते कदमों को जारी रखा अर्थात दुश्मनों को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ते गए। सैनिक गर्व से कहते हैं कि हमें अपने सर भी कटवाने पड़े तो हम ख़ुशी ख़ुशी कटवा देंगे पर हमारे गौरव के प्रतीक हिमालय को नहीं झुकने देंगे अर्थात हिमालय पर दुश्मनों के कदम नहीं पड़ने देंगे। हम मरते दम तक वीरता से दुश्मनों का मुकाबला करते रहे हैं, अब इस देश की रक्षा का भार आप देशवासियों को सौंप रहे हैं।

काव्यांश 2

ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने के रुत रोज़ आती नहीं
हुस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे
वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं
आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हमारे पूरे जीवन में हमें जिन्दा रहने के कई अवसर मिलते हैं लेकिन देश के लिए प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी कभी कभी किसी किसी को ही मिल पाती है अर्थात सैनिक देश पर मर मिटने का एक भी मौका नहीं खोना चाहते। सैनिक देश के नौजवानों को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि सुंदरता और प्रेम का त्याग करना सीखो क्योंकि वो सुंदरता और प्रेम क्या, जवानी ही क्या, जो देश के लिए अपना खून न बहा सके। सैनिक देश की धरती को दुल्हन जैसा मानते हैं और कहते हैं कि जिस तरह दुल्हन को स्वयंवर में हासिल करने के लिए राजा किसी भी मुश्किल को पार कर जाते थे उसी तरह तुम भी अपनी इस दुल्हन को दुश्मनों से बचा कर रखना। क्योंकि अब हम देश की रक्षा का दायित्व आप देशवासियों पर छोड़कर जा रहे हैं।

काव्यांश 3

राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फतह का जश्न इस जश्न के बाद है
जिंदगी मौत से मिल रही है गले
बाँध लो अपने सर से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि हम देश के लिए बलिदान दे रहे हैं, परंतु हमारे बाद भी यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। जब भी जरूरत हो, तो इसी तरह देश की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना चाहिए। जीत की ख़ुशी तो देश पर प्राण न्योछावर करने की ख़ुशी के बाद दोगुनी  हो जाती है। उस स्थिति में ऐसा लगता है मानो जिंदगी मौत से गले मिल रही हो। अब यह देश आप देशवासियों को सौंप रहे हैं अब आप अपने सर पर मौत की चुनरी बाँध लो अर्थात अब आप देश की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ।

काव्यांश 4

खींच दो अपने खूँ से जमीं पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावन कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

व्याख्या: सैनिक कहते हैं कि अपने खून से लक्ष्मण रेखा जैसी रेखा तुम भी खींच लो और ये तय कर लो कि उस रेखा को पार करके कोई रावण रूपी दुश्मन इस पार न आ पाए। सैनिक अपने देश की धरती को सीता के आँचल की तरह मानते हैं और कहते हैं कि अगर कोई हाथ आँचल को छूने के लिए बढ़े, तो उसे तोड़ दो। अपने वतन की रक्षा के लिए तुम ही राम हो और तुम ही लक्ष्मण हो ।अब इस देश की रक्षा का दायित्व तुम पर है।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने देश से सच्चा प्यार करना चाहिए और देश की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। सैनिक हमें सिखाते हैं कि देश की सेवा सबसे बड़ा धर्म है, और इसके लिए अपना जीवन तक कुर्बान करना गौरव की बात होती है। वे अपने प्राणों की आहुति देकर हमें देश की रक्षा का दायित्व सौंपते हैं। कविता हमें प्रेरणा देती है कि हम भी एकजुट होकर अपने देश की रक्षा करें, जैसे राम और लक्ष्मण ने किया था। जब भी देश को ज़रूरत हो, हमें बिना डरे आगे आना चाहिए और अपने देश के सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।

शब्दार्थ 

  • फ़िदा: न्योछावर
  • हवाले: सौंपना
  • जानो-तन: जान और शरीर
  • वतन: देश
  • नब्ज़: नाड़ी
  • रुत: मौसम
  • हुस्न: सौंदर्य
  • इश्क़: प्यार
  • रुस्वा: बदनाम
  • खुँ: खून
  • वीरान: सुनसान
  • काफिले: यात्रियों का समूह
  • फतह: जीत
  • जश्न: ख़ुशी
  • दामन: आँचल

5. तोप – पाठ का सार

कवि परिचय

कवि वीरेन डंगवाल जी का जन्म 5 अगस्त 1947 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के कीर्तिनगर में हुआ था | इन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा नैनीताल में और उच्च शिक्षा इलाहाबाद में पूरी की | यह पेशेवर प्राध्यापक हैं, परन्तु पत्रकारिता से भी जुड़े हुए हैं | इनकी कविताओं की विशिष्टता की बात करें तो समाज के साधारण जन और हाशिए पर स्थित विलक्षण ब्योरे और दृश्य कवि की कविताओं की विशिष्टता मानी जाती है | 
कवि वीरेन डंगवाल जी का अब तक दो कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में’ और ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ प्रकाशित हो चुके हैं | इन्हें श्रीकांत वर्मा पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा और भी अनेक पुरस्कार से नवाजा गया है| 

पाठ प्रवेश

‘प्रतीक’ अर्थात निशानी और ‘धरोहर’ अर्थात विरासत दो तरह की होती है। एक वे जिन्हें देखकर या जिनके बारे में जानकर हम अपने देश और समाज की प्राचीन उपलब्धियों के बारे में जान सकते हैं और दूसरी वे जो हमें बताती हैं कि हमारे पूर्वजों से कब क्या गलती हुई थी जिसके कारण देश की कई पीढ़ियों को गहरे दुःख और कष्टों को झेलना पड़ा।
प्रस्तुत पाठ में ऐसी ही दो निशानियों का वर्णन किया गया है। पाठ हमें याद दिलाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी कभी भारत में व्यापार करने आई थी। भारत में उसका स्वागत किया गया था परन्तु धीरे – धीरे वो हमारी शासक बन गई।
अगर उन्होंने कुछ बाग़ – बगीचे बनाये तो उन्होंने तोपें भी तैयार की। देश को फिर से आज़ाद करने का सपना देखने वाले वीर सपूतों को इन तोपों ने मौत के घाट उतार दिया। पर एक दिन ऐसा भी आया जब हमारे पूर्वजों ने उस सत्ता को उखाड़ फैंका। तोप को बेकार कर दिया। फिर भी हमें इन निशानियों के माध्यम से याद रखना होगा की भविष्य में कोई और इस तरह हम पर हुक्म ना जमा पाए जिसके इरादे अच्छे ना हो और यहाँ फिर से वही परिस्थितियाँ बने जिनके घाव आज तक हमारे दिलों में हरे हैं। भले ही अंत में उनकी तोप भी उसी काम क्यों ना आये जिस काम इस पाठ की तोप आ रही है।

कविता सार

प्रस्तुत पाठ हमें याद दिलाता है कि कभी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने के इरादे से आई थी। भारत में उसका स्वागत किया गया था परन्तु धीरे – धीरे वो हमारी शासक बन गई। अगर उन्होंने कुछ बाग़ – बगीचे बनाये तो उन्होंने तोपें भी तैयार की। कवि कहते हैं कि यह 1857 की तोप, जो आज कंपनी बाग़ के प्रवेश द्वार पर रखी गई है, बहुत देखभाल की जाती है। जिस तरह यह कंपनी बाग़ हमें विरासत में अंग्रेजों से मिला है उसी तरह यह तोप भी हमें अंग्रेजों से ही विरासत में मिली। सुबह और शाम को बहुत सारे व्यक्ति कंपनी के बाग़ में घूमने के लिए आते हैं। तब यह तोप उन्हें अपने बारे में कहती है कि मैं अपने ज़माने में बहुत ताकतवर थी। 

अब तोप की स्थिति बहुत खराब हो गई है- छोटे बच्चे इस पर बैठ कर घुड़सवारी का खेल खेलते हैं। चिड़ियाँ इस पर बैठ कर आपस में बातचीत करने लग जाती हैं। कभी – कभी शरारती चिड़ियाँ खासकर गौरैयें तोप के अंदर घुस जाती हैं। वह यह बताना चाहती है कि ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि ताकत हमेशा नहीं रहती।

कविता की व्याख्या

काव्यांश 1

कंपनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप
इसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिले
कंपनी बाग़ की तरह
साल में चमकाई जाती है दो बार।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि यह जो 1857 की तोप आज कंपनी बाग़ के प्रवेश द्वार पर रखी गई है इसकी बहुत देखभाल की जाती है। जिस तरह यह कंपनी बाग़ हमें अंग्रेजों से मिली विरासत है, उसी तरह यह तोप भी हमें अंग्रेजों से ही विरासत में मिली है। जिस तरह कंपनी बाग़ की साल में दो बार अच्छी देखरेख की जाती है। उसी तरह इस तोप को भी साल में दो बार चमकाया जाता है।

काव्यांश 2

सुबह शाम आते हैं कंपनी बाग़ में बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिए थे मैंने
अच्छे – अच्छे सूरमाओं के धज्जें
अपने ज़माने में

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सुबह और शाम को बहुत सारे व्यक्ति कंपनी के बाग़ में घूमने के लिए आते हैं। तब यह तोप उन्हें अपने बारे में बताती है कि मैं अपने ज़माने में बहुत ताकतवर थी। मैंने अच्छे अच्छे वीरों के चिथड़े उड़ा दिए थे। अर्थात, उस समय तोप का भय हर इंसान के मन में था।

काव्यांश 3

अब तो बहरहाल
छोटे बच्चों की सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती है गपशप
कभी -कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
खासकर गौरैयें
वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उसका मुँह बंद।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि अब तोप की स्थिति अब बहुत खराब हो गई है। छोटे बच्चे इस पर बैठ कर घुड़सवारी का खेल खेलते हैं। जब बच्चे इस पर नहीं खेल रहे होते, तब चिड़ियाँ इस पर बैठ कर आपस में बातचीत करने लगती हैं।। कभी–कभी शरारती चिड़ियाँ खासकर गौरैयें तोप के अंदर घुस जाती हैं। वह छोटी सी चिड़ीया हमें यह बताना चाहती है कि कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो एक ना एक दिन उसका भी अंत निश्चित होता है।

कविता का परिप्रेक्ष्य

प्रस्तुत पाठ या कविता तोप, कवि वीरेन डंगवाल जी के द्वारा रचित है | इस पाठ में दो किस्म प्रतीक और धरोहर का चित्रण करते हुए, कवि कहते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी कभी भारत में व्यापार करने आई थी और हमारा शासक बन बैठी | कवि कहते हैं कि धरोहर दोनों, अच्छी और बुरी, हो सकती है | जैसे कम्पनी बाग अंग्रेजों द्वारा दी गई विरासतों में से एक अच्छी धरोहर मानी जाती है | लेकिन वहीं, उसके मुहाने पर रखी तोप एक ऐसी विरासत है, जिसने हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को बेरहमी से मारा था।

शब्दार्थ 

  • धज्जे – नष्ट-भ्रष्ट करना
  • जबर – शक्तिशाली
  • सूरमाओं – वीरों
  • फ़ारिग – मुक्त
  • कंपनी बाग़ – ब्रिटिश जमाने में भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा जगह-जगह बनवाए गए बाग़-बगीचों मे कानपुर में बनवाया गया एक बाग़,जिसे कंपनी बाग के नाम से जानते हैं 
  • मुहाने पर – प्रवेश द्वार पर
  • सम्हाल – देखभाल
  • विरासत – पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्ति
  • सैलानी – यात्री