4. पर्वत प्रदेश में पावस – पाठ का सार

कवि परिचय

इस कविता में कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने पर्वतीय इलाके में वर्षा ऋतु का सजीव चित्रण किया है। उनका जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी (अल्मोड़ा) में हुआ था। उन्होंने बचपन से ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था। सात साल की उम्र में उन्हें स्कूल में काव्य-पाठ के लिए पुरस्कृत किया गया। 1915 में उन्होंने स्थायी रूप से साहित्य सृजन शुरू किया और छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में पहचाने गए। उनकी प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और रहस्यवाद झलकता है। इसके बाद वे मार्क्स और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए।

कविता का सार

कवि ने इस कविता में प्रकृति का ऐसा वर्णन किया है कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति सजीव हो उठी हो। कवि कहता है कि वर्षा ऋतु में प्रकृति का रूप हर पल बदल रहा है—कभी वर्षा होती है तो कभी धूप निकल आती है। पर्वतों पर उगे हजारों फूल ऐसे लग रहे हैं जैसे वे पर्वतों की आँखें हों, और वे इन आँखों के सहारे अपने आपको अपने चरणों में फैले दर्पण रूपी तालाब में देख रहे हों। पर्वतों से गिरते झरने कल-कल की मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं, जो नस-नस में प्रसन्नता भर रही है। पर्वतों पर उगे हुए पेड़ शांत आकाश को इस प्रकार निहार रहे हैं जैसे वे उसे छूना चाहते हों। बारिश के बाद मौसम ऐसा प्रतीत हो रहा है कि घनी धुंध के कारण पेड़ मानो उड़ गए हों या गायब हो गए हों। चारों ओर धुआँ-सा होने के कारण ऐसा लग रहा है जैसे तालाब में आग लग गई हो। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस मौसम में इंद्र भी अपने बादल रूपी विमान को लेकर इधर-उधर घूम रहे हैं और जादू का खेल दिखा रहे हैं।

कविता की व्याख्या

(1)
पावस ऋतु थी ,पर्वत प्रवेश ,
पल पल परिवर्तित प्रकृति -वेश।

व्याख्या: कवि कहता है कि पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु का आगमन हो गया है, जिससे प्रकृति का रूप बार-बार बदल रहा है—कभी बारिश होती है तो कभी धूप निकल आती है।

(2)
मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्र दृग- सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार बार ,
नीचे जल ने निज महाकार ,
-जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण सा फैला है विशाल !

व्याख्या: इस पद्यांश में कवि ने पहाड़ों के आकार की तुलना करघनी (कमर में बांधा जाने वाला आभूषण) से की है। कवि कहता है कि करघनी के आकार वाले पहाड़ अपनी हजारों पुष्परूपी आँखें फाड़कर नीचे जल में अपने विशाल स्वरूप को देख रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पहाड़ों के चरणों में स्थित तालाब उनके लिए एक विशाल दर्पण का कार्य कर रहा है।

(3)
गिरि का गौरव गाकर झर- झर
मद में नस -नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों- से सुन्दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर !
गिरिवर के उर से उठ -उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
है झाँक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष ,अटल कुछ चिंतापर।

व्याख्या: इस पद्यांश में कवि कहता है कि मोतियों की लड़ियों के समान सुंदर झरने झर-झर की मधुर ध्वनि के साथ बह रहे हैं, मानो वे पहाड़ों का गुणगान कर रहे हों। उनकी करतल ध्वनि नस-नस में उत्साह और प्रसन्नता भर देती है। पहाड़ों के हृदय से उठकर अनेक पेड़ ऊँचा उठने की आकांक्षा लिए एकटक शांत आकाश को निहार रहे हैं, मानो वे किसी गहरी चिंता में डूबे हों। वास्तव में, वे हमें निरंतर ऊँचा उठने की प्रेरणा दे रहे हैं।

(4)
उड़ गया ,अचानक लो ,भूधर
फड़का अपार पारद *  के पर !
रव -शेष रह गए हैं निर्झर !
है टूट पड़ा भू पर अम्बर !
धँस गए धारा में सभय शाल !
उठ रहा धुआँ  ,जल गया ताल !
-यों जलद -यान में विचर -विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।

व्याख्या: इस पद्यांश में कवि कहता है कि तेज बारिश के बाद मौसम ऐसा हो गया है कि घनी धुंध के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पेड़ कहीं उड़ गए हों, अर्थात वे अदृश्य हो गए हों। ऐसा लग रहा है कि पूरा आकाश ही धरती पर उतर आया हो और केवल झरने की आवाज़ सुनाई दे रही हो। प्रकृति के इस भयानक रूप को देखकर शाल के पेड़ भयभीत होकर धरती में समाने लगे हैं। चारों ओर धुंआ-सा छा जाने के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो तालाब में आग लग गई हो। ऐसा भी प्रतीत हो रहा है कि इस विचित्र मौसम में इंद्र अपने बादल रूपी विमान में सवार होकर इधर-उधर घूमते हुए जादू का खेल दिखा रहे हैं।

कविता का निष्कर्ष

इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के माध्यम से पर्वतीय प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। वर्षा, धूप, झरने और पर्वत मिलकर एक मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। कवि बताते हैं कि प्रकृति केवल आनंद ही नहीं देती, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है। इंद्र अपनी मूसलधार वर्षा और बादलों के विमान से इस प्राकृतिक खेल को और अद्भुत बना रहे हैं। कविता हमें यह संदेश देती है कि जीवन में आने वाले हर परिवर्तन को सकारात्मक दृष्टिकोण से अपनाना चाहिए।

शब्दार्थ

  • पावस ऋतू: वर्षा ऋतू
  • वेश: रूप
  • मेघलाकार: करघनी के आकार की पहाड़ की ढाल
  • अपार: जिसकी कोई सीमा ना हो
  • सहस्त्र: हजारों
  • दृग-सुमन: फूल रूपी आँखें
  • अवलोक: देख रहा
  • महाकार: विशाल आकार
  • ताल: तालाब
  • दर्पण: शीशा
  • गिरि: पर्वत
  • मद: मस्ती
  • उत्तेजित करना: भड़काना
  • निर्झर: झरना
  • उर: हृदय
  • उच्‍चाकांक्षायों: उँची आकांक्षा
  • तरुवर: वृक्ष
  • नीरव: शांत
  • अनिमेष: अपलक
  • अटल: स्थिर
  • भूधर: पर्वत
  • वारिद: बादल
  • रव-शेष: केवल शोर बाकी रह जाना
  • सभय: डरकर
  • जलद: बादल रूपी वाहन
  • विचर-विचर: घूम-घूम कर
  • इंद्रजाल: इन्द्रधनुष

3. मनुष्यता – पाठ का सार

कविता का सार

‘मनुष्यता’ कविता में कवि ने मनुष्य के वास्तविक गुणों से परिचित कराया है। कवि के कथनानुसार, मनुष्य तभी मनुष्य कहलाने लायक है, जब उसमें परहित-चिंतन के गुण हों। मनुष्य का जीवन वास्तव में परहित के लिए न्योछावर हो जाने पर ही सफल है। ऐसे व्यक्ति को संसार याद रखता है। यदि मनुष्य परहित के लिए स्वयं को समर्पित नहीं करता तो उसका जीवन व्यर्थ है। प्रकृति के समस्त प्राणियों में से केवल मनुष्य के पास ही विवेक है। मृत्यु की सार्थकता भी दूसरों के लिए वुफर्बान होने में है। यह तो पशु-प्रवृत्ति है कि वह केवल अपने ही खाने-पीने का ख्याल रखे। सरस्वती भी उदार व्यक्ति का गुणगान करती है। पृथ्वी भी उसका आभार मानती है। उसके यश की कीर्ति चारों दिशाओं में गूँजती है। कवि महान परोपकारी व्यक्तियों यथा- दधीचि, रंतिदेव, उशीनर, कर्ण आदि का उदाहरण देते हुए अपने तथ्य को स्पष्ट करते हैं। हमें कभी भी अपने धन तथा वुफशलता पर गर्व नहीं करना चाहिए। जब तक परम पिता परमेश्वर हमारे साथ हैं, तब तक हम भाग्यहीन तथा अनाथ नहीं हैं। परोपकारी व्यक्ति का सम्मान तो देवता भी करते हैं। सभी मनुष्य वास्तव में बंधु हैं, परंतु हम अपने कर्मों के अनुसार पफल भोगते हैं। मनुष्य को सहर्ष अपने मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। उसे विपत्तियों से नहीं घबराना चाहिए। वास्तव में मनुष्य जीवन की सार्थकता परोपकार में है, अन्यथा यह जीवन विफल है।

2. पद – पाठ का सार

कवि परिचय: मीराबाई

मीराबाई भक्ति काल की एक प्रसिद्ध महिला कवयित्री थीं। उनका जन्म 1503 में राजस्थान के चोकड़ी (कुड़की) गाँव में हुआ था। उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ, लेकिन जल्दी ही उनके पति, पिता और श्वसुर का निधन हो गया। दुखों से भरपूर जीवन के कारण मीरा ने अपना घर छोड़ दिया और भगवान कृष्ण की भक्ति में लग गईं। वे संत रैदास की शिष्या थीं। उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना और जीवन भर उनकी भक्ति में लीन रहीं। मीरा ने अपने पदों में कृष्ण से प्रेम, शिकायत, विनती और लाड़ सभी भावों को बहुत सुंदर ढंग से बताया है। उनकी भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मेल मिलता है।

मीराबाई

मीरा के पद पाठ प्रवेश

लोक कथाओं के अनुसार, मीरा अपने जीवन के दुखों से परेशान होकर घर छोड़कर वृंदावन चली गई थीं। वहाँ उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान कृष्ण को समर्पित कर दिया और उनके प्रेम में डूब गईं। मीरा की रचनाओं में भगवान कृष्ण कभी बिना रूप के परमात्मा (निर्गुण), कभी गोपियों के प्यारे श्रीकृष्ण (सगुण), और कभी किसी को न चाहने वाले संत (निर्मोही जोगी) के रूप में दिखाई देते हैं।

इस पाठ में दिए गए दोनों पद मीरा ने अपने भगवान श्रीकृष्ण के लिए ही लिखे हैं। मीरा कभी भगवान की तारीफ करती हैं, कभी उनसे प्यार जताती हैं और कभी उन्हें डांट भी देती हैं। वे भगवान की शक्तियों की याद दिलाती हैं और उन्हें यह भी कहती हैं कि अपने भक्तों का साथ देना उनका कर्तव्य है।

पाठ का सार

इस पाठ में मीराबाई के दो पद दिए गए हैं, जिनमें उन्होंने अपने आराध्य श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल) को प्रेम, भक्ति और श्रद्धा से पुकारा है। पहले पद में मीरा भगवान से विनती करती हैं कि जैसे उन्होंने पहले अपने भक्तों की मदद की थी, वैसे ही अब वे मीरा की भी मदद करें। वे याद दिलाती हैं कि भगवान ने द्रौपदी की लाज बचाई, नरसिंह रूप लेकर भक्त की रक्षा की और गजराज को बचाया। मीरा खुद को भगवान की दासी मानकर उनसे अपनी पीड़ा हरने की प्रार्थना करती हैं।

दूसरे पद में मीरा कहती हैं कि वे अपने आराध्य श्रीकृष्ण की सेविका बनकर रहना चाहती हैं। वे रोज़ बाग लगाएँगी, प्रभु के दर्शन करेंगी और वृंदावन की गलियों में श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाएँगी। वे कहती हैं कि उन्हें भगवान के दर्शन, सुमिरन (स्मरण) और भक्ति की जागीर (धन-संपत्ति) चाहिए। मीरा अपने मन में बसे मोर मुकुट, पीताम्बर पहनने वाले, मुरली बजाने वाले श्रीकृष्ण का सुंदर रूप याद करती हैं। वे चाहती हैं कि आधी रात को भी यमुना के किनारे भगवान उन्हें दर्शन दें, क्योंकि उनका मन श्रीकृष्ण के बिना बहुत अधीर हो रहा है।

इन पदों में मीरा की गहरी भक्ति, प्रेम, समर्पण और आराध्य के प्रति विश्वास झलकता है।

पद से शिक्षा

मीरा बाई के इन पदों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अगर हमारा विश्वास और भक्ति सच्ची हो, तो भगवान हमेशा हमारे साथ रहते हैं और हमारी परेशानी दूर करते हैं। मीरा ने अपने जीवन में बहुत दुख झेले, फिर भी उन्होंने भगवान कृष्ण पर विश्वास नहीं छोड़ा। वे उन्हें अपने सच्चे दोस्त, मालिक और सहारा मानती थीं। हमें भी सच्चे मन से भगवान पर भरोसा रखना चाहिए और अपने काम को पूरी श्रद्धा और सेवा भाव से करना चाहिए। यह पद हमें सिखाते हैं कि प्रेम और भक्ति से ही जीवन में शांति और सच्चा सुख पाया जा सकता है।

शब्दार्थ

  • हरि: श्री कृष्ण
  • जन: भक्त
  • भीर: दुख- दर्द
  • लाज: इज्जत
  • चीर: साड़ी, कपड़ा
  • नरहरि: नरसिंह अवतार
  • सरीर: शरीर
  • गजराज: हाथियों का राजा (ऐरावत)
  • कुण्जर: हाथी
  • काटी: मारना
  • लाल गिरधर: श्री कृष्ण
  • म्हारी: हमारी
  • स्याम: श्री कृष्ण
  • चाकर: नौकर
  • रहस्यूँ: रह कर
  • नित: हमेशा
  • दरसण: दर्शन
  • जागीरी: जागीर, साम्राज्य
  • कुंज: संकरी (गलियाँ)
  • पीताम्बर: पीले वस्त्र
  • धेनु: गाय
  • बारी: बगीचा
  • पहर: पहन कर
  • तीरा: किनारा
  • अधीरा: व्याकुल होना
  • सुमरण: स्मरण, याद करना
  • भाव: भावना
  • भगती: भक्ति
  • सरसी: सुंदर, सरस
  • मोहन: मन को मोह लेने वाला (श्री कृष्ण)
  • मुरली: बांसुरी
  • दरसण पास्यूँ: दर्शन प्राप्त करूं
  • बणावं: बनवाना
  • दीज्यो: देना
  • हिवड़ो: हृदय, दिल

1. साखी – पाठ का सार

कवि का परिचय: कबीर

कबीर एक प्रसिद्ध संत और कवि थे। उनका जन्म 1398 में काशी (अब वाराणसी) में हुआ माना जाता है। उन्होंने गुरु रामानंद से शिक्षा ली और 120 वर्ष तक जीवित रहे। जीवन के आखिरी साल उन्होंने मगहर में बिताए और वहीं उनका निधन हुआ। कबीर ने अपने दोहों और साखियों के ज़रिए समाज को सही रास्ता दिखाने का काम किया। वे ईश्वर को एक मानते थे और पूजा-पाठ के दिखावे के खिलाफ थे। कबीर ने अनुभव से ज्ञान लिया और उसी को अधिक महत्व दिया। उनकी भाषा आसान और लोगों की बोलचाल वाली थी, जिससे उनकी बातें सबको समझ में आती थीं।

कविता का सार

इस कविता में संत कबीर हमें अच्छी बातें बोलने, अपने अहंकार को छोड़ने और दूसरों को सुख देने की सीख देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान हमारे अंदर ही हैं, लेकिन हम बाहर ढूंढते रहते हैं। जब तक हम खुद में ही उलझे रहते हैं, तब तक हमें ईश्वर नहीं मिलते। लेकिन जब हम अपने अहं को छोड़ देते हैं, तब हमें सच्चा ज्ञान और ईश्वर का अनुभव होता है।

कबीर यह भी बताते हैं कि दुनिया में सभी लोग सोने-खाने में मस्त हैं, लेकिन जो सच्चा भक्त होता है, वह भगवान की याद में जागता और रोता है। वे विरह (जुदाई) के दर्द को सांप की तरह बताते हैं, जिसे राम के नाम का कोई भी मंत्र ठीक नहीं कर सकता। वे निंदा करने वाले को भी पास रखने की सलाह देते हैं क्योंकि वह हमारी गलतियों को बताकर हमें सुधारने में मदद करता है।

अंत में कबीर कहते हैं कि केवल किताबें पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता। सच्चा ज्ञान तो अनुभव से मिलता है। वे अपने पुराने जीवन को छोड़कर नए सच्चे रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं।

कविता की व्याख्या

काव्यांश 1

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी न केवल हमारे मन और शरीर को शांत और ठंडा करती है, बल्कि दूसरों को भी सुख और शांति का अनुभव कराती है।

काव्यांश 2

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै वन माँहि। 
ऐसैं घटि-घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि।।

व्याख्या: यहाँ कबीर जी ईश्वर की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा है कि कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है लेकिन इससे अनजान हिरन उसके सुगंध के कारण उसे पूरे जंगल में ढूंढ़ता फिरता है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं परन्तु मनुष्य इसे वहाँ नही देख पाता। वह ईश्वर को मंदिर-मस्जिद और तीर्थ स्थानों में ढूंढ़ता रहता है।

काव्यांश 3

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि।
सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माँहि।।

व्याख्या: यहाँ कबीर कह रहे हैं कि जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार बना रहता है, तब तक उसे ईश्वर की अनुभूति नहीं होती। जैसे ही उसका अहंकार समाप्त होता है, उसे ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। जैसे दीपक के जलते ही अंधकार दूर हो जाता है, वैसे ही अहंकार मिटने पर आत्मज्ञान का प्रकाश फैलता है। यहाँ “अहंकार” को अंधकार और “दीपक” को ईश्वर का प्रतीक माना गया है।

काव्यांश 4

सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।

व्याख्या: कबीर जी कहते हैं कि संसार के लोग सुखी हैं क्योंकि वे केवल खाने और सोने में लगे रहते हैं और उन्हें ईश्वर की प्राप्ति की चिंता नहीं होती। परंतु कबीरदास स्वयं को दुखी कहते हैं क्योंकि वे प्रभु-वियोग में रात-भर जागते हैं और रोते रहते हैं। उन्हें ईश्वर के दर्शन की तड़प सताती है, इसलिए वे सच्चे अर्थों में प्रभु-प्रेम में व्याकुल हैं।

काव्यांश 5

बिरह भुवंगम तन बसै, मन्त्र ना लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।

व्याख्या: जब किसी मनुष्य के शरीर के अंदर अपने प्रिय से बिछड़ने का साँप बसता है तो उसपर कोई मन्त्र या दवा का असर नहीं होता ठीक उसी प्रकार राम यानी ईश्वर के वियोग में मनुष्य भी जीवित नही रहता। अगर जीवित रह भी जाता है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है।

काव्यांश 6

निंदक नेडा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणी बिना, निरमल करै सुभाइ।।

व्याख्या: कबीर जी कहते हैं कि निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए, यदि संभव हो तो उसके लिए अपने आँगन में कुटिया बनवाकर रखना चाहिए। क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है। उसका तात्पर्य यह है कि निंदा करने वाला हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधारने में मदद करता है।

काव्यांश 7

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया ना कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होई।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि संसार में बहुत लोग मोटी-मोटी पोथियाँ पढ़ते-पढ़ते मर गए, लेकिन कोई भी सच्चा ज्ञानी (पंडित) नहीं बन पाया। यदि कोई व्यक्ति प्रेम और भक्ति से ईश्वर के नाम का एक अक्षर भी समझ लेता है, तो वही सच्चा पंडित कहलाता है। यहाँ पंडित का अर्थ विद्वान से नहीं, बल्कि ईश्वर को जानने वाले सच्चे ज्ञानी से है।

काव्यांश 8

हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराडा हाथि। 
अब घर जालौं तास का, जे चले हमारे साथि।।

व्याख्या: कबीरदास कहते हैं कि उन्होंने अपने घर (अर्थात् मोह-माया और सांसारिक बंधनों) को स्वयं जला दिया है और अब उनके हाथ में ज्ञान की मशाल है। अब जो भी व्यक्ति उनके साथ चलना चाहता है, उसे भी अपने भीतर के मोह-माया के घर को जलाना होगा। यानी सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए सांसारिक मोह से मुक्त होना आवश्यक है।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह सिखने को मिलता है कि हमें मीठा और अच्छा बोलना चाहिए जिससे दूसरों को सुख मिले और मन शांत हो। ईश्वर हर जगह है, लेकिन हम उसे देख नहीं पाते। जब हमारे अंदर अहंकार होता है, तब हमें ईश्वर नहीं मिलते, पर जब हम अपने अहंकार को छोड़ देते हैं, तो ईश्वर हमारे भीतर ही दिखाई देते हैं। जो सच्चे प्रेम में होता है, वह विरह में दुखी रहता है और चैन से नहीं सो पाता। सच्चा ज्ञान किताबों से नहीं, अनुभव और ईश्वर की भक्ति से आता है। कबीर हमें बताते हैं कि पहले खुद को सुधारो और फिर दूसरों को राह दिखाओ।

शब्दार्थ

  • बाँणी: वाणी
  • आपा: अहंकार
  • सीतल: ठंडा
  • कस्तूरी: एक सुगन्धित पदार्थ
  • कुंडलि: नाभि
  • माँहि: भीतर
  • हरि: भगवान
  • मिटि: मिटना
  • सुखिया: सुखी
  • अरु: और
  • बिरह: वियोग
  • भुवंगम: साँप
  • बौरा: पागल
  • निंदक: बुराई करने वाला
  • नेड़ा: निकट
  • आँगणि: आँगन
  • साबण: साबुन
  • पाँणी: पानी
  • निरमल: पवित्र
  • सुभाइ: स्वभाव
  • पोथी: ग्रन्थ
  • मुवा: मर गया
  • भया: हुआ
  • अषिर: अक्षर
  • पीव: प्रियतम या ईश्वर
  • जाल्या: जलाया
  • आपणाँ: अपना
  • मुराडा: जलती हुई लकड़ी
  • जालौं: जलाऊँ
  • तास का: उसका