14. कारतूस – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. वजीर अली कौन था? उसके चरित्र की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था। इस प्रकार जो अंग्रेजों की ब्रिटिश कम्पनी की सैनिक छावनी में प्रवेश कर कर्नल से कारतूस प्राप्त कर सकता है, वह साधारण व्यक्ति या सिपाही नहीं हो सकता। वज़ीर अली ने एक जाँबाज सिपाही की तरह प्राणों की बाजी लगाकर कारतूस हासिल किए। उसका यह कार्य उसे एक जाँबाज सिपाही सिद्ध करता है और हम वज़ीर अली को जाँबाज सिपाही कह सकते हैं।

प्रश्न 2. लेफ्टीनेंट को ऐसा क्यों लगा कि कम्पनी के खिलाफ सारे हिन्दुस्तान में एक लहर दौड़ गई है? ‘कारतूस’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लेफ्टीनेंट को ऐसा इसलिए लगा कि कम्पनी के खिलाफ सारे हिन्दुस्तान में एक लहर दौड़ गई है, क्योंकि हिन्दुस्तान की जनता कम्पनी के विरोध में आ गई थी, वह वज़ीर अली जैसे जाँबाज यौद्धाओं की तरफदारी कर उनका साथ दे रही थी। गाँधी जी जैसे नेताओं के आह्नान पर भारतीय जनता सत्याग्रह, आन्दोलनों में हिस्सा लेकर कम्पनी के खिलाफ बगावत पर उतर आई थी।

प्रश्न 3. ‘मुट्ठी भर आदमी, मगर ये दमखम’ कथन से क्या तात्पर्य है ? ‘कारतूस’ के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
इसका तात्पर्य है कि वज़ीर अली के पास मुट्ठी भर आदमी थे, अर्थात् बहुत कम आदमियों की सहायता या साथ था, फिर भी इतनी शक्ति और दृढ़ता का परिचय देना कमाल की बात थी। सालों से जंगल में रहने पर भी स्वयं कर्नल, उनकी सेना का बड़ा समूह, जो बहु-संख्या में युद्धसामग्री से लैस था, मिलकर भी उसे पकड़ नहीं पाए थे। उसकी अदम्य शक्ति और दृढ़ता को जीत नहीं पाए थे। उस जाँबाज सिपाही को पकड़ नहीं पाए थे। अर्थात् वह हर काम इतनी सावधानी तथा होशियारी से करता था कि उसने व उसके मुट्ठी भर आदमियों ने ही कर्नल के इतने बड़े सेना-समूह की नाक में दम कर दिया था।

प्रश्न 4. गर्द तो ऐसी उड़ रही है जैसे कि पूरा एक काफिला चला आ रहा हो। मगर मुझे तो एक ही सवार नजर आता है। इसका आशय लिखिए।
उत्तर:
 आशय-जब कर्नल अपने खेमे के बाहर बैठकर लेफ्टीनेंट से वज़ीर अली के विषय में बात कर ही रहे थे कि तभी उन्हें दूर से धूल का गुबार उठता दिखाई दिया जिसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सेना का पूरा-पूरा काफिला चला आ रहा हो परंतु जब ध्यान से देखा तो केवल एक ही व्यक्ति दिखाई दे रहा था। वह अकेला ही पूरे काफिले के समान धूल का गुबार उड़ाता चला आ रहा था।

प्रश्न 5. एकांकी ‘कारतूस’ में वर्णित किन घटनाओं से पता चलता है कि वज़ीर अली अंग्रेज़ों से नफ़रत करता था और उनका कट्टर विरोधी था ?
उत्तर:
 वज़ीर अली अंग्रेजों से नफ़रत करता था तथा उनका कट्टर विरोधी था। अंग्रेज़ों को भारत से निकालना उसका एकमात्र लक्ष्य था। इसके लिए उसने अफ़गानिस्तान के बादशाह शाहे जमा को भारत पर आक्रमण करने का न्यौता दिया। उसने सारे भारत वर्ष में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ वातावरण बना दिया था। अंग्रेज़ों का पक्ष लेने वालों को वह अपना शत्रु समझता था इसी कारण उसने कंपनी के वकील की हत्या कर दी। वह सआदत अली को अवध की गद्दी से हटाना चाहता था और स्वयं उस पर कब्जा करना चाहता था ताकि वहाँ से अंग्रेज़ों को निकाल सके।

प्रश्न 6. वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था, कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था। इस प्रकार जो अंग्रेजों की ब्रिटिश कम्पनी की सैनिक छावनी में प्रवेश कर कर्नल से कारतूस प्राप्त कर सकता है। वह साधारण व्यक्ति या सिपाही नहीं हो सकता। वज़ीर अली ने एक जाँबाज सिपाही की तरह प्राणों की बाजी लगाकर कारतूस हासिल किए। उसका यह कार्य उसे एक जाँबाज सिपाही सिद्ध करता है और हम वज़ीर अली को जाँबाज सिपाही कह सकते हैं।

प्रश्न 7. कारतूस पाठ के आधार पर वजीर अली की विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 वजीर अली की विशेषताएँ-

  • देशभक्ति-अंग्रेजों के प्रति नफरत का भाव।
  • स्वाभिमानी-स्वाभिमान की रक्षा हेतु वकील की हत्या।
  • जाँबाज सिपाही-मुट्ठीभर सेना के साथ अंग्रेजों से मुकाबला।
  • निर्भीक एवं निडर-अंग्रेजों खेले में घुसकर कारतूस ले जाना।
  • नीति कुशल-अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए अफगानिस्तान के बादशाह को निमंत्रण।
    (किन्हीं तीन बिन्दुओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख अपेक्षित।) 

व्याख्यात्मक हल:
वजीर अली एक जाँबाज सिपाही था, उसने अंग्रेजों की ब्रिटिश कम्पनी की सैनिक छावनी में निडरतापूर्वक प्रवेश किया और कर्नल से कारतूस प्राप्त किए। वह एक बलशाली, साहसी नौजवान था। उसने एक जाँबाज सिपाही की तरह अपने प्राणों की बाजी लगाकर कारतूस हासिल किए। उसके जाने के बाद कर्नल भी हक्का-बक्का रह गया और उसकी हिम्मत और बहादुरी से अचंभित रह गया जो उसकी जान बख्श कर चला गया। वजीर अली अंग्रेजों की हुकूमत को समाप्त करना चाहता था, उसने अफगानिस्तान के बादशाह शाहजमा को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने की दावत दी।

13. पतझर में टूटी पत्तियाँ – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’ गाँधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात किस तरह झलकती है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: शुद्ध सोने में……में सोना’ गाँधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात झलकती है। लोग गाँधी जी को ‘व्यावहारिक और आदर्शवादी’ कहते और मानते थे। इसलिए वे अपने विलक्षण आदर्श चला सके। उनके व्यवहार और आदर्शों से प्रभावित होकर देशवासी उनके पीछे चले। उनके आग्रह पर स्वदेशी स्वाधीनतावाद को स्वीकार कर कार्य कर सके। उन्होंने आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं दिया बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाया था। वे सोने में ताँबा नहीं बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे। आजादी की लड़ाई में उन्होंने साधारण व्यक्तियों को जोड़कर उनकी कीमत, प्रसिद्धि बढ़ाई। चाहे वे कृषक पुत्र राजेन्द्र प्रसाद हों, चाहे बल्लभ भाई पटेल हों, चाहे जवाहर लाल नेहरू हों ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। गाँधी जी के व्यक्तित्व, सिद्धांतों  और आदर्श से प्रभावित होकर ही लोग उनके निकट आए।

प्रश्न 2. लेखक ने व्यवहारवादी लोगों के बारे में क्या कहा है ? वे असली जीवन में आदर्शवादी लोगों से कैसे भिन्न हैं ? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 (क) व्यवहारवादी लोग सफल व हमेशा सजग रहते हैं।
(ख) सोने में ताँबे की अपेक्षा ताँबे पर सोने का पानी चढ़ाकर कीमत बढ़ाते हैं।
(ग) आदर्शवादी लोग जीवन मूल्यों के अनुयायी तथा सामाजिक उत्थान में सहयोगी होते हैं।
(घ) स्वार्थ-सिद्धि की उपेक्षा करके वे सर्वस्व उत्थान के हिमायती होते हैं।

प्रश्न 3. ”गाँधी जी सच्चे आदर्शवादी थे और उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी।“ ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ पाठ के आधार पर समझाइए। 
उत्तर: गाँधी जी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी, उदाहरण सहित इस बात की पुष्टि इस प्रकार कर सकते हैं-
(1) सर्वप्रथम गाँधी जी ने नेतृत्व क्षमता का उदाहरण दक्षिण-अफ्रीका की यात्रा के दौरान प्रदर्शित किया। वहाँ रंग-भेद नीति के विरूद्ध आंदोलन खड़ा करके सरकार को भी अपने कानून बदलने के लिए मजबूर कर दिया था।
(2) भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उन्होंने अहिंसा नीति के माध्यम से हिला कर रख दी थी। सन् 1942 के ”अंग्रेजो भारत छोड़ो“ आन्दोलन में गाँधी जी की नेतृत्व क्षमता का परिचय प्राप्त होता है।
(3) सत्याग्रह आन्दोलन, बहिष्कार कार्यक्रम, दाण्डी यात्रा आदि आंदोलन गाँधी जी के नेतृत्व में पूर्ण हुए जिसके परिणामस्वरूप अंत में हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई, जो प्रत्यक्ष रूप से गाँधी जी की नेतृत्व क्षमता का परिचायक है।

प्रश्न 4. आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वर्तमान में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 हमारे विचार से आदर्श, व्यावहारिकता, सूझबूझ, सजगता, लाभ-हानि का हिसाब लगाकर कदम उठाना, नैतिकता, धैर्य, सत्यवादिता आदि ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं। वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता न के बराबर दिखाई दे रही है। समाज का वातावरण बदल चुका है, लोगों की मानसिकता में गिरावट आ गई है। शाश्वत मूल्यों को हेय द्रष्टि से देखा जाने लगा है। आदर्शवादी, सीधे-साधे, नैतिकता का आचरण करने वाले लोगों को हेय और तुच्छ मानकर व्यवहार किया जाता है। लोगों का विश्वास मूल्यों पर से उठता जा रहा है। इसलिए हमारे विचार से वर्तमान समय में मूल्यों की प्रासंगिकता में गिरावट आती जा रही है।

प्रश्न 5. लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए। आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?
अथवा
‘झेन की देन’ पाठ में जापानी लोगों को मानसिक रोग होने के क्या-क्या कारण बताए गए हैं। आप इनसे कहाँ
तक सहमत हैं?
उत्तर: 

  • अमेरिका से प्रतिस्पर्धा।
  • एक माह का काम एक दिन में करने का प्रयत्न।
  • दिमाग में स्पीड का इंजन लगना।
  • एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़।
    (उपर्युक्त विस्तार सहित छात्रों द्वारा दिए गए तर्क संगत उत्तर अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
‘झेन की देन’ पाठ में जापानी लोगों को मानसिक रोग होने के जो कारण बताए हैं उनमें सबसे प्रमुख कारण उनकी अमेरिका से प्रतिस्पर्धा की भावना है। वे बहुत गति से प्रगति करते हैं इसके लिए उनका प्रयत्न एक माह का काम एक दिन में पूरा करने का रहता है। लेखक ने इन्हीं कारणों की वजह से उनके दिमाग में स्पीड का इंजन लगाने की बात कही है जिसके कारण उनकी तनाव लेने की क्षमता बढ़ जाएगी। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ मानसिक रोग होने का प्रमुख कारण है। इन कारणों से हम पूरी तरह सहमत हैं क्योंकि प्रतिस्पर्धा में अधिक पाने की चाह में तनावपूर्ण जीवन मानसिक रोगों की जड़ है।

प्रश्न 6. ‘हमारे जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं बल्कि दौड़ता है।’ ‘झेन की देन’ पाठ के आधार पर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: जापानी लोगों के जीवन की गति बहुत तेज हो गई है। वे सामान्य ढंग से गरिमापूर्वक चलने की बजाय, बेतहाशा भागते हैं ताकि अधिक से अधिक काम कर सकें। वे स्वाभाविक रूप से बोलने की बजाय आवेश में आकर बकते हैं। उनके पास स्वाभाविक रूप से बोलने का समय नहीं होता। वे लोग अकेले में भी शांत नहीं होते। उनके जीवन के तनाव, निराशाएँ और कुंठाएँ उन्हें हिलाकर रख देती हैं अतः वे एकांत में भी बड़बड़ाते रहते हैं। आशय यह है कि वे तनाव से भरपूर जीवन जीते हैं।

प्रश्न 7. टी सेरेमनी की तैयारी और उसके प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
 तैयारी-शांत वातावरण, तातामी (चटाई) से युक्त पर्णकुटी, एक समय में दो या तीन व्यक्तियों का ही प्रवेश, चाजीन द्वारा स्वागत, अँगीठी सुलगाना, चायदानी रखना, बरतन लाकर तौलिए से साफ करना। प्रभाव-दिमाग की गति धीमी होना और फिर बंद हो जाना, तनावमुक्ति, वर्तमान से जुड़ाव।
(उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)
व्याख्यात्मक हल:
तैयारी-झोपड़ी या फूस की बनी एक कुटी। दफ्ती की दीवारों वाली तातामी (चटाई) की जमीन वाली एक सुंदर पर्णकुटी थी। चाजीन ने दो-झो (आइए, तशरीफ लाइए) कहकर स्वागत किया। मिट्टी के बर्तन में पानी भरा हुआ था, जिसमें हाथ-पाँव धोकर ही अंदर प्रवेश कर सकते थे। अँगीठी सुलगाई गई। चाय चढ़ाई, बर्तन लाकर तौलिये से साफ किए। यह सभी क्रियाएँ उसने गरिमापूर्ण ढंग से पूरी की। ‘टी सेरेमनी’ में केवल तीन आदमियों को प्रवेश दिया जाता है। क्योंकि इस सेरेमनी में शांति का बहुत महत्त्व होता है, इसलिए वहाँ अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। प्रभाव:चाय पीने के बाद दिमाग की रफ्तार धीमी पड़ती जाती है। इसमें मानसिक रोग का उपचार होता है, मानसिक सन्तुलन होता है तथा व्यक्ति भूत-भविष्य की चिंता नहीं करता है। ऐसा लगता है वह मानों अनंतकाल में जी रहा हो और वर्तमान से उसका जुड़ाव हो गया है।

प्रश्न 8. टी सेरेमनी किसे कहा जाता है? इसमें होने वाले अनुभवों पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
 
टी सेरेमनी-

  • चाय पीनी की एक विधि, जिसे जापानी में चा-नो-यू कहते हैं।
  • शांतिपूर्ण कक्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को बिठाकर, प्याले में दो घूँट ही चाय दी जाती है।

अनुभव-

  • अतीत या भविष्य की उलझन से निकलते हुए दिमाग की रफ्तार कम होना और अंततः बंद होना।
  • वर्तमान में जीते हुए अत्यधिक संवेदनशील हो जाना, जीने का वास्तविक अर्थ मिलना।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
‘टी सेरेमनी’ चाय पीने की एक विधि को कहा जाता है। जापानी में इसे चा-नो-यू कहते हैं। इसके लिए एक शान्तिपूर्ण कमरे में अधिकतम तीन व्यक्तियों को बिठाकर प्याले में दो घूँट ही चाय दी जाती है। इसमें शान्ति का महत्त्व होने से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। चाय पीने के बाद लेखक ने स्वयं ही अनुभव किया कि अतीत की उलझन निकलते हुए दिमाग की रफ्तार कम होते हुए बंद हो जाती है और सन्नाटा सुनाई देने लगता है। इस प्रकार वर्तमान में जीते हुए व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है और उसे जीने का वास्तविक अर्थ मिल जाता है।

प्रश्न 9. ‘‘हमें सत्य में जीना चाहिए, सत्य केवल वर्तमान है।’’ ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ के इस कथन को स्पष्ट करते हुए लिखिए कि लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?
अथवा
लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 

  • बीता समय वापस नहीं आता है।
  • बीते समय को याद करके दुःखी होना उचित नहीं है।
  • भविष्य को हमने देखा नहीं है।
  • उसकी कल्पनाओं में खोकर समय नष्ट करना व्यर्थ है।
  • वर्तमान ही सत्य है। 

व्याख्यात्मक हल:
लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा इसलिए कहा होगा, क्योंकि जब वह जापान में अपने मित्र के साथ ‘टी-सेरेमनी’ में गया तो चाय की चुस्कियों के मध्य दिमाग की रफ्तार धीरे-धीरे कम होने पर उसे ऐसा अनुभव हुआ। हम हमेशा बीते हुए दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। हम या तो भूत काल में रहते हैं या भविष्य काल में। वास्तव में हमारे सामने जो वर्तमान है, वही सत्य है। हमें उसी में जीना चाहिए।

प्रश्न 10. निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।
(ख) जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट के आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यावहारिक सूझ-बूझ ही आगे आने लगती है।
(ग) सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उनकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों।
उत्तर: (क) समाज में अहिंसा, सत्य, समानता, बंधुता, त्याग जैसे कुछ शाश्वत मूल्य अभी भी बचे हुए हैं। ये मूल्य आदर्शवादी लोगों के कारण ही बचे हुए हैं। उन्होंने अपने व्यवहार से अहिंसा, सत्य, समानता, बंधुता और त्याग का सौंदर्य प्रकट करके दिखाया। तभी लोग आज भी इनका महत्त्व समझते हैं।
(ख) जब आदर्श और व्यवहार में से लोग आदर्शों की बात करना भूल जाते हैं और व्यावहारिक होने को महत्त्व देने लगते हैं तो उनका व्यवहार धीरे-धीरे पतन की ओर जाने लगता है। समझौतों की चर्चा अधिक होने लगती है। लोगों का ध्यान आदर्शों को छोड़ने की ओर लगा रहता है। इस प्रकार पतन के रास्ते खुल जाते हैं।
(ग) ‘टी-सेरेमनी’ में चाजीन ने लेखक और उसके मित्र के स्वागत में अँगीठी जलाना, चायदानी रखना, बर्तन लाना, उन्हें तौलिए से पोंछना आदि कार्य इतने गरिमापूर्ण ढंग से किए कि मानो उसके एक-एक काम से संगीत का कोई उल्लासपूर्ण स्वर निकल रहा हो। उसका एक-एक काम मनोहारी प्रतीत हुआ।

12. अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. बादशाह सुलेमान ने चींटियों से क्या कहा? उससे उनके स्वभाव की किस विशेषता का पता चलता है ?
उत्तर: 
बादशाह सुलेमान बहुत ही दयालु था। वह मानवों की ही नहीं वन्य जीव-जन्तुओं की भाषा भी जानता था। एक बार उसका लश्कर कहीं जा रहा था। उसके घोड़ों की टापों को सुनकर चींटियों का दल भयभीत हो उठा। तब सुलेमान ने चींटियों को कहा कि वे भयभीत न हों। उसका जन्म सभी की रक्षा और मुहब्बत के लिए हुआ है। इस बात और व्यवहार से हमें उसकी उदारता का पता चलता है।

प्रश्न 2. नूह का असली नाम क्या था? वे दुखी होकर क्यों रोते थे?
अथवा
नूह कौन थे? उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता क्या थी?
अथवा
पैगम्बर नूह दुःखी हो मुद्दत तक क्यों रोते रहे? इससे उनके चरित्र की किस विशेषता का पता चलता है ?
उत्तर:
 नूह का वास्तविक नाम लशकर था। वे नूह के लकव (पदाधिकारी) थे। इस्लाम धर्म में आस्था रखने के कारण वे कुत्ते को बहुत ही गंदा जीव मानते थे। एक दिन उन्होंने एक कुत्ते को दुत्कार दिया। तब कुत्ते ने उन्हें कहा:“न तो मैं अपनी मर्जी से कुत्ता हूँ और न तुम अपनी पसंद से इन्सान हो”। यह बात उन्हें चुभ गई। उन्हें लगा कि सभी जीव खुदा के हैं। अतः उन्होंने कुत्ते को दुत्कार कर पाप किया है। इसलिए वे जीवन भर रोते रहे। इससे पता चलता है कि ‘नूह एक अत्यन्त करुणामय व प्रायश्चित करने वाले इन्सान थे।

प्रश्न 3. ‘मिट्टी से मट्टी (मिट्टी) मिले,
खो के सभी निशान,
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचान है ?’
इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पद्यांश का आशय है- सब प्राणियों का निर्माण एक ही मिट्टी से हुआ है। उस मिट्टी में जाने कौन-कौन-सी मिट्टी मिली हुई है। इसका बोध किसी को नहीं है। मृत्यु के बाद सभी इसी मिट्टी में मिल जाते हैं और कोई भिन्नता नहीं रह जाती। अतः मनुष्य में कितनी मनुष्यता है और कितनी पशुता, यह किसी को नहीं पता। इसी प्रकार पशु में कितनी पशुता है और कितनी मनुष्यता यह भी किसी को ज्ञात नहीं। आशय यह है कि मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं को किसी पशु से बेहतर न माने अर्थात् स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ न समझे।

प्रश्न 4. लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली क्यों लगवानी पड़ी?
उत्तर:
 लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली इसलिए लगवानी पड़ी, क्योंकि उसके फ्लैट के एक मचान में दो कबूतरों ने घोंसला बना लिया था, वे दिन में कई बार आते-जाते और चीजों को गिराकर तोड़ देते। कभी लेखक की लाइब्रेरी में प्रवेश कर कबीर या मिर्जा गालिब की पुस्तकों को सताने लगते। इस रोज-रोज की परेशानी से तंग आकर लेखक की पत्नी ने जहाँ कबूतरों का आशियाना था, उस जगह एक जाली लगा दी थी।

प्रश्न 5. लेखक निदा फ़ाजली को प्रकृति की सुरक्षा की सीख अपनी माँ से मिली थी-यह आप कैसे कह सकते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लेखक की माँ बचपन से ही उन्हें सिखाती थी कि बेवक्त फूल और पत्ते मत तोड़ो, नदी को प्रणाम करो, पशु-पक्षियों को मत सताओ। वे स्वयं पशु-पक्षियों से बहुत प्रेम करती थीं। साथ ही उनके जीवन की वह घटना जब गलती से उनकी माँ से कबूतर का अण्डा फूट गया था और वह बहुत दुःखी हुईं और उन्होंने पूरे दिन का रोजा भी रखा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लेखक को माँ से ही प्रकृति से प्रेम करने की सीख मिली।

प्रश्न 6. बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है और क्यों? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ पाठ में बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या कुप्रभाव बताया गया है? अपने शब्दों में विस्तार से लिखिए।
उत्तर
पर्यावरण पर कुप्रभाव-

  • पर्यावरण के संतुलन का बिगड़ना
  • पशु-पक्षियों का आवास छिनना
  • मौसम-चक्र में असंतुलन:गर्मी में अधिक गर्मी,सर्दी में अधिक सर्दी, बेवक्त बरसातें
  • बाढ़, तूफान, जलजला
  • नित नए रोगों का बढ़ना
  • समुद्र का सिमटना।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

उत्तर: बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो आज हमारे सामने पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के रूप में दिखाई दे रहा है। आबादी के बढ़ने पर मनुष्यों के आवास के लिए जंगलों का विनाश करके आवास बनाए गये जिससे प्रकृति में असंतुलन पैदा हो गया। बढ़ती हुई आबादियों ने समुद्र को पीछे सरकाना शुरू कर दिया, पेड़ों को रास्तों से हटाना शुरू कर दिया है, फैलते हुए प्रदूषण ने पक्षियों को बस्तियों से भगाना शुरू कर दिया। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया। अब गरमी में ज्यादा गरमी, बेवक्त की बरसातें, तूफान, बाढ़, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएँ और नये-नये रोग बीमारियों के रूप में मनुष्य को प्राप्त हो रहे हैं। बढ़ती आबादी के कारण प्रकृति का दोहन होने से वस्तुओं, पदार्थों की गुणवत्ता समाप्त हो चुकी है और मँहगाई समस्या के रूप में खड़ी हुई है।

प्रश्न 7. ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुखी होने वाले’ पाठ के आधार पर प्रकृति के साथ मानव के दुर्व्यहवार और उसके परिणामों पर चर्चा कीजिए।
अथवा
बढ़ती आबादी, मनुष्य की हवस, बारूद की विनाशलीलाओं ने प्राकृतिक संतुलन के साथ क्या खिलवाड़ किया है? इसके दुष्प्रभाव ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुखी होने वाले’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:

व्याख्यात्मक हल:
मानव बढ़ती हुई आबादी के तथा औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के साथ दुर्व्यहवार पर उतर आया है। वह अपना स्वार्थ सिद्ध  करने के लिए अंधा-धुंध वृक्षों की कटाई कर रहा है। मानव जंगलों को समाप्त करके अपने लिए आवास बना रहा है, तथा पशु पक्षियों से उनके आवास छीन रहा है। बढ़ती हुई आबादी ने समुद्र को पीछे सरकाना शुरू कर दिया है। समुद्री जमीन को हड़पकर भवनों का निर्माण किया जा रहा है। बारूद से पहाड़ी क्षेत्र को समतल किया जा रहा है। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया है। मौसम का संतुलन बिगड़ गया है। बाढ़, तूफान व जलजले आने लगे हैं। बेवक्त बरसात होने लगी है। सर्दी कम हो गयी है तथा गर्मी बढ़ गयी है। नित नए-नए रोग उत्पन्न हो रहे हैं। पशु-पक्षी बेघर हो गये हैं यहाँ तक कि कुछ प्रजातियाँ लुप्त हो गयी हैं। मँहगाई समस्या के रूप में सामने खड़ी हो गयी है।

प्रश्न 8. पाठ के आधार पर प्रतिपादित कीजिए कि दूसरों के दुःख से दुखी होने वाले लोग अब कम मिलते हैं?
उत्तर: 

  • स्वार्थ सिद्धि -‘स्व’ की भावना के कारण परोपकारिता का अभाव
  • जीवन मूल्यों में गिरावट-भाई-चारे की कमी (सौहार्दभाव की कमी) के कारण
  • संवेदनहीनता-दूसरों के दुख में समभागी न होना।
  • एकल परिवार का बढ़ना-जीविकोपार्जन की मजबूरी।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
अब दूसरों की पीड़ा व दुःख को समझना तथा मुसीबत के समय काम आना इस प्रवृत्ति के लोग कम हैं। मनुष्य जो कि ईश्वर की उत्कृष्ट  कृति है, उसने धीरे-धीरे पूरी धरती को ही अपनी सम्पत्ति बना लिया है, और जीवधारियों को दर-बदर कर दिया है। उसे किसी के सुख-दुःख की परवाह नहीं है, उसे केवल अपने ही सुख की चिन्ता है क्योंकि स्वार्थ से घिरा मनुष्य मशीनों के बीच मशीन बनकर रह गया है। उसे केवल अपना ही स्वार्थ नजर आता है। उसे दूसरों से दुःख व पीड़ा की कोई परवाह नहीं तथा उनके अन्दर भाईचारे की भावना नहीं है। जीविकोपार्जन की मजबूरी है इस कारण एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं।

प्रश्न 9. ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले’ पाठ के माध्यम से लेखक ने कौन-सी समस्या उठाई है? उसका समाधान क्या हो सकता है ? 
उत्तर: इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक दर्शन के सार्वभौम सत्य को प्रतिपादित करता है कि हम सब परमपिता के अंश रूप हैं। हम सब मिट्टी से निर्मित हैं और मृत्यु होने पर मिट्टी में ही मिल जाएँगे। मिट्टी में मिलने पर हमारी भिन्नता समाप्त हो जाती है। यह पहचान सम्भव ही नहीं होती कि कौन किस रूप में है। अतः हमें भेदभाव को छोड़कर सबको समान रूप से समझना चाहिए और कभी भी अपने आप को किसी से श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए।

प्रश्न 10. बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ? ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए और बताइए कि पर्यावरण से सम्बन्धित संस्कार आपको अपने परिवार से वैळसे मिलते हैं ?
उत्तर: बढ़ती हुई आबादी के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। पेड़-पौधों के कट जाने के कारण जीव-जन्तु बेघर हो गए तथा उनमें से कुछ की जातियाँ विलुप्त हो गयीं तो कुछ अपना स्थान छोड़कर कहीं और चले गए। आवास बढने से समुद्र का स्वरूप सिकुड़ने लगा। इस प्रकार प्रकृति में असंतुलन होने से मनुष्य को कई प्राकृतिक आपदाएँ तूफान, जलजले, बेवक्त बरसात, ज्यादा गरमी का पड़ना, नित नए रोग, बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। (विद्यार्थी अपने परिवार से मिलने वाले संस्कारों के विषय में स्वयं लिखें।)

प्रश्न 11. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क) ”प्रकृति/नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। प्रकृति के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले मुम्बई में देखने को मिला था।“ पाठ के आधार पर पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 आशय-‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले’ पाठ के माध्यम से लेखक श्री निदा फाज़ली प्रकृति/नेचर की सहनशीलता का वर्णन करते हुए कह रहे हैं-
मनुष्य ने प्रकृति के साथ बहुत खिलवाड़ किया है। किन्तु प्रकृति की सहन शक्ति की भी एक सीमा होती है। प्रकृति के कोप का उदाहरण कुछ साल पहले मुम्बई में देखने को मिला था। तब प्रकृति का प्रकोप ;गुस्साद्ध इतना डरावना था कि मुम्बई के निवासी पूजा-स्थलों में जाकर अपने आराध्य देव से प्रार्थना करने लगे थे। उस समय समुद्र ने क्रोधित होकर तीन जहाजों को तीन विभिन्न दिशाओं में अपनी लहरों से उठाकर फेंक दिया था।
(ख) जो जितना बड़ा होता है, उसे उतना ही कम गुस्सा आता है। आशय स्पष्ट कीजिए।
आशय-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से लेखक समुद्र के विषय में बताते हुए कह रहे हैं कि भवन निर्माताओं ने समुद्र के साथ खिलवाड़ किया, वे उसे पीछे ढकेलते गए। समुद्र का हृदय बहुत बड़ा था अर्थात् अपनी विशालता के कारण वह अपने साथ हो रहे अन्याय को सहता रहा, किन्तु आखिरकार जब उसके सब्र का बाँध टूट गया तब उसने अपना कहर बरपाया, जहाजों को गेंद की तरह उठाकर जमीन पर पटक दिया। यह वाक्य समुद्र के संदर्भ में कहा गया है।
(ग) इस बस्ती में न जाने कितने परिंदों-चरिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से कुछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ-वहाँ डेरा डाल दिया है। 
आशय-लेखक मुम्बई के विकास की कथा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं-मुम्बई का जब विकास किया गया तब वहाँ बर्सोवा में घने जंगल, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी थे। बाद में उन्हें उजाड़कर भवन बनाए गए। इस बस्ती में रहने वाले पक्षियों के घर छीन लिए गए, कुछ यहाँ से दूर चले गए। जो शेष बचे उन्होंने फ्लैटों में अपना आशियाना बनाकर डेरा डाल दिया।
(घ) शेख अयाज के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घरवाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’ इन पंक्तियों में छिपी हुई उनकी भावना को स्पष्ट कीजिए। 
आशय-प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज की आत्मकथा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कह रहे हैं:शेख अयाज के पिता बहुत दयालु किस्म के व्यक्ति थे। वह जीव-जन्तुओं पर रहम करने वाले दयालु व्यक्ति थे। एक बार वे कुएँ से स्नान कर घर आए। उनकी बाँह पर एक चींटा रेंग रहा था। वे खाना छोड़कर उसे कुएँ पर छोड़ने के लिए चले गए। इससे उनकी जीव-जन्तुओं के प्रति दयालुता की भावना का पता चलता है।

11. तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेन्द्र – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान का अभिनय लाजवाब था । स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
 जिस समय फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के लिए राजकपूर ने काम करने के लिए हामी भरी वे अभिनय के लिए प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय हो गए थे। इस फ़िल्म में राजकपूर ने ‘हीरामन ‘ नामक देहाती गाड़ीवान की भूमिका निभाई थी। फ़िल्म में राजकपूर का अभिनय इतना सशक्त था कि हीरामन में कहीं भी राजकपूर नज़र नहीं आए। इसी प्रकार छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी हीराबाई’ का किरदार निभा रही वहीदा रहमान का अभिनय भी लाजवाब था जो हीरामन की बातों का जवाब जुबान से । नहीं आँखों से देकर वह सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की जिसे शब्द नहीं कह सकते थे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान का अभिनय लाजवाब था।

प्रश्न 2: हिंदी फ़िल्म जगत में एक सार्थक और उद्देश्यपरक फ़िल्म बनाना कठिन और जोखिम का काम है ।’ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: 
हिंदी फ़िल्म जगत की एक सार्थक और उद्देश्यपरक फ़िल्म है तीसरी कसम, जिसका निर्माण प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र ने किया । इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे प्रसिद्ध सितारों का सशक्त अभिनय था । अपने जमाने के मशहूर संगीतकार शंकर जयकिशन का संगीत था जिनकी लोकप्रियता उस समय सातवें आसमान पर थी । फ़िल्म के प्रदर्शन के पहले ही इसके सभी गीत लोकप्रिय हो चुके थे। इसके बाद भी इस महान फ़िल्म को कोई न तो खरीदने वाला था और न इसके वितरक मिले। यह फ़िल्म कब आई और कब चली गई मालूम ही न पड़ा, इसलिए ऐसी फ़िल्में बनाना जोखिमपूर्ण काम है।

प्रश्न 3: ‘राजकपूर जिन्हें समीक्षक और कलामर्मज्ञ आँखों से बात करने वाला मानते हैं’ के आधार पर राजकपूर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर: 
राजकपूर हिंदी फ़िल्म जगत के सशक्त अभिनेता थे। अभिनय की दुनिया में आने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे उत्तरोत्तर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते गए और अपने अभिनय से नित नई ऊचाईयाँ छूते रहे । संगम फ़िल्म की अद्भुत सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने एक साथ चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा की। ये फ़िल्में सफल भी रही। इसी बीच राजकपूर अभिनीत फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के बाद उन्हें एशिया के शोमैन के रूप ‘जाना जाने लगा। इनका अपना व्यक्तित्व लोगों के लिए किंवदंती बन चुका था । वे आँखों से बात करने वाले कलाकार जो हर भूमिका में जान फेंक देते थे । वे अपने रोल में इतना खो जाते थे कि उनमें राजकपूर कहीं नज़र नहीं आता था । वे सच्चे इंसान और मित्र भी थे, जिन्होंने अपने मित्र शैलेंद्र की फ़िल्म में मात्र एक रुपया पारिश्रमिक लेकर काम किया और मित्रता का आदर्श प्रस्तुत किया।

प्रश्न 4: एक निर्माता के रूप में बड़े व्यावसायिक सूझबूझ वाले व्यक्ति भी चक्कर खा जाते हैं। फिर भी शैलेंद्र फ़िल्म क्यों बनाई ? तर्क सहित उत्तर दीजिए ।
उत्तर: 
एक फ़िल्म निर्माता के रूप में बड़े व्यावसायिक सूझ-बूझ वाले व्यक्ति भी चक्कर खा जाते हैं क्योंकि उन्हें बहुत सोच समझकर फ़िल्म का निर्माण करना पड़ता है। उनका उद्देश्य ‘लाभ कमाना’ होता है। ‘धन-लिप्सा’ ही उनकी मनोवृत्ति होती है । शैलेंद्र ने ‘आत्म संतुष्टि’ व ‘सुख’ के लिए फ़िल्म का निर्माण किया था। व्यावसायिक सूझ-बूझ वाले लोग पैसा कमाने के लिए सस्ती लोकप्रियता को अधिक महत्त्व देते हैं, परंतु शैलेंद्र ने अपनी फ़िल्म में सस्ती लोकप्रियता के तत्त्वों को कोई महत्त्व नहीं दिया। शैलेंद्र अच्छी फ़िल्म बनाने की कला तो जानते थे, किंतु वे जनता को लुभाने की कला नहीं जानते थे । यद्यपि फ़िल्म-निर्माता के रूप में शैलेंद्र सर्वथा अयोग्य थे, फिर भी उन्होंने आत्मिक संतुष्ट व ‘आत्मिक सुख’ के लिए फ़िल्म का निर्माण किया।

प्रश्न 5: ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर:
 ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी । इस फ़िल्म की कहानी मार्मिकता एक कविता के समान है। इस फ़िल्म में मूल साहित्यिक रचना को उसी रूप में प्रस्तुत किया गया। इस फ़िल्म के गीत बहुत लोकप्रिय हुए। इसके गीत दुरूह नहीं थे। ये सभी गीत सहज व भाव-प्रवण थे, वे संदेशप्रद थे। इस फ़िल्म में राजकपूर व वहीदा रहमान जैसे महान कलाकारों ने अभिनय किया है। इस फ़िल्म तथा गीतों को शंकर-जयकिशन जैसे महान संगीतकार ने संगीत दिया जो प्रसारण से पूर्व ही अत्यंत लोकप्रिय हो गए । ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में अन्य फ़िल्मों की तरह चकाचौंध के बजाए, सहज लोकशैली को अपनाया गया। इस फ़िल्म ने अपने गीत-संगीत, कहानी आदि के लिए प्रसिद्धि प्राप्त की । इस फ़िल्म में अपने ज़माने के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर ने अपने जीवन का सबसे बेहतरीन अभिनय कर सबको हैरान कर दिया। इस फ़िल्म को उनके अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । यह फ़िल्म जिंदगी से जुड़ी हुई है। फ़िल्मी सफर में इसे मील का पत्थर माना गया है। आज भी इस फ़िल्म की गणना हिंदी की अमर फ़िल्मों में की जाती है। प्रश्न 11.

प्रश्न 6. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में दुख के भाव को किस प्रकार प्रस्तुत किया गया है? दुख के वीभत्स रूप से यह दुख किस प्रकार भिन्न है? लिखिए ।
उत्तर:
 ‘तीसरी कसम’ फिल्म में दुख के भाव को सहज स्थिति में प्रकट किया गया है। इस फ़िल्म में दुखों को जीवन के सापेक्ष रूप में प्रस्तुत किया है। दुख के वीभत्स रूप से यह सर्वथा भिन्न है क्योंकि यहाँ दुखों से घबराकर लोग पीठ नहीं दिखाते। दुखों से हमें घबराना नहीं चाहिए। दुखों का साहसपूर्वक सामना करना चाहिए। दुख के इस रूप को देखकर मनुष्य ‘व्यथा’ व ‘करुणा’ को सकारात्मक ढंग से स्वीकार करता है । वह दुखों से परास्त नहीं होता, निराश नहीं होता। इस फ़िल्म में दुख की सहज स्थिति लोगों को आशावादी बनाती है ।

प्रश्न 7: ‘तीसरी कसम’ सभी गुणों से पूर्ण होने के बाद भी जनता की भीड़ क्यों नहीं जुटा पाई? तर्क संगत उत्तर दीजिए ।
उत्तर:
 ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म एक महान फ़िल्म थी, परंतु इस फ़िल्म को अधिक वितरक नहीं मिल सके । यद्यपि इस फ़िल्म में नामज़द सितारों ने काम किया था फिर भी इस फ़िल्म को खरीदने वाला कोई नहीं था। दरअसल, इस फ़िल्म की संवेदना दो से चार बनाने का गणित जानने वालों की समझ से परे थी। इस फ़िल्म में दुखों को ग्लोरीफाई करके नहीं दिखाया गया। इस फ़िल्म में दर्शकों की भावनाओं का शोषण नहीं किया गया। इस फ़िल्म में किसी भी प्रकार के अनावश्यक मसाले नहीं डाले गए थे इसलिए इस फ़िल्म के लिए भीड़ जुट नहीं पाई। यही अनावश्यक मसाले जो फ़िल्म के पैसे वसूल करने के लिए आवश्यक होते हैं, इस फ़िल्म में डाले नहीं गए थे। यह एक शुद्ध साहित्यिक फ़िल्म थी जिसमें लोकप्रियता के तत्वों का अभाव होने के कारण वितरकों ने इस फ़िल्म को खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। वस्तुतः वितरक पैसा कमाने को महत्त्व देते थे। वे अच्छी फ़िल्म को महत्त्व नहीं देते थे। मुख्यतः ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में जनरुचि और लोकप्रियता के तत्वों का ध्यान नहीं रखा गया था क्योंकि शैलेंद्र को फ़िल्म निर्माण करने की कला का अनुभव नहीं था। शैलेंद्र ने फ़िल्म में ‘करुणा’ व संवेदना की गहराई पर तो ध्यान दिया, परंतु इसे अधिक आकर्षक बनाने के लिए उन्होंने किसी झूठ का सहारा नहीं लिया। इस फ़िल्म की करुणा किसी तराजू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी। इसीलिए गीत इस फ़िल्म के प्रदर्शित होने से पहले लोकप्रिय हो गए, फिर भी यह फ़िल्म लोगों की भीड़ जुटा नहीं पाई । उत्कृष्ट कलात्मकता अत्यंत लोकप्रिय संगीत, प्रसिद्ध अभिनेता व अत्यंत नामज़द अभिनेत्री के बावजूद ये फ़िल्म लोगों की भीड़ नहीं जुटा पाई।

प्रश्न 8: प्राचीन काल में भारतीय साहित्य में गीत और संगीत किस तरह का महत्व रखते थे? इस संदर्भ में शैलेंद्र के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: 
प्राचीन काल में भारतीय साहित्य में गीत और संगीत को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। गीत और संगीत के माध्यम से भावनाओं को अद्वितीय रूप में प्रकट किया जाता था और लोगों के दिलों में समानता और एकता की भावना को स्थापित किया जाता था। शैलेंद्र भी अपने गीतों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और भावनाओं को उनकी अद्वितीयता में प्रकट करने का प्रयास करते थे।

प्रश्न 9: शैलेंद्र का गीतकारी में योगदान कैसे विशिष्ट था? उनके गीतों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
 शैलेंद्र गीतकारी में विशेष थे क्योंकि उनके गीत न केवल संगीतिक दृष्टिकोण से बल्कि भावनाओं के प्रति भी संवेदनशीलता से भरपूर थे। उनके गीतों में सामाजिक संदेश, प्रेम, आध्यात्मिकता आदि के विभिन्न पहलुओं का संवेदनशीलता से प्रस्तुतिकरण होता था। उनके गीतों का व्यक्तिगतता और जीवन के मामूल्यों के प्रति उनकी आसक्ति उनके गीतों के माध्यम से स्पष्ट दिखती थी।

प्रश्न 10: शैलेंद्र के गीतों में सामाजिक संदेश कैसे प्रकट होते थे? उनके गीतों से हमें कौन-कौन से सामाजिक मुद्दे दिखते हैं?
उत्तर:
 शैलेंद्र के गीतों में सामाजिक संदेश अत्यंत प्रभावशाली रूप से प्रकट होते थे। उनके गीतों में गरीबी, असहमति, समाज में बदलाव, सामाजिक न्याय, आदिक के मुद्दे प्रमुख रूप से दिखते थे। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया और लोगों को सामाजिक सुधार के प्रति प्रेरित किया।

10. तताँरा–वामीरो कथा – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद कहाँ गया ? वहाँ के प्राड्डतिक सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। 
उत्तर: तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद समुद्र किनारे टहलने गया। वहाँ का प्राड्डतिक सौंदर्य बड़ा ही लुभावना था। सूरज समुद्र से लगे क्षितिज तले डूबने को था। समुद्र से ठण्डी बयारें आ रही थीं। पक्षियों की सायंकालीन चहचहाहटें शनैः-शनैः क्षीण होने को थीं। समुद्री बालू पर रंग-बिरंगी किरणें फैल रही थी, लहरों का संगीत समुद्र के किनारे सुनाई दे रहा था।

प्रश्न 2. वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में क्या परिवर्तन आया ?
उत्तर:
 वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में यह परिवर्तन आया कि उसका हृदय वामीरो के लिए व्यथित रहने लगा। उसने किसी तरह दिन व्यतीत किया और वह शाम की प्रतीक्षा करने लगा। उसके पूरे जीवन में यह अकेली प्रतीक्षा थी, यह उसके शांत-गम्भीर जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था। वह अचम्भित और रोमांचित था। वामीरो की प्रतीक्षा में एक-एक पल पहाड़ की तरह भारी था और उसके भीतर एक आशंका भी दौड़ रही थी कि वामीरो उससे मिलने आएगी या नहीं।

प्रश्न 3. प्राचीनकाल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए किस प्रकार के आयोजन किए जाते थे ?
उत्तर:
 प्राचीनकाल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए गाँव में पशु-पर्व और मेले तमाशों का आयोजन किया जाता था। जहाँ पशु पर्व में हृष्ट-पुष्ट पशुओं के प्रदर्शन के अतिरिक्त पशुओं से युवकों की शक्ति परीक्षा प्रतियोगिता भी होती थी। वर्ष में एक बार सभी गाँव के लोग हिस्सा लेते थे। उसमें शिकार, नृत्य-संगीत, दौड़ आदि प्रतियोगिताओं के द्वारा शक्ति प्रदर्शन किया जाता था।

प्रश्न 4. कहानी के अंत में तताँरा का क्या हुआ ? तताँरा का वियोग वामीरो किस तरह सहन कर रही थी ? 
उत्तर: कहानी के अंत में तताँरा के हृदय में समाज के विरुद्ध क्रांति की भावना पैदा हुई। वह अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने अपनी लकड़ी की तलवार को जमीन में गाड़ कर उसे इतनी जोर से खींचा कि द्वीप के दो टुकड़े हो गए। तताँरा द्वीप के साथ पानी में डूब गया। वामीरो तताँरा के न मिलने पर पागल-सी हो उठी। वह हर समय उसे खोजती हुई उसी स्थान पर पहुँच जाया करती थी जहाँ वे घंटों बैठा करते थे। उसने खाना पीना छोड़ दिया। वह परिवार से अलग हो गई।

प्रश्न 5. तताँरा-वामीरो की मृत्यु कैसे हुई? पठित पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 तताँरा की मृत्यु समुद्र की लहरों में बह जाने तथा वामीरो की मृत्यु उसके इन्तजार में खाना-पीना छोड़ने से हुई थी। पाठ के अनुसार तताँरा धरती को काटकर उस हिस्से में रह गया जो समुद्र में धँस गया था। पानी की लहरें न जाने उसे कहाँ बहा ले गईं। वामीरो तताँरा को खोजते-खोजते उसी जगह आ बैठती थी जहाँ से तताँरा अलग हुआ था। उसने भी खाना-पीना छोड़ दिया था और परिवार से अलग हो गई। तताँरा की प्रतीक्षा में एक दिन वह भी चल बसी।

प्रश्न 6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क) जब कोई राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसमें शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। 
(ख) बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी।
उत्तर: (क) आशय-”तताँरा-वामीरो कथा“ पाठ के अनुसार लेखक उस समय का वर्णन कर रहे हैं जब वामीरो के परिवारीजनों ने तताँरा का अपमान कर उसे बुरा-भला कहा। अपमानित होने पर उसे बहुत क्रोध आया, जब उसे कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया तब उसने क्रोध को दबाने के लिए अपनी शक्ति युक्त तलवार को धरती में घोंप दिया और सम्पूर्ण ताकत से उसे खींचने लगा।
(ख) आशय-प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से लेखक उस समय का वर्णन कर रहा है जब तताँरा की प्रथम भेंट समुद्र किनारे वामीरो से हुई। उसने वामीरो से अगले दिन उसी समुद्र तट पर मिलने का वचन लिया। जब वह अगले दिन सायंकाल समुद्र के किनारे पहुँचा, सूर्य अस्त हो रहा था, समुद्र में सूर्य की किरणें डूबती हुई नजर आ रही थीं। उसे बस एक आशा थी कि वामीरो उससे मिलने अवश्य आएगी। यही आशा की किरण उसके मन में विश्वास जगाए हुए थी।

प्रश्न 7. रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगें तब उनका टूट जाना ही अच्छा है, क्यों ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगें तब उनका टूट जाना ही अच्छा है। क्योंकि प्रस्तुत कहानी पाठ ‘तताँरा-वामीरो कथा’ के अनुसार अडंमान द्वीप समूह पर स्थित पासी और लपाती गाँव के रीति-रिवाज के अनुसार विवाह सम्बन्ध के लिए युवक-युवती दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। यह रूढ़िवादी बंधन तताँरा और वामीरो के प्रेम सम्बन्ध के मध्य रुकावट बन गया था। यह वाक्य लेखक ने तताँरा को सम्बोधित करते हुए कहा था। इस वाक्य की प्रासंगिकता प्रस्तुत पाठ के सम्बन्ध में सिद्ध  होती है। नायक ने रूढ़ियों के बंधन बनने पर उनको तोड़ने के लिए विरोधस्वरूप अपने प्राणों का बलिदान दिया।

9. डायरी का एक पन्ना – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न.                                                            प्रश्न 1. सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी ?
अथवा
सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्रियों ने क्या सहयोग दिया ?
उत्तर: सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्रियों का विशेष सहयोग था। गुजराती सेविका संघ के जुलूस में पुलिस ने बहुत-सी लड़कियों को गिरफ्तार किया। मारवाड़ी बालिका विद्यालय ने झण्डा उत्सव मनाया। स्त्रियाँ जुलूस निकालकर ठीक स्थान पर पहुँचने की कोशिश कर रही थीं। लाठी चार्ज की परवाह किए बिना स्त्रियाँ बड़ी तादाद में मोन्युमेंट में पहुँची और उसकी सीढ़ियों पर चढ़कर झण्डा फहराया और घोषणा पढ़ी। पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लाल बाजार भेजने पर भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ। लगभग 105 स्त्रियों को गिरफ्तार किया गया।

प्रश्न 2. ”जबसे कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान में नहीं की गई थी और यह सभा ही, कहना चाहिए कि ओपन लड़ाई थी।“ यहाँ पर कौन-से और किसके द्वारा लागू किए गए कानून को भंग करने की बात कही गई है ? क्या कानून भंग करना उचित था ? पाठ के संदर्भ में अपने विचार प्रकट कीजिए। 
उत्तर:
 यहाँ पर ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए कानून को भंग करने की बात कही गई है। पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकला था। कानून था कि अमुक धारा के अनुसार कोई सभा नहीं हो सकती । जो इस सभा में हिस्सा लेगा वह दोषी समझा जाएगा। कानून भंग करना हमारे विचार से उचित था, ‘डायरी का एक पन्ना’ पाठ के आधार पर भारतीयों को स्वतंत्रता दिवस मनाने का अधिकार नहीं था जिसे मनाने के लिए उन्हें रोका जा रहा था। उस कानून को भंग करके भारतीय नेताओं ने झण्डारोहण भी किया और जुलूस भी निकाला था।

प्रश्न 3. जुलूस के लाल बाजार आने पर लोगों की क्या दशा हुई ? 
उत्तर: 
जुलूस के लाल बाजार आने पर लोगों की यह दशा हुई कि उस जुलूस में नर-नारी, युवा सभी शामिल होने लगे। वे ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगा रहे थे। लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। पुलिस उन्हें रोकने का प्रयास करने के लिए लाठी चलाती जिससे लोग घायल हो जाते थे। लोगों को पकड़कर कुछ दूर पुलिस ले जाती और फिर छोड़ देती थी। इसमें 105 स्त्रियाँ पकड़ी गई थीं। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

प्रश्न 4. बहुत से लोग घायल हुए, बहुतों को लाॅकअप में रखा गया, बहुत-सी स्त्रियाँ जेल गईं फिर भी इस दिन को अपूर्व बताया गया है। आपके विचार में यह सब अपूर्व क्यों है ? अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तर: हमारे विचार में यह सब अपूर्व इसलिए है, क्योंकि इस दिन बहुत अधिक लोगों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया था। लोगों ने अपने-अपने नेताओं के संरक्षण में झण्डारोहण करके विशाल सभाएँ कीं और जुलूस निकाले थे। ब्रिटिश सरकार के बनाए कानून को तोड़ने के अपराध से युवाओं, पुरुषों और स्त्रियों को पुलिस का कोप भाजन बनना पड़ा था। महिलाओं को जेल भी जाना पड़ा था। इसलिए यह दिन अपूर्व है। इस दिन बहुत अधिक लोग लगभग 200 कार्यकत्र्ता घायल हुए थे और बंदी बनाए गए थे। आज जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ कोई काम नहीं हो रहा है, वह आज बहुत अंश में धुल गया था।

प्रश्न 5. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क)आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो  रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया। 

(ख) खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।
उत्तर:
 

(क) ”डायरी का एक पन्ना“ नामक पाठ के माध्यम से लेखक श्री सीताराम सेकसरिया कह रहे हैं, कि जब 26 जनवरी, 1931 के दिन सारे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था, उस दिन क्रांतिकारियों द्वारा स्थान-स्थान पर प्रदर्शन किया जा रहा था। झण्डारोहण, सभा और जुलूस को रोकने की व्यवस्था ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई थी। इस कार्यक्रम में महिलाओं द्वारा धरना जुलूस का आयोजन किया गया। जब सुभाष बाबू का जुलूस चैरंगी पर पहुँचा तो उसे रोक दिया गया और लाठीचार्ज किया गया। विरोध स्वरूप वहाँ भीड़ एकत्र हो गई। स्त्रियाँ जुलूस बनाकर आगे चलीं। तब उन्हें ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। कुल मिलाकर 105 (एक सौ पाँच) स्त्रियाँ बंदी बनाकर थाने लाई गईं। काफी लोग घायल भी हुए थे। आज जो कुछ भी यह हुआ था वह अपूर्व था क्योंकि बंगाल या कलकत्ता के नाम पर लगा हुआ कलंक, कि यहाँ काम नहीं हो रहा है, बहुत अंश तक धुल गया था।

(ख) प्रस्तुत पंक्ति के अनुसार लेखक उस समय का वर्णन कर रहे हैं जब स्वतंत्रता दिवस के आयोजन के अवसर पर ब्रिटिश सरकार ने कानून भंग होने से रोकने के लिए, किसी भी सार्वजनिक सभा को होने से रोकने के लिए नोटिस और सूचना दे दी थी कि जो व्यक्ति किसी भी सभा में शामिल होगा वह दोषी समझा जाएगा। सर्वसाधारण और क्रांतिकारियों ने खुली चुनौती के रूप में सभा का आयोजन करने का निश्चय किया था। इससे पूर्व कोई ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।

प्रश्न 6. ‘डायरी का एक पन्ना’ पाठ के आधार पर भारतीय स्वाधीनता संग्राम की एक झाँकी प्रस्तुत कीजिए। 
उत्तर:
 प्रस्तुत पाठ में 26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रीय झंडा फहराए जाने का वर्णन है। इस दिन भारतीय जनता ने अंग्रेज सरकार के विरूद्ध खुला विद्रोह किया था। काँग्रेस के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। सरकारी आदेश के अनुसार इस दिन सार्वजनिक सभा करने और राष्ट्रीय झंडा फहराए जाने पर रोक थी। स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कौंसिल शाम को मोनुमेंट के नीचे सभा करने तथा झंडा फहराए जाने के लिए तत्पर थी। यह खुला विद्रोह था। पुलिस ने खुलकर लाठीचार्ज किया, पकड़-धकड़ की और आंदोलन को दबाने की कोशिश की। अभूतपूर्व उत्साह होने के कारण लोग चोट खाकर भी रुकते नहीं थे। हजारों नर-नारी सभा स्थल पर इकट्ठे हुए। कितने ही घायल हुए। पकड़े गए और कितनों को जेलों में बंद कर दिया गया। सरकार की हर कोशिश के बावजूद निर्धारित समय पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी गई।

प्रश्न 7. ”भारत को मिली स्वतंत्रता में सभी वर्गों की भूमिका थी“ – सिद्ध कीजिए। 
उत्तर:
 भारत को जो स्वतंत्रता मिली, उसमें समाज के सभी वर्गों की भूमिका थी। इस आंदोलन में स्त्रियों ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। उन्होंने स्वप्रेरणा से अपनी टोलियाँ खुद बनाकर संघर्ष का नेतृत्व किया। उन्होंने पूर्व निश्चय के अनुसार मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा भी फहराया और पूर्ण स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी। उन्होंने लाठियाँ खाईं, गिरफ्तारी दी तथा जेल गईं। विद्यार्थियों ने भी बढ़-चढ़कर झंडोत्सव मनाया। व्यापारियों ने बाजारों और मकानों को ऐसे सजाया मानो स्वतंत्रता मिल गई हो।

प्रश्न 8. 26 जनवरी को ही स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाया गया ? 
उत्तर:
 दिसंबर 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उसमें प्रस्ताव पारित किया गया कि हम पूर्ण स्वराज्य से कम कुछ नहीं मागेंगे। 26 जनवरी, 1930 को देशवासियों ने भारत को ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ दिलाने के लिए हर प्रकार का बलिदान देने की प्रतिज्ञा की। अतः उस दिन को तब से स्वतंत्रता-दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। आजाद भारत में इसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

8. बड़े भाई साहब  – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई का टाइम-टेबिल बनाते समय क्या-क्या सोचा था और फिर उसका पालन क्यों नहीं कर पाया? 
उत्तर
: छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई का टाइम-टेबल बनाते समय सोचा कि वह अब मन लगाकर पढ़ाई करेगा और बड़े भाई को कभी शिकायत का मौका नहीं देगा। रात गयारह बजे तक हर विषय को पढ़ने का कार्यक्रम बनाया गया परन्तु पढ़ाई करते समय खेल के मैदान उसकी हरियाली, हवा के हल्के-हल्के झोंके, फुटबॉल की उछल-कूद, कबड्डी, बालीबॉल की तेजी सब चीजें उसे अपनी ओर खींचती थीं। इसलिए वह टाइम-टेबिल का पालन नहीं कर पाया। साथ ही प्रिय शौक खेल को टाइम टेबिल में स्थान देना भी रुकावट था।



प्रश्न 2: एक दिन जब गुल्ली-डंडा खेलने के बाद छोटा भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुँचा तो उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
 एक दिन जब गुल्ली-डंडा खेलने के बाद छोटे भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुँचे तो उनकी प्रतिक्रिया बहुत भयानक थी। वह बहुत क्रोधित थे। उन्होंने छोटे भाई को बहुत डाँटा। उन्होंने उसे पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा। गुल्ली-डंडा खेल की उन्होंने बहुत बुराई की। उनके अनुसार यह खेल भविष्य के लिए लाभकारी नहीं है। अतः इसे खेलकर उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उन्होंने यह भी कहा कि अव्वल आने पर उसे घंमड हो गया है। उनके अनुसार घमंड तो रावण तक का भी नहीं रहा। अभिमान का एक-न-एक दिन अंत होता है। अतः छोटे भाई को चाहिए कि घमंड छोड़कर पढ़ाई की ओर ध्यान दे।


प्रश्न 3: बड़े भाई की डाँट-फटकार अगर न मिलती, तो क्या छोटा भाई कक्षा में अव्वल आता? अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर:
 बड़े भाई की डाँट-फटकार अगर न मिलती तो हमारे विचार से छोटा भाई कक्षा में अव्वल नहीं आता, क्योंकि किसी कार्य की सफलता के लिए चाणक्य द्वारा बताई साम-दाम, दण्ड-भेद की नीति, प्रेरक शक्ति के रूप में प्रताड़ना प्रेरणा का कार्य करती है। जब बड़े भाई साहब की डाँट छोटे भाई को पड़ती थी, तब वह उनकी डाँट को गलत सिद्ध करने के लिए अध्ययन के प्रति सचेत हो जाता था। जिसका परिणाम यह होता था कि छोटा भाई कक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण हो जाता था। भाई की डाँट उसके अध्ययन की सफलता का सिद्धि मंत्र थी, जो उसे आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती थी। अतः छोटे भाई को अगर बड़े भाई की डाँट-फटकार नहीं मिलती तो वह कक्षा में अव्वल नहीं आता।

प्रश्न 4: बडे़ भाई साहब अपने छोटे भाई पर रौब जमाने के लिए लंबे-लंबे भाषण देते हैं। उनकी आत्यधिक बोलने की आदत उनकी कमजोरी है अथवा खूबी? तर्क सम्मत उत्तर लिखिए। 
उत्तर:
 बड़े भाई साहब की आत्यधिक बोलने की आदत एक समय पर खूबी और दूसरे समय पर कमजोरी हो सकती है, जो स्थिति और मकसद के अनुसार बदलती रहती है। 
इसका तर्कसंगत उत्तर निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है:
खूबी के रूप में:

  • शिक्षा और मार्गदर्शन: बड़े भाई साहब छोटे भाई को जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सलाह देते हुए उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करते हैं। उनके लंबे भाषण छोटे भाई के लिए एक शिक्षा का स्रोत बनते हैं।
  • अनुभव का हवाला: बड़े भाई साहब के पास अधिक जीवन-अनुभव होते हैं, जिसे वे छोटे भाई को समझाने के लिए उपयोग करते हैं। इससे छोटे भाई को जीवन की कठिनाइयों से निपटने के लिए तैयारी मिलती है।
  • उत्तरदायित्व की भावना: बड़े भाई साहब को छोटे भाई के प्रति एक उत्तरदायित्व का अहसास होता है। इस उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए वे अपने विचार बार-बार समझाते हैं।

कमजोरी के रूप में:

  • छोटे भाई की रुचि की अनदेखी: बड़े भाई साहब के लंबे भाषण छोटे भाई को अक्सर ऊबा देते हैं। इससे छोटा भाई उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता और उनका प्रभाव कम हो जाता है।
  • अत्यधिक नियंत्रण की भावना: बड़े भाई साहब के बार-बार बोलने से छोटे भाई में एक अनुभव होता है कि उस पर अत्यधिक नियंत्रण रखा जा रहा है। यह छोटे भाई को प्रतिबंधित महसूस करा सकता है।
  • प्रभावी संचार की कमी: लंबे भाषण देने की बजाय, छोटे भाई के साथ संवाद करना और उसकी राय सुनना अधिक प्रभावी होता। बड़े भाई साहब के एकतरफा बोलने से यह संचार नष्ट हो सकता है।

निष्कर्ष: बड़े भाई साहब की बोलने की आदत खूबी तब होती है जब उनके भाषण छोटे भाई के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक होते हैं। लेकिन जब ये भाषण अत्यधिक और एकतरफा होते हैं, तो वे छोटे भाई को ऊबाते हैं और उसकी रुचि को नष्ट करते हैं, जिससे यह एक कमजोरी बन जाती है। अतः, बड़े भाई साहब को अपने भाषणों को संक्षिप्त और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

प्रश्न 5: बड़े भाई साहब ने स्वयं फेल हो जाने पर भी अपने छोटे भाई को डाँटकर भी उसका प्यार किस प्रकार जीता? अगर आपके बड़े भाई ऐसा करते तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होती? लिखिए। 
उत्तर:
 बड़े भाई साहब ने, यद्यपि स्वयं की पढ़ाई में असफलता का सामना किया, फिर भी छोटे भाई को डाँटने और सही राह दिखाने के माध्यम से उसका प्यार जीता। वे छोटे भाई को अपने अनुभवों से सीखने का मौका देते हैं और उसे सही दिशा में लाने का प्रयास करते हैं। बड़े भाई का यह रवैया इसलिए महत्वपूर्ण है कि वे छोटे भाई के भविष्य के प्रति जिम्मेदार महसूस करते हैं। उनकी डाँट और सख्ती के पीछे छिपा प्यार और चिंता ही वजह बनती है कि छोटा भाई उनकी बातों को गंभीरता से लेता है और अंततः उनके प्रति सम्मान और प्यार विकसित करता है।
अगर मेरे बड़े भाई ऐसा करते, तो मेरी प्रतिक्रिया इस पर निर्भर करती कि उनकी डाँट में कितना सच्चा प्यार और उद्देश्य था। यदि मुझे लगता कि वे मेरे भले के लिए कह रहे हैं, तो मैं उनकी बात को समझने और सुधार करने की कोशिश करता। लेकिन अगर उनकी डाँट में केवल आलोचना होती और उसमें कोई सकारात्मक संदेश नहीं होता, तो मैं थोड़ा निराश महसूस करता और शायद उनसे दूरी बनाने की कोशिश करता। फिर भी, मैं उनके साथ संवाद करने की कोशिश करता और अपनी भावनाओं को साफ़ करने का प्रयास करता, ताकि हम दोनों के बीच समझौता हो सके।
इस तरह, बड़े भाई की डाँट का प्रभाव उसके तरीके और उद्देश्य पर निर्भर करता है। अगर वह सच्चे दिल से छोटे भाई के भले के लिए कहता है, तो वह उसका प्यार और सम्मान जीत सकता है।

प्रश्न 6: छोटे भाई के मन में बड़े भाई साहब के प्रति श्रद्धा क्यों उत्पन्न हुई?
उत्तर:
 छोटे भाई को खेलना बहुत पसंद था। वह हर समय खेलता रहता था। बड़े भाई साहब इस बात पर उसे बहुत डांटते रहते थे। उनके डर के कारण वह थोड़ा बहुत पढ़ लेता था। परन्तु जब बहुत खेलने के बाद भी उसने अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, तो उसे स्वयं पर अभिमान हो गया। अब उसके मन से बड़े भाई का डर भी जाता रहा। वह बेखौफ होकर खेलने लगा। एक दिन पतंग उड़ाते समय बड़े भाई साहब ने उसे पकड़ लिया। उन्होंने उसे समझाया और अगली कक्षा की पढ़ाई की कठिनाइयों का अहसास भी दिलाया। उन्होंने बताया कि वह कैसे उसके भविष्य के कारण अपने बचपन का गला घोंट रहे हैं। उनकी बातें सुनकर छोटे भाई की आँखें खुल गई। उसे समझ में आ गया कि उसके अव्वल आने के पीछे बड़े भाई की ही प्रेरणा रही है। इससे उसके मन में बड़े भाई के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई।

प्रश्न 7: बड़े भाई साहब छोटे भाई को क्या सलाह देते थे और क्यों?
उत्तर:
 बड़े भाई साहब छोटे भाई को पढ़ाई पर ध्यान देने और समय का सदुपयोग करने की सलाह देते थे। वे उसे बताते थे कि पढ़ाई में लगन और मेहनत के बिना सफलता नहीं मिल सकती, और समय को अकेले खेलने या बेकार गुजारने के लिए बर्बाद नहीं करना चाहिए। वे छोटे भाई को यह समझाने की कोशिश करते थे कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से कठिन परिश्रम करना आवश्यक है।
कारण:

  • छोटे भाई की भलाई के लिए: बड़े भाई साहब छोटे भाई को सही रास्ते पर लाना चाहते थे। वे उसके भविष्य के प्रति जिम्मेदार महसूस करते थे और चाहते थे कि वह जीवन में सफल हो।
  • अपने अनुभवों से सीखने के लिए: बड़े भाई साहब ने स्वयं कठिनाइयों का सामना किया था और उन्हें पता था कि अगर छोटा भाई सही समय पर मेहनत नहीं करेगा, तो उसे भी भविष्य में पछताना पड़ेगा। इसलिए, वे उसे समय पर सही फैसले लेने के लिए प्रेरित करते थे।
  • पारिवारिक उत्तरदायित्व: बड़े भाई साहब को लगता था कि उनका यह कर्तव्य है कि वे छोटे भाई को सही मार्गदर्शन दें और उसे जीवन की कठिनाइयों से निपटने के लिए तैयार करें।

इस प्रकार, बड़े भाई साहब की सलाह का मुख्य उद्देश्य छोटे भाई को जीवन में सफल बनाना और उसे सही मार्गदर्शन प्रदान करना था।

प्रश्न 8: ‘बड़े भाई साहब’ पाठ में लेखक ने समूची शिक्षा के किन तौर-तरीकों पर व्यंग्य किया है, क्या आप उनके विचार से सहमत हैं? 
उत्तर: ‘बड़े भाई साहब’ पाठ में लेखक ने शिक्षा की परंपरागत और रटने-आधारित प्रणाली पर व्यंग्य किया है। उन्होंने इन तरीकों की आलोचना की है:

  • रटने की प्रणाली: लेखक बच्चों को बिना समझे रटने पर जोर देने वाली प्रणाली की आलोचना करते हैं। छोटे भाई को बड़े भाई साहब रटने के लिए कहते हैं, न कि समझने के लिए।
  • परीक्षा-केंद्रित शिक्षा: लेखक ने परीक्षा को ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य बनाने पर व्यंग्य किया है। वे बताते हैं कि बच्चों को बस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए तैयार किया जाता है, न कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए।
  • व्यावहारिक ज्ञान की अनदेखी: लेखक ने जीवन के व्यावहारिक पहलुओं को समझने की अनदेखी करने पर व्यंग्य किया है। बड़े भाई साहब छोटे भाई को सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह देते हैं, जबकि खेल और अन्य गतिविधियों को नज़रअंदाज करने को कहते हैं।
  • शिक्षकों की दबावपूर्ण विधियाँ: लेखक ने शिक्षकों की कठोर और डाँट-फटकार भरी विधियों पर व्यंग्य किया है। बड़े भाई साहब की डाँट और डराने की शैली से छोटे भाई पर बहुत दबाव पड़ता है।
  • सैद्धांतिक ज्ञान पर अत्यधिक बल: लेखक ने केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर अत्यधिक बल देने की आलोचना की है। उनका मानना है कि ज्ञान को व्यावहारिक तौर पर लागू करना भी महत्वपूर्ण है।

क्या मैं लेखक के विचार से सहमत हूँ?
हाँ, मैं लेखक के विचार से सहमत हूँ। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों को रटने की बजाय सोचने, समझने और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए। परीक्षा-केंद्रित शिक्षा बच्चों को दबाव में डालती है और उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासा को दबा देती है। खेल और अन्य गतिविधियाँ बच्चों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, और इन्हें नज़रअंदाज करना गलत है।
इसलिए, शिक्षा को जीवन का एक अभिन्न अंग बनाने के लिए, यह आवश्यक है कि इसमें व्यावहारिक ज्ञान, सृजनात्मकता और बच्चों के समग्र विकास पर बल दिया जाए।

प्रश्न 9: आपके माता-पिता द्वारा दी जा रही हिदायतों और पढ़ाई के लिए डाँट-फटकार के प्रति आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है? अपने अनुभव बड़े भाई साहब पाठ के आधार पर लिखिए। 
उत्तर:
 बड़े भाई साहब पाठ के आधार पर, मेरी प्रतिक्रिया अपने माता-पिता द्वारा दी जाने वाली हिदायतों और पढ़ाई के लिए डाँट-फटकार के प्रति मिश्रित हो सकती है। यह पाठ बताता है कि छोटे भाई को बड़े भाई की डाँट और उनके उपदेशों के प्रति अलग-अलग समय पर अलग-अलग भावनाएँ महसूस होती हैं। इसी तरह, मेरे अनुभव भी इन परिस्थितियों के आधार पर बदल सकते हैं।
1. प्रारंभिक प्रतिक्रिया: असंतोष और दबाव
जब माता-पिता या बड़े भाई-बहन हमें पढ़ाई के लिए डाँटते हैं, तो प्रारंभ में हमें यह बात अच्छी नहीं लगती। बड़े भाई साहब की तरह, मेरे माता-पिता की भी अपेक्षाएँ कभी-कभी बहुत ऊँची होती हैं, जिससे मुझे दबाव महसूस होता है। ऐसे में मैं भी कभी-कभी निराश हो जाता हूँ और सोचता हूँ कि “मुझे अपनी गलती का एहसास है, फिर भी मुझे इतनी डाँट क्यों सुननी पड़ती है?”
2. गहरी समझ: प्यार और चिंता का एहसास
लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, मुझे अपने माता-पिता की डाँट के पीछे छुपा प्यार और चिंता समझ में आने लगता है। बड़े भाई साहब भी अपने छोटे भाई को डाँटते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल उसका भला करना है। इसी तरह, मेरे माता-पिता की हर डाँट में एक संदेश छिपा होता है कि वे मेरे भविष्य के लिए चिंतित हैं। जब मैं इसे समझता हूँ, तो मेरे मन में उनके प्रति आदर और प्यार की भावना बढ़ जाती है।
3. प्रेरणा और सुधार की भावना
बड़े भाई साहब की तरह, मेरे माता-पिता की डाँट भी कभी-कभी मुझे प्रेरित करती है। जब मैं उनकी बातों को गंभीरता से लेता हूँ, तो मैं अपने आप में सुधार लाने की कोशिश करता हूँ। 
4. आत्म-विश्लेषण और विकास
अंततः, बड़े भाई साहब के पाठ से मुझे यह सीख मिलती है कि डाँट-फटकार को नकारात्मक तरीके से नहीं, बल्कि एक सीख के रूप में लेना चाहिए। जब मैं अपने माता-पिता की बातों को समझता हूँ और उनकी उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश करता हूँ, तो मैं अपने आप में विकास का अनुभव करता हूँ। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता है और मैं अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए तैयार हो जाता हूँ।
निष्कर्ष: मेरी प्रतिक्रिया अपने माता-पिता की हिदायतों और डाँट-फटकार के प्रति शुरुआत में असंतोषपूर्ण हो सकती है, लेकिन समय के साथ मैं उनके पीछे छुपे प्यार, चिंता और उद्देश्य को समझता हूँ। यह समझ मेरे अंदर सुधार और विकास की भावना जगाती है, जो मेरे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।


प्रश्न 10: निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क) इम्तिहान पास कर लेना कोई चीज नहीं असल चीज है बुद्धि का विकास। 
(ख) फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच भी आदमी मायामोह के बंधन में जकड़ा रहता है, मैं फटकार और घुड़कियाँ खाकर खेलकूद का तिरस्कार न कर सकता था। 
(ग) बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान कैसे पायेदार बने ? 
(घ) आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला आ रहा था, मानो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार ग्रहण करने जा रही हो। 

उत्तर: (क) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन का अर्थ है कि केवल परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना या अंक प्राप्त करना जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। वास्तविक उपलब्धि तब होती है जब व्यक्ति की बुद्धि, सोच और समझ में विकास होता है। इसके अंतर्गत ज्ञान का वास्तविक अर्थ, जीवन की समझ और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता आती है। यह कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व और बौद्धिक क्षमता का विकास करना है।
(ख) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन में यह कहा गया है कि चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ या खतरे क्यों न हों, व्यक्ति अपनी इच्छाओं और पसंदों से जुड़ा रहता है। यहाँ लेखक कहता है कि बड़े भाई की डाँट-फटकार के बावजूद भी वह खेलकूद को छोड़ नहीं सकता था। खेलने की उसकी इच्छा और रुचि इतनी मजबूत थी कि वह उसे तिरस्कार नहीं कर सकता था। यह उसके लिए माया का बंधन था, जिससे वह बाहर नहीं निकल पा रहा था।
(ग) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन का अर्थ है कि यदि किसी कार्य या उपलब्धि की आधारशिला (बुनियाद) मजबूत नहीं है, तो उसका परिणाम भी स्थिर या सफल नहीं हो सकता। यहाँ “मकान” का उल्लेख जीवन की उपलब्धियों या सफलता के लिए किया गया है, जबकि “बुनियाद” उसकी शिक्षा, मेहनत और तैयारी को दर्शाता है। यह कहना है कि यदि शिक्षा या किसी कार्य की शुरुआत मजबूत नहीं है, तो अंतिम परिणाम भी सफल नहीं होगा।
(घ) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन में लेखक ने एक गहरा और भावपूर्ण दृश्य चित्रित किया है। यहाँ “आँखें आसमान की ओर” देखने का अर्थ है कि व्यक्ति का ध्यान ऊँचे लक्ष्यों या आदर्शों की ओर है। वह “आकाशगामी पथिक” को देख रहा है, जो धीरे-धीरे गिरते हुए प्रतीत होता है। यह पथिक एक आत्मा की तरह है, जो स्वर्ग से नीचे आ रही है और नए संस्कारों को स्वीकार करने के लिए तैयार है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपने ऊँचे सपनों और आदर्शों को छोड़कर वास्तविकता की ओर आ रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहाँ आदर्श और वास्तविकता के बीच संघर्ष का भाव छाया हुआ है।

7. आत्मत्राण – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक का अर्थ बताते हुए उसकी सार्थकता, कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
‘आत्मत्राण’ का अर्थ है-स्वयं अपनी सुरक्षा करना। इस कविता में कवि ईश्वर से सहायता नहीं माँगता। वह ईश्वर को हर दुःख से बचाने के लिए नहीं पुकारता। वह स्वयं अपने दुःख से बचने और उसके सामना करने योग्य बनना चाहता है। इसके लिए वह केवल स्वयं को समर्थ बनाना चाहता है। इसलिए यह शीर्षक विषय वस्तु के अनुरूप बिल्कुल सही और सटीक है।

प्रश्न 2. ‘आत्मत्राण’ कविता में कवि की प्रार्थना से क्या संदेश मिलता है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 

  • जीवन-भार स्वयं वहन कर सकें।
  • सुख के समय में भी प्रभु को निरन्तर याद रखें।
  • ईश्वर की शक्ति और करुणा पर विश्वास रखें।
  • विपत्तियों और बाधाओं में आत्मबल, आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता बनाए रखें।
    (उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)

व्याख्यात्मक हल:
‘आत्मत्राण’ कविता में कवि की प्रार्थना से आत्मनिर्भर जीवन जीने का संदेश मिलता है। कवि ईश्वर से अपने जीवन का भार स्वयं वहन कर सकने की क्षमता माँगता है। वह चाहता है कि सुख के समय में भी हम ईश्वर को निरन्तर याद करते रहें और ईश्वर की शक्ति और करुणा पर अपना अटूट विश्वास बनाये रखें। जीवन में आने वाली विपत्तियों व बाधाओं में हम अपना आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता बनाए रखें।

प्रश्न 3. आत्मत्राण कविता में किसी सहायक पर निर्भर न रहने की बात कवि क्यों कहता है? कविता का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 

  • कवि स्वावलंबी है और वह अपने बलबूते जीवन की सभी बाधाओं और विपत्तियों का सामना करना चाहता है।

केन्द्रीय भाव:

  • विपत्ति के समय ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना।
  • सुख के समय भी ईश्वर को याद रखना।
  • अपने आत्मबल और पुरुषार्थ के बल पर बाधाओं और विपत्तियों का सामना करना।
  • सहायक न मिलने पर भी विचलित न होना।
    (उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)

व्याख्यात्मक हल:
‘आत्मत्राण’ कविता में किसी सहायक पर निर्भर न रहने की बात कवि इसलिए कहता है कि यदि ऐसी परिस्थिति आ जाए कि कोई सहायक न भी मिले अर्थात कोई सहायता करने वाला न हो तो भी उसमें आत्मबल, हिम्मत-साहस और बल पौरुष बना रहे। क्योंकि कवि स्वावलंबी है और वह अपने बलबूते जीवन की सभी बाधाओं और विपत्तियों का सामना करना चाहता है। ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है-स्वयं अपनी सुरक्षा करना। इस कविता में कवि ईश्वर से सहायता नहीं माँगता। वह ईश्वर को हर दुःख से बचाने के लिए नहीं पुकारता। वह स्वयं अपने दुःख से बचने और उसके योग्य बनना चाहता है। इसके लिए वह केवल स्वयं को समर्थ बनाना चाहता है।

प्रश्न 4. आत्मत्राण कविता के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है ? उसका संदेश स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 

  • विपदाओं से भयभीत न हों।
  • किसी सहायक के न मिलने पर भी बल-पौरुष बनाए रखें।
  • लोगों द्वारा छले जाने पर भी मन से हार न मानें।
  • सुख के दिनों में भी ईश्वर को याद रखें।
  • ईश्वर के प्रति मन में कभी भी संदेह न रखें। 

व्याख्यात्मक हल:
आत्मत्राण कविता के द्वारा कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हमें विपत्तियों से न घबराने का संदेश दिया है। भले ही कोई सहायक न मिले पर हम साहस बनाए रखें। यदि कोई हमें धोखा दे या छल-कपट करे तो भी मन में हमें हार नहीं माननी चाहिए। सुख के दिनों में भी सदैव ईश्वर को याद रखें और कभी ईश्वर के प्रति मन में अविश्वास और संदेह की भावना न लाएँ:यही संदेश इस कविता से हमें प्राप्त होता है।

प्रश्न 5. कवि ईश्वर पर संशय नहीं करना चाहता, क्यों ? कविता के संदर्भ में उत्तर दीजिए।
उत्तर:
 कवि ईश्वर पर सदैव विश्वास बनाए रखना चाहते हैं। दुख के दिनों में भी परमेश्वर के प्रति उनकी आस्था पर किसी प्रकार का संदेह या संशय न हो, क्योंकि ईश्वर पर उनके विश्वास का संबल ही उन्हें हर कठिनाई को सहने की शक्ति प्रदान करता है। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास ही उन्हें कठिनाइयों में निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

प्रश्न 6. कवि को ईश्वर के अतिरिक्त और किस पर भरोसा है और क्यों ?
उत्तर:
 कवि को ईश्वर के अतिरिक्त अपनी बुद्धि व कौशल पर विश्वास है। उन्हें अपनी शक्ति व कठिनाइयों का सामना करने के लिए बुद्धि के बल पर बनाई गई योजनाओं और कुशलता के बल पर उनका सामना करने की क्षमता पर विश्वास है, क्योंकि कवि का मानना है कि मनुष्य अपना उद्धार स्वयं ही कर सकता है, अपनी कठिनाइयों से खुद छुटकारा पा सकता है, कोई और उसकी सहायता नहीं कर सकता। वह जानता है कि वह यदि अपनी समस्त शक्तियों का उचित प्रयोग करेगा, तो कठिनाइयाँ निश्चय ही दूर होंगी।

प्रश्न 7. सामान्यतः मनुष्य कैसे दिनों में ईश्वर को भूल जाता है और क्यों? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
 सामान्यतः मनुष्य सुख के दिनों में ईश्वर को भूल जाता है, क्योंकि वह स्वार्थी प्राणी है। जब-जब उसे किसी चीज की आवश्यकता होती है, तब-तब वह उसे पाने के लिए प्रयत्नशील होता है और ईश्वर से इच्छा-पूर्ति की कामना करता है और इच्छा-पूर्ति हो जाने पर भगवान को पूरी तरह भूल जाता है। फिर दुख के समय आपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए पुनः ईश्वर का स्मरण करता है।

प्रश्न 8. हमें संकटों का सामना किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर:
 हमें संटकों का सामना डटकर करना चाहिए। आत्मसंघर्ष करके, संकटों से जूझकर ही विजय प्राप्त की जा सकती है। पुरुषार्थ के बल पर संकटों का सामना करने में ही भलाई है। कवि निर्भय बनकर जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष कर विजय पाने का प्रयत्न करना चाहता है। हमें ईश्वर पर विश्वास बनाए रखकर कठिनाइयों पर पार पाना चाहिए।

प्रश्न 9. कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर:
 ‘आत्मत्राण’ कविता में कवि की आकांक्षा सामान्य लोगों की आकांक्षा से भिन्न है। सामान्य रूप से लोग ईश्वर से दुःखों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। पर इस कविता में कवि दुःखों से विचलित न होकर अपने बुद्धि-बल और साहस के बल पर कठिनाइयों से त्राण पाना चाहता है। वह ईश्वर से इतनी शक्ति चाहता है कि विपत्तियाँ, हानि, धोखा सहन कर पाए। उसका ईश्वर पर सदैव विश्वास बना रहे। सुख-दुःख को समभाव से वहन कर सके। कवि ने जीवन में संघर्ष करने की शक्ति की कामना की है।

6. कर चले हम फ़िदा – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. ‘कर चले हम फ़िदा’ कविता में ‘साथियो’ सम्बोधन किन के लिए किया गया है और उनसे क्या अपेक्षा की गई है?
उत्तर: 
‘कर चले हम फ़िदा’ कविता में कवि ने चीन के युद्ध में सीमाओं पर लड़ने वाले सैनिकों द्वारा ‘साथियो’ शब्द भारत-वर्ष के देशवासियों (युवा पीढ़ी) के लिए सम्बोधन किया है और उनसे अपेक्षा की गई है कि वे तो संसार छोड़कर जा रहे है और अब देश की रक्षा का उत्तरदायित्व उन पर है। हिमालय देश का मुकुट है, इसलिए अपने सिर भले ही कट जाएँ, परंतु हिमालय का सिर नहीं झुकना चाहिए। मातृभूमि पर हँसते-हँसते न्योछावर हो जाएँ। संकट की घड़ी में अपने सुखों को, स्वार्थों को छोड़कर देशसेवा में समर्पित हो जाएँ।

प्रश्न 2. ‘कर चले हम फ़िदा’ कविता में किस प्रकार की मृत्यु को अच्छा कहा गया है और क्यों? इसमें कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर: देश की रक्षा करते समय होने वाली मृत्यु को अच्छा कहा गया है।
देशभक्ति और बलिदान की भावना जगाने के लिए।
संदेश-देश के लिए समर्पण एवं बलिदान का।
(उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित)
व्याख्यात्मक हल:
कविता में युद्ध भूमि में लड़ते समय सैनिक की देश की रक्षा करते समय होने वाली मृत्यु को अच्छा कहा गया है। इससे कवि यह संदेश देना चाहता है कि जब देश पर कोई विदेशी आक्रमणकारी चढ़ आया हो, तब हमें जी जान लगाकर देश की रक्षा करना चाहिए। युद्ध में चाहे कितने भी संकट आएँ, मौत सामने आ जाए, तो भी हमें बलिदान देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। और हमारे अन्दर देश के लिए समर्पण और बलिदान की भावना होनी चाहिए।

प्रश्न 3. इस कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
‘कर चले हम फ़िदा’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान करने वाला वीर सैनिक साथियों से देश की रक्षा का दायित्व उठाने का आह्वान करता है। सैनिक कहता है कि देश के लिए बलिदान का अवसर रोज-रोज नहीं आता अतः इसका सिलसिला चलते रहना चाहिए। देश की मर्यादा और सीमाओं के विरूद्ध उठने वाले दुश्मन के हर वार का मुँहतोड़ जवाब देना है, इसकी रक्षा करनी है।
व्याख्यात्मक हल:
भारतीय वीर सैनिकों में देश की सुरक्षा के लिए जोश भरना तथा देशवासियों के मन में देशभक्ति की भावना भरना इस कविता का उद्देश्य है। देश के लिए बलिदान होने वाला सैनिक अपने साथियों को बताता है कि उसने तथा उसके काफिले के अन्य सैनिकों ने भीषण कष्ट और संकट सहन करके भी शत्रुओं के साथ मुकाबला किया। वे लड़ते-लड़ते शहीद हो गए, मरते दम तक उन्होंने संघर्ष किया। वह अपने अन्य सैनिक साथियों को कहता है कि वे भी देश की धरती को दुल्हन मानकर उस पर फिदा हो जाएँ। वे इसकी सुरक्षा के लिए खून की नदी बहा दें। देश के लिए मरने का अवसर कभी-कभी आता है। अतः वे नए-नए काफ़िले सजाकर शत्रु के साथ संघर्ष करें। उनके होते कोई भी शत्रु देश की सीमाओं में प्रवेश न कर सके। वे शत्रु रूपी रावण के संहार के लिए राम और लक्ष्मण की भाँति संघर्ष करें।

प्रश्न 4. ‘कर चले हम फ़िदा’ कविता पाठक के मन को छू जाती है। आपके मत में इसके क्या कारण हो सकते हैं।
उत्तर:
 

  • देशभक्ति
  • सैनिकों का देश के लिए समर्पण और बलिदान
  • देश की रक्षा के लिए भावी सैनिक तैयार करने की भावना
  • संगीतात्मकता
  • ओजपूर्ण भाषा-शैली 

व्याख्यात्मक हल:
‘कर चले हम फ़िदा’ कविता पाठकों के मन को छू जाती है क्योंक इसकी विषयवस्तु देशभक्ति से ओतप्रोत है। कवि ने इस कविता के माध्यम से सैनिकों के देश के लिए समर्पण व बलिदान होने की भावना को प्रकट किया है। यह कविता देश की रक्षा के लिए भावी सैनिक तैयार करने की भावना उत्पन्न करती है। इसकी भाषा-शैली ओजपूर्ण है तथा इसमें संगीतात्मकता की प्रधानता है। क्योंकि यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म हकीकत के लिए लिखा गया है।

प्रश्न 5. हमें आज़ादी का क्या मूल्य चुकाना पड़ा? ‘कर चले हम फ़िदा’ के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। 
उत्तर: हमें आज़ादी प्राप्त करने के लिए अपने वीर सैनिकों को देश पर कुर्बान करना पड़ा। विदेशियों की चतुराई एवं चालाकी को न समझ पाने के कारण उनके धोखे को सहन करना पड़ा। अनेक बहनों ने अपने भाई तथा अनेक माताओं ने अपने लाल खोकर यह आज़ादी हासिल की, किन्तु इन सबसे हमने शत्रुओं की चतुराई एवं कपटता से सदैव सावधान रहने का पाठ पढ़ा।

प्रश्न 6. मानव जीवन में स्वतंत्रता का क्या महत्त्व है?
उत्तर: 
स्वतंत्रता प्रत्येक प्राणी का जन्मसिद्ध अधिकार है। मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ कर स्वतंत्र रहना चाहते हैं। स्वतंत्रता व्यक्ति के अस्तित्व की पहचान है। पराधीन व्यक्ति को तो सपने में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती है। स्वतंत्र हवा में साँस लेने के लिए हमारे देश के वीरों ने संघर्ष कर अपने प्राण अ£पत कर दिए। प्रत्येक व्यक्ति को जीते-जी अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कुछ भी करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए।

प्रश्न 7. गीत की भाषा तथा शब्द-योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 गीत खड़ी बोली हिन्दी में लिखा गया है। गीत में अरबी और फ़ारसी के शब्दों का प्रयोग मिलता है। गीत में वीर रस की उत्पत्ति करने वाले सुंदर शब्दों का प्रयोग है। भाषा में ओजगुण सर्वत्र विद्यमान है। गीत की भाषा मुहावरेदार है। साधारण बोलचाल की भाषा अत्यंत सरल, सरस, प्रभावशाली एवं मार्मिक है।

5. तोप – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न. 1. कम्पनी बाग और तोप को विरासत मानकर क्यों सुरक्षित रखा गया ?
उत्तर:
 कम्पनी बाग और तोप-ये दोनों अंग्रेजों की विरासत हैं। इन दोनों का उपयोग भारतीय जनता के लिए किया गया। एक ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत की जनता को खुशहाल बनाने के लिए हर नगर में कम्पनी बाग बनवाए। इससे जनता प्रसन्न हुई। दूसरी ओर, कम्पनी ने जनता के विद्रोह को दबाने के लिए, उन्हें अपना गुलाम बनाने के लिए उन पर तोपें दगवाईं। ये दोनों विरासतें भारतीय जनता को सावधान करती हैं। ये कहती हैं कि विदेशी कम्पनियों द्वारा दिए गए आकर्षणों में न फँसो। एक दिन ये तुम्हें गुलाम बना डालेंगी। तुम्हें फिर से इनकी तोपों से दगना पड़ेगा।

प्रश्न. 2. इस कविता से ‘तोप’ के विषय में क्या जानकारी मिलती है ?
उत्तर:
 ‘तोप’ नामक इस कविता में हमें तोप के विषय में निम्नलिखित जानकारी मिलती है:
(i) तोप के इतिहास के विषय में, जो 1857 की है।
(ii) यह विरासत में प्राप्त हुई है, जिसको बड़ी सँभाल के साथ रखा गया है।
(iii) पर्यटकों को सुबह-शाम वह प्रतीक रूप में अपने कार्यों का बखान करती है।
(iv) समय बदलने पर तोप के ऊपर हो रहे परिवर्तनों का वर्णन किया गया है।
(v) बच्चों द्वारा तोप का उपयोग घुड़सवारी, चिड़ियों द्वारा बैठकर गप-शप करने, गौरेये द्वारा उसके अंदर शैतानी करते हुए प्रवेश करना।

प्रश्न. 3. ‘तोप’ कविता का प्रतिपाद्य/संदेश स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 प्रस्तुत कविता शस्त्र-शक्ति और बलपूर्वक दमन का विरोध करती है। इसमें बताया गया है कि तोपों, तलवारों से जनता की आवाज को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, हमेशा के लिए नहीं। जनता का विद्रोह समय आने पर बड़ी-बड़ी तोपों का मुँह बन्द कर देता है, बड़े-बड़े अत्याचारियों को उखाड़ फेंकता है। तब ये तोप बच्चों के खिलौने बन जाती है और इनकी व्यर्थता का उपहास उड़ाया जाता है।

प्रश्न. 4. कविता के आधार पर ‘तोप’ के अतीत और वर्तमान पर प्रकाश डालिए। 
उत्तर: कविता के आधार पर कम्पनी के अफसरों ने भारतीय क्रांतिकारियों को दबाने के लिए इस ‘तोप’ का प्रयोग किया था। इन तोपों ने न जाने कितने शूरवीरों को मार डाला था। उस युग में बेकसूर लोगों को मारने वाली यह तोप आज निरर्थक है। वर्तमान में चिड़ियाँ व गौरैयाँ इस तोप पर बैठकर बातें करती हैं, लड़के घुड़सवारी करते हैं। इससे पता चलता है कि अब उन्हें उस शक्तिशाली तोप का कोई डर नहीं रहा।

प्रश्न. 5. वीरेन डंगवाल द्वारा रचित ‘तोप’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 कम्पनी बाग में 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में काम आई एक तोप रखी है उसे विरासत की तरह सँभाल कर रखा जाता है। मानो वह सैलानियों को बताती है कि उसने कैसे-कैसे वीरों की धज्जियाँ उड़ाई थी। परन्तु आज उस तोप पर या तो छोटे बच्चे सवारी करते हैं या चिड़ियाँ गपशप करती हैं। कभी-कभी गौरेये उसके भीतर भी घुस जाते हैं। वे मानो बताते हैं कि तोप चाहे कितनी भी बड़ी हो उसे एक ना एक दिन चुप होना ही पड़ता है।

प्रश्न. 6. कम्पनी बाग में रखी तोप की क्या विशेषता है ? वह कब और क्यों चमकाई जाती है ?
उत्तर:
 कम्पनी बाग में रखी तोप सन् 1857 के स्वतन्त्रता आन्दोलन की निशानी है। यह विरासत में मिली निशानी है जो अंग्रेजों द्वारा दी गई है। यह तोप दो कारणों से चमकाई जाती है-पहला राष्ट्रीय पर्व स्वतन्त्रता दिवस (15 अगस्त) तथा गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी)। दूसरा उसे जब विदेशी सैलानी देखेंगे तो रख-रखाव से खुश होंगे तथा उसकी कार्यशैली से परिचित होंगे।

प्रश्न. 7. ‘तोप’ कविता के आधार पर लिखिए कि विरासत में मिली चीजों का महत्त्व क्यों होता है ?
उत्तर: एक पुरानी तोप कम्पनी बाग के प्रवेश द्वारा पर रखी गई है जो सन् 1857 की तोप है। इस तोप की देखभाल सँभाल कर की जाती है। जिस प्रकार यह कम्पनी बाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा हमें विरासत में मिला है, वैसे ही यह तोप हमें विरासत में अंग्रेजों  द्वारा दी गई है। यह वर्ष में दो बार चमकाई जाती है अर्थात् इसका प्रयोग दो बार ही किया जाता है। विरासत में मिली चीजों की सुरक्षा बड़ी सँभालकर इसलिए होती है, क्योंकि वह हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त होती हैं, उनका अपना महत्त्व और इतिहास होता है।

प्रश्न. 8. कविता में तोप को दो बार चमकाने की बात की गई है ? ये दो अवसर कौन-से होंगे ?
उत्तर:
 कविता में तोप को दो बार चमकाने की बात की गई है। ये दो अवसर वर्तमान काल में-(1) स्वतन्त्रता दिवस (15 अगस्त), तथा (2) गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी) हैं। पन्द्रह अगस्त को भारत स्वाधीन हुआ था। हमने अंग्रेजों  को देश से बाहर निकाल दिया था तथा 26 जनवरी को देश में भारतीय संविधान लागू हुआ था। इन्हीं दोनों अवसरों पर तोप और कम्पनी बाग को चमकाया जाता है।

प्रश्न. 9. ‘प्रतीक’ और ‘धरोहर’ कितने प्रकार की होती हैं ? उनकी क्या उपयोगिता है ? ‘तोप’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 ‘तोप’ कविता प्रतीकात्मक कविता है। इसमें तोप, चिड़ियाँ, बच्चे आदि प्रतीकों का प्रयोग किया गया है। किसी भी स्थिति का वर्णन करने के लिए उससे मिलते-जुलते प्रतीकों या धरोहर का प्रयोग किया जाता है जो प्रड्डति से सम्बन्धित होते हैं। हमारे पूर्वजों की, पूर्व अनुभवों की और पुरानी परम्पराओं व संस्कारों की धरोहर नई पीढ़ी को मिलती है जिससे नई पीढ़ी उनके बारे में जान सकती है उनके अनुभवों से कुछ सीख सकती है और उनकी बनाई श्रेष्ठ परंपराओं का पालन कर सकती है। इसीलिए इन्हें बचाकर रखना हमारा परम कर्तव्य है।