4. पर्वत प्रदेश में पावस – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न. 1. पर्वत प्रदेश में वर्षा ऋतु में प्राकृतिक सौन्दर्य कई गुना बढ़ जाता है, परन्तु पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में क्या कठिनाइयाँ उत्पन्न होती होंगी? उनके विषय में लिखिए।
उत्तर: 

  • हरियाली बढ़ जाती है, फल-फूल बढ़ जाते हैं। खेती तैयार होती है।
  • भूमि फिसलन भरी, चट्टानें टूटना, मिट्टी फैलना, बाढ़ आना, जंगल में कीचड़ व दलदल आदि।

व्याख्यात्मक हल:
पर्वतीय प्रदेशों में वर्षा ऋतु में प्राकृतिक सौन्दर्य तो कई गुना बढ़ जाता है, परन्तु इस ऋतु में पहाड़ों पर जीवन व्यतीत करने वाले लोगों के लिए कई समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं जैसे वर्षा के कारण पहाड़ों की भूमि फिसलन भरी हो जाती है जिसके कारण पहाड़ों से फिसलकर गिरने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही चट्टानों का अपक्षय होने लगता है वह टूटकर गिरने लगती है। कभी-कभी बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े गिरते हैं जिनसे जान-माल का बहुत नुकसान होता है। वर्षा के कारण पहाड़ों की मिट्टी फैलने लगती है। कभी-कभी बादल फटने से भयंकर बाढ़ तक आ जाती है। जंगलों में कीचड़ व दलदल बन जाती है जिसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

प्रश्न. 2. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर: प्रस्तुत कविता ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने पर्वतीय प्रदेश में वर्षाकाल में क्षण-क्षण होने वाले परिवर्तनों व अलौकिक दृश्यों का बड़ा सजीव चित्रण किया है। कवि कहता है कि महाकार पर्वत मानो अपने ही विशाल रूप को अपने चरणों में स्थित बड़े-बड़े तालाबों में अपने हजारों सुमनरूपी नेत्रों से निहार रहे हैं। बहते हुए झरने दर्शकों की नस-नस में उमंग व उल्लास भर रहे हैं। पर्वतों के सीनों को फाड़कर उच्चाकांक्षाओं से युक्त ऊँचे-ऊँचे वृक्ष मानो बाहर आए हैं और अपलक व शान्त आकाश को निहार रहे हैं। फिर अचानक ही पर्वत मानो बादल रूपी यान के परों को फड़फड़ाते हुए उड़ गए हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी मालूम होता है कि मानो धरती पर आकाश टूट पड़ा हो और उसके भय से विशाल साल के पेड़ जमीन में धँस गए हों। तालों से उठती भाप ऐसी जान पड़ती है, मानो उनमें आग-सी लग गई हो और धुआँ उठ रहा हो और साल के पेड़ इससे भी भयभीत हों। कवि कहता है कि यह सब देखकर लगता है कि जैसे इन्द्र ही अपने इन्द्रजाल से खेल रहा है।

प्रश्न. 3. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में झरने पर्वत का गौरव-गान कैसे करते हैं ?
उत्तर:
 ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में बताया गया है कि जब पहाड़ों पर वर्षा ऋतु में बादल बरसते हैं तब पर्वतों से प्रवाहित होने वाले झरने पर्वतों का गौरवगान करते हुए पृथ्वी पर झर-झर गिरते हैं और नस-नस में उत्तेजना भर देते हैं। झरते हुए झरने झाग भरे हुए होते हैं। वे मोती की माला जैसे लड़ियों की तरह सुन्दर दिखाई देते हैं और ऐसा लगता है कि पहाड़ों से चाँदी का भण्डार सफेद धातु के रूप में गिर रहा है। पहाड़ों के हृदय से उठकर ऊँची आकांक्षाओं वाले वृक्ष आकाश की ओर शान्त भाव से टकटकी लगाकर देख रहे हैं। इस प्रकार झरने पहाड़ों की शोभा को बढ़ाते हैं।

प्रश्न. 4. सिद्ध कीजिए:पंतजी कल्पना के सुकुमार कवि हैं ?
उत्तर: पंतजी कल्पना-लोक के कवि थे। उनकी कल्पनाएँ अत्यंत मनोरम हैं। उन्होंने इस कविता में भी प्रकृति को मानव की तरह क्रिया करते दिखाया है। उन्होंने पहाड़ को अपनी शक्ल निहारता, पेड़ को उच्चाकांक्षा-सा चिंतन-मुद्रा में खड़ा, झरने को गौरव गाथा गाता हुआ, शाल के वृक्षों को भय से धँसा हुआ, बादलों को पारे के समान चमकीले पंख, फड़-फड़ाकर उड़ता हुआ और आक्रमण करता हुआ दिखाया है। ये सब कल्पनाएँ गतिशील, मौलिक एवं नवीन हैं।

प्रश्न. 5. ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
 सचमुच वर्षा-ऋतु में पहाड़ों पर पल-पल दृश्य बदल रहे हैं। कभी तालाब के जल में पहाड़ों का प्रतिबिंब दिखाई देता है, तो कभी तालाब में धुँआ उठने लगता है। कभी पहाड़ों पर खड़े लम्बे वृक्ष शांत आकाश की ओर अपलक देखते प्रतीत होते हैं तो कभी वे भयभीत से धरती में धँसे नजर आते हैं। झरने कभी झर-झर का संगीत करते हुए मोती की लड़ी से सुन्दर लगते हैं, तो कभी वे अद्रश्य हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति सचमुच पल-पल अपना रूप बदलती है।

प्रश्न. 6. पंतजी द्वारा रचित ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ नामक कविता का सारांश लिखिए। 
उत्तर: इस कविता में पंतजी ने पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु का वर्णन किया है। इस कविता का सार इस प्रकार है- पर्वतीय प्रदेश था। वर्षा ऋतु में प्रकृति पल-पल अपना रूप बदल रही थी। पर्वत के नीचे दर्पण जैसा तालाब था। पर्वत पर हजारों फूल खिले थे। लगता था कि वे फूल पर्वत की आँखें हों जिनसे वह बार-बार दर्पण में अपना विराट रूप देख रहा था। पर्वत से गिरने वाले झरने झर-झर स्वर में मानो पर्वत की गौरव गाथा गा रहे थे। चोटियों पर खड़े पेड़ हमारी महत्त्वाकांक्षाओं के समान ऊँचे थे। वह मानो चुपचाप अपलक और चिन्तामग्न होकर नीले आकाश को निहारे जा रहे थे। अचानक बादल ऐसे ऊपर उठे मानो पूरा पहाड़ अपने पंख फड़-फड़ाकर उड़ चला हो। झरने दिखना बंद हो गए। उनका शोर-शोर रह गया। बादलों के कारण शाल के पेड़ धरती में धँसे हुए से जान पड़ते थे। तालाब से उठता धुआँ देखकर लगता था मानो तालाब जल गया हो। इस प्रकार इंद्र देवता घूम-घूमकर अपना इंद्रजाल दिखा रहे थे।

3. मनुष्यता – Long Question answer

प्रश्न 1. ‘वृथा मरे, वृथा जिए’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

उत्तर: ‘वृथा मरे, वृथा जिए’ यह शब्द कवि सूरदास द्वारा रचित दोहे से लिए गए हैं। इस दोहे का तात्पर्य यह है कि जीवन व्यर्थ है जब हम उसे धर्म और सच्चाई से वंचित रखते हैं तथा अपने दुःखों को भोगते रहते हैं। इसके बदले हमें सच्चाई की खोज में निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए ताकि हम अपने जीवन को एक सार्थक और उपयोगी ढंग से जी सकें।

मनुष्यता कवि – मैथिलीशरण गुप्त 

प्रश्न 2. मनुष्यता कविता में कवि ने किन महान व्यक्तियों का उदाहरण दिया है और उनके माध्यम से क्या संदेश देना चाहा है?
अथवा
कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?

उत्तर: मनुष्यता कविता में कवि ने राजा रंतिदेव, दधीचि ऋषि, उशीनर, कर्ण तथा महात्मा बुद्ध का उदाहरण देते हुए मानवता, एकता, सहानुभूति, सद्भाव, उदारता और करुणा का संदेश देना चाहता है। वह मनुष्य को स्वार्थ, भिन्नता, वर्गवाद, जातिवाद आदि संकीर्णताओं से मुक्त करना चाहता है। वह मनुष्य में उदारता के भाव भरना चाहता है। कवि चाहता है कि हर मनुष्य समस्त संसार में अपनत्व की अनुभूति करे। वह दुखियों, वंचितों और जरूरत मंदों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को भी तैयार हो। वह कर्ण, दधीचि, रंतिदेव आदि के अतुल त्याग से प्रेरणा ले। वह अपने मन में करुणा का भाव जगाए। वह अभिमान, लालच और अधीरता का त्याग करे। एक-दूसरे का सहयोग करके देवत्व को प्राप्त करे। वह हँसता-खेलता जीवन जिए तथा आपसी मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास करे। उसे किसी भी सूरत में अलगाव और भिन्नता को हवा नहीं देनी चाहिए।

प्रश्न 3. कवि गर्वरहित जीवन जीने की सलाह क्यों दे रहा है?

उत्तर: कवि गर्वरहित जीवन जीने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि गर्व और अभिमान की वजह से मनुष्य अनेक बार अपने असली धर्म से भटक जाता है। इससे मनुष्य दूसरों को नुकसान पहुंचाने लगता है और स्वयं भी अस्थिर बन जाता है। इससे उसके समाज में सम्मान की कमी होती है।
इससे बेहतर है कि मनुष्य गर्व की जगह हमेशा समझदारी और सम्मति का मार्ग अपनाएं। गलती करने पर उसे इसे स्वीकारना चाहिए और उससे सीख लेना चाहिए। इससे उसका जीवन सुखद और आनंदमय होता है जो उसे एक अच्छे मानव के रूप में बनाता है।
इससे समाज का भी फायदा होता है क्योंकि गर्व और अभिमान से वंचित लोग एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और समझदारी रखते हैं जो समाज के विकास में मददगार साबित होता है।
इसलिए, कवि गर्वरहित जीवन जीने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि इससे मनुष्य समझदार, सम्मतिपूर्ण, और संतुलित बनता है।

प्रश्न 4. मनुष्यता कविता के माध्यम से कवि ने किन गुणों को अपनाने का संकेत दिया है ? तर्क सहित उत्तर दीजिए

उत्तर: मनुष्यता कविता के माध्यम से कवि ने परोपकार, वसुधैव कुटुंबकम्, सहयोग की भावना, भाईचारा, दानशीलता, उदारता, अहंकार का त्याग, धन का अहंकार न करना, भेदभाव न करना, सहानुभूति की भावना आदि गुणों को अपनाने का संकेत दिया है क्योंकि यही गुण मनुष्य की पहचान है। माँ सरस्वती भी परोपकारी व्यक्ति की प्रशंसा करती हैं। हम सब एक ही परमपिता की संतान होने से आपस में भाई-भाई हैं इसलिए हमें एक-दूसरे की उन्नति में सहयोग देना चाहिए। हम सब का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है जिसके लिए हमें रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण व महात्मा बुद्ध जैसे उदार व दानी बनना चाहिए।

प्रश्न 5. मनुष्यता कविता का मूल संदेश स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है ?
अथवा
‘मनुष्यता’ कविता का प्रतिपाद्य संक्षेप में लिखिए। 

उत्तर: मनुष्यता कविता के माध्यम से कवि मानवता, एकता, सहानुभूति, सद्भाव, उदारता और करुणा का संदेश देना चाहता है। वह मनुष्य को स्वार्थ, भिन्नता, वर्गवाद, जातिवाद आदि संकीर्णताओं से मुक्त करना चाहता है। वह मनुष्य में उदारता के भाव भरना चाहता है। कवि चाहता है कि हर मनुष्य समस्त संसार में अपनत्व की अनुभूति करे। वह दुखियों, वंचितों और जरूरतमंदों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को भी तैयार हो। वह कर्ण, दधीचि, रंतिदेव आदि के अतुल त्याग से प्रेरणा ले। वह अपने मन में करुणा का भाव जगाए। वह अभिमान, लालच और अधीरता का त्याग करे। एक-दूसरे का सहयोग करके देवत्व को प्राप्त करे। वह हँसता-खेलता जीवन जिए तथा आपसी मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास करे। उसे किसी भी सूरत में अलगाव और भिन्नता को हवा नहीं देनी चाहिए।

प्रश्न 6. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए:
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी। 

उत्तर: यह पंक्तियाँ एक संदेश देती हैं कि हमें जीवन में हमेशा उन मार्गों को चुनना चाहिए जो सत्य हों और जिनसे हमारे और लोगों के लिए अच्छाई हो। हमें विपत्तियों और विघ्नों से नहीं घबराना चाहिए, बल्कि हमें उनका सामना करना चाहिए और उन्हें पार करना चाहिए। हमें एक दूसरे से मिलना चाहिए और एक दूसरे का साथ देना चाहिए, क्योंकि इससे हमारे बीच एकता बढ़ती है और हमें समस्याओं का सामना करने में मदद मिलती है। हमें सभी के लिए एक ही मार्ग का चुनाव करना चाहिए, जो सबके लिए उचित हो। इससे भेदभाव और विभिन्नता नहीं होगी और हम एक दूसरे के साथ समझदारी से रह सकेंगे।

2. पद – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न. 1. मीराबाई श्रीकृष्ण को पाने के लिए क्या-क्या कार्य करने को तैयार हैं ?
उत्तर: वे (मीराबाई) श्रीकृष्ण को पाने के लिए निम्नलिखित कार्य करने को तैयार हैं-
(i) वे श्रीकृष्ण के यहाँ सेवक के रूप में चाकरी (नौकरी) करने को तैयार हैं।
(ii) चाकर के रूप में बाग लगाएँगीं और प्रातःकाल आवाज लगाकर दर्शन करेंगी।
(iii) वृंदावन की गलियों में गोविंद की लीलाओं को गाकर सुनाएँगी।
(iv) वे वृंदावन में गायें भी चराएँगी।

प्रश्न. 2. पठित पाठों के आधार पर मीरा की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 मीरा भगवान कृष्ण की भक्त थीं। वे कृष्ण को अपना प्रियतम, पति और रक्षक मानती थीं। इन पदों में उन्होंने उनके दो रूपों-रक्षक रूप तथा रसिक रूप की आराधना करते हुए प्रभु से अपनी रक्षा करने की गुहार की है। वे स्वयं को उनकी दासी बताते हुए कहती हैं- ‘दासी मीरा लाल गिरधर, हरो म्हारी पीर’।
वे स्वयं को कृष्ण का अपनाजन ही कहती हैं तथा उनकी चाकरी करने को तैयार हैं। वे उनके महल में रहकर उनके विहार के लिए बाग लगाने को भी तैयार हैं। वे वृन्दावन की गली-गली में घूमकर कृष्ण का गुणगान करना चाहती हैं। दूसरे पद में वे कृष्ण के सुंदर छबीले रूप की आराधना करती हैं और उनके मुरलीधर रूप का स्मरण करती हैं। वे स्वयं लाल साड़ी पहनकर उनसे मिलना चाहती हैं और यमुना तट की याद कराकर प्रेम के बंधन में बाँध लेना चाहती हैं।

प्रश्न. 3. मीराबाई की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: 
मीराबाई की भाषा शैली भक्ति दैन्य और माधुर्यभाव की है। इन पर योगियों, संतों और वैष्णव भक्तों का सम्मिलित प्रभाव है। मीरा के पदों की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषाओं का मिश्रण पाया जाता है। कहीं-कहीं पंजाबी, खड़ी बोली और पूर्वी भाषा के प्रयोग भी मिल जाते हैं। मीराबाई में अभूतपूर्व काव्य क्षमता थी। मीराबाई के पदों ने जन सामान्य को अधिक प्रभावित किया, क्योंकि उन्होंने अपने मन के भावों को सीधे सरल शब्दों में व्यक्त किया है। इनके पद गेय एवं संगीतात्मक शैली से युक्त हैं।

प्रश्न. 4. मीरा के पदों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 हमारी पाठ्य-पुस्तक में मीरा रचित दो पद संकलित हैं।। इनका सारांश निम्न प्रकार है:
(i) इस पद में मीरा ने कृष्ण को अपना संरक्षक माना है। उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की है कि वे मीरा की रक्षा करें। कृष्णा ने द्रौपदी की लाज रखी थी। प्रहलाद के लिए नरहरि अवतार लिया था। डूबते हुए हाथी को बचाया। अतः वह अब अपनी दासी मीरा की रक्षा करें।
(ii) इस पद में मीराबाई अपने प्रियतम कृष्ण के समीप रहने के लिए उनकी सेविका बन जाना चाहती हैं। वह चाहती हैं कि उसे वृंदावन में कृष्णा के बाग-बगीचे लगाने का सौभाग्य मिले। इसी बहाने वह नित्य प्रातः उठकर प्रभु के दर्शन करेंगी। दिन-रात उन्हें याद करेंगी और उनकी लीला-गुण गाएँगीं। वह पीताम्बरधारी साँवले कृष्णा की आराधना में लीन होना चाहती हैं। उसका हृदय प्रभु के दर्शन पाने के लिए बहुत व्याकुल है।

1. साखी – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: ईश्वर भक्ति ने कबीर के अहंकार को दूर कर दिया। आप इस दोहे को पढ़कर क्या समझे हैं ? अपने विचार लिखिए।
‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि।।’
उत्तर: 

  • ईश्वरीय सत्ता सर्वोपरि है। मनुष्य स्वयं को भूलकर ईश्वर को ही स्वयं में व सम्पूर्ण संसार में देखता है।
  • व्यक्ति की शक्ति अत्यंत सीमित।
  • झूठा अभिमान किस लिए।

व्याख्यात्मक हल: जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि।’ इस दोहे को पढ़कर हम यह समझते हैं कि मनुष्य अहंकारी है तथा स्वयं को महत्त्वपूर्ण मानता है, इसलिए वह कण-कण में व्याप्त ईश्वर को नहीं देख पाता है, जबकि ईश्वरीय सत्ता सर्वोपरि है और मानव की शक्ति अत्यंत सीमित है। इसका अहसास व्यक्ति को तब होता है जब उसके अंदर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश फैलता है और उसके अंदर का अहंकार रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है। इस अवस्था में वह अपने झूठे अभिमान को त्यागकर अपने आपको भूल जाता है और ईश्वर को स्वयं में और सम्पूर्ण संसार में देखने लगता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ईश्वर की भक्ति ने कबीर के अहंकार को दूर कर दिया है।

प्रश्न 2: अपने अंदर का दीपक दिखाई देने पर कौन-सा अँधियारा कैसे मिट जाता है ? कबीर की साखी के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
कबीर दास के अनुसार, अहंकारी व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि अहंकारी व्यक्ति स्वयं को सर्वोपरि मानता है, परन्तु जब उसके अंदर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश फैलता है, तब उसके अंदर का अहंकार रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है और मानव मन के सारे भ्रम, क्लेश, संदेह व परेशानियाँ समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 3: ‘एकै अषिर पीव का पढ़े सु पंडित होय’ पंक्ति का आप क्या अर्थ समझे हैं ? प्रेम का एक अक्षर सभी ग्रन्थों से किस प्रकार भारी है, अपने जीवन के एक अनुभव के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 

  • ‘प्रेम’ का एक अक्षर हृदय से पढ़ लेना सौ पुस्तकें पढ़ने के बराबर है।
  • मानव जीवन का मूल मंत्र-मानव प्रेम
  • व्यक्तिगत अनुभव

व्याख्यात्मक हल: एकै अषिर पीव का पढ़े सु पंडित होय’ पंक्ति का अर्थ है कि जिस व्यक्ति ने प्रेम के एक अक्षर को पढ़ लिया है, वह विद्वान हो जाता है। यह पूर्णतः सत्य है क्योंकि संसार में लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़-पढ़कर मर जाते हैं परन्तु ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते हैं और न ही सत्य को जान पाते हैं। कबीर दास जी का मानना है कि ईश्वर अनुभवगम्य है, अक्षरगम्य नहीं। वह केवल अपने अनुभव से ही जाना जा सकता है, दूसरों के अनुभवों से नहीं। मानव जीवन का मूल-मंत्र मानव प्रेम है और प्रेम का अक्षर हृदय से पढ़ लेना सौ पुस्तकों के पढ़ने के बराबर होता है। अतः स्पष्ट है कि प्रेम का एक अक्षर सभी ग्रन्थों पर भारी होता है।

प्रश्न 4: ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय’। कबीर के इस काव्यांश की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए। 
उत्तर:
 इस काव्यांश का आशय है — संसार के लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते मर गए, किन्तु उन्हें न तो ईश्वर की प्राप्ति हो सकी और न सत्य एवं ज्ञान की। कवि के अनुसार ईश्वर अनुभवगम्य है, अक्षरगम्य नहीं। वह अपने अनुभव से जाना जा सकता है, दूसरों के अनुभवों से नहीं।

प्रश्न 5: कबीर द्वारा रचित साखियों का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 कबीर ग्रंथावली से संकलित ‘साखी’ कबीरदास द्वारा रचित है। ‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ शब्द का ही तद्भव रूप है। साखी शब्द साक्ष्य से बना है, जिसका अर्थ होता है- प्रत्यक्ष ज्ञान। यह ज्ञान गुरु शिष्य को प्रदान करता है। संत सम्प्रदाय में अनुभव ज्ञान की ही महत्ता है, शास्त्रीय ज्ञान की नहीं। कबीर का अनुभव क्षेत्र विस्तृत था। ‘साखी’ वस्तुतः दोहा छंद ही है। प्रस्तुत पाठ की साखियाँ इसका प्रमाण हैं कि सत्य की साक्षी देता हुआ ही गुरु शिष्य को जीवन के तत्त्व ज्ञान की शिक्षा देता है। यह शिक्षा जितनी प्रभावपूर्ण होती है, उतनी ही याद रखने योग्य भी। प्रस्तुत साखियों में संत कबीर ने वाणी, ईश्वर, आत्मज्ञान, ज्ञान और अज्ञान, विरह, निंदक, व्यावहारिक ज्ञान आदि के विषय में बताया है।

प्रश्न 6: पाठ्य-पुस्तक में संकलित साखियों का भाव संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
 (i) ऐसी मीठी वाणी बोलो जिससे बोलने और सुनने वाले दोनों को शांति मिले।
(ii) राम प्रत्येक प्राणी के मन में वास करता है। फिर भी लोग उसे देख नहीं पाते।
(iii) अहंकार और परमात्मा इकट्ठे नहीं रह सकते। जब मन में परमात्मा का बोध जागा, तो अहंकार मिट गया।
(iv) परमात्मा के प्रति जाग्रत मनुष्य उसके विरह से तड़पता है, जबकि संसारिक लोग मौज करते हैं।
(v) विरह रूपी साँप के डँसने पर विरहणी आत्मा तड़पती रह जाती है। उसे परमात्मा के बिना शांति नहीं मिलती।
(vi) निंदक अपने निंदा-वचनों से साधक के चरित्र को पवित्र बना देता है। इसलिए निंदक को पास रखना चाहिए।
(vii) सांसारिक ज्ञान से ईश्वर नहीं मिलते। प्रेम के ढाई अक्षर से ही उसकी प्राप्ति होती है।
(viii) कबीर ने प्रभु-प्राप्ति के लिए अपनी सांसारिक वासनाओं में आग लगा ली है। अब वे अन्य साधकों को प्रेरणा दे रहे हैं।

प्रश्न 7: कबीर ने सच्चा भक्त और पंडित किसे कहा है ? पंडित या भक्त होने के लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर:
 सच्चा भक्त वह है जिसने ईश्वर के प्रेम का अनुभव किया हो और वह ईश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करता हो। प्रेमी ही ज्ञानी और विद्वान भी है।
व्याख्यात्मक हल: कबीर ने सच्चा भक्त उसे कहा है जो प्रभु के विरह में घायल हो, जिसने प्रभु के प्रेम का अनुभव किया हो और पंडित उसे कहा गया है जिसने प्रेम का एक अक्षर पढ़ लिया है, अर्थात् जिसने प्रेम का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लिया है, वही संसार का सबसे बड़ा विद्वान है। इससे स्पष्ट है कि पंडित या भक्त होने के लिए प्रेमी होना आवश्यक है।

प्रश्न 8: मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लोग आदर और सम्मान भरे वचनों को सुनकर सुखी होते हैं। इसी प्रकार मीठी बोली बोलने वाला व्यक्ति बातचीत करते हुए जब अहंकार का त्याग कर देता है, तो उसके तन को भी शीतलता मिलती है।
व्याख्यात्मक हल: कबीर ने साखी के माध्यम से स्पष्ट किया है कि मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि मीठी वाणी सुनने में मधुर और आदर-सम्मान से युक्त होती है। ऐसे आदर और सम्मान से भरे वचनों को सुनकर लोग सुखी होते हैं और मीठी बोली बोलने वाला व्यक्ति जब अपने अहंकार का त्याग करके बात करता है, तो उसके तन को भी शीतलता प्राप्त होती है।