18. हम अनेक, किंतु एक – पाठ का सार

परिचय

इस कविता “हम अनेक किंतु एक” को द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी ने लिखा है। यह कविता भारत के विविधता और एकता को दर्शाती है। इसमें बताया गया है कि भले ही भारत में कई प्रकार की भाषाएँ, पहनावे और रीति-रिवाज हों, फिर भी हम सभी भारतीय एक हैं। 

पहला प्रसंग:

“हैं कई प्रदेश के,
किंतु एक देश के,
विविध रूप-रंग हैं,
भारत के अंग हैं।” 

व्याख्या: इस पंक्ति में कवि यह बता रहे हैं कि भारत में कई राज्य और प्रदेश हैं, लेकिन सभी एक ही देश के हिस्से हैं। यहाँ लोगों के अलग-अलग रूप और रंग हैं, लेकिन सब भारत के अंग हैं।

दूसरा प्रसंग:

“बोलियाँ हजार हैं,
टोलियाँ हजार हैं,
कंठ भी अनेक हैं,
राग भी अनेक हैं,
किंतु गीत-बोल एक,
हम अनेक किंतु एक।”

व्याख्या: यहाँ कवि कह रहे हैं कि भारत में कई भाषाएँ और बोलियाँ हैं, बहुत से समूह और लोग हैं, लेकिन फिर भी हम सब एक ही गान गाते हैं। हम भले ही अलग-अलग बोलते हों, लेकिन हमारा देश एक है। 

तीसरा प्रसंग:

“एक मातृभूमि है,
एक पितृभूमि है,
एक भारतीय हम,
चल रहे मिला कदम,
लक्ष्य के समक्ष एक,
हम अनेक किंतु एक।”

व्याख्या: इस पंक्ति में कवि बताते हैं कि हमारी मातृभूमि और पितृभूमि एक ही है – भारत। हम सभी भारतीय हैं और साथ मिलकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। हम सभी एक साथ खड़े हैं, भले ही हम अनेक हों।

सारांश

इस कविता में कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने भारत की विविधता और एकता का सुंदर चित्रण किया है। उन्होंने बताया कि भले ही हमारे देश में अनेक भाषाएँ, रंग, और रीति-रिवाज हों, फिर भी हम सभी एक हैं। यह कविता हमें सिखाती है कि हमें अपनी विविधता का सम्मान करना चाहिए और एकता बनाए रखनी चाहिए।

17. बोलने वाली माँद – पाठ का सार

परिचय

इस अध्याय में एक चालाक सियार और भूखे सिंह की कहानी बताई गई है। यह कहानी जंगल में एक सिंह और सियार के बीच की चालाकी और होशियारी को दिखाती है, जिसमें सियार अपनी सूझबूझ से सिंह को धोखा देकर अपनी जान बचाता है।

व्याख्या

एक दिन जंगल में एक सिंह, जिसका नाम खरनखर था, बहुत भूखा था। वह दिनभर आहार की खोज में इधर-उधर भटकता रहा, लेकिन उसे कुछ भी खाने को नहीं मिला। शाम होने पर उसे एक माँद दिखी, और वह वहाँ रात बिताने के लिए घुस गया। सिंह ने सोचा कि जब माँद का असली निवासी लौटेगा, तब वह उसे मारकर खा जाएगा। 

उस माँद में एक सियार रहता था, जिसका नाम दधिपुच्छ था। जब सियार वापस आया, तो उसने देखा कि सिंह के पैरों के निशान माँद में जा रहे हैं, लेकिन बाहर नहीं आ रहे। उसे समझ में आ गया कि सिंह माँद के अंदर ही छिपा है। सियार ने अपनी जान बचाने के लिए एक योजना बनाई। 

सियार ने माँद के बाहर खड़े होकर माँद को पुकारा और कहा, “ऐ मेरी माँद, आज तू क्यों नहीं बोल रही? पहले तो तू मुझे बुलाने पर हमेशा जवाब देती थी। अगर आज तूने जवाब नहीं दिया, तो मैं किसी और माँद में चला जाऊँगा।” सिंह ने सोचा कि सचमुच माँद जवाब देती होगी, इसलिए उसने सियार के बदले खुद जवाब दिया। सिंह की दहाड़ सुनते ही सियार समझ गया कि उसकी योजना काम कर गई, और वह वहाँ से भाग गया।

सारांश

यह कहानी हमें सिखाती है कि बुद्धिमानी और सूझबूझ से बड़ी से बड़ी मुसीबत से भी बचा जा सकता है। सियार ने अपनी चालाकी से सिंह को बेवकूफ बनाया और अपनी जान बचाई।

16. चंद्रयान (संवाद) – पाठ का सार

परिचय

इस अध्याय में चाँद और चंद्रयान मिशन के बारे में एक रोचक बातचीत बताई गई है। इसमें अध्यापिका और विद्यार्थियों के बीच चाँदचंद्रयान, और भारत के वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर चर्चा की गई है।

व्याख्या

अध्यापिका जब कक्षा में आती हैं, तो बच्चों से चाँद के बारे में बातचीत शुरू करती हैं। बच्चे बताते हैं कि उन्होंने चाँद देखा है, लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि चाँद कभी दिखाई देता है और कभी नहीं। एक बच्चा मजाकिया ढंग से कहता है कि चाँद का मन है, वह कभी दिखता है और कभी नहीं। इसके बाद बातचीत चंद्रयान मिशन की ओर मुड़ती है। बच्चे बताते हैं कि वे चंद्रयान-1, 2 और 3 के बारे में जानते हैं। अध्यापिका उन्हें समझाती हैं कि चंद्रयान-3 के माध्यम से भारत ने चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की है, और यह हमारे देश के लिए गर्व की बात है।

बच्चों में यह जानने की उत्सुकता बढ़ती है कि चाँद पर क्या है। अध्यापिका उन्हें बताती हैं कि चाँद पर ‘विक्रम लैंडर‘ और ‘प्रज्ञान’ नामक मशीनें भेजी गई हैं, जो चाँद की मिट्टी और अन्य जानकारियाँ इकट्ठा कर रही हैं। यह जानकर बच्चे और भी उत्साहित हो जाते हैं और कहते हैं कि उनका भी मन करता है कि वे चाँद पर जाएँ। वे गाने के माध्यम से अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं और कल्पना करते हैं कि वे चंद्रयान से चाँद की सैर करेंगे।

अध्याय में बच्चों की चाँद के प्रति जिज्ञासा और विज्ञान के प्रति उनके बढ़ते आकर्षण को बड़े ही सरल और रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यह अध्याय विज्ञान और खोज की भावना को बढ़ावा देता है।

सारांश

यह अध्याय चाँद और चंद्रयान मिशन के बारे में बच्चों की बातचीत पर आधारित है। इसमें यह बताया गया है कि कैसे वैज्ञानिक प्रयासों और निरंतर मेहनत से बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। यह बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि और गर्व की भावना को जगाने वाला अध्याय है, जिसमें सरल शब्दों में बच्चों को चाँद और चंद्रयान की जानकारी दी गई है।

15. भारत – पाठ का सार

परिचय

इस कविता “भारत तू है हमको प्यारा” को सोहन लाल त्रिवेदी जी ने लिखा है। इसमें भारत देश की सुंदरतापेड़-पौधेनदियाँ और उसकी संस्कृति की बात की गई है। यह कविता हमें भारत की महानता और पवित्रता के बारे में सिखाती है।

पहला प्रसंग:

“भारत तू है हमको प्यारा,

तू है सब देशों से न्यारा।

मुकुट हिमालय तेरा सुंदर,

धोता तेरे चरण समुद्र।”

व्याख्या: यहाँ कवि ने भारत के प्रति अपने प्यार और श्रद्धा को प्रकट किया है। भारत के लिए हिमालय मुकुट जैसा है और समुद्र इसके चरणों को धोता है, जो इसकी विशालता और सुंदरता को दर्शाता है।

दूसरा प्रसंग:

“गंगा यमुना की है धारा,

जिनसे है पावन जग सारा।

अन्न, फूल, फल, जल हैं प्यारे,

तुझमें रत्न जवाहर न्यारें।”

व्याख्या: इस हिस्से में कवि गंगा और यमुना की पवित्रता का वर्णन कर रहा है। इन नदियों से सारा संसार पावन होता है। भारत के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं, जैसे अन्न, फूल, फल और जल, जो इसकी अनमोल संपत्ति हैं।

तीसरा प्रसंग:

“राम कृष्ण का अंतर्यामी,

तेरे सभी पुत्र हैं नामी।

हम सदैव तेरा गुण गाएँ,

सब विधि तेरा सुयश बढ़ाएँ।”

व्याख्या: यहाँ कवि भगवान राम और कृष्ण का नाम लेते हुए भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का गुणगान करता है। भारत के सभी नागरिक महान और नामी हैं। कवि कहता है कि हम हमेशा भारत का गुणगान करते रहेंगे और उसकी महिमा को बढ़ाएँगे।

सारांश:

इस कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, उसके संसाधनों और उसकी परंपराएँ और रीति-रिवाज का वर्णन किया गया है। यह कविता हमें सिखाती है कि हमें अपने देश पर गर्व करना चाहिए और उसकी महिमा को सदैव बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

14. किसान की होशियारी – पाठ का सार

परिचय

इस कहानी में एक चतुर किसान और एक भालू के बीच के संवाद को दिखाया गया है। कहानी का मुख्य विषय फसल का बंटवारा है, जिसमें दोनों पात्र अपने-अपने हिस्से के लिए समझौता करते हैं। किसान अपनी बुद्धिमत्ता से भालू को बार-बार मात देता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि चतुराई और समझदारी से किसी भी बड़ी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।

व्याख्या

कहानी का प्रारंभ और प्रस्ताव

 एक साधारण दिन में, जब किसान खेत में काम कर रहा होता है, तभी अचानक एक भालू उस पर हमला करने आ जाता है। किसान, भालू को रोकने के लिए और स्थिति को संभालने के लिए, उसे फसल का हिस्सा देने की पेशकश करता है। इससे किसान न केवल खुद को बचाता है बल्कि भालू को भी समझौते में शामिल करता है।

पहला समझौता – आलू की फसल

भालू, फसल के ऊपरी हिस्से को चुनता है, जिस पर किसान चतुराई से आलू बोता है। आलू एक ऐसी फसल है जिसका खाने योग्य हिस्सा जमीन के नीचे होता है और पत्तियाँ ऊपर होती हैं। इस चतुराई से किसान भालू को सिर्फ सूखे पत्ते थमा देता है, जबकि सारे आलू अपने पास रख लेता है।

भालू की प्रतिक्रिया और दूसरा समझौता

जब भालू को पता चलता है कि उसे खाली हाथ छोड़ दिया गया है, वह बहुत निराश होता है और अगली बार फसल के नीचे के हिस्से को चुनता है। इस बार किसान गेहूं बोता है, जिसमें दाने ऊपर होते हैं और जड़ें नीचे होती हैं।

किसान का दूसरी बार जीतना

जब गेहूं की फसल तैयार होती है, तो किसान को दाने मिलते हैं और भालू को फिर से बेकार की जड़ें मिलती हैं। भालू इस बार भी ठगा हुआ महसूस करता है, और उसे यह एहसास होता है कि किसान ने फिर से उसे चतुराई से मात दी है।

तीसरा समझौता

 भालू अब फसल के ऊपरी और निचले हिस्से दोनों की मांग करता है। इस बार किसान गन्ना लगाता है, जिसका उपयोगी हिस्सा मध्य में होता है। फसल तैयार होने पर, भालू को फिर से निराशा हाथ लगती है क्योंकि उसे केवल गन्ने के ऊपरी पत्ते और निचली जड़ें मिलती हैं, जबकि सारा मीठा हिस्सा किसान के पास रहता है।

भालू का अंतिम समझ

 इस घटना के बाद भालू समझ जाता है कि किसान ने उसे कैसे चालाकी से हराया है। वह किसान की बुद्धिमत्ता की सराहना करता है और उससे सीखने की कोशिश करता है। भालू ने इस अनुभव से यह सीखा कि सिर्फ शक्ति ही सब कुछ नहीं होती, बुद्धिमत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

सारांश

कहानी “किसान की होशियारी” हमें सिखाती है कि कैसे बुद्धि और चतुराई से बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है। किसान के जैसे, हमें भी समस्याओं का समाधान चतुराई से करना चाहिए और कभी भी परिस्थितियों के आगे हार नहीं माननी चाहिए। यह कहानी यह भी दिखाती है कि कैसे अनुभव और ज्ञान हमें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

13.  पेड़ों की अम्मा थिम्मक्का – पाठ का सार

परिचय

इस कहानी में हम ‘सल्मरदा सथमकका’ के बारे में जानेंगे, जिन्हें लोग ‘अम्मा’ और ‘वृक्षमाता’ के नाम से भी जानते हैं। वह कर्नाटक की रहने वाली हैं और उन्होंने अपने जीवन में 8000 से अधिक पेड़ लगाए हैं।

व्याख्या

सथमकका को लोग ‘अम्मा’ और ‘वृक्षमाता’ के नाम से भी जानते हैं। वह कर्नाटक के तुमकुर जिले में पैदा हुई थीं और वहीं बड़ी हुईं। अम्मा ने बहुत सारे पेड़ लगाए और अपने आस-पास के जगह को सुंदर बनाया।

जब वह छोटी थीं, तब से ही उन्होंने पेड़ लगाना शुरू कर दिया था। उन्होंने 8000 से भी ज्यादा पेड़ लगाए हैं। अम्मा को पेड़ बहुत पसंद थे और वह चाहती थीं कि सब जगह हरियाली हो।

अम्मा ने अपने 107 वर्ष की उम्र में भी काम करना जारी रखा। इस उम्र में भी वह बहुत सक्रिय रहती हैं और पेड़ लगाने का उनका जुनून कम नहीं हुआ है। वह यह दिखाती हैं कि उम्र सिर्फ एक संख्या है, और अगर हमारे अंदर जुनून हो तो हम किसी भी उम्र में कुछ भी कर सकते हैं।

अम्मा को यह काम करने में कई मुश्किलें आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बहुत मेहनत की और लोगों को भी पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया।

उनके इस महान काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया। यह बहुत बड़ा सम्मान होता है और यह उनके कड़ी मेहनत की वजह से मिला।

सारांश

अम्मा की कहानी हमें बहुत कुछ सिखाती है। उन्होंने हमें दिखाया कि कैसे लगन और मेहनत से हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी उम्र की परवाह किए बिना अपने सपनों के पीछे भागना चाहिए। अम्मा ने हमें यह भी सिखाया कि पर्यावरण की देखभाल करना कितना जरूरी है। उनकी मेहनत और समर्पण हमें प्रेरित करते हैं कि हम भी अपने आस-पास की दुनिया को बेहतर बनाने के लिए काम करें।

12. अपना अपना काम – पाठ का सार

कहानी का परिचय

इस अध्याय में हम सिमरन की कहानी पढ़ेंगे, जो अपनी पढ़ाई से थक गई है और चाहती है कि वह भी उड़ने वाली एक मधुमक्खी बन जाए। यह कहानी हमें बताती है कि हर काम में मेहनत होती है, चाहे वह पढ़ाई हो या फिर मधुमक्खी का उड़ना।

कहानी की व्याख्या

सिमरन हमेशा पढ़ाई में व्यस्त रहती है जिसे वाह थक जाती है इसलिए उसने एक दिन उसने सोचा कि काश वह भी मधुमक्खी की तरह खुले आसमान में उड़ सकती। उसे लगा कि मधुमक्खियों का जीवन कितना आसान होगा, सिर्फ उड़ते रहना और फूलों से शहद इकट्ठा करना।

लेकिन जब सिमरन ने गौर से देखा तो उसे समझ में आया कि मधुमक्खियों को भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है। वे दिन भर फूलों से फूलों तक उड़ती रहती हैं और शहद बनाने के लिए पराग को इकट्ठा करती हैं। यह काम इतना आसान नहीं होता जितना सिमरन ने सोचा था।

इसके बाद सिमरन ने पेड़ की ओर देखा और सोचा कि पेड़ होना कितना आरामदायक होता। लेकिन पेड़ ने उसे बताया कि वह भी बिना रुके काम करता है, उसकी जड़ें पानी खींचती हैं और पत्तियां भोजन बनाती हैं।

फिर सिमरन ने चिड़ियों को देखा, जो दाना खोजने में दिनभर उड़ती रहती थीं। चिड़िया ने बताया कि उसे एक-एक दाना खोजने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है और घोंसला बनाने के लिए भी बहुत परिश्रम करना पड़ता है।

यह सब जानने के बाद, सिमरन को समझ आया कि हर कोई अपने-अपने काम में मेहनत करता है। चाहे वह मधुमक्खी हो या पेड़, हर किसी का काम महत्वपूर्ण और मेहनत भरा होता है। सिमरन ने सोचा कि अगर सभी मेहनत करते हैं, तो उसे भी अपनी पढ़ाई में मन लगाना चाहिए और पूरी मेहनत से अपना काम करना चाहिए।

कहानी का सारांश

इस कहानी से सिमरन ने सीखा कि हर काम मेहनत से होता है। चाहे मधुमक्खी हो या पेड़, सबको अपना काम करने में मेहनत करनी पड़ती है। सिमरन को समझ आया कि पढ़ाई भी मेहनत का काम है और उसे मन लगाकर करनी चाहिए। इस कहानी से हम सीखते हैं कि मेहनत और धैर्य से ही सफलता मिलती है।

11. एक जादुई पिटारा – पाठ का सार

परिचय

यह कविता “जादुई पिटारा” की है। जादुई पिटारा एक ऐसा खास डब्बा है जिसमें से बहुत सारी जादुई और मजेदार चीजें निकलती हैं। जब हम इसे खोलते हैं, तो हर बार कुछ नया और अच्छा दिखता है। ये सभी चीजें हमें बहुत हैरान करती हैं और हमें एक कल्पनाओं की दुनिया में ले जाती हैं जहाँ हर चीज बहुत खास होती है। इस कविता से हमें पता चलता है कि कल्पना करना कितना मजेदार होता है और हर छोटी चीज में भी कुछ नया सीखने को मिलता है। आइए, इसे आसान शब्दों में समझते हैं:

पहला प्रसंग:

एक पिटारा हमने खोला,
उसमें से निकला गप्पू गोला।
गोले पर जब बाँधी सुतली,
लगा नाचने बन कठपुतली।

व्याख्या: यहाँ कवि हमें बता रहे हैं कि जब उन्होंने जादुई पिटारा खोला, तो उसमें से गप्पू गोला नाम की एक गोलाकार गुड़िया निकली। जब इस गुड़िया को एक रस्सी से बाँधा गया, तो वह नाचने लगी मानो वह कठपुतली हो।

दूसरा प्रसंग:

कठपुतली ने गाड़े खूँट,
उसमें निकले नौ सौ ऊँट।
उन ऊँटों पर हुई सवारी,
मिली राह में एक सुपारी।

व्याख्या: कवि कहता है कि कठपुतली ने जमीन में खूंटे गाड़े और वहां से नौ सौ ऊँट निकले। ये ऊँट इतने ज्यादा थे कि उन पर सवारी की जा सकती थी। फिर जब वे ऊँटों पर सवार होकर चले, तो रास्ते में उन्हें एक सुपारी मिली।

तीसरा प्रसंग:

उसी सुपारी को जब काटा,
उसमें निकला नौ मन आटा।
उस आटे पर नारियल फोड़ा,
उसमें निकल पड़ा इक घोड़ा।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब उन्होंने सुपारी को काटा, तो उसमें से बहुत सारा आटा निकला, जितना कि नौ मन के बराबर हो। फिर जब उस आटे पर नारियल फोड़ा गया, तो वहां से एक घोड़ा निकला।

चौथा प्रसंग:

घोड़े को जब ऐंड लगाई,
आसमान ले पहुँचा भाई।
पाया वहाँ एक गुब्बारा,
जिस पर छेद हुए थे बारा।

व्याख्या: कवि आगे कहता है कि जब घोड़े को एड़ लगाई गई, तो वह उड़कर आसमान में पहुँच गया। वहाँ उसे एक गुब्बारा मिला, जिसमें बारह छेद थे। 

पाँचवां प्रसंग:

एक छेद पर था इस्टेशन,
जिस पर खड़ा हुआ था इंजन।
उस इंजन को धोया ऐसे,
उसमें निकल पड़े दो भैंसे।

व्याख्या: कवि कहता है कि उन बारह छेदों में से एक छेद पर एक स्टेशन था, जहाँ एक इंजन खड़ा हुआ था। जब उस इंजन को धोया गया, तो उसमें से दो भैंसे निकल आए।

छठा प्रसंग:

भैंसे लाकर जोता खेत,
नाज हुआ बारह सौ सेर।
खा-खा नाज हुए दीवाने,
चले चाल, बेहद मस्ताने।

व्याख्या: अंतिम पंक्तियों में कवि कहता है कि भैंसों को लाकर खेत में जोता गया, जिससे बारह सौ सेर अनाज उगा। फिर जब उस अनाज को खाया गया, तो सभी बहुत खुश और मस्त हो गए।

सारांश

इस कविता के माध्यम से हमने सीखा कि जादुई दुनिया में कुछ भी संभव है और हर चीज़ में कोई न कोई रोचक रहस्य छिपा होता है। यह कविता हमें बताती है कि कल्पना की दुनिया में जाकर हम अपने मन की उड़ान को कितना भी विस्तार दे सकते हैं। अंत में, हमें यह भी सिखने को मिलता है कि हर असंभव सी लगने वाली चीज़ में भी संभावनाएँ छिपी होती हैं और हमें हमेशा नए अनुभवों के लिए खुले रहना चाहिए।

10.  रस्साकशी – पाठ का सार

कविता का परिचय

यह कविता “ज़ोर लगाओ, हेंई सा!” को कन्हैया लाल “मत्त” जी ने लिखा है। इस कविता में समूह में खेलते हुए बच्चों की मस्ती और उनकी मेहनत का चित्रण किया गया है। रस्साकशी खेल के माध्यम से कवि ने बच्चों की एकताजोश, और मेहनत को दर्शाया है। कविता सरल भाषा में लिखी गई है, जो बच्चों को मेहनत और टीमवर्क की सीख देती है।

कविता की व्याख्या

पहला प्रसंग:

“ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!

सीना ताने रहो अकड़ कर,

रस्सा दोनों और पकड़ कर,

तिरछे पड़ कर, कमर जकड़ कर,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: यहाँ कवि बच्चों को खेलते समय सीना तानकर और मजबूती से रस्से को पकड़कर खींचने के लिए कह रहे हैं। वे खेल में पूरी ताकत लगाने और ध्यान से खेलने की प्रेरणा दे रहे हैं।

दूसरा प्रसंग:

खींचो, खींचो, ज़ोर लगाओ,

पैर गड़ा कर, पीठ अड़ाओ,

आड़ी-तिरछी चाल भिड़ाओ,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: इस हिस्से में बच्चों को पैर मजबूती से ज़मीन पर गड़ाने और पूरी ताकत से रस्से को खींचने का तरीका बताया गया है। कवि खेलते समय आड़ी-तिरछी चाल से जीतने की कोशिश की बात कर रहे हैं।

तीसरा प्रसंग:

“रस्सा नहीं फिसलने पाए,

साथी नहीं बिचलने पाए,

जोश-खरोश न ढलने पाए,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: यहाँ कवि बच्चों को यह समझाते हैं कि खेल में रस्से को मजबूती से पकड़कर रखना जरूरी है ताकि वह फिसल न सके। साथी खिलाड़ियों को भी ध्यान से खेलना चाहिए ताकि कोई गड़बड़ न हो। कवि बच्चों को जोश और उत्साह बनाए रखने की बात करते हैं, ताकि वे खेल में पूरी शक्ति से लगे रहें।

चौथा प्रसंग:

“हुए पसीने से तर सारे,

सफल हुए सब दाँव करारे,

इधर हमारे, उधर तुम्हारे,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: कवि बच्चों की मेहनत का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सबके पसीने से तर हो जाने के बाद भी वे हार नहीं मानते। हर दांव पर जीतने की कोशिश होती है और एक-दूसरे को टक्कर देने का हौसला दिखाते हैं।

कविता का सारांश

इस कविता में बच्चों के खेल रस्साकशी का शानदार चित्रण किया गया है। कवि ने मेहनतएकता, और जोश को बड़े सरल और मजेदार तरीके से प्रस्तुत किया है। यह कविता बच्चों को मिलकर काम करने और अपनी पूरी ताकत लगाने की प्रेरणा देती है।

09. प्रकृति पर्व – फूलदेई – पाठ का सार

कहानी का परिचय

यह कहानी जानकी और उसके दोस्तों की है जो उत्तराखंड के प्रसिद्ध त्योहार ‘फूलदेई’ को मनाने के लिए तैयार हो रहे थे। फूलदेई बच्चों द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक पर्व है, जो वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक होता है। इस दिन बच्चे फूलों की डलियों में फूल एकत्रित करते हैं और घर-घर जाकर समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।

कहानी की व्याख्या

जानकी बहुत खुश थी क्योंकि अगले दिन वह अपने दोस्तों के साथ फूलदेई पर्व मनाने जाने वाली थी। उसकी माँ ने उसे सुबह जल्दी उठा दिया। नहाने के बाद, वह अपनी छोटी डलिया लेकर फूल चुनने निकल पड़ी। आँगन में पहुँचते ही उसने हेमा, गीता, राधा, बीर, गोविंद और मनोज को बुलाया। सभी दोस्त अपनी-अपनी डलियाँ लेकर जंगल की ओर फूल चुनने चले गए।

फूलदेई उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध त्योहार है, जिसे खासकर बच्चे मनाते हैं। इसलिए इसे ‘बाल पर्व‘ भी कहा जाता है। यह त्योहार चैत्र मास की संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जो हिन्दू नववर्ष का पहला महीना होता है। फूलदेई वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। इस समय पहाड़ियों की बर्फ पिघलने लगती है और सर्दियों का अंत हो जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ फूलों से भर जाते हैं।

जानकी और उसके दोस्तों ने बुराँस, फ्योंली और अन्य प्रकार के फूल अपनी डलियों में भर लिए। अब यह टोली, जिसे ‘फूलारी’ कहा जाता है, हर घर के मुख्य दरवाजे पर जाकर अक्षत और फूल चढ़ाती है और गीत गाती है—

फूल देई, छम्मा देई,
दैणी द्वार, भर भकार
ये देली कैं बार-बार नमस्कार
फूले द्वार…

इसका अर्थ है, “आपकी देहली फूलों से भरी रहे, सब मंगलकारी हो, सभी को क्षमा मिले, सभी की रक्षा हो, और घर में समृद्धि बनी रहे। अन्न के भंडार भरे रहें।”  सभी घरों में फूलारी के स्वागत की तैयारी की जाती है। घरों को साफ-सुथरा करके देहली को गोबर-मिट्टी से लीपा जाता है। जब फूलारी आशीर्वाद देते हुए गाती है, तब घरों से उन्हें चावल, गुड़ और पैसे दिए जाते हैं। जानकी और उसके दोस्त दिनभर यह काम करते हुए थक जाते हैं, लेकिन वे बहुत खुश होते हैं।

फूलदेई का यह त्योहार उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में आठ दिन से लेकर एक महीने तक चलता है। बच्चे जो चावल और गुड़ इकट्ठा करते हैं, उससे हलवा, छोई, साई और पापड़ी जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं। जमा पैसों से घी या तेल खरीदा जाता है, और फिर ये व्यंजन सभी मिलकर खाते हैं।  फूलदेई बच्चों को बचपन से ही प्रकृति से प्यार और सामाजिक एकता की सीख देता है। यह त्योहार लोकगीतों, परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है। साथ ही, यह पर्व हमें अपनी संस्कृति और प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

कहानी का सारांश

यह कहानी हमे सिखाती है कि हमें प्रकृति से प्रेम और सामाजिक एकता को बनाए रखना चाहिए। त्योहारों के माध्यम से हम परंपराओं से जुड़ते और खुशियाँ बाँटते हैं।