08. चतुर गीदड़ – पाठ का सार

कहानी का परिचय

इस कहानी में एक चतुर गीदड़ और भूखे मगरमच्छ की कहानी बताई गई है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कभी-कभी अपनी चतुराई से बड़ी समस्या से बचा जा सकता है। साथ ही, यह भी दिखाती है कि गलतफहमी और लालच से किसी को नुकसान हो सकता है।

कहानी की व्याख्या

पहला दृश्य: तालाब का किनारा

मगरमच्छ तालाब के किनारे बैठा सोच रहा है कि उसने सारी मछलियाँ खा ली हैं और अब खाने को कुछ नहीं बचा है। उसे बहुत भूख लगी है। वह सोचता है कि अगर गीदड़ मिल जाए तो उसकी भूख मिट सकती है, लेकिन गीदड़ बहुत चतुर है और आसानी से पकड़ में नहीं आता। 

तभी उसका मित्र कछुआ आता है और उससे उसकी उदासी का कारण पूछता है। मगरमच्छ बताता है कि वह भूख से परेशान है और गीदड़ को खाना चाहता है। कछुआ कहता है कि गीदड़ को पकड़ना कठिन है, लेकिन वह मदद करने को तैयार है। वह मगरमच्छ के कान में एक योजना बताता है, जिससे गीदड़ को फँसाया जा सके।

दूसरा दृश्य: तालाब का किनारा

मगरमच्छ मरा हुआ बनकर तालाब के किनारे लेट जाता है और कछुआ उसके पास खड़ा होता है। दूर से गीदड़ आता दिखता है। कछुआ दुखी होकर कहता है, “हाय! मेरे प्यारे मित्र मगरमच्छ के प्राण निकल गए। अब मैं अकेला रह गया हूँ।”

गीदड़  पास आकर पूछता है कि क्या हुआ। कछुआ बताता है कि मगरमच्छ मर गया है। गीदड़ मन ही मन खुश होता है कि अब वह बिना डर के तालाब का पानी पी सकेगा। कछुआ उससे मदद मांगता है कि वे मिलकर मगरमच्छ के ऊपर सूखे पत्ते डालकर उसे ढक दें। 

गीदड़ शक करता है और कहता है कि उसने सुना है कि मरे हुए मगरमच्छ की पूँछ हिलती रहती है। वह मगरमच्छ को ध्यान से देखने लगता है। तभी मगरमच्छ की पूँछ हिलती है। गीदड़ समझ जाता है कि यह एक चाल है। वह तेजी से वहाँ से भाग जाता है। कछुआ मगरमच्छ से कहता है कि गीदड़ बहुत चतुर है और वे उसकी चाल में आ गए। अब उसे पकड़ना और भी कठिन होगा।

कहानी का सारांश

यह कहानी हमें सिखाती है कि चालाकी से किसी को मूर्ख बनाना आसान नहीं होता। गीदड़ की समझदारी और मगरमच्छ का लालच दोनों ही कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इस कहानी के माध्यम से बच्चों को सिखाया जाता है कि किसी भी परिस्थिति में हिम्मत न हारना और बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए। गीदड़ की चतुराई ने न केवल उसे अपने शिकारियों से बचाया, बल्कि यह भी सिखाया कि बुद्धिमत्ता और समझदारी से कैसे किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। 

यह कहानी बच्चों को प्रेरित करती है कि वे जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना बुद्धिमानी और चतुराई से करें।

07. मित्र को पत्र – पाठ का सार

कहानी का परिचय

यह कहानी एक पत्र के रूप में है, जिसे रूपम नाम का बच्चा अपने मित्र अभिषेक को लिखता है। इसमें वह अपनी गर्मी की छुट्टियों की यात्रा के बारे में बताता है।

कहानी का सारांश

रूपम ने अपने दोस्त अभिषेक को नमस्ते कहा और पूछा कि वह और उसका परिवार ठीक-ठाक है या नहीं। रूपम ने लिखा कि वह गर्मी की छुट्टियाँ मनाने अपने नाना-नानी के घर गुवाहाटी आया है।

गुवाहाटी असम का एक बड़ा और सुंदर शहर है। यह ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा है। यह नदी बहुत चौड़ी है और इसमें माजुली नाम का एक द्वीप स्थित है। माजुली भारत का सबसे बड़ा नदी में बना द्वीप है।

माजुली में रूपम ने एक मठ देखा, जहाँ लोग भगवान की पूजा करते हैं। वहाँ उसने सत्रिया नृत्य भी देखा, जो असम के प्रसिद्ध नृत्यों में से एक है। रूपम ने कामाख्या मंदिर भी देखा, जो एक पर्वत पर बना है। वहाँ बहुत से लोग पूजा करने आते हैं। वह उमानंद मंदिर भी गया, जहाँ पहुँचने के लिए नाव में बैठना और थोड़ा पैदल चलना पड़ता है।

चलते समय नानी ने रूपम को बताया कि खेलना बहुत जरूरी है। खेलने से शरीर स्वस्थ रहता है और पढ़ाई भी अच्छे से होती है। रूपम ने बताया कि वह अपने दोस्तों के साथ खो-खो, पिट्ठू, क्रिकेट और फुटबॉल खेलता है।

खेल की बात करते ही रूपम को अभिषेक की याद आ गई। उसने लिखा कि वह जल्दी लौटेगा और उसे अपने सारे अनुभव बताएगा। अंत में रूपम ने सभी बड़ों को प्रणाम किया।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि छुट्टियाँ केवल आराम करने के लिए नहीं होतीं, बल्कि नई जगहों को देखने और वहाँ की चीज़ों को जानने का अच्छा समय भी होती हैं। यात्रा करने से हमारा ज्ञान बढ़ता है और हम नए-नए अनुभव हासिल करते हैं। इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलना भी बहुत जरूरी है, क्योंकि खेलों से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है और मन भी खुश रहता है। साथ ही हमें अपने दोस्तों और परिवार के साथ अपने अनुभव बाँटने चाहिए, जिससे हमारे रिश्ते और भी मजबूत होते हैं।

शब्दार्थ

  • सकुशल: ठीक-ठाक, सुरक्षित
  • महानगर: बड़ा शहर
  • द्वीप: चारों ओर पानी से घिरी ज़मीन
  • विश्वप्रसिद्ध: पूरी दुनिया में प्रसिद्ध
  • मठ: साधुओं का पूजा-स्थान
  • श्रद्धालु: भगवान को मानने वाले लोग
  • दर्शन: मंदिर जाकर भगवान को देखना
  • आवश्यक: ज़रूरी
  • सत्रिया नृत्य: असम का पारंपरिक नृत्य

06. बीरबल की खिचड़ी – पाठ का सार

परिचययह कहानी अकबर और उनके बुद्धिमान दरबारी बीरबल की है। बीरबल अपनी समझदारी के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। इस कहानी में एक गाँव के व्यक्ति को अकबर ने एक चुनौती दी, और बीरबल ने अपनी चतुराई से उस व्यक्ति की मदद की, जिससे अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ।

व्याख्या

कहानी की शुरुआत अकबर के दरबार से होती है, जहाँ अनेक विद्वान और बुद्धिमान लोग होते थे। बीरबल उनमें से एक थे, जिन्हें अपनी चतुराई और बुद्धिमत्ता के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। यह उनकी चतुराई ही थी जो अक्सर बादशाह अकबर को भी प्रभावित करती थी। 

एक सर्दी के दिन, जब अकबर एक गाँव से गुजर रहे थे, उन्होंने एक व्यक्ति को यह कहते सुना कि वह यमुना नदी के पानी में रातभर खड़ा रह सकता है। अकबर ने उसे चुनौती दी कि यदि वह ऐसा कर पाता है, तो उसे थैलीभर मोहरें इनाम में देंगे।

वह व्यक्ति अपनी बात पर कायम रहा और ठंडे पानी में पूरी रात खड़ा रहा। अगली सुबह, वह बादशाह के दरबार में पहुंचा और अपनी चुनौती की सफलता की बात कही और बताया कि वह महल से आने वाले दीपक की रोशनी देखकर सारी रात खड़ा रहा। अकबर ने सोचा कि दीपक की रोशनी से उसे ठंड का एहसास कम हुआ होगा, इसलिए उसे इनाम नहीं दिया। वह व्यक्ति निराश हो गया। 

बीरबल ने इस अन्याय को देखा और एक चतुराई भरा तरीका निकाला। वे दरबार में नहीं आए और जब बादशाह ने उन्हें बुलाया, तो उन्होंने कहा कि वे खिचड़ी पका रहे हैं। अकबर जब बीरबल के घर पहुंचे तो देखा कि बीरबल ने एक लंबे बाँस पर हाँडी लटका रखी है और बहुत नीचे आग जल रही है। बीरबल ने तर्क दिया कि यदि वह व्यक्ति दीपक की गरमी से सारी रात पानी में खड़ा रह सकता है, तो इस आग से उनकी खिचड़ी क्यों नहीं पक सकती। अकबर को बीरबल की बात समझ में आ गई, और उन्होंने अपनी गलती मानी और उस व्यक्ति को उसका उचित इनाम दिया। 

सारांश

यह कहानी हमें न्याय, समझदारी, और चतुराई का महत्व सिखाती है। यह दिखाती है कि कैसे बुद्धिमत्ता और चतुराई से कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है और सही को सही साबित किया जा सकता है। 

05. आम का पेड़ – पाठ का सार

परिचय

इस अध्याय में एक लड़के सौरभ की कहानी बताई गई है, जो अपने बगीचे में आम का पौधा लगाता है और उसकी देखभाल करता है। कहानी के माध्यम से यह सिखाया गया है कि धैर्य और देखभाल से किसी भी छोटे पौधे को बड़ा पेड़ बनाया जा सकता है। 

व्याख्या

गर्मियों के दिन थे जब सौरभ के चाचाजी ने उसे अपने बगीचे से एक टोकरी भर आम भेजे। आम बहुत मीठे थे, और सौरभ को वे बेहद पसंद आए। उसने यह सोचा कि वह अपने बगीचे में भी ऐसे ही आम उगाएगा। 

सौरभ ने बगीचे में मिट्टी खोदकर एक आम की गुठली बोई। उसने उस पर मिट्टी डालकर पानी छिड़का और हर रोज़ पानी डालता रहा। कुछ दिनों तक पौधा नहीं निकला, जिससे निराश होकर उसने पानी डालना बंद कर दिया। 

एक दिन जब हल्की बारिश हो रही थी, सौरभ बगीचे में गया और देखा कि उस जगह पर एक नन्हा-सा पौधा निकल आया था, जिसमें लाल-लाल कोंपलें थीं। यह देख सौरभ बहुत खुश हुआ और उसने अपनी बहन प्रिया को भी बुलाया। दोनों भाई-बहन पौधा देखकर बहुत खुश हुए। 

सौरभ ने प्रिया को बताया कि यह आम का पौधा है और इसमें एक दिन मीठे आम लगेंगे। दोनों उत्साहित होकर पिताजी के पास पहुंचे और उन्हें यह खुशखबरी दी। पिताजी ने बताया कि इस छोटे पौधे को बड़ा होने में चार-पांच साल लगेंगे। तब जाकर यह पेड़ बनेगा और इसमें आम लगेंगे। यह सुनकर प्रिया थोड़ी उदास हो गई, पर सौरभ ने कहा कि वह इस पौधे की देखभाल करेगा और एक दिन वे अपने बगीचे के आम जरूर खाएंगे।

सारांश

यह कहानी धैर्य, मेहनत और देखभाल का महत्व बताती है। पौधों की तरह ही, जीवन में भी किसी चीज़ को बड़ा करने के लिए समय और देखभाल की आवश्यकता होती है।

04. क्या हमारी चिड़िया रानी! – पाठ का सार

परिचय

इस कविता को महादेवी वर्मा जी ने लिखा है। यह कविता एक छोटी चिड़िया की कहानी बताती है, जो बहुत ध्यान से अपना घोंसला बनाती है, उसमें अंडे देती है, और फिर अपने बच्चों की देखभाल करती है। इस कविता में प्रकृति और जीवन के सुंदर तरीके को समझाया गया है। आइए, इसे आसान शब्दों में समझते हैं:व्याख्या
पहला प्रसंग:

“बया हमारी चिड़िया रानी! 
तिनके लाकर महल बनाती, 
ऊँची डाली पर लटकाती,
खेतों से फिर दाना लाती, 
नदियों से भर लाती पानी।”

व्याख्या: यहाँ कवि हमें चिड़िया की मेहनत और उसके घोंसले की सुंदरता के बारे में बता रहे हैं। चिड़िया तिनके इकट्ठा करके एक मजबूत और सुंदर घोंसला बनाती है, जिसे वह एक   ऊँची डाली पर रखती है। वह अपने और अपने बच्चों के खाने के लिए खेतों से दाने और नदियों से पानी लाती है।

दूसरा प्रसंग:

“तुझको दूर न जाने देंगे, 
दानों से आँगन भर देंगे, 
और हौज में भर देंगे हम, 
मीठा-मीठा ठंडा पानी।”

व्याख्या: कवि कहता है कि हम बया चिड़िया को कभी दूर नहीं जाने देंगे। हम अपने आँगन को दानों से भर देंगे और हौज में मीठा और ठंडा पानी भर देंगे ताकि चिड़िया को कहीं और जाने की जरूरत न पड़े।

तीसरा प्रसंग:

“फिर अंडे सेयेगी तू जब, 
निकलेंगे नन्हें बच्चे तब, 
हम आकर बारी-बारी से, 
कर लेंगे उनकी निगरानी।”

व्याख्या: कवि आगे कहता है कि जब बया चिड़िया के अंडों से नन्हे बच्चे निकलेंगे, तो हम बारी-बारी से उनकी देखभाल करेंगे। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि वे सुरक्षित रहें और अच्छे से बड़े हों।

चौथा प्रसंग:

“फिर जब उनके पर निकलेंगे,
उड़ जाएँगे बया बनेंगे, 
हम तब तेरे पास रहेंगे, 
तू मत रोना चिड़िया रानी।”

व्याख्या: अंतिम पंक्तियों में कवि कहता है कि जब बया के बच्चों के पंख निकल आएँगे और वे उड़ने लगेंगे, तो वे भी बया चिड़िया बन जाएँगे। तब भी हम तुम्हारे पास रहेंगे, इसलिए चिड़िया रानी तुम उदास मत होना।

सारांश

इस कविता में कवि महादेवी वर्मा ने बया चिड़िया की मेहनत और उसकी देखभाल की जरूरत को बताया है। कविता हमें सिखाती है कि हमें चिड़िया और दूसरे जानवरों की मदद और उनकी सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए, ताकि वे सुरक्षित और खुश रहें। कविता हमें प्रकृति और जानवरों के प्रति प्यार और जिम्मेदारी सिखाती है।

03. कितने पैर? – पाठ का सार

परिचय                                                                        

इस अध्याय में विभिन्न जीवों के पैरों की संख्या के बारे में बताया गया है। इसमें अध्यापिका और छात्र-छात्राओं के बीच जीवों और कीटों के पैरों की संख्या पर चर्चा की गई है। यह चर्चा बच्चों को यह समझने में मदद करती है कि विभिन्न जीवों के शरीर की संरचना कितनी अलग होती है।

व्याख्या

अध्याय की शुरुआत में, अध्यापिका बच्चों को यह बताती हैं कि जीवों के पैरों की संख्या अलग-अलग हो सकती है। कुछ जीवों के पैर बिल्कुल नहीं होते, जबकि कुछ के कई सौ पैर भी हो सकते हैं। बच्चों की उत्सुकता और उनके जवाब इस बातचीत को और भी दिलचस्प बना देते हैं। इस चर्चा के माध्यम से, पाठकों को जीवों के बारे में बुनियादी बातें समझ में आती हैं और वे प्रकृति की अनोखी विविधता की कदर करना सीखते हैं।

धरती पर जीवों के पैरों की संख्या

  • अध्यापिका बच्चों के साथ एक दिलचस्प बातचीत करती हैं, जिसमें वे उनसे पूछती हैं कि जीवों के पैरों की संख्या कितनी हो सकती है।  
  • बच्चे अपने अनुभव साझा करते हैं, जैसे कि बरसात में केंचुए कैसे पेट के बल सरकते हैं और उनके पैर नहीं होते। 
  • इस प्रकार, बच्चों को यह समझ में आता है कि कुछ जीव बिना पैरों के भी जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

द्विपाद और चार पैरों वाले जीव

  • अध्यापिका बच्चों को द्विपाद (दो पैरों वाले) और चतुष्पाद (चार पैरों वाले) जीवों के बारे में जानकारी देती हैं। 
  • वे बच्चों से पूछती हैं कि वे कौन-कौन से जीव जानते हैं जो द्विपाद या चतुष्पाद होते हैं। 
  • बच्चे अपने ज्ञान के अनुसार विभिन्न जीवों के नाम बताते हैं, जैसे कि कबूतर, तोता, गाय, भैंस, कुत्ता, बिल्ली, शेर आदि। 
  • इस चर्चा के माध्यम से, बच्चों को यह समझ में आता है कि ज्यादातर बड़े जानवर चार पैरों वाले होते हैं, जो उन्हें स्थिरता और चलने में मदद करते हैं, जबकि कुछ जीव दो पैरों पर भी चलते हैं। 

कीटों के पैरों की संख्या

  • अध्यापिका बच्चों से पूछती हैं कि कीटों के पैरों की संख्या कितनी होती है। बच्चे अपने अनुभवों को साझा करते हैं, जैसे कि चींटी के पैर कितने होते हैं। 
  • अध्यापिका उन्हें बताती हैं कि अधिकांश कीटों, जैसे चींटी, मक्खी, तितली, के छह पैर होते हैं। वे बच्चों से यह भी पूछती हैं कि क्या वे कोई ऐसा कीट जानते हैं जिसके पैर छह से अधिक होते हैं। 
  • इस चर्चा से बच्चों को यह ज्ञान मिलता है कि कीट छोटे होते हुए भी विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं और उनकी शारीरिक संरचना भी विभिन्न होती है।

कनखजूरा 

  • अध्यापिका बच्चों को कनखजूरा के बारे में बताती हैं, जिसके पैरों की संख्या अत्यधिक हो सकती है। वे बच्चों से पूछती हैं कि क्या उन्होंने कभी कनखजूरा देखा है। \
  • इसके बाद, अध्यापिका उन्हें बताती हैं कि कनखजूरा आमतौर पर गीली और अंधेरी जगहों में पाया जाता है, जैसे कि गीले पेड़ के तने या गीली घास में। इस वजह से उसे देख पाना कठिन होता है। 
  • कनखजूरा के बारे में जानकर बच्चे यह समझते हैं कि धरती पर ऐसे भी जीव होते हैं जिनकी संरचना बहुत ही अनोखी होती है।

सारांश

यह अध्याय बच्चों को जीवों और कीटों के पैरों की संख्या के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है। यह उनके ज्ञान को बढ़ाता है और उन्हें अपने आस-पास के पर्यावरण के प्रति और अधिक जागरूक बनाता है। इस प्रकार, बच्चों की समझ में सुधार होता है और वे जीवन की विविधता को और बेहतर तरीके से समझने लगते हैं।

02.चींटी- पाठ का सार

कविता का परिचय

यह कविता प्रकाश मनु जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में चींटी के जीवन की मेहनत, लगन और साहस को बहुत सुंदर शब्दों में बताया गया है। यह कविता हमें सिखाती है कि कैसे एक छोटी-सी चींटी भी बड़ा काम कर सकती है।

कविता का सारांश

यह कविता हमें चींटी से सीखने को कहती है। चींटी कभी आलस नहीं करती। वह छोटी होते हुए भी हमेशा मेहनत करती है। चाहे रास्ता कठिन हो या मौसम खराब, वह हार नहीं मानती। चींटी हमें सिखाती है कि अगर हम भी मेहनत और हिम्मत से काम करें, तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है।

कविता की व्याख्या
पहला प्रसंग:

हर पल चलती जाती चींटी,
श्रम का राग सुनाती चींटी।

कड़ी धूप हो या हो वर्षा,
दाना चुनकर लाती चींटी।

सचमुच कैसी कलाकार है,
घर को खूब सजाती चींटी।

व्याख्या: कवि कह रहे हैं कि चींटी हमेशा काम करती रहती है और हमें मेहनत करना सिखाती है। वह कभी नहीं रुकती। चाहे तेज धूप हो या बारिश, वह दाने इकट्ठा करती रहती है। चींटी अपना घर खुद बनाती है और उसे सुंदर भी बनाती है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें भी हर समय मेहनत करते रहना चाहिए, चाहे हालत जैसे भी हों। अगर हम लगातार काम करते रहेंगे, तो हम जरूर सफल होंगे।

दूसरा प्रसंग:

छोटा तन पर बड़े इरादे,
नहीं कभी घबराती चींटी।

नन्हे-नन्हे पैर बढ़ाकर,
पर्वत पर चढ़ जाती चींटी।

काम बड़े करके दिखलाती,
जहाँ कहीं अड़ जाती चींटी।

मेहनत ही पूजा है प्रभु की,
हमको यही सिखाती चींटी।

व्याख्या: कवि कह रहे हैं कि छोटा शरीर होने पर भी चींटी के इरादे बहुत मजबूत होते हैं। वह अपने नन्हे-नन्हे पैरों से पहाड़ पर भी चढ़ जाती है। वह हमें यह सिखाती है कि मेहनत करना ही भगवान की सच्ची पूजा है। इसी तरह, हमारा शरीर चाहे छोटा हो, लेकिन हमारी सोच और इरादे बड़े होने चाहिए। हमें मुश्किल समय में डरना नहीं चाहिए। धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहना चाहिए और अपने लक्ष्य तक पहुँचने की कोशिश करते रहना चाहिए। हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए और मेहनत को सबसे बड़ा धर्म मानना चाहिए।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा मेहनत करते रहना चाहिए। चींटी बहुत छोटी होती है, फिर भी वह कभी रुकती नहीं, डरती नहीं और हर मौसम में काम करती रहती है। वह हमें सिखाती है कि अगर हम लगन और हिम्मत से काम करें, तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। जैसे चींटी अपने छोटे-छोटे पैरों से पहाड़ पर चढ़ जाती है, वैसे ही हम भी मेहनत से अपने लक्ष्य को पा सकते हैं।

शब्दार्थ

  • श्रम: मेहनत, परिश्रम
  • राग: गीत, संदेश
  • कड़ी: तीव्र, तेज (जैसे: कड़ी धूप)
  • वर्षा: बारिश
  • सजाती: सुंदर बनाती, सजावट करती है
  • इरादे: संकल्प, निश्चय
  • घबराती: डरती नहीं, विचलित नहीं होती
  • पर्वत: पहाड़
  • अड़ जाती: डट जाती है, रुकती नहीं
  • पूजा: उपासना, भक्ति
  • हर पल: प्रत्येक क्षण, हमेशा
  • नन्हे-नन्हे: बहुत छोटे-छोटे
  • अग्रसर: आगे बढ़ना, प्रगति करना
  • विपरीत परिस्थितियाँ: मुश्किल हालात, कठिन समय
  • जागरूक: सतर्क, सजग

01. सीखो- पाठ का सार

कविता का परिचय

‘सीखो’ कविता श्रीनाथ सिंह जी ने लिखी है। यह कविता हमें बताती है कि हमें अपने आसपास के प्राकृतिक तत्वों से सीखना चाहिए। हमें इन प्राकृतिक चीजों से सीखना चाहिए जो हमारे जीवन में खुशी, तरक्की, और सहयोग लाती हैं।

प्रमुख बातें

  • फूलों से नित हँसना सीखो: यह हमें बताता है कि हमें हमेशा खुश रहना चाहिए, जैसे फूल हमेशा हँसते रहते हैं।
  • भौंरों से नित गाना: भौंरे अपनी मीठी आवाज में गाते हैं, हमें भी अपनी आवाज में गाना चाहिए।
  • तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना: जैसे पेड़ों की डालियाँ झुकती हैं, हमें भी विनम्रता से सिर झुकाना चाहिए।
  • सीख हवा के झोंकों से लो, कोमल भाव बहाना: हवा हमेशा हल्की और नरम होती है, हमें भी अपने भावों को कोमलता से व्यक्त करना चाहिए।
  • दूध तथा पानी से सीखो, मिलना और मिलना: दूध और पानी मिलकर एक हो जाते हैं, हमें भी सबके साथ मिलजुल कर रहना चाहिए।
  • सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना: सूरज की किरणें सबको जगाती हैं, हमें भी दूसरों को प्रेरित करना चाहिए।
  • लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना: हमें सभी के साथ प्यार और सहयोग करना चाहिए।
  • दीपक से सीखो जितना, हो सके अँधेरा हरना: हमें हमेशा सच्चाई की ओर बढ़ना चाहिए, जैसे दीपक अंधेरे को दूर करता है।
  • पृथ्वी से सीखो प्राणी की, सच्ची सेवा करना: हमें धरती और उसके सभी जीवों की सेवा और मदद करनी चाहिए।
  • जलधारा से सीखो आगे, जीवन-पथ में बढ़ना: पानी की धारा हमेशा आगे बढ़ती रहती है, हमें भी जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए।
  • और धुएँ से सीखो हरदम, ऊँचे ही पर चढ़ना: जैसे धुआं हमेशा ऊपर उठता है, हमें हमेशा चुनौतियों का सामना करना चाहिए और हमें भी हमेशा ऊँचाइयों को पाने की कोशिश करनी चाहिए।

कविता की व्याख्या

पहला प्रसंग:

फूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से नित सीखो शीश झुकाना।

सीख हवा के झोंकों से लो, कोमल भाव बहाना।
दूध तथा पानी से सीखो, मिलना और मिलाना।

सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना|
लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि जिस प्रकार फूल खिलकर अपनी सुगंध से सबके मन को प्रसन्नता से भर देते हैं, उसी प्रकार हमें फूलों से हँसने- मुसकराने की सीख लेकर चारों ओर खुशियाँ बिखेरनी चाहिए । भौंरों से अपनी धुन में मग्न रहकर गुनगुनाने की सीख लेनी चाहिए। जिस प्रकार पेड़ों की डालियाँ फल-फूलों से लदकर झुक जाती हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने गुणों का अहंकार नहीं करना चाहिए बल्कि सबसे विनम्र व्यवहार करना चाहिए। जैसे मंद हवा के झोंके सबको भले लगते हैं वैसे ही अपने मन में सबके प्रति कोमल भाव रखना हम हवा के झोंकों से सीखें। दूध और पानी जिस प्रकार मिलकर एकरूप हो जाते हैं, उसी तरह हम भी आपस में मिल-जुलकर रहना सीखें। जिस प्रकार सूरज स्वयं पहले जगकर फिर अपनी किरणें फैलाकर दूसरों को जगाता है, उसी तरह सूरज की किरणों से सीख लेकर पहले हम स्वयं सत्य के मार्ग पर चलना सीखें फिर दूसरों को भी चलने के लिए प्रेरित करें। लता और पेड़ जिस प्रकार आपस में एक-दूसरे को प्रेम से गले लगाकर एक साथ आगे बढ़ते हैं। उनसे सीख लेकर हम भी परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ें।

दूसरा प्रसंग:

दीपक से सीखो जितना हो सके अँधेरा हरना।
पृथ्वी से सीखो प्राणी की सच्ची सेवा करना।

जलधारा से सीखो आगे, जीवन-पथ में बढ़ना।
और धुएँ से सीखो हरदम, ऊँचे ही पर चढ़ना।

व्याख्या: कवि कहता है कि दीपक छोटा-सा होता है किंतु अपनी क्षमता के अनुसार अँधेरे को दूर करता है ठीक उसी प्रकार हमें भी जीवन के अँधेरों को दूर करने की सीख दीपक से लेनी चाहिए। पृथ्वी अर्थात् धरती अपने ऊपर रहने वाले सभी लोगों की चाहे वे अच्छे हैं या बुरे, सबकी सच्ची सेवा करती है। सबके साथ एक समान व्यवहार करती है। पृथ्वी से हमें सच्ची सेवा का गुण ग्रहण करना (अपनाना) चाहिए। कवि आगे कहते हैं कि हमें जलधारा अर्थात् नदी से जीवन में सदा आगे बढ़ने की सीख लेनी चाहिए। नदी के रास्ते में चाहे कितने ही पत्थर-कंकड़ आए, नदी आगे बढ़ती ही रहती है ठीक वैसे ही हमें भी चाहे कितनी ही मुश्किलें आए, जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए। इसी तरह धुएँ से हमें सदा ऊँचा उठना सीखना चाहिए। धुआँ सदा ऊपर की ओर जाता है वैसे ही हमें भी ऊँचा उठने की कोशिश करनी चाहिए।

कविता का सारांश

इस कविता में हमें सिखाया गया है कि हमें जीवन में सबके साथ मिल-जुलकर और प्यार से रहना चाहिए। हमें प्रकृति से सीखना चाहिए और उसका ख्याल रखना चाहिए। इसके अलावा, हमें अपने भावों को प्यार और नर्मी से दिखाना चाहिए और हमेशा सच्चाई और ईमानदारी से जीना चाहिए। यह कविता हमें जीवन में अच्छे बदलाव लाने के लिए प्रेरित करती है।