12. गंगा की कहानी – Chapter Notes

कहानी परिचय

यह कहानी नदी गंगा के जीवन और यात्रा के बारे में है। गंगा का जन्म हिमालय की गोद में गंगोत्री से होता है। गोमुख से निकलकर वह पहाड़ों से नीचे आती है, रास्ते में चट्टानों और घाटियों से टकराती है और अपनी धारा बढ़ाती है। गंगा कई नगरों और तीर्थों के पास से बहती है, जैसे ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, प्रयागराज और वाराणसी। वह खेतों को पानी देती है, कारखानों और लोगों की जरूरतें पूरी करती है और अंत में बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है। गंगा को लोग पवित्र मानते हैं। इस कहानी में यह भी बताया गया है कि गंगा का पानी शहरों और कारखानों के कारण गंदा हो जाता है, लेकिन अब लोगों ने इसे साफ करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।

मुख्य विषय

इस कहानी का मुख्य विषय यह है कि गंगा नदी भारत की जीवनदायिनी और पवित्र नदी है। कहानी में बताया गया है कि गंगा हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है और पहाड़ों, नगरों और तीर्थस्थलों से होकर बहती है। लोग गंगा के पानी का उपयोग पीने, खेती और उद्योगों में करते हैं। गंगा का जल समय के साथ शहरों और कारखानों के गंदे पानी से दूषित हो जाता है, लेकिन अब लोगों ने उसे साफ़ करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी जीवन, संस्कृति और पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है और इसे स्वच्छ रखना हमारी जिम्मेदारी है।

कहानी का सार

गंगा नदी का जन्म हिमालय की गोद में हुआ। गंगा नन्ही-सी धारा के रूप में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री हिमनद के गोमुख नामक स्थान से निकलती हूँ। गंगोत्री में मेरा भव्य मंदिर है, जहाँ देशभर से लोग दर्शन करने आते हैं। मेरा एक नाम भागीरथी भी है क्योंकि राजा भगीरथ ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। यहाँ से मैं पहाड़ों के बीच से बहती हुई नीचे की ओर चलती हूँ। मैं चट्टानों से टकराती, उछलती-कूदती आगे बढ़ती हूँ।

देवप्रयाग में मुझसे अलकनंदा नदी मिलती है। ऋषिकेश पहुँचने पर मैं मैदान में उतर जाती हूँ। मेरे किनारों पर साधु-संतों और महात्माओं के आश्रम हैं। कई नगर मेरे किनारे बसे हैं और कई कारखाने भी खुल गए हैं। इन सबको पानी मैं ही देती हूँ। ऋषिकेश और हरिद्वार प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं। हरिद्वार में हर बारह वर्ष बाद कुंभ मेला लगता है। हरिद्वार के पास से गंगानहर निकाली गई है, जो लाखों एकड़ जमीन को सींचती हुई उत्तर प्रदेश के कानपुर तक पहुँचती है।

कानपुर भारत का प्रसिद्ध औद्योगिक नगर है। यहाँ कपड़े, चमड़े और लोहे के कारखाने हैं। ये कारखाने मुझसे पानी पाते हैं। कानपुर से मैं प्रयागराज पहुँचती हूँ। यहाँ मेरी यमुना नदी से संगम होता है। संगम पर भी हर बारह साल में कुंभ का मेला लगता है, जिसमें लाखों लोग आते हैं।

मैं लगातार बहती रहती हूँ। वाराणसी (काशी) पहुँचकर मैं यहाँ के लोगों और तीर्थस्थलों को अपने जल से लाभ पहुँचाती हूँ। वाराणसी से आगे मैं बिहार पहुँचती हूँ। यहाँ पटना, भागलपुर जैसे नगर मेरे किनारे बसे हैं। फिर मैं पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती हूँ। यहाँ मेरी दो धाराएँ बन जाती हैं। एक धारा बांग्लादेश की ओर जाती है और वहाँ उसका नाम पद्मा है। दूसरी धारा कोलकाता की ओर जाती है और वहाँ मुझे हुगली कहते हैं। अंत में मैं बंगाल की खाड़ी में समुद्र से मिल जाती हूँ।

भारतवासी मुझे पवित्र नदी मानते हैं। गंगोत्री से निकलते समय मेरा जल चाँदी जैसा चमकता है। लेकिन काशी पहुँचने तक मेरा जल मटमैला हो जाता है क्योंकि कारखानों और शहरों का गंदा पानी मुझे दूषित कर देता है। मुझे खुशी है कि अब लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया है। मेरे जल को फिर से स्वच्छ और निर्मल बनाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। गंगा उस दिन की प्रतीक्षा करती है जब मेरा जल फिर से वैसा स्वच्छ होगा जैसा गंगोत्री से निकलते समय था।

कहानी की मुख्य बातें

  • जन्म और शुरुआत: गंगा हिमालय में गंगोत्री के गोमुख से निकलती है। इसे भागीरथी भी कहते हैं।
  • देवप्रयाग: यहाँ अलकनंदा नदी गंगा से मिलती है।
  • ऋषिकेश और हरिद्वार: ये गंगा के किनारे बसे प्रसिद्ध तीर्थ हैं। हरिद्वार में हर बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है।
  • गंगानहर: हरिद्वार से निकलने वाली नहर लाखों एकड़ खेतों को पानी देती है और कानपुर तक जाती है।
  • कानपुर: यहाँ गंगा कारखानों को पानी देती है, जो कपड़े, चमड़े और लोहे का सामान बनाते हैं।
  • प्रयागराज: यहाँ यमुना नदी गंगा से मिलती है। यहाँ भी हर बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है।
  • वाराणसी (काशी): यह गंगा के किनारे बसा बड़ा तीर्थ है।
  • बिहार और पश्चिम बंगाल: गंगा पटना, भागलपुर से होती हुई पश्चिम बंगाल पहुँचती है। यहाँ यह दो धाराओं में बँट जाती है।
  • हुगली और पद्मा: एक धारा कोलकाता में हुगली कहलाती है, दूसरी बांग्लादेश में पद्मा बन जाती है। अंत में गंगा बंगाल की खाड़ी में समुद्र से मिलती है।
  • पवित्र नदी: भारतवासी गंगा को पवित्र मानते हैं, लेकिन कारखानों और शहरों का गंदा पानी इसे गंदा करता है।
  • स्वच्छता के प्रयास: अब लोग गंगा के पानी को साफ करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि यह फिर से गंगोत्री जैसा स्वच्छ हो जाए।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें नदियों और पानी की स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। गंगा जैसे पवित्र जल स्रोत हमारे जीवन के लिए बहुत जरूरी हैं। अगर हम नदी और उसके जल को गंदा करेंगे तो यह हमारी और अन्य जीवों की सेहत के लिए हानिकारक होगा। हमें अपने शहरों, घरों और कारखानों का गंदा पानी सीधे नदियों में नहीं डालना चाहिए। साथ ही, हमें यह भी सीख मिलती है कि लगातार प्रयास और सावधानी से हम किसी भी चीज़ को साफ, सुंदर और उपयोगी बना सकते हैं, जैसे कि लोग अब गंगा को फिर से स्वच्छ बनाने के प्रयास कर रहे हैं। इस तरह, हमें अपने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनी चाहिए।

शब्दार्थ

  • जनपद: किसी राज्य का एक प्रशासनिक क्षेत्र
  • हिमनद: हिमानी, ग्लेशियर
  • औद्योगिक: उद्योग संबंधी
  • कारखाने: एक ऐसी जगह जहाँ कोई चीज़ बनाई या तैयार की जाती है
  • संगम: मेल
  • चमकीला: चमकने वाला
  • मटमैला: मिट्टी के रंग का
  • दूषित: गंदा
  • स्वच्छ: साफ़
  • प्रतीक्षा: इंतज़ार

11. हमारे ये कलामंदिर – Chapter Notes

कहानी परिचय

यह कहानी “हमारे ये कलामंदिर” अजंता और एलोरा की प्रसिद्ध गुफाओं के बारे में है। इसमें बताया गया है कि निशा अपनी मौसी के साथ दशहरे की छुट्टियों में इन गुफाओं को देखने जाती है। वहाँ पहुँचकर निशा देखती है कि पहाड़ों को काटकर सुंदर गुफाएँ और मंदिर बनाए गए हैं। गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र बहुत ही सजीव और सुंदर हैं, जिनमें गौतम बुद्ध के जीवन, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और लोगों के चित्र बने हैं। इन चित्रों के रंग आज भी चमकदार दिखाई देते हैं। एलोरा की गुफाओं में हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से संबंधित मूर्तियाँ और मंदिर बने हैं। कैलाश मंदिर तो पूरी एक चट्टान को काटकर बनाया गया है, जो बहुत अद्भुत लगता है। इस कहानी से हमें पता चलता है कि हमारे देश की कला बहुत पुरानी और महान है।

मुख्य विषय

इस कहानी का मुख्य विषय यह है कि भारत में बहुत पुराने समय से कला और वास्तुकला का कितना अद्भुत विकास हुआ था। अजंता और एलोरा की गुफाएँ और उनमें बनी चित्रकला और मूर्तियाँ देखकर पता चलता है कि हमारे पूर्वज कितने बुद्धिमान और कुशल कलाकार थे। गुफाओं में दीवारों पर बने चित्र इतने सजीव हैं कि वे आज भी हमें मंत्रमुग्ध कर देते हैं। एलोरा की गुफाओं में केवल बौद्ध धर्म से जुड़े ही नहीं, बल्कि हिंदू और जैन धर्म से संबंधित मंदिर और मूर्तियाँ भी हैं। कहानी यह भी बताती है कि ये कला केवल देखने में सुंदर ही नहीं, बल्कि यह हमारे इतिहास और संस्कृति की गौरवशाली धरोहर भी है।

कहानी का सार

निशा की मौसी ने उसे छुट्टियों में अजंता और एलोरा की गुफाएँ दिखाने का वादा किया था। निशा ने किताबों में इन गुफाओं के बारे में पढ़ा था और उसे देखने की बड़ी उत्सुकता थी। दशहरे की छुट्टियाँ आईं तो निशा और मौसी अजंता और एलोरा जाने के लिए तैयार हो गईं। रेलगाड़ी से वे संभाजीनगर पहुँचे और वहाँ स्टेशन के पास ही रात बिताई। अगले दिन सुबह जल्दी उठकर वे बस से अजंता की ओर चल पड़ीं। अजंता शहर से लगभग सौ किलोमीटर दूर है।

अजंता पहुँचकर निशा ने एक बहुत ही सुंदर दृश्य देखा। वहाँ एक छोटी नदी बह रही थी और नदी में बड़े-बड़े शिलाखंड पड़े थे। नदी के दक्षिण में एक पहाड़ी पर गुफाएँ बनी थीं, जिनका मुंह पूर्व की ओर था और प्रातःकाल सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही थीं। गुफाओं के नीचे पानी से भरा एक कुंड था और घाटी में रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे।

निशा और मौसी गुफाओं के अंदर गईं और देखा कि दीवारों पर सुंदर चित्र बने हुए थे। गौतम बुद्ध का घर छोड़कर तपस्या के लिए जाना, भिक्षुओं को उपदेश देना, साधु के रूप में भिक्षा माँगते हुए आदि दिखाए गए थे। साथ ही पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और स्त्रियों के चित्र भी बने थे। निशा बहुत आश्चर्यचकित हुई क्योंकि ये चित्र सैकड़ों साल बाद भी रंगीन और जीवंत थे। मौसी ने बताया कि ये गुफाएँ लगभग दो हजार वर्ष पुरानी हैं और उस समय रंग बनाने का तरीका बहुत खास था। चित्रों में हाथों की मुद्राएँ, आँखों के भाव, अंगों की लोच और मुखों पर सुख-दुख सभी दिखते थे, जैसे चित्र बोल उठेंगे।

कुछ गुफाएँ बहुत लंबी-चौड़ी थीं और कुछ छोटी। निशा को सबसे अधिक आश्चर्य यह देखकर हुआ कि ये गुफाएँ पहाड़ों को काटकर बनाई गई थीं और मूर्तियाँ भी पत्थर तराशकर बनाई गई थीं।

अजंता देखने के बाद निशा और मौसी संभाजीनगर लौट आईं और फिर अगले दिन एलोरा की गुफाएँ देखने गईं। एलोरा संभाजीनगर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर है। वहाँ निशा ने देखा कि पहाड़ों को काटकर लगभग तीस मंदिर बनाए गए थे। इन मंदिरों में सुंदर मूर्तियाँ थीं, जो केवल बौद्ध धर्म से ही नहीं, बल्कि हिंदू और जैन धर्म से भी संबंधित थीं। विशाल शिलाओं को तराशकर इतनी बड़ी-बड़ी इमारतें और मूर्तियाँ बनाई गई थीं।

मौसी ने कैलाश मंदिर दिखाया और बताया कि यह मंदिर ऊँचे पहाड़ को ऊपर से काटकर बनाया गया है और एक ही चट्टान से इतनी बड़ी और सुंदर इमारत बनाई गई। निशा ने कहा कि यह अद्भुत है और यह गर्व की बात है कि हजारों साल पहले हमारे देश में कला इतनी विकसित थी।

अजंता और एलोरा देखकर निशा और मौसी घर लौट आईं, लेकिन निशा का मन अब भी उन बेजोड़ कलाकृतियों की ओर लगा रहा।

कहानी की मुख्य बातें

  • निशा और उसकी मौसी दशहरे की छुट्टियों में अजंता और एलोरा की गुफाएँ देखने गईं।
  • वे छत्रपति संभाजीनगर रेल से पहुँचीं और वहाँ से बस से अजंता गईं, जो लगभग 100 किलोमीटर दूर है।
  • अजंता में कुल 29 गुफाएँ हैं, जो पहाड़ी पर बनी थीं। वहाँ नदी, फूल और सुंदर दृश्य थे।
  • गुफाओं में गौतम बुद्ध के जीवन, पशु-पक्षी और अन्य सुंदर चित्र थे, जो 2000 साल पुराने थे।
  • चित्रों के प्राकृतिक पत्तों, जड़ी-बूटियों और फूलों से बने थे, जो आज भी चमक रहे थे।
  • गुफाएँ और मूर्तियाँ पहाड़ों को काटकर बनाई गई थीं, जो बहुत आश्चर्यजनक था।
  • अजंता देखने के बाद वे संभाजीनगर लौटीं और फिर एलोरा गईं, जो 40 किलोमीटर दूर है।
  • एलोरा में लगभग 30 गुफाएँ और मंदिर हैं, जो बौद्ध, हिंदू और जैन धर्म से संबंधित थे।
  • कैलाश मंदिर बहुत प्रसिद्ध है, जो एक ही चट्टान को तराशकर बनाया गया था।
  • निशा को गर्व हुआ कि हजारों साल पहले भारत में इतनी सुंदर कला थी।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारे देश में प्राचीन समय से ही कला और संस्कृति का बहुत विकास हुआ था। लोग अपनी मेहनत और बुद्धिमानी से पहाड़ों को काटकर गुफाएँ और मंदिर बनाए, जिसमें सुंदर चित्र और मूर्तियाँ बनाई गईं। यह हमें यह भी सिखाता है कि कला का महत्व हमेशा रहता है और हमें अपनी पुरानी संस्कृति और कलाकृतियों को सँभालकर रखना चाहिए। साथ ही, यह कहानी हमें अपने इतिहास को जानने और उसका आदर करने की प्रेरणा देती है।

शब्दार्थ

  • उत्सुकता: अत्यधिक इच्छुक
  • विश्रामगृह: आराम करने का स्थान
  • मनोरम: सुंदर
  • शिलाखंड: चट्टान का टुकड़ा
  • कुंड: जलाशय/हौज
  • सजीव: जीवित
  • हाथों की मुद्रा: हाथों की विशेष आकृति
  • लोच: लचक
  • तराशना: पत्थर को काटकर आकार देना
  • कलाकृति: कला के माध्यम से बनाई गई वस्तु या चित्र
  • टकटकी लगाना: लगातार देखना

10. तीन मछलियाँ – Chapter Notes

कहानी परिचय

यह कहानी पंचतंत्र से ली गई है। इसमें तीन मछलियों की बात की गई है, जो आपस में अच्छी मित्र थीं। तीनों का स्वभाव अलग-अलग था – पहली मछली हमेशा पहले से सोचकर संकट से बचने का उपाय कर लेती थी। दूसरी मछली समय आने पर अपनी बुद्धि से समस्या का हल निकाल लेती थी। तीसरी मछली भाग्य पर भरोसा करके कुछ नहीं करती थी। कहानी में बताया गया है कि सोच-समझकर काम करने और समय पर सही निर्णय लेने से ही हम मुसीबत से बच सकते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत और समझदारी से काम करना हमेशा लाभदायक होता है।

मुख्य विषय

यह कहानी तीन मछलियों की है जो एक सरोवर में रहती थीं। इस कहानी का मुख्य विषय है कि हमें मुसीबतों से बचने के लिए पहले से योजना बनानी चाहिए और अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। अनागतविधाता मछली भविष्य की परेशानियों को पहले से सोचकर उपाय करती थी, इसलिए वह बच गई। प्रत्युत्पन्नमति मछली ने अपनी तेज बुद्धि से सही समय पर उपाय किया और वह भी बच गई। लेकिन यद्भविष्य मछली ने न तो पहले से योजना बनाई और न ही समय पर कुछ किया, इसलिए वह मुसीबत में फंस गई। यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत, समझदारी और सही समय पर निर्णय लेना बहुत जरूरी है। भाग्य के भरोसे बैठने से काम नहीं चलता।

कहानी का सार

एक सुंदर सरोवर में तीन मछलियाँ रहती थीं, जिनका नाम था अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य। ये तीनों बहुत अच्छी दोस्त थीं और सरोवर की दूसरी मछलियों के साथ मिलकर खुशी से रहती थीं। अनागतविधाता बहुत बुद्धिमान थी और भविष्य की समस्याओं का हल पहले से सोच लेती थी। प्रत्युत्पन्नमति की बुद्धि बहुत तेज थी, वह किसी भी समस्या का समाधान उसी समय निकाल लेती थी। लेकिन यद्भविष्य आलसी थी और उसका मानना था कि जो होगा, वह भाग्य में लिखा होगा, इसलिए कुछ करने की जरूरत नहीं है।

एक दिन शाम को दो मछुआरे सरोवर के पास आए। उन्होंने पानी में बहुत सारी मछलियाँ देखीं और अगले दिन सुबह जाल लेकर मछलियाँ पकड़ने का प्लान बनाया। तीनों मछलियों ने उनकी बात सुन ली और सरोवर की सारी मछलियों को बुलाकर सभा की। अनागतविधाता ने सबको बताया कि मछुआरे सुबह जाल डालने आएंगे और सभी को खतरा है। उसने सुझाव दिया कि सभी मछलियाँ सरोवर छोड़कर पास के दूसरे सरोवर में चली जाएँ।

प्रत्युत्पन्नमति ने कहा कि वह यहीं रहेगी और अगर मछुआरे आए तो वह उस समय कोई उपाय ढूंढ लेगी। यद्भविष्य ने कहा कि वह अपना घर नहीं छोड़ेगी और जो भाग्य में होगा, वही होगा। उसने सोचा कि शायद मछुआरे आएँ ही नहीं। इसके बाद अनागतविधाता और कई मछलियाँ पास के सरोवर में चली गईं, लेकिन प्रत्युत्पन्नमति, यद्भविष्य और कुछ अन्य मछलियाँ, जो यद्भविष्य की बात से सहमत थीं, वहीं रहीं।

अगली सुबह मछुआरे आए और उन्होंने जाल डालकर सभी मछलियों को पकड़ लिया, जिसमें प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य भी थीं। मछुआरे बहुत खुश थे कि उन्हें इतनी बड़ी और स्वस्थ मछलियाँ मिलीं। प्रत्युत्पन्नमति ने तुरंत एक उपाय सोचा। उसने समझा कि मछुआरे केवल जीवित मछलियाँ चाहते हैं। उसने अपना शरीर सिकोड़ लिया, आँखें बंद कीं और मरी हुई मछली की तरह बन गई। मछुआरों ने उसे मरा समझकर सरोवर में फेंक दिया और इस तरह उसकी जान बच गई। लेकिन यद्भविष्य ने कोई उपाय नहीं किया और मछुआरे उसे और बाकी मछलियों को लेकर चले गए। इस तरह उसकी जान नहीं बच सकी।

कहानी की मुख्य बातें

  • तीन मछलियाँ और उनकी दोस्ती: एक सरोवर में तीन मछलियाँ रहती थीं – अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति, और यद्भविष्य। तीनों बहुत अच्छी दोस्त थीं।
  • अनागतविधाता की बुद्धिमानी: अनागतविधाता बहुत चतुर थी। वह पहले से ही समस्याओं का हल सोच लेती थी।
  • प्रत्युत्पन्नमति की तेज बुद्धि: प्रत्युत्पन्नमति की बुद्धि बहुत तेज थी। वह मुसीबत आने पर तुरंत हल निकाल लेती थी।
  • यद्भविष्य की लापरवाही: यद्भविष्य आलसी थी। वह सोचती थी कि जो होगा, वह भाग्य में लिखा होगा, इसलिए कुछ करने की जरूरत नहीं।
  • मछुआरों का खतरा: दो मछुआरों ने सरोवर में मछलियाँ देखीं और अगले दिन जाल डालने का प्लान बनाया।
  • अनागतविधाता की सलाह: अनागतविधाता ने सभी मछलियों को दूसरा सरोवर में जाने की सलाह दी ताकि वे बच सकें।
  • प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य का फैसला: प्रत्युत्पन्नमति ने कहा कि वह यहीं रहेगी और बाद में उपाय सोचेगी। यद्भविष्य ने कहा कि वह भाग्य के भरोसे रहेगी और कहीं नहीं जाएगी।
  • मछुआरों का जाल: अगले दिन मछुआरे आए और जाल डालकर बाकी मछलियों को पकड़ लिया।
  • प्रत्युत्पन्नमति की चालाकी: प्रत्युत्पन्नमति ने मरे होने का नाटक किया, जिससे मछुआरों ने उसे सरोवर में फेंक दिया और वह बच गई।
  • यद्भविष्य की गलती: यद्भविष्य ने कुछ नहीं किया और वह मछुआरों के साथ चली गई।
  • कहानी का सबक: पहले से योजना बनाना और मुसीबत में तेजी से सोचना हमें बचा सकता है, लेकिन आलस और भाग्य के भरोसे रहना खतरनाक हो सकता है।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा भविष्य की समस्याओं के बारे में पहले से सोचकर उनकी तैयारी करनी चाहिए। अनागतविधाता ने पहले ही खतरे को समझकर दूसरी जगह चली गई और बच गई। प्रत्युत्पन्नमति ने अपनी तेज बुद्धि से आखिरी समय में उपाय निकाला और वह भी बच गई। लेकिन यद्भविष्य ने कोई मेहनत नहीं की और भाग्य के भरोसे रही, इसलिए वह नहीं बच सकी। इसीलिए हमें आलस्य छोड़कर समय पर सही निर्णय लेना चाहिए और मुसीबतों से बचने के लिए पहले से योजना बनानी चाहिए।

शब्दार्थ

  • सरोवर: तालाब
  • गाढ़ी: गहरी
  • विनोद: मनोरंजन
  • तीक्ष्ण: तेज़
  • आशंकित: जिसकी शंका हो
  • पैनी: तेज़
  • यत्न: प्रयास
  • अकस्मात्: अचानक
  • मछुआरे: मछली पकड़ने वाले
  • रमणीय: सुंदर, देखने योग्य
  • विश्राम: आराम
  • हर्ष: खुशी से
  • सभा: वह स्थान जहाँ किसी विषय पर बात करने के लिए एकत्र हो
  • योजना: कार्य करने की रूपरेखा
  • भयभीत: डर
  • संकट: मुसीबत
  • आलस्यमयी: आलसी
  • पश्चात: बाद
  • सवेरा: सुबह
  • ध्वनियाँ: आवाज़
  • प्रसन्न: खुश
  • नीरोग: स्वस्थ

9. न्याय – Chapter Notes

कहानी परिचय

यह कहानी प्रसिद्ध लेखक विष्णु प्रभाकर जी ने लिखी है। इसमें कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ (जो आगे चलकर गौतम बुद्ध बने) के दयालु स्वभाव को दिखाया गया है। कहानी में राजकुमार सिद्धार्थ और उनके चचेरे भाई देवदत्त के बीच एक घायल हंस को लेकर विवाद होता है। देवदत्त हंस को तीर से घायल कर देता है और उसे अपना मानता है, जबकि सिद्धार्थ उसे बचाकर अपने पास रखते हैं। जब यह मामला महाराज के सामने पहुँचता है तो मंत्री यह निर्णय करते हैं कि हंस उसी के पास रहेगा जिसके पास वह स्वयं जाना चाहे। हंस सिद्धार्थ के पास उड़कर चला जाता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि दूसरों की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म और सच्चा न्याय है।

मुख्य विषय

कहानी “न्याय” का मुख्य विषय यह है कि सही न्याय वही है जिसमें दया, करुणा और बचाने वाला सबसे बड़ा माना जाता है। कहानी में राजकुमार सिद्धार्थ (भगवान बुद्ध) घायल हंस को बचाते हैं और कहते हैं कि जिसको मारा गया है वह मारने वाले का नहीं बल्कि बचाने वाले का होता है। मंत्री भी यही फैसला सुनाते हैं और हंस स्वयं सिद्धार्थ की गोद में आकर बैठ जाता है। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें किसी भी जीव-जंतु पर दया करनी चाहिए, उन्हें कष्ट नहीं देना चाहिए। सच्चा न्याय हमेशा अहिंसा, दया और करुणा के पक्ष में होता है।

पात्र परिचय

  • सिद्धार्थ: कपिलवस्तु के राजकुमार। वे दयालु और करुणावान हैं। पक्षियों और सभी जीवों से बहुत प्यार करते हैं।
  • शुद्धोदन: कपिलवस्तु के महाराजा और सिद्धार्थ के पिता।
  • सखा: सिद्धार्थ का प्यारा मित्र, जो हर समय उनके साथ रहता है।
  • देवदत्त: सिद्धार्थ का चचेरा भाई। वह शिकार करना चाहता है और उसी ने हंस पर तीर चलाया था।
  • मंत्री: महाराजा का मंत्री, जो समझदारी और न्याय से फैसला करता है।
  • प्रतिहारी: दरबार का सेवक, जो राजा के आदेश पहुँचाता है।

कहानी का सार

शुरुआत: प्रकृति की सुंदरता और हंस का घायल होना

कहानी की शुरुआत कपिलवस्तु के राज-उद्यान में होती है, जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ अपने मित्र (सखा) के साथ संध्या के समय बैठे हैं। दोनों प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले रहे हैं। वे गायों का अपने बछड़ों के पास लौटना, पक्षियों के घोंसलों में जाने, और सूरज के रोज़ पूरब से निकलने व पश्चिम में डूबने की बात करते हैं। सिद्धार्थ कहते हैं कि हर चीज़ का अपना स्वभाव होता है, जैसे गर्मी और बरसात का समय पर आना। तभी वे आसमान में उड़ते हुए सुंदर राजहंसों का झुंड देखते हैं और उनकी तारीफ करते हैं। अचानक एक हंस को तीर लगता है और वह घायल होकर सिद्धार्थ की गोद में गिर जाता है। सिद्धार्थ करुणा से उसे सहलाते हैं, तीर निकालते हैं, और पूछते हैं कि किसने इस निर्दोष पक्षी को मारा। उनका मित्र कहता है कि सुंदर होना कोई पाप नहीं है। सिद्धार्थ अपने मित्र को राजवैद्य से मरहम लाने भेजते हैं।

पहला विवाद: देवदत्त का दावा

तभी सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त आता है और कहता है कि उसने हंस को तीर मारकर गिराया है, इसलिए हंस उसका है। वह गर्व से कहता है कि उसका निशाना सध गया है। सिद्धार्थ जवाब देते हैं कि उन्होंने हंस को बचाया है, इसलिए हंस उनका है। दोनों में बहस हो जाती है। सिद्धार्थ कहते हैं कि कोई भी हृदय वाला व्यक्ति निर्दोष पक्षी को नहीं मार सकता। देवदत्त ज़िद करता है कि हंस उसका है, लेकिन सिद्धार्थ उसे देने से मना कर देते हैं। सखा सुझाव देता है कि इस झगड़े का फैसला महाराज शुद्धोदन करें। दोनों राजकुमार और सखा महाराज की सभा में जाने का फैसला करते हैं।

दूसरा दृश्य: सभा में न्याय

महाराज शुद्धोदन की सभा में देवदत्त पहले पहुँचता है और शिकायत करता है कि सिद्धार्थ ने उसका हंस छीन लिया। महाराज सिद्धार्थ को बुलाते हैं। सिद्धार्थ हंस को गोद में लिए सभा में आते हैं। देवदत्त कहता है कि उसने हंस को तीर मारकर गिराया, इसलिए वह उसका है। सिद्धार्थ कहते हैं कि उन्होंने हंस को बचाया है और बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है। वे यह भी कहते हैं कि हंस उनकी शरण में आया है, इसलिए वे उसे नहीं लौटाएँगे। सभा सिद्धार्थ की बात से प्रभावित होती है। महाराज मंत्री से निर्णय करने को कहते हैं। मंत्री सुझाव देते हैं कि हंस को बीच में रखा जाए और दोनों राजकुमार उसे बुलाएँ। देवदत्त पहले बुलाता है, लेकिन हंस डरकर चीखता है और उसके पास नहीं जाता। फिर सिद्धार्थ प्यार से बुलाते हैं, और हंस तुरंत उड़कर उनकी गोद में चिपक जाता है। यह देखकर सभा में हर्ष की लहर दौड़ उठती है।

अंत: हंस का निर्णय और महाराज का फैसला

मंत्री कहते हैं कि हंस ने खुद फैसला कर लिया है कि वह सिद्धार्थ के पास रहना चाहता है। महाराज इस निर्णय को स्वीकार करते हैं और आदेश देते हैं कि हंस सिद्धार्थ के पास रहे। सभा में जय-जयकार होती है। सिद्धार्थ प्रेम से हंस को गले लगाते हैं, जबकि देवदत्त शर्मिंदगी में सिर झुका लेता है। कहानी यहीं खत्म होती है, जो दिखाती है कि करुणा और न्याय की जीत होती है और निर्दोष प्राणियों के प्रति प्रेम सबसे बड़ा होता है।

कहानी की मुख्य बातें

  • सिद्धार्थ और हंस की कहानी: कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ उद्यान में अपने मित्र के साथ बैठे हैं। वे प्रकृति की सुंदरता और शांति का आनंद ले रहे हैं।
  • हंस पर तीर: सिद्धार्थ और उनका मित्र राजहंसों को देख रहे हैं, तभी एक हंस को तीर लगता है और वह सिद्धार्थ की गोद में गिरता है।
  • देवदत्त का दावा: देवदत्त, सिद्धार्थ का चचेरा भाई, कहता है कि उसने हंस को तीर मारा, इसलिए हंस उसका है।
  • सिद्धार्थ का तर्क: सिद्धार्थ कहते हैं कि उन्होंने हंस को बचाया, इसलिए हंस उनका है। वे हंस को देवदत्त को नहीं देना चाहते।
  • महाराज के पास मामला: सिद्धार्थ और देवदत्त अपने झगड़े का निर्णय महाराज शुद्धोदन के पास ले जाते हैं।
  • मंत्री का फैसला: मंत्री हंस को बीच में रखकर दोनों को बुलाने के लिए कहते हैं। हंस डरकर देवदत्त से दूर भागता है, लेकिन सिद्धार्थ की गोद में खुशी से चला जाता है।
  • अंतिम निर्णय: मंत्री और महाराज फैसला करते हैं कि हंस सिद्धार्थ का है, क्योंकि हंस ने खुद सिद्धार्थ को चुना।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सभी जीवों के प्रति दया और प्रेम रखना चाहिए। सिद्धार्थ ने हंस को बचाकर दिखाया कि किसी की मदद करना और उसकी रक्षा करना बहुत बड़ा काम है। दूसरी ओर, देवदत्त ने हंस को मारने की कोशिश की, जो गलत था। कहानी बताती है कि जो दूसरों को दुख देता है, वह गलत है, और जो दूसरों की रक्षा करता है, वह सही है। हमें हमेशा दूसरों की भलाई के लिए काम करना चाहिए और किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। यह भी सीख मिलती है कि सच्चा न्याय वही है, जो प्रेम और करुणा पर आधारित हो।

शब्दार्थ

  • राज-उद्यान: राजा का बगीचा
  • लालिमा: लाल रंग की आभा या चमक
  • नेपथ्य: परदे के पीछे का स्थान
  • वेदी: पूजा, यज्ञ या समारोह के लिए बनाया गया ऊँचा चबूतरा
  • व्याकुल: बेचैन
  • अचरज: आश्चर्य
  • नियत: निश्चित
  • योगी: संत / महात्मा
  • निर्दयी: दया भाव से हीन
  • अनुराग: प्रेम
  • निर्दोष: दोष रहित
  • राजवैद्य: राज महल का वैद्य
  • गवाही: बयान या साक्ष्य
  • प्रमाण: सबूत
  • तिलमिलाकर: व्याकुल होकर / छटपटाकर
  • विवश: मज़बूर
  • सुझाव: राय देना
  • प्रतिहारी: दरबार के प्रवेश द्वार की रखवाली करने वाला
  • आखेट: शिकार
  • शरणागत: शरण में आया हुआ
  • स्नेहपूरित: प्रेम से भरा हुआ
  • स्तंभित: चकित / हैरान
  • आसन: बैठने का स्थान
  • उल्लास: आनंद / उमंग / खुशी

मुहावरे

  • धौंस जमाना: दबाव बनाना या डराना-धमकाना
  • नेत्र सजल हो जाना: आँखों में आँसू आ जाना
  • छाती से चिपकाना: स्नेहपूर्वक अपनाना / बहुत प्यार करना
  • गरदन झुकाना: हार मान लेना / समर्पण कर देना
  • नेकी और पूछ-पूछ: भलाई में संकोच या देरी नहीं करनी चाहिए

8. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा – Chapter Notes

कहानी परिचय 

यह एक पत्र है जो अरूप चाचा ने अपने भतीजे-भतीजियों को काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के बारे में लिखा है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा है। इस पत्र में अरूप चाचा ने अपनी रोमांचक यात्रा का वर्णन किया है। उन्होंने बताया कि कैसे वे सुबह जल्दी उठकर हाथी पर बैठकर जंगल देखने गए। वहाँ उन्होंने एक सींग वाले गैंडे, हिरण, जंगली भैंसें, और कई तरह के पक्षी देखे। गैंडों के बारे में एक मजेदार कहानी भी सुनी। अगले दिन वे जीप से गए और जंगली हाथियों का झुंड, ऊदबिलाव, और बहुत सारे पक्षियों को देखा। यह कहानी हमें प्रकृति और जानवरों के प्रति प्रेम और उनकी रक्षा करने का संदेश देती है।

मुख्य विषय

इस कहानी का मुख्य विषय काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा और वहाँ पाए जाने वाले अलग-अलग पशु-पक्षियों का वर्णन है। लेखक ने बताया है कि काजीरंगा असम में स्थित है और यह एक सींग वाले गैंडे के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ हिरण, भैंस, जंगली सूअर, हाथी, बाघ और कई प्रकार के पक्षी भी मिलते हैं। लेखक ने अपनी यात्रा का अनुभव साझा करते हुए बताया है कि जानवर आपस में शांति और भाईचारे से रहते हैं, इसलिए इंसानों को भी उनसे यह सीख लेनी चाहिए।

कहानी का सार

यह कहानी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा पर आधारित है। लेखक अपने भतीजे-भतीजियों को पत्र लिखकर वहाँ के अनुभव बताते हैं। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है और यह एक सींग वाले गैंडे के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

लेखक बताते हैं कि सुबह-सुबह वे हाथी पर बैठकर उद्यान घूमने गए। वहाँ हिरणों और जंगली भैंसों के झुंड दिखे। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने पहली बार एक सींग वाला गैंडा देखा। गैंडे के शरीर पर मोटी चमड़ी होती है, जो कवच जैसी लगती है। महावत ने एक कहानी सुनाई कि भगवान कृष्ण ने गैंडे को युद्ध के लिए तैयार किया, लेकिन वह आदेशों का पालन नहीं कर पाया और उसे जंगल भेज दिया गया।

पहले गैंडे भारत के कई हिस्सों में पाए जाते थे, लेकिन लोगों ने उसके सींग के लालच में बहुत शिकार किया। लोग मानते थे कि सींग में औषधीय गुण हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे गलत साबित किया। शिकार की वजह से गैंडे की संख्या कम हो गई और अब आधे से अधिक गैंडे काजीरंगा में पाए जाते हैं।

यात्रा के दौरान लेखक ने मादा गैंडे को उसके बच्चे के साथ देखा। महावत ने बताया कि शिशु के साथ होने पर मादा गैंडा खतरनाक हो सकती है। उन्होंने हिरण की चार प्रजातियाँ देखीं – भौंकने वाला हिरण, बौना सूअर हिरण, दलदली हिरण और साँभर हिरण। साथ ही जंगली सूअर भी दिखाई दिए।

दूसरे दिन जीप से घूमते समय वे एक बील पर पहुँचे। वहाँ सैकड़ों पक्षियों के झुंड थे – पेलिकन, सारस, बगुले और कलहोन। पानी में ऊदबिलाव भी खेल रहे थे। लौटते समय उन्हें जंगली हाथियों का झुंड दिखा। झुंड में बच्चे भी थे और एक बड़ा हाथी सबकी सुरक्षा कर रहा था।

काजीरंगा में रॉयल बंगाल टाइगर भी रहते हैं, लेकिन वे रात में निकलते हैं इसलिए लेखक उन्हें नहीं देख पाए। कुल मिलाकर यह यात्रा बहुत अद्भुत रही। लेखक को लगा कि सभी जानवर शांति और भाईचारे से रहते हैं, इसलिए मनुष्यों को भी शांति और मेल-जोल से रहना चाहिए।

इस तरह यह कहानी हमें काजीरंगा उद्यान की सुंदरता, वहाँ के विविध पशु-पक्षी और वन्यजीवन की महत्वपूर्ण जानकारी देती है।

कहानी की मुख्य बातें

  • स्थान: काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे है।
  • जानवर: यहाँ एक सींग वाला गैंडा (भारतीय गैंडा), हिरण, जंगली भैंस, जंगली सूअर और हाथी पाए जाते हैं।
  • प्रसिद्धि: काजीरंगा एक सींग वाले गैंडे के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है।
  • सैर का तरीका: लेखक सुबह जल्दी उठकर हाथी और जीप से उद्यान घूमने गए।
  • गैंडे की खासियत: गैंडे के शरीर पर मोटी त्वचा होती है, जो कवच जैसी दिखती है। पहले लोग इसके सींग को औषधि समझते थे, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे गलत बताया।
  • शिकार की समस्या: गैंडों का बहुत शिकार हुआ, इसलिए उनकी संख्या कम हो गई। अब ज्यादातर गैंडे काजीरंगा में हैं।
  • मादा गैंडा: मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ होने पर हिंसक हो सकती है, इसलिए उसे पास से नहीं देखा गया।
  • हिरण की प्रजातियाँ: यहाँ चार प्रकार के हिरण हैं – भौंकने वाला हिरण, बौना सूअर हिरण (हॉग डीयर), दलदली हिरण और साँभर हिरण।
  • पक्षी और बील: उद्यान में एक बील है, जहाँ पेलिकन, सारस, बगुला जैसे कई पक्षी और ऊदबिलाव दिखे।
  • जंगली हाथी: लौटते समय जंगली हाथियों का झुंड दिखा, जिसमें बच्चे भी थे। एक बड़ा हाथी झुंड की निगरानी कर रहा था।
  • रॉयल बंगाल टाइगर: यहाँ टाइगर भी हैं, लेकिन वे रात में निकलते हैं, इसलिए नहीं दिखे।
  • सीख: काजीरंगा में सभी जानवर शांति और भाईचारे से रहते हैं। हमें भी उनसे मिल-जुलकर रहना सीखना चाहिए।

कहानी से शिक्षा

कहानी हमें सिखाती है कि हमें प्रकृति और जंगली जानवरों से प्यार करना चाहिए। काजीरंगा में सभी जानवर शांति और भाईचारे से रहते हैं। हमें भी एक-दूसरे के साथ प्रेम और सम्मान से रहना चाहिए। यह कहानी बताती है कि जानवरों और पर्यावरण की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इन्हें देख सकें।

शब्दार्थ

  • उद्यान: बाग-बगीचा
  • महावत: हाथी की देखभाल करने वाला
  • कवच: बाहरी आवरण जो किसी से रक्षा करता है
  • रणक्षेत्र: जिस स्थान पर युद्ध हो
  • हिंसक: हिंसा करने वाला
  • निगरानी: देखभाल
  • अद्भुत: अनोखा
  • बील: झील
  • प्रजाति: किसी जानवर या पौधे का प्रकार

7. मेरा बचपन – Chapter Notes

कहानी परिचय

यह कहानी प्रेमचंद जी की रचना है जिसमें उन्होंने अपने बचपन की मीठी यादों को बहुत ही सुंदर ढंग से बताया है। इसमें उन्होंने खेतों में खेलना, पेड़ों पर चढ़ना, रामलीला देखना और सबसे ज़्यादा गुल्ली-डंडा खेलने का आनंद याद किया है। लेखक बताते हैं कि उस समय खेलों में न कोई अमीरी-गरीबी का फर्क था और न ही किसी तरह का दिखावा। सब बच्चे मिलकर उत्साह से खेलते थे। बचपन की सादगी और देशी खेलों की खुशी सबसे अनोखी और सच्ची होती है।

मुख्य विषय

इस लेख का मुख्य विषय है बचपन की यादें और गुल्ली-डंडा जैसे साधारण खेलों का आनंद। प्रेमचंद अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं, जब वे अपने चचेरे भाई के साथ पढ़ने जाते थे, रामलीला देखने का उत्साह होता था, और गुल्ली-डंडा खेलते थे। वे बताते हैं कि गुल्ली-डंडा एक ऐसा खेल है, जिसमें न तो महंगे सामान की जरूरत होती है और न ही किसी खास मैदान की। यह खेल सभी बच्चों को एक साथ लाता था, चाहे वे अमीर हों या गरीब। प्रेमचंद कहते हैं कि भारतीय खेल सरल और मजेदार हैं, लेकिन लोग अब अंग्रेजी खेलों के पीछे भाग रहे हैं। वे अपने बचपन के उत्साह, दोस्तों के साथ खेलने की मस्ती और सादगी को बहुत याद करते हैं।

कहानी का सार

यह कहानी “मेरा बचपन” प्रेमचंद जी द्वारा लिखी गई है। इसमें लेखक ने अपने बचपन की यादों को बहुत ही सरल और प्यारे ढंग से बताया है। लेखक कहते हैं कि उनका बचपन बहुत ही साधारण था। वे कच्चे टूटे घर में रहते थे और पयाल (खप्पच्ची) का बिछौना बिछाकर सोते थे। वे नंगे बदन और नंगे पाँव खेतों में घूमते थे और आम के पेड़ों पर चढ़ते थे। वे अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में मौलवी साहब के पास पढ़ने जाते थे। उस समय उनकी उम्र आठ साल थी और हलधर उनसे दो साल बड़े थे। सुबह-सुबह दोनों मटर और जौ का चबेना खाते थे।

लेखक को रामलीला देखने में बहुत आनंद आता था। उनके घर के पास ही रामलीला का मैदान था और जहाँ लीला के पात्र सजते थे वह घर तो उनके घर से बिलकुल मिला हुआ था। दोपहर से ही पात्रों की सजावट शुरू हो जाती और लेखक छोटे-मोटे काम करने में बहुत उत्साह दिखाते। वे कहते हैं कि उस समय जितना उत्साह काम करने में था, उतना उत्साह आज पेंशन लेने में भी नहीं आता।

बचपन में उन्हें सबसे ज़्यादा मज़ा गुल्ली-डंडा खेलने में आता था। लेखक कहते हैं कि गुल्ली-डंडा सभी खेलों का राजा है। आज भी जब वे बच्चों को गुल्ली-डंडा खेलते देखते हैं तो उनका मन करता है कि वे भी जाकर खेलने लगें। इस खेल के लिए न लॉन चाहिए, न कोर्ट चाहिए और न ही महँगा सामान। बस पेड़ से टहनी काटकर गुल्ली बना ली और खेल शुरू हो गया। लेखक कहते हैं कि विदेशी खेलों में सबसे बड़ी कमी यह है कि उनमें बहुत पैसे खर्च होते हैं। लेकिन आज लोग अंग्रेजी खेलों के पीछे दीवाने हो गए हैं और भारतीय खेलों से दूरी बना ली है।

वे यह भी कहते हैं कि अगर गुल्ली-डंडा खेलते समय आँख फूटने का डर है तो क्रिकेट खेलते समय सिर फूटने का भी डर है। उनके माथे पर आज भी गुल्ली का दाग है और कई दोस्त तो ऐसे भी हुए जिन्हें चोट लगने से बैसाखी का सहारा लेना पड़ा। फिर भी लेखक को गुल्ली-डंडा सबसे अच्छा लगता है। लेखक अपने बचपन के खेलों की बातें बताते हुए कहते हैं कि प्रातःकाल ही घर से निकल जाना, पेड़ों की टहनियाँ काटना, गुल्ली-डंडा बनाना, खिलाड़ियों का इकट्ठा होना, लड़ाई-झगड़े करना, सब कुछ बहुत मज़ेदार था। उस समय अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था, न कोई घमंड था। सब खेलते, सब हँसते।

घरवाले अक्सर नाराज़ रहते थे कि वे न नहाते हैं, न ठीक से खाते हैं, बस गुल्ली-डंडा खेलते रहते हैं। पिताजी तो कभी-कभी रोटियाँ बेलते समय गुस्सा भी उतारते। लेकिन लेखक के लिए गुल्ली-डंडा ही सबसे बड़ी खुशी थी। उन्हें उसमें मिठाइयों से भी ज़्यादा मिठास और तमाशों से भी ज़्यादा आनंद मिलता था। इस प्रकार, इस कहानी में लेखक ने अपने बचपन की यादों, रामलीला के आनंद और सबसे बढ़कर गुल्ली-डंडा जैसे भारतीय खेलों की महत्ता को सरल और मज़ेदार ढंग से बताया है।

कहानी की मुख्य बातें

  • बचपन की यादें: लेखक को अपने बचपन की बातें बहुत याद आती हैं, जैसे पुराना घर, खेतों में नंगे पांव घूमना, और आम के पेड़ पर चढ़ना।
  • पढ़ाई का समय: लेखक 8 साल की उम्र में अपने चचेरे भाई हलधर के साथ मौलवी साहब के पास पढ़ने जाता था। सुबह वे मटर और जौ का चबेना खाते थे।
  • रामलीला का मजा: लेखक को रामलीला देखना बहुत पसंद था। वह दोपहर से ही पात्रों की सजावट देखने चला जाता और छोटे-मोटे कामों में मदद करता।
  • गुल्ली-डंडा का खेल: लेखक को गुल्ली-डंडा सबसे अच्छा खेल लगता है। इसे खेलने के लिए ज्यादा सामान की जरूरत नहीं, सिर्फ पेड़ की टहनी से गुल्ली और डंडा बन जाता।
  • खेलों की तुलना: लेखक कहते हैं कि अंग्रेजी खेल महंगे हैं, लेकिन भारतीय खेल जैसे गुल्ली-डंडा सस्ते और मजेदार हैं। स्कूलों में भारतीय खेलों को बढ़ावा देना चाहिए।
  • खेलों का खतरा: गुल्ली-डंडा से आंख फूटने का डर होता है, लेकिन क्रिकेट जैसे खेलों में भी सिर टूटने का खतरा है। फिर भी लेखक को गुल्ली-डंडा सबसे प्यारा है।
  • बचपन की मस्ती: बचपन में खेलने का उत्साह इतना था कि नहाना-खाना भूल जाता था। गुल्ली-डंडा में बहुत मजा और मिठास थी।
  • सादगी और भाईचारा: बचपन में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था। सब मिलकर खेलते थे, और अभिमान की कोई जगह नहीं थी।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बचपन बहुत ही अनमोल होता है। उस समय की सादगी, खुशी और खेलकूद हमें जीवनभर याद रहते हैं। हमें अपने देशी खेलों और परंपराओं की कद्र करनी चाहिए, क्योंकि उनमें मज़ा भी है और अपनापन भी। खेल हमें मिलजुलकर रहना, भाईचारा और सरलता सिखाते हैं। हमें केवल महँगे या विदेशी खेलों के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि अपने भारतीय खेलों को भी महत्व देना चाहिए।

शब्दार्थ

  • पयाल: धान के पौधे का सूखा तना / पराली
  • जेठ: उम्र में बड़ा
  • चबेना: भुना हुआ अन्न
  • थापी: आटा बेलने या रोटियाँ बनाने में प्रयोग होने वाला सपाट लकड़ी का टुकड़ा
  • विलायती: विदेशी
  • कौड़ी: मुद्रा का एक रूप
  • भय: डर
  • चौके: रसोईघर
  • सुध: होश 
  • मुहावरा: जी लोट-पोट होना- मन अत्यधिक प्रसन्न होना 

6. चतुर चित्रकार – Chapter Notes

कविता परिचय

यह कविता “चतुर चित्रकार” प्रसिद्ध कवि रामनरेश त्रिपाठी जी ने लिखी है। इसमें एक चित्रकार की बुद्धिमानी और चतुराई को दिखाया गया है। जब वह जंगल में चित्र बना रहा था, तभी एक शेर आ गया। चित्रकार ने डरने के बजाय अपनी समझदारी से शेर को चित्र बनाने का बहाना देकर पीठ घुमा कर बैठा दिया और नाव पकड़कर भाग निकला। इस कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में घबराना नहीं चाहिए, बल्कि समझदारी और चतुराई से काम लेना चाहिए।

कविता का सार

इस कविता में एक बुद्धिमान और साहसी चित्रकार की कहानी है। वह एक सुनसान जगह पर नदी, पहाड़ और पेड़-पौधों के चित्र बना रहा था। तभी वहाँ एक शेर आ गया। चित्रकार पहले तो डर गया, लेकिन उसने चतुराई से शेर को कहा कि बैठो, मैं तुम्हारा सुंदर चित्र बनाता हूँ। शेर ध्यान से बैठ गया। चित्रकार ने शेर से सामने का चित्र बनाने के बाद कहा कि अब पीछे का चित्र बनाने के लिए मुँह घुमा लो। 

शेर ने जैसे ही मुँह घुमाया, चित्रकार धीरे से झील किनारे रखी नाव पर बैठकर भाग निकला। शेर को जब देर लगी तो उसने पलटकर देखा और पाया कि चित्रकार नाव से दूर जा चुका है। गुस्से में शेर ने कहा कि कायर चित्रकार अपना कागज़–कलम तो लेता जा। इस पर चित्रकार ने चतुराई और हिम्मत से उत्तर दिया कि इन्हें तुम ही रखो और जंगल में बैठकर चित्रकला का अभ्यास करो।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

चित्रकार सुनसान जगह में, बना रहा था चित्र,
इतने ही में वहाँ आ गया, यम राजा का मित्र।
उसे देखकर चित्रकार के, तुरंत उड़ गए होश,
नदी, पहाड़, पेड़, पत्तों का, रह न गया कुछ जोश।
फिर उसको कुछ हिम्मत आई, देख उसे चुपचाप,
बोला- सुंदर चित्र बना दूँ, बैठ जाइए आप।

व्याख्या: इस प्रसंग में बताया गया है कि एक चित्रकार जंगल की सुनसान जगह पर नदी, पहाड़ और पेड़-पौधों के सुंदर चित्र बना रहा था। तभी वहाँ एक शेर आ गया, जिसे देखकर चित्रकार बहुत डर गया और उसका जोश खत्म हो गया। लेकिन उसने हिम्मत दिखाई और शेर को चुपचाप देखकर चतुराई से कहा कि वह उसका सुंदर चित्र बनाएगा और उसे बैठने के लिए कहा।

प्रसंग 2

उकड़ू–मुकड़ू बैठ गया वह, सारे अंग बटोर,
बड़े ध्यान से लगा देखने, चित्रकार की ओर।
चित्रकार ने कहा–हो गया, आगे का तैयार,
अब मुँह आप उधर तो करिए, जंगल के सरदार।
बैठ गया पीठ फिराकर, चित्रकार की ओर,
चित्रकार चुपके से खिसका, जैसे कोई चोर।

व्याख्या: इस प्रसंग में बताया गया है कि शेर चित्रकार की बात मानकर घुटनों को मोड़कर बैठ गया और बड़े ध्यान से उसे चित्र बनाते देखने लगा। चित्रकार ने चतुराई से कहा कि उसका चित्र लगभग तैयार है, लेकिन अब उसे पीछे का चित्र बनाने के लिए मुँह दूसरी तरफ करने को कहा। जैसे ही शेर ने पीठ फेरी, चित्रकार चुपके से वहाँ से भाग गया, जैसे कोई चोर चुपके से निकल जाता है।

प्रसंग 3

बहुत देर तक आँख मूँदकर, पीठ घुमाकर शेर,
बैठे-बैठे लगा सोचने, इधर हुई क्यों देर?
झील किनारे नाव थी, एक रखा था बाँस,
चित्रकार ने नाव पकड़कर, ली जी भर के साँस।
जल्दी-जल्दी नाव चलाकर, निकल गया वह दूर,
इधर शेर था धोखा खाकर, झुंझलाहट में चूर।

व्याख्या: इस प्रसंग में बताया गया है कि शेर पीठ फेरकर और आँखें बंद करके चित्र बनने का इंतज़ार करता रहा। उसे लगा कि चित्र बनाने में बहुत समय लग रहा है, तो वह सोचने लगा कि देर क्यों हो रही है। उधर, चित्रकार ने झील के किनारे रखी नाव पकड़ ली और राहत की साँस ली। उसने जल्दी-जल्दी नाव चलाकर शेर से बहुत दूर निकल गया। शेर को जब पता चला कि उसे धोखा मिला, तो वह बहुत गुस्सा हो गया।

प्रसंग 4

शेर बहुत खिसियाकर बोला, नाव जरा ले रोक,
कलम और कागज़ तो ले जा रे कायर डरपोक।
चित्रकार ने कहा तुरंत ही रखिए अपने पास,
चित्रकला का आप कीजिए, जंगल में अभ्यास।

व्याख्या: इस प्रसंग में बताया गया है कि शेर ने गुस्से में चित्रकार को आवाज़ देकर कहा कि कलम और कागज़ तो देकर जाओ। चित्रकार ने हँसते हुए कहा कि ये सब तुम ही अपने पास रखो और जंगल में चित्र बनाने का अभ्यास करो।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि संकट की घड़ी में घबराना नहीं चाहिए, बल्कि बुद्धिमानी और समझदारी से काम लेना चाहिए। चित्रकार ने शेर को डर के कारण मारने या हिंसा करने की जगह अपनी चतुराई से धोखा देकर बच निकलने का रास्ता निकाला। इससे हमें पता चलता है कि कठिन परिस्थितियों से निकलने के लिए साहस, धैर्य और चतुराई बहुत ज़रूरी होती है। डरकर हार मान लेना सही नहीं है, बल्कि समझदारी से सोचना और सही उपाय करना ही असली बुद्धिमानी है।

शब्दार्थ

  • चित्रकार: चित्र बनाने वाला व्यक्ति
  • सुनसान: वीरान, खाली जगह जहाँ कोई न हो
  • यम राजा का मित्र: शेर (यहाँ शेर को खतरनाक होने के कारण यमराज का मित्र कहा गया है)
  • होश: समझ, चेतना
  • जोश: उत्साह, उमंग
  • हिम्मत: साहस, बहादुरी
  • चुपचाप: बिना आवाज़ किए, शांति से
  • उकड़ू–मुकड़ू: घुटने मोड़कर बैठने का एक ढंग
  • अंग बटोर: शरीर के हिस्सों को समेटना, सिकोड़कर बैठना
  • ध्यान से: सावधानी और एकाग्रता के साथ
  • जंगल के सरदार: शेर, जंगल का राजा
  • खिसका: चुपके से निकल जाना
  • चोर: वह जो चोरी करता हो, यहाँ चुपके से भागने के लिए कहा गया है
  • आँख मूँदकर: आँखें बंद करके
  • झील: पानी का बहुत बड़ा तालाब या जलाशय
  • बाँस: नाव चलाने के लिए लंबा डंडा
  • जी भर के साँस: राहत की साँस लेना
  • झुंझलाहट: गुस्सा होना, चिढ़ना
  • चूर: पूरी तरह से (यहाँ गुस्से से भरा हुआ)
  • खिसियाकर: गुस्सा करके, चिढ़कर
  • जरा: थोड़ा, कुछ देर के लिए
  • कायर/डरपोक: डरने वाला, कायर व्यक्ति
  • चित्रकला: चित्र बनाने की कला
  • अभ्यास: बार-बार करने की प्रक्रिया

5. सुंदरिया – Chapter Notes

कहानी का परिचय

यह कहानी प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार द्वारा लिखी गई है। इसमें हरियाणा के एक गरीब किसान हीरासिंह और उसकी प्यारी गाय सुंदरिया की कहानी है। हीरासिंह अपनी गाय का चारा ठीक से नहीं जुटा पाता था, इसलिए वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जाकर एक सेठ के यहाँ चौकीदार बन गया। सेठ को अच्छी गाय चाहिए थी, तो हीरासिंह ने अपनी ही गाय सुंदरिया बेच दी, यह सोचकर कि वह उसके सामने ही रहेगी। लेकिन सुंदरिया अपने मालिक के बिना ज्यादा दूध नहीं देती थी। यह बात सेठ को पसंद नहीं आई और उसने गाय वापस ले जाने को कहा। आखिर में हीरासिंह ने तय किया कि वह गाय को अपने गाँव ले जाएगा और सेठ के पैसे धीरे-धीरे चुका देगा। यह कहानी मनुष्य और जानवर के गहरे प्रेम और वफ़ादारी को दर्शाती है।

मुख्य विषय

यह कहानी एक गरीब किसान हीरासिंह और उसकी प्यारी गाय सुंदरिया के गहरे लगाव की है। हीरासिंह उसे अपने परिवार का हिस्सा मानता था, लेकिन मजबूरी में उसने उसे बेच दिया। गाय भी अपने मालिक से बहुत प्यार करती थी, इसलिए उसके बिना खुश नहीं रही और पूरा दूध नहीं देती थी। आखिरकार हीरासिंह ने उसे वापस गाँव ले जाने का फैसला किया। यह कहानी हमें सिखाती है कि जानवर भी प्यार और अपनापन समझते हैं, और पैसा कभी भी सच्चे रिश्तों से बड़ा नहीं होता।

कहानी का सार

कहानी की शुरुआत

हरियाणा के एक गाँव में हीरासिंह नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसके पास एक प्यारी गाय थी, जिसका नाम सुंदरिया था। सुंदरिया बहुत सुंदर और स्वस्थ गाय थी। लोग उसे देखकर जलन महसूस करते थे। लेकिन हीरासिंह इतना गरीब था कि वह अपने परिवार और सुंदरिया के लिए खाना-चारा भी ठीक से नहीं जुटा पाता था।

हीरासिंह की परेशानी

हीरासिंह को समझ नहीं आता था कि वह अपने बीवी-बच्चों और सुंदरिया की देखभाल कैसे करे। गरीबी के कारण वह सुंदरिया के लिए चारा नहीं खरीद पाता था। खाने की कमी होने लगी तो उसने सोचा कि सुंदरिया को बेच दे। लेकिन उसका बड़ा बेटा जवाहरसिंह सुंदरिया को “मौसी” कहता था और उससे बहुत प्यार करता था। इसलिए हीरासिंह को डर था कि अगर उसने सुंदरिया को बेचा तो जवाहरसिंह बहुत दुखी होगा।

दिल्ली में नौकरी

पैसे कमाने के लिए हीरासिंह दिल्ली चला गया। वहाँ उसे एक सेठ के यहाँ चौकीदार की नौकरी मिल गई। एक दिन सेठ ने हीरासिंह से कहा, “तुम हरियाणा से हो, वहाँ की गायें बहुत अच्छी होती हैं। मेरे लिए एक अच्छी गाय लाओ।”
हीरासिंह ने तुरंत अपनी सुंदरिया की याद की। उसने सेठ से कहा कि उसे एक गाय के बारे में पता है। सेठ ने पूछा, “वह गाय कैसी है?” हीरासिंह ने सुंदरिया की तारीफ की और कहा, “वह गाय बहुत अच्छी है। वह पंद्रह सेर दूध देती है। मैंने उसकी देखभाल में दो सौ रुपये खर्च किए हैं।”

सेठ का प्रस्ताव

सेठ ने कहा, “ठीक है, मैं तुम्हें दो सौ रुपये से ज्यादा यानी दो सौ पाँच रुपये दूँगा।” तब हीरासिंह ने सच बताया कि वह गाय उसकी अपनी है, यानी सुंदरिया। सेठ बहुत खुश हुआ और उसने तुरंत सौ रुपये हीरासिंह को दे दिए। उसने कहा, “जाओ, गाय को जल्दी लाओ। ज्यादा देर मत करना।” हीरासिंह ने कहा कि उसे गाय लाने में पाँच दिन लगेंगे।

सुंदरिया को लाना

हीरासिंह गाँव गया और जवाहरसिंह को समझाकर सुंदरिया को दिल्ली ले आया। सेठ ने सुंदरिया को देखा तो बहुत खुश हुआ क्योंकि वह सचमुच बहुत सुंदर और स्वस्थ थी। हीरासिंह ने खुद सुंदरिया को चारा-पानी दिया, उसे प्यार किया और दूध निकाला। सुंदरिया ने पंद्रह सेर से भी ज्यादा दूध दिया। सेठ इतना खुश हुआ कि उसने दो सौ रुपये के अलावा सात रुपये और दे दिए।

सुंदरिया का दुख

सेठ ने सुंदरिया को अपने घोसी (गायों की देखभाल करने वाले) को सौंप दिया। लेकिन सुंदरिया घोसी के साथ जाना नहीं चाहती थी। हीरासिंह का दिल भारी हो गया। उसने सेठ से कहा, “मुझे सुंदरिया की देखभाल करने का काम दे दीजिए, चाहे मेरी तनख्वाह कम कर दीजिए।” सेठ ने कहा, “तुम बहुत ईमानदार चौकीदार हो। मैं तुम्हारी तनख्वाह और बढ़ा सकता हूँ, लेकिन तुम्हें चौकीदार का काम ही करना होगा।”
हीरासिंह ने सुंदरिया को प्यार से थपथपाया और कहा, “जा सुंदरिया, जा।” सुंदरिया ने उसकी ओर देखा, जैसे पूछ रही हो, “क्या मुझे सचमुच जाना है?” फिर वह घोसी के पीछे चली गई। हीरासिंह उसे जाते हुए देखता रहा।

दूध की समस्या

अगले दिन सेठ ने हीरासिंह को बुलाकर कहा, “तुमने मुझे धोखा दिया। सुंदरिया ने सुबह सिर्फ पाँच सेर दूध दिया।” हीरासिंह ने कहा, “मैंने तो खुद पंद्रह सेर से ज्यादा दूध निकाला था।” सेठ ने कहा, “जाओ, गाय को देखो।”
हीरासिंह सुंदरिया के पास गया और प्यार से बोला, “सुंदरिया, मेरी बदनामी क्यों कर रही है?” सुंदरिया ने उसकी ओर देखा, जैसे कह रही हो, “बताओ, मुझे क्या करना है?” हीरासिंह ने घोसी से बाल्टी लाने को कहा। घोसी ने कहा कि वह पहले ही दूध निकाल चुका है। लेकिन हीरासिंह ने फिर दूध निकाला और इस बार साढ़े तेरह सेर दूध निकला। उसने दूध घोसी को दे दिया और सुंदरिया से कहा, “मेरी इज्जत रखना, सुंदरिया।”

फिर वही समस्या

अगले दिन फिर वही हुआ। सुंदरिया ने पूरा दूध नहीं दिया। सेठ ने हीरासिंह को बुलाकर कहा, “यह क्या है? तुमने मुझे धोखा दिया।” सेठ ने कहा, “अगर ऐसा ही है तो अपनी गाय ले जाओ और मेरे रुपये वापस करो।” लेकिन हीरासिंह ने रुपये गाँव भेज दिए थे और उनमें से ज्यादातर रुपये मकान की मरम्मत में खर्च हो गए थे।
सेठ ने कहा, “ठीक है, तुम्हारी तनख्वाह से रुपये कटते रहेंगे। जब सारे रुपये चुक जाएँ, तब गाय ले जाना।”

सुंदरिया का विद्रोह

अगले दिन सुंदरिया ने और गड़बड़ की। उसने दूध देने से पूरी तरह मना कर दिया और रात को सारा दूध ड्योढ़ी (आँगन) में बिखेर दिया। सेठ ने हीरासिंह से पूछा, “यह क्या बात है?” हीरासिंह ने कहा, “शायद गाय रात को खुल गई और ड्योढ़ी में आकर दूध गिरा दिया।”
घोसी ने कहा कि उसने गाय को रात में खूँटे से बाँधा था। लेकिन हीरासिंह को यकीन था कि सुंदरिया ने ऐसा किया। सेठ ने कहा, “ऐसी बातें मत बनाओ। जाओ, पता करो कि यह किसने किया।”

हीरासिंह का दुख

हीरासिंह अपनी कोठरी में जाकर लेट गया। उसे बहुत दुख हो रहा था। रात को उसे लगा कि दरवाजे से कोई आवाज आई। उसने दरवाजा खोला तो देखा कि सुंदरिया खड़ी है। वह उसे ऐसी आँखों से देख रही थी, जैसे माफी माँग रही हो। मानो कह रही हो, “मैंने गलती की, मुझे माफ कर दो। मैं बहुत दुखी हूँ।” हीरासिंह का दिल भर आया। वह सुंदरिया की गर्दन से लिपटकर रोने लगा।

हीरासिंह का फैसला

अगले दिन हीरासिंह ने सेठ से कहा, “आप जितने महीने चाहें, मुझसे सख्त मेहनत करवाएँ। लेकिन सुंदरिया को मैं आज ही गाँव वापस ले जाऊँगा। जब आपके रुपये चुक जाएँ, मुझे बता दीजिए। फिर मैं भी नौकरी छोड़ दूँगा।” सेठ कुछ कह पाता, इससे पहले ही हीरासिंह सुंदरिया को लेकर गाँव चला गया।

कहानी का अंत

इस तरह, हीरासिंह ने सुंदरिया को बेचने का फैसला छोड़ दिया। वह समझ गया कि सुंदरिया उसके परिवार का हिस्सा है और उसे पैसे के लिए नहीं बेचा जा सकता। सुंदरिया भी हीरासिंह से बहुत प्यार करती थी और उसके बिना दूध नहीं देती थी। यह कहानी बताती है कि प्यार और विश्वास पैसे से ज्यादा कीमती होते हैं।

कहानी की मुख्य बातें

  • हीरासिंह हरियाणा के एक गाँव का गरीब किसान था।
  • उसके पास सुंदरिया नाम की एक बड़ी और सुंदर गाय थी, जिसे उसका बेटा मौसी कहता था।
  • गरीबी के कारण हीरासिंह गाय का चारा भी ठीक से नहीं जुटा पाता था।
  • वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जाकर एक सेठ के यहाँ चौकीदार बन गया।
  • सेठ को अच्छी गाय चाहिए थी, तो हीरासिंह ने अपनी ही गाय सुंदरिया बेचने का सोचा।
  • उसने सोचा कि गाय बेचकर भी वह उसे अपनी आँखों के सामने देख सकेगा।
  • हीरासिंह गाँव से सुंदरिया लाया और सेठ को दे दी।
  • पहले दिन गाय ने खूब दूध दिया, लेकिन दूसरे दिन से उसने कम दूध देना शुरू कर दिया।
  • असल में गाय अपने मालिक हीरासिंह से दूर होकर ठीक से दूध नहीं दे पा रही थी।
  • सेठ नाराज़ हो गए और बोले – गाय वापस ले जाओ और पैसे लौटा दो।
  • पैसे तो हीरासिंह ने गाँव में खर्च कर दिए थे, इसलिए उसने कहा कि तनख्वाह में से पैसे कट जाएँगे।
  • एक दिन गाय रात को छूटकर ड्योढ़ी में आई और हीरासिंह के पास खड़ी रही, जैसे माफी माँग रही हो।
  • हीरासिंह गाय को देखकर रो पड़ा और उसे गले से लगा लिया।
  • अगले दिन उसने सेठ से कहा कि वह गाय को गाँव वापस ले जाएगा, चाहे जितना समय लग जाए पैसे चुकाने में।
  • वह उसी दिन सुंदरिया को लेकर गाँव लौट गया।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जानवर भी हमारे परिवार का हिस्सा होते हैं और हमें उनकी देखभाल करनी चाहिए। पैसा ज़िंदगी में सबसे ज़रूरी नहीं है, कभी-कभी प्यार और अपनापन पैसों से ज़्यादा कीमती होता है। हमें हमेशा ईमानदारी और सच्चाई से काम लेना चाहिए, जैसे हीरासिंह ने सच बताया कि गाय उसकी अपनी है। जब किसी को ज़बरदस्ती अलग किया जाता है, तो वह खुश नहीं रह सकता, जैसे सुंदरिया अपने मालिक से दूर होकर ठीक से दूध नहीं देती थी। इसलिए हमें अपनी प्रिय चीज़ों और जीवों को संभालकर रखना चाहिए और उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए।

शब्दार्थ

  • डील-डौल: शरीर की बनावट
  • ईर्ष्या: जलन, द्वेष की भावना
  • चारा: पशुओं के खाने की घास या भोजन
  • मौसी: माँ की बहन (यहाँ प्रेम से दी गई उपमा)
  • बंदोबस्त: प्रबंध, व्यवस्था
  • कामधेनु: पौराणिक गाय, जो इच्छानुसार दूध और संपत्ति देती है
  • सेर: पुराना भार माप (लगभग 1 किलोग्राम के बराबर)
  • सानी-पानी देना: पशु को चारा और पानी देना
  • दुहना: गाय, भैंस आदि का दूध निकालना
  • सिपुर्द: सौंपना, हवाले करना
  • जी भरा आना: भावुक हो जाना, आँखों में आँसू आ जाना
  • पुचकारना: प्यार से सहलाना या दुलारना
  • रुसवाई: बदनामी, अपमान
  • ओछा करानाअपमानित करना
  • मसनूई: बनावटी, झूठा
  • करतूत: बुरा काम, शरारत
  • लुढ़क जाना: थककर या उदासी में लेट जाना
  • विह्वल: भावुक होकर व्याकुल हो जाना
  • अपराधिनी: अपराध करने वाली (स्त्रीलिंग)
  • चाकरी: नौकरी, सेवा

4. साइड्केन – Chapter Notes

कहानी का परिचय

यह कहानी अरुणाचल प्रदेश के चौखाम गाँव की है। वल्लरी के पिताजी वहाँ काम करते हैं और उन्होंने अपने परिवार को भी बुला लिया है। दिल्ली की भीड़-भाड़ और शोरगुल से अलग, चौखाम का वातावरण शांत और हरा-भरा है। कहानी में वल्लरी अपनी दोस्त चाऊतान के घर जाती है। वहाँ से वे लोग गाँव में निकल रही एक शोभायात्रा देखते हैं, जिसमें भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ नए मंदिर में ले जाई जा रही हैं। यह मंदिर बाँस और फूलों से बहुत सुंदर सजाया गया है। गाँव के लोग इस समय साङकेन का त्योहार मना रहे हैं। यह उनका नया वर्ष होता है, जिसमें लोग एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, चावल का आटा लगाते हैं, गीत गाते हैं और नाचते हैं। वल्लरी को यह त्योहार होली जैसा लगता है। कहानी हमें बताती है कि अलग-अलग जगहों के त्योहार भले ही अलग हों, लेकिन उनका मकसद खुशी बाँटना और मिल-जुलकर रहना होता है।

मुख्य विषय

यह कहानी अरुणाचल प्रदेश के साङकेन त्योहार के बारे में है। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चौखाम में अपने दोस्त चाऊतान के घर जाती है और वहाँ उसे शोभायात्रा, मंदिर की सजावट, मूर्तियों की पूजा और लोगों का पानी व आटे से खेलना देखने को मिलता है। यह त्योहार उनके यहाँ नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, जैसे हमारे यहाँ होली। इसमें लोग खुश होकर गाते-नाचते हैं, एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं और मिलजुलकर आनंद मनाते हैं।

कहानी का सार

अरुणाचल प्रदेश में एक सुंदर जगह है जिसका नाम है चौखाम। यहाँ का मंडल कार्यालय है, जहाँ वल्लरी के पिताजी एक अधिकारी के रूप में काम करते हैं। इस बार उन्होंने अपने परिवार को दिल्ली से चौखाम बुला लिया। दिल्ली में तो हर तरफ भीड़भाड़, हॉर्न बजाती गाड़ियाँ और लोगों की लंबी-लंबी कतारें दिखती हैं। लेकिन चौखाम बिल्कुल अलग है। यहाँ चारों तरफ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, और शांति है। यहाँ के लोग हमेशा मुस्कुराते रहते हैं।

एक दिन वल्लरी का दोस्त चाऊतान उसे अपने घर बुलाने आया। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चाऊतान के घर गई। जब वे वहाँ पहुँचे, तो चाऊतान के पिताजी घर की सफाई कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने वल्लरी और उसके पिताजी को देखा, उन्होंने सफाई का काम छोड़ दिया और उनका स्वागत किया।

चाऊतान की माँ कई तरह के स्वादिष्ट पकवान ले आईं। वल्लरी और उसके पिताजी ने बड़े चाव से पकवान खाए। तभी वल्लरी ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर एक शोभायात्रा निकल रही थी। इसमें बहुत सारे लोग थे। कुछ लोग अपने कंधों पर पालकियाँ लिए हुए थे। इन पालकियों में बड़ी-बड़ी और सुंदर मूर्तियाँ रखी थीं। लोग नाचते-गाते, खुशी-खुशी आगे बढ़ रहे थे।

वल्लरी ने चाऊतान से पूछा, “ये लोग कहाँ जा रहे हैं? सब बहुत खुश दिख रहे हैं।”

चाऊतान ने बताया, “हमारे गाँव के लोगों ने कुछ दिन पहले नदी के किनारे एक मंदिर बनाया है। ये लोग बौद्ध-विहार से भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ लाए हैं। अब वे इन्हें मंदिर ले जा रहे हैं। ये मूर्तियाँ तीन दिन तक मंदिर में रहेंगी। गाँव के लोग हर दिन इन पर जल चढ़ाएँगे और इनकी पूजा करेंगे।”

वल्लरी के पिताजी ने पूछा, “क्या हम भी इस शोभायात्रा में शामिल हो सकते हैं?”

चाऊतान के पिताजी ने कहा, “हाँ, बिल्कुल! चलो, हम सब चलते हैं।”

सब लोग शोभायात्रा में शामिल हो गए। लोग गाते, बाजे बजाते, और नाचते-कूदते हुए चल रहे थे। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

थोड़ी देर बाद शोभायात्रा मंदिर के पास पहुँची। मंदिर बहुत सुंदर था। इसकी दीवारें बाँस और बाँस की खपच्चियों से बनी थीं। दीवारों में जगह-जगह हरी-हरी टहनियाँ लगाई गई थीं, और उन पर रंग-बिरंगे फूल सजाए गए थे। वल्लरी को ऐसा सादा और सुंदर मंदिर पहले कभी नहीं दिखा था।

भीड़ मंदिर के द्वार पर इकट्ठा हो गई। बौद्ध भिक्षुओं ने मंत्र पढ़ते हुए मूर्तियों को पालकियों से उतारा और मंदिर में रख दिया। फिर उन्होंने मूर्तियों की पूजा शुरू की और उन पर जल चढ़ाया।

वहाँ का माहौल बहुत खुशहाल था। वल्लरी ने देखा कि लोग एक-दूसरे पर बाल्टियों से पानी डाल रहे थे। कुछ लोग एक-दूसरे के चेहरों पर चावल का आटा भी लगा रहे थे। वल्लरी को अपने शहर की होली याद आ गई। उसने चाऊतान से कहा, “चाऊतान भाई, ये तो होली जैसा लग रहा है।”

चाऊतान ने जवाब दिया, “नहीं, ये होली नहीं है। आज हमारा साङकेन का त्योहार है। आज से हमारा नया साल शुरू होता है।”

वल्लरी ने बताया, “हमारे यहाँ भी होली से नया साल शुरू होता है। होली के दिन हम लोग एक-दूसरे पर रंगीन पानी और गुलाल डालते हैं। अगले दिन लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, मिठाइयाँ और नमकीन खाते हैं, और मेहमानों का स्वागत करते हैं।”

चाऊतान ने कहा, “आज शाम को हम भी अपने ताऊजी के घर जाएँगे। ताईजी ने कई तरह के पकवान बनाए होंगे। हम उन्हें प्रणाम करेंगे, और वे हमें आशीर्वाद देंगे। कल मेरी बुआजी और फूफाजी हमारे घर आएँगे।”

तभी किसी ने वल्लरी और उसके पिताजी पर एक बालटी पानी डाल दिया। वे पूरी तरह भीग गए। फिर लोग देर तक एक-दूसरे पर पानी डालते रहे और साङकेन का त्योहार मनाते रहे।

चाऊतान ने बताया, “तीन दिन तक साङकेन का त्योहार ऐसे ही मनाया जाता है। तीसरे दिन बौद्ध भिक्षु इन मूर्तियों को फिर से पालकियों में रखकर बौद्ध-विहार ले जाएँगे। वहाँ मंत्र पढ़कर मूर्तियों को उनके स्थान पर रखा जाएगा।”

चाऊतान के पिताजी ने कहा, “फिर गाँव के लोग बौद्ध-विहार जाएँगे और भिक्षुओं को बार-बार प्रणाम करेंगे। भिक्षु हमें आशीर्वाद देंगे –

कहानी की मुख्य बातें

  • वल्लरी के पिताजी अरुणाचल प्रदेश के चौखाम में अधिकारी हैं और उन्होंने दिल्ली से परिवार को बुला लिया।
  • चौखाम दिल्ली की भीड़ और शोर से अलग, बहुत शांत और हरा-भरा स्थान है।
  • वल्लरी अपने पिताजी के साथ दोस्त चाऊतान के घर गई।
  • चाऊतान के माता-पिता ने उनका स्वागत किया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए।
  • वल्लरी ने सड़क पर एक शोभायात्रा देखी जिसमें लोग मूर्तियाँ लेकर मंदिर जा रहे थे।
  • यह मूर्तियाँ बौद्ध-विहार से लाकर नए बने मंदिर में रखी जानी थीं और तीन दिन पूजा होनी थी।
  • सब लोग शोभायात्रा में शामिल होकर गाते, बजाते और नाचते हुए मंदिर पहुँचे।
  • मंदिर बाँस और फूलों से सजाया गया था, बहुत सुंदर और सादा था।
  • लोग मूर्तियों की पूजा कर रहे थे और एक-दूसरे पर पानी डाल रहे थे, चेहरों पर चावल का आटा लगा रहे थे।
  • चाऊतान ने बताया कि यह साङकेन का त्योहार है और इससे उनका नया साल शुरू होता है।
  • वल्लरी ने बताया कि उनके यहाँ होली से नया साल शुरू होता है।
  • साङकेन तीन दिन तक मनाया जाता है और आखिरी दिन मूर्तियाँ वापस बौद्ध-विहार ले जाई जाती हैं।
  • त्योहार के अंत में भिक्षु लोगों को आशीर्वाद देते हैं कि उनकी खेती अच्छी हो और सब खुश रहें।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि त्योहार खुशी और मिलजुलकर मनाने के लिए होते हैं। हमें एक-दूसरे की परंपराओं और संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए। मिलजुलकर रहने से प्यार और दोस्ती बढ़ती है। अतिथियों का स्वागत करना और उनका आदर करना एक अच्छी आदत है। परंपराएँ हमें अपनी संस्कृति से जोड़ती हैं और हमें एकता का अनुभव कराती हैं।

शब्दार्थ

  • मंडल कार्यालय: प्रशासनिक क्षेत्र का दफ्तर
  • भीड़-भाड़ वाली सड़केंबहुत अधिक लोगों और वाहनों वाली सड़कें
  • पालकी: कंधों पर उठाकर ले जाने की डिब्बेनुमा सवारी
  • शोभायात्रा: किसी पर्व या अवसर पर सजाकर निकाली जाने वाली यात्रा
  • बौद्ध-विहार: बौद्ध भिक्षुओं का मठ या धर्मस्थल
  • भिक्षु: बौद्ध धर्म का साधु
  • प्रतिदिन: हर दिन
  • जालीदार: जाल की तरह बनी हुई संरचना
  • खपच्ची: बाँस या लकड़ी की पतली पट्टी
  • टहनियाँ: पेड़ों की छोटी शाखाएँ
  • सादा: साधारण, बिना दिखावे का
  • मंत्र: धार्मिक अवसर पर पढ़े जाने वाले पवित्र वाक्य
  • गुलाल: रंग-बिरंगा सूखा पाउडर जो होली पर लगाया जाता है
  • अतिथि: मेहमान
  • आशीर्वाद: शुभकामना के रूप में दी गई दुआ
  • दंडवत प्रणाम: जमीन पर लेटकर किया जाने वाला प्रणाम
  • खेती फूले-फले: खेती अच्छी तरह बढ़े और भरपूर उपज दे
  • हिल-मिलकर: मिलजुलकर, आपसी मेल से

3. चाँद का कुर्ता – Chapter Notes

कविता का परिचय

यह कविता प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने लिखी है। इस कविता में चाँद को एक नन्हा बच्चा दिखाया गया है, जो ठंड से परेशान होकर अपनी माँ से ऊन का मोटा कुरता सिलवाने की ज़िद करता है। माँ उसे प्यार से समझाती है कि कुरता कैसे सिले, क्योंकि चाँद तो कभी छोटा होता है, कभी बड़ा और कभी दिखाई ही नहीं देता। इसलिए उसका नाप लेना बहुत मुश्किल है। यह कविता बहुत ही सरल, मज़ेदार और कल्पना से भरी है। इसमें चाँद को बच्चे जैसा बनाकर, ठंड और आकार बदलने की बात को मज़ेदार तरीके से बताया गया है।


कविता का सार

यह कविता चाँद और उसकी माँ के बीच की प्यारी बातचीत को दिखाती है। एक दिन चाँद अपनी माँ से कहता है कि वह बहुत ठंड महसूस करता है क्योंकि रात को तेज हवा चलती है। इसलिए वह माँ से एक मोटा ऊनी कुरता सिलवाने की ज़िद करता है।

माँ उसकी बात सुनकर प्यार से कहती है कि भगवान तुम्हारी रक्षा करें, लेकिन एक परेशानी है – तुम्हारी नाप कौन ले? कभी तुम छोटे दिखते हो, कभी बड़े। कभी पतले, तो कभी मोटे। कभी तो तुम बिल्कुल दिखते ही नहीं। रोज़-रोज़ बदलते रहते हो, तो फिर एक ही नाप का कुरता कैसे सिला जाए?

इस कविता में हँसी और प्यार के साथ यह समझाया गया है कि चाँद की आकृति हर दिन बदलती है, इसलिए उसके लिए एक नाप का कुरता बनाना असंभव है।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,  
“सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।  
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,  
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।

व्याख्या: एक दिन चाँद, एक जिद्दी बच्चे की तरह, अपनी माँ से कहता है कि उसे रात में बहुत ठंड लगती है। तेज “सन-सन” हवा चलती है, जिससे वह ठिठुरता रहता है। वह माँ से ऊन का मोटा झिंगोला (गरम कुरता) सिलवाने की ज़िद करता है, ताकि ठंड से बचा रहे और आसमान में अपनी रात की यात्रा आराम से पूरी कर सके।

प्रसंग 2

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,  
न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।”  
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, “अरे सलोने !  
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

व्याख्या: चाँद कहता है कि उसे सर्दियों के मौसम में आसमान में लंबा सफर करना पड़ता है, इसलिए उसे गरम कपड़ा चाहिए। अगर नया झिंगोला नहीं बन सकता, तो कोई किराए का या उधार का कुरता ही ला दो। माँ उसकी बात सुनकर प्यार से कहती है, “अरे मेरे सलोने बेटे! भगवान तुझे नजर से बचाए, कहीं तुझ पर जादू-टोना न हो जाए।” वह मजाक में उसकी ज़िद को हल्का करती है।

प्रसंग 3

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,  
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।  
कभी एक अंगुल-भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,  
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

व्याख्या: माँ कहती है कि ठंड की बात तो ठीक है, लेकिन मुझे चिंता इस बात की है कि तुम्हारा आकार कभी एक जैसा नहीं रहता। मैंने तुम्हें कभी एक नाप में नहीं देखा। कभी तुम एक अंगुल जितने छोटे दिखते हो, तो कभी एक फुट जितने बड़े। कोई दिन तुम बहुत छोटे तो कोई दिन बहुत बड़े हो जाते हो। ऐसे में तुम्हारी सही नाप कैसे लूँ?

प्रसंग 4

घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,  
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।  
अब तू ही तो बता, नाप तेरी किस रोज लिवाएँ,  
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?”

व्याख्या: माँ कहती है कि तुम तो रोज घटते-बढ़ते हो, और कभी-कभी तो बिल्कुल दिखाई ही नहीं देते, जैसे अमावस्या में। अब तू ही बता, तुम्हारी नाप किस दिन लें? अगर तुम्हारा आकार ही रोज बदलता है, तो ऐसा झिंगोला (कुरता) कैसे सिलवाया जाए जो तुम्हारे बदन में हर रोज फिट हो?

कविता से शिक्षा

यह कविता हमें यह सिखाती है कि हर चीज़ को मापकर, सोच-समझकर और सही समय पर करना चाहिए। चाँद की तरह अगर कोई हर दिन बदलता रहे — कभी बड़ा, कभी छोटा, तो उसके लिए सही चीज़ बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इससे हमें यह भी समझ में आता है कि अगर हम अपने कामों में स्थिर नहीं रहेंगे और हर दिन अपना मन बदलते रहेंगे, तो न तो कोई हमारी मदद कर पाएगा और न ही कोई काम ठीक से हो पाएगा। इसलिए हमें खुद में थोड़ा स्थिर और समझदार बनना चाहिए।

शब्दार्थ

  • हठ: ज़िद
  • झिंगोला: ऊन से बना मोटा कपड़ा या कुरता
  • सन-सन: हवा चलने की आवाज़
  • ठिठुर-ठिठुरकर: ठंड से काँपते हुए
  • जाड़ा: सर्दी
  • भाड़े का: किराए का
  • सलोने: सुंदर, प्यारे
  • कुशल करें भगवान: भगवान रक्षा करें
  • जादू-टोने: तंत्र-मंत्र
  • नाप: माप
  • अंगुल: उंगली की चौड़ाई
  • फुट: लंबाई मापने की इकाई
  • घटता-बढ़ता: कभी छोटा, कभी बड़ा होना