13. पेड़ की बात – Chapter Notes

लेखक परिचयप्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बसु का बचपन प्रकृति का अवलोकन करते हुए बीता। पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से प्रेम करते हुए उनकी शिक्षा आंशिक रूप से जीवविज्ञान, भौतिकी, वनस्पति विज्ञान और विज्ञान कथा लेखन में स्वाभाविक रूप से हुई। वे एक बहुस्तरीय व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में एक निरंतर जीवनदानी और प्रेरणाप्रदाता के रूप में देखा जाता है, और वे अपने परिवार के प्रति जागरूक थे। इस प्रकार, जगदीशचन्द्र बसु ने न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठता की मिसाल प्रस्तुत की। ‘पेड़ की बात’ का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद संक्रांत ने किया है, जिसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने सर्वव्यापीता को भी सामने रखा।

मुख्य विषय

कहानी का मुख्य विषय पेड़ों का महत्व और उनके संरक्षण की आवश्यकता है। जगदीशचन्द्र बसु हमें बताते हैं कि पेड़ न केवल हमारे जीवन के लिए आवश्यक हैं, बल्कि वे हमारे पर्यावरण को भी संतुलित रखते हैं। पेड़ हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, जलवायु को नियंत्रित करते हैं, और जीवों को आश्रय देते हैं। कवि के अनुसार, पेड़ जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और हमें उनकी रक्षा करनी चाहिए।

कहानी का सार

बीज से पेड़ बनने की प्रक्रिया

लेखक ने बताया कि जब बीज को मिट्टी में बोया जाता है, तो वह धीरे-धीरे अंकुरित होता है। यह अंकुर मिट्टी के नीचे से ऊपर की ओर बढ़ता है। अंकुर का एक हिस्सा नीचे की ओर जड़ बनता है, जो मिट्टी में गहराई तक जाती है, जबकि दूसरा हिस्सा तने के रूप में ऊपर की ओर बढ़ता है। जड़ें मिट्टी से पोषक तत्व और पानी अवशोषित करती हैं, जिससे पेड़ का विकास होता है। तना पेड़ को मजबूती देता है और पत्तियों को सूरज की रोशनी तक पहुँचाता है।

पेड़-पौधों का भोजन ग्रहण करना

लेखक ने पेड़-पौधों के भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया का वर्णन किया है। पेड़-पौधों के “दाँत” नहीं होते, इसलिए वे ठोस भोजन नहीं कर सकते। वे मिट्टी से पानी और घुले हुए पोषक तत्वों को जड़ों के माध्यम से अवशोषित करते हैं। इसके अलावा, पत्तियाँ सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके “फोटोसिंथेसिस” की प्रक्रिया के माध्यम से ऊर्जा का उत्पादन करती हैं। पत्तियों में स्थित छोटे-छोटे रोमछिद्र (स्टोमेटा) हवा से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं, जिसे पेड़ ऑक्सीजन में परिवर्तित करके वातावरण में छोड़ते हैं।

प्रकाश और पेड़-पौधे

प्रकाश पेड़-पौधों के जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेखक बताते हैं कि पेड़-पौधों की पत्तियाँ हमेशा प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास करती हैं। अगर किसी पौधे को अंधेरे में रखा जाए, तो वह प्रकाश की तलाश में अपनी दिशा बदलता है। वनस्पतियों में एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा होती है, जिसमें सभी पौधे सूर्य के प्रकाश को पाने के लिए तेजी से ऊपर की ओर बढ़ने का प्रयास करते हैं। बेल-लताएँ भी पेड़ों से लिपटकर ऊपर की ओर बढ़ती हैं ताकि वे भी सूर्य की रोशनी प्राप्त कर सकें।

पेड़-पौधों का पर्यावरणीय योगदान

पेड़-पौधे न केवल ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, बल्कि वे हमारे वातावरण को भी स्वच्छ रखते हैं। जब हम सांस लेते हैं, तो हम कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जो पेड़-पौधों के लिए भोजन का स्रोत बनता है। पेड़ इस कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके वातावरण को शुद्ध करते हैं। इसके अलावा, पेड़-पौधे अपनी पत्तियों और शाखाओं से पर्यावरण में सुखद सुगंध और हरियाली का अनुभव कराते हैं, जिससे मानव जीवन को मानसिक और शारीरिक संतुलन मिलता है।

पेड़-पौधों की संरचना और जीवन

लेखक ने बताया कि पेड़-पौधे भी जीवित होते हैं और उन्हें भी हमारी तरह भोजन, पानी, और प्रकाश की आवश्यकता होती है। पेड़-पौधे जड़ों, तनों, और पत्तियों के माध्यम से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। जैसे-जैसे पेड़ बड़ा होता है, वह अपनी शाखाओं और पत्तियों के माध्यम से बढ़ता जाता है और अंततः एक विशाल पेड़ बन जाता है।

प्राकृतिक संसाधनों का संचय

पेड़ अपने जीवन के दौरान अपने शरीर में रस और पोषक तत्वों का संचय करते हैं, जिससे वे अपनी संतानों, यानी बीजों को पोषण प्रदान कर सकते हैं। पेड़ अपने जीवन के अंत में भी अपनी संतानों के लिए सब कुछ समर्पित कर देता है।

पेड़ों का अंत

जब पेड़ का जीवन समाप्त होने को आता है, तो उसकी शाखाएँ और पत्तियाँ सूखने लगती हैं। धीरे-धीरे, पेड़ की शाखाएँ टूटने लगती हैं, और अंत में पूरा पेड़ जड़ सहित धरती पर गिर जाता है। लेकिन अपने जीवन के अंत से पहले, पेड़ अपनी संतानों के रूप में बीज छोड़ जाता है, जो आगे चलकर नए पेड़ बनते हैं।

कहानी की मुख्य घटनाएं

  • बीज का अंकुरित होना और पौधे में बदलना।
  • पौधे का तना और जड़ का विकास।
  • पेड़-पौधों का भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया।
  • पत्तियों का सूर्य के प्रकाश की ओर मुड़ना।
  • पेड़ों द्वारा विषाक्त वायु को शुद्ध करना।
  • पेड़ का संतान उत्पन्न करने के लिए फूलों का निर्माण।
  • मधुमक्खियों और तितलियों का पराग-कणों को एक फूल से दूसरे फूल तक ले जाना।
  • पेड़ का अंत में सुख कर गिर जाना।

कहानी से शिक्षाकहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन का प्रत्येक हिस्सा महत्वपूर्ण होता है और प्रकृति की हर छोटी-बड़ी चीज का अपना महत्व है। पेड़-पौधों की जीवन यात्रा हमें धैर्य, संघर्ष, और निस्वार्थ प्रेम की प्रेरणा देती है। वे हमारे जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं। हमें पेड़ों की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति जागरूक होना चाहिए।

शब्दावली

  • अंकुर: बीज से निकलने वाला नया पौधा
  • तना: पौधे का ऊपर की ओर बढ़ने वाला हिस्सा
  • जड़: पौधे का मिट्टी के अंदर रहने वाला हिस्सा
  • तरल द्रव्य: पेड़-पौधों का द्रव भोजन
  • अंगारक वायु: पेड़ों द्वारा शुद्ध की जाने वाली विषाक्त वायु
  • पराग-कण: फूलों में पाए जाने वाले सूक्ष्म कण
  • मृदंग: वृक्ष का भोजन बनाने का अंग
  • संवर्द्धन: वृक्ष का विकास

निष्कर्ष“पेड़ की बात” कहानी हमें यह सिखाती है कि पेड़-पौधों का जीवन कितना महत्वपूर्ण है और वे हमारे पर्यावरण के लिए कितने आवश्यक हैं। उनकी निस्वार्थता और जीवन के प्रति उनका संघर्ष हमें प्रेरित करता है। हमें पेड़ों का संरक्षण करना चाहिए और उन्हें संरक्षित रखने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। पेड़-पौधे हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और हमें उनके महत्व को समझना और उन्हें बचाना चाहिए।

12. हिंद महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान – Chapter Notes

लेखक परिचयआपने जो रोचक यात्रा-वृत्तांत पढ़ा है, वह हिंदी के प्रसिद्ध लेखक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखा गया है। ‘दिनकर’ की रचनाओं की विशेषता भारत और उसकी संस्कृति है। उनकी रचनाओं में वीरता, उत्साह और देशभक्ति का भाव प्रमुख रूप से पाया जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी भारत का गौरव-गान उनकी रचनाओं का प्रमुख विषय रहा। उन्होंने बच्चों के लिए भी पुस्तकें लिखी हैं, जैसे— मिर्च का मजा, पटाखों की छुट्टी और सूरत का ब्याह आदि।

मुख्य विषय

इस पाठ का मुख्य विषय प्रवासी भारतीयों की मातृभूमि के प्रति लगाव और उनकी संस्कृति का संरक्षण है। लेखक ने बताया है कि कैसे मॉरीशस जैसे देश में बसे भारतीय अपनी भारतीय पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखे हुए हैं। यह पाठ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।

कहानी का सार

लेखक का यात्रा विवरण

कहानी “हिंद महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान” में लेखक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अपने मॉरिशस यात्रा के अनुभवों को साझा करते हैं। लेखक की यात्रा 15 जुलाई को दिल्ली से शुरू होती है। 16 जुलाई को वे मुंबई से और 17 जुलाई को नैरोबी (केन्या) से मॉरिशस के लिए रवाना होते हैं। नैरोबी में उनके पास एक रात और दो दिन ठहरने का समय होता है, इसलिए वे नैरोबी के नेशनल पार्क में घूमने जाते हैं।

नैरोबी का नेशनल पार्क एक विशाल जंगल है, जहाँ पेड़ों की कमी और घास की बहुतायत है। यहाँ वे सिंहों को देखने की कोशिश करते हैं। काफी समय तक सफर करने के बाद वे एक जगह पहुँचते हैं, जहाँ सिंह आराम कर रहे होते हैं। सिंहों की गतिविधियों को देखकर लेखक को एहसास होता है कि ये सिंह पर्यटकों की उपस्थिति से बिल्कुल अप्रभावित हैं। इसी दौरान कुछ दूर हिरनों का एक झुंड दिखता है, जिनके बीच एक जिराफ खड़ा होता है। जैसे ही सिंहों की नजर हिरनों पर पड़ती है, वे शिकार की तैयारी करने लगते हैं। हिरनों के झुंड में हलचल होती है, लेकिन वे तुरंत भागने के बजाय सतर्क होकर खड़े रहते हैं।

मॉरिशस का परिचय

मॉरिशस एक छोटा-सा द्वीप है जो हिंद महासागर में स्थित है। लेखक ने मॉरिशस को ‘हिंद महासागर का मोती’ और ‘भारत-सागर का सबसे खूबसूरत सितारा’ कहा है। मॉरिशस का क्षेत्रफल लगभग 720 वर्गमील है और यह द्वीप चारों ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। मॉरिशस की अधिकांश जनसंख्या भारतीय मूल की है, जिनमें से 67 प्रतिशत लोग भारतीय वंश के हैं और उनमें से अधिकांश हिंदू हैं। इस कारण मॉरिशस को ‘छोटा-सा हिंदुस्तान’ भी कहा जा सकता है।

भारतीय संस्कृति का प्रभाव

मॉरिशस में भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव है। यहां के लोग भारतीय त्योहारों को बड़े धूमधाम से मनाते हैं, जैसे दशहरा, और वे धार्मिक स्थलों पर जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। मॉरिशस के मध्य में स्थित ‘परी-तालाब’ नामक झील एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जहां पर भक्तगण कांवड़ लेकर जाते हैं और वहां की पवित्र जल को अपने गांव के मंदिरों में चढ़ाते हैं। यह स्थान धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।

भाषा और समाज

मॉरिशस में मुख्य भाषा फ्रेंच है, लेकिन अधिकांश भारतीय मूल के लोग भोजपुरी बोलते हैं, जो वहां की दूसरी सबसे प्रमुख भाषा है। यहां की भोजपुरी भाषा में फ्रेंच के शब्द भी मिलते हैं, जिससे यह भाषा और भी अनोखी बन जाती है। भारतीय मूल के लोगों ने मॉरिशस की कृषि, विशेषकर गन्ने की खेती और चीनी उद्योग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

भारत और मॉरिशस के संबंध

लेखक ने मॉरिशस को भारत का एक हिस्सा माना है, क्योंकि वहां के लोग भारतीय संस्कृति और परंपराओं का पालन करते हैं। मॉरिशस में भारतीय संस्कृति को देखने के बाद लेखक को गर्व महसूस होता है, और वह इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारतीय संस्कृति कितनी जीवंत और स्थायी है।

कहानी की मुख्य घटनाएं

  • लेखक की यात्रा दिल्ली से शुरू होती है और वे नैरोबी (केन्या) में रुकते हैं, जहाँ वे नेशनल पार्क में सिंहों को देखते हैं।
  • लेखक नैरोबी से मॉरिशस पहुँचते हैं, जहाँ वे मॉरिशस की भारतीय संस्कृति और वहाँ के लोगों के बारे में बताते हैं।
  • मॉरिशस में भारतीय समुदाय की प्रमुखता, उनकी धार्मिकता, और उनकी सांस्कृतिक पहचान को कहानी में विस्तार से बताया गया है।
  • लेखक मॉरिशस के प्रमुख त्यौहार शिवरात्रि का वर्णन करते हैं, जिसमें भारतीय लोग परी-तालाब पर जाकर शिवजी की पूजा करते हैं।
  • लेखक मॉरिशस के मंदिरों और शिवालयों की स्वच्छता और सुरम्यता की प्रशंसा करते हैं, और भारत में भी ऐसे स्थानों को स्वच्छ रखने का आग्रह करते हैं।

कहानी से शिक्षाइस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भारतीय संस्कृति और परंपराएँ अत्यंत प्राणवंत और चिरायु हैं, चाहे भारतीय कहीं भी क्यों न रहें। उन्होंने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा है और विदेश में भी अपनी संस्कृति को जीवित रखा है। यह हमें गर्व करने का अवसर देती है कि भारतीय अपनी पहचान को बनाए रखने में सक्षम हैं और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान रखते हैं।

शब्दावली

  • यात्रा वृत्तांत: एक यात्रा के दौरान के अनुभवों का वर्णन
  • नैरोबी: केन्या की राजधानी
  • सिंह: शेर
  • मॉरिशस: हिंद महासागर में स्थित एक द्वीप राष्ट्र
  • परी-तालाब: मॉरिशस में स्थित एक झील, जिसे हिंदुओं ने धार्मिक महत्व दिया है
  • शिवरात्रि: हिंदुओं का एक प्रमुख धार्मिक पर्व
  • काँवर: शिवजी की पूजा के लिए जल भरने के लिए प्रयोग में आने वाला बर्तन

निष्कर्ष“हिंद महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान” एक प्रेरणादायक कहानी है, जो मॉरिशस में बसे भारतीय समुदाय की धार्मिकता, सांस्कृतिक पहचान, और स्वच्छता के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है। यह कहानी भारतीय संस्कृति की शक्ति और उसकी प्राणवत्ता का प्रतीक है, जो हमें अपनी पहचान पर गर्व करने का संदेश देती है। कहानी से हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि भारतीय जहाँ भी जाते हैं, वहाँ अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेज कर रखते हैं, जिससे वह स्थान भी छोटा-सा हिंदुस्तान बन जाता है।

11. चेतक की वीरता – Chapter Notes

कवि परिचय

इस कविता के रचयिता श्याम नारायण पाण्डेय हैं, जिनका जन्म 1907 ई. में हुआ था। पाण्डेय जी वीर रस के प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। उनकी सबसे चर्चित रचना है- ‘हल्दीधाटी’, जिसका प्रकाशन 1939 में हुआ था। ‘चेतक की वीरता’ शीर्षक कविता उसी रचना ‘हल्दीघाटी’ का एक अंश है। इस रचना ने स्वतंत्रता सेनानियों में सांस्कृतिक एकता और उत्साह का संचार किया था। पाण्डेय जी का निधन 1991 ई. में हुआ।

मुख्य विषय

“चेतक की वीरता” का मुख्य विषय है महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वीरता और निष्ठा। यह कविता वीर रस में लिखी गई है और एक पशु के साहस तथा अपने स्वामी के प्रति उसकी निष्ठा को प्रदर्शित करती है। इसमें चेतक की कुशलता, निडरता और युद्ध में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका का वर्णन किया गया है। यह कविता पाठकों में देशभक्ति और वीरता की भावना को जागृत करती है।

कविता का सार‘चेतक की वीरता’ कविता में कवि ने चेतक की वीरता और उसकी अद्वितीय क्षमता का वर्णन किया है। चेतक युद्ध के मैदान में चौकड़ी भरकर अथवा छलांग लगाकर अपनी वीरता को दिखाता है, उसके चलने के तीव्र गति से ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानो वह हवा से बातें कर रहा हो अथवा हवा का सामना कर रहा हो ।

राणा प्रताप का कोड़ा चेतक के तन पर कभी भी नहीं गिरता था, क्योंकि वह इतना समझदार था कि अपने स्वामी की आज्ञा को भली-भाँति समझ जाता था। वह शत्रुओं के मस्तक पर इस तरह से आक्रमण करता था जैसे मानो कोई आसमान से घोड़ा ज़मीन पर उतर आया हो अर्थात वह बहुत तेजी से अपने शत्रुओं के सिर पर प्रहार करता था।

अगर हवा के माध्यम से भी घोड़े की लगाम जरा-सी भी हिल जाती थी तो वह तुरंत अपनी सवारी को लेकर अर्थात राणा प्रताप को लेकर तीव्र गति से उड़ जाता था। अर्थात बहुत तेजी से दौड़ने लगता था । राणा प्रताप को जिस तरह मुड़ना होता वह उनकी आँखों के पुतली के घुमने से पूर्व ही चेतक उस दिशा में मुड़ जाता था, कहने का तात्पर्य यह है कि चेतक अपने स्वामी की हर प्रतिक्रिया को भली-भाँति समझ जाता था।

चेतक अपनी कौशलता और वीरता का परिचय अपनी चाल के द्वारा दिखाता । तीव्र गति से दौड़ना और निडर होकर अपने शत्रुओं पर आक्रमण करना यह उसकी वीरता का स्मारक था। वह निडर होकर युद्ध के समय में भयानक भालों और तलवारों से सुसज्जित सेनाओं के बीच में जाकर उन पर प्रहार करता और नहरों-नालों आदि को पार करता हुआ सरपट अर्थात बहुत तेज गति से बाधाओं में फँसने के बाद भी वह निकल जाता ।

युद्ध के क्षेत्र में ऐसा कोई स्थान नहीं था जहाँ पर चेतक ने अपने शत्रुओं पर प्रहार न किया हो। वह किसी एक स्थान पर दिखता तो पर जैसे ही शत्रु उस पर आक्रमण करने के लिए वहाँ पहुँचते तो वह वहाँ से तुरंत गायब हो जाता फिर वह कहीं दूसरी जगह दिखता। ठीक उसी प्रकार बाद में वहाँ से भी गायब हो जाता। अतः वह युद्ध के सभी स्थलों पर अपनी वीरता का परचम लहराता था ।

वह नदी की लहरों की भाँति आगे बढ़ता गया। वह जहाँ भी जाता कुछ क्षण के लिए रुक जाता फिर अचानक विकराल, बिजली की चमक की तरह बादल का रूप धारण करके अपने दुश्मनों पर प्रहार करता ।

घोड़े की टापों से दुश्मन पूरी तरह से घायल हो गए। उनके भाले और तरकस सभी ज़मीन पर पड़े थे। चेतक की वीरता का ऐसा पराक्रम देखकर बैरी दल दंग रह गया ।

कविता की व्याख्या

(1)
रण-बीच चौकड़ी भर-भरकर
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा को पाला था।
गिरता न कभी चेतक-तन पर
राणा प्रताग का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर
या आसमान पर घोड़ा था।

व्याख्या: कवि बताते हैं कि महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक युद्धभूमि में इतनी गति से दौड़ता था कि वह एक अनोखा घोड़ा बन गया था। चेतक इतनी तेज दौड़ता था कि ऐसा लगता था कि वह हवा के साथ मुकाबला कर रहा हो। वह हमेशा इतना सतर्क रहता था कि उसके शरीर पर कभी भी कोड़ा मारने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वह शत्रुओं के सिर के ऊपर से इस तरह दौड़ता था जैसे वह आकाश में दौड़ रहा हो। वह शत्रुओं के बीच से होते हुए एक छोर से दूसरे छोर तक इतनी तेजी से दौड़ता था कि वह किसी आकाशीय घोड़े की तरह प्रतीत होता था।

(2)
जो तनिक हवा से बाग हिली
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था।
कौशल दिखलाया चालों में
उड़ गया भयानक भालों में।
निर्भीक गया वह ढालों में
सरपट दौड़ा करवालों में।

व्याख्या: कवि चेतक की सजगता को बताते हुए कहता है कि यदि थोड़ी सी हवा से भी उसकी लगाम हिल जाती, तो वह तुरंत सवार के इशारे को समझकर हवा में उड़ जाता था। राणा प्रताप की आँख की पुतली के इशारे पर वह तुरंत दिशा बदल लेता था। चेतक अपनी चाल में इतना कुशल था कि वह भयंकर भालों के बीच से भी बिना किसी डर के निकल जाता था। वह ढालों की परवाह किए बिना निडरता से उनके बीच से दौड़ता चला जाता था। तलवारों के बीच भी वह बेखौफ दौड़ता रहा। किसी भी प्रकार की बाधा उसे रोक नहीं सकती थी। उसकी युद्ध-कला और साहस अविश्वसनीय था।

(3)
है यहीं रहा, अब यहाँ नहीं
वह वहीं रहा है वहाँ नहीं।
थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरि-मस्तक पर कहाँ नहीं।
बढ़ते नद-सा वह लहर गया
वह गया गया फिर ठहर गया।
विकराल बज्र-मय बादल-सा
अरि की सेना पर घहर गया।
भाला गिर गया, गिरा निषंग,
हय-टापों से खन गया अंग।
वैरी-समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग।

व्याख्या: चेतक की यह विशेषता थी कि वह कभी भी एक जगह नहीं रुकता था। वह एक स्थान पर होता और अगले पल किसी और स्थान पर दिखाई देता। युद्धभूमि में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहाँ वह नहीं पहुँचा हो, अर्थात वह हर जगह मौजूद रहता था। वह हर शत्रु के मस्तक पर दिखाई दे जाता था।
वह एक तेज बहती नदी की तरह लहराता हुआ चलता था। कभी-कभी वह बीच में रुक भी जाता था, फिर अचानक वह शत्रु सेना पर भयंकर बझ्र की तरह टूट पड़ता था और शत्रुओं का संपूर्ण नाश कर देता था। वह शत्रु सेना पर घहरा कर बादल की तरह आक्रमण करता था। शत्रु के भाले और तरकश युद्धभूमि में गिर जाते थे, और घोड़े के पैरों की टापों से शत्रु का पूरा दल घायल हो जाता था। शत्रुओं का दल घोड़े की ऐसी वीरता देखकर हैरान रह जाता था।

कविता की मुख्य घटनाएं

  • चेतक की अद्वितीय चौकड़ी और निराला रूप।
  • हवा से तेज दौड़ने की क्षमता।
  • राणा प्रताप का कोड़ा चेतक पर कभी न गिरना।
  • चेतक का निर्भीक होकर भालों और ढालों में दौड़ना।
  • अरि की सेना पर वज्र-मय बादल की तरह टूट पड़ना।
  • वैरी समाज का चेतक के साहस से दंग रह जाना।

कविता से शिक्षा

‘चेतक की वीरता’ कविता हमें अदम्य साहस, वीरता और निर्भीकता की शिक्षा देती है। यह कविता यह भी सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हमें हार नहीं माननी चाहिए और अपने कौशल और साहस के बल पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

शब्दावली

  • चौकड़ी: तेज गति से दौड़ना
  • अरि: शत्रु
  • मस्तक: सिर
  • कौशल: निपुणता
  • भाला: एक प्रकार का हथियार
  • निषंग: तलवार की म्यान
  • हय-टाप: घोड़े के खुर की आवाज़
  • वीरता: बहादुरी
  • विकराल: भयानक

निष्कर्ष‘चेतक की वीरता’ कविता वीरता, साहस और अदम्य आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह कविता न केवल चेतक के अद्वितीय गुणों का वर्णन करती है, बल्कि हमें यह भी सिखाती है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी साहस और आत्मविश्वास के साथ विजय प्राप्त की जा सकती है। श्यामनारायण पाण्डेय की यह कविता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में उत्साह और सांस्कृतिक एकता का संचार करने वाली है।

10. परीक्षा – Chapter Notes

लेखक परिचय

‘परीक्षा’ प्रेमचंद द्वारा रचित एक कहानी है, जो सच्चे नेतृत्व, विनम्रता और आंतरिक गुणों के महत्व पर आधारित है।। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि असली नेतृत्व बाहरी दिखावे या योग्यता में नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक गुणों में निहित होता है। प्रेमचंद हिंदी और उर्दू साहित्य के महान लेखक माने जाते हैं। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। अपने लेखन में उन्होंने समाज की कुरीतियों और सामाजिक विषमताओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया। उनकी कहानियाँ आम जनजीवन, गरीबी, समाज और जीवन की सच्चाइयों को सामने लाती हैं। 

मुख्य विषय

कहानी का मुख्य विषय समाज में सच्ची योग्यता और सेवा भावना की पहचान है। एक सच्चे और समझदार व्यक्ति की पहचान उसके कार्यों और दूसरों के प्रति सहानुभूति में निहित होती है। इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि पद या प्रतिष्ठा केवल योग्यता के आधार पर ही मिलने चाहिए, और जो सही मायनों में दयालु और सक्षम हैं, वही इस प्रकार के उच्च पद के हकदार होते हैं।

कहानी का सारकहानी की शुरुआत दवेगढ़ रियासत के दीवान, सरदार सुजानसिंह, से होती है। वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं और अपनी बढ़ती उम्र के कारण अपने पद से सेवानिवृत्त होना चाहते हैं। दीवान साहब, जो वर्षों से रियासत की सेवा कर रहे हैं, राजा से निवेदन करते हैं कि वे उनके स्थान पर एक योग्य उत्तराधिकारी का चयन करें। राजा, दीवान साहब की अनुभवशीलता और उनके प्रति विश्वास को देखते हुए, उन्हें ही नए दीवान का चयन करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं।

विज्ञापन के बाद, देशभर से कई उम्मीदवार दवेगढ़ में एकत्रित होते हैं। ये सभी अपने श्रेष्ठता और योग्यताओं को विभिन्न तरीकों से प्रदर्शित करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग अपने कपड़ों और फैशन से, जबकि कुछ अपने ज्ञान और समझ से, अपनी योग्यताओं को दिखाने का प्रयास करते हैं। उम्मीदवार इस सोच में होते हैं कि यदि वे बाहरी रूप से अच्छे दिखें और अपने व्यवहार में श्रेष्ठता दिखाएं, तो उन्हें दीवान के पद के लिए चुना जा सकता है।

नया दीवान खोजने की प्रक्रिया

नए दीवान की नियुक्ति के लिए एक सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया जाता है। इस विज्ञापन में स्पष्ट किया जाता है कि उम्मीदवार के लिए स्नातक होना आवश्यक नहीं है, लेकिन उसे शारीरिक रूप से स्वस्थईमानदार, और जिम्मेदार होना चाहिए। उम्मीदवारों को बताया जाता है कि उनकी योग्यता के साथ-साथ उनके चरित्र का भी परीक्षण किया जाएगा।

किसान की मदद का दृश्य

कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब सभी उम्मीदवार एक खेल में व्यस्त होते हैं। उसी समय, एक गरीब किसान अपनी गाड़ी लेकर वहां से गुजरता है। दुर्भाग्यवश, उसकी गाड़ी कीचड़ में फंस जाती है और वह उसे बाहर निकालने में असमर्थ होता है। वह बार-बार प्रयास करता है, लेकिन उसकी सारी कोशिशें बेकार जाती हैं। वह आसपास के लोगों से मदद की उम्मीद करता है, लेकिन सभी उम्मीदवार, जो अपनी छवि और प्रतिष्ठा को बनाए रखने में व्यस्त होते हैं, उसकी परेशानी को नजरअंदाज कर देते हैं।

उसी समय, एक युवक, जो खेल के दौरान घायल हो गया था, उस किसान की परेशानी को देखता है। उस युवक के अंदर करुणा और साहस का भाव उमड़ता है। वह बिना किसी हिचकिचाहट के किसान की मदद के लिए आगे बढ़ता है। वह अपने कपड़े उतारकर, पूरी ताकत से गाड़ी को धक्का देने लगता है। अंततः, उसकी मदद से किसान की गाड़ी कीचड़ से बाहर निकल जाती है।

सच्चे नेतृत्व का चयन

इस घटना को गुप्त रूप से देख रहे दीवान सरदार सुजानसिंह, उस युवक की निःस्वार्थता और दयालुता से प्रभावित होते हैं। उन्हें एहसास होता है कि सच्चे नेतृत्व के लिए केवल बाहरी योग्यता नहीं, बल्कि आंतरिक गुण भी आवश्यक हैं। वह युवक, जिसने बिना किसी स्वार्थ के किसान की मदद की, उन्हें रियासत के दीवान के रूप में सही उम्मीदवार लगता है।

अंततः, दीवान साहब राजा के दरबार में सभी उम्मीदवारों के सामने उस युवक को नए दीवान के रूप में घोषित करते हैं। यह घोषणा अन्य उम्मीदवारों को चौंका देती है, क्योंकि वे समझ नहीं पाते कि केवल एक साधारण से दिखने वाले युवक को क्यों चुना गया। लेकिन दीवान साहब स्पष्ट करते हैं कि सच्चा नेता वही है, जिसमें करुणा, साहस, और निःस्वार्थ सेवा की भावना हो।

कहानी की मुख्य घटनाएं

  • दीवान सरदार सुजानसिंह की सेवा निवृत्ति की प्रार्थना।
  • नए दीवान के लिए विज्ञापन का प्रकाशन।
  • सैकड़ों उम्मीदवारों का देवगढ़ में आना।
  • उम्मीदवारों की जांच और रहन-सहन।
  • किसान की गाड़ी कीचड़ में फंसना।
  • एक युवक द्वारा किसान की मदद।

कहानी से शिक्षाकहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा नेतृत्व वही है जिसमें दया, साहस और आत्मबल हो। बाहरी दिखावा महत्वहीन होता है, जबकि इंसान का आचरण और व्यवहार ही उसकी वास्तविक पहचान होती है। निःस्वार्थ सेवा और परोपकार ही सच्ची मानवता है।

शब्दावली

  1. दीवान: राज्य का प्रमुख मंत्री
  2. विनय: निवेदन
  3. रहन-सहन: जीवन शैली
  4. आत्मबल: आत्मा की शक्ति
  5. उदारता: दानशीलता
  6. नसीब: भाग्य
  7. संकल्प: दृढ़ निश्चय

निष्कर्षइस कहानी का निष्कर्ष यह है कि समाज में ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो निःस्वार्थ सेवा, दया, और साहस के साथ कार्य करें। बाहरी दिखावा और नकली आदर्शों से कुछ नहीं होता, बल्कि सच्चे आदर्शों और नैतिक मूल्यों का पालन करना ही महत्वपूर्ण है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यही संदेश देने का प्रयास किया है कि दयालु और साहसी व्यक्ति ही समाज का सच्चा नेता होता है।

09. मैया मैं नहीं माखन खायो – Chapter Notes

कवि परिचयसूरदास एक प्रतिष्ठित संत, कवि और गायक थे। उन्हें हिंदी भक्ति साहित्य के महत्वपूर्ण कवियों में गिना जाता है। वे भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और उनके पदों में कृष्ण की बाल लीलाओं का गहरा वर्णन किया गया है। उनके काव्य में प्रेम, भक्ति और करुणा का अद्वितीय मेल देखने को मिलता है।

मुख्य विषय

इस कविता का प्रमुख विषय भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं और उनकी मासूमियत को दर्शाना है। इसके अलावा, यह कविता माँ और बेटे के रिश्ते की मिठास और उनके बीच के विश्वास को भी प्रस्तुत करती है।

कविता का सार’मैया मैं नहिं माखन खायो’ कविता में सूरदास जी ने बालक कृष्ण और उनकी माँ यशोदा के बीच हुए संवाद को बहुत ही सरल और सुंदर शब्दों में वर्णित किया है। कविता की शुरुआत में कृष्ण अपनी माँ से कहते हैं कि उन्होंने माखन नहीं खाया है। वे बताते हैं कि सुबह से ही वे गैयन (गायों) के पीछे मधुबन (वन) में चले गए थे और वहां चार पहर तक बंसीवट (वृक्ष) के पास भटकते रहे। शाम होने पर वे घर लौटे।

कृष्ण कहते हैं कि वे छोटे बच्चे हैं, उनकी बाहें छोटी हैं, और वे छींके से माखन नहीं निकाल सकते। ग्वाल-बाल (गाय चराने वाले बालक) उनके विरुद्ध हैं और जबरदस्ती उनके मुख पर माखन लगा दिया। कृष्ण अपनी माँ को यह भी कहते हैं कि वह दिल से बहुत भोली हैं और दूसरों की बातों पर जल्दी विश्वास कर लेती हैं।

अंत में, कृष्ण अपनी माँ को उनकी कमरिया (दुपट्टा) देते हुए कहते हैं कि उन्होंने उन्हें बहुत नचाया है। यशोदा, सूरदास के अनुसार, इस मासूमियत भरे उत्तर को सुनकर हंस पड़ती हैं और कृष्ण को अपने गले से लगा लेती हैं।

पद की व्याख्या

मैया मैं नहिं माखन खायो ।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो ।
चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ।।
मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो ।
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ।।
तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो ।
जिय तेरे कछु भेद उपज हैं, जानि परायो जायो।।
ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।
सूरदास तब बिहाँस जसोदा, लै उर कंठ लगायो।।

व्याख्या: कवि सूरदास जी के पदों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का बहुत ही मनमोहक चित्रण किया गया है। माता यशोदा उनके बाल- विनोद को देखकर बहुत खुश होती हैं। इस पद में कवि ने श्रीकृष्ण के नटखट स्वभाव का सुंदर वर्णन किया है। सूरदास जी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। इस पद में श्रीकृष्ण माखन चुराकर खाते हैं। जब उनकी चोरी पकड़ी जाती है, तो माता यशोदा उनसे माखन चुराने का कारण पूछती हैं। श्रीकृष्ण मना करते हुए कहते हैं, “माँ, मैंने माखन नहीं खाया है। तुम मुझे रोज़ सुबह गायों के पीछे मधुबन भेज देती हो, और वहां बंसीवट के पास चार पहर (पूरा दिन) बिता देता हूँ। फिर शाम को घर लौटता हूँ।” माँ पूछती हैं, “फिर तेरे मुँह पर माखन कैसे लगा?” तो कृष्ण चंचलता से उत्तर देते हैं, “मैंने माखन नहीं खाया। मैं तो बहुत छोटा हूँ, मेरे हाथ भी छोटे हैं। मैं कैसे ऊँचे छीके से माखन चुरा सकता हूँ? ग्वाल-बालों ने मिलकर अपनी शरारत के कारण मुझसे माखन चुराकर मेरे मुँह पर लगा दिया है। माँ, तुम तो बहुत भोली हो, जो इनकी बातों में आ जाती हो।” फिर कृष्ण माँ से कहते हैं, “तुम मुझे पराया समझकर इनकी बातों में आकर ऐसा कह रही हो।” फिर नाराज़गी दिखाते हुए कहते हैं, “ये अपनी लंकुटी और कमरिया ले लो, तुमने मुझे बहुत परेशान किया है।” इस पर माता यशोदा हँस पड़ती हैं और कृष्ण को प्यार से गले से लगा लेती हैं। बच्चों की शरारत और ज्ञान- भरी बातों को सुनकर माता-पिता का क्रोध समाप्त हो जाता है और वे प्रसन्न हो जाते हैं।

कविता की मुख्य घटनाएं

  • कृष्ण का माखन चोरी का आरोप खंडन।
  • गायों के पीछे वन जाने का विवरण।
  • ग्वाल-बाल द्वारा जबरदस्ती मुख पर माखन लगाना।
  • यशोदा की भोलेपन पर टिप्पणी।
  • यशोदा का कृष्ण को गले लगाना।

कविता से शिक्षा

  • सच्चाई और मासूमियत की शक्ति।
  • माता-पिता और बच्चों के बीच का स्नेहपूर्ण रिश्ता।
  • किसी भी परिस्थिति में सच्चाई का साथ न छोड़ना।
  • निर्दोषता की अहमियत और मूल्य।

शब्दावली

  • माखन: मक्खन
  • गैयन: गायें
  • मधुबन: वन या जंगल
  • बंसीवट: वृक्ष
  • बैर: विरोधी
  • छीको: छींका, वह स्थान जहाँ माखन रखा जाता है
  • पतियायो: विश्वास करना
  • बिहँसि: हँसना

निष्कर्ष‘मैया मैं नहिं माखन खायो’ कविता भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की मासूमियत और सच्चाई को उजागर करती है। सूरदास जी ने इस कविता के माध्यम से यह संदेश दिया है कि सच्चाई और सरलता हमेशा दिल को छूती है और यही वास्तविकता है। कृष्ण और यशोदा के इस प्रेमपूर्ण संवाद से हमें यह सीख मिलती है कि माता-पिता और बच्चों के बीच का स्नेह कभी नहीं टूटना चाहिए और हमें सच्चाई का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

08. सत्रिया और बिहू नृत्य – Chapter Notes

लेखक परिचय

जया मेहता एक जानी-मानी लेखिका हैं जिनका भारतीय संस्कृति और नृत्य कला में गहरा रुचि है। उन्होंने अपने लेखन के जरिए असम की संस्कृति, विशेष रूप से सत्रिया और बिहू नृत्य, को व्यापक रूप से परिचित कराया है। उनके लेखन में भारतीय परंपरा, लोक कला और क्षेत्रीय नृत्य शैलियों का गहरा ज्ञान और समझ प्रकट होती है।

अनुवादक: शिवेंद्र कुमार सिंह

शिवेंद्र कुमार सिंह एक अनुभवी अनुवादक हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य में कई महत्वपूर्ण कृतियों का अनुवाद किया है। उनका अनुवाद सरल और स्पष्ट भाषा में होता है, जिससे पाठक मूल भाव को आसानी से समझ पाते हैं।

मुख्य विषय

इस पाठ का मुख्य विषय असम के पारंपरिक नृत्य – सत्रिया और बिहू – की महत्ता और सांस्कृतिक विशेषताएँ हैं। सत्रिया नृत्य असम की प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है, जिसमें भक्ति भाव और शास्त्रीय तत्वों का समावेश है। वहीं, बिहू नृत्य असम के किसानों द्वारा फसल कटाई के दौरान मनाए जाने वाले त्योहार का हिस्सा है, जो जीवंतता और उल्लास का प्रतीक है। इस पाठ के माध्यम से इन दोनों नृत्यों के जरिए असम की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित किया गया है, जिसमें समुदाय, परंपरा और प्रकृति के साथ गहरा संबंध दिखाया गया है।

कहानी का सारयह कहानी एंजेला नाम की एक छोटी लड़की की है, जो लंदन में रहती थी। एंजेला का जीवन लंदन में काफी सामान्य था; उसका स्कूल उसके घर के पास है, और वह अपने दोस्तों जेम्स और कीरा के साथ समय बिताने में खुश रहती है। ये तीनों बच्चे मिलकर कल्पनाओं की दुनिया में खो जाने वाले खेल खेलते हैं। एंजेला को उन कहानियों में बहुत मज़ा आता है जिनमें ताजमहल, एफिल टॉवर, या कोलोजियम जैसी जगहों की यात्रा शामिल होती है। वह अपनी माँ, एलेसेंड्रा, से बहुत प्रभावित थी, जो एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता थीं और लंदन की प्रतिष्ठित ‘ब्रिटिश एकेडमी’ से मिली सहायता के साथ असम की नृत्य परंपराओं पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने जा रही थीं।

एक दिन अचानक, एंजेला की माँ उसे बताती हैं कि वे असम की यात्रा पर जा रहे हैं। एंजेला इस खबर से चौंक गई क्योंकि यह यात्रा अचानक और जल्दबाजी में तय हुई थी। एंजेला और उसका परिवार नई दिल्ली होते हुए गुवाहाटी पहुँचा, जहाँ वे एक होटल में ठहरे।

गुवाहाटी पहुँचने के बाद, एंजेला को असम की खूबसूरती और वहाँ की संस्कृति का अनुभव करती है।। उसकी माँ उसे बताती हैं कि असम, पूर्वोत्तर भारत का एक सुंदर राज्य है, जो अपने समृद्ध वन्यजीवन, रेशम, चाय के बागानों और नृत्य परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। वे मलंग गाँव में बोहाग बिहू त्योहार देखने गए, जो असम में नए साल के आगमन और बसंत ऋतु का प्रतीक है। यह त्योहार मुख्यतः किसानों द्वारा मनाया जाता है और साल में तीन बार आयोजित किया जाता है—जब बीज बोए जाते हैं, धान रोपा जाता है और फसल तैयार होती है।

गाँव में पहुँचकर एंजेला त्योहार के जीवंत माहौल को देखकर आश्चर्यचकित हो जाती है। वहाँ एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे मंच सजा था, जहाँ पुरुष और महिलाएँ पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाते हुए रंगीन परिधानों में नृत्य कर रहे थे। यह दृश्य एंजेला को अत्यंत आकर्षक और जादुई प्रतीत होता है, मानो वह किसी टाइम मशीन में बैठकर अतीत की सैर कर रही हो। नृत्य देखते-देखते वह उसमें खो जाती है और महसूस करती है कि वह भी इस नृत्य का हिस्सा बन जाए।

एंजेला की माँ, एलेसेंड्रा, डॉक्यूमेंट्री के लिए जानकारी जुटाने में व्यस्त रहती हैं। इसी दौरान एंजेला अपनी नई दोस्त अनु के साथ समय बिताने लगती है। अनु असम की एक लड़की है, जो प्रसिद्ध लेखिका रीना सेन की बेटी है। दोनों लड़कियाँ शीघ्र ही घुलमिल जाती हैं और एक-दूसरे की भाषा व संस्कृति को समझने लगती हैं। अनु के लकड़ी के तीर-कमान और नारियल की जटा से बने घर जैसे खिलौने एंजेला को बहुत अनोखे लगते हैं, क्योंकि उसने ऐसे खिलौने पहले कभी नहीं देखे थे।

इसके बाद वे उत्तर असम के एक मठ में जाते हैं, जहाँ सत्रिया नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। पहले यह नृत्य केवल मठों में पुरुष साधु ही करते थे, लेकिन अब महिलाएँ भी इसमें भाग लेने लगी हैं। एंजेला और अनु इस नृत्य से इतने प्रभावित होते हैं कि वे स्वयं भी इसे सीखने का प्रयास करते हैं और इसके विभिन्न पात्रों की नकल करने लगते हैं।

  वह असम की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, विशेषकर बिहू और सत्रिया नृत्य, से इतनी प्रभावित होती है कि जब वह लंदन लौटती है, तो अपनी कक्षा में इन नृत्यों का प्रदर्शन करती है। वह अपनी माँ की रिकॉर्डिंग्स को बार-बार देखती और उन पलों को याद करती। उसकी माँ, एलेसेंड्रा, एंजेला की इस गहरी रुचि को समझती हैं और उसके लिए एक विशेष योजना बनाती हैं।

कहानी की मुख्य घटनाएं

  • एंजेला और उसका परिवार लंदन से असम के लिए रवाना होते हैं।
  • असम में बिहू त्योहार का अनुभव और उसका अद्भुत नृत्य।
  • उत्तरी असम में सत्रिया नृत्य का फ़िल्मांकन और रीना सेन के परिवार से मुलाकात।
  • एंजेला और अनु की दोस्ती और असमिया खिलौनों के साथ खेलना।
  • सत्रिया नृत्य का प्रदर्शन और जय-विजय की कहानी का नाटकीय प्रदर्शन।
  • एंजेला और अनु का सत्रिया नृत्य सीखना और लंदन में अपने सहपाठियों के साथ साझा करना।

कहानी से शिक्षाइस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दुनिया की विविध संस्कृतियों को जानना और समझना एक अद्वितीय अनुभव हो सकता है। नृत्य, संगीत, और कला के माध्यम से हम किसी भी संस्कृति की गहरी समझ प्राप्त कर सकते हैं। यह कहानी सिखाती है कि यात्रा के दौरान हमें नई चीजें सीखने और अनुभव करने का अवसर मिलता है।

शब्दावली

  • डॉक्यूमेंट्री: एक प्रकार की फिल्म जो वास्तविक घटनाओं और व्यक्तियों पर आधारित होती है।
  • बिहू: असम का एक प्रसिद्ध कृषि आधारित त्योहार।
  • सत्रिया: असम का एक पारंपरिक नृत्य, जो वैष्णव मठों में प्रचलित है।
  • वैष्णव मठ: भगवान विष्णु के अनुयायियों का मठ।
  • संक्टरियम: मठ का एक विशेष भाग जहाँ धार्मिक गतिविधियाँ होती हैं।

निष्कर्ष“सत्रिया और बिहू नृत्य” कहानी एक सांस्कृतिक यात्रा की अद्भुत कथा है, जो एंजेला और उसके परिवार की असम यात्रा के माध्यम से भारतीय नृत्य परंपरा को उजागर करती है। इस कहानी से हमें भारतीय नृत्य और त्योहारों की समृद्ध परंपरा की झलक मिलती है, और यह हमें दुनिया की विविध संस्कृतियों को जानने और समझने के लिए प्रेरित करती है।

06. मेरी माँ – Chapter Notes

लेखक परिचय

‘रामप्रसाद बिस्मिल’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी थे। उनका जीवन संघर्ष, साहस और देशभक्ति का प्रतीक है। उन्होंने अंग्रेज़ों के अत्याचारों का सामना करते हुए अपनी आत्मकथा लिखी, जो आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। ‘सरफरोशी की तमन्ना’ जैसे गीत के रचनाकार रामप्रसाद बिस्मिल भी उन वीरों में शामिल थे। केवल तीस वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया। असाधारण प्रतिभा के स्वामी रामप्रसाद बिस्मिल न केवल एक महान कवि और लेखक थे, बल्कि उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा विशेष रूप से प्रसिद्ध रही। ‘मेरी माँ’ उनकी आत्मकथा का एक महत्वपूर्ण भाग है।

मुख्य विषय

इस आत्मकथा का प्रमुख विषय देशभक्ति, मातृप्रेम, नैतिकता और संघर्ष है। बिस्मिल की माँ ने उन्हें सदैव सत्य के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। यह आत्मकथा उनकी माँ के महान आदर्शों और देशभक्ति के प्रति उनके अडिग समर्पण को प्रदर्शित करती है।

कहानी का साररामप्रसाद बिस्मिल का जन्म उस समय हुआ जब भारत पर अंग्रेजों का आधिपत्य था। छोटी आयु से ही वे अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हो गए। उनके शौर्य और देशभक्ति की अनेक कहानियाँ हैं। भगत सिंह भी उनकी प्रशंसा करते थे और कहते थे कि यदि बिस्मिल किसी अन्य देश या समय में जन्मे होते तो वे सेनाध्यक्ष बनते।

बिस्मिल ने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा ‘निज जीवन की एक छटा’ लिखी। इस पुस्तक ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए और लोगों में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। जेल में भी बिस्मिल ने अंग्रेजों के अत्याचारों का सामना किया। उनकी आत्मकथा ने उन्हें अमर बना दिया। यह आत्मकथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

उनके जीवन में माता-पिता का विशेष योगदान था। उनकी माताजी ने उन्हें सदैव प्रोत्साहित किया और कठिनाइयों के बावजूद उनका साथ दिया। उनके पिताजी ने एक बार एक अनैतिक कार्य करने के लिए कहा, परंतु बिस्मिल ने सत्य का पालन किया और उसे करने से मना कर दिया।

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ अपनी माँ को एक साहसी और दृढ़ निश्चयी महिला के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिन्होंने न केवल अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना किया, बल्कि अपने बेटे को भी जीवन के संघर्षों से निपटने के लिए तैयार किया। उनकी माँ एक अनपढ़ गाँव की लड़की थीं, जो कम उम्र में विवाह करके शहर आईं और धीरे-धीरे अपने घर-परिवार के कामकाज को समझा और संभाला। उन्होंने अपनी रुचि और जिज्ञासा के चलते हिंदी पढ़ना-लिखना भी सीखा, जो उस समय की ग्रामीण महिलाओं के लिए असामान्य था।

माँ ने उन्हें हमेशा सत्य, ईमानदारी और नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। जब रामप्रसाद ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, तब भी उनकी माँ ने उनका पूरा समर्थन किया, भले ही यह उनके लिए आसान नहीं था। उनकी माँ का यह कहना कि “कभी किसी के प्राण नहीं लेने चाहिए, चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो,” उनके विचारों की उदारता और उच्च नैतिकता को दर्शाता है।

माँ के संस्कार और उनके दिए हुए शिक्षाओं ने रामप्रसाद को एक मजबूत और साहसी इंसान बनाया। उन्होंने बताया कि उनकी माँ ने उन्हें कभी गलत काम करने के लिए नहीं कहा और हमेशा सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी। इस पाठ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उनकी माँ ने न केवल उन्हें जीवन के व्यावहारिक सबक सिखाए, बल्कि उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी दिया।

कहानी की मुख्य घटनाएं

  • रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत।
  • भगत सिंह द्वारा बिस्मिल की प्रशंसा।
  • बिस्मिल की जेल में आत्मकथा ‘निज जीवन की एक झलक’ का लेखन और प्रकाशन।
  • माताजी का योगदान और उनका प्रोत्साहन।
  • पिताजी द्वारा अनैतिक कार्य के लिए मना करने पर बिस्मिल का सत्य का पालन करना।

कहानी से शिक्षा

  • सत्य और निष्ठा का पालन करना।
  • कठिनाइयों का सामना करते हुए भी अपने लक्ष्यों से न डिगना।
  • माताओं का प्रोत्साहन और मार्गदर्शन बच्चों के जीवन में महत्वपूर्ण होता है।
  • स्वतंत्रता और देशभक्ति के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करना।

शब्दावली

  • स्वतंत्रता सेनानी: देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाला व्यक्ति।
  • आत्मकथा: किसी व्यक्ति द्वारा अपने जीवन की कहानी का लेखन।
  • अत्याचार: किसी पर किए गए अन्यायपूर्ण और क्रूर कार्य।
  • प्रोत्साहन: किसी को आगे बढ़ने और कुछ करने के लिए उत्साहित करना।
  • सत्य: सचाई, जो वास्तव में हो।

निष्कर्षरामप्रसाद बिस्मिल का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य, निष्ठा, और साहस के साथ जीवन जीना चाहिए। उनका स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अमूल्य था। उनकी आत्मकथा ‘निज जीवन की एक छटा’ आज भी प्रेरणा स्रोत है। उनकी माताजी का योगदान उनके जीवन में महत्वपूर्ण था, जिसने उन्हें देशभक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। बिस्मिल का जीवन एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी का जीवन था, जिसने अपनी मातृभूमि के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

05. रहीम के दोहे – Chapter Notes

कवि परिचयरहीम भक्तिकाल के एक प्रसिद्ध कवि थे। माना जाता है कि उनका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था। उन्होंने नीति, भक्ति और प्रेम संबंधी रचनाएँ कीं। रहीम ने अवधी और ब्रजभाषा, दोनों में कविताएँ लिखीं। वे रामायण, महाभारत आदि प्रसिद्ध ग्रंथों के अच्छे जानकार थे। उनकी मृत्यु 17वीं शताब्दी में हुई। आज भी उनके दोहे आम जन-जीवन में अत्यंत लोकप्रिय हैं।

मुख्य विषय

कविता का मुख्य विषय जीवन के गुण और मूल्य हैं। रहीम ने अपने दोहों में प्रेम, सहनशीलता, विनम्रता, संतोष और जल के महत्व को समझाया है। उन्होंने यह संदेश दिया है कि हमें जीवन में सद्गुणों को अपनाना चाहिए और दूसरों के प्रति विनम्र रहना चाहिए।

दोहे का सार

रहीम जी के दोहों में जीवन की महत्वपूर्ण वास्तविकताओं का सार प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने यह बताया कि बड़ों के साथ जुड़ने पर हमें छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हर किसी का अपना महत्व होता है। जैसे प्रकृति बिना किसी स्वार्थ के सभी को लाभ देती है, वैसे ही मनुष्य का स्वभाव भी परोपकारी होना चाहिए। 

उन्होंने प्रेम संबंधों को कच्चे धागे से जोड़ा, यह बताते हुए कि यदि संबंध टूट जाएं, तो पुनः प्रयास करने पर भी मनमुटाव का असर रह जाता है। रहीम जी ने यह भी कहा कि पानी, चमक और सम्मान जीवन में सर्वोपरि हैं और हमें इनका सम्मान करना चाहिए। विपत्ति के समय ही हमें सच्चे मित्रों का पता चलता है, क्योंकि बहुत से लोग संपत्ति की स्थिति में हमारे मित्र बन जाते हैं, लेकिन सच्चे मित्र वही होते हैं जो कठिन समय में हमारे काम आते हैं। 

इसके अलावा, उन्होंने यह भी समझाया कि हमें अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी शब्दों के कारण हमारा काम बिगड़ सकता है। इन दोहों के माध्यम से रहीम जी ने जीवन के मूल्य और कठिनाइयों से उबरने की समझ दी है।

रहीम के दोहों का अर्थ और व्याख्या

(1)
रहीमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।।

अर्थ: रहीम कहते हैं कि बड़े व्यक्ति या वस्तु को देखकर छोटे को नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि जहाँ सूई उपयोगी होती है, वहाँ तलवार व्यर्थ हो जाती है। अर्थात, छोटी चीज़ें भी अपने स्थान पर बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।

व्याख्या: इस दोहे में रहीम यह समझाते हैं कि हर व्यक्ति और वस्तु का अपना महत्व होता है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। हमें किसी को तुच्छ समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी छोटी चीज़ें भी बड़े कार्य सिद्ध कर सकती हैं।

(2)
तरुवर फल नहिं खात हैं सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।

अर्थ: रहीम कहते हैं कि पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते और नदियाँ अपने पानी को नहीं पीतीं। हीम कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति का उपयोग भी दूसरों के कल्याण के लिए करते हैं।

व्याख्या: इस दोहे में रहीम यह संदेश देते हैं कि सच्चे और अच्छे लोग वही हैं जो अपनी संपत्ति और संसाधनों का उपयोग समाज और दूसरों के भले के लिए करते हैं, जैसे पेड़ और नदियाँ भी दूसरों के लाभ के लिए होते हैं।

(3)
रहीमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि प्रेम का धागा इतना नाजुक होता है कि इसे झटका देकर मत तोड़ो। क्योंकि एक बार टूटने के बाद यह दुबारा नहीं जुड़ता और यदि जुड़ भी जाए, तो उसमें गाँठ पड़ जाती है।

व्याख्या: इस दोहे में रहीम समझाते हैं कि रिश्ते और प्रेम बहुत नाजुक होते हैं। अगर इन्हें तोड़ दिया जाए, तो वे दोबारा उसी रूप में नहीं आते। अगर जुड़ते भी हैं तो उनमें दूरी और कड़वाहट की गाँठ पड़ जाती है।

(4)
रहीमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि जीवन में पानी (जल) को संभाल कर रखना चाहिए, क्योंकि बिना पानी के सब कुछ सूना हो जाता है। यदि पानी चला गया, तो न मोती का अस्तित्व रहेगा, न मनुष्य का, न ही चूने का।

व्याख्या: इस दोहे में पानी को जीवन का प्रतीक माना गया है। जैसे पानी के बिना जीवन संभव नहीं, वैसे ही हमें अपने जीवन में नैतिकता, आत्म-सम्मान और रिश्तों का ख्याल रखना चाहिए। अगर ये एक बार खो जाएँ, तो फिर उन्हें वापस पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

(5)
रहीमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि थोड़े समय की विपत्ति (कठिनाई) अच्छी होती है, क्योंकि उससे हमें अपने मित्र और शत्रु की पहचान हो जाती है।

व्याख्या: इस दोहे में रहीम समझाते हैं कि कभी-कभी कठिन समय भी अच्छा होता है क्योंकि इसी दौरान हमें यह समझ में आता है कि कौन हमारा सच्चा मित्र है और कौन नहीं। कठिनाइयाँ हमारे जीवन में अनुभव और समझदारी लाती हैं।

(6)
रहीमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि जीभ (वाणी) ऐसी बावरी होती है जो बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती है, जिससे वह स्वर्ग और पाताल का सफर कर जाती है। परंतु बाद में जब नुकसान होता है, तो वह खुद अंदर छुप जाती है और उसका दंड व्यक्ति को भुगतना पड़ता है।

व्याख्या: इस दोहे में रहीम यह समझाते हैं कि बिना सोचे-समझे बोले गए शब्द बहुत हानि पहुँचाते हैं। इसलिए हमें अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि इसके गलत उपयोग से हमें ही नुकसान होता है।

(7)
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि संपत्ति (संपन्नता) में तो कई लोग मित्र बन जाते हैं, लेकिन जो मित्र विपत्ति की कसौटी पर खरा उतरे, वही सच्चा मित्र होता है।

व्याख्या: इस दोहे में रहीम समझाते हैं कि सच्चे मित्र की पहचान सुख के समय नहीं, बल्कि कठिनाइयों के समय होती है। जो मित्र हमारे साथ बुरे वक्त में खड़ा रहे, वही सच्चा मित्र है।

दोहे से शिक्षा

रहीम के दोहों से यह शिक्षा मिलती है कि हमें हर व्यक्ति और वस्तु का सम्मान करना चाहिए, सच्चे मित्र वही होते हैं जो कठिन समय में साथ देते हैं, प्रेम संबंधों को संभालकर रखना चाहिए, और अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। इसके अलावा, विपत्ति के समय हमें अपने सच्चे मित्रों की पहचान होती है और हमें परोपकारिता की भावना से जीना चाहिए।

शब्दावली

  • लघु: छोटा
  • तलवारि: तलवार
  • सरवर: तालाब
  • काज: कार्य
  • संपति: संपत्ति
  • धागा: धागा
  • छिटकाय: टूटना
  • जिह्वा: जीभ
  • बावरी: पागल
  • सरग: स्वर्ग
  • पताल: पाताल
  • सगे: संबंधी
  • बिपति: विपत्ति
  • कसौटी: परीक्षा
  • साँचे: सच्चे

निष्कर्षरहीम के दोहे जीवन के गूढ़ और महत्वपूर्ण संदेशों को सरल और संक्षिप्त शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। ये दोहे हमें नैतिकता, प्रेम, मित्रता और जीवन की सच्ची पहचान सिखाते हैं। रहीम का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। इन दोहों से हमें जीवन के हर पहलू को समझने और उसे सही दिशा में जीने की प्रेरणा मिलती है।

04. हार की जीत – Chapter Notes

लेखक परिचय

सुदर्शन हिंदी साहित्य के एक प्रतिष्ठित लेखक हैं, जो मानवीय संवेदनाओं को सहज भाषा में व्यक्त करने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी कहानियों में आदर्श, नैतिक मूल्यों और समाज सुधार की भावना स्पष्ट रूप से झलकती है। उनकी रचनाओं में भारतीय समाज की परंपराओं और मूल्यों का गहन चित्रण मिलता है, जिससे पाठक उनकी लेखनी से गहराई से जुड़ाव महसूस करते हैं।

मुख्य विषय

कहानी का प्रमुख विषय मानवता, विनम्रता और सच्चे गुणों की विजय है। यह कहानी यह संदेश देती है कि वास्तविक जीत किसी वस्तु की प्राप्ति में नहीं, बल्कि अपने आचरण में सद्गुणों को अपनाने में निहित होती है।

कहानी का सार

श्री सुदर्शन द्वारा लिखित कहानी ‘हार की जीत’ में एक डाकू के हृदय परिवर्तन की घटना का वर्णन किया गया है। बाबा भारती के पास एक बहुत सुंदर घोड़ा था। उसकी मशहूरी दूर-दूर तक फैल गई थी। बाबा भारती सब कुछ छोड़कर साधु बन गये थे, परंतु घोड़े को छोड़ना उनके वश में न था। वे उसे ‘सुलतान’ कह कर पुकारते थे। संध्या के समय वे सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर लगा लेते थे। उस इलाके के मशहूर डाकू खड्गसिंह के कानों में भी सुलतान की चर्चा पहुँची। वह उसे देखने के लिए बेचैन हो उठा और एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा। उन्हें नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने उससे पूछा कि कहो खड्गसिंह क्या हाल है ? इधर कैसे आना हुआ ? खड्गसिंह ने कहा, कि आपकी कृपा है।

सुलतान को देखने की चाह मुझे यहाँ खींच लाई। इस पर बाबा भारती ने उत्तर दिया, ‘सचमुच, घोड़ा बाँका है। उन्होंने खड्गसिंह को अस्तबल में ले जाकर घोड़ा दिखाया। खड्गसिंह उस पर लट्टू हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा कि ऐसा घोड़ा तो उसके पास होना चाहिए था । वहाँ से जाते-जाते वह बोला कि बाबा जी ! मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा। यह सुनकर बाबा भारती को डर के मारे अब नींद न आती । वे सारी रात अस्तबल में घोड़े की रखवाली में बिताते।

एक दिन संध्या के समय बाबा भारती घोड़े पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। अचानक उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी— ‘ओ बाबा! इस कंगले की बात सुनते जाओ।” उन्होंने देखा एक अपाहिज वृक्ष के नीचे बैठा कराह रहा है। बाबा भारती ने पूछा, तुम्हें क्या तकलीफ है? वह बोला, मैं दुखी हूँ। मुझे पास के रामावाला गाँव जाना है। मैं दुर्गादत्त वैद्य का सौतेला भाई हूँ। मुझे घोड़े पर चढ़ा लो।

बाबा भारती ने उस अपाहिज को घोड़े पर चढ़ा लिया और स्वयं लगाम पकड़कर चलने लगा। अचानक लगाम को झटका लगा और लगाम उनके हाथ से छूट गई। अपाहिज घोड़े पर तनकर बैठ गया । अपाहिज के वेश में वह खड्गसिंह था। बाबा भारती के मुँह से चीख निकल गई। बाबा भारती थोड़ी देर चुप रहने के बाद चिल्लाकर बोले, ‘खड्गसिंह, मेरी बात सुनते जाओ।’ वह कहने लगा, ‘बाबा जी, अब घोड़ा नहीं दूँगा।’

बाबा भारती बोले, ‘घोड़े की बात छोड़ो। अब मैं घोड़े के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। मेरी एक प्रार्थना है कि इस घटना के बारे में किसी से कुछ न कहना, क्योंकि लोगों को यदि इस घटना का पता चल गया, तो वे किसी दीन-हीन गरीब पर विश्वास नहीं करेंगे।’ बाबा भारती सुलतान की ओर से मुँह मोड़कर ऐसे चले गए, मानो उसके साथ उनका कोई संबंध न हो।

बाबा जी के उक्त शब्द खड्गसिंह के कानों में गूँजते रहे। एक रात खड्गसिंह घोड़ा लेकर बाबा भारती के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर खामोशी थी। अस्तबल का फाटक खुला था। उसने सुलतान को वहाँ बाँध दिया और फाटक बंद करके चल दिया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे। रात के आखिरी पहर में बाबा भारती स्नान आदि के बाद अचानक अस्तबल की ओर चल दिए, पर फाटक पर पहुँचकर उन्हें सुलतान के न होने की बात याद आई, तो उनके पैर स्वयं रुक गए। तभी उन्हें अस्तबल से सुलतान के हिनहिनाने की आवाज़ सुनाई दी। वे प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर आए और सुलतान से ऐसे लिपट गए, जैसे कोई पिता अपने बिछुड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। वे बोले, ‘अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह नहीं मोड़ेगा।’

कहानी की मुख्य घटनाएं

  • बाबा भारती का अपने घोड़े सुल्तान से अत्यधिक प्रेम।
  • खड्गसिंह की सुल्तान को देखने की इच्छा और बाबा भारती से मिलना।
  • खड्गसिंह द्वारा सुल्तान को धोखे से चुराना।
  • बाबा भारती की प्रार्थना कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न किया जाए।
  • खड्गसिंह का सुल्तान को वापस लाकर बाबा भारती के अस्तबल में बाँधना।
  • बाबा भारती का सुल्तान को देखकर प्रसन्न होना और विश्वास की शक्ति का अनुभव करना।

कहानी से शिक्षा

  • सच्चाई और विश्वास की हमेशा जीत होती है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
  • कहानी यह सिखाती है कि दूसरों के प्रति दया और सच्चाई का व्यवहार करना सबसे महत्वपूर्ण है।

शब्दावली

  • लहलहाते: हरे-भरे
  • अर्पण: समर्पण
  • भ्रांति: गलतफहमी
  • अधीर: बेताब
  • वस्तु: चीज़
  • अस्वीकार: नकारना
  • पवित्र: शुद्ध
  • पश्चाताप: पछतावा

निष्कर्ष“हार की जीत” कहानी यह संदेश देती है कि जीवन में सच्चाई और विश्वास महत्वपूर्ण हैं। चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हमें सच्चाई का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। बाबा भारती और खड्गसिंह की कहानी हमें सिखाती है कि विश्वास और सच्चाई के सामने कोई भी कठिनाई टिक नहीं सकती। अंततः, सच्चाई और विश्वास की शक्ति ही विजय प्राप्त करती है।

03. पहली बूँद – Chapter Notes

कवि परिचय

गोपालकृष्ण कौल हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि हैं, जो अपनी कविताओं में गहरी भावनाओं और प्रकृति प्रेम को उजागर करने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके लेखन में करुणा और संवेदनशीलता का स्पर्श होता है, जो पाठकों को उनकी रचनाओं से जोड़ता है। उनकी कविताएँ प्रकृति की सुंदरता और मानवीय संवेदनाओं का उत्कृष्ट संगम प्रस्तुत करती हैं। 

मुख्य विषय

कविता का मुख्य विषय प्रकृति के प्रति प्रेम और वर्षा की पहली बूँद का महत्व है। यह बूँद न केवल धरती की प्यास बुझाती है बल्कि नई ऊर्जा और ताजगी का संचार भी करती है। कवि ने इस कविता के माध्यम से प्रकृति और मनुष्य के गहरे संबंध को दर्शाया है, जहाँ वर्षा का आगमन जीवन के नवीनीकरण और पुनर्जागरण का प्रतीक बनता है।

कविता का सार

प्रस्तुत कविता ‘पहली बूँद’ प्रसिद्ध कवि गोपालकृष्ण कौल द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने वर्षा की सुंदरता और उसके महत्व को दर्शाया है। जब आसमान से मोती के समान वर्षा की बूँदें धरती पर गिरती हैं, तो सूखी हुई धरती में नया जीवन संचार होता है और चारों ओर हरियाली फैल जाती है।

बारिश की पहली बूँद धरती के सूखे होंठों पर अमृत के समान गिरती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो निर्जीव और बेजान धरती को नया जीवन मिल गया हो। हरी घास, जो धरती की सुंदरता को और बढ़ाती है, उसकी रोमों की पंक्तियों की तरह मुस्कुराने लगती है और चारों ओर खुशहाली छा जाती है। पहली बूँद का धरती पर आगमन एक अनोखा अनुभव और परिवर्तन लाता है, जिससे धरती आनंदित हो उठती है।

नीला आकाश मानो नीली आँखों की तरह दिखता है और काले बादल उन आँखों की काली पुतलियों की भाँति प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है जैसे बादल धरती के दुःखों को देखकर व्यथित हो गए हों और अपनी वर्षा रूपी आँसुओं से उसे राहत दे रहे हों। इन आँसुओं की बूंदों से धरती की प्यास बुझ जाती है, और वह प्रेम से अभिभूत होकर फिर से हरी-भरी होने की आकांक्षा से भर जाती है। पहली बूँद का यह आगमन धरती के लिए न केवल एक सुंदर अनुभव है, बल्कि उसका परिणाम भी बेहद सुखद और जीवनदायी होता है।

कविता की व्याख्या

(1)
वह पावस का प्रथम दिवस जब,
पहली बूँद धरा पर आई,
अंकुर फूट पड़ा धरती से,
नव जीवन की ले अँगड़ाई | 

व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि गोपालकृष्ण कौल जी द्वारा रचित कविता ‘पहली बूँद’ से उद्धृत हैं। यहाँ वर्षा ऋतु के आगमन से धरती में आए सुंदर परिवर्तन का वर्णन किया गया है। इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कहते हैं कि ग्रीष्म ऋतु के बाद वर्षा ऋतु के आगमन से चारों ओर आनंद और हरियाली छा जाती है। जब वर्षा की पहली बूँद धरती पर गिरती है, तो मिट्टी में दबे बीज से अंकुर फूटकर बाहर आ जाता है, मानो वह नया जीवन पाकर अँगड़ाई लेते हुए जाग उठा हो।

(2)
धरती के सूखे अधरों पर, 
गिरी बूँद अमृत-सी आकर, 
वसुंधरा की रोमावलि-सी, 
हरी दूब, पुलकी मुसकाई | 
पहली बूँद धरा पर आई | 

व्याख्या: आगे कवि कहते हैं कि धरती के सूखे होंठों पर बारिश की बूँद अमृत के समान गिरी, मानो वर्षा के होने से बेजान और सूखी पड़ी धरती को नया जीवन मिल गया हो। धरती रूपी सुंदरी के रोमों की पंक्ति की तरह हरी घास भी मुस्कुराने लगी और आनंद से भर उठी। पहली बूँद कुछ इस तरह धरती पर आई, जिसका खूबसूरत एहसास और सकारात्मक प्रभाव धरती को मिला।

(3)
आसमान में उड़ता सागर, 
लगा बिजलियों के स्वर्णिम पर, 
बजा नगाड़े जगा रहे हैं, 
बादल धरती की तरुणाई | 
पहली बूँद धरा पर आई | 

व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि गोपालकृष्ण कौल जी द्वारा रचित कविता “पहली बूँद” से उद्धृत हैं। इसमें वर्षा ऋतु के आगमन पर धरती में आए सुंदर परिवर्तन का वर्णन किया गया है। इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि आकाश में जल से भरे बादलों के बीच बिजली चमक रही है, मानो सागर ने सुनहरे पंख लगाकर आकाश में उड़ान भर ली हो। बादलों की गर्जना सुनकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे नगाड़े बजाकर धरती के यौवन को जागृत कर रहे हों।

(4)
नीले नयनों-सा यह अंबर,
काली-पुतली से ये जलधर,
करुणा-विगलित अश्रु बहाकर,
धरती की चिर प्यास बुझाई |
बूढ़ी धरती शस्य-श्यामला,
बनने को फिर से ललचाई |
पहली बूँद धरा पर आई | 

व्याख्या: आगे कवि कहते हैं कि नीला आसमान नीली आँखों के समान प्रतीत होता है, और काले बादल उन आँखों की काली पुतलियों की तरह दिखते हैं। ऐसा लगता है जैसे बादल धरती के दुःखों से व्यथित होकर वर्षा रूपी आँसू बहा रहे हों। इस प्रकार, बारिश से धरती की प्यास बुझ जाती है। वर्षा का प्रेम पाकर धरती के हृदय में पुनः हरा-भरा होने की आकांक्षा जागृत हो उठती है। पहली बूँद कुछ इस प्रकार धरती पर उतरी, जिसका सुंदर एहसास और परिणाम धरती को प्राप्त हुआ।

कविता की मुख्य घटनाएं

  • ग्रीष्म ऋतु के बाद वर्षा ऋतु का आगमन होता है।
  • वर्षा की पहली बूँद जब धरती पर गिरती है, तो वह धरती के अंदर छिपे बीजों से अंकुरों को बाहर निकालती है।
  • पहली बूँद धरती के सूखे होंठों पर अमृत के समान गिरती है, जिससे धरती में नया जीवन और ताजगी आती है।
  • नीला आकाश और काले बादल धरती की प्यास बुझाने के लिए अपनी वर्षा रूपी आँसू बहाते हैं।
  • वर्षा की पहली बूँद से धरती हरी-भरी होती है और आनंदित हो उठती है।

कविता से शिक्षा

कविता से यह शिक्षा मिलती है कि प्रकृति का सम्मान और जीवन में नवीनीकरण की आवश्यकता महत्वपूर्ण है। जैसे वर्षा की पहली बूँद धरती को ताजगी और नया जीवन देती है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन को अपनाना चाहिए। छोटे बदलाव भी जीवन में ऊर्जा और सकारात्मकता ला सकते हैं।

शब्दार्थ

  • प्रथम दिवस: पहला दिन
  • बूँद: वर्षा की छोटी बूंद
  • धरा: धरती
  • अंकुर फूटना: पौधे का उगना
  • अंगड़ाई: खिंचाव के साथ जागना
  • अधर: होंठ
  • अमृत: अमरता देने वाला रस
  • वसुंधरा: पृथ्वी
  • रोमांच: उत्तेजना, खुशी
  • पुलकना: खुश होना
  • नगाड़ा: बड़ा ढोल
  • अंबर: आकाश
  • जलधर: बादल
  • करुणा: दया
  • अश्रु: आँसू
  • शस्य-श्यामला: फसलों से भरी हुई हरी-भरी धरती
  • ललचाना: आकांक्षा रखना

निष्कर्ष

गोपालकृष्ण कौल द्वारा लिखित “पहली बूँद” कविता प्रकृति और वर्षा ऋतु की सुंदरता को अद्वितीय रूप से प्रस्तुत करती है। यह कविता धरती की प्यास, आकाश के बदलते रंग, और पहली बूँद के गिरने के महत्व को गहराई से उजागर करती है। इस कविता में प्रकृति के सौंदर्य, वर्षा की महत्ता, और धरती के हर्षोल्लास को सुंदर तरीके से चित्रित किया गया है।