10. तरुण के स्वप्न (उद्दोधन) – Chapter Notes

लेखक परिचय

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक बहुत बड़े नेता थे। उनका मुख्य उद्देश्य था भारत को अंग्रेजों की हुकूमत से आज़ाद कराना। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व किया और सैनिकों को देश की आज़ादी के लिए लड़ने का हौसला दिया। नेताजी ने “दिल्ली चलो” और “जय हिंद” जैसे नारे देकर लोगों में देशभक्ति की भावना जगाई। उन्होंने कहा था, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा,” जो बहुत प्रेरणादायक था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने एक ऐसा समाज और राष्ट्र बनाने का सपना देखा, जहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र और बराबर हो। उनके जीवन और काम को समझना भारत की आज़ादी की कहानी को समझना है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस

मुख्य विषय

इस पाठ में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के उस स्वप्न के बारे में बताया गया है जिसमें वे एक ऐसा आज़ाद और समृद्ध भारत चाहते थे जहाँ सभी लोग बराबर हों, जात-पात न हो, महिलाओं को समान अधिकार मिले और हर व्यक्ति को शिक्षा और अवसर मिले। उन्होंने युवाओं को यह स्वप्न दिया ताकि वे अपने देश और समाज की सेवा करें और एक आदर्श राष्ट्र बनाएं। साथ ही, पाठ में नेताजी के जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान की भी जानकारी दी गई है।

कहानी का सार

नेताजी सुभाषचंद्र बोस एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहाँ हर व्यक्ति आज़ाद हो, खुशहाल हो और समाज व देश की सेवा में बराबर भाग ले सके। वे चाहते थे कि समाज में सभी लोग एक-दूसरे के साथ बराबरी से रहें। उन्होंने 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर में युवक-सम्मेलन में युवाओं को एक खास बात कही थी। उसमें उन्होंने अपने सपने के बारे में बताया, जो बहुत प्रेरणादायक था। आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।

नेताजी कहते थे कि बहुत सारे लोगों ने सपने देखे हैं। उनके गुरु, देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक सुंदर सपना देखा था। वह सपना उनकी ताकत और खुशी का कारण था। नेताजी कहते हैं कि हम, यानी आज के युवा, उनके सपने को पूरा करने वाले हैं। इसलिए हमारा भी एक सपना है। यह सपना हमें हर दिन प्रेरणा देता है। यह हमें उठने, काम करने, बोलने और लिखने की ताकत देता है।

नेताजी का सपना क्या था?

नेताजी का सपना था एक ऐसा समाज और देश बनाना, जो पूरी तरह आज़ाद और खुशहाल हो। वे चाहते थे कि:

  • हर व्यक्ति आज़ाद हो: समाज में कोई भी व्यक्ति दबाव में न रहे। हर कोई अपनी मर्जी से जी सके और खुश रहे।
  • जात-पात का भेदभाव न हो: समाज में कोई ऊँच-नीच न हो। सभी लोग एक-दूसरे के साथ बराबरी से रहें।
  • महिलाएँ भी बराबर हों: औरतें भी पुरुषों की तरह समाज और देश के लिए काम करें। उन्हें भी वही अधिकार और सम्मान मिले, जो पुरुषों को मिलता है।
  • पैसों की असमानता न हो: समाज में कुछ लोग बहुत अमीर और कुछ बहुत गरीब न हों। सभी को बराबर मौका मिले।
  • सभी को शिक्षा मिले: हर व्यक्ति को पढ़ने और आगे बढ़ने का समान मौका मिले।
  • काम की इज्जत हो: जो लोग मेहनत करते हैं, उनकी इज्जत हो। आलसी और कामचोर लोगों के लिए समाज में कोई जगह न हो।
  • देश पूरी तरह आज़ाद हो: कोई बाहरी ताकत हमारे देश को नियंत्रित न करे। हमारा देश पूरी तरह स्वतंत्र हो।
  • भारत आदर्श बने: हमारा देश न सिर्फ अपने लोगों की ज़रूरतें पूरी करे, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बने। यह दुनिया को दिखाए कि एक अच्छा समाज और देश कैसा होता है।

नेताजी कहते थे कि यह सपना उनके लिए एक सच्चाई की तरह है। इस सपने को पूरा करने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। इसके लिए वे हर मुश्किल को सह सकते हैं, हर त्याग कर सकते हैं। अगर इस सपने को पूरा करने के लिए अपनी जान भी देनी पड़े, तो वे उसे भी स्वर्ग के समान मानते थे।

युवाओं को संदेश

नेताजी ने युवाओं से कहा, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है, सिवाय इस सपने के। यह सपना मुझे ताकत और खुशी देता है। यह मेरे छोटे से जीवन को भी खास बनाता है।” उन्होंने युवाओं से कहा कि वे यह सपना उन्हें उपहार के रूप में दे रहे हैं। उन्होंने युवाओं से इस सपने को स्वीकार करने और इसे पूरा करने की अपील की।

नेताजी का यह सपना आज भी हमें प्रेरणा देता है कि हम एक बेहतर समाज और देश के लिए मेहनत करें।

कहानी की मुख्य बातें

  • आज़ाद और खुशहाल समाज: नेताजी चाहते थे कि ऐसा समाज बने जहाँ हर व्यक्ति आज़ाद हो और खुशी से जिए।
  • सबके लिए समानता: समाज में कोई भेदभाव न हो, जैसे जाति का अंतर, और सभी को बराबर सम्मान मिले।
  • नारी की आज़ादी: महिलाएँ भी पुरुषों की तरह बराबर अधिकार पाएँ और समाज व देश की सेवा में हिस्सा लें।
  • सबको शिक्षा और अवसर: हर व्यक्ति को पढ़ने और आगे बढ़ने का बराबर मौका मिले।
  • काम की इज्जत: मेहनत और काम करने वालों की कदर हो, और आलसी लोगों के लिए कोई जगह न हो।
  • गरीबी का अंत: समाज में कोई गरीब न रहे, और सभी की जरूरतें पूरी हों।
  • आज़ाद देश: देश किसी बाहरी प्रभाव से मुक्त हो और अपने नियम खुद बनाए।
  • दुनिया के लिए मिसाल: भारत का समाज और देश ऐसा हो जो पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श बन जाए।
  • स्वप्न की ताकत: नेताजी कहते थे कि यह सपना उन्हें ताकत और खुशी देता है। वे चाहते थे कि युवा इस सपने को अपनाएँ और इसे सच करें।
  • त्याग और मेहनत: इस सपने को सच करने के लिए हर मुश्किल को सहने और मेहनत करने की जरूरत है।

कहानी से शिक्षा

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने एक ऐसा समाज और देश का सपना देखा था जहाँ सभी लोग बराबर हों और स्वतंत्रता से जी सकें। वे चाहते थे कि सबको अच्छी शिक्षा मिले और महिलाएँ भी पूरी आज़ादी के साथ समाज में भाग लें। उनका सपना था कि जात-पात, अमीर-गरीब का भेद खत्म हो जाए। हमें भी उनके इस सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करनी चाहिए। हमें मिलकर देश और समाज की सेवा करनी है। इस तरह हम एक आदर्श और शक्तिशाली देश बना सकते हैं।

शब्दार्थ

  • स्वप्न: सपना, कल्पना
  • स्वाधीन: स्वतंत्र, आज़ाद
  • संपन्न: समृद्ध, विकसित
  • दृष्टि: नजर, दृष्टिकोण
  • उद्बोधन: भाषण, संदेश
  • नारी मुक्ति: महिलाओं की आज़ादी या स्वतंत्रता
  • समान अवसर: बराबर के मौके
  • युवक-सम्मेलन: युवा लोगों की सभा
  • स्वर्गीय: दिवंगत, जो स्वर्ग को प्राप्त हो चुका हो
  • देशबंधु: देश का मित्र या प्रिय व्यक्ति
  • उत्तराधिकारी: वह जो किसी की जगह लेता है
  • प्रेरणा: उत्साह देना, प्रेरित करना
  • सर्वांगीण: पूर्ण, सभी दिशाओं से
  • जातिभेद: जाति के आधार पर भेदभाव
  • समता: समानता
  • विषमता: असमानता, भेदभाव
  • सुअवसर: अच्छा अवसर
  • मर्यादा: सम्मान, सीमा
  • अकर्मण्य: आलसी, काम न करने वाला
  • विजातीय: बाहरी, विदेशी
  • यंत्र: उपकरण, मशीन
  • अभाव: कमी, न होना
  • सार्थक: सफल, जिसका फल निकले
  • अखंड: निरंतर, लगातार
  • त्याग: बलिदान, छोड़ना
  • प्राण: जीवन
  • स्वर्ग समान: स्वर्ग जैसा, अत्यंत अच्छा
  • क्षुद्र: छोटा, मामूली
  • उपहारस्वरूप: उपहार की तरह

9. आदमी का अनुपात – Chapter Notes

कवि परिचय

गिरिजा कुमार माथुर का जन्म मध्य प्रदेश के अशोक नगर में 1919 में हुआ। उनके पिता देवीचरण माथुर भी कवि थे, इसलिए बचपन से ही उन्हें कविता में रुचि थी। उन्होंने आकाशवाणी (रेडियो) में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। कविताओं के साथ-साथ उन्होंने नाटक, गीत, कहानियाँ और निबंध भी लिखे। उनकी प्रमुख रचनाओं में मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले और मैं वक्त के हूँ सामने शामिल हैं। उन्होंने प्रसिद्ध गीत “हम होंगे कामयाब” का हिंदी रूप भी लिखा। 1994 में उनका निधन हुआ।

गिरिजा कुमार माथुर

मुख्य विषय

इस कविता “आदमी का अनुपात” का मुख्य विषय है कि आदमी ब्रह्मांड के विशाल आकार के मुकाबले बहुत छोटा है, लेकिन फिर भी वह अपने भीतर ईर्ष्या, घमंड, स्वार्थ, नफरत और अविश्वास भर लेता है। इतना छोटा होने के बावजूद वह दूसरों पर हुकूमत करना चाहता है और लोगों के बीच दीवारें खड़ी करता है। कवि हमें समझाना चाहते हैं कि जब पूरी पृथ्वी और ब्रह्मांड इतने बड़े हैं, तो हमें आपस में लड़ने के बजाय मिल-जुलकर रहना चाहिए।

कविता का सार

यह कविता हमें बताती है कि आदमी का आकार और शक्ति ब्रह्मांड की विशालता के मुकाबले बहुत छोटी है। एक आदमी एक कमरे में है, कमरा घर में, घर मोहल्ले में, मोहल्ला शहर में, शहर प्रदेश में, प्रदेश देश में, देश पृथ्वी पर, और पृथ्वी करोड़ों तारों और लाखों ब्रह्मांडों में सिर्फ एक है। इतनी छोटी जगह घेरने के बावजूद आदमी के भीतर ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, नफरत और अविश्वास भरे रहते हैं। वह अपने चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारें खड़ी करता है और दूसरों पर अधिकार जताता है। कवि यह बताना चाहता है कि जब ब्रह्मांड इतना विशाल और हम इतने छोटे हैं, तो हमें झगड़े और विभाजन की जगह मिल-जुलकर रहना चाहिए।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

दो व्यक्ति कमरे में 
कमरे से छोटे-
कमरा है घर में 
घर है मुहल्ले में 
मुहल्ला नगर में 
नगर है प्रदेश में 
प्रदेश कई देश में 
देश कई पृथ्वी पर 

व्याख्या: कवि कहते हैं कि दो लोग एक कमरे में रहते हैं, और वे कमरे से भी छोटे हैं। वह कमरा एक घर का हिस्सा है, घर मोहल्ले में है, मोहल्ला नगर में, नगर प्रदेश में, प्रदेश देश में और कई देश मिलकर पृथ्वी पर स्थित हैं। इससे पता चलता है कि इंसान इस विशाल दुनिया का एक बहुत छोटा हिस्सा है। कवि यह संदेश देते हैं कि भले ही हम छोटे हों, लेकिन हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

प्रसंग 2

अनगिन नक्षत्रों में 
पृथ्वी एक छोटी 
करोड़ों में एक ही 
सबको समेटे है 
परिधि नभ गंगा की 
लाखों ब्रह्मांडों में 
अपना एक ब्रह्मांड 
हर ब्रह्मांड में 
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ 
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात 

व्याख्या: कवि बताते हैं कि अनगिनत तारों और ग्रहों में हमारी पृथ्वी बहुत छोटी है, जैसे करोड़ों में एक बिंदु। यह पृथ्वी आकाशगंगा (नभ गंगा) का हिस्सा है, जिसमें अनगिनत तारे हैं। इसके अलावा, लाखों ब्रह्मांड हैं, और हर ब्रह्मांड में कई पृथ्वियाँ, भूमियाँ और सृष्टियाँ हैं। यह “अनुपात” दिखाता है कि इंसान और उसकी पृथ्वी ब्रह्मांड की विशालता में कितने छोटे हैं। इससे हमें अपनी छोटी जगह को समझना चाहिए।

प्रसंग 3

आदमी का विराट से 
इस पर भी आदमी 
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन 
संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है 
अपने को दूजे का स्वामी बताता है 
देशों की कौन कहे 
एक कमरे में 
दो दुनिया रचाता है

व्याख्या: कवि कहते हैं कि इतने विशाल ब्रह्मांड में छोटा-सा होने के बावजूद इंसान के भीतर ईर्ष्या, घमंड, स्वार्थ, नफरत और अविश्वास भरे हुए हैं। वह अपने चारों ओर परत-दर-परत दीवारें खड़ी करता है, मानो वह दूसरों से अलग और बड़ा है। वह खुद को दूसरों का मालिक समझता है। देशों के बीच तो दूरी रखता ही है, पर एक छोटे से कमरे में भी अपनी-अपनी अलग दुनिया बना लेता है। कवि हमें समझाते हैं कि इंसान को घमंड और झगड़े छोड़कर मिल-जुलकर रहना चाहिए।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आदमी ब्रह्मांड के विशाल आकार के सामने बहुत छोटा है, फिर भी वह अपने भीतर अहंकार, ईर्ष्या, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास भर लेता है। वह लोगों के बीच दीवारें खड़ी करता है और खुद को दूसरों से बड़ा समझता है। कवि हमें समझाना चाहते हैं कि जब हम इतनी विशाल सृष्टि का छोटा-सा हिस्सा हैं, तो हमें मिल-जुलकर, प्रेम और विश्वास के साथ रहना चाहिए, न कि छोटे-छोटे कारणों से झगड़ना चाहिए।

शब्दार्थ

  • अनुपात: कोई चीज़ दूसरी चीज़ के साथ तुलना या माप का संबंध
  • कमरा: घर का वह भाग जहाँ लोग रहते हैं या कार्य करते हैं
  • मुहल्ला: किसी शहर या नगर का एक हिस्सा जहाँ लोग रहते हैं
  • नगर: बड़ा शहर
  • प्रदेश: बड़ा इलाका या राज्य
  • देश: एक क्षेत्र जिसके अपने शासन और सीमाएं होती हैं
  • पृथ्वी: हमारा ग्रह, जिस पर हम रहते हैं
  • नक्षत्र: आकाश में चमकने वाले तारे या तारामंडल
  • परिधि: सीमा या घेरा
  • नभ: आकाश या आकाशगंगा
  • गंगा: भारत की प्रसिद्ध नदी, यहाँ इसका उपयोग विशालता और सीमा के अर्थ में हुआ है
  • ब्रह्मांड: जिसमें कई आकाशगंगाएँ और ग्रह शामिल हैं
  • विराट: बहुत बड़ा या विशाल
  • ईर्ष्या: दूसरों की उपलब्धियों या खुशियों से जलन
  • अहं: आत्मगौरव या अहंकार
  • स्वार्थ: केवल अपने हित की चिंता
  • घृणा: नफरत या दुश्मनी
  • अविश्वास: भरोसे का अभाव
  • संख्यातीत: इतनी अधिक संख्या जिसमें गिनती मुश्किल हो
  • शंख: एक प्रकार का समुद्री शंख जो दीवार के रूप में इस्तेमाल किया गया है
  • दूजा: दूसरा
  • रचाता है: बनाता है, निर्मित करता है

8. नए मेहमान – Chapter Notes

लेखक परिचय

उदयशंकर भट्ट का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में 1898 में हुआ था। उनके परिवार में साहित्य का माहौल था, इसलिए उन्हें बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। उन्होंने रेडियो के लिए कई नाटक लिखे और नाटकों व फिल्मों में अभिनय भी किया। उन्होंने कविताएँ और उपन्यास भी लिखे, लेकिन नाटक और एकांकी के क्षेत्र में उन्हें खास पहचान मिली। उनका उपन्यास “लोक-परलोक” और एकांकी संग्रह “पर्दे के पीछे” बहुत प्रसिद्ध हुए। उनका निधन 1966 में हुआ।

उदयशंकर भट्ट

मुख्य विषय

“नए मेहमान”  एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है, जो गर्मी और छोटे मकान की परेशानियों से जूझ रहा है। अचानक दो अनजान मेहमानों के आने से परिवार को और मुश्किलें होती हैं। कहानी दिखाती है कि कैसे यह परिवार मेहमानों की खातिरदारी करने की कोशिश करता है, भले ही उनकी अपनी समस्याएँ हों। यह एकांकी मेहमाननवाजी, सामाजिक दबाव और मध्यवर्गीय जीवन की कठिनाइयों को दर्शाती है।

पात्र-परिचय

  • विश्वनाथ: घर के मालिक, 45 साल के, गंभीर स्वभाव के, परिवार की चिंता करने वाले।
  • रेवती: विश्वनाथ की पत्नी, घर और बच्चों का ध्यान रखने वाली, गर्मी और घर की परेशानियों से थकी हुई।
  • प्रमोद: विश्वनाथ का बेटा, मदद करने वाला।
  • किरण: विश्वनाथ की बेटी, पंखा चलाने और छोटे-मोटे काम में मदद करती है।
  • नन्हेमल: एक अनजान मेहमान, 35 साल के, अपने छोटे भाई के साथ आए हैं।
  • बाबूलाल: नन्हेमल का छोटा भाई, 24 साल का, बातूनी और खाने-पीने का शौकीन।
  • आगंतुक: रेवती का भाई, सही मायनों में असली मेहमान।
  • पड़ोसी: पास में रहने वाला व्यक्ति, छोटी-छोटी बातों पर शिकायत करने वाला।

कहानी का सार

शुरुआत: गर्मी और परेशानियाँ

कहानी की शुरुआत में विश्वनाथ, जो एक मध्यवर्गीय परिवार का मुखिया है, गर्मी से परेशान होकर कमरे में प्रवेश करता है। वह पसीने से तर है और अपने छोटे बच्चे को हवा देने के लिए पंखा झलता है। वह कहता है कि मकान इतना गर्म है कि भट्टी जैसा लगता है। रेवती, उसकी पत्नी, भी गर्मी और सिरदर्द से परेशान है। दोनों इस बात पर चर्चा करते हैं कि मकान में हवा नहीं है, पानी गर्म है, और ठंडा पानी भी प्यास नहीं बुझाता। विश्वनाथ बताता है कि वह दो साल से बेहतर मकान ढूँढ़ रहा है, लेकिन उसे कोई अच्छा मकान नहीं मिल रहा।

रेवती शिकायत करती है कि पड़ोसियों ने अपनी छत पर बच्चों को सोने की जगह नहीं दी, क्योंकि वे स्वार्थी हैं। विश्वनाथ कहता है कि अगर कोई मेहमान आ जाए, तो इस छोटे मकान में उनकी खातिरदारी करना मुश्किल होगा। रेवती भी यही चाहती है कि कोई मेहमान न आए, क्योंकि वह पहले से ही गर्मी और सिरदर्द से परेशान है। वे बच्चों की बीमारियों के बारे में भी बात करते हैं, जैसे बड़ा बच्चा टाइफाइड से बीमार था और शिमला भेजना पड़ा। विश्वनाथ छुट्टी लेने की बात करता है, लेकिन कहता है कि छुट्टी मिलना मुश्किल है और खर्च भी चाहिए। दोनों सोने की जगह पर बहस करते हैं कि कौन ऊपर छत पर सोएगा और कौन आँगन में, लेकिन कोई फैसला नहीं होता।

पहले मेहमान का आगमन: अपरिचित मेहमान

अचानक दरवाजा खटखटाता है, और दो अजनबी, नन्हेमल और बाबूलाल, मकान में प्रवेश करते हैं। वे अपने साथ एक बिस्तर और संदूक लाते हैं। विश्वनाथ और रेवती उन्हें नहीं जानते, लेकिन भारतीय मेहमाननवाजी की परंपरा के कारण उनकी खातिरदारी में जुट जाते हैं। नन्हेमल और बाबूलाल गर्मी से परेशान हैं और कहते हैं कि उनके कपड़े पसीने से भीग गए हैं। वे ठंडा पानी माँगते हैं और खाने-पीने की बात करते हैं।

नन्हेमल और बाबूलाल अपने बारे में ठीक-ठीक नहीं बताते। वे कहते हैं कि वे बिजनौर से आए हैं और किसी संपतराम (जो गोटे का व्यापारी है) के रिश्तेदार हैं। विश्वनाथ कहता है कि वह संपतराम को नहीं जानता। फिर वे कहते हैं कि शायद विश्वनाथ को सेठ जगदीशप्रसाद के यहाँ मुरादाबाद में देखा था। लेकिन विश्वनाथ को कुछ भी याद नहीं आता, क्योंकि वह बीस साल पहले बिजनौर गया था और जगदीशप्रसाद का प्रेस है, न कि मिल। मेहमान बार-बार अस्पष्ट बातें करते हैं, जिससे विश्वनाथ और रेवती को शक होता है। वे कोई चिट्ठी भी नहीं लाए हैं और कहते हैं कि संपतराम ने उन्हें रेलवे रोड पर कृष्णा गली का पता दिया था, लेकिन शहर में कई कृष्णा गलियाँ हैं।

मेहमानों की माँगें और परिवार की परेशानी

नन्हेमल और बाबूलाल ठंडा पानी, नहाने का इंतजाम, और खाना माँगते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें साग और पूरी या रोटी खानी है। रेवती को गुस्सा आता है, क्योंकि वह पहले से ही सिरदर्द और गर्मी से परेशान है। वह विश्वनाथ से कहती है कि पहले मेहमानों की सही जानकारी लें, फिर खाना बनाएँ। लेकिन विश्वनाथ कहता है कि मेहमानों को भूखा नहीं रख सकते, इसलिए खाना बनाना होगा। रेवती कहती है कि बाजार से मँगाना पड़ेगा, जो महँगा पड़ेगा। परिवार में नौकर भी नहीं टिकता, क्योंकि पानी ऊपर चढ़ाना पड़ता है।

इसी बीच, पड़ोसी की शिकायत आती है कि मेहमानों ने उनकी छत पर गंदा पानी फैलाया। विश्वनाथ माफी माँगता है, लेकिन पड़ोसी नाराज होकर कहता है कि विश्वनाथ के यहाँ बार-बार मेहमान आते हैं और परेशानी खड़ी करते हैं। इससे विश्वनाथ को और शर्मिंदगी महसूस होती है। मेहमान फिर से पानी पीते हैं और खाने की जल्दी माँगते हैं।

दूसरे मेहमान का आगमन: गलतफहमी का खुलासा

विश्वनाथ बार-बार पूछता है कि मेहमान कहाँ से आए हैं और किसके यहाँ जाना चाहते हैं। अंत में नन्हेमल और बाबूलाल कहते हैं कि वे कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जा रहे थे, जो पास की गली में रहते हैं। विश्वनाथ को राहत मिलती है, क्योंकि उसे लगता है कि ये मेहमान गलती से उसके घर आ गए। वह प्रमोद को कहता है कि मेहमानों को कविराज रामलाल का घर दिखा दे। नन्हेमल और बाबूलाल विदा लेते हैं। विश्वनाथ और रेवती को अब राहत मिलती है, और रेवती कहती है कि सिर फट रहा था।

अंत: असली मेहमान का आगमन

जैसे ही नन्हेमल और बाबूलाल जाते हैं, रेवती का भाई अचानक आता है। वह कहता है कि उसने पहले से तार (टेलीग्राम) भेजा था, लेकिन विश्वनाथ को तार नहीं मिला। रेवती का भाई गर्मी और मकान खोजने की परेशानी से थका हुआ है। वह कहता है कि उसे खाना नहीं चाहिए, लेकिन रेवती जिद करती है कि वह खाना बनाएगी, क्योंकि भाई को भूखा नहीं सोने दे सकती। विश्वनाथ और रेवती उसे ठंडा पानी और नहाने का इंतजाम देते हैं। वह कहता है कि शहर बहुत बड़ा है और होटल में ठहरने का विचार आया था, लेकिन घर आ गया। कहानी यहीं खत्म होती है, जो दिखाती है कि मध्यवर्गीय परिवार मेहमानों की वजह से कितनी परेशानियाँ झेलता है।

कहानी का मुख्य बातें

  • मध्यवर्गीय जीवन की कठिनाइयाँ: कहानी में दिखाया गया है कि मध्यवर्गीय परिवार छोटे मकान, गर्मी, और आर्थिक तंगी से कैसे जूझता है। उनके पास संसाधन सीमित हैं, फिर भी वे मेहमाननवाजी करते हैं।
  • मेहमाननवाजी की परंपरा: भारतीय संस्कृति में मेहमान को भगवान माना जाता है। विश्वनाथ और रेवती, भले ही परेशान हों, मेहमानों की सेवा करते हैं।
  • गलतफहमी और हास्य: नन्हेमल और बाबूलाल की अस्पष्ट बातें और गलत मकान में आने की घटना कहानी में हास्य पैदा करती है।
  • पड़ोसियों का स्वार्थ: पड़ोसी का व्यवहार दिखाता है कि शहरों में लोग अपने स्वार्थ को ज्यादा महत्व देते हैं और दूसरों की मदद कम करते हैं।
  • पारिवारिक जिम्मेदारी: रेवती और विश्वनाथ अपनी परेशानियों के बावजूद बच्चों और मेहमानों की देखभाल करते हैं।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी “नए मेहमान” से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कभी-कभी अनजान परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और हमें धैर्य, संयम और समझदारी से काम लेना चाहिए। मेहमान चाहे परिचित हों या अनजाने, उनका सम्मान करना और उनकी मदद करना हमारी जिम्मेदारी है। साथ ही, यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि गर्मी, तंग जगह और असुविधाओं के बीच भी हमें आपसी सहयोग और विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ सहानुभूति रखना और परिस्थिति को हँसी-मज़ाक व धैर्य से संभालना ही सच्ची समझदारी है।

शब्दार्थ

  • असुविधा: परेशानी, कठिनाई
  • संकोचवश: झिझक के कारण
  • आगंतुक: आने वाला व्यक्ति, अतिथि
  • गर्मी की ऋतु: गर्मियों का मौसम
  • गृहपति: घर का मालिक, घर का मुखिया
  • पल्ला: कपड़े का सिरा
  • चर्राई हुई हैकड़ी हो गई है, खिंच रही है
  • ठग: धोखा देने वाला
  • कष्ट: तकलीफ़, दुःख
  • कष्ट सहना: परेशानी झेलना
  • तुनककर: नाराज़ होकर
  • क्षमा: माफ़ करना
  • नेपथ्य: मंच के पीछे का भाग (नाटक में)
  • यवनिका: परदा
  • भुना: तपना, गर्म होना
  • भाड़ में भुनना: बहुत गर्मी में तपना
  • भली चलाई: अच्छी बात कह दी
  • संपन्न: अमीर, सम्पन्न व्यक्ति
  • जिद: अड़ जाना, अपनी बात पर अड़े रहना
  • कविराज: वैद्य (आयुर्वेदिक डॉक्टर)

7. मत बाँधो – Chapter Notes

कवि परिचय

महादेवी वर्मा हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री थीं। उनका जन्म 1907 में फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने बचपन से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। उन्होंने बच्चों के लिए कई सुंदर कविताएँ लिखीं, जैसे ‘बारहमासा’, ‘आज खरीदेंगे हम ज्वाला’ और ‘अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी’। उन्होंने गद्य में भी कई रचनाएँ लिखीं, जैसे ‘मेरा परिवार’, ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएँ’। उनके कविता-संग्रह ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्य गीत’ और ‘दीपशिखा’ बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला। महादेवी वर्मा एक कुशल चित्रकार भी थीं। उनका निधन 1987 में हुआ।

महादेवी वर्मा

मुख्य विषय

इस कविता में कवयित्री कहती हैं कि हमें अपने सपनों के पंख नहीं काटने चाहिए और उनकी गति को नहीं रोकना चाहिए। सपनों को स्वतंत्र छोड़ना चाहिए, ताकि वे ऊँचाइयों तक उड़कर नई रोशनी और प्रेरणा के साथ लौटें और जीवन को सुंदर बनाएं।

कविता का सार

इस कविता में कवयित्री कहती हैं कि हमें सपनों को रोकना या बाँधना नहीं चाहिए। जैसे पक्षी आकाश में उड़कर लौटकर नहीं आते और बीज मिट्टी में गिरकर ही पेड़ बन पाते हैं, वैसे ही सपनों को भी अपनी गति और उड़ान चाहिए। सपने कभी ऊपर उठते हैं, कभी नीचे आते हैं, लेकिन उनका आना-जाना ही उन्हें सुंदर बनाता है। यदि उन्हें रोका जाए तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सपनों को खुला आकाश देना चाहिए ताकि वे अपनी पूरी चमक और रंग लेकर धरती को सुंदर बना सकें।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

इन सपनों के पंख न काटो 
इन सपनों की गति मत बाँधो!
सौरभ उड़ जाता है नभ में 
फिर वह लौट कहाँ आता है? 
बीज धूलि में गिर जाता जो 
वह नभ में कब उड़ पाता है? 

व्याख्या: इन पंक्तियों में कवयित्री कहती हैं कि सपनों के पंख मत काटो और उनकी उड़ान को मत रोकना। जैसे फूलों की खुशबू हवा में उड़कर आसमान में चली जाती है और वापस नहीं आती, वैसे ही सपने भी स्वतंत्र होने चाहिए। अगर बीज को मिट्टी में गिरने से रोक दिया जाए, तो वह कभी पेड़ बनकर आसमान तक नहीं पहुँच सकता। इसका मतलब है कि सपनों को खुलकर उड़ने और आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए।

प्रसंग 2

अग्नि सदा धरती पर जलती 
धूम गगन में मँडराता है। 
सपनों में दोनों ही गति हैं 
उड़ कर आँखों में आता है! 

व्याख्या: इन पंक्तियों में कवयित्री कहती हैं कि सपने धरती से शुरू होकर आसमान तक जाते हैं। जैसे आग धरती पर जलती है और उसका धुआँ आसमान में उड़ता है, वैसे ही सपने भी धरती से उठकर हमारी आँखों में नई चमक लाते हैं। सपनों में इतनी ताकत होती है कि वे हमें ऊँचा उठाते हैं और नई उम्मीदें देते हैं।

प्रसंग 3

इसका आरोहण मत रोको 
इसका अवरोहण मत बाँधो! 
मुक्त गगन में विचरण कर यह 
तारों में फिर मिल जायेगा, 
मेघों से रंग औ’ किरणों से 
दीप्ति लिए भू पर आयेगा। 

व्याख्या: इन पंक्तियों में कवयित्री कहती हैं कि सपनों को ऊपर उठने या नीचे आने से नहीं रोकना चाहिए। सपने स्वतंत्र होकर आसमान में तारों और बादलों के बीच घूमते हैं। वे बादलों से रंग और सूरज की किरणों से रोशनी लेकर धरती पर लौटते हैं। इसका मतलब है कि सपने हमें नई प्रेरणा और सुंदरता देते हैं।

प्रसंग 4

स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प 
भूमि को सिखलायेगा ! 
नभ तक जाने से मत रोको 
धरती से इसको मत बाँधो! 
इन सपनों के पंख न काटो 
इन सपनों की गति मत बाँधो !

व्याख्या: अंत में कवयित्री कहती हैं कि सपने हमें धरती को स्वर्ग बनाने का तरीका सिखाते हैं। हमें सपनों को धरती से बाँधने या आसमान तक जाने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सपनों को स्वतंत्र देने से वे हमें नई राह दिखाते हैं और दुनिया को और सुंदर बनाने में मदद करते हैं।

कविता से शिक्षा

कविता “मत बाँधो” में महादेवी वर्मा कहती हैं कि हमें अपने सपनों को रोकना नहीं चाहिए। जैसे पक्षी आकाश में स्वतंत्र उड़ता है, वैसे ही सपनों को भी स्वतंत्रता देनी चाहिए। सपने हमें नई ऊँचाइयों तक ले जाते हैं और नई सोच देते हैं। अगर हम सपनों को बाँधेंगे या उनकी उड़ान रोकेंगे, तो वे कभी पूरे नहीं होंगे। यह कविता हमें सिखाती है कि हमें अपने सपनों को खुलकर जीने देना चाहिए, उनकी गति को नहीं रोकना चाहिए, ताकि वे हमें बेहतर इंसान बनने और कुछ नया करने की प्रेरणा दे सकें।

शब्दार्थ

  • पंख काटना: उड़ने या आगे बढ़ने की क्षमता छीन लेना
  • गति बाँधना: गति या स्वतंत्रता को रोकना
  • नभ: आकाश
  • बीज: पौधे का अंकुरण प्रारंभ करने वाला अंश
  • धूलि: मिट्टी, धूल
  • अग्नि: आग
  • धरती: पृथ्वी
  • धूम: धुआँ
  • गगन: आकाश
  • मँडराना: ऊपर घूमना, चक्कर लगाना
  • आरोहण: ऊपर चढ़ना
  • अवरोहण: नीचे उतरना
  • मुक्त: स्वतंत्र, आज़ाद
  • विचरण: घूमना, चलना
  • तारे: आकाश में चमकने वाले तारे
  • मेघ: बादल
  • किरण: सूरज की रोशनी
  • दीप्ति: चमक, प्रकाश
  • शिल्प: कला, निर्माण का तरीका
  • सिखलाना: सिखाने का तरीका
  • स्वर्ग: सुंदर और सुखद स्थान

6. एक टोकरी भर मिट्टी – Chapter Notes

लेखक परिचय

माधवराव सप्रे हिंदी के शुरुआती कहानीकार थे। उनकी मातृभाषा मराठी थी और उनका जन्म मध्य प्रदेश के दमोह में हुआ था। वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से प्रेरित होकर हिंदी साहित्य में आए। उन्होंने तिलक की प्रसिद्ध पुस्तक गीता-रहस्य का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट शामिल हैं। उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि समाज की सोच और रिश्तों पर भी सवाल उठाती है।

माधवराव सप्रे

मुख्य विषय

कहानी “एक टोकरी भर मिट्टी” में दिखाया गया है कि धन और ताकत के घमंड में इंसान अक्सर गलत रास्ता चुन लेता है और दूसरों के दुख को नहीं समझ पाता। ज़मींदार ने लालच और अहंकार में आकर एक गरीब वृद्धा की झोंपड़ी छीन ली, लेकिन वृद्धा की सच्ची बात ने उनका दिल बदल दिया। टोकरी भर मिट्टी न उठा पाने पर उन्हें समझ आया कि किसी का घर और यादें छीनना कितना भारी बोझ होता है। यह कहानी बताती है कि दूसरों की भावनाओं और उनके जीवन से जुड़ी चीज़ों का सम्मान करना चाहिए। अंत में, दया और समझदारी ही इंसान को सही रास्ते पर ले आती है।

कहानी का सार 

यह कहानी एक गरीब, अनाथ वृद्धा और एक अमीर ज़मींदार की है। ज़मींदार के पास एक बड़ा महल था, और उसके पास ही वृद्धा की छोटी सी झोंपड़ी थी। ज़मींदार को अपने महल का आंगन बढ़ाने की इच्छा हुई, और इसके लिए उसे वृद्धा की झोंपड़ी चाहिए थी। उसने वृद्धा से कई बार कहा कि वह अपनी झोंपड़ी हटा ले, लेकिन वृद्धा इसके लिए तैयार नहीं थी। उस झोंपड़ी में उसकी जिंदगी की कई यादें थीं। वहां उसका पति और उसका इकलौता बेटा मर चुका था। 

उसकी बहू भी एक पांच साल की बेटी को छोड़कर मर गई थी। अब उसकी पोती ही उसका एकमात्र सहारा थी। जब उसे अपनी पुरानी जिंदगी याद आती, तो वह रोने लगती थी। जब से उसने सुना कि ज़मींदार उसकी झोंपड़ी लेना चाहता है, तब से वह बहुत दुखी और कमजोर हो गई थी। वह उस झोंपड़ी से इतना प्यार करती थी कि वह मरने से पहले वहां से नहीं हटना चाहती थी।

ज़मींदार ने बहुत कोशिश की, लेकिन वृद्धा नहीं मानी। आखिरकार, उसने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। उसने वकीलों को पैसे देकर अदालत से वृद्धा की झोंपड़ी पर कब्जा कर लिया और उसे वहां से निकाल दिया। बेचारी वृद्धा अनाथ थी, इसलिए वह पास-पड़ोस में कहीं और रहने चली गई।

एक दिन जमींदार उस झोंपड़ी के पास टहल रहा था और अपने नौकरों को काम बता रहा था। तभी वृद्धा एक टोकरी लेकर वहां आई। ज़मींदार ने उसे देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे वहां से हटा दो। लेकिन वृद्धा गिड़गिड़ाकर बोली, “महाराज, अब तो यह झोंपड़ी आपकी हो चुकी है। मैं इसे लेने नहीं आई। मेरी आपसे एक विनती है।” ज़मींदार ने सिर हिलाकर उसे बोलने की इजाजत दी। 

वृद्धा ने कहा, “जब से यह झोंपड़ी मुझसे छीनी गई है, मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानती। वह बार-बार कहती है कि अपने घर जाऊंगी और वही रोटी खाऊंगी। इसलिए मैंने सोचा कि इस झोंपड़ी की थोड़ी सी मिट्टी लेकर जाऊंगी और उससे चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। शायद तब मेरी पोती खाना खाने लगे। कृपया मुझे इस टोकरी में मिट्टी ले जाने की इजाजत दें।” ज़मींदार ने उसे मिट्टी ले जाने की अनुमति दे दी।

वृद्धा झोंपड़ी के अंदर गई। वहां पहुंचते ही उसे अपनी पुरानी यादें ताजा हो गईं, और वह रोने लगी। उसने अपने दुख को किसी तरह संभाला और टोकरी में मिट्टी भर ली। फिर वह बाहर आई और जमींदार से हाथ जोड़कर बोली, “महाराज, कृपया इस टोकरी को थोड़ा सा छू दें ताकि मैं इसे अपने सिर पर रख सकूं।” जमींदार पहले तो बहुत गुस्सा हुए, लेकिन वृद्धा बार-बार गिड़गिड़ाने लगी और उनके पैरों पर गिर गई। 

आखिरकार, ज़मींदार को उस पर दया आ गई। उन्होंने किसी नौकर को नहीं बुलाया और खुद टोकरी उठाने के लिए आगे बढ़े। लेकिन जब उन्होंने टोकरी को उठाने की कोशिश की, तो वह बहुत भारी लगी। उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाई, लेकिन टोकरी एक इंच भी नहीं उठी। शर्मिंदगी के साथ उन्होंने कहा, “नहीं, यह टोकरी मुझसे नहीं उठेगी।”

यह सुनकर वृद्धा बोली, “महाराज, नाराज न हों। आप एक टोकरी मिट्टी नहीं उठा पा रहे, और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी है। उसका बोझ आप पूरी जिंदगी कैसे उठाएंगे? इस बारे में सोचिए।” वृद्धा के ये शब्द सुनकर ज़मींदार को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ। उन्होंने वृद्धा से माफी मांगी और उसकी झोंपड़ी उसे वापस दे दी।

कहानी की मुख्य बातें

  • कहानी का आधार: यह कहानी एक गरीब, अनाथ वृद्धा और एक अमीर ज़मींदार के बीच की घटना पर आधारित है। वृद्धा की झोंपड़ी ज़मींदार के महल के पास थी।
  • ज़मींदार की इच्छा: ज़मींदार अपने महल का अहाता बढ़ाना चाहता था और इसके लिए वृद्धा की झोंपड़ी को हटाना चाहता था।
  • वृद्धा का लगाव: वृद्धा की झोंपड़ी में उसकी पुरानी यादें थीं। उसका पति और बेटा वहाँ मरे थे, और अब उसकी पोती ही उसका एकमात्र सहारा थी। वह झोंपड़ी छोड़ना नहीं चाहती थी।
  • ज़मींदार की चाल: ज़मींदार ने वकीलों की मदद से अदालत से झोंपड़ी पर कब्ज़ा कर लिया और वृद्धा को वहाँ से निकाल दिया।
  • वृद्धा की विनती: वृद्धा एक टोकरी मिट्टी लेने झोंपड़ी आई। उसने ज़मींदार से कहा कि उसकी पोती झोंपड़ी की मिट्टी से बने चूल्हे की रोटी ही खाएगी।
  • ज़मींदार का प्रयास: वृद्धा ने ज़मींदार से टोकरी को छूकर उसे सिर पर रखने में मदद माँगी। ज़मींदार ने टोकरी उठाने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत भारी थी और उठी नहीं।
  • वृद्धा का संदेश: वृद्धा ने कहा कि अगर एक टोकरी मिट्टी नहीं उठती, तो पूरी झोंपड़ी का बोझ ज़मींदार कैसे उठाएगा? यह सुनकर ज़मींदार को अपनी गलती का एहसास हुआ।
  • ज़मींदार का पश्चाताप: ज़मींदार ने अपनी गलती मानी, वृद्धा से माफी माँगी, और उसकी झोंपड़ी वापस कर दी।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धन और ताकत के घमंड में कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा दूसरों की भावनाओं और परेशानियों को समझना चाहिए। किसी को उसके घर या अधिकार से बेघर करना बहुत गलत है। सच्ची ताकत पैसा या शक्ति नहीं, बल्कि दया, करुणा और इंसानियत होती है। अगर हमसे गलती हो जाए तो उसे मानकर सुधार लेना ही सही रास्ता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि दूसरों के दुःख को समझकर ही हम अच्छे इंसान बन सकते हैं।

शब्दार्थ

  • ज़मींदार: गाँव या क्षेत्र में ज़मीन का मालिक
  • अहाता: घर या भवन के चारों ओर घिरा हुआ खुला स्थान
  • बहुतेरा कहा: बहुत बार समझाया
  • पतोहू: पुत्रवधू, बहू
  • आधार: सहारा, सहायक
  • मृतप्राय: जो लगभग मर चुका हो
  • निष्फल: असफल
  • चाल चलना: कोई योजना या उपाय अपनाना
  • बाल की खाल निकालना: बहुत बारीकी से खोज करना
  • वकील की थैली गरम करना: वकील को रिश्वत देना या अधिक पैसे देना
  • कब्ज़ा करना: अपने अधिकार में लेना
  • गिड़गिड़ाना: विनती करना, बार-बार आग्रह करना
  • चूल्हा: रोटी पकाने का स्थान
  • स्मरण: याद आना
  • आंतरिक: भीतर का
  • प्रार्थना: निवेदन, विनती
  • लज्जित: शर्मिंदा
  • गर्वित: अभिमानी
  • कृतकर्म: किए गए काम
  • पश्चाताप: गलती पर पछतावा करना

5. कबीर के दोहे – Chapter Notes

कवि परिचय

कबीर एक ऐसे संत और कवि थे जो करघे पर कपड़ा बुनते थे और साथ ही सुंदर दोहे भी कहते थे। उनका जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी (वाराणसी) में हुआ माना जाता है। उनकी रचनाएँ “कबीर ग्रंथावली” में मिलती हैं। उनके दोहे हमें सच्चाई, ईमानदारी और अच्छा इंसान बनने की सीख देते हैं। उनके दोहे इतने सरल और सुंदर हैं कि लोग आज भी उन्हें गाते और सीखते हैं।

कबीर

मुख्य विषय

कबीर के इन दोहों का मुख्य विषय यह है कि हमें हमेशा सच बोलना चाहिए, बुरे कामों से बचना चाहिए, अच्छे और सच्चे गुरु का सम्मान करना चाहिए, और ऐसी बातें बोलनी चाहिए जो घमंड रहित हों और दूसरों को शांति दें। बुरी आदतों और बुरे लोगों से सीखने के बजाय अच्छे लोगों की संगति करनी चाहिए, ताकि हमारा जीवन अच्छा बने।

दोहों का सार

कबीर के दोहे हमें सरल शब्दों में जीवन का सही रास्ता दिखाते हैं। वे कहते हैं कि सच्चाई सबसे बड़ा तप है और झूठ सबसे बड़ा पाप। जिसके दिल में सच है, उसके पास सच्चा ज्ञान (गुरु) होता है। केवल बड़े होने से कोई महान नहीं बनता, जैसे खजूर का पेड़ न छाया देता है न पास से फल देता है। गुरु को भगवान से भी पहले स्थान दिया गया है क्योंकि वही हमें भगवान का रास्ता बताते हैं। किसी भी बात में ज़्यादा बोलना, चुप रहना या ज़्यादा बरसना और धूप, सब हानिकारक हैं—हर चीज़ में संतुलन होना चाहिए। हमें ऐसी बातें करनी चाहिए जिनमें घमंड न हो, जिससे दूसरों को सुख मिले और हमें भी शांति मिले। बुराई बताने वाले (निंदक) को अपने पास रखना चाहिए क्योंकि वह बिना पानी-साबुन के हमारे स्वभाव को साफ कर देता है। सच्चा साधु सूप की तरह होता है, जो अच्छा बचा लेता है और बुरा अलग कर देता है। हमारा मन पक्षी जैसा है, वह जहाँ चाहे उड़ जाता है, लेकिन जैसी संगति होगी, वैसा ही फल मिलेगा।

दोहों की व्याख्या

पद 1

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि दुनिया में सच बोलने से बड़ा कोई धर्म या पूजा नहीं है। जैसे मंदिर में पूजा करना अच्छा है, वैसे ही सच बोलना भी सबसे बड़ी पूजा है। वहीं, झूठ बोलना सबसे बड़ा पाप है, क्योंकि झूठ से विश्वास टूटता है और बुरे काम होते हैं। जिसके दिल में सच्चाई होती है, वहाँ सच्चा ज्ञान (गुरु) खुद आ जाता है। उदाहरण: जैसे तुम सच बोलकर सबका भरोसा जीतते हो, वैसे ही सच बोलने से मन में अच्छी समझ आती है।

पद 2

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि केवल ऊँचा होना या बड़ा पद पाना ही सम्मान की बात नहीं है, बल्कि दूसरों के काम आना जरूरी है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, लेकिन राहगीर को न तो उसकी छाया मिलती है, और न ही फल आसानी से। उसी तरह, अगर कोई इंसान ऊँचे पद पर है या बहुत धनवान है, लेकिन किसी की मदद नहीं करता, तो उसका बड़ा होना बेकार है।

पद 3

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि अगर गुरु और भगवान दोनों सामने खड़े हों, तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए। क्योंकि गुरु ही हमें भगवान के बारे में बताते हैं और हमें सही रास्ता दिखाते हैं। गुरु के बिना हम भगवान तक नहीं पहुँच सकते।

गुरु गोविंद 

पद 4

अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि किसी भी चीज की अधिकता अच्छी नहीं होती। बहुत ज्यादा बोलना बुरा है, क्योंकि लोग परेशान हो जाते हैं। बहुत ज्यादा चुप रहना भी बुरा है, क्योंकि इससे ज़रूरी बातें छुप जाती हैं। उसी तरह, बहुत ज्यादा बारिश से बाढ़ आ जाती है और बहुत तेज धूप से धरती सूख जाती है।

पद 5

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि हमें ऐसे शब्द बोलने चाहिए जिनमें घमंड न हो और जो सुनने वाले को शांति दें। ऐसी नम्र बातें दूसरों के दिल को ठंडक पहुँचाती हैं और हमें भी खुशी देती हैं। उदाहरण: जैसे तुम दोस्तों से प्यार से बात करो तो सब खुश रहते हैं, वैसे ही हमें हमेशा शांत और अच्छी बातें करनी चाहिए।

पद 6

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जो हमारी बुराई बताता है, उसे अपने पास रखना चाहिए। वह हमारी गलतियाँ बता कर हमें सुधारने में मदद करता है। यह काम वह बिना किसी खर्च के करता है — जैसे बिना पानी और साबुन के सफाई हो जाए।

पद 7

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि अच्छा इंसान उस सूप की तरह होना चाहिए, जो अनाज में से दाने (अच्छा) रख लेता है और भूसी (बुरा) को उड़ा देता है। इंसान को भी अच्छी बातें और अच्छे गुण अपनाने चाहिए और बुरी आदतें छोड़ देनी चाहिए।

पद 8

कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि मन एक पक्षी की तरह है, जो जहाँ चाहे उड़ जाता है। अगर हम अच्छे लोगों के साथ रहेंगे तो अच्छे विचार और अच्छे परिणाम मिलेंगे। लेकिन अगर हम बुरे संग में रहेंगे तो हमें बुरे परिणाम ही मिलेंगे।

दोहों से शिक्षा

कबीर के दोहों से हमें यह सीख मिलती है कि हमेशा सच बोलना चाहिए क्योंकि झूठ बुरा होता है। बड़ा होना सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करने वाला होना जरूरी है। गुरु का सम्मान पहले करना चाहिए, क्योंकि वे हमें भगवान का रास्ता दिखाते हैं। किसी भी काम में ज़्यादा करना ठीक नहीं होता, इसलिए हमें सही मात्रा में बोलना और सही समय पर चुप रहना सीखना चाहिए। हमें हमेशा नम्र और शांत करने वाले शब्द बोलने चाहिए जिससे सबका दिल खुश हो। जो हमारी गलतियाँ बताएं, उन्हें पास रखना चाहिए ताकि हम सुधर सकें। अच्छा दोस्त वही होता है जो अच्छे विचार अपने दिल में रखे और बुरी बातें दूर करे। हमारा मन उस समाज जैसा बनता है जहाँ हम रहते हैं, इसलिए अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए ताकि हमारा स्वभाव भी अच्छा हो। ये सीख हमें अच्छा इंसान बनने और सुखी जीवन जीने में मदद करती हैं।

शब्दार्थ

  • साँच: सत्य, जो सही और वास्तविक हो
  • तप: तपस्या, कठिन साधना या कष्ट
  • हिरदे: हृदय, दिल
  • गुरु: शिक्षक या आध्यात्मिक मार्गदर्शक
  • पंथी: यात्री या रास्ते पर चलने वाला
  • गोविंद: भगवान विष्णु का एक नाम
  • पाँय: पैर
  • बलिहारी: समर्पित या बलिदान देने वाला
  • बानी: बोली गई भाषा या वाणी
  • आपा: स्वाभिमान या अहंकार
  • निंदक: आलोचक, जो बुराई निकालता है
  • कुटी: छोटी झोपड़ी या घर
  • सुभाय: अच्छा स्वभाव या अच्छी आदत
  • सूप: अनाज छानने का कृषि उपकरण

4. हरिद्वार – Chapter Notes

लेखक परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक माने जाते हैं। उनका जन्म 1850 में हुआ और 1885 में उनका निधन हो गया। उन्होंने कविताएँ, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत लिखे। उन्होंने कई पत्रिकाएँ भी निकालीं, जैसे कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और बालाबोधिनी। उनकी रचनाओं में समाज सुधार, देश प्रेम और अंग्रेज़ी शासन का विरोध दिखाई देता है। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में सत्य हरिश्चंद्र, भारत-दुर्दशा और अंधेर नगरी शामिल हैं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र

मुख्य विषय

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1871 में हरिद्वार की यात्रा की और वहाँ की सुंदर प्रकृति, गंगा नदी, घाट, पर्वत, पक्षी और शांत वातावरण का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह पवित्र स्थान मन को शुद्ध और प्रसन्न करता है, यहाँ के लोग संतोषी हैं और यह जगह साधुओं और यात्रियों के लिए बहुत उपयुक्त है।

हरिद्वार यात्रा का सार

भारतेंदु हरिश्चंद्र एक मशहूर हिंदी लेखक थे। उन्हें घूमना बहुत पसंद था। वे भारत के कई गाँवों और शहरों में गए और उनके बारे में लिखा। उनकी यात्राएँ उन्हें प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और पुरानी चीज़ों के बारे में जानने में मदद करती थीं। उनका मानना था कि किताबों के साथ-साथ यात्राएँ भी हमें बहुत कुछ सिखाती हैं।

सन् 1871 में भारतेंदु हरिद्वार गए। उन्होंने वहाँ की सुंदरता को देखकर बहुत खुशी महसूस की। उन्होंने ‘कविवचन सुधा’ नाम की पत्रिका के संपादक को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपनी हरिद्वार यात्रा के बारे में बताया। यह पत्र बहुत पुराना है, लगभग 150 साल पहले का, और इसमें उस समय की हिंदी का इस्तेमाल हुआ है।

पत्र का सार

भारतेंदु ने अपने पत्र में लिखा कि हरिद्वार का वर्णन करने में उन्हें बहुत आनंद मिल रहा है। हरिद्वार एक पवित्र जगह है, जहाँ जाते ही मन शांत और साफ हो जाता है। यह जगह तीन तरफ से हरे-भरे पहाड़ों से घिरी है। इन पहाड़ों पर हरी-हरी लताएँ और पेड़ हैं, जो बहुत सुंदर लगते हैं। पेड़ ऐसे लगते हैं जैसे साधु एक टांग पर खड़े होकर तपस्या कर रहे हों। ये पेड़ धूप, बारिश और ओस को सहते हैं। भारतेंदु कहते हैं कि इन पेड़ों का जन्म धन्य है, क्योंकि ये लोगों को फल, फूल, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ देते हैं। यहाँ तक कि जलने के बाद भी इनके कोयले और राख से लोगों का काम होता है। ये पेड़ इतने अच्छे हैं कि पत्थर मारने पर भी फल देते हैं।

इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और बिना डर के गाते हैं, क्योंकि वहाँ शिकारी नहीं हैं। बारिश की वजह से चारों तरफ हरियाली थी, जो देखने में ऐसा लगता था जैसे हरा गलीचा (कालीन) बिछा हो।

हरिद्वार में गंगा नदी बहती है, जो बहुत पवित्र है। भारतेंदु कहते हैं कि गंगा की धारा राजा भगीरथ की कीर्ति की तरह चमकती है। गंगा का पानी बहुत ठंडा और मीठा है, जैसे बर्फ में जमी चीनी का शरबत। पानी साफ और सफेद है, और उसमें कई तरह के जलीय जीव तैरते हैं। गंगा का पानी तेज़ी से बहता है, जिससे बहुत आवाज़ होती है। ठंडी हवा गंगा के छोटे-छोटे कणों को उड़ाती है, जो छूने से ही मन को शुद्ध कर देती है।

गंगा यहाँ दो धाराओं में बँटी है – एक का नाम नील धारा और दूसरी गंगा। इन दोनों धाराओं के बीच एक छोटा सा पहाड़ है। नील धारा के किनारे एक सुंदर पहाड़ है, जिसके ऊपर चण्डिका देवी की मूर्ति है। हरिद्वार में ‘हरि की पैड़ी’ नाम का एक पक्का घाट है, जहाँ लोग स्नान करते हैं। खास बात यह है कि यहाँ गंगा ही सबसे बड़ी देवी हैं, और कोई दूसरा देवता नहीं है। हालाँकि, कुछ साधुओं ने मठ और मंदिर बना लिए हैं। गंगा का रास्ता यहाँ संकरा है, लेकिन पानी बहुत तेज़ बहता है।

गंगा के किनारे राजाओं ने धर्मशालाएँ बनवाई हैं, जहाँ यात्री ठहरते हैं। वहाँ दुकानें भी हैं, लेकिन रात को बंद हो जाती हैं। हरिद्वार इतना शुद्ध और शांत जगह है कि वहाँ कोई गुस्सा या लालच नहीं दिखता। यहाँ के पंडे और दुकानदार कनखल और ज्वालापुर से आते हैं। पंडे बहुत संतुष्ट रहते हैं और एक पैसे को भी बहुत मानते हैं।

हरिद्वार में पाँच मुख्य तीर्थ हैं: हरिद्वार, कुशावर्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल। हरिद्वार में हरि की पैड़ी पर स्नान होता है। कुशावर्त उसके पास ही है। नीलधारा दूसरी धारा है। विल्वपर्वत एक सुंदर पहाड़ है, जहाँ विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है। कनखल तीर्थ भी पास ही है। कनखल बहुत अच्छा तीर्थ है। बहुत समय पहले वहाँ दक्ष ने यज्ञ किया था, और सती ने शिव जी का अपमान न सहकर अपना शरीर त्याग दिया था। वहाँ कुछ छोटे-छोटे घर भी हैं। भारामल जैकृष्णदास खत्री वहाँ के मशहूर धनवान व्यक्ति हैं।

हरिद्वार में कोई झगड़ा या बखेड़ा नहीं है। यह साधुओं और शांत लोगों के लिए बहुत अच्छी जगह है। भारतेंदु का मन वहाँ जाते ही बहुत खुश और शुद्ध हो गया। वे दीवान कृपा राम के घर के ऊपर बने बंगले में रुके थे। वहाँ चारों तरफ से ठंडी हवा आती थी। एक रात को चंद्रग्रहण हुआ, और उन्होंने बड़े आनंद से गंगा में स्नान किया। दिन में उन्होंने भागवत पुराण का पाठ भी किया। उनके दोस्त कल्लू जी भी उनके साथ थे और बहुत खुश थे।

एक दिन भारतेंदु ने गंगा के किनारे पत्थर पर खाना बनाया और पानी के पास बैठकर खाया। गंगा के ठंडे छींटे उनके पास आते थे। यह खाना उन्हें सोने की थाली के खाने से भी ज़्यादा अच्छा लगा। उनका मन बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से भर जाता था। वहाँ कोई झगड़ा या लड़ाई नहीं थी।

हरिद्वार में कई चीज़ें अच्छी बनती हैं। वहाँ का जनेऊ बहुत पतला और चमकदार होता है। वहाँ की कुशा (पवित्र घास) बहुत खास है, जिसमें दालचीनी और जावित्री जैसी खुशबू आती है। भारतेंदु कहते हैं कि यह पुण्य भूमि इतनी खास है कि यहाँ की घास भी सुगंधित है।

अंत में, भारतेंदु लिखते हैं कि हरिद्वार सब कुछ अनोखा है। यह जगह साधुओं और शांत मन वालों के लिए बनी है। उनका मन अभी भी हरिद्वार में ही बस्ता है। उन्होंने संपादक से अपने इस पत्र को पत्रिका में छापने की गुज़ारिश की और कहा कि वे पाठकों को इस पवित्र जगह के बारे में बताना चाहते हैं। पत्र के अंत में उन्होंने अपने नाम की जगह ‘यात्री’ लिखा।

हरिद्वार यात्रा की मुख्य बातें

  • भारतेंदु हरिश्चंद्र 1871 में हरिद्वार घूमने गए थे।
  • हरिद्वार को देखकर उनका मन बहुत खुश और साफ हो गया।
  • यह जगह तीन ओर से हरे-हरे पहाड़ों से घिरी हुई है।
  • पहाड़ों पर बेलें और बड़े-बड़े पेड़ हैं, जिनसे लोग फल, फूल, छाया, लकड़ी आदि पाते हैं।
  • पेड़ों पर अलग-अलग रंग के पक्षी निडर होकर गाते हैं।
  • चारों तरफ बारिश के कारण हरियाली फैली थी, जैसे हरा कालीन बिछा हो।
  • पास में गंगा नदी बहती है, जिसका पानी बहुत ठंडा, मीठा और साफ है।
  • गंगा की दो धाराएँ हैं – नीलधारा और गंगा जी। इनके बीच एक छोटा पहाड़ है।
  • हरि की पैड़ी नाम का घाट है, जहाँ लोग स्नान करते हैं।
  • यहाँ लोग शांत और संतोषी हैं, झगड़े-लड़ाई नहीं होती।
  • पाँच मुख्य तीर्थ हैं – हरिद्वार, कुशावर्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल।
  • कनखल तीर्थ में पहले दक्ष का यज्ञ हुआ था और यहीं सती ने अग्नि में प्रवेश किया था।
  • लेखक ने गंगा किनारे पत्थर पर बैठकर खाना खाया, जो उन्हें सोने की थाली से भी अच्छा लगा।
  • यहाँ का जनेऊ बहुत अच्छा बनता है और कुशा में अच्छी खुशबू आती है।
  • यह जगह साधुओं और शांत मन वाले लोगों के रहने के लिए बहुत अच्छी है।

यात्रा से शिक्षा

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी मानते थे कि पढ़ाई सिर्फ किताबों से नहीं, यात्राओं से भी होती है। 1871 में हरिद्वार जाकर उन्होंने वहाँ की प्रकृति, गंगा नदी, शांत वातावरण और लोगों का संतोष देखा। उन्हें महसूस हुआ कि यात्रा से हमें नया ज्ञान, भक्ति, और प्रकृति की कद्र करना सीखने को मिलता है।

शब्दार्थ

  • पुण्य भूमि: पवित्र और धार्मिक महत्व वाली जगह
  • चित्त: मन, हृदय
  • निर्मल: साफ, शुद्ध
  • वल्ली: बेल या लता
  • शुभ मनोरथ: अच्छे उद्देश्य या नेक इरादे
  • तपस्या: साधना, कठिन धार्मिक अभ्यास
  • अर्थी: मृत शरीर ले जाने वाले लोग
  • गंध: सुगंध, खुशबू
  • मनोर्थ: मन की इच्छा
  • कल्लोल: पानी या पक्षियों की चहचहाहट जैसी मधुर ध्वनि
  • जात्री: यात्री, यात्रा करने वाला
  • त्रिभुवन पावनी: तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) को पवित्र करने वाली (यहाँ गंगा जी)
  • पवित्र: शुद्ध, पावन
  • मिष्ट: मीठा
  • पने: टुकड़ा (यहाँ चीनी का टुकड़ा)
  • संचार: चलना-फिरना, फैलना
  • धार: नदी का बहाव
  • चुटीला पर्वत: छोटा और नुकीला पहाड़
  • मूर्ति: प्रतिमा
  • घाट: नदी किनारे स्नान करने की सीढ़ियाँ
  • वैरागी: संसार के मोह-माया से दूर साधु
  • धर्मशाला: यात्रियों के ठहरने की जगह
  • निर्मल तीर्थ: साफ-सुथरा और पवित्र तीर्थस्थान
  • विलक्षण: अनोखा
  • कनखल: हरिद्वार के पास का प्रसिद्ध धार्मिक स्थान
  • यज्ञ: धार्मिक हवन या अनुष्ठान
  • अपमान: बेइज्जती
  • भस्म: राख
  • टिकना: ठहरना
  • पारायण: किसी धार्मिक ग्रंथ का पाठ
  • निदान: अंत में, आखिरकार
  • छलके: लहरें, पानी की छोटी-छोटी तरंगें
  • वैराग्य: मोह-माया से मुक्ति की भावना
  • जनेऊ: यज्ञोपवीत, एक धार्मिक धागा
  • कुशा: पूजा में प्रयुक्त एक प्रकार की पवित्र घास
  • सुगंधमय: जिसमें अच्छी खुशबू हो
  • विरागमय: मोह-माया से रहित
  • मौनावलंबन: चुप्पी धारण करना
  • स्थानदान: जगह देना

3. एक आशीर्वाद – Chapter Notes

कवि परिचय

दुष्यंत कुमार हिंदी के प्रसिद्ध कवि और लेखक थे। उनका जन्म 1933 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुआ था। उन्होंने कम समय में ही अपनी रचनाओं से हिंदी साहित्य को बहुत कुछ दिया। उनकी भाषा जीवंत और सरल थी, जिसे लोग बहुत पसंद करते थे। उनका सबसे लोकप्रिय गज़ल संग्रह “साये में धूप” है। उनकी सभी रचनाएँ “दुष्यंत कुमार रचनावली” के चार खंडों में प्रकाशित हैं। उनका निधन 1975 में हुआ।दुष्यंत कुमार

मुख्य विषय

इस कविता में कवि एक बच्चे को आशीर्वाद देते हैं कि उसके सपने बड़े हों। वह अच्छी बातें सीखे, कभी-कभी रूठे, कुछ पाने की कोशिश करे और अपने पैरों पर खड़ा हो। कविता में यह संदेश है कि हर बच्चे को सपने देखने और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए।

कविता का सार

इस कविता में कवि किसी छोटे बच्चे को आशीर्वाद दे रहा है। वह चाहता है कि बच्चे के सपने बड़े हों और वह हमेशा खुश रहे। कवि कहता है कि बच्चे के सपने कल्पना की दुनिया से निकलकर सच बनें और वह ज़मीन पर अपने पैरों पर चलना सीखे। 

वह कहता है कि बच्चा कभी-कभी सपनों को पाने के लिए रूठे या ज़िद भी करे, और कठिनाइयों का सामना करना सीखे। जैसे दीये की रोशनी देखकर वह आकर्षित हो, वैसे ही वह सीखते-सीखते छोटी गलतियाँ करे और अपने अनुभव से मजबूत बने। कवि का यह आशीर्वाद है कि बच्चा बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा हो और अपने सपनों को पूरा करे।

कविता की व्याख्या

जा, 
तेरे स्वप्न बड़े हों
भावना की गोद से उतरकर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें
चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए
रूठना-मचलना सीखें
हँसें
मुसकराएँ
गाएँ
हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ 
उँगली जलाएँ
अपने पाँवों पर खड़े हों।
जा, 
तेरे स्वप्न बड़े हों।

व्याख्या: इन पंक्तियों में कवि किसी बच्चे या नवयुवक को आशीर्वाद दे रहा है कि उसके सपने बहुत बड़े हों। वह चाहता है कि ये सपने केवल सोच तक ही सीमित न रहें, बल्कि भावना की दुनिया से बाहर निकलकर सच्ची ज़िंदगी में उतरें। जैसे छोटा बच्चा धीरे-धीरे चलना सीखता है, वैसे ही यह व्यक्ति भी अपने सपनों को हकीकत में बदलना सीखे। कवि यह भी चाहता है कि जब कोई सपना पूरा न हो तो वह रूठे, मचले और कोशिश करता रहे। उसे हर दीये की रोशनी (उम्मीद) अच्छी लगे, भले ही उंगली जल जाए, यानी कठिनाइयाँ आएँ, फिर भी वह अपनी कोशिश न छोड़े और खुद पर भरोसा रखे। आखिर में कवि फिर से आशीर्वाद देता है कि उसके सपने बड़े हों और वे पूरे हों।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें सीख मिलती है कि हमें अपने सपने बड़े रखने चाहिए और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। मुश्किलें आएँ तो डरना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। यह कविता हिम्मत, मेहनत और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देती है।

शब्दार्थ

  • स्वप्न: सपना
  • भावना: मन की कोमल और सच्ची सोच या भावना
  • पृथ्वी: धरती
  • अप्राप्य: जिसे पाना मुश्किल हो
  • सच्चाइयाँ: सच बातें, हकीकत
  • रूठना: नाराज़ होना
  • मचलना: ज़िद करना या कुछ पाने की इच्छा करना
  • दीया: मिट्टी का छोटा दीपक
  • रोशनी: प्रकाश या उजाला
  • ललचाना: किसी चीज़ को पाने की इच्छा करना
  • उँगली जलाएँ: कुछ सीखने के प्रयास में गलती करना
  • अपने पाँवों पर खड़ा होना: आत्मनिर्भर बनना
  • गाएँ: गीत गाना या प्रसन्नता प्रकट करना
  • मुसकराना: हल्की सी हँसी के साथ खुशी दिखाना

2. दो गौरैया – Chapter Notes

लेखक परिचय

भीष्म साहनी हिंदी के प्रसिद्ध लेखक थे। उनका जन्म 1915 में रावलपिंडी में हुआ। उनकी कहानियाँ और उपन्यास देश के बँटवारे और मानवीय मूल्यों को दर्शाते हैं। उनके उपन्यास तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। बच्चों के लिए उन्होंने गुलेल का खेल जैसी कहानियाँ लिखीं। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनका निधन 2003 में हुआ।

भीष्म साहनी

मुख्य विषय

यह कहानी दो गौरैयों और एक परिवार की है। गौरैयाँ घर में घोंसला बना लेती हैं। पिताजी उन्हें निकालने की बहुत कोशिश करते हैं, लेकिन वे बार-बार लौट आती हैं। जब उनके बच्चे घोंसले से बाहर झाँकते हैं, तो पिताजी का मन बदल जाता है। अंत में, परिवार गौरैयों को अपना लेता है।

कहानी का सार

कहानी “दो गौरैया” एक छोटे से परिवार की है, जिसमें माँ, पिताजी और एक बच्चा रहते हैं। उनके घर में बहुत सारे पक्षी और जानवर आते-जाते हैं, जिससे पिताजी मजाक में कहते हैं कि उनका घर एक सराय बन गया है, और वे खुद मेहमान जैसे हैं, जबकि असली मालिक ये जानवर और पक्षी हैं। घर के आँगन में एक आम का पेड़ है, जहाँ तोते, कौवे और गौरैया जैसे कई पक्षी आते हैं। पिताजी हँसते हुए कहते हैं कि दिल्ली आने वाला हर पक्षी उनके घर का पता जानकर चला आता है। इन पक्षियों का शोर इतना तेज होता है कि कानों के पर्दे फटने जैसे लगते हैं, लेकिन लोग इसे गाना कहते हैं।

घर के अंदर भी कई जानवर रहते हैं। चूहे रात भर दौड़ते हैं, जिससे बर्तन गिरते हैं और नींद टूट जाती है। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठता है, शायद उसे सर्दी लगती है, और दूसरा बाथरूम की टंकी पर, शायद उसे गर्मी लगती है। एक बिल्ली भी कभी-कभी दूध पीने आती है। चमगादड़ शाम को कमरों में उड़ते हैं, कबूतर “गुटर गूँ” की आवाज करते हैं, और छिपकलियाँ, बर्रे और चींटियों की फौज भी घर में रहती है।

एक दिन दो गौरैया घर में घुस आती हैं और पूरे घर का मुआयना करती हैं, जैसे देख रही हों कि यह रहने लायक है या नहीं। दो दिन बाद वे पंखे के गोले में घोंसला बना लेती हैं और वहाँ रहने लगती हैं। माँ कहती हैं कि अब वे नहीं जाएँगी क्योंकि उन्होंने घोंसला बना लिया है। लेकिन पिताजी को गुस्सा आता है, और वे गौरैयों को भगाने की ठान लेते हैं। माँ मजाक में कहती हैं कि पिताजी चूहों को नहीं भगा पाए, तो गौरैया क्या भगाएँगे। इससे पिताजी और नाराज हो जाते हैं।

पिताजी गौरैयों को भगाने के लिए ताली बजाते हैं, “शू-शू” करते हैं, कूदते हैं, और लाठी लहराते हैं। गौरैया घोंसले से निकलकर कभी पर्दे पर, कभी दरवाजे पर बैठ जाती हैं। माँ हँसती हैं और कहती हैं कि पिताजी का नाचना गौरैयों को पसंद आ रहा है। पिताजी और कोशिश करते हैं, दरवाजे बंद करवाते हैं, लेकिन गौरैया दरवाजों के नीचे की जगह या टूटे रोशनदान से बार-बार अंदर आ जाती हैं। माँ कहती हैं कि अब गौरैयों ने अंडे दे दिए होंगे, इसलिए वे नहीं जाएँगी। पिताजी गुस्से में रोशनदान में कपड़ा ठूंस देते हैं और गौरैयों को फिर भगाते हैं।

हर दिन यही होता है। दिन में गौरैया बाहर निकाल दी जाती हैं, लेकिन रात में वे फिर अंदर आ जाती हैं। पिताजी परेशान होकर कहते हैं कि वे घोंसला तोड़ देंगे। वे स्टूल पर चढ़कर घोंसले के तिनके हटाने लगते हैं। तभी घोंसले से दो नन्हीं गौरैयों की “चीं-चीं” की आवाज आती है। ये नवजात चूजे हैं, जो अपने माँ-बाप को बुला रहे हैं। यह देखकर पिताजी का मन बदल जाता है। वे लाठी नीचे रख देते हैं और चुपचाप बैठ जाते हैं। माँ सभी दरवाजे खोल देती हैं, और गौरैयों के माँ-बाप अंदर आकर अपने बच्चों को खाना खिलाने लगते हैं।

अंत में, घर फिर से चहल-पहल से भर जाता है, लेकिन इस बार पिताजी गौरैयों को देखकर मुस्कुराते हैं। 

कहानी की मुख्य बातें

  • परिवार और घर का वर्णन: कहानी में एक छोटा परिवार है – माँ, पिताजी और बच्चा। उनका घर पक्षियों और जानवरों से भरा हुआ है, जैसे कि यह एक सराय हो।
  • आम का पेड़ और पक्षी: घर के आँगन में एक आम का पेड़ है, जहाँ कई तरह के पक्षी जैसे तोते, कौवे और गौरैया आते हैं। पिताजी मजाक में कहते हैं कि पक्षी उनके घर का पता जानकर आते हैं।
  • घर में जानवरों का बसेरा: घर में चूहे, छिपकलियाँ, चींटियाँ, कबूतर और चमगादड़ रहते हैं। एक बिल्ली भी कभी-कभी दूध पीने आती है। ये सभी घर को जीवंत बनाते हैं।
  • दो गौरैयों का आना: एक दिन दो गौरैया घर में घुस आती हैं और पंखे के गोले में घोंसला बना लेती हैं। उन्हें घर पसंद आ जाता है।
  • पिताजी का गुस्सा: पिताजी गौरैयों को भगाने की कोशिश करते हैं। वे ताली बजाते हैं, लाठी लहराते हैं और कूदते हैं, लेकिन गौरैया नहीं भागतीं। माँ इस पर हँसती हैं।
  • माँ का व्यंग्य: माँ पिताजी का मजाक उड़ाती हैं, कहती हैं कि वे चूहों को नहीं भगा पाए, तो गौरैया क्या भगाएँगे। इससे पिताजी और नाराज हो जाते हैं।
  • गौरैयों को भगाने की कोशिश: पिताजी दरवाजे बंद करवाते हैं और लाठी से गौरैयों को भगाने की कोशिश करते हैं। गौरैया कभी पर्दे पर, कभी दरवाजे पर बैठ जाती हैं।
  • गौरैयों की चतुराई: गौरैया बार-बार दरवाजों के नीचे की जगह या टूटे रोशनदान से अंदर आ जाती हैं। पिताजी परेशान हो जाते हैं।
  • घोंसला तोड़ने का फैसला: पिताजी गुस्से में घोंसला तोड़ने का फैसला करते हैं। वे स्टूल पर चढ़कर घोंसले के तिनके हटाने लगते हैं।
  • नन्हीं गौरैयों का दिखना: घोंसला तोड़ते समय पिताजी को दो नन्हें गौरैया दिखती हैं, जो चीं-चीं कर रही हैं। 
  • पिताजी का मन बदलना: पिताजी घोंसला तोड़ना बंद कर देते हैं और चुपचाप बैठ जाते हैं। माँ सभी दरवाजे खोल देती है, ताकि गौरैयों के माँ-बाप अंदर आ सकें।
  • खुशहाल अंत: गौरैयों के माँ-बाप अपने बच्चों के पास आते हैं और उन्हें खाना खिलाते हैं। पिताजी अब गौरैयों को देखकर मुस्कुराते हैं, और घर में फिर से चहल-पहल शुरू हो जाती है।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें सीखने को मिलता है कि हमें पक्षियों और सभी जीवों के प्रति दया और प्रेम रखना चाहिए। गौरैयों ने जब घर में घोंसला बनाया, तो पिताजी ने उन्हें निकालने की कोशिश की। लेकिन जब उन्होंने उनके बच्चों की चीं-चीं सुनी, तो उनका दिल बदल गया। हमें समझना चाहिए कि हर जीव को अपने घर से प्यार होता है, और हमें प्रकृति के साथ मिलकर रहना चाहिए।

शब्दार्थ

  • सराय: ऐसा स्थान जहाँ यात्री ठहरते हैं (गेस्ट हाउस)
  • मेहमान: थोड़े समय के लिए घर आने वाला अतिथि
  • धमा-चौकड़ी: भाग-दौड़ और शोर-गुल
  • अँगीठी: कोयले या लकड़ी से जलने वाला हीटर
  • व्यंग्य: मजाक उड़ाते हुए कुछ कहना
  • उबल पड़ना: अचानक बहुत गुस्सा हो जाना
  • झुलाना: तेजी से हिलाना या लहराना
  • मल्हार: एक तरह का मधुर गीत या राग
  • तिनका: सूखी घास का छोटा टुकड़ा
  • घोंसला: पक्षियों का रहने का घर
  • कालीन: ज़मीन पर बिछाने वाली मोटी चादर (गलीचा)
  • शीशा: काँच जिससे खिड़की या दरवाज़ा बना होता है
  • लाठी: लकड़ी की मजबूत छड़ी
  • ठकुराना: हल्के से मारना या थपथपाना
  • गुमसुम: चुपचाप, बिना कुछ बोले या आवाज किए

1. स्वदेश – Chapter Notes

कवि परिचय

गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे। उनका जन्म 1883 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हुआ। उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली में कविताएँ लिखीं। ‘सनेही’ और ‘त्रिशूल’ उनके उपनाम थे। उनकी कविताएँ देशप्रेम, किसानों, मजदूरों और सामाजिक बुराइयों पर आधारित हैं। स्वदेश, त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मंत्र उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। उनका निधन 1972 में हुआ। उनकी कविताएँ आज भी प्रेरणा देती हैं।

गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’मुख्य विषय

यह कविता देशभक्ति की भावना को प्रकट करती है। इसमें बताया गया है कि जिस व्यक्ति के दिल में अपने देश के लिए प्रेम, सम्मान और समर्पण नहीं है, वह व्यर्थ है। कवि देशप्रेम को जीवन का सार मानते हैं और कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने देश के लिए कुछ नहीं करता, उसमें भावना और उद्देश्य की कमी है। कविता हमें यह सिखाती है कि जिस मिट्टी में हम पले-बढ़े, जिसने हमें सब कुछ दिया, उसके लिए हमें सच्चा प्रेम और कर्तव्यभाव होना चाहिए। सच्चा नागरिक वही है जो निडर होकर देश की सेवा करता है और समय रहते कुछ कर दिखाने का जज़्बा रखता है।

कविता का सार

यह कविता अपने देश के प्रति प्यार और समर्पण की भावना को दिखाती है। कवि कहता है कि जिस दिल में अपने देश के लिए प्यार नहीं है, वह दिल पत्थर के जैसा है। अगर किसी के जीवन में देश के लिए कोई जोश नहीं है, तो उस जीवन का कोई मतलब नहीं है।

जो इंसान देश और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलता, वह जीवन में कुछ खास नहीं कर सकता। जो डर के कारण साहस छोड़ देता है, वह कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता।

कवि कहता है कि जिस इंसान के कारण समाज का भला नहीं होता, उसका खुद का भी भला नहीं हो सकता। जिस दिल में भावनाएँ नहीं हैं और जिसमें देशभक्ति की भावना नहीं बहती, वह दिल व्यर्थ है।

जिस मिट्टी में हम जन्मे, पले-बढ़े, जिसने हमें खाना-पानी दिया, जहाँ हमारे माता-पिता और रिश्तेदार रहते हैं, उस देश को न मानना बहुत गलत बात है। यही देश हमें अमूल्य रत्नों की तरह ज्ञान और संपदा देता है, जिस पर दुनिया भी गर्व करती है।

अगर फिर भी किसी का दिल इस देश पर दया से नहीं पसीजता, तो वह धरती पर बोझ है। अंत में कवि कहता है कि हमारी जान एक दिन जानी ही है, समय की लौ हर पल जल रही है, इसलिए देश के लिए कुछ करने का समय अभी है। हमारे पास ताकत भी है, साहस भी है, बस जरूरत है देशप्रेम की।

इसलिए, जो अपने देश से प्यार नहीं करता, उसका दिल पत्थर के समान है।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।

व्याख्या: कवि कहता है कि जिस इंसान के दिल में अपने देश के लिए प्यार नहीं है, उसका दिल पत्थर जैसा कठोर है। ऐसा जीवन जिसमें देश के लिए जोश और उत्साह न हो, वह जीवन व्यर्थ है, उसका कोई मूल्य नहीं है।

प्रसंग 2

जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं।
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं।

व्याख्या: कवि कहता है कि जो व्यक्ति दुनिया की तरक्की और बदलाव के साथ नहीं चलता, वह पीछे रह जाता है और जो साहसी नहीं होता, वह जीवन की कठिनाइयों को पार नहीं कर सकता। साहस और आगे बढ़ने की भावना ज़रूरी है।

प्रसंग 3

जिससे न जाति- उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं॥
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

व्याख्या: यहाँ कवि कहता है कि जो व्यक्ति अपने समाज और देश की भलाई के लिए काम नहीं करता, वह खुद भी कभी सफल नहीं हो सकता। जिस दिल में भावना, ममता और प्यार नहीं है, वह पत्थर की तरह निर्जीव है और खासकर वह हृदय तो निश्चय ही पत्थर है जिसमें अपने देश के लिए प्रेम नहीं है।

प्रसंग 4

जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
माता-पिता बंधु जिसमें,
हैं जिसके राजा-रानी॥

व्याख्या: कवि अपने देश की महानता का वर्णन करते हुए कहता है कि जिस देश की मिट्टी में हम बड़े हुए, जिसमें हमने अन्न और जल पाया, हमारे माता-पिता और रिश्तेदार रहते हैं, और जिसके राजा-रानी हमारे संरक्षक हैं – ऐसा देश हमारा कर्ज़दार नहीं, बल्कि हम उस देश के ऋणी हैं।

प्रसंग 5

जिसने कि खजाने खोले हैं,
नव रत्न दिये हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी॥

व्याख्या: कवि कहता है कि हमारा देश भारत ऐसा है जिसने दुनिया को अनगिनत रत्न दिए हैं – जैसे विद्या, संस्कृति, योग, और महान विचारक। यहाँ की सुंदरता और ज्ञान को पूरी दुनिया मानती है और आकर्षित होती है। हमारा देश वास्तव में अद्भुत है।

प्रसंग 6

उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।
निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि अगर किसी का हृदय अपने महान देश की महानता को देखकर भी नहीं पिघलता, तो वह धरती पर बोझ के समान है। जीवन एक दिन खत्म हो जाएगा, इसलिए जब तक ज़िंदा हैं, हमें अपने देश के लिए कुछ अच्छा करना चाहिए।

प्रसंग 7

है काल- दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को ॥
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

व्याख्या: कवि अंत में कहता है कि समय का दीपक हमेशा जलता रहता है, और जो वीर होते हैं, वे उस दीपक की लौ में जलने को तैयार रहते हैं (अर्थात बलिदान को तैयार रहते हैं)। हमारे पास सब कुछ है – शक्ति, साहस और हथियार भी। फिर भी यदि किसी के दिल में देश के लिए प्रेम नहीं है, तो वह दिल पत्थर है।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें सिखाई जाती है कि हमें अपने देश से सच्चा प्रेम करना चाहिए। जिस दिल में देशभक्ति नहीं है, वह पत्थर जैसा है। जो देश के लिए कुछ नहीं करता, उसका जीवन बेकार है। जिस मिट्टी ने हमें सब कुछ दिया – भोजन, परिवार, संस्कार – उसके लिए हमें सम्मान और भाव होना चाहिए। हमें डरना नहीं चाहिए, बल्कि साहस से देश की सेवा करनी चाहिए। इस कविता की मुख्य शिक्षा है कि सच्चा नागरिक वही है जो अपने देश से प्रेम करता है और उसके लिए कुछ करता है।

शब्दार्थ

  • स्वदेश: अपना देश
  • हृदय: दिल, मन
  • जोश: उत्साह, उमंग
  • साहस: हिम्मत
  • उद्धार: सुधार या मुक्ति
  • रस-धार: भावना की बहती धारा
  • लासानी: अनुपम, जिसकी कोई तुलना न हो
  • पसीजा: दया या भावना से पिघलना
  • परवाना: दीपक पर जान देने वाला कीट, प्रेमी
  • तलवार: एक तेज़ धार वाला युद्ध-हथियार