10. अन्योत्तरम् – Chapter Summary

अन्योक्तयः पाठपरिचयः

अन्योक्ति अर्थात किसी की प्रशंसा अथवा निन्दा अप्रत्यक्ष रूप से अथवा किसी बहाने से करना। जब किसी प्रतीक या माध्यम से किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा की जाती है, तब वह पाठकों के लिए अधिक ग्राह्य होती है। प्रस्तुत पाठ में ऐसा ही सात अन्योक्तियों का सङ्कलन है जिनमें राजहंस, कोकिल, मेघ, मालाकार, सरोवर तथा चातक के माध्यम से मानव को सवृत्तियों एवं सत्कर्मों के प्रति प्रवृत्त होने का संदेश दिया गया है।

09. भूकम्पविभीषिका – Chapter Summary

भूकम्पविभीषिका पाठपरिचयः

हमारे वातावरण में भौतिक सुख-साधनों के साथ-साथ अनेक आपदाएँ भी लगी रहती हैं। प्राकृतिक आपदाएँ जीवन को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। कभी किसी महामारी की आपदा. बाढ़ तथा सूखे की आपदा या तूफ़ान के रूप में भयङ्कर प्रलय-ये सब हम अपने जीवन में देखते तथा सुनते रहते हैं। भूकम्प भी ऐसी आपदा है, जिस पर यहाँ दृष्टिपात किया गया है। इस पाठ के माध्यम से यह बताया गया है कि किसी भी आपदा में बिना किसी घबराहट के, हिम्मत के साथ किस प्रकार हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकते हैं।

08. सूत्रयः – Chapter Summary

चेन्नई नगर के समुद्रतट पर महाकवि तिरुवल्लुवर की प्रतिमा है। इन्होंने तिरुक्कुरल् नामक एक पावन ग्रन्थ की रचना की है। इसमें सूक्तियों का संग्रह है। प्रस्तुत पाठ में इसी ग्रन्थ से सूक्तियों का संकलन किया गया है। पाठ का सार इस प्रकार है-
पिता पुत्र को विद्या रूपी महान् धन देता है। इसके लिए पिता अत्यधिक तपस्या करता है। यह पुत्र पर पिता का ऋण है। जैसी सरलता मन में है, वैसी सरलता यदि वाणी में भी हो तो महापुरुष इस स्थिति को समत्व कहते हैं।जो धर्मनिष्ठ वाणी को छोड़कर कठोर वाणी बोलता है, वह मूर्ख पके फल को छोड़कर कच्चे फल का सेवन करता है।

इस संसार में विद्वान् व्यक्ति ही वास्तविक नेत्रों वाले कहे जाते हैं। भौतिक आँखें तो नाममात्र के नेत्र हैं।
जो मन्त्री बोलने में चतुर, धीर तथा सभा में निडर होकर मन्त्रणा देने वाला है, वह शत्रुओं के द्वारा किसी प्रकार से पराजित नहीं होता है। जो व्यक्ति अपना कल्याण तथा अनेक सुखों की कामना करता है, वह अन्य व्यक्तियों के लिए कदापि अहितकर कार्य न करे। सदाचार प्रथम धर्म कहा गया है। अतः प्राण देकर भी सदाचार की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिए। जिस किसी के द्वारा जो कुछ भी कहा गया है, उसके वास्तविक अर्थ का निर्णय जिसके द्वारा किया जा सकता है, वह ही ‘विवेक’ कहलाता है।

07. विचित्राः साक्षी – Chapter Summary

प्रस्तुत पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। यह कथा प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश-रूप में दिए गए फैसले पर आधारित है।
‘सत्यमेव जयते’ परंतु सत्य की विजय के लिए भी प्रमाण की आवश्यकता होती है। सत्य की जीत, निष्पक्ष और उचित न्याय प्रमाण के बिना नहीं हो सकता। अतएव ‘विचित्र साक्षी’ नामक प्रस्तुत पाठ में चोरी के अभियोग में साक्ष्य के अभाव में न्यायाधीश निर्णय नहीं कर सकता। परंतु न्यायाधीश बंकिमचंद्र महोदय प्रमाण के अभाव में अपनी बुद्धि की चतुरता से साक्ष्य उपस्थित करने में सफल होते हैं।

कोई निर्धन जन बहुत परिश्रम से धन अर्जित कर अपने पुत्र को किसी महाविद्यालय में प्रवेश दिलवाता है। छात्रावास में रहने वाले अपने पुत्र की बीमारी सुनकर पुत्र को देखने के लिए जाता है। रात्रि में किसी गृहस्थ के घर आश्रय लेता है। उसी रात कोई चोर भी उसी घर में प्रवेश कर रखी हुई एक पेटी लेकर भागता है। चोर के पदध्वनि से जागे हुए अतिथि ने ‘चोर चोर’ चिल्लाया। ऊँचे स्वर से जागे हुए ग्रामवासी भी आ गए और उस अतिथि को ही चोर मानकर पीटने लगे। यद्यपि असली चोर सिपाही (चौकीदार) ही था। परंतु उस समय उस सिपाही ने अतिथि को ही जेल में डाल दिया। न्यायालय में न्यायाधीश बंकिमचंद्र ने पूरा विवरण सुना। सत्य जानते हुए भी साक्ष्य के अभाव में वह निर्णय न ले सके। अतः उन्होंने अपने बुद्धिचातुर्यबल से एक जीवित साक्ष्य उपस्थित किया। शव रूप में छिपे साक्ष्य ने सब कुछ सत्य उद्घाटित कर दिया। दोषी सिपाही को कारावास हुआ और अतिथि ससम्मान मुक्त हुआ। अतः कहा जाता है “बुद्धिबल से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।”

06. सौहार्दं प्रकृतेः शोभा – Chapter Summary

आधुनिक युग में भौतिक सुखों में जकड़ा हुआ मानव अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए अन्यों का अहित और तिरस्कार करने से भी नहीं चूकता। स्वार्थपरक और दूसरों को हीन समझने वाले मनुष्य की सबसे श्रेष्ठ शिक्षिका प्रकृति ही है। समाज के उत्थान, विकास और सुरक्षा के हेतु हमें अपना स्वार्थ छोड़ना ही होगा।

प्रस्तुत पाठ में इसी मानवीय भावना को पशु-पक्षियों के माध्यम से दर्शाया गया है कि परस्पर विवाद नहीं करते हुए आपसी सहयोग से कल्याणपथ पर चलना चाहिए। नदी किनारे आराम करते सिंह को बन्दर अनेक प्रकार से तंग करते हैं तो क्रोधित सिंह उनसे तंग करने का कारण पूछता है। बन्दर सिंह को वनराज पद के अयोग्य घोषित करते है कि वह भक्षक है रक्षक नहीं। और अपनी ही रक्षा करने में असमर्थ है तो अन्यजीवों की रक्षा किस प्रकार करेगा?

 इनका विवाद सुनकर कौआ, कोयल, हाथी, बगुला, मोर, व्याघ्र और चीता भी आते हैं और वनराज पद के लिए अपने गुणों का बखान कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और सभी पक्षी अपने पक्षी समुदाय के उल्लू को ही वनराज पद के योग्य कहते हैं। परन्तु कौआ अप्रियवादी, क्रूर रौद्र उल्लू के पक्ष में ना जाकर कहता है मोर, हंस, कोयल, चक्रवाक, तोता और सारस आदि पक्षिप्रधानों के होते हुए, दिन के अंधे और विकराल रूप वाला उल्लू क्या हित करेगा?

विवाद सुनकर प्रकृतिमाता प्रवेश कर सबसे कहती है कि तुम सब ही मेरी सन्तान हो। परस्पर कलह मत करो मिलकर खुशी से जीवन को रसमय बनाओ। परस्पर विवाद से प्राणियों की हानि होती है और प्रेम व सहयोग से सब प्राणियों का उत्थान व विकास होता है।

05. सुभाषितानि – Chapter Summary

संस्कृत साहित्य में जिन पद्यों (श्लोकों) में सार्वभौमिक सत्य को सुचारु रूप से प्रस्तुत किया है उनको ‘सुभाषित’ कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में 10 सुभाषितों का संग्रह है। इनमें परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, मानव प्रकृति, वस्तुओं की उपादेयता, बुद्धि की विशेषता आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

शरीर में स्थित आलस्य ही मनुष्यों का महान् शत्रु है और परिश्रम समान कोई बन्धु नहीं है जिसको करके मनुष्य दुःखी नहीं होता। गुणी मनुष्य ही गुण को जानता है निर्गुण नहीं, बलवान बल को जानता है निर्बल नहीं, वसन्त का गुण कोयल जानती है कौआ नहीं, शेर का बल हाथी जानता है चूहा नहीं। जो मनुष्य किसी कारण से क्रोधित होते हैं। उस कारण की समाप्ति पर प्रसन्न हो जाते हैं। परंतु जो अकारण क्रोधी हैं उनको कौन संतुष्ट कर सकता है? कही गई बात का अर्थ तो पशु, हाथी, घोड़े आदि भी जान लेते हैं। लेकिन ज्ञानीजन वह है जो न कहा गया भी जान ले। मनुष्यों के देह विनाश के लिए देह में ही स्थित प्रथम शत्रु क्रोध ही है। जैसे काष्ठ में स्थित अग्नि ही काष्ठ को जला डालती है वैसे ही शरीरस्थ क्रोध मानव शरीर को जला देता है। मित्रता समान शील और व्यवहार में होती है। जैसे मृग मृगों के साथ, गाएँ गायों के साथ विचरण करते हैं वैसे ही मूर्ख मूों के साथ और बुद्धिमान ज्ञानियों के साथ मैत्री करते हैं। फल व छायायुक्त महावृक्ष संरक्षण के योग्य है यदि दुर्भाग्य से वृक्ष फलहीन है तो छाया तो सदैव देता ही है। अक्षर मन्त्रहीन नहीं होता, औषधि मूल हीन नहीं होती, पुरुष अयोग्य नहीं होता। वहाँ योजक दुर्लभ है अर्थात् पारखी ही वस्तु की परख रखता है। महान् पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति में समभाव होते हैं जैसे सूर्य उदय व अस्त समय एक ही रूप (रक्त वर्ण) होता है। इस विचित्र संसार में कुछ भी निरर्थक नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में वीर है तो गधा बोझ वहन करने में। अर्थात् सबकी अपनी उपयोगिता है।

04. जननी तुल्यवत्सला – Chapter Summary

प्रस्तुत पाठ वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रन्थ के वनपर्व से उद्धृत है। जिसमें व्यास द्वारा कौरव प्रधान धृतराष्ट्र को समझाने का प्रयास किया गया है कि तुम पिता हो और तुम्हें अपने पुत्रों के साथ अपने भतीजों (पाण्डवों) के हित का ख्याल रखना है। प्रस्तुत प्रसंग में गाय के मातृत्व की चर्चा करते हुए गोमाता सुरभि और इन्द्र के माध्यम से यह बताया गया है कि माता के लिए सब संतान बराबर होती है उसके हृदय में अपनी सब सन्तानों के लिए समान स्नेह होता है।

एक किसान दो बैलों से अपना खेत जोत रहा था। तभी उनमें से एक दुर्बल बैल हल चलाने व शीघ्र चलने में असमर्थ हो पृथ्वी पर गिर पड़ता है, तो किसान उसे उठाने का प्रयत्न करता है। भूमि पर गिरे हुए दुखित बैल (अपने पुत्र) को देखकर, माता सुरभि की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। इन्द्र सुरभि से दुःख का कारण पूछते हैं तो सुरभि कहती है कि क्या आप नहीं देख रहे कि यह मेरा पुत्र किसान द्वारा पीड़ित किया जा रहा है। इन्द्र कहते हैं कि हजारों पुत्रों की माता होते हुए भी इस दीन पुत्र के लिए इतना स्नेह क्यों?

माता सुरभि कहती है कि सभी सन्तानों के लिए माता समान स्नेह वाली होती है। परन्तु दुर्बल पुत्र पर माता का विशेष स्नेह होता है। सुरभि के वचन सुनकर इन्द्र का हृदय भी द्रवित हो जाता है फिर प्रचण्ड वायु के साथ वर्षा आरम्भ होने पर किसान बैलों को लेकर अपने घर आ जाता है।

03. शिशुलालनम् – Chapter Summary

शिशुलालनम् पाठपरिचयः

प्रस्तुत पाठ संस्कृतवाङ्मय के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पंचक अंक से सम्पादित कर लिया गया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग हैं। इस नाटकांश में राम कुश और लव को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं, किन्तु वे दोनों अतिशालीनतापूर्वक मना करते हैं। सिंहासनारूढ़ राम कुश और लव के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं और आनन्दित होते हैं। पाठ में शिशु स्नेह का अत्यन्त मनोहारी वर्णन किया गया है।शिशुलालनम् Summary

पाठसारः
प्रस्तुत नाटक संस्कृत वाङ्मय के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पञ्चमाङ्क से सम्पादित किया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग है। प्रस्तुत नाटक में रामकथा के करुण अवसाद पूर्ण उत्तरार्ध की हृदयस्पर्शी और मार्मिक भावनाओं को सरल व सुन्दर रूप से प्रस्तुत किया गया है।
सिंहासन पर स्थित राम लव-कुश को देखकर उन्हें राजसिंहासन पर बैठाना चाहते हैं किन्तु वे दोनों शालीनतापूर्वक इन्कार कर देते हैं। लव-कुश के सौंदर्य से आकृष्ट राम उन्हें अपनी गोद में बैठाकर आनन्दित होते हैं।

प्रस्तुत पाठ में राम के हृदय में शिशु-प्रेम की भावना का अति मनोहारी वर्णन है। राम लव-कुश से उनके वंश, नाम, गुरु और माता-पिता के विषय में जानना चाहते हैं। प्रत्युत्तर में लव-कुश के कथनों से माता-पिता के प्रति सहानुभूति, गुरु के प्रति सम्मान और पिता के प्रति आक्रोश स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अपना परिचय देते हुए दोनों बालक गुरु वाल्मीकिः, सूर्यवंश में जन्म, माता का नाम ‘देवी’ और वाल्मीकि ऋषि द्वारा दिया गया नाम वधू बताते हैं।
पिता का नाम ‘निरनुक्रोश’ कहते हैं विदूषक इस नाम का कारण माता का तिरस्कृत और अपमानित होना कहता है आहृत हुए राम विदूषक से कहते हैं कि इन कुमारों और उनका पारिवारिक वृत्तान्त एक रूप है। तभी लव-कुश गुरु के आदेश से वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण का सुन्दर गान करते हैं।

02. बुद्धिर्बलवती सदा – Chapter Summary

प्रस्तुत पाठ ‘शुकसप्ततिः’ नामक प्रसिद्ध कथाग्रन्थ से सम्पादित किया गया है। ‘शुकसप्ततिः’ के लेखक और काल के विषय में आज भी भ्रान्ति बनी हुई है। शुकसप्तति अत्यन्त सरल और मनोरंजक कथासंग्रह है। प्रस्तुत कहानी में अपने दो पुत्रों के साथ जंगल के रास्ते से पिता के घर जा रही बुद्धिमती नामक नारी के बुद्धिकौशल को दिखाया गया है जो अपनी चातुर्य से सामने आए बाघ को भी डरा कर भगा देती है।

बुद्धिमती बाघ को समक्ष देख अपने पुत्रों को डाँटने का नाटक करती हुई कहती है कि झगड़ा मत करो। आज एक ही बाघ को बाँटकर खा लो फिर दूसरा देखते हैं। यह सुन ‘यह व्याघ्रमारी है’ ऐसा मानकर बाघ डरकर भांग जाता है। भयभीत बाघ को देखकर शृगाल बाघ का उपहास उड़ाता हुआ कहता है कि मुझे अपने गले में बाँधकर चलो जहाँ वह धूर्ता है। शृगाल के साथ पुनः आते बाघ को देखकर बुद्धिमती अपनी प्रत्युत्पन्नमति से शृगाल को ही आक्षेप लगाती हुई कहती है कि तुमने तीन बाघ देने के लिए कहा था। आज एक ही बाघ क्यों लाए हो?
यह सुनते ही शृगाल सहित बाघ भाग जाता है। इस प्रकार अपने बुद्धिबल से वह अपनी और अपने पुत्रों की प्राणरक्षा करती है।

01. शुचिपर्यावरणम – Chapter Summary

प्रस्तुत पाठ आधुनिक संस्कृत कवि हरिदत्त शर्मा के रचना संग्रह ‘लसल्लतिका’ से संकलित है। इनमें कवि ने महानगरों में बढ़ते प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करते हुए और मानव कल्याण के लिए पर्यावरण शुद्धि व स्वच्छता का संदेश देकर शुद्ध पर्यावरण की ओर जनजागरण करने का प्रयास किया है।


महानगरों में दिन-रात दौड़ते हुए यातायात साधनों से मनुष्य का शारीरिक व मानसिक ह्रास हो गया है। इस कारण वहाँ रहना मनुष्यों के लिए दुष्कर हो गया है। काले धुएँ को छोड़ती असंख्य गाड़ियों के कोलाहलपूर्ण मार्गों पर चलना भी कठिन है। प्रदूषित वातावरण के कारण वायुमण्डल, जल, भोज्य पदार्थ और समस्त धरातल सब कुछ अति दूषित हो गया है। अतः प्रदूषण को दूर कर पर्यावरण को शुद्ध करना चाहिए। प्रदूषित पर्यावरण से दु:खी कवि की इच्छा है कि कुछ समय के लिए महानगर से दूर प्रकृति की गोद में, एकान्त वन में वास करें, जहाँ पवित्र व शुद्ध जलपूर्ण नदियाँ, झरने और जलाशय हैं। जहाँ पक्षियों के मधुर कलरव से वन प्रदेश गुञ्जित हैं। चकाचौंध पूर्ण इस वातावरण से दूर प्राकृतिक दृश्यों को निहारते हुए जीवन को रसमय करना चाहता है।

कवि की आशंका है कि इस प्रदूषित पर्यावरण में हमारी संस्कृति, प्राकृतिक छटा, पाषाणी सभ्यता लुप्त न हो जाए। सुखमय मानव जीवन की कामना करता हुआ कवि पर्यावरण को शुद्ध व सुरक्षित करने की प्रार्थना करता है।