13. वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – Chapter Notes

परिचय

संस्कृत भाषा के अध्ययन में वर्णों का शुद्ध उच्चारण अत्यन्त आवश्यक है। यदि किसी शब्द का उच्चारण ठीक प्रकार से न हो, तो उसका अर्थ भी बदल सकता है। इसीलिए वर्णोच्चारण-शिक्षा का विशेष महत्त्व है। इस अध्याय में यह बताया गया है कि शब्द उच्चारण के लिए किन-किन स्थानों, करणों और प्रयत्नों की आवश्यकता होती है, तथा मुख और नासिका में ध्वनि उत्पन्न होने की प्रक्रिया कैसी है।

शब्दानां सम्यक् उच्चारणस्य महत्त्वम्

मूल पाठ (संस्कृत):
शब्दानां सम्यक् शब्दं च उच्चारणं नितान्तं महत्त्वपूर्णम् अन्तेऽपि तत्त्व्यं पदार्थे दृष्टव्यम्।
किञ्चित् शब्दस्य सम्यग् उच्चारणार्थं, तस्य शब्दस्य प्रत्येकवर्णस्य स्पष्टम उच्चारणं भवति।
अतः प्रत्येकवर्णस्य शब्दम् उच्चारणं कर्तुं भवति इति अत्र ज्ञायते।

भावार्थ:
किसी भी शब्द का सही उच्चारण बहुत आवश्यक है, क्योंकि इससे उसका वास्तविक अर्थ प्रकट होता है। जब तक किसी शब्द के प्रत्येक वर्ण का शुद्ध उच्चारण नहीं होगा, तब तक उसका सही अर्थ स्पष्ट नहीं हो सकता।

वागुत्पत्तेः प्रणाली

संस्कृत अनुच्छेद:
स्वर-व्यान्जनानां नत्वनत्वध-भेद-उपभेदानां विशेषः तत्त्व्यदर्शनातः। तत्र अङ्गेषु षट् उच्चारण-प्रदानानि अपि दृष्टानि। परन्तु, स्वराणाम् उच्चारणे केवलं आङ्ग्य एव उपयुज्यते न।

भावार्थ (हिंदी):
मानव-शरीर में ध्वनि उत्पन्न करने के लिए मुख्यतः छः अंग कार्य करते हैं। स्वर-उच्चारण में केवल मुख और नासिका का ही प्रयोग होता है, जबकि व्यंजन-उच्चारण में अन्य अंग भी सहायक होते हैं।

षट् उच्चारण-प्रदानानि (षडङ्गानि):

  • नाभि-प्रदेशः – उदर की मांसपेशियाँ (श्वास बल-तंत्र)
  • उरः – छाती (फेफड़े व डायफ्राम, वायु-बल-तंत्र)
  • कण्ठ-सिरः – कंठ, स्वरयंत्र (स्वनन-तंत्र)
  • आस्यम् – मुख व नासिका (उच्चारण-तंत्र)
  • जिह्वा – जिह्वा का विभिन्न भाग
  • नासिका – नासिका गुहा

उच्चारण हेतु आवश्यक तत्त्वानि

संस्कृत अनुच्छेद:
आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि –
(क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः।

भावार्थ (हिंदी):
मुख और नासिका के भीतर वर्णों के निर्माण के लिए तीन बातें आवश्यक हैं—

  • स्थानम् – जहाँ से वर्ण उत्पन्न होता है।
  • करणम् – जिससे स्थान पर वर्ण का आघात होता है।
  • आभ्यन्तर-प्रयत्नः – वर्ण के निर्माण का भीतरी प्रयास।

स्थानानि (उच्चारण-स्थान)

षट् स्थानानि:

  • कण्ठः
  • तालुः
  • मूर्धा
  • दन्तः
  • ओष्ठः
  • नासिका

भावार्थ (हिंदी):
मुख और नासिका में ये छह स्थान वर्णों के उच्चारण में सहायक होते हैं।

करणानि (उपकरणानि)

संस्कृत अनुच्छेद:
स्थानस्य समीपं यदागतं तत् करणं कथ्यते।

भावार्थ (हिंदी):
जिस अंग से उच्चारण-स्थान को स्पर्श किया जाता है, उसे करण कहते हैं।

स्थान और करण के उदाहरण:

  • तालु – स्थानम्, जिह्वा-मध्यः – करणम्
  • मूर्धा – स्थानम्, जिह्वा-उपान्तः – करणम्
  • दन्तः – स्थानम्, जिह्वा-अग्रः – करणम्
  • ओष्ठः – स्थानम्, ओष्ठः – करणम्

परिभाषा

  • स्वरः – “स्वयं राजन्ते इति स्वराः” – जो अपने बल से उच्चारित होते हैं।
  • व्यञ्जनम् – “अनवग्रहवत्त्वात् व्यञ्जनम्” – जो स्वर के साथ मिलकर बोले जाते हैं।

सारांश

इस अध्याय में यह स्पष्ट हुआ कि –

  • ध्वनि उत्पादन के लिए शरीर के छह अंग विशेष रूप से कार्य करते हैं।
  • उच्चारण के लिए तीन बातें आवश्यक हैं – स्थानम्, करणम्, आभ्यन्तर-प्रयत्नः।
  • मुख और नासिका के भीतर छह स्थानों और उनके करणों से ही सभी वर्ण उच्चरित होते हैं।
  • स्वर और व्यंजन की परिभाषाएँ तथा उनके भेद समझाए गए हैं।

12. सम्यवर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोकेऽपि महीयते – Chapter Notes

परिचय

यह पाठ हमें सही उच्चारण और सम्यक् वर्ण प्रयोग के महत्व को बताता है। जब हम वेदों, शास्त्रों या सामान्य भाषा का भी सही उच्चारण करते हैं, तो उसका वास्तविक अर्थ स्पष्ट होता है और श्रोता तक सही संदेश पहुँचता है। गलत उच्चारण से अर्थ बदल सकता है और अपूर्णता आ सकती है। इसीलिए वर्ण प्रयोग में शुद्धता आवश्यक है। पाठ में उत्तम पाठक के गुण और अधम पाठक के दोष भी बताए गए हैं। अंत में यह संदेश दिया गया है कि सम्यक् वर्ण प्रयोग करने वाला मनुष्य ब्रह्मलोक में भी मान-सम्मान प्राप्त करता है।

श्लोक एवं भावार्थ

(१) यद्यहप बिु नारीषे तथाहप पठ पुत्र वयाकरणम्।
सवजनः श्वजनो मा भूः सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥

  • पदच्छेदः यदि अपि बहु न अधीषे, तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
    सजनः श्वजनः मा भूः। सकलं शकलं, सकृत् शकृत्।
  • अन्वयः हे पुत्र! यदि तुम बहुत अधिक अध्ययन न करो तो भी व्याकरण का अवश्य अध्ययन करो। क्योंकि व्याकरण न जानने पर ‘सजनः’ (सज्जन) का अर्थ ‘श्वजनः’ (कुत्ता) हो जाता है। इसी प्रकार ‘सकलम्’ (पूरा) का अर्थ ‘शकलम्’ (टुकड़ा), ‘सकृत्’ (एक बार) का अर्थ ‘शकृत्’ (मल) हो जाता है।
  • भावार्थ: यहाँ स्पष्ट किया गया है कि व्याकरण का ज्ञान न होने पर शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। इसीलिए शुद्ध उच्चारण और व्याकरण का अभ्यास करना आवश्यक है, जिससे अर्थ का अपभ्रंश न हो।

(२) व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभयायं न च पीडयेत्।
भीता पतनभेदाभयायं तद्वद्वर्णान् प्रयोजयेत्॥

  • पदच्छेदः व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभयायं न च पीडयेत्।
    भीता पतनभेदाभयायं तद्वत् वर्णान् प्रयोजयेत्।
  • अन्वयः जैसे व्याघ्री अपने बच्चों को दाँतों से पकड़ती है, पर उन्हें पीड़ा नहीं देती, वैसे ही उच्चारण करते समय वर्णों का प्रयोग करना चाहिए।
  • भावार्थ: उच्चारण ऐसा हो कि स्पष्ट सुनाई दे, पर कठोरता न हो। अधिक बलपूर्वक उच्चारण करने से श्रोता को कष्ट हो सकता है। इसलिए मधुरता और कोमलता बनाए रखना चाहिए।

(३) एवमवर्णाः प्रयोज्याः नाव्यक्ता न च पीडिताः।
सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते॥

  • पदच्छेदः एवं वर्णाः प्रयोज्याः। न अव्यक्ताः, न च पीडिताः।
    सम्यग् वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते।
  • अन्वयः इस प्रकार वर्णों का प्रयोग करना चाहिए। वे अस्पष्ट भी न हों और पीड़ादायक भी न हों। सही वर्ण प्रयोग करने वाला व्यक्ति ब्रह्मलोक में सम्मान पाता है।
  • भावार्थ: उच्चारण में स्पष्टता और मधुरता आवश्यक है। न तो शब्द अस्पष्ट हों और न ही कठोर। शुद्ध उच्चारण करने वाला व्यक्ति लोक और परलोक दोनों में सम्मानित होता है।

(४) मार्दवं अक्षरव्यक्तं पदच्छेदः सुस्वरः।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठकगुणाः॥

  • पदच्छेदः मार्दवम्, अक्षरव्यक्तम्, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम्, लयसमर्थम्।
    एते षट् पाठकगुणाः।
  • अन्वयः मधुरता, स्पष्ट अक्षर उच्चारण, पदों का उचित छेदन, सुन्दर स्वर, धैर्य और लय की समर्थता – ये छह उत्तम पाठक के गुण हैं।
  • भावार्थ: एक अच्छे पाठक के लिए यह आवश्यक है कि उसका स्वर मधुर हो, अक्षरों का उच्चारण स्पष्ट हो, वाक्यों को सही ढंग से विभाजित करे, आत्मविश्वास से बोले और लय का पालन करे।

(५) गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा ललितपाठकः।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥

  • पदच्छेदः गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, ललितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठः।
    एते षट् पाठकाधमाः।
  • अन्वयः जो गाने की तरह पढ़े, बहुत शीघ्रता से पढ़े, सिर हिलाकर पढ़े, गाकर पढ़े, अर्थ न समझकर पढ़े और मंद स्वर से पढ़े – ये छह अधम पाठक कहलाते हैं।
  • भावार्थ: खराब पाठक वे हैं जो केवल शब्द बोलते हैं पर अर्थ नहीं समझते, जल्दी-जल्दी पढ़ते हैं, गाकर पढ़ते हैं, या अस्पष्ट वाणी से पढ़ते हैं। ऐसे पठन से श्रोता को कोई लाभ नहीं होता।

वेदाङ्गाः

पाठ में आगे वेदाङ्गों का उल्लेख है –

  • शिक्षा – स्वर एवं वर्णों के उच्चारण का विज्ञान।
  • कल्प – यज्ञविधि का वर्णन।
  • व्याकरण – भाषा के शुद्ध प्रयोग का शास्त्र।
  • निरुक्त – शब्दों की व्युत्पत्ति।
  • छन्दः – कविता और छन्दों का शास्त्र।
  • ज्योतिषम् – ग्रह-नक्षत्रों का शास्त्र।

निष्कर्ष

इस अध्याय से शिक्षा मिलती है कि –

  • शुद्ध उच्चारण और सम्यक् वर्ण प्रयोग का अत्यधिक महत्व है।
  • व्याकरण और शिक्षा के बिना शब्दों का अर्थ बदल सकता है।
  • उत्तम पाठक के छह गुण और अधम पाठक के छह दोष हमें सीखने चाहिए।
  • सही वर्ण प्रयोग करने वाला व्यक्ति इस लोक और परलोक दोनों में सम्मान प्राप्त करता है।

11. सत्रमिते वरं त्याग: (ख-भाग:) – Chapter Notes

परिचय

यह नाटक त्याग और बलिदान की महत्ता को दर्शाता है। इसमें वीरवर नामक राजपुरुष का चरित्र है जो राजा शूद्रक की सेवा करता है। वह अपने धन का एक अंश परिवार पर, एक अंश दान में और शेष अंश पत्नी को देता है। जब एक दिन वह एक करुणार्द्र रानी को देखता है, तब उसके त्याग और निष्ठा की परीक्षा होती है। वीरवर यह दिखाता है कि जब किसी उच्च उद्देश्य के लिए त्याग की आवश्यकता हो, तब अपने जीवन और सम्पत्ति का त्याग करना श्रेष्ठ होता है।पाठ का गद्यांश

(१) प्रारम्भ

  • वीरवर राजा शूद्रक का सेवक था।
  • उसे वेतन में सौ स्वर्णमुद्राएँ मिलती थीं।
  • आधा परिवार पर, चौथाई दान में और शेष पत्नी को देता था।
  • राजद्वार पर वह तलवार लेकर सेवा करता था।

(२) रात्रिकाल की घटना

  • एक दिन उसने आभूषणों से अलंकृत रानी को रोते देखा।
  • रानी ने कहा कि राजा शूद्रक का आयुष्य केवल एक दिन शेष है।
  • उसे बचाने के लिए असाधारण उपाय आवश्यक था।

(३) वीरवर का त्याग

  • वीरवर ने अपना समस्त स्वर्ण, वस्त्र, द्रव्य आदि रानी को उपहारस्वरूप दे दिए।
  • रानी अदृश्य होकर चली गयी।
  • यह सब राजा शूद्रक ने गुप्त रूप से देखा और संवाद सुना।

(४) संवाद

  • राजा ने कहा – “धन और जीवन परार्थे त्याग करना चाहिए।”
  • रानी ने प्रसन्न होकर राजा का जीवन सुरक्षित कर दिया।
  • राजा ने घोषणा की कि ऐसा त्यागी इस संसार में दुर्लभ है।

 (५) परिणाम

  • देवी के आशीर्वाद से राजा की मृत्यु टल गयी।
  • वीरवर अपने परिवार सहित स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
  • पुनः राजा शूद्रक के महल में अदृश्य रूप से रहने लगा।

श्लोक

(१) धनान्यजीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥

  • पदच्छेदः धनानि + जीवितम् + च + एव + परार्थे + प्राज्ञः + उत्सृजेत्। सन्निमित्ते वरम् त्यागः विनाशे नियते सति।
  • अन्वयः प्राज्ञः धनानि जीवितम् च परार्थे उत्सृजेत्। नियते विनाशे सति सन्निमित्ते त्यागः वरम्।
  • भावार्थः बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि धन और जीवन को परोपकार हेतु त्याग दे। क्योंकि विनाश तो निश्चित है, अतः श्रेष्ठ कारण के लिए त्याग ही सर्वोत्तम है।

(२) जात्ये कृत्ये च मादृशाः क्षुद्रजातयः।
अनेन दृष्टो लोके न भूतो न भविष्यति ॥

  • पदच्छेदः जात्ये + कृत्ये + च + मादृशाः + क्षुद्रजातयः। अनेन + दृष्टः + लोके + न + भूतः + न + भविष्यति।
  • अन्वयः जात्ये कृत्ये च मादृशाः क्षुद्रजातयः। अनेन सदृशः लोके न भूतः न भविष्यति।
  • भावार्थः मेरे समान अल्प लोग जन्म लेकर शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ऐसा त्यागी न तो पहले हुआ है, न भविष्य में होगा।

शब्दार्थ (हिन्दी सहित)

  • आवासम् = गृह (घर)
  • चन्द्रालसाम् = नींद से अलसाई हुई
  • दुहित्रम् = पुत्री
  • अवर्ण्यत् = वर्णन किया
  • सान्दम् = प्रसन्नता सहित
  • स्वल्पयोगः = थोड़े उपयोग वाला
  • परमश्लाघ्यः = अति प्रशंसनीय
  • त्यागः = त्यागना
  • गृहीतस्वाश्मवृत्तिनस्य = ऋणदाता का ऋण चुकानेवाला
  • आयतनम् = प्रांगण
  • राज्यभङ्गः = राज्य का नाश
  • वात्सल्येन = स्नेहपूर्वक

व्याकरण

वाच्य

  • कर्तरिवाच्य
  • कर्मणिवाच्य
  • भाववाच्य

उदाहरण

  • कर्तरिवाच्य – बालकः ग्रामं गच्छति।
  • कर्मणिवाच्य – बालकेन ग्रामः गम्यते।
  • भाववाच्य – बालकेन हस्यते।

निष्कर्ष

इस अध्याय से शिक्षा मिलती है कि जब किसी महान उद्देश्य के लिए त्याग करना पड़े तो अपने धन और जीवन का बलिदान करना ही श्रेष्ठ है। वीरवर ने इस आदर्श को अपने आचरण से सिद्ध किया।

10. सत्रमिते वरं त्याग: (क-भाग:) – Chapter Notes

परिचय

यह पाठ हितोपदेश नामक प्रसिद्ध नीति-ग्रंथ से लिया गया है। इसमें वीरवर नामक राजपुत्र की कथा वर्णित है। वीरवर ने शत्रु-राजा शूद्र की सेवा स्वीकार की, परंतु उसका जीवन त्याग, परोपकार और राष्ट्रभक्ति का आदर्श बना। इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना सर्वस्व त्यागना ही सच्चा धर्म है।

पाठ का सार

नगर और राजा

आसीत् शोभावती नाम नगरी। 
तत्र शूद्रः नाम महापराक्रमी राजा वसति स्म।

एक नगर था जिसका नाम शोभावती था। वहाँ शूद्र नामक बलशाली और पराक्रमी राजा रहता था।

वीरवर का आगमन

अथैदा वीरवरनाम राजपुत्रः वकृत्यर्थं राजद्वारमुपागच्छत्। 
सः स्वपत्नी वेदरता, सुतः शक्तधरः, कन्या वीरवती च सह आगतः।

उसी समय वीरवर नामक राजपुत्र अपनी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तधर और पुत्री वीरवती के साथ आजीविका के लिए राजद्वार पर आया।

राजा से भेंट

वीरवरः – भोः प्रतिहार! वकृत्यर्थमागतोऽस्मि, आनय माम्।

वीरवर ने द्वारपाल से कहा – “मैं सेवा हेतु आया हूँ, मुझे राजा के पास ले चलो।”

राजा – किं ते वर्तनम्? वीरवरः – प्रतिदिनं चतुश्शतं सुवर्णमुद्राः।

राजा ने पूछा – “तुम्हें कितना वेतन चाहिए?” वीरवर ने कहा – “प्रतिदिन चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ।”

राजा – नैतत् शक्यम्!

राजा बोला – “यह संभव नहीं।”

मन्त्री की सलाह और नियुक्ति

मन्त्री – देव! प्रथमं परीक्ष्यतामस्य स्वरूपम्, ततः एव वेतनं दातव्यम्।

मन्त्री ने कहा – “हे महाराज! पहले इसके आचरण और योग्यता की परीक्षा होनी चाहिए, फिर वेतन दिया जाए।”

ततः ताम्बूलदानादिना राजा तं नियुक्तवान्। 
वीरवरः प्रतिदिनं वेतनं लब्ध्वा देवभ्यः अर्धं यच्छति स्म, शेषं दरिद्रभ्यः ददाति, पत्न्याः भोजनविलासे व्ययति च।

फिर राजा ने उसे नियुक्त कर लिया। 
वीरवर वेतन पाकर उसका एक भाग देवताओं को अर्पित करता, कुछ दरिद्रों को देता और शेष घर पर भोजन में लगाता।

मध्यरात्रि का रोदन

कृष्णचतुर्दश्यामधिरात्रे राजा श्रुतवान् रुणरोदनध्वनिम्।

एक दिन कृष्णचतुर्दशी की रात राजा ने रोने की ध्वनि सुनी।

राजा – कः अत्र? वीरवरः – सेवकः वीरवरः। 
राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!

राजा ने पूछा – “कौन है वहाँ?” वीरवर ने उत्तर दिया – “मैं सेवक वीरवर हूँ।” 
राजा ने कहा – “जाकर इस रोदन का कारण पता करो।”

राजलक्ष्मी का वचन

वीरवरः – का त्वम्? राजलक्ष्मीः – अहं अस्य शूद्रराजस्य राजलक्ष्मीः। 
तृतीये दिने अपराधे राजा मरणं प्राप्स्यति, तदा अहं न स्थास्यामि।

वीरवर ने रो रही सुन्दरी से पूछा – “आप कौन हैं?” उसने उत्तर दिया – “मैं इस शूद्रराजा की राजलक्ष्मी हूँ। 
तीसरे अपराध पर यह राजा मर जाएगा और तब मैं यहाँ से चली जाऊँगी।”

वीरवरः – अस्त्यत्र कश्चिदुपायः?

वीरवर ने पूछा – “क्या कोई उपाय है जिससे आप स्थिर रह सकें और स्वामी जीवित रह सके?”

राजलक्ष्मीः – यदि त्वं स्वस्य सर्वस्वं त्यक्त्वा सदा प्रसन्नमुखेन सर्वमङ्गलायै उपहारं करिष्यसि, तदा शूद्रराजः शतवर्षं जीवेत।

राजलक्ष्मी ने कहा – “यदि तुम अपना सर्वस्व त्याग कर प्रसन्न मुख से सर्वमंगल देवी को अर्पित करोगे तो शूद्रराजा सौ वर्ष तक जीवित रहेगा।”

शब्दार्थ

  • महापराक्रमी – अत्यन्त बलशाली
  • नानाशास्त्रवित् – अनेकों शास्त्रों का ज्ञाता
  • प्रतिहारः – द्वारपाल
  • वर्तनम् – वेतन
  • उपपन्नम् – उपयुक्त, उचित
  • धृतायतुधः – शस्त्रधारी
  • रुणरोदनध्वनिः – रोने की ध्वनि
  • अनाथा – बिना रक्षक
  • दुष्साध्या – कठिनाई से सम्भव

व्याकरण बिन्दु

  • वाक्यान्वयः – संस्कृत साहित्य में पदक्रम विशेष प्रकार से बदला जाता है, जैसे –
    • सामान्य क्रमः – रामः वनं गच्छति।
    • साहित्य क्रमः – वनं गच्छति रामः।
  • भूतकाल प्रयोगः – उपागच्छत, अनयत, श्रुतवान् इत्यादि।

9. को डस्कू ? को डस्कू ? को डस्कू ? – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय आयुर्वेद और स्वास्थ्य-नियमों पर आधारित है। इसमें वाग्भट नामक वैद्य और भगवान् धन्वन्तरि की कथा दी गई है। भगवान् धन्वन्तरि ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ कहते हुए प्रकट होते हैं और उसके रहस्य को समझाया जाता है। इसमें बताया गया है कि मनुष्य को स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए किस प्रकार का भोजन करना चाहिए — हितभुक् (स्वास्थ्यकर भोजन करने वाला), मितभुक् (मर्यादा में भोजन करने वाला) और ऋतुभुक् (ऋतु के अनुसार भोजन करने वाला)। साथ ही, इसमें आहार के प्रकार, ऋतु-नियम, और सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहार की व्याख्या दी गई है। अंत में श्लोकों और व्यावहारिक उपदेशों द्वारा स्वास्थ्य-संबंधी संदेश दिए गए हैं।

पाठांशप्रारम्भिक संवाद

“अम्ब ! महती बभुकु्धा बाधते, शीघ्रं भोजनं परिवेषयतु। 
… उष्णं भोजनं सहस्रं न भवति” इति आयुर्वेद उपदेशः।

 अर्थ: बालक अपनी माता से कहता है कि उसे बहुत भूख लगी है और शीघ्र भोजन परोसा जाए। माता बताती है कि अधिक गर्म भोजन खाने से मुख में जलन होती है। इसलिए आयुर्वेद कहता है कि अत्यधिक गर्म भोजन कभी लाभकारी नहीं होता।

भगवान् धन्वन्तरिः का आगमन

“भाषितवः वैदाः सर्वसन्तानानां व्याधीनां शमनं कुर्युः” इति ज्ञातुं भगवान् धन्वन्तरिः भ्रमणं कुर्वन् ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ इति शब्दं उच्चैः श्रावयन्”।

अर्थ : भगवान धन्वन्तरि मनुष्य-रूप धारण कर घूमते हुए बार-बार पूछते थे — “कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?” (कौन अरोग्य है? कौन स्वस्थ है?)।

वाग्भट और धन्वन्तरिः का संवाद

“वाग्भटः मनोहारीं तरुमूलां शुकं दृष्ट्वा चिन्तितवान् — एषः न साधारणः पक्षी, अवश्यं देवविशेषः”।
शुकः पुनः उच्चैः शब्दं करोति — “कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?”।
ततः धन्वन्तरिः त्रयमुत्तरं दत्तवान् — 
हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्।

अर्थ : वाग्भट वैद्य ने देखा कि यह पक्षी साधारण नहीं है। भगवान् धन्वन्तरि ने उत्तर दिया — वही मनुष्य अरोग्य है जो हितकर भोजन करता है, मर्यादित मात्रा में भोजन करता है, और ऋतु के अनुसार भोजन करता है।

श्लोक एवं व्याख्या

(१) “तच्च हितं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुतिष्ठते।
अजतानां च सर्वेषां अनुत्पत्तिकरं च यत्॥”

अर्थ :वही भोजन उचित है जिससे स्वास्थ्य ठीक रहे और जो नए रोग उत्पन्न न करे।

() “अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चासमेवने।
गुरुलाघवे द्रव्याणाम् मात्रायाः अनुसारितम्॥”

अर्थ : भारी (कठिन पचने वाले) पदार्थ अल्प मात्रा में और हल्के पदार्थ उचित मात्रा में ही लेने चाहिए।

(३) “तस्मात् हितं यदन्नं स्यात् बलवर्णकरं तथा।
ऋतुनां चानुसार्यं तदन्नं साधु भोजनम्॥”

अर्थ: जो आहार ऋतु के अनुकूल हो, वह बल, वर्ण और आयु बढ़ाता है।

(४) “व्यायामः प्रातरुत्थाय स्नानं शुद्धोदकेन च।
बुभुक्षायां च भोजनं हितं चान्नं प्रयोक्तव्यम्॥”

अर्थ: प्रातः उठकर व्यायाम करना चाहिए, शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए और जब भूख लगे तभी हितकर भोजन करना चाहिए।

(५) “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥”

अर्थ  सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब शुभ देखें और कोई भी दुःख न पाए।

आहार के प्रकार (गीता के आधार पर)

  • सात्त्विक आहार : आयुष्यमान, बलवर्धक, सुखद, रोगनाशक, रसयुक्त, मधुर, स्निग्ध।
  • राजसिक आहार : अत्यधिक तिक्त, अम्ल, लवण, उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष, विदाहकारक; रोग उत्पन्न करने वाले।
  • तामसिक आहार : बासी, दुर्गंधयुक्त, अतिपक्व, पुनः गरम किया हुआ, अस्वच्छ — यह आलस्य, निद्रा और रोग बढ़ाता है।

व्याकरणिक अंश

  • विशेषण – विशेष्य सम्बन्ध उदाहरण सहित।
  • शब्दरूप अभ्यास (उत्तम, मनोहरि, सर्वस्मत, उत्कृष्ट, एक)।

8. पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम् – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक महत्व का परिचय कराता है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम – इन आठ राज्यों को मिलाकर “अष्टभगिनी राज्य” कहा जाता है। इन राज्यों की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, जनजातियाँ, वंशवृक्ष (बाँस), त्यौहार और जीवनशैली पूरे भारत को समृद्ध बनाते हैं। यह पाठ विद्यार्थियों को भारत के कोने-कोने के सौंदर्य और एकता में विविधता की झलक दिखाता है।पाठ्यांश और भावार्थ१. प्रारम्भिक परिचय

अरुणाचलप्रदशेः, असमः, मणिपुरं, मेघालयः, मिजोरमः, नागालैण्डं, त्रिपुरा एवञ्च सिक्किमः इत्येतानि अष्टराज्यानि देशस्य पूर्वोत्तरभागे स्थितानि। 
एतानि राज्यानि भारतस्य केवलं स्थानविशेषत्वेन न, अपितु सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-विविधतायाः कारणेन विशेषमहत्त्वं वहन्ति।

अर्थ: अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम – ये आठ राज्य भारत के पूर्वोत्तर भाग में स्थित हैं। ये केवल स्थान की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विविधता के कारण भी विशेष महत्त्व रखते हैं।२. सप्तभगिनी एवं एक भ्रातासंस्कृत श्लोक

अद्वं मतं चैव नगपत्मुकं तथाद्वं।
सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मतम्॥
तेनुक्तो लघवः भ्रातया सशक्तमाः इति प्रसिद्धाः।
पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्॥

अर्थ: असम, अरुणाचल, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, नागालैंड और त्रिपुरा – इन सात राज्यों को “सप्तभगिनी” कहा जाता है और सिक्किम को ‘एक भ्राता’ कहा जाता है। इसलिए ये “सप्तभगिनी एक भ्राता” नाम से प्रसिद्ध हैं।

३. ऐतिहासिक स्थिति

भारत सह इमाः सप्तभगिन्यः प्राचीनइतिहासे प्रायः स्वाधीनाः एव दृष्टाः। 
न केनचित् शासकेन इमाः सर्वायत्तीकृताः।

अर्थ: भारत के इतिहास में ये सात भगिनी राज्य प्रायः स्वतंत्र ही देखे गए। इन्हें किसी भी शासक ने अपने अधीन नहीं किया।

४. सांस्कृतिक विशेषताएँ

पर्वत-कृषि-पशुप-प्रकृतिभ्यः प्राकृतिकसम्पद्भ्यः समृद्धानि सन्ति। 
गारो-खासी-नागा-लेपचा-प्रभृतयः जनजातयः अत्र निवसन्ति। 
विविधभाषाभिः समन्विताः, व्यापारपरम्पराभिः समृद्धाः, कलासु निपुणाः च सन्ति।

अर्थ: यह क्षेत्र प्राकृतिक सम्पदाओं से समृद्ध है। यहाँ गारो, खासी, नागा, लेपचा आदि अनेक जनजातियाँ रहती हैं। ये लोग अनेक भाषाओं में बोलते हैं, व्यापार और त्योहारों की परम्पराओं से सम्पन्न हैं और विभिन्न कलाओं में निपुण हैं।

५. बाँस का महत्त्व

प्रदेशेषु हस्तशिल्पानां बाहुल्यं विद्यते। 
आवासाभरणेभ्यः गृहनिर्माणपर्यन्तं वंशवृक्षिणां (बाँस) उपयोगः क्रियते।

अर्थ: यहाँ हस्तशिल्प की बहुत अधिकता है। घर बनाने से लेकर आभूषणों तक में बाँस का उपयोग होता है। बाँस यहाँ के लोगों के जीवन का अभिन्न अंग है।

६. राज्यों का संक्षिप्त परिचय

  • अरुणाचल प्रदेश – यहाँ भारत का प्रथम सूर्योदय होता है, इसलिए नाम पड़ा “अरुणाचल”।
  • असम – प्राचीन नाम “कामरूप”। यहाँ तेल, प्राकृतिक गैस, और प्रसिद्ध माजुली नदीद्वीप है।
  • मेघालय – गारो, खासी और जयन्तिया पहाड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। यहाँ कोयला, चूना-पत्थर आदि खनिज मिलते हैं।
  • मणिपुर – महाभारत और पुराणों में इसका उल्लेख है। यहाँ लोकटक झील पर तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है।
  • मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, सिक्किम – प्रत्येक राज्य की अपनी भाषा, संस्कृति और त्योहार हैं, जो इन्हें विशेष बनाते हैं।

7. मञ्जुलमञ्जुषा सुन्दरसुरभाषा – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय संस्कृत भाषा की महिमा का परिचय कराता है। संस्कृत को देववाणी, सभ्य भाषाओं की जननी, साहित्य का आधार तथा ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका कहा गया है। इसमें श्लोकों के माध्यम से बताया गया है कि संस्कृत न केवल सौंदर्य और माधुर्य से परिपूर्ण है, बल्कि यह मानव-जीवन, साहित्य, विज्ञान और दर्शन को भी आलोकित करती है।

श्लोक १

मूल श्लोकः
मुनिवरनवकनितकनववरनवलनित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा ।
अनिमातसत्त्व पोषणक्षमता
मम वच्यातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥१॥

  • पदच्छेदः – मुनिवर-नवकनित-नववर-नवलनित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे माते! तव पोषणक्षमता मम वच्यातीता, सुन्दरसुरभाषा (असि)।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत भाषा अत्यन्त सुन्दर है।
    • यह देवभाषा कहलाती है।
    • मुनियों ने इसके द्वारा गवेषणाएँ कीं और ग्रन्थों की रचना की।
    • संस्कृत अन्य भाषाओं की जननी है।
    • इसके शब्द कोमल और सम्पूर्ण हैं।
    • संस्कृत अन्य भाषाओं का पोषण करती है।

श्लोक २

मूल श्लोकः
वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः कृतानि
कालिदास-बाणकविभिः रचितानि ।
पौराणिक-सामान्य-जीविनाम् आशा
सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥

  • पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः कालिदास-बाणकविभिः पौराणिक-सामान्य-जीविनाम् आशा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! तव आश्रयेण वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः रचितानि, कालिदास-बाणकविभिः रचितानि, पौराणिक-सामान्यजीविनाम् आशा असि।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत रमणीय भाषा है।
    • वेदव्यास ने महाभारत, वाल्मीकि ने रामायण रची।
    • कालिदास, बाणभट्ट आदि कवियों ने साहित्य की अमूल्य धरोहर दी।
    • प्राचीन काल से आज तक संस्कृत सामान्य जन के जीवन में आशा का संचार करती रही है।

श्लोक ३

मूल श्लोकः
श्रुतिसुखनिर्दे कलप्रमोदे
समस्मृतिवर्द्धे सरसविनोदे ।
गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे
तव संस्कृतिः एषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥

  • पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिदे कलप्रमोदे स्मृतिवर्द्धे सरसविनोदे गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! श्रुतिसुखनिदे! कलप्रमोदे! स्मृतिवर्द्धे! सरसविनोदे! गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे! तव एषा संस्कृतिः अस्ति।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत सुनने में मधुर और आनन्दप्रद है।
    • यह कला और संस्कृति का विकास करती है।
    • स्मृति और विवेक को बढ़ाती है।
    • सरस विनोद का अनुभव कराती है।
    • यह साहित्य और काव्य की प्रेरणा है।
    • यह मानव-जीवन में उत्तम मार्गदर्शन देती है।

श्लोक ४

मूल श्लोकः
रस-रुचिरालङ्कृत-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा ।
वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः
विज्ञैः धरा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥

  • पदच्छेदः – रस-रुचिरा अलङ्कृत-धारा वेदविषय-वेदान्तविचारा वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः विज्ञैः धरा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! रस-रुचिरा अलङ्कृत-धारा, वेदविषय-वेदान्तविचारा, वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः धरा (असि)।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत में शृंगार, हास्य, रौद्र, वीर आदि सभी रस विद्यमान हैं।
    • शब्दों की अलंकारयुक्त धारा इसे और समृद्ध बनाती है।
    • वेद, उपनिषद्, वेदान्त और पुराणों के विचार इसमें समाहित हैं।
    • आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, खगोल आदि शास्त्र संस्कृत में रचे गए।
    • इस प्रकार संस्कृत सर्वत्र प्रतिष्ठित है।

शब्दार्थ (संग्रह से)

  • मञ्जुल = मोहक
  • मञ्जूषा = पेटिका, संचित निधि
  • सुन्दरसुरभाषा = देवभाषा संस्कृत
  • पोषणक्षमता = पालन-पोषण करने की शक्ति
  • वच्यातीता = वाणी से परे
  • श्रुतिसुख = सुनने में आनन्ददायक
  • सरसविनोद = हृदय को आनन्द देने वाला
  • रस-रुचिर = रसों से युक्त
  • अलङ्कृतधारा = अलंकारों से सुसज्जित धारा

व्याकरण (समास का विवेचन)

  • मातुः भूमि = मातृभूमिः
  • सुराणां भाषा = सुरभाषा
  • पोषण + क्षमत्वम् = पोषणक्षमत्वम्
  • वच्यम् अतीतम् = वच्यातीतम्
  • विरसैः रुचिरा = विरसरुचिरा
  • वेद + विषय = वेदविषयः
  • खगोल + शास्त्रम् = खगोलशास्त्रम्

6. डिजिभारतम् – युगपरिवर्तनम् – Chapter Notes

परिचय

आज का युग सूचना-प्रौद्योगिकी का युग है। भारत ने ‘डिजिटल भारत अभियान’ द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अनेक प्रगति की है। शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों में डिजिटल साधनों का प्रयोग हो रहा है। इस अध्याय में विद्यार्थियों के माध्यम से डिजिटल भारत की झलक, उसके लाभ तथा सावधानियों का वर्णन किया गया है। यह अध्याय हमें बताता है कि किस प्रकार डिजिटल क्रांति ने जीवन को सरल और सुलभ बना दिया है।

पाठ्यांशसंग्रहालय-दर्शनम्

अस्माकं देशः भारतं न केवलं सांस्कृतिके क्षेत्रे समृद्धम्, अपि तु नूतनैः आविष्कारैः कीर्तिं लभते। अद्य सम्पूर्णश्रियं ‘डिजिटल-भारतम्’ इत्यस्य चिह्नेन ज्ञायते।

भावार्थः हमारा देश भारत न केवल संस्कृति में महान है बल्कि आधुनिक आविष्कारों से भी प्रसिद्ध है। आज सम्पूर्ण विश्व भारत को ‘डिजिटल भारत’ के नाम से पहचान रहा है।

प्रधान–मन्त्री–संग्रहालये अनुभवः

सर्वे छात्राः – अद्भुतं महोदय! अत्र होलोग्राम-द्वारा प्रधानमन्त्रिणः भाषणं श्रूयते, दृश्यते च।

भावार्थः सभी छात्र आश्चर्य से कहते हैं कि यहाँ होलोग्राम के माध्यम से प्रधानमन्त्री का भाषण सुनाई और दिखाई दे रहा है।

नूतन-प्रौद्योगिक्याः परिचयः

अथर्वः – अत्र ‘वर्धिता-वास्‍तवता’ (AR), ‘आभासीया-वास्‍तवता’ (VR) च उपकरणानि अपि सन्ति।

भावार्थः यहाँ ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) और वर्चुअल रियलिटी (VR) जैसी तकनीकों के उपकरण भी हैं। इनके माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

दैनन्दिन-जीवने डिजिटलस्य प्रभावः

अध्यापकः – अस्माकं दैनन्दिनं जीवनं ‘डिजिटल’ इत्यनेन परिवर्तितं भवति।

भावार्थः अध्यापक कहते हैं कि हमारा दैनिक जीवन डिजिटल साधनों से प्रभावित और परिवर्तित हो गया है।

विविध-क्षेत्रेषु प्रयोगः

  • शासनम् : डिजिटल-लॉकर, ई-गवर्नेंस मंच (UMANG, My-Gov, GeM), Cowin इत्यादि।
  • स्वास्थ्यसेवा : ई-संजीवनी, आरोग्य-सेतु, Cowin इत्यादयः।
  • शिक्षा : दीक्षा, स्वयं, स्वयं-प्रभा, ई-पाठशाला, पीएम ई-विद्या।
  • कृषि : ई-नाम, पीएम किसान योजना।
  • वित्तीय समावेशनम् : UPI, रूपे कार्ड, ई-रूपी, जनधन योजना।

भावार्थ: इन सबके माध्यम से शासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और वित्तीय क्षेत्र में नई क्रांति आई है।

वाणिज्ये प्रभावः

अध्यापकः – आभासी-पटलानां साहाय्येन आभासी-विक्रयः भवति। QR Code आधारेण विनिमयः च भवति।

भावार्थः व्यापार में अब ऑनलाइन क्रय-विक्रय होता है। क्यूआर कोड के माध्यम से भुगतान आसानी से किया जाता है।

सावधानता – साइबर सुरक्षा

अध्यापकः – अस्माभिः ‘साइबर-सुरक्षा’ विषये अपि चिन्तनीयम्।

भावार्थः हमें साइबर सुरक्षा के विषय में भी सावधान रहना चाहिए क्योंकि अनेक प्रकार के अपराध बढ़ते जा रहे हैं।

श्लोक
सर्वं शक्यं भवति शिशु-जालभारतेऽधुना।
जीर्णश्च सौकर्यं सहजं लभते जनः॥

भावार्थः आज डिजिटल भारत में सब कुछ सम्भव हो गया है। पुरानी कठिनाइयाँ अब आसानी से हल हो जाती हैं और सुविधा सबको उपलब्ध है।

व्याकरण-भागःक्त-प्रत्ययः

  • भूतकाल अथवा कर्मणि प्रयोगे प्रयुज्यते।
  • उदाहरणम् :
    • रामः पाठं अपठत् → बालकेन पाठः पठितः।

त्र-प्रत्ययः

  • वर्तमानकाले कार्यं कुर्वाणं दर्शयति।
  • केवलं परस्मैपद-धातुभिः सह प्रयोगः।
  • उदाहरणम् :
    • पठन्, गच्छन्, करण्।

5. गीता सुगीता कर्तव्या – Chapter Notes

परिचय

यह पाठ हमें श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व के बारे में बताता है। गीता का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अर्जुन को दिया था। इसमें जीवन जीने के सही मार्ग, धर्म, कर्तव्य और ज्ञान का महत्व समझाया गया है।

पाठ का प्रसंग

कुरुक्षेत्र में गीता जयंती का उत्सव मनाया जा रहा था। उसमें एक कथावाचक गीता का महत्व बता रहा था। तभी मिशेष नामक व्यक्ति ने अपने पिताजी से पूछा – “गीता क्या है और क्यों गाना चाहिए?”
तब पिता ने समझाया कि गीता भगवान कृष्ण का अमूल्य उपदेश है। इसे भक्ति और भाव से पढ़ना और गाना चाहिए।

श्लोक और भावार्थ

(१) गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥

भावार्थ: यह श्लोक हमें बताता है कि गीता सबसे श्रेष्ठ ग्रंथ है। इसे प्रेम और भक्ति के साथ पढ़ना और गाना चाहिए। अन्य शास्त्रों को पढ़ने से भी अधिक महत्व गीता का है, क्योंकि यह सीधे भगवान के मुख से निकला दिव्य उपदेश है।

(२) दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

भावार्थ: वह मनुष्य सच्चा ज्ञानी है जिसका मन दुःख में विचलित नहीं होता, जो सुख में आसक्त नहीं होता, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर स्थिर बुद्धि वाला रहता है।

(३) क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

भावार्थ: क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है, भ्रम से स्मृति जाती रहती है, स्मृति जाने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

(४) तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। 
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

भावार्थ: हे अर्जुन! गुरु के पास जाकर विनम्रतापूर्वक प्रश्न करो और सेवा करो। जो तत्वदर्शी ज्ञानी होते हैं, वे तुम्हें सही ज्ञान प्रदान करेंगे।

(५) श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

भावार्थ: श्रद्धा रखने वाला, इन्द्रियों को संयमित करने वाला और लगन से प्रयास करने वाला व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है। और ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को पा लेता है।

(६) अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

भावार्थ: जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रवत और करुणामय है, जो ‘मेरा-तेरा’ भाव से रहित और अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दुःख में समान भाव रखता है और क्षमाशील है – वही सच्चा भक्त है।

(७) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

भावार्थ: जो योगी सदैव संतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है, दृढ़ निश्चयी है, जिसने अपना मन और बुद्धि मुझमें अर्पित कर दी है, वह मेरा प्रिय भक्त है।

(८) यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥

भावार्थ: जिस मनुष्य से कोई भयभीत नहीं होता और जो स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध और भय से मुक्त रहता है – वही मेरा प्रिय भक्त है।

() अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

भावार्थ: जो वाणी बिना किसी को दुःख पहुँचाए सत्य, प्रिय और हितकारी होती है, वही वाणी तप कहलाती है। शास्त्रों का अध्ययन और अभ्यास करना भी वाणी का तप है।

निष्कर्ष

  • गीता का संदेश है कि जीवन में दुःख-सुख में समान रहना चाहिए।
  • क्रोध, भय और मोह से बचना चाहिए।
  • गुरु से सीखकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
  • भक्ति, संयम और संतोष से जीवन जीना चाहिए।
  • सत्य और मधुर वचन बोलना भी एक तप है।

4. प्रणम्य देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महानया: – Chapter Notes

परिचय

इस अध्याय में “उत्कलमणि गोपबन्धु दास” के जीवन, त्याग, समाजसेवा और देशभक्ति का वर्णन है। वे ओडिशा राज्य के महान समाजसेवक, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और लोकसेवक थे। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण जीवनशक्ति निर्धनों, बाढ़–पीड़ितों और देश की सेवा में अर्पित की। गोपबन्धु का जीवन हमें सिखाता है कि परोपकार और राष्ट्रसेवा ही सच्चा जीवन है।

(१) बाढ़ की पीड़ा और सहायता

  • ओडिशा राज्य के केन्द्रीय जनपद में महानदी में भयंकर बाढ़ आई।
  • बाढ़ से घर बह गये, अनेक लोग नदी की धारा में डूबकर मर गये।
  • लोग भूखे-प्यासे, बिना घर के दुःख भोगने लगे।
  • ऐसे समय उत्कलमणि गोपबन्धु ने अकुण्ठ सेवाभाव से पीड़ितों की सहायता की।
  • उनके कार्यों से जनता में आदर और सम्मान उत्पन्न हुआ।

(२) करुणा का भाव

  • आचार्य हरिहरदास ने एक दिन सभी अध्यापकों को भोजन हेतु आमन्त्रित किया।
  • सभी बैठे ही थे कि बाहर से एक भूखा बालक रोते हुए माँ से भोजन माँगने लगा।
  • यह देखकर गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गयीं।
  • उन्होंने तुरंत थाली उठाई और उस बालक को भोजन कराया।
  • इससे उनकी करुणा और संवेदनशीलता प्रकट होती है।

(३) जीवन परिचय एवं कार्य

  • वे साक्षीगोपाल (ओडिशा) के सुबर्णपुर ग्राम में जन्मे।
  • प्रारम्भ से ही निर्धन–सेवा और समाजसेवा में लगे रहे।
  • उन्होंने एक नि:शुल्क विद्यालय (सत्यवादी विद्यापीठ) की स्थापना की।
  • वे स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय रहे और कारावास भोगा।
  • जेल में रहते हुए उन्होंने “बन्दीर आत्मकथा”, “कारा–कविता”, “स्वप्न”, “गो–माहात्म्य”, “नचिकेता–उपाख्यान” आदि प्रेरणादायी पुस्तकें ओड़िया भाषा में लिखीं।
  • वे “समाज” नामक दैनिक समाचारपत्र के संस्थापक थे।
  • निर्धनों को अन्न, वस्त्र, आश्रय देने में वे सदैव तत्पर रहे।
  • उनका त्याग और देशप्रेम देखकर उन्हें “उत्कलमणि” (उड़ीसा का रत्न) की उपाधि दी गई।

४. गोपबन्धु के प्रेरणादायी शब्द

  • वे कहते हैं कि –
    • “देश के लिए मेरा शरीर मिट्टी में मिल जाए।”
    • “देश की आज़ादी के मार्ग में यदि मेरे शरीर की हड्डियाँ और मांस किसी काम आ जाएँ तो यह मेरे जीवन की सार्थकता होगी।”
  • उनका जीवन सम्पूर्ण देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

५. गोपबन्धु का सम्मान

  • “सत्यवादी विद्यालय”, “दरिद्रनारायण सेवा संघ”, “समाज” दैनिक पत्र आदि संस्थाओं की स्थापना की।
  • समाजसेवा और देशसेवा के कारण उन्हें “उत्कलमणि” की उपाधि से सम्मानित किया गया।

श्लोक एवं भावार्थ

श्लोक – १

भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्।
तदर्थं भोजनं कुर्याद् मा शरीरे व्ययं कुरु॥

भावार्थ: भोजन प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु जीवन को सुख देने वाला है। इसलिए जब भी भोजन मिले तो उसे ग्रहण करना चाहिए, शरीर को कष्ट देकर भोजन छोड़ना उचित नहीं है।

श्लोक – २

सर्वदेशभूमौ मम रीयायां लीनुः,
सर्वदेशलोकयात्रासिद्धये प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे तद् गह्वरमायतकया,
ममयास्थिमांसैः परिपूरणीयाः सदा॥

भावार्थ:  मेरे शरीर की अस्थियाँ सारे देश की भूमि में लीन हो जाएँ। देश के लोगों की यात्रा (देश की उन्नति) में सहायक हों। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढ़े पड़ें तो वे मेरे अस्थि-मांस से ही भरे जाएँ। यही मेरे जीवन का उद्देश्य है।

श्लोक – ३

उत्कलमतिरीत्याख्याः प्रतिपदं लोकसेवकाः।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥

भावार्थ: गोपबन्धु दास समाजसेवक और देशभक्त थे। उनके त्याग, सेवा और बलिदान के कारण जनता ने उन्हें “उत्कलमणि” की उपाधि दी। वास्तव में वे ओडिशा ही नहीं, पूरे देश के लिए पूज्य और प्रणम्य हैं।

​शब्दार्थ (चयनित)

  • जलप्लावपीडितानाम् – बाढ़ पीड़ितों का
  • नष्टान – नष्ट हुए
  • अनाहारेण – बिना भोजन के
  • अकुण्ठम् – निःसंकोच / उदार भाव से
  • समादृतः – सम्मानित
  • करुणिवचनः – करुणा से भरे वचन
  • अश्रुपूर्णः – आँसुओं से भरे नेत्र वाला
  • कारावासम् – जेलवास
  • देशसेवातत्परः – देशसेवा में तत्पर
  • उत्कलमणिः – ओडिशा की मणि (उपाधि)