4. साइड्केन – Chapter Notes

कहानी का परिचय

यह कहानी अरुणाचल प्रदेश के चौखाम गाँव की है। वल्लरी के पिताजी वहाँ काम करते हैं और उन्होंने अपने परिवार को भी बुला लिया है। दिल्ली की भीड़-भाड़ और शोरगुल से अलग, चौखाम का वातावरण शांत और हरा-भरा है। कहानी में वल्लरी अपनी दोस्त चाऊतान के घर जाती है। वहाँ से वे लोग गाँव में निकल रही एक शोभायात्रा देखते हैं, जिसमें भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ नए मंदिर में ले जाई जा रही हैं। यह मंदिर बाँस और फूलों से बहुत सुंदर सजाया गया है। गाँव के लोग इस समय साङकेन का त्योहार मना रहे हैं। यह उनका नया वर्ष होता है, जिसमें लोग एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, चावल का आटा लगाते हैं, गीत गाते हैं और नाचते हैं। वल्लरी को यह त्योहार होली जैसा लगता है। कहानी हमें बताती है कि अलग-अलग जगहों के त्योहार भले ही अलग हों, लेकिन उनका मकसद खुशी बाँटना और मिल-जुलकर रहना होता है।

मुख्य विषय

यह कहानी अरुणाचल प्रदेश के साङकेन त्योहार के बारे में है। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चौखाम में अपने दोस्त चाऊतान के घर जाती है और वहाँ उसे शोभायात्रा, मंदिर की सजावट, मूर्तियों की पूजा और लोगों का पानी व आटे से खेलना देखने को मिलता है। यह त्योहार उनके यहाँ नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, जैसे हमारे यहाँ होली। इसमें लोग खुश होकर गाते-नाचते हैं, एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं और मिलजुलकर आनंद मनाते हैं।

कहानी का सार

अरुणाचल प्रदेश में एक सुंदर जगह है जिसका नाम है चौखाम। यहाँ का मंडल कार्यालय है, जहाँ वल्लरी के पिताजी एक अधिकारी के रूप में काम करते हैं। इस बार उन्होंने अपने परिवार को दिल्ली से चौखाम बुला लिया। दिल्ली में तो हर तरफ भीड़भाड़, हॉर्न बजाती गाड़ियाँ और लोगों की लंबी-लंबी कतारें दिखती हैं। लेकिन चौखाम बिल्कुल अलग है। यहाँ चारों तरफ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, और शांति है। यहाँ के लोग हमेशा मुस्कुराते रहते हैं।

एक दिन वल्लरी का दोस्त चाऊतान उसे अपने घर बुलाने आया। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चाऊतान के घर गई। जब वे वहाँ पहुँचे, तो चाऊतान के पिताजी घर की सफाई कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने वल्लरी और उसके पिताजी को देखा, उन्होंने सफाई का काम छोड़ दिया और उनका स्वागत किया।

चाऊतान की माँ कई तरह के स्वादिष्ट पकवान ले आईं। वल्लरी और उसके पिताजी ने बड़े चाव से पकवान खाए। तभी वल्लरी ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर एक शोभायात्रा निकल रही थी। इसमें बहुत सारे लोग थे। कुछ लोग अपने कंधों पर पालकियाँ लिए हुए थे। इन पालकियों में बड़ी-बड़ी और सुंदर मूर्तियाँ रखी थीं। लोग नाचते-गाते, खुशी-खुशी आगे बढ़ रहे थे।

वल्लरी ने चाऊतान से पूछा, “ये लोग कहाँ जा रहे हैं? सब बहुत खुश दिख रहे हैं।”

चाऊतान ने बताया, “हमारे गाँव के लोगों ने कुछ दिन पहले नदी के किनारे एक मंदिर बनाया है। ये लोग बौद्ध-विहार से भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ लाए हैं। अब वे इन्हें मंदिर ले जा रहे हैं। ये मूर्तियाँ तीन दिन तक मंदिर में रहेंगी। गाँव के लोग हर दिन इन पर जल चढ़ाएँगे और इनकी पूजा करेंगे।”

वल्लरी के पिताजी ने पूछा, “क्या हम भी इस शोभायात्रा में शामिल हो सकते हैं?”

चाऊतान के पिताजी ने कहा, “हाँ, बिल्कुल! चलो, हम सब चलते हैं।”

सब लोग शोभायात्रा में शामिल हो गए। लोग गाते, बाजे बजाते, और नाचते-कूदते हुए चल रहे थे। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

थोड़ी देर बाद शोभायात्रा मंदिर के पास पहुँची। मंदिर बहुत सुंदर था। इसकी दीवारें बाँस और बाँस की खपच्चियों से बनी थीं। दीवारों में जगह-जगह हरी-हरी टहनियाँ लगाई गई थीं, और उन पर रंग-बिरंगे फूल सजाए गए थे। वल्लरी को ऐसा सादा और सुंदर मंदिर पहले कभी नहीं दिखा था।

भीड़ मंदिर के द्वार पर इकट्ठा हो गई। बौद्ध भिक्षुओं ने मंत्र पढ़ते हुए मूर्तियों को पालकियों से उतारा और मंदिर में रख दिया। फिर उन्होंने मूर्तियों की पूजा शुरू की और उन पर जल चढ़ाया।

वहाँ का माहौल बहुत खुशहाल था। वल्लरी ने देखा कि लोग एक-दूसरे पर बाल्टियों से पानी डाल रहे थे। कुछ लोग एक-दूसरे के चेहरों पर चावल का आटा भी लगा रहे थे। वल्लरी को अपने शहर की होली याद आ गई। उसने चाऊतान से कहा, “चाऊतान भाई, ये तो होली जैसा लग रहा है।”

चाऊतान ने जवाब दिया, “नहीं, ये होली नहीं है। आज हमारा साङकेन का त्योहार है। आज से हमारा नया साल शुरू होता है।”

वल्लरी ने बताया, “हमारे यहाँ भी होली से नया साल शुरू होता है। होली के दिन हम लोग एक-दूसरे पर रंगीन पानी और गुलाल डालते हैं। अगले दिन लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, मिठाइयाँ और नमकीन खाते हैं, और मेहमानों का स्वागत करते हैं।”

चाऊतान ने कहा, “आज शाम को हम भी अपने ताऊजी के घर जाएँगे। ताईजी ने कई तरह के पकवान बनाए होंगे। हम उन्हें प्रणाम करेंगे, और वे हमें आशीर्वाद देंगे। कल मेरी बुआजी और फूफाजी हमारे घर आएँगे।”

तभी किसी ने वल्लरी और उसके पिताजी पर एक बालटी पानी डाल दिया। वे पूरी तरह भीग गए। फिर लोग देर तक एक-दूसरे पर पानी डालते रहे और साङकेन का त्योहार मनाते रहे।

चाऊतान ने बताया, “तीन दिन तक साङकेन का त्योहार ऐसे ही मनाया जाता है। तीसरे दिन बौद्ध भिक्षु इन मूर्तियों को फिर से पालकियों में रखकर बौद्ध-विहार ले जाएँगे। वहाँ मंत्र पढ़कर मूर्तियों को उनके स्थान पर रखा जाएगा।”

चाऊतान के पिताजी ने कहा, “फिर गाँव के लोग बौद्ध-विहार जाएँगे और भिक्षुओं को बार-बार प्रणाम करेंगे। भिक्षु हमें आशीर्वाद देंगे –

कहानी की मुख्य बातें

  • वल्लरी के पिताजी अरुणाचल प्रदेश के चौखाम में अधिकारी हैं और उन्होंने दिल्ली से परिवार को बुला लिया।
  • चौखाम दिल्ली की भीड़ और शोर से अलग, बहुत शांत और हरा-भरा स्थान है।
  • वल्लरी अपने पिताजी के साथ दोस्त चाऊतान के घर गई।
  • चाऊतान के माता-पिता ने उनका स्वागत किया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए।
  • वल्लरी ने सड़क पर एक शोभायात्रा देखी जिसमें लोग मूर्तियाँ लेकर मंदिर जा रहे थे।
  • यह मूर्तियाँ बौद्ध-विहार से लाकर नए बने मंदिर में रखी जानी थीं और तीन दिन पूजा होनी थी।
  • सब लोग शोभायात्रा में शामिल होकर गाते, बजाते और नाचते हुए मंदिर पहुँचे।
  • मंदिर बाँस और फूलों से सजाया गया था, बहुत सुंदर और सादा था।
  • लोग मूर्तियों की पूजा कर रहे थे और एक-दूसरे पर पानी डाल रहे थे, चेहरों पर चावल का आटा लगा रहे थे।
  • चाऊतान ने बताया कि यह साङकेन का त्योहार है और इससे उनका नया साल शुरू होता है।
  • वल्लरी ने बताया कि उनके यहाँ होली से नया साल शुरू होता है।
  • साङकेन तीन दिन तक मनाया जाता है और आखिरी दिन मूर्तियाँ वापस बौद्ध-विहार ले जाई जाती हैं।
  • त्योहार के अंत में भिक्षु लोगों को आशीर्वाद देते हैं कि उनकी खेती अच्छी हो और सब खुश रहें।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि त्योहार खुशी और मिलजुलकर मनाने के लिए होते हैं। हमें एक-दूसरे की परंपराओं और संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए। मिलजुलकर रहने से प्यार और दोस्ती बढ़ती है। अतिथियों का स्वागत करना और उनका आदर करना एक अच्छी आदत है। परंपराएँ हमें अपनी संस्कृति से जोड़ती हैं और हमें एकता का अनुभव कराती हैं।

शब्दार्थ

  • मंडल कार्यालय: प्रशासनिक क्षेत्र का दफ्तर
  • भीड़-भाड़ वाली सड़केंबहुत अधिक लोगों और वाहनों वाली सड़कें
  • पालकी: कंधों पर उठाकर ले जाने की डिब्बेनुमा सवारी
  • शोभायात्रा: किसी पर्व या अवसर पर सजाकर निकाली जाने वाली यात्रा
  • बौद्ध-विहार: बौद्ध भिक्षुओं का मठ या धर्मस्थल
  • भिक्षु: बौद्ध धर्म का साधु
  • प्रतिदिन: हर दिन
  • जालीदार: जाल की तरह बनी हुई संरचना
  • खपच्ची: बाँस या लकड़ी की पतली पट्टी
  • टहनियाँ: पेड़ों की छोटी शाखाएँ
  • सादा: साधारण, बिना दिखावे का
  • मंत्र: धार्मिक अवसर पर पढ़े जाने वाले पवित्र वाक्य
  • गुलाल: रंग-बिरंगा सूखा पाउडर जो होली पर लगाया जाता है
  • अतिथि: मेहमान
  • आशीर्वाद: शुभकामना के रूप में दी गई दुआ
  • दंडवत प्रणाम: जमीन पर लेटकर किया जाने वाला प्रणाम
  • खेती फूले-फले: खेती अच्छी तरह बढ़े और भरपूर उपज दे
  • हिल-मिलकर: मिलजुलकर, आपसी मेल से

3. चाँद का कुर्ता – Chapter Notes

कविता का परिचय

यह कविता प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने लिखी है। इस कविता में चाँद को एक नन्हा बच्चा दिखाया गया है, जो ठंड से परेशान होकर अपनी माँ से ऊन का मोटा कुरता सिलवाने की ज़िद करता है। माँ उसे प्यार से समझाती है कि कुरता कैसे सिले, क्योंकि चाँद तो कभी छोटा होता है, कभी बड़ा और कभी दिखाई ही नहीं देता। इसलिए उसका नाप लेना बहुत मुश्किल है। यह कविता बहुत ही सरल, मज़ेदार और कल्पना से भरी है। इसमें चाँद को बच्चे जैसा बनाकर, ठंड और आकार बदलने की बात को मज़ेदार तरीके से बताया गया है।


कविता का सार

यह कविता चाँद और उसकी माँ के बीच की प्यारी बातचीत को दिखाती है। एक दिन चाँद अपनी माँ से कहता है कि वह बहुत ठंड महसूस करता है क्योंकि रात को तेज हवा चलती है। इसलिए वह माँ से एक मोटा ऊनी कुरता सिलवाने की ज़िद करता है।

माँ उसकी बात सुनकर प्यार से कहती है कि भगवान तुम्हारी रक्षा करें, लेकिन एक परेशानी है – तुम्हारी नाप कौन ले? कभी तुम छोटे दिखते हो, कभी बड़े। कभी पतले, तो कभी मोटे। कभी तो तुम बिल्कुल दिखते ही नहीं। रोज़-रोज़ बदलते रहते हो, तो फिर एक ही नाप का कुरता कैसे सिला जाए?

इस कविता में हँसी और प्यार के साथ यह समझाया गया है कि चाँद की आकृति हर दिन बदलती है, इसलिए उसके लिए एक नाप का कुरता बनाना असंभव है।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,  
“सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।  
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,  
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।

व्याख्या: एक दिन चाँद, एक जिद्दी बच्चे की तरह, अपनी माँ से कहता है कि उसे रात में बहुत ठंड लगती है। तेज “सन-सन” हवा चलती है, जिससे वह ठिठुरता रहता है। वह माँ से ऊन का मोटा झिंगोला (गरम कुरता) सिलवाने की ज़िद करता है, ताकि ठंड से बचा रहे और आसमान में अपनी रात की यात्रा आराम से पूरी कर सके।

प्रसंग 2

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,  
न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।”  
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, “अरे सलोने !  
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

व्याख्या: चाँद कहता है कि उसे सर्दियों के मौसम में आसमान में लंबा सफर करना पड़ता है, इसलिए उसे गरम कपड़ा चाहिए। अगर नया झिंगोला नहीं बन सकता, तो कोई किराए का या उधार का कुरता ही ला दो। माँ उसकी बात सुनकर प्यार से कहती है, “अरे मेरे सलोने बेटे! भगवान तुझे नजर से बचाए, कहीं तुझ पर जादू-टोना न हो जाए।” वह मजाक में उसकी ज़िद को हल्का करती है।

प्रसंग 3

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,  
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।  
कभी एक अंगुल-भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,  
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

व्याख्या: माँ कहती है कि ठंड की बात तो ठीक है, लेकिन मुझे चिंता इस बात की है कि तुम्हारा आकार कभी एक जैसा नहीं रहता। मैंने तुम्हें कभी एक नाप में नहीं देखा। कभी तुम एक अंगुल जितने छोटे दिखते हो, तो कभी एक फुट जितने बड़े। कोई दिन तुम बहुत छोटे तो कोई दिन बहुत बड़े हो जाते हो। ऐसे में तुम्हारी सही नाप कैसे लूँ?

प्रसंग 4

घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,  
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।  
अब तू ही तो बता, नाप तेरी किस रोज लिवाएँ,  
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?”

व्याख्या: माँ कहती है कि तुम तो रोज घटते-बढ़ते हो, और कभी-कभी तो बिल्कुल दिखाई ही नहीं देते, जैसे अमावस्या में। अब तू ही बता, तुम्हारी नाप किस दिन लें? अगर तुम्हारा आकार ही रोज बदलता है, तो ऐसा झिंगोला (कुरता) कैसे सिलवाया जाए जो तुम्हारे बदन में हर रोज फिट हो?

कविता से शिक्षा

यह कविता हमें यह सिखाती है कि हर चीज़ को मापकर, सोच-समझकर और सही समय पर करना चाहिए। चाँद की तरह अगर कोई हर दिन बदलता रहे — कभी बड़ा, कभी छोटा, तो उसके लिए सही चीज़ बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इससे हमें यह भी समझ में आता है कि अगर हम अपने कामों में स्थिर नहीं रहेंगे और हर दिन अपना मन बदलते रहेंगे, तो न तो कोई हमारी मदद कर पाएगा और न ही कोई काम ठीक से हो पाएगा। इसलिए हमें खुद में थोड़ा स्थिर और समझदार बनना चाहिए।

शब्दार्थ

  • हठ: ज़िद
  • झिंगोला: ऊन से बना मोटा कपड़ा या कुरता
  • सन-सन: हवा चलने की आवाज़
  • ठिठुर-ठिठुरकर: ठंड से काँपते हुए
  • जाड़ा: सर्दी
  • भाड़े का: किराए का
  • सलोने: सुंदर, प्यारे
  • कुशल करें भगवान: भगवान रक्षा करें
  • जादू-टोने: तंत्र-मंत्र
  • नाप: माप
  • अंगुल: उंगली की चौड़ाई
  • फुट: लंबाई मापने की इकाई
  • घटता-बढ़ता: कभी छोटा, कभी बड़ा होना

02. न्याय की कुर्सी – Chapter Notes

कहानी परिचय

“न्याय की कुर्सी” लीलावती भागवत की कहानी है, जो स्वर्ग की सैर तथा अन्य कहानियाँ (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास) से ली गई है। उज्जैन के एक मैदान में एक लड़का पत्थर को सिंहासन समझकर राजा बनने का खेल शुरू करता है और अपने दोस्तों की शिकायतों के फैसले करता है। उसकी न्याय-बुद्धि की चर्चा फैलती है, और लोग असली झगड़े लेकर आने लगते हैं। जब राजा को यह पता चलता है, तो वह हैरान होकर स्वयं देखने जाता है। पता चलता है कि वह पत्थर विक्रमादित्य का सिंहासन है, जिसकी मूर्तियाँ बोलती हैं। राजा उस पर बैठने की कोशिश करता है, लेकिन मूर्तियाँ उससे चोरी, झूठ और हिंसा के सवाल पूछती हैं। राजा प्रायश्चित करता है, पर अहंकार के कारण सिंहासन मूर्ति सहित उड़ जाता है।

मुख्य विषय

“न्याय की कुर्सी” कहानी का मुख्य विषय है न्याय, नैतिकता और अहंकार से मुक्ति। यह कहानी बताती है कि सच्चा न्याय वही कर सकता है, जिसका मन स्वच्छ और निष्पक्ष हो, जैसा कि बच्चों के खेल में दिखाया गया है। राजा विक्रमादित्य का सिंहासन इस बात का प्रतीक है कि सत्ता और शक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है सत्य, ईमानदारी और दूसरों के प्रति करुणा। राजा का अहंकार और उसकी गलतियाँ उसे सिंहासन पर बैठने से रोकती हैं, जिससे यह संदेश मिलता है कि सच्चे न्याय के लिए मन की पवित्रता और विनम्रता जरूरी है।

कहानी का सार

कहानी “न्याय की कुर्सी” उज्जैन शहर के बाहर एक बड़े मैदान से शुरू होती है, जहाँ कुछ टीले बिखरे हुए थे। एक दिन वहाँ बच्चे खेल रहे थे। एक लड़का दौड़ता-कूदता एक टीले पर चढ़ा और अचानक एक चिकने पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसने देखा कि वह पत्थर कोई साधारण चीज नहीं थी। उसने अपने दोस्तों को बुलाया और उस पत्थर पर बैठकर शान से कहा, “यह मेरा सिंहासन है। मैं राजा हूँ, और तुम सब मेरे दरबारी। अपनी-अपनी शिकायतें लाओ, मैं उनका फैसला करूँगा।” दोस्तों को यह खेल बहुत पसंद आया। वे एक-एक करके काल्पनिक शिकायतें लेकर आते, गवाह बुलाते, और लड़का उनसे सवाल-जवाब करके फैसला सुनाता। यह खेल इतना मजेदार था कि बच्चे रोज़ इसे खेलने लगे।

धीरे-धीरे इस खेल की बात आसपास फैलने लगी। लोग उस लड़के की समझदारी और न्याय करने की कला की तारीफ करने लगे। कुछ लोग तो कहने लगे कि उसमें कोई दैवी शक्ति है। एक दिन दो किसानों के बीच ज़मीन को लेकर बड़ा झगड़ा हो गया। वे राजा के दरबार जाने की बजाय उस लड़के के पास गए और अपनी समस्या बताई। लड़के ने बहुत ध्यान से दोनों की बात सुनी और ऐसा फैसला दिया कि किसान हैरान रह गए। उस दिन से पूरे शहर के लोग अपनी शिकायतें लेकर उसी लड़के के पास आने लगे। कोई भी राजा के दरबार नहीं जाता था, क्योंकि लड़के के फैसले हमेशा सही और संतोषजनक होते थे।

यह बात जब राजा को पता चली, तो उसे बहुत गुस्सा आया। उसने कहा, “यह लड़का अपने आप को मुझसे बेहतर न्यायकर्ता समझता है? मैं खुद जाकर देखूँगा।” राजा अपने सैनिकों के साथ उस मैदान में पहुँचा और बच्चों का खेल देखने लगा। वह लड़के की बुद्धिमानी देखकर दंग रह गया और अपने मंत्री से बोला, “यह लड़का वाकई बहुत समझदार है। इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धिमत्ता होना वास्तव में प्रशंसनीय है।” तभी किसी ने बताया कि वह रोज़ वाला लड़का नहीं है, बल्कि दूसरा लड़का है, क्योंकि पहला लड़का बीमार था। राजा को और आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि शायद उस पत्थर में ही कोई जादू है।

राजा के आदेश पर उस जगह को खोदा गया, और पत्थर को बाहर निकाला गया। तब पता चला कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि एक बहुत सुंदर सिंहासन था, जिस पर खूबसूरत नक्काशी और चारों पायों पर चार देवदूतों की मूर्तियाँ बनी थीं। विद्वानों ने बताया कि यह राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था, जो अपने न्याय और विवेक के लिए प्रसिद्ध थे। राजा ने सिंहासन को अपने दरबार में रखवाया और कहा कि वह उस पर बैठकर प्रजा की शिकायतें सुनेगा।

अगले दिन जब राजा सिंहासन पर बैठने गया, तो एक मूर्ति ने आवाज़ दी, “ठहरो!” मूर्ति ने पूछा, “क्या तुमने कभी चोरी नहीं की?” राजा ने शर्मिंदगी से स्वीकार किया कि उसने एक दरबारी की ज़मीन पर कब्ज़ा किया था। मूर्ति ने कहा कि वह सिंहासन पर बैठने योग्य नहीं है और उसे तीन दिन तक प्रायश्चित करना होगा। मूर्ति फिर आकाश में उड़ गई। राजा ने तीन दिन उपवास और प्रार्थना की। चौथे दिन जब वह फिर बैठने गया, तो दूसरी मूर्ति ने पूछा, “क्या तुमने कभी झूठ नहीं बोला?” राजा ने माना कि उसने कई बार झूठ बोला था। वह पीछे हट गया, और दूसरी मूर्ति भी उड़ गई।

तीन दिन और प्रायश्चित करने के बाद राजा फिर कोशिश करने गया। तीसरी मूर्ति ने पूछा, “क्या तुमने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई?” राजा को अपनी गलतियाँ याद आईं, और वह फिर पीछे हट गया। तीसरी मूर्ति भी उड़ गई। तीन दिन बाद जब राजा चौथी बार सिंहासन की ओर बढ़ा, तो चौथी मूर्ति ने कहा, “जो बच्चे यहाँ बैठते थे, उनके मन साफ थे। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम इस योग्य हो?” राजा ने सोचा कि वह राजा है, धनवान और बुद्धिमान है, तो वह ज़रूर योग्य है। लेकिन जैसे ही वह बैठने गया, चौथी मूर्ति सिंहासन समेत आकाश में उड़ गई।

कहानी की मुख्य बातें

  • बच्चों का खेल: उज्जैन के एक मैदान में बच्चे खेल रहे थे। एक लड़के को एक चिकना पत्थर मिला, जिसे वह सिंहासन समझकर उस पर बैठा और राजा बनकर दोस्तों की शिकायतों के फैसले करने लगा।
  • लड़के की प्रसिद्धि: लड़के के निष्पक्ष फैसलों की चर्चा फैली। लोग असली झगड़े लेकर उसके पास आने लगे, और सभी उसके फैसलों से खुश थे।
  • राजा का गुस्सा: राजा को यह बात पता चली और वह गुस्सा हुआ। वह खुद मैदान में गया और लड़के की बुद्धिमानी देखकर हैरान रह गया।
  • विक्रमादित्य का सिंहासन: पत्थर को खोदने पर पता चला कि वह राजा विक्रमादित्य का प्राचीन सिंहासन था, जिसके चार पायों पर देवदूतों की मूर्तियाँ थीं।
  • राजा की कोशिश: राजा ने सिंहासन पर बैठने की कोशिश की, लेकिन हर बार मूर्तियाँ बोल उठीं और उससे चोरी, झूठ, और दूसरों को चोट पहुँचाने जैसे सवाल पूछे।
  • प्रायश्चित: राजा ने अपनी गलतियाँ मानीं और हर बार तीन दिन तक उपवास और प्रार्थना की, लेकिन वह हर सवाल में असफल रहा।
  • अहंकार और अंत: आखिरी मूर्ति ने राजा से मन की शुद्धता के बारे में पूछा। राजा ने अहंकार में खुद को योग्य समझा, लेकिन सिंहासन चौथी मूर्ति के साथ आकाश में उड़ गया।

कहानी से शिक्षा

कहानी “न्याय की कुर्सी” से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा न्याय करने के लिए मन का साफ और निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है। राजा विक्रमादित्य का सिंहासन केवल उसी को स्वीकार करता है, जो चोरी, झूठ, या किसी को चोट पहुँचाने जैसे गलत कामों से मुक्त हो। कहानी यह भी सिखाती है कि अहंकार और घमंड इंसान को सही रास्ते से भटका सकता है, जैसे राजा अपने अहंकार के कारण सिंहासन पर नहीं बैठ पाया। हमें हमेशा नम्र, ईमानदार और दूसरों के प्रति दयालु रहना चाहिए।

शब्दार्थ

  • प्राचीन: बहुत पुराना
  • ऐतिहासिक: इतिहास से जुड़ा हुआ
  • मैदान: खुली और समतल ज़मीन
  • टीला: मिट्टी या रेत का ऊँचा छोटा ढेर
  • चिकना: एकदम सपाट और मुलायम सतह वाला
  • शिला: बड़ा पत्थर
  • सिंहासन: राजा की बैठने की खास कुर्सी
  • दरबारी: राजा के दरबार में रहने वाला व्यक्ति
  • फरियाद: शिकायत या अर्ज़ी
  • गवाही: किसी बात की सच्चाई बताना या पुष्टि करना
  • न्याय-बुद्धि: सही-गलत को पहचानने की समझ
  • दैवी शक्ति: भगवान जैसी चमत्कारी ताकत
  • दंग रह जाना: बहुत ज़्यादा हैरान हो जाना
  • लाव-लश्कर: राजा की सेना और उसके साथ आने वाला समूह
  • स्तंभित: बहुत चकित या हैरान रह जाना
  • विवेक: सोचने-समझने की बुद्धि
  • प्रायश्चित: अपनी गलती का पश्चाताप करना
  • कलुष: बुरे विचार या मन की गंदगी
  • दृढ़ कदम: आत्मविश्वास से भरे हुए ठोस कदम
  • उड़ गई: आकाश की ओर चली गई (यहाँ चमत्कार के रूप में)

1. किरण – Chapter Notes

कविता परिचय

यह कविता “किरन” प्रसिद्ध कवि निरंकार देव सेवक जी ने लिखी है। इसमें सूरज की किरण को एक प्यारे दोस्त की तरह दिखाया गया है, जो सुबह-सुबह जल्दी आ जाता है। कविता में एक बच्ची और किरन के बीच की मजेदार और प्यारी बातचीत दिखाई गई है। यह कविता हमें प्रकृति की सुंदरता और कल्पना की दुनिया में ले जाती है।

कविता का सार

यह कविता एक छोटी लड़की और सूरज की किरण (किरन) के बीच की मजेदार और प्यारी बातचीत की कहानी है। लड़की हैरान है कि उसका दोस्त किरण सुबह इतनी जल्दी कैसे आ गया, जबकि वह खुद अभी बिस्तर से उठी भी नहीं है। वह बताती है कि कल उसने किरण के साथ दिनभर खूब खेल खेले, लेकिन जब सूरज डूबा और किरण चली गई, तो वह अकेली रह गई और उसे नींद नहीं आई। 

किरण जवाब देती है कि वह सोती नहीं है! जब यहाँ रात होती है, तो वह पृथ्वी के दूसरे हिस्से में जाती है, जहाँ वह वहाँ के बच्चों को सुबह जगाती है। फिर, जब वहाँ शाम होती है, तो वह वापस यहाँ लौट आती है। यह कविता हमें सिखाती है कि सूरज की किरणें पृथ्वी के घूमने की वजह से दिन-रात बनाती हैं और हमेशा मेहनत से काम करती हैं।

कविता की व्याख्या

प्रसंग 1

अरी किरन तू उठकर इतनी
जल्दी आज चली आई।
मैं तो बिस्तर में से अपने
अब तक निकल नहीं पाई।

व्याख्या: बच्ची अपनी दोस्त जैसी सूरज की किरण से कहती है, “अरे किरण, तुम तो सुबह इतनी जल्दी आ गई!” लेकिन वह खुद अभी तक बिस्तर से उठ नहीं पाई। उसे आश्चर्य होता है कि सूरज की किरण हर दिन इतनी जल्दी कैसे आ जाती है। यह इसलिए होता है, क्योंकि सूरज हर सुबह समय पर उगता है और अपनी किरणों को धरती पर भेजता है।

प्रसंग 2

कल तो तेरे साथ शाम तक
खेल बहुत से खेली मैं।
पर जब तू चल दी सोने को
तो रह गई अकेली मैं।

व्याख्या: बच्ची कहती है कि कल उसने अपनी दोस्त किरण के साथ दिनभर खूब खेल खेले। लेकिन जब शाम हुई और सूरज डूब गया, तो किरण चली गई और बच्ची अकेली रह गई। उसे अकेलापन महसूस हुआ। यह दर्शाता है कि सूरज हर शाम डूबता है, जिससे रात शुरू होती है।

प्रसंग 3

तू सुख से सोई होगी पर
मुझको नींद नहीं आई।
परी कथाएँ पढ़ते-पढ़ते
बड़ी देर में सो पाई।

व्याख्या: बच्ची सोचती है कि किरण शायद चैन से सो गई होगी। लेकिन वह खुद रात तक अपनी पसंदीदा परी कथाओं की किताबें पढ़ती रही, जिससे उसे बहुत देर बाद नींद आई। उसे लगता है कि किरण सो रही है, पर यह उसकी कल्पना है, क्योंकि सूरज की किरणें वास्तव में सोती नहीं हैं।

प्रसंग 4

कहने लगी किरन यह सुनकर
मैं ही कब सो पाती हूँ।
तुम्हें सुलाकर एक दूसरी
दुनिया में मैं जाती हूँ।

व्याख्या: किरण बच्ची से कहती है, “मैं तो कभी सोती नहीं!” जब यहाँ रात होती है और तुम सो जाते हो, तब मैं पृथ्वी के दूसरे हिस्से में चली जाती हूँ, जहाँ उस समय सुबह होती है। यह इसलिए होता है, क्योंकि पृथ्वी घूमती है, और सूरज की किरणें हर जगह बारी-बारी से पहुँचती हैं।

प्रसंग 5

बच्चे जो बिस्तर में सोए
होते, उन्हें जगाती हूँ।
वहाँ शाम हो जाती है तो
लौट यहाँ फिर आती हूँ।

व्याख्या: किरण बताती है कि वह पृथ्वी के दूसरे हिस्से में जाती है और वहाँ सो रहे बच्चों को अपनी चमक से सुबह जगाती है। जब वहाँ शाम होती है, तो वह वापस यहाँ लौट आती है, ताकि तुम्हें फिर से सुबह जगा सके। यह सब पृथ्वी के घूमने की वजह से होता है, जिससे दिन और रात बनते हैं।

कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह सीख मिलती है कि समय बहुत कीमती होता है। सूरज की किरण समय पर आती है, अपना काम करती है और फिर दूसरी जगह चली जाती है। हमें भी समय का सही उपयोग करना चाहिए। हमें सुबह जल्दी उठकर अपना दिन अच्छे कामों में लगाना चाहिए। यह कविता हमें यह भी सिखाती है कि किरण (प्रकाश) सभी बच्चों को जगाने और रोशनी फैलाने के लिए मेहनत करती है। हमें भी मेहनती और समय के पाबंद बनना चाहिए।

शब्दार्थ

  • किरन: सूरज की रोशनी
  • बिस्तर: सोने या लेटने की जगह (जैसे पलंग, चादर आदि)
  • अकेली: एकाकी / जिसके साथ कोई न हो
  • सुख: आनंद / खुशी / प्रसन्नता
  • परी कथाएँ: परियों की कल्पनात्मक कहानियाँ
  • जगाना: नींद से उठाना
  • दुनिया: संसार / विश्व
  • खेली: खेल खेलना (क्रिया का भूतकालिक रूप)
  • लौट: वापस आना / पुनः आना
  • देर: समय की अधिकता / समय का अधिक बीत जाना

13. वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – Textbook Solutions

पृष्ठम् 155: प्रश्नानि

1. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन द्विपदेन वा उत्तरत
(क) उरसि किं तन्त्रं भवति? 
उत्तरम्: वायुबलतन्त्रम्।

(ख) नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः किं नोदयन्ति? 
उत्तरम्: श्वासप्रवृत्तिम्। 

(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वार्णानाम् उत्पत्त्यर्थं द्वितीयं तत्त्वं किम् अस्ति? 
उत्तरम्: करणम्। 

(घ) आस्ये कति स्थानानि सन्ति? 
उत्तरम्: षट् स्थानानि। 

(ङ) स्थानस्य कार्यनिदर्शनार्थं किं समुचितम् उदाहरणम् अस्ति? 
उत्तरम्: मुरली। 

(च) करणानि मुरल्याः कस्य भागम् इव व्यवहरन्ति? 
उत्तरम्: अङ्गुलीभागस्य। 

2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत।
(क) करणं किं भवति? 
उत्तरम्: करणं तदङ्गं भवति, यत् वर्णस्य उच्चारणसमये स्थानं स्पृशति वा समीपं याति। 

(ख) उरः श्वासकोशस्थितं वायुं कुत्र निःसारयति? 
उत्तरम्: उरः श्वासकोशे स्थितं वायुं ऊर्ध्वं निःसारयति। 

(ग) मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि कीदृशं व्यवहरन्ति? 
उत्तरम्: मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि आस्यस्य स्थानानि इव व्यवहरन्ति।

(घ) केषां वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति? 
उत्तरम्: कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। 

(ङ) तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं किम् अस्ति? 
उत्तरम्: तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं जिह्वा भवति। 

(च) कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये किं भवति? 
उत्तरम्: कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे स्थानमेव करणं भवति। 

3. अधोलिखितेषु वाक्येषु आम् /  इति लिखित्वा उचितभावं सूचयत
(क) श्वासकोशस्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वम् आस्यं प्राप्नोति।
उत्तरम्: न

(ख) सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्याः कण्ठं नोदयन्ति।
उत्तरम्: न

(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः आवश्यकम् अस्ति।
उत्तरम्: आम्

(घ) तालव्य-वर्णनाम् उच्चारणार्थं दन्तः स्थानं स्पृशति।
उत्तरम्: न

(ङ) मूर्धन्यानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वा स्थानं स्पृशति।
उत्तरम्: आम्

(च) तत्तत्स्थानस्य एव कश्चित् पूर्वभागः, तत्तत्स्थानस्य परभागं स्पृशति।
उत्तरम्: आम्

पृष्ठम् 156: प्रश्नानि

4. मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत – क्रमेण) लिखन्तु –
(क) मूर्धा __________
(ख) दन्तः __________
(ग) तालु __________
(घ) कण्ठः __________
(ङ) ओष्ठः __________

उत्तरम्:
(ङ) ओष्ठः
(ख) दन्तः
(ग) तालु
(क) मूर्धा
(घ) कण्ठः

5. यथायोग्यं मेलनं कुरुत –
उत्तरम्:

12. सम्यवर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोकेऽपि महीयते – Textbook Solutions

पृष्ठम् 142: प्रश्नानि

1. पाठे विद्यमानानां श्लोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत ।

उत्तरम्: स्वयं करोतु।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखत-
(क) पाठकाः केषां सम्यक् प्रयोगं कुर्युः ? 
उत्तरम्: वर्णानाम्। 

(ख) किम् अवश्यमेव पठनीयम् ? 
उत्तरम्: व्याकरणम्। 

(ग) ब्रह्मलोके केन सम्मानं भवति ? 
उत्तरम्: सम्यग्वर्णप्रयोगेण। 

(घ) अधमाः पाठकाः कति भवन्ति ? 
उत्तरम्: षट्। 

(ङ) धैर्यं केषां गुणः ? 
उत्तरम्: पाठकानाम्। 

पृष्ठम् 143: प्रश्नानि

3. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत–
(क) व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां कान् नयति ? 
उत्तरम्:  व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् नयति। 

(ख) वर्णाः कथं प्रयोक्तव्याः ? 
उत्तरम्: वर्णाः स्पष्टतया न च पीडयित्वा प्रयोक्तव्याः। 

(ग) पाठकानां षट्-गुणाः के भवन्ति ? 
उत्तरम्: पाठकानां षट् गुणाः – माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम्, लयसमर्थता च भवन्ति। 

(घ) के अधमाः पाठकाः भवन्ति ? 
उत्तरम्: गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठश्च अधमाः पाठकाः भवन्ति। 

(ङ) ‘स्वजनः’ ‘श्वजनः’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ? 
उत्तरम्: ‘स्वजनः’ इत्यस्य अर्थः बान्धवः, ‘श्वजनः’ इत्यस्य अर्थः शुनकः अस्ति। 

(च) ‘सकलं’ ‘शकलं’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ? 
उत्तरम्: ‘सकलं’ इत्यस्य अर्थः सम्पूर्णम्, ‘शकलं’ इत्यस्य अर्थः खण्डः अस्ति।

4. अधोलिखितानि लक्षणानि पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इति विभजत–
उत्तरम्: 


पृष्ठम् 144: प्रश्नानि

5. श्लोकानुसारं रिक्तस्थानानि उचितैः शब्दैः पूरयत
(क) भीता _________ तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
(ख) _________ लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।
(ग) गीती शीघ्री _________ तथा लिखितपाठकः।
(घ) एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च _________।
(ङ) स्वजनः _________ माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।

उत्तरम्: 
(क) भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
(ख) माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।
(ग) गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।
(घ) एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः
(ङ) स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।

6. अधोलिखितानि वाक्यानि सत्यम् वा असत्यम् वा इति लिखत
यथा– पदच्छेदः पाठकानां गुणः अस्ति। सत्यम् / असत्यम्

(क) गानसहितपठनं पाठकानां दोषः भवति।
उत्तरम्: सत्यम्

(ख) माधुर्यं नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अस्ति।
उत्तरम्: असत्यम्

(ग) शकृत् नाम एकवारम् इति अर्थः अस्ति।
उत्तरम्: असत्यम्

(घ) अव्यक्ताः वर्णाः प्रयोक्तव्याः भवन्ति।
उत्तरम्: असत्यम्

(ङ) व्याघ्री यथा पुत्रान् हरति तथा वर्णान् प्रयोजयेत्।
उत्तरम्: सत्यम् 

11. सत्रमिते वरं त्याग: (ख-भाग:) – Textbook Solutions

पृष्ठम् 131: प्रश्नानि

1. निम्नलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयानि (रेखांकनम्) स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(क) वीरवरो पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत्। 
प्रश्न (संस्कृत): कः पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत्? 

(ख) ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गताः। 
प्रश्न (संस्कृत): ततस्ते सर्वे जनाः कुत्र गताः? 

(ग) वीरवरः वर्तनस्य निस्तारं पुत्रोत्सर्गेण अकरोत्। 
प्रश्न (संस्कृत): वीरवरः वर्तनस्य निस्तारं केन अकरोत्? 

(घ) राजा स्वप्रासादं प्राविशत्। 
प्रश्न (संस्कृत): राजा कुत्र प्राविशत्? 

(ङ) महीपतिः वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशम् अयच्छत्। 
प्रश्न (संस्कृत): महीपतिः कस्य समग्रकर्णाटप्रदेशं अयच्छत्? 

2. अधोलिखितान् प्रश्नान् उत्तरत –
(क) वीरवरः किम् अवर्णयत् ? 
उत्तरम्: वीरवरः अखिलराजलक्ष्मीसंवादं अवर्णयत्। 

(ख) प्राज्ञः धनानि जीवितञ्च केभ्यः उत्सृजेत् ? 
उत्तरम्: प्राज्ञः परार्थे धनानि जीवितञ्च उत्सृजेत्। 

(ग) केन सदृशः लोके न भूतो न भविष्यति ? 
उत्तरम्: वीरवरेण सदृशः लोके न भूतो न भविष्यति। 

(घ) का अदृश्या अभवत्? 
उत्तरम्: भगवती सर्वमङ्गला अदृश्या अभवत्। 

(ङ) सपरिवारः वीरवरः कुत्र गतवान्? 
उत्तरम्: सपरिवारः वीरवरः स्वगृहं गतवान्। 

पृष्ठम् 132: प्रश्नानि

3. अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि (रेखांकनम्) केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत-
(क) भगवति ! न “मे” प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा ।
उत्तरम्: राज्ञः

(ख) वत्स ! अनेन “ते” सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि ।
उत्तरम्: राज्ञः

(ग) धन्याहं “यस्या” ईदृशो जनको भ्राता च ।
उत्तरम्: वीरवत्या

(घ) तदेतत्परित्यक्तेन “मम” राज्येनापि किं प्रयोजनम् !
उत्तरम्: राज्ञः

(ङ) “अयम्” अपि सपरिवारो जीवतु ।
उत्तरम्: वीरवरः

4. उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत
यथा – कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रोत्सर्गेण ।
गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो मया स्वपुत्रोत्सर्गेण कृतः।

(क) नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति। 
अन्वय: ते राज्यभङ्गः अब भविष्यति नहीं। 

(ख) तेन पातितं स्वशिरः स्वकरस्थखड्गेन। 
अन्वय: तेन स्वकरस्थखड्गेन स्वशिरः पातितम्। 

(ग) तदा ममायुःशेषेणापि जीवतु राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च। 
अन्वय: तदा राजपुत्रः वीरवरः मम आयुःशेषेणापि सह पुत्रेण पत्न्या च दुहित्रा जीवतु। 

(घ) तत्क्षणादेव देवी गताऽदर्शनम्। 
अन्वय: देवी तत्क्षणादेव गताऽदर्शनम्। 

(ङ) महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय। 
अन्वय: महीपतिः तस्मै राजपुत्राय वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशम् प्रायच्छत्। 

(च) जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
अन्वय: मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च। 

पृष्ठम् 133-134: प्रश्नानि

5. उदाहरणानुगुणम् अधोलिखितानां पदानां पदच्छेदं कुरुत-
यथा –
यद्येवमस्मत्कुलोचितम् = यदि-एवम्-अस्मत्-कुलोचितम्
सत्त्वोत्कर्षेण = ‘सत्त्व – उत्कर्षेण
(क) गृहीतस्वामिवर्तनस्य = _____________
(ख) निस्तारोपायः = _____________
(ग) गृह्यतामेष = _____________
(घ) स्वपुत्रोत्सर्गेण = _____________
(ङ) स्वकरस्थखड्गेन = _____________
(च) तदेतत्परित्यक्तेन = _____________
(छ) स्वशिरश्छेदनार्थमुत्क्षिप्तः = _____________
(ज) मद्दर्शनाददृश्यताम् = _____________
(झ) तत्क्षणादेव = _____________
(ञ) लब्धजीवितः = _____________
उत्तरम्:
(क) गृहीतस्वामिवर्तनस्य = गृहीत-स्वामि-वर्तनस्य
(ख) निस्तारोपायः = निस्तार-उपायः
(ग) गृह्यतामेष = गृह्यताम्-एष
(घ) स्वपुत्रोत्सर्गेण = स्व-पुत्र-उत्सर्गेण
(ङ) स्वकरस्थखड्गेन = स्व-कर-स्थ-खड्गेन
(च) तदेतत्परित्यक्तेन = तत्-एतत्-परित्यक्तेन
(छ) स्वशिरश्छेदनार्थमुत्क्षिप्तः = स्व-शिरः-छेदन-अर्थम्-उत्क्षिप्तः
(ज) मद्दर्शनाददृश्यताम् = मत्-दर्शनात्-दृश्यताम्
(झ) तत्क्षणादेव = तत्-क्षणात्-एव
(ञ) लब्धजीवितः = लब्ध-जीवितः

6. (क) उदाहरणानुसार पाठगत पदों से रिक्त स्थानों की पूर्ति सन्धियुक्त शब्दों द्वारा करें —

तत् + श्रुत्वा   = ____________
दुहितरम् + च
    = ____________
धन्यः + अहम्
   = ____________
जीवितम् + च + एव
 = ____________
विलम्बः + तात
  = ____________
कः + अधुना
  = ____________
न + आचरितव्यम्
  = ____________
धन्या + अहम्
   = ____________
निस्तारः + उपायः
  = ____________
वीरवरः + अवदत्
   = ____________
ततः + असौ
   = ____________
ततः + ते
   = ____________
उत्तरम्:
तत् + श्रुत्वा  = तच्छ्रुत्वा
दुहितरम् + च  = दुहितरञ्च
धन्यः + अहम्  = धन्याहम्
जीवितम् + च + एव  = जीवितमेव
विलम्बः + तात =  विलम्बस्तात
कः + अधुना  = कोऽधुना
न + आचरितव्यम्  = नाचरितव्यम्
धन्या + अहम् =  धन्याहम्
निस्तारः + उपायः  =  निस्तारोपायः
वीरवरः + अवदत्  = वीरवरोऽवदत्
ततः + असौ =  ततोऽसौ
ततः + ते  = ततस्ते

(ख) निम्नलिखितपदानां सन्धिच्छेदं कुरुत-
शूद्रकोऽपि  = _______ + _______
पुनर्भूपालेन  = _______ + _______
महीपतिस्तस्मै  = _______ + _______
प्रायच्छत्  = _______ + _______
नृपतिरपि  = _______ + _______
सर्वेषामदृश्य  = _______ + _______
वार्ताऽन्या  = _______ + _______
राज्यभङ्गस्ते  = _______ + _______
गतिर्गन्तव्या  = _______ + _______
इत्युक्त्वा  = _______ + _______
नेदानीं  =  _______ + _______
प्रीतास्मि  = _______ + _______
उत्तरम्:
शूद्रकोऽपि  = शूद्रकः + अपि
पुनर्भूपालेन  = पुनः + भूपालेन
महीपतिस्तस्मै  = महीपतिः + तस्मै
प्रायच्छत्  = प्रा + अयच्छत्
नृपतिरपि  = नृपतिः + अपि
सर्वेषामदृश्य  = सर्वेषाम् + अदृश्य
वार्ताऽन्या  = वार्ता + अन्या
राज्यभङ्गस्ते  = राज्यभङ्गः + ते
गतिर्गन्तव्या  = गतिः + गन्तव्या
इत्युक्त्वा  = इति + उक्त्वा
नेदानीं  =  न + इदानीं
प्रीतास्मि  = प्रीता + अस्मि

पृष्ठम् 135: प्रश्नानि

7. अधोलिखितानि कथनानि कथायाः घटनानुसारं लिखत
(क) सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
(ख) पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
(ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’?
(घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत्।
(ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता । सा नारी अदृश्या अभवत्।
(च) भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः।
(छ) वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।

उत्तरम्:
(घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत्।
(ख) 
पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
(छ) 
वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।
(क) 
सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
(च) 
भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः।
(ग) 
प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’?
(ङ) 
वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता । सा नारी अदृश्या अभवत्।

10. सत्रमिते वरं त्याग: (क-भाग:) – Textbook Solutions

पृष्ठम् 118: प्रश्नानि

1. पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लिखत ‘आम्’ अथवा ‘न’ –

(क) किं वीरवरः राजपुत्रः आसीत्? ____________
उत्तरम्:
 आम्

(ख) “किं ते वर्तनम्”? इति किं शूद्रकः अपृच्छत्? ____________
उत्तरम्:
 आम्

(ग) किं वीरवरं राज्ञः समीपे दौवारिकः अनयत् ? ____________
उत्तरम्: 
आम्

(घ) किं राजा शूद्रकः राजपुत्रं वीरवरं साक्षात् दृष्ट्वा एव वृत्तिम् अयच्छत् ? ____________
उत्तरम्:
 न

(ङ) किं वीरवरः स्ववेतनस्य चतुर्थं भागम् एव पत्न्यै यच्छति स्म ? ____________
उत्तरम्:
 न

(च) किं करुण – रोदन-ध्वनिं राजा श्रुतवान्? ____________
उत्तरम्:
 आम्

(छ) किं करुणरोदनध्वनिः दिवसे श्रुतः आसीत् ? ____________
उत्तरम्:
 न

(ज) किं राजलक्ष्म्या उक्तः उपायः अतीव दुःसाध्यः आसीत् ? ____________
उत्तरम्: 
आम्

(झ) किं भगवती सर्वमङ्गला उपायं संसूच्य शीघ्रमेव अदृश्या अभवत्? ____________
उत्तरम्:
 आम्

2. अधोलिखितान् प्रश्नान् पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) शूद्रकः कीदृशः राजा आसीत्? 
उत्तरम्: शूद्रकः महापराक्रमी, नानाशास्त्रवित्, पूतचरित्रः च राजा आसीत्। 

(ख) वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छति स्म? 
उत्तरम्: वीरवरः राज्ञः समीपं गन्तुम् इच्छति स्म। 

(ग) राज्ञः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?” इति प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः किम् अयच्छत् ?  
उत्तरम्: वीरवरः उक्तवान् – “इमौ बाहू, एषः खड्गः च मम सामग्री।” 

(घ) वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छति स्म ? 
उत्तरम्: वीरवरः यदा राजा आदेशं ददाति तदा एव स्वगृहं गच्छति स्म। 

(ङ) वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं केभ्यः यच्छति स्म ? 
उत्तरम्: वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं देवेभ्यः यच्छति स्म। 

(च) राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ? 
उत्तरम्: राजलक्ष्मीः शूद्रकस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन अवसत्। 

(छ) राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं श्रुत्वा बद्धाञ्जलिः वीरवरः किम् अवदत् ? 
उत्तरम्: वीरवरः उक्तवान् – “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायः येन भगवत्याः पुनः चिरवासः भवेत्?” 

पृष्ठम् 119: प्रश्नानि

3. उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत

(क) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी ।
अन्वयः  काचित् नगरी शोभावती नाम आसीत्।

(ख) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !
अन्वयः हे देव! प्रतिदिनं सुवर्णशतानां चतुष्टयं भवति।

(ग) देव! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथममवगम्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।
अन्वयः हे देव! प्रथमं दिनचतुष्टयस्य वेतनस्य अर्पणेन, अयम् वेतनार्थी राजपुत्रः उपपन्नम् अस्ति वा न इति स्वरूपं अवगम्यताम्।

(घ) क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !
अन्वयः हे राजपुत्र! त्वं क्रन्दनस्य अनुसरणं कुरु।

(ङ) अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना ।
अन्वयः अथ नरपतिना मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदाने नियोजितः असौ राजपुत्रः वीरवरः।

(च) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन् ।
अन्वयः अस्मिन् सूचिभेद्ये तिमिरे एकाकी राजपुत्रः गन्तुं न अर्हति।

(छ) भगवति! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?
अन्वयः हे भगवति! अत्र कश्चित् उपायः अस्ति, येन भगवत्या पुनः अत्र चिरकालं वासः भवति, च स्वामी सुचिरं जीवति।

(ज) तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम् ।
अन्वयः तदा राजा शूद्रकः वर्षाणां शतं पुनः जीविष्यति।

पृष्ठम् 120: प्रश्नानि

4. उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत
यथा – (1) अथैकदा = अथ + एकदा
(2) वृत्त्यर्थम् = वृत्तिः + _______
(3) कस्मादपि = _______ + अपि
(4) कोऽपि = कः + _______
(5) राजपुत्रोऽस्मि = _______ + अस्मि
(6) यथेष्टम् = यथा + _______
(7) वेतनार्पणेन = वेतन + _______
(8) तदालोक्य = _______ + आलोक्य
(9) ततोऽसौ = ततः + _______
(10) वर्तनार्थिनो = _______ + अर्थिनः
(11) तदवशिष्टं = _______ + अवशिष्टम्
(12) राजदर्शनादनन्तरं = राजदर्शनात् + _______
(13) वेत्ति = _______+ इति
(14) राजलक्ष्मीरुवाच = राजलक्ष्मीः + _______
(15) चार्द्धं = _______ + अर्धम्
(16) बहिर्नगरादालोकिता = बाहिः + _______ + आलोकिता
(17) कापि = _______ + अपि
(18) प्रत्युवाच = प्रति + _______
(19) राजलक्ष्मीरस्मि = _______ + अस्मि
(20) स्थास्यामीति = स्थास्यामि + _______
(21) भुजच्छायायां = _______ + छायायाम्
(22) अस्त्यत्र = अस्ति + _______
(23) कश्चिदुपायः = _______ + उपायः
उत्तरम्:
यथा – (1) अथैकदा = अथ + एकदा
(2) वृत्त्यर्थम् = वृत्तिः + अर्थम्
(3) कस्मादपि = कस्मात् + अपि
(4) कोऽपि = कः + अपि
(5) राजपुत्रोऽस्मि = राजपुत्रः + अस्मि
(6) यथेष्टम् = यथा + इष्टम्
(7) वेतनार्पणेन = वेतन + अर्पणेन
(8) तदालोक्य = तत् + आलोक्य
(9) ततोऽसौ = ततः + असौ
(10) वर्तनार्थिनो = वर्तन + अर्थिनः
(11) तदवशिष्टं = तत् + अवशिष्टम्
(12) राजदर्शनादनन्तरं = राजदर्शनात् + अनन्तरम्
(13) वेत्ति = वेत् + इति
(14) राजलक्ष्मीरुवाच = राजलक्ष्मीः + उवाच
(15) चार्द्धं = च + अर्धम्
(16) बहिर्नगरादालोकिता = बाहिः + नगरात् + आलोकिता
(17) कापि = का + अपि
(18) प्रत्युवाच = प्रति + उवाच
(19) राजलक्ष्मीरस्मि = राजलक्ष्मीः + अस्मि
(20) स्थास्यामीति = स्थास्यामि + इति
(21) भुजच्छायायां = भुजः + छायायाम्
(22) अस्त्यत्र = अस्ति + अत्र
(23) कश्चिदुपायः = कश्चित् + उपायः

पृष्ठम् 121: प्रश्नानि

5. अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि (रेखांकनम्) केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत –
यथा – अहं “भवतः” सेवायां नियोजितः । → राज्ञे (चतुर्थी विभक्ति – ‘के लिए’)

(क) ततः “असौ” तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः ।
उत्तरम्: अस्मात् (पञ्चमी विभक्ति)

(ख) तत् “अहम्” अपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य ।
उत्तरम्: अहम्  (प्रथमा विभक्ति)

(ग) चिरम् “एतस्य” भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि ।
उत्तरम्: एतस्य 

(घ) “सा” चातीव दुःसाध्या ।
उत्तरम्: सा (प्रथमा विभक्ति)

(ङ) किं “ते” वर्तनम् ?
उत्तरम्: ते (चतुर्थी विभक्ति)

6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत –
(क) राजलक्ष्मीः वदति यत् यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु त्यजति तदा सा पुनः शूद्रकस्य समीपे स्थास्यति।

उत्तरम्: परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥

(ख) राजा शूद्रकः प्रथमं वीरवरस्य वृत्त्यर्थं प्रार्थनां न स्वीकरोति।
उत्तरम्: कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥

(ग) एकदा कोऽपि वीरवरः नाम राजपुत्रः वृत्तिं प्राप्तुं राज्ञः शूद्रकस्य समीपं गच्छति।
उत्तरम्: कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥

(घ) सः तस्य कर्तव्यनिष्ठां साक्षात् पश्यति।
उत्तरम्: यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्।
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥

(ङ) राजा मन्त्रिणां मन्त्रणया वीरवराय वृत्तिं यच्छति।
उत्तरम्: कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥

पृष्ठम् 122: प्रश्नानि

7. अधोलिखितानां वाक्यानां पदच्छेदं कुरुत-
यथा – अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्।
अथ एकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मात् अपि देशात् राजद्वारम् उपागच्छत्।

(क) वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि ।
पदच्छेदः वृत्त्यर्थम् आगतः राजपुत्रः अस्मि।

(ख) अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन ।
पदच्छेदः अथ एकदा कृष्णचतुर्दश्याम् अर्धरात्रे सः राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिम् कञ्चन।

(ग) तदहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य निरूपयामि च किमेतदिति ।
पदच्छेदः तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतः अस्य निरूपयामि च किम् एतत् इति।

(घ) अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति।
पदच्छेदः अस्ति अत्र कश्चित् उपायः येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति।

(ङ) एकैवात्र प्रवृत्तिः सा चातीव दुःसाध्या ।
पदच्छेदः एका एव अत्र प्रवृत्तिः सा च अतीव दुःसाध्या।

9. को डस्कू ? को डस्कू ? को डस्कू ? – Textbook Solutions

पृष्ठम् 104: प्रश्नानि

1. अधोलिखितान् प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरत —
(क) शुकरूपं कः धृतवान्? 
उत्तरम्: धन्वन्तरिः 

(ख) धन्वन्तरिः (शुकः) कुत्र उपविश्य ध्वनिम् अकरोत्? 
उत्तरम्: वृक्षे 

(ग) अन्ते शुकः कस्य आश्रमस्य समीपं गतवान्? 
उत्तरम्: वाग्भटस्य 

(घ) ऋतवः कति सन्ति? 
उत्तरम्: षट् 

(ङ) वाग्भटः शुकस्य रहस्यं केभ्यः उक्तवान्? 
उत्तरम्: शिष्येभ्यः

2. पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत  —

(क) _______ जनाः कथं निरामयाः भवन्ति?
(ख) अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य ________ गतवान्।
(ग) तव उत्कृष्टेन ________ अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि।
(घ) महर्षेः _______ नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः।
(ङ) लघुद्रव्याणि _______ सेवनेन हानिकराणि जायन्ते।

उत्तरम्:
(क) भारतवर्षे जनाः कथं निरामयाः भवन्ति?
(ख) अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्।
(ग) तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि।
(घ) महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः।
(ङ) लघुद्रव्याणि अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते।

3. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत —
(क) मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः किम् अकरोत्? 
उत्तरम्: मधुरां वाणीं श्रुत्वा वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्। 

(ख) वाग्भटः झटिति किम् अकरोत्?
उत्तरम्: वाग्भटः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान्। 

(ग) छात्राः पुनः जिज्ञासया आचार्यं किम् अपृच्छन्? 
उत्तरम्: छात्राः पुनः आचार्यं अपृच्छन् – “हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् इति – एतेषां कः आशयः?” 

(घ) भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण किं प्रदत्तवान्? 
उत्तरम्: भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशम् दत्तवान्। 

(ङ) ऋषयः नित्यं कां प्रार्थनां कुर्वन्ति? 
उत्तरम्: ऋषयः नित्यं “सर्वे भवन्तु सुखिनः…” इत्यादि प्रार्थनां कुर्वन्ति। 

पृष्ठम् 105: प्रश्नानि

4. पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चिन्त्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —

उत्तरम्:


5. पाठं पठित्वा अधोलिखितपट्टिकातः पदानि चित्वा उचितसञ्चिकायां पूरयत —

उत्तरम्:


पृष्ठम् 106: प्रश्नानि

6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत —
(क) अस्माभिः नित्यं व्यायामः, स्नानं, दन्तधावनं, बुभुक्षायाञ्च भोजनं कर्तव्यम्।
उत्तरम्: अस्माभिः नित्यकाले व्यायामः, स्नानम्, दन्तधावनं च कर्तव्यं, बुभुक्षायां भोजनं च आवश्यकं।

(ख) अस्माभिः हितकरः आहारः सेवनीयः येन विकाराणां शमनं स्वास्थ्यस्य च रक्षणं भवेत्।
उत्तरम्: येन विकाराणां शमनं स्वास्थ्यस्य च रक्षणं भवति, तादृशः हितकरः आहारः अस्माभिः सेवनीयः।

(ग) ऋतोः अनुसारं भोजनेन बलस्य वर्णस्य च अभिवृद्धिः भवति।
उत्तरम्: ऋतूनां अनुसारं भोजनं कुर्वन् जनः बलवर्णयोः अभिवृद्धिं प्राप्नोति।

8. पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम् – Textbook Solutions

पृष्ठम् 90: प्रश्नानि

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत-
(क) अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति? 
उत्तरम्: अष्टाविंशतिः 

(ख) प्राचीनेतिहासे का स्वाधीनाः आसन्? 

उत्तरम्: सप्तभगिन्यः

(ग) केषां समवायः ‘सप्तभगिन्यः’ इति कथ्यते? 

उत्तरम्: अष्टराज्यानाम् 

(घ) अस्माकं देशे कति केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति? 

उत्तरम्: अष्ट 

(ङ) सप्तभगिनी-प्रदेशे कः उद्योगः सर्वप्रमुखः? 

उत्तरम्: वंशोद्योगः 

2. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत –
(क) भ्रातृसहित-भगिनीसप्तके कानि राज्यानि सन्ति? 
उत्तरम्: अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरम्, मिजोरमः, मेघालयः, नागालैण्डं, त्रिपुरा च भगिन्यः; सिक्किमः भ्राता अस्ति।

(ख) इमानि राज्यानि सप्तभगिन्यः इति किमर्थं कथ्यन्ते?
उत्तरम्: एतेषां सामाजिक-सांस्कृतिक-साम्यं च भौगोलिकवैशिष्ट्यं च दृष्ट्वा, एतानि सप्तभगिन्यः इति कथ्यन्ते।

(ग) ऐशान्यकोणप्रदेशेषु के निवसन्ति?
उत्तरम्: गारो-खासी-नागा-मिजो-लेप्चा-प्रभृतयः जनजातीयाः ऐशान्यप्रदेशेषु निवसन्ति।

(घ) पूर्वोत्तरप्रादेशिकाः केषु निष्णाताः सन्ति?
उत्तरम्: पूर्वोत्तरप्रादेशिकाः स्वलीलाकलासु च पर्वपरम्परासु च निष्णाताः सन्ति।

(ङ) वंशवृक्षवस्तूनाम् उपयोगः कुत्र क्रियते?
उत्तरम्: सप्तभगिनीप्रदेशेषु वंशवृक्षवस्तूनाम् उपयोगः वस्त्राभूषणगृहनिर्माणेषु क्रियते।

पृष्ठम् 91: प्रश्नानि

3. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृति-प्रत्ययविभागं कुरुत-
यथा – गन्तुम्  =  गम + ‘तुमुन्
(क) ज्ञातुम्  ___________ + ___________
(ख) विश्रुतः ___________ + ___________
(ग) अतिरिच्य ___________ + ___________
(घ) पठनीयम् ___________ + ___________
उत्तरम्:
गन्तुम् = गम् (प्रकृति) + तुमुन् (प्रत्यय)
(क) ज्ञातुम् = ज्ञा + तुमुन्
(ख) विश्रुतः = श्रु + क्त (वि + पूर्वसर्ग)
विश्रुतः = वि (उपसर्ग) + श्रु (धातु) + क्त (कृदन्त प्रत्यय)
(ग) अतिरिच्य = ऋच् + अतिच (उपसर्ग) + यङ् (प्रत्यय)
अतिरिच्य = अति (उपसर्ग) + ऋच् (धातु) + ल्यप् (कृदन्त प्रत्यय)
(घ) पठनीयम् = पठ् + णीय

4. रेखाङ्कितम् पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(क) वयं स्वदेशस्य राज्यानां विषये ज्ञातुमिच्छामः । 
प्रश्नः – कस्य देशस्य राज्यानां विषये यूयं ज्ञातुमिच्छथ? 

(ख) सप्तभगिन्यः प्राचीनेतिहासे प्रायः स्वाधीनाः एव दृष्टाः | 
प्रश्नः – प्राचीनेतिहासे के स्वाधीनाः का: दृष्टाः? 

(ग) प्रदेशेऽस्मिन् हस्तशिल्पानां बाहुल्यं वर्तते । 
प्रश्नः – प्रदेशे कस्यानां बाहुल्यं वर्तते? 

(घ) एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थं स्वर्गसदृशानि । 
प्रश्नः – एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थं किमसदृशानि सन्ति? 

5. यथानिर्देशम् उत्तरत
(क)  महोदये ! मम भगिनी कथयति। अत्र ‘मम’ इति सर्वनामपदं कस्यै प्रयुक्तम् ?
उत्तरम्: ‘मम’ इति सर्वनामपदं ‘भगिन्यै’ प्रयुक्तम्।

(ख) सामाजिक-सांस्कृतिकपरिदृश्यानां साम्याद् इमानि उक्तोपाधिना प्रथितानि। अस्मिन् वाक्ये ‘प्रथितानि’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
उत्तरम्: अत्र ‘इमानि’ इति कर्तृपदम् अस्ति।

(ग)  एतेषां राज्यानां पुनः सङ्घटनं विहितम्। अत्र ‘सङ्घटनम्’ इति कर्तृपदस्य क्रियापदं किम् ?
उत्तरम्: ‘विहितम्’ इति क्रियापदं अस्ति।

(घ) अत्र वंशवृक्षाणां प्राचुर्यं विद्यते। अस्मात् वाक्यात् ‘अल्पता’ इति पदस्य विपरीतार्थकं पदं किम् ?
उत्तरम्: ‘प्राचुर्यम्’ इति विपरीतार्थकं पदं अस्ति।

(ङ) क्षेत्रपरिमाणैः इमानि लघूनि वर्तन्ते। अस्मिन् वाक्ये ‘सन्ति’ इति क्रियापदस्य समानार्थकं पदं किम् ?
उत्तरम्: ‘वर्तन्ते’ इति समानार्थकं क्रियापदं अस्ति।

पृष्ठम् 92: प्रश्नानि

6. अधः शब्दजालं प्रदत्तम् अस्ति । अस्मिन् उपरितः अधः वामतः दक्षिणं चेति आधारं कृत्वा सार्थक शब्दान् रेखाङ्कयत-

उत्तरम्:
जनजातिः
खासी
नागा
मिजोरमः
संस्कृतिः
पूर्वोत्तरम्
देशस्य
भगिन्यः
गारो
प्राकृतिकः
वंशवृक्षः
अरुणाचलः
मेघालयः
भ्राता
भिन्निः

पृष्ठम् 93: प्रश्नानि
7. पट्टिकातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-

(क) छात्राः अद्य ____________ विषये ज्ञातुमिच्छन्ति।
(ख) अस्माकं देशे ____________ राज्यानि तथा अष्ट केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति।
(ग) सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च इति ____________ कथ्यन्ते।
(घ) सप्तभगिन्यः इत्युक्तानि राज्यानि –
 ____________, ____________, ____________, ____________, ____________, ____________, ____________।
(ङ) प्रदेशेऽस्मिन् ____________ बाहुल्यम् अस्ति।
(छ) पूर्वोत्तरराज्येषु वंशवृक्षाणां ____________ विद्यते।
उत्तरम्:
(क) छात्राः अद्य स्वदेशस्य राज्यानाम् विषये ज्ञातुमिच्छन्ति।
(ख) अस्माकं देशे अष्टाविंशतिः राज्यानि तथा अष्ट केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति।
(ग) सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च इति पूर्वोत्तरराज्यानि कथ्यन्ते।
(घ) सप्तभगिन्यः इत्युक्तानि राज्यानि – अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरं, मिजोरमः, मेघालयः, नागालैण्डं, त्रिपुरा च।
(ङ) प्रदेशेऽस्मिन् जनजातिः बाहुल्यम् अस्ति।
(छ) पूर्वोत्तरराज्येषु वंशवृक्षाणां प्राचुर्यम् विद्यते।

8. भिन्नप्रकृतिकं पदं चिनुत-
(क) गच्छति, पठति, धावति, अहसत्, क्रीडति
उत्तरम्: अहसत्

(ख) छात्रः, सेवकः, शिक्षकः, लेखिका, क्रीडकः
उत्तरम्: लेखिका

(ग) पत्रम्, मित्रम्, पुष्पम्, आम्रः, फलम्
उत्तरम्: आम्रः

(घ) व्याघ्रः, भल्लूकः, गजः, कपोतः, शाखा, वृषभः, सिंहः
उत्तरम्: शाखा

(ङ) पृथिवी, वसुन्धरा, धरित्री, यानम्, वसुधा
उत्तरम्: यानम्

पृष्ठम् 94: प्रश्नानि

9. विशेष्य- विशेषणानाम् उचितं मेलनं कुरुत
उत्तरम्: