10. सत्रमिते वरं त्याग: (क-भाग:) – Chapter Notes

परिचय

यह पाठ हितोपदेश नामक प्रसिद्ध नीति-ग्रंथ से लिया गया है। इसमें वीरवर नामक राजपुत्र की कथा वर्णित है। वीरवर ने शत्रु-राजा शूद्र की सेवा स्वीकार की, परंतु उसका जीवन त्याग, परोपकार और राष्ट्रभक्ति का आदर्श बना। इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना सर्वस्व त्यागना ही सच्चा धर्म है।

पाठ का सार

नगर और राजा

आसीत् शोभावती नाम नगरी। 
तत्र शूद्रः नाम महापराक्रमी राजा वसति स्म।

एक नगर था जिसका नाम शोभावती था। वहाँ शूद्र नामक बलशाली और पराक्रमी राजा रहता था।

वीरवर का आगमन

अथैदा वीरवरनाम राजपुत्रः वकृत्यर्थं राजद्वारमुपागच्छत्। 
सः स्वपत्नी वेदरता, सुतः शक्तधरः, कन्या वीरवती च सह आगतः।

उसी समय वीरवर नामक राजपुत्र अपनी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तधर और पुत्री वीरवती के साथ आजीविका के लिए राजद्वार पर आया।

राजा से भेंट

वीरवरः – भोः प्रतिहार! वकृत्यर्थमागतोऽस्मि, आनय माम्।

वीरवर ने द्वारपाल से कहा – “मैं सेवा हेतु आया हूँ, मुझे राजा के पास ले चलो।”

राजा – किं ते वर्तनम्? वीरवरः – प्रतिदिनं चतुश्शतं सुवर्णमुद्राः।

राजा ने पूछा – “तुम्हें कितना वेतन चाहिए?” वीरवर ने कहा – “प्रतिदिन चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ।”

राजा – नैतत् शक्यम्!

राजा बोला – “यह संभव नहीं।”

मन्त्री की सलाह और नियुक्ति

मन्त्री – देव! प्रथमं परीक्ष्यतामस्य स्वरूपम्, ततः एव वेतनं दातव्यम्।

मन्त्री ने कहा – “हे महाराज! पहले इसके आचरण और योग्यता की परीक्षा होनी चाहिए, फिर वेतन दिया जाए।”

ततः ताम्बूलदानादिना राजा तं नियुक्तवान्। 
वीरवरः प्रतिदिनं वेतनं लब्ध्वा देवभ्यः अर्धं यच्छति स्म, शेषं दरिद्रभ्यः ददाति, पत्न्याः भोजनविलासे व्ययति च।

फिर राजा ने उसे नियुक्त कर लिया। 
वीरवर वेतन पाकर उसका एक भाग देवताओं को अर्पित करता, कुछ दरिद्रों को देता और शेष घर पर भोजन में लगाता।

मध्यरात्रि का रोदन

कृष्णचतुर्दश्यामधिरात्रे राजा श्रुतवान् रुणरोदनध्वनिम्।

एक दिन कृष्णचतुर्दशी की रात राजा ने रोने की ध्वनि सुनी।

राजा – कः अत्र? वीरवरः – सेवकः वीरवरः। 
राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!

राजा ने पूछा – “कौन है वहाँ?” वीरवर ने उत्तर दिया – “मैं सेवक वीरवर हूँ।” 
राजा ने कहा – “जाकर इस रोदन का कारण पता करो।”

राजलक्ष्मी का वचन

वीरवरः – का त्वम्? राजलक्ष्मीः – अहं अस्य शूद्रराजस्य राजलक्ष्मीः। 
तृतीये दिने अपराधे राजा मरणं प्राप्स्यति, तदा अहं न स्थास्यामि।

वीरवर ने रो रही सुन्दरी से पूछा – “आप कौन हैं?” उसने उत्तर दिया – “मैं इस शूद्रराजा की राजलक्ष्मी हूँ। 
तीसरे अपराध पर यह राजा मर जाएगा और तब मैं यहाँ से चली जाऊँगी।”

वीरवरः – अस्त्यत्र कश्चिदुपायः?

वीरवर ने पूछा – “क्या कोई उपाय है जिससे आप स्थिर रह सकें और स्वामी जीवित रह सके?”

राजलक्ष्मीः – यदि त्वं स्वस्य सर्वस्वं त्यक्त्वा सदा प्रसन्नमुखेन सर्वमङ्गलायै उपहारं करिष्यसि, तदा शूद्रराजः शतवर्षं जीवेत।

राजलक्ष्मी ने कहा – “यदि तुम अपना सर्वस्व त्याग कर प्रसन्न मुख से सर्वमंगल देवी को अर्पित करोगे तो शूद्रराजा सौ वर्ष तक जीवित रहेगा।”

शब्दार्थ

  • महापराक्रमी – अत्यन्त बलशाली
  • नानाशास्त्रवित् – अनेकों शास्त्रों का ज्ञाता
  • प्रतिहारः – द्वारपाल
  • वर्तनम् – वेतन
  • उपपन्नम् – उपयुक्त, उचित
  • धृतायतुधः – शस्त्रधारी
  • रुणरोदनध्वनिः – रोने की ध्वनि
  • अनाथा – बिना रक्षक
  • दुष्साध्या – कठिनाई से सम्भव

व्याकरण बिन्दु

  • वाक्यान्वयः – संस्कृत साहित्य में पदक्रम विशेष प्रकार से बदला जाता है, जैसे –
    • सामान्य क्रमः – रामः वनं गच्छति।
    • साहित्य क्रमः – वनं गच्छति रामः।
  • भूतकाल प्रयोगः – उपागच्छत, अनयत, श्रुतवान् इत्यादि।

9. को डस्कू ? को डस्कू ? को डस्कू ? – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय आयुर्वेद और स्वास्थ्य-नियमों पर आधारित है। इसमें वाग्भट नामक वैद्य और भगवान् धन्वन्तरि की कथा दी गई है। भगवान् धन्वन्तरि ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ कहते हुए प्रकट होते हैं और उसके रहस्य को समझाया जाता है। इसमें बताया गया है कि मनुष्य को स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए किस प्रकार का भोजन करना चाहिए — हितभुक् (स्वास्थ्यकर भोजन करने वाला), मितभुक् (मर्यादा में भोजन करने वाला) और ऋतुभुक् (ऋतु के अनुसार भोजन करने वाला)। साथ ही, इसमें आहार के प्रकार, ऋतु-नियम, और सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहार की व्याख्या दी गई है। अंत में श्लोकों और व्यावहारिक उपदेशों द्वारा स्वास्थ्य-संबंधी संदेश दिए गए हैं।

पाठांशप्रारम्भिक संवाद

“अम्ब ! महती बभुकु्धा बाधते, शीघ्रं भोजनं परिवेषयतु। 
… उष्णं भोजनं सहस्रं न भवति” इति आयुर्वेद उपदेशः।

 अर्थ: बालक अपनी माता से कहता है कि उसे बहुत भूख लगी है और शीघ्र भोजन परोसा जाए। माता बताती है कि अधिक गर्म भोजन खाने से मुख में जलन होती है। इसलिए आयुर्वेद कहता है कि अत्यधिक गर्म भोजन कभी लाभकारी नहीं होता।

भगवान् धन्वन्तरिः का आगमन

“भाषितवः वैदाः सर्वसन्तानानां व्याधीनां शमनं कुर्युः” इति ज्ञातुं भगवान् धन्वन्तरिः भ्रमणं कुर्वन् ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ इति शब्दं उच्चैः श्रावयन्”।

अर्थ : भगवान धन्वन्तरि मनुष्य-रूप धारण कर घूमते हुए बार-बार पूछते थे — “कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?” (कौन अरोग्य है? कौन स्वस्थ है?)।

वाग्भट और धन्वन्तरिः का संवाद

“वाग्भटः मनोहारीं तरुमूलां शुकं दृष्ट्वा चिन्तितवान् — एषः न साधारणः पक्षी, अवश्यं देवविशेषः”।
शुकः पुनः उच्चैः शब्दं करोति — “कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?”।
ततः धन्वन्तरिः त्रयमुत्तरं दत्तवान् — 
हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्।

अर्थ : वाग्भट वैद्य ने देखा कि यह पक्षी साधारण नहीं है। भगवान् धन्वन्तरि ने उत्तर दिया — वही मनुष्य अरोग्य है जो हितकर भोजन करता है, मर्यादित मात्रा में भोजन करता है, और ऋतु के अनुसार भोजन करता है।

श्लोक एवं व्याख्या

(१) “तच्च हितं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुतिष्ठते।
अजतानां च सर्वेषां अनुत्पत्तिकरं च यत्॥”

अर्थ :वही भोजन उचित है जिससे स्वास्थ्य ठीक रहे और जो नए रोग उत्पन्न न करे।

() “अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चासमेवने।
गुरुलाघवे द्रव्याणाम् मात्रायाः अनुसारितम्॥”

अर्थ : भारी (कठिन पचने वाले) पदार्थ अल्प मात्रा में और हल्के पदार्थ उचित मात्रा में ही लेने चाहिए।

(३) “तस्मात् हितं यदन्नं स्यात् बलवर्णकरं तथा।
ऋतुनां चानुसार्यं तदन्नं साधु भोजनम्॥”

अर्थ: जो आहार ऋतु के अनुकूल हो, वह बल, वर्ण और आयु बढ़ाता है।

(४) “व्यायामः प्रातरुत्थाय स्नानं शुद्धोदकेन च।
बुभुक्षायां च भोजनं हितं चान्नं प्रयोक्तव्यम्॥”

अर्थ: प्रातः उठकर व्यायाम करना चाहिए, शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए और जब भूख लगे तभी हितकर भोजन करना चाहिए।

(५) “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥”

अर्थ  सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब शुभ देखें और कोई भी दुःख न पाए।

आहार के प्रकार (गीता के आधार पर)

  • सात्त्विक आहार : आयुष्यमान, बलवर्धक, सुखद, रोगनाशक, रसयुक्त, मधुर, स्निग्ध।
  • राजसिक आहार : अत्यधिक तिक्त, अम्ल, लवण, उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष, विदाहकारक; रोग उत्पन्न करने वाले।
  • तामसिक आहार : बासी, दुर्गंधयुक्त, अतिपक्व, पुनः गरम किया हुआ, अस्वच्छ — यह आलस्य, निद्रा और रोग बढ़ाता है।

व्याकरणिक अंश

  • विशेषण – विशेष्य सम्बन्ध उदाहरण सहित।
  • शब्दरूप अभ्यास (उत्तम, मनोहरि, सर्वस्मत, उत्कृष्ट, एक)।

8. पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम् – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक महत्व का परिचय कराता है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम – इन आठ राज्यों को मिलाकर “अष्टभगिनी राज्य” कहा जाता है। इन राज्यों की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, जनजातियाँ, वंशवृक्ष (बाँस), त्यौहार और जीवनशैली पूरे भारत को समृद्ध बनाते हैं। यह पाठ विद्यार्थियों को भारत के कोने-कोने के सौंदर्य और एकता में विविधता की झलक दिखाता है।पाठ्यांश और भावार्थ१. प्रारम्भिक परिचय

अरुणाचलप्रदशेः, असमः, मणिपुरं, मेघालयः, मिजोरमः, नागालैण्डं, त्रिपुरा एवञ्च सिक्किमः इत्येतानि अष्टराज्यानि देशस्य पूर्वोत्तरभागे स्थितानि। 
एतानि राज्यानि भारतस्य केवलं स्थानविशेषत्वेन न, अपितु सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-विविधतायाः कारणेन विशेषमहत्त्वं वहन्ति।

अर्थ: अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम – ये आठ राज्य भारत के पूर्वोत्तर भाग में स्थित हैं। ये केवल स्थान की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विविधता के कारण भी विशेष महत्त्व रखते हैं।२. सप्तभगिनी एवं एक भ्रातासंस्कृत श्लोक

अद्वं मतं चैव नगपत्मुकं तथाद्वं।
सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मतम्॥
तेनुक्तो लघवः भ्रातया सशक्तमाः इति प्रसिद्धाः।
पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्॥

अर्थ: असम, अरुणाचल, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, नागालैंड और त्रिपुरा – इन सात राज्यों को “सप्तभगिनी” कहा जाता है और सिक्किम को ‘एक भ्राता’ कहा जाता है। इसलिए ये “सप्तभगिनी एक भ्राता” नाम से प्रसिद्ध हैं।

३. ऐतिहासिक स्थिति

भारत सह इमाः सप्तभगिन्यः प्राचीनइतिहासे प्रायः स्वाधीनाः एव दृष्टाः। 
न केनचित् शासकेन इमाः सर्वायत्तीकृताः।

अर्थ: भारत के इतिहास में ये सात भगिनी राज्य प्रायः स्वतंत्र ही देखे गए। इन्हें किसी भी शासक ने अपने अधीन नहीं किया।

४. सांस्कृतिक विशेषताएँ

पर्वत-कृषि-पशुप-प्रकृतिभ्यः प्राकृतिकसम्पद्भ्यः समृद्धानि सन्ति। 
गारो-खासी-नागा-लेपचा-प्रभृतयः जनजातयः अत्र निवसन्ति। 
विविधभाषाभिः समन्विताः, व्यापारपरम्पराभिः समृद्धाः, कलासु निपुणाः च सन्ति।

अर्थ: यह क्षेत्र प्राकृतिक सम्पदाओं से समृद्ध है। यहाँ गारो, खासी, नागा, लेपचा आदि अनेक जनजातियाँ रहती हैं। ये लोग अनेक भाषाओं में बोलते हैं, व्यापार और त्योहारों की परम्पराओं से सम्पन्न हैं और विभिन्न कलाओं में निपुण हैं।

५. बाँस का महत्त्व

प्रदेशेषु हस्तशिल्पानां बाहुल्यं विद्यते। 
आवासाभरणेभ्यः गृहनिर्माणपर्यन्तं वंशवृक्षिणां (बाँस) उपयोगः क्रियते।

अर्थ: यहाँ हस्तशिल्प की बहुत अधिकता है। घर बनाने से लेकर आभूषणों तक में बाँस का उपयोग होता है। बाँस यहाँ के लोगों के जीवन का अभिन्न अंग है।

६. राज्यों का संक्षिप्त परिचय

  • अरुणाचल प्रदेश – यहाँ भारत का प्रथम सूर्योदय होता है, इसलिए नाम पड़ा “अरुणाचल”।
  • असम – प्राचीन नाम “कामरूप”। यहाँ तेल, प्राकृतिक गैस, और प्रसिद्ध माजुली नदीद्वीप है।
  • मेघालय – गारो, खासी और जयन्तिया पहाड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। यहाँ कोयला, चूना-पत्थर आदि खनिज मिलते हैं।
  • मणिपुर – महाभारत और पुराणों में इसका उल्लेख है। यहाँ लोकटक झील पर तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है।
  • मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, सिक्किम – प्रत्येक राज्य की अपनी भाषा, संस्कृति और त्योहार हैं, जो इन्हें विशेष बनाते हैं।

7. मञ्जुलमञ्जुषा सुन्दरसुरभाषा – Chapter Notes

परिचय

यह अध्याय संस्कृत भाषा की महिमा का परिचय कराता है। संस्कृत को देववाणी, सभ्य भाषाओं की जननी, साहित्य का आधार तथा ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका कहा गया है। इसमें श्लोकों के माध्यम से बताया गया है कि संस्कृत न केवल सौंदर्य और माधुर्य से परिपूर्ण है, बल्कि यह मानव-जीवन, साहित्य, विज्ञान और दर्शन को भी आलोकित करती है।

श्लोक १

मूल श्लोकः
मुनिवरनवकनितकनववरनवलनित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा ।
अनिमातसत्त्व पोषणक्षमता
मम वच्यातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥१॥

  • पदच्छेदः – मुनिवर-नवकनित-नववर-नवलनित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे माते! तव पोषणक्षमता मम वच्यातीता, सुन्दरसुरभाषा (असि)।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत भाषा अत्यन्त सुन्दर है।
    • यह देवभाषा कहलाती है।
    • मुनियों ने इसके द्वारा गवेषणाएँ कीं और ग्रन्थों की रचना की।
    • संस्कृत अन्य भाषाओं की जननी है।
    • इसके शब्द कोमल और सम्पूर्ण हैं।
    • संस्कृत अन्य भाषाओं का पोषण करती है।

श्लोक २

मूल श्लोकः
वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः कृतानि
कालिदास-बाणकविभिः रचितानि ।
पौराणिक-सामान्य-जीविनाम् आशा
सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥

  • पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः कालिदास-बाणकविभिः पौराणिक-सामान्य-जीविनाम् आशा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! तव आश्रयेण वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनिभिः रचितानि, कालिदास-बाणकविभिः रचितानि, पौराणिक-सामान्यजीविनाम् आशा असि।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत रमणीय भाषा है।
    • वेदव्यास ने महाभारत, वाल्मीकि ने रामायण रची।
    • कालिदास, बाणभट्ट आदि कवियों ने साहित्य की अमूल्य धरोहर दी।
    • प्राचीन काल से आज तक संस्कृत सामान्य जन के जीवन में आशा का संचार करती रही है।

श्लोक ३

मूल श्लोकः
श्रुतिसुखनिर्दे कलप्रमोदे
समस्मृतिवर्द्धे सरसविनोदे ।
गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे
तव संस्कृतिः एषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥

  • पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिदे कलप्रमोदे स्मृतिवर्द्धे सरसविनोदे गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! श्रुतिसुखनिदे! कलप्रमोदे! स्मृतिवर्द्धे! सरसविनोदे! गतिमत-मनः-प्रेरक-काविविशारदे! तव एषा संस्कृतिः अस्ति।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत सुनने में मधुर और आनन्दप्रद है।
    • यह कला और संस्कृति का विकास करती है।
    • स्मृति और विवेक को बढ़ाती है।
    • सरस विनोद का अनुभव कराती है।
    • यह साहित्य और काव्य की प्रेरणा है।
    • यह मानव-जीवन में उत्तम मार्गदर्शन देती है।

श्लोक ४

मूल श्लोकः
रस-रुचिरालङ्कृत-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा ।
वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः
विज्ञैः धरा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥

  • पदच्छेदः – रस-रुचिरा अलङ्कृत-धारा वेदविषय-वेदान्तविचारा वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः विज्ञैः धरा सुन्दरसुरभाषा ।
  • अन्वयः – हे सुन्दरसुरभाषे! रस-रुचिरा अलङ्कृत-धारा, वेदविषय-वेदान्तविचारा, वैद्य-खगोल-शास्त्रादि-विहाराः धरा (असि)।
  • भावार्थः (हिन्दी में)
    • संस्कृत में शृंगार, हास्य, रौद्र, वीर आदि सभी रस विद्यमान हैं।
    • शब्दों की अलंकारयुक्त धारा इसे और समृद्ध बनाती है।
    • वेद, उपनिषद्, वेदान्त और पुराणों के विचार इसमें समाहित हैं।
    • आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, खगोल आदि शास्त्र संस्कृत में रचे गए।
    • इस प्रकार संस्कृत सर्वत्र प्रतिष्ठित है।

शब्दार्थ (संग्रह से)

  • मञ्जुल = मोहक
  • मञ्जूषा = पेटिका, संचित निधि
  • सुन्दरसुरभाषा = देवभाषा संस्कृत
  • पोषणक्षमता = पालन-पोषण करने की शक्ति
  • वच्यातीता = वाणी से परे
  • श्रुतिसुख = सुनने में आनन्ददायक
  • सरसविनोद = हृदय को आनन्द देने वाला
  • रस-रुचिर = रसों से युक्त
  • अलङ्कृतधारा = अलंकारों से सुसज्जित धारा

व्याकरण (समास का विवेचन)

  • मातुः भूमि = मातृभूमिः
  • सुराणां भाषा = सुरभाषा
  • पोषण + क्षमत्वम् = पोषणक्षमत्वम्
  • वच्यम् अतीतम् = वच्यातीतम्
  • विरसैः रुचिरा = विरसरुचिरा
  • वेद + विषय = वेदविषयः
  • खगोल + शास्त्रम् = खगोलशास्त्रम्

6. डिजिभारतम् – युगपरिवर्तनम् – Chapter Notes

परिचय

आज का युग सूचना-प्रौद्योगिकी का युग है। भारत ने ‘डिजिटल भारत अभियान’ द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अनेक प्रगति की है। शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों में डिजिटल साधनों का प्रयोग हो रहा है। इस अध्याय में विद्यार्थियों के माध्यम से डिजिटल भारत की झलक, उसके लाभ तथा सावधानियों का वर्णन किया गया है। यह अध्याय हमें बताता है कि किस प्रकार डिजिटल क्रांति ने जीवन को सरल और सुलभ बना दिया है।

पाठ्यांशसंग्रहालय-दर्शनम्

अस्माकं देशः भारतं न केवलं सांस्कृतिके क्षेत्रे समृद्धम्, अपि तु नूतनैः आविष्कारैः कीर्तिं लभते। अद्य सम्पूर्णश्रियं ‘डिजिटल-भारतम्’ इत्यस्य चिह्नेन ज्ञायते।

भावार्थः हमारा देश भारत न केवल संस्कृति में महान है बल्कि आधुनिक आविष्कारों से भी प्रसिद्ध है। आज सम्पूर्ण विश्व भारत को ‘डिजिटल भारत’ के नाम से पहचान रहा है।

प्रधान–मन्त्री–संग्रहालये अनुभवः

सर्वे छात्राः – अद्भुतं महोदय! अत्र होलोग्राम-द्वारा प्रधानमन्त्रिणः भाषणं श्रूयते, दृश्यते च।

भावार्थः सभी छात्र आश्चर्य से कहते हैं कि यहाँ होलोग्राम के माध्यम से प्रधानमन्त्री का भाषण सुनाई और दिखाई दे रहा है।

नूतन-प्रौद्योगिक्याः परिचयः

अथर्वः – अत्र ‘वर्धिता-वास्‍तवता’ (AR), ‘आभासीया-वास्‍तवता’ (VR) च उपकरणानि अपि सन्ति।

भावार्थः यहाँ ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) और वर्चुअल रियलिटी (VR) जैसी तकनीकों के उपकरण भी हैं। इनके माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

दैनन्दिन-जीवने डिजिटलस्य प्रभावः

अध्यापकः – अस्माकं दैनन्दिनं जीवनं ‘डिजिटल’ इत्यनेन परिवर्तितं भवति।

भावार्थः अध्यापक कहते हैं कि हमारा दैनिक जीवन डिजिटल साधनों से प्रभावित और परिवर्तित हो गया है।

विविध-क्षेत्रेषु प्रयोगः

  • शासनम् : डिजिटल-लॉकर, ई-गवर्नेंस मंच (UMANG, My-Gov, GeM), Cowin इत्यादि।
  • स्वास्थ्यसेवा : ई-संजीवनी, आरोग्य-सेतु, Cowin इत्यादयः।
  • शिक्षा : दीक्षा, स्वयं, स्वयं-प्रभा, ई-पाठशाला, पीएम ई-विद्या।
  • कृषि : ई-नाम, पीएम किसान योजना।
  • वित्तीय समावेशनम् : UPI, रूपे कार्ड, ई-रूपी, जनधन योजना।

भावार्थ: इन सबके माध्यम से शासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और वित्तीय क्षेत्र में नई क्रांति आई है।

वाणिज्ये प्रभावः

अध्यापकः – आभासी-पटलानां साहाय्येन आभासी-विक्रयः भवति। QR Code आधारेण विनिमयः च भवति।

भावार्थः व्यापार में अब ऑनलाइन क्रय-विक्रय होता है। क्यूआर कोड के माध्यम से भुगतान आसानी से किया जाता है।

सावधानता – साइबर सुरक्षा

अध्यापकः – अस्माभिः ‘साइबर-सुरक्षा’ विषये अपि चिन्तनीयम्।

भावार्थः हमें साइबर सुरक्षा के विषय में भी सावधान रहना चाहिए क्योंकि अनेक प्रकार के अपराध बढ़ते जा रहे हैं।

श्लोक
सर्वं शक्यं भवति शिशु-जालभारतेऽधुना।
जीर्णश्च सौकर्यं सहजं लभते जनः॥

भावार्थः आज डिजिटल भारत में सब कुछ सम्भव हो गया है। पुरानी कठिनाइयाँ अब आसानी से हल हो जाती हैं और सुविधा सबको उपलब्ध है।

व्याकरण-भागःक्त-प्रत्ययः

  • भूतकाल अथवा कर्मणि प्रयोगे प्रयुज्यते।
  • उदाहरणम् :
    • रामः पाठं अपठत् → बालकेन पाठः पठितः।

त्र-प्रत्ययः

  • वर्तमानकाले कार्यं कुर्वाणं दर्शयति।
  • केवलं परस्मैपद-धातुभिः सह प्रयोगः।
  • उदाहरणम् :
    • पठन्, गच्छन्, करण्।

5. गीता सुगीता कर्तव्या – Chapter Notes

परिचय

यह पाठ हमें श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व के बारे में बताता है। गीता का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अर्जुन को दिया था। इसमें जीवन जीने के सही मार्ग, धर्म, कर्तव्य और ज्ञान का महत्व समझाया गया है।

पाठ का प्रसंग

कुरुक्षेत्र में गीता जयंती का उत्सव मनाया जा रहा था। उसमें एक कथावाचक गीता का महत्व बता रहा था। तभी मिशेष नामक व्यक्ति ने अपने पिताजी से पूछा – “गीता क्या है और क्यों गाना चाहिए?”
तब पिता ने समझाया कि गीता भगवान कृष्ण का अमूल्य उपदेश है। इसे भक्ति और भाव से पढ़ना और गाना चाहिए।

श्लोक और भावार्थ

(१) गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥

भावार्थ: यह श्लोक हमें बताता है कि गीता सबसे श्रेष्ठ ग्रंथ है। इसे प्रेम और भक्ति के साथ पढ़ना और गाना चाहिए। अन्य शास्त्रों को पढ़ने से भी अधिक महत्व गीता का है, क्योंकि यह सीधे भगवान के मुख से निकला दिव्य उपदेश है।

(२) दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

भावार्थ: वह मनुष्य सच्चा ज्ञानी है जिसका मन दुःख में विचलित नहीं होता, जो सुख में आसक्त नहीं होता, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर स्थिर बुद्धि वाला रहता है।

(३) क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

भावार्थ: क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है, भ्रम से स्मृति जाती रहती है, स्मृति जाने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

(४) तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। 
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

भावार्थ: हे अर्जुन! गुरु के पास जाकर विनम्रतापूर्वक प्रश्न करो और सेवा करो। जो तत्वदर्शी ज्ञानी होते हैं, वे तुम्हें सही ज्ञान प्रदान करेंगे।

(५) श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

भावार्थ: श्रद्धा रखने वाला, इन्द्रियों को संयमित करने वाला और लगन से प्रयास करने वाला व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है। और ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को पा लेता है।

(६) अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

भावार्थ: जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रवत और करुणामय है, जो ‘मेरा-तेरा’ भाव से रहित और अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दुःख में समान भाव रखता है और क्षमाशील है – वही सच्चा भक्त है।

(७) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

भावार्थ: जो योगी सदैव संतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है, दृढ़ निश्चयी है, जिसने अपना मन और बुद्धि मुझमें अर्पित कर दी है, वह मेरा प्रिय भक्त है।

(८) यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥

भावार्थ: जिस मनुष्य से कोई भयभीत नहीं होता और जो स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध और भय से मुक्त रहता है – वही मेरा प्रिय भक्त है।

() अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

भावार्थ: जो वाणी बिना किसी को दुःख पहुँचाए सत्य, प्रिय और हितकारी होती है, वही वाणी तप कहलाती है। शास्त्रों का अध्ययन और अभ्यास करना भी वाणी का तप है।

निष्कर्ष

  • गीता का संदेश है कि जीवन में दुःख-सुख में समान रहना चाहिए।
  • क्रोध, भय और मोह से बचना चाहिए।
  • गुरु से सीखकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
  • भक्ति, संयम और संतोष से जीवन जीना चाहिए।
  • सत्य और मधुर वचन बोलना भी एक तप है।

4. प्रणम्य देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महानया: – Chapter Notes

परिचय

इस अध्याय में “उत्कलमणि गोपबन्धु दास” के जीवन, त्याग, समाजसेवा और देशभक्ति का वर्णन है। वे ओडिशा राज्य के महान समाजसेवक, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और लोकसेवक थे। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण जीवनशक्ति निर्धनों, बाढ़–पीड़ितों और देश की सेवा में अर्पित की। गोपबन्धु का जीवन हमें सिखाता है कि परोपकार और राष्ट्रसेवा ही सच्चा जीवन है।

(१) बाढ़ की पीड़ा और सहायता

  • ओडिशा राज्य के केन्द्रीय जनपद में महानदी में भयंकर बाढ़ आई।
  • बाढ़ से घर बह गये, अनेक लोग नदी की धारा में डूबकर मर गये।
  • लोग भूखे-प्यासे, बिना घर के दुःख भोगने लगे।
  • ऐसे समय उत्कलमणि गोपबन्धु ने अकुण्ठ सेवाभाव से पीड़ितों की सहायता की।
  • उनके कार्यों से जनता में आदर और सम्मान उत्पन्न हुआ।

(२) करुणा का भाव

  • आचार्य हरिहरदास ने एक दिन सभी अध्यापकों को भोजन हेतु आमन्त्रित किया।
  • सभी बैठे ही थे कि बाहर से एक भूखा बालक रोते हुए माँ से भोजन माँगने लगा।
  • यह देखकर गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गयीं।
  • उन्होंने तुरंत थाली उठाई और उस बालक को भोजन कराया।
  • इससे उनकी करुणा और संवेदनशीलता प्रकट होती है।

(३) जीवन परिचय एवं कार्य

  • वे साक्षीगोपाल (ओडिशा) के सुबर्णपुर ग्राम में जन्मे।
  • प्रारम्भ से ही निर्धन–सेवा और समाजसेवा में लगे रहे।
  • उन्होंने एक नि:शुल्क विद्यालय (सत्यवादी विद्यापीठ) की स्थापना की।
  • वे स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय रहे और कारावास भोगा।
  • जेल में रहते हुए उन्होंने “बन्दीर आत्मकथा”, “कारा–कविता”, “स्वप्न”, “गो–माहात्म्य”, “नचिकेता–उपाख्यान” आदि प्रेरणादायी पुस्तकें ओड़िया भाषा में लिखीं।
  • वे “समाज” नामक दैनिक समाचारपत्र के संस्थापक थे।
  • निर्धनों को अन्न, वस्त्र, आश्रय देने में वे सदैव तत्पर रहे।
  • उनका त्याग और देशप्रेम देखकर उन्हें “उत्कलमणि” (उड़ीसा का रत्न) की उपाधि दी गई।

४. गोपबन्धु के प्रेरणादायी शब्द

  • वे कहते हैं कि –
    • “देश के लिए मेरा शरीर मिट्टी में मिल जाए।”
    • “देश की आज़ादी के मार्ग में यदि मेरे शरीर की हड्डियाँ और मांस किसी काम आ जाएँ तो यह मेरे जीवन की सार्थकता होगी।”
  • उनका जीवन सम्पूर्ण देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

५. गोपबन्धु का सम्मान

  • “सत्यवादी विद्यालय”, “दरिद्रनारायण सेवा संघ”, “समाज” दैनिक पत्र आदि संस्थाओं की स्थापना की।
  • समाजसेवा और देशसेवा के कारण उन्हें “उत्कलमणि” की उपाधि से सम्मानित किया गया।

श्लोक एवं भावार्थ

श्लोक – १

भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्।
तदर्थं भोजनं कुर्याद् मा शरीरे व्ययं कुरु॥

भावार्थ: भोजन प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु जीवन को सुख देने वाला है। इसलिए जब भी भोजन मिले तो उसे ग्रहण करना चाहिए, शरीर को कष्ट देकर भोजन छोड़ना उचित नहीं है।

श्लोक – २

सर्वदेशभूमौ मम रीयायां लीनुः,
सर्वदेशलोकयात्रासिद्धये प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे तद् गह्वरमायतकया,
ममयास्थिमांसैः परिपूरणीयाः सदा॥

भावार्थ:  मेरे शरीर की अस्थियाँ सारे देश की भूमि में लीन हो जाएँ। देश के लोगों की यात्रा (देश की उन्नति) में सहायक हों। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढ़े पड़ें तो वे मेरे अस्थि-मांस से ही भरे जाएँ। यही मेरे जीवन का उद्देश्य है।

श्लोक – ३

उत्कलमतिरीत्याख्याः प्रतिपदं लोकसेवकाः।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥

भावार्थ: गोपबन्धु दास समाजसेवक और देशभक्त थे। उनके त्याग, सेवा और बलिदान के कारण जनता ने उन्हें “उत्कलमणि” की उपाधि दी। वास्तव में वे ओडिशा ही नहीं, पूरे देश के लिए पूज्य और प्रणम्य हैं।

​शब्दार्थ (चयनित)

  • जलप्लावपीडितानाम् – बाढ़ पीड़ितों का
  • नष्टान – नष्ट हुए
  • अनाहारेण – बिना भोजन के
  • अकुण्ठम् – निःसंकोच / उदार भाव से
  • समादृतः – सम्मानित
  • करुणिवचनः – करुणा से भरे वचन
  • अश्रुपूर्णः – आँसुओं से भरे नेत्र वाला
  • कारावासम् – जेलवास
  • देशसेवातत्परः – देशसेवा में तत्पर
  • उत्कलमणिः – ओडिशा की मणि (उपाधि)

3. सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु – Chapter Notes

परिचय

इस पाठ में हमें उपदेशात्मक श्लोकों के माध्यम से जीवन को सफल बनाने की दिशा में प्रेरणा दी जाती है। यह श्लोक जीवन के आदर्श रूप को प्रस्तुत करते हैं, जिसमें हमें अच्छे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। सभाषितों के माध्यम से जीवन के रहस्यों को समझना और उसे सही दिशा में लगाना, यह इस पाठ का मुख्य उद्देश्य है।सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु

सुभाषितपठनेन जीवननिर्माणाय प्रेरणा

  • सुभाषितों के पठन से आदर्श मानवजीवन निर्माण की प्रेरणा मिलती है।
  • मानवजीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों का पठन आवश्यक है।
  • जो व्यक्ति सुभाषितों का ज्ञान कार्यक्षेत्र में प्रयोग करता है, वह अनेक लाभ प्राप्त करता है।
  • सुभाषित सुंदर वचन होते हैं जो सदैव जनहित के लिए होते हैं।
  • ये स्वकर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
  • अतः सभी को सुभाषित पढ़ने चाहिए, जिससे जीवन का रहस्य समझें और सुखमय जीवन बनाएँ।

सुभाषितानि किम् ?

  • सुभाषित सुंदर और शोभन वचन हैं।
  • ये नीतिश्लोक कहलाते हैं जो जीवन के लिए उपयोगी सलाह देते हैं।
  • पितामही बच्चों को नीतिश्लोक सुनाने की सलाह देती है।

प्रथमः श्लोकः

श्लोक: गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। 
स्वर्गापवर्गास्पद‌मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ १ ॥
अर्थ:
 देवता भारतभूमि के गुणगान करते हैं और कहते हैं कि जो इस भूमि पर जन्म लेते हैं, वे धन्य हैं।
भारतभूमि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है, अतः यहाँ देवता भी मनुष्यरूप में जन्म लेना चाहते हैं।

द्वितीयः श्लोकः

श्लोक: गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः। 
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥ २ ॥
अर्थ:
 गुणवान् व्यक्ति दूसरों के गुण जानता है, किन्तु गुणहीन नहीं जानता।
बलवान् दूसरों का बल समझता है, किन्तु निर्बल नहीं समझता।
कोयल वसन्त के गुण को गाती है, किन्तु कौआ नहीं गा सकता।
हाथी सिंह का बल जानता है, किन्तु चूहा नहीं जानता।

तृतीयः श्लोकः

श्लोक: भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। 
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ ३ ॥
अर्थ: 
फल के भार से वृक्ष झुक जाते हैं, नए जल से मेघ नीचे आते हैं और वर्षा करते हैं।
समृद्धि पाकर भी सज्जन लोग अभिमानहीन रहते हैं, यह परोपकारी का स्वभाव होता है।

चतुर्थः श्लोकः

श्लोक: यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। 
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ ४ ॥
अर्थ:
 सोने की शुद्धता घर्षण, काटने, ताप और प्रहार से जाँची जाती है।
उसी तरह पुरुष की परीक्षा कुल, स्वभाव, गुण और कर्म से की जाती है।

पञ्चमः श्लोकः

श्लोक: अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च। 
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ५ ॥
अर्थ: 
प्रज्ञा, कुलीनता, संयम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अल्पभाषिता, दान और कृतज्ञता ये आठ गुण पुरुष को सम्मानित करते हैं।

षष्ठः श्लोकः

श्लोक: न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्। 
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६॥
अर्थ:
 जहाँ वृद्धजन न हों, वह सभा नहीं।
जो वृद्ध धर्म न बोलें, वे वृद्ध नहीं।
जहाँ सत्य न हो, वहाँ धर्म नहीं, और जो छल से मिले, वह सत्य नहीं।

सप्तमः श्लोकः

श्लोक: दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्। 
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥ ७ ॥
अर्थ: 
दुष्ट व्यक्ति के साथ मित्रता और प्रीति नहीं करनी चाहिए।
गरम अंगार जलाता है और ठंडा हाथ को काला करता है, उसी तरह दुष्ट हानि पहुँचाता है।

अष्टमः श्लोकः

श्लोक: यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। 
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ८ ॥
अर्थ: 
एक चक्र से रथ नहीं चलता, उसी तरह पुरुषार्थ के बिना भाग्य सफल नहीं होता।
प्रयत्न और भाग्य दोनों मिलकर फल देते हैं।

शब्दार्थानि

  • शृङ्खलितम्: अनुशासित, Disciplined
  • गायन्ति: गानं कुर्वन्ति, गाते हैं
  • किल: निश्चयेन, निश्चय से
  • धन्याः: प्रशंसिताः, प्रशंसनीय
  • अपवर्गः: निर्वाणम्, मोक्ष
  • भूयः: पुनः पुनः, बार-बार
  • सुरत्वात्: देवत्वात्, देवत्व से
  • वेत्ति: जानाति, जानता है
  • निर्गुणः: गुणहीनः, गुणरहित
  • बली: बलवान्, बलशाली
  • निर्बलः: बलरहितः, बलहीन
  • पिकः: कोकिलः, कोयल
  • वायसः: काकः, कौआ
  • करी: गजः, हाथी
  • नम्राः: अवनताः, झुके हुए
  • तरवः: पादपाः, वृक्ष
  • फलोद्गमैः: फलभारैः, फलों के भार से
  • अम्बुभिः: जलैः, जल से भरे हुए
  • दूरविलम्बिनः: दूरात् अधः अवनताः, दूर से नीचे झुके हुए
  • घनाः: मेघाः, बादल
  • अनुद्धताः: गर्वशून्याः, अभिमान से रहित
  • सत्पुरुषाः: सज्जनाः, अच्छे लोग
  • समृद्धिभिः: प्रचुरैः धनैः, बहुत धन से
  • कनकम्: सुवर्णम्, सोना
  • परीक्ष्यते: परीक्षितं भवति, उसकी परीक्षा की जाती है
  • निघर्षणम्: घर्षणम्, घिसना
  • छेदनम्: कर्तनम्, काटना
  • ताडनैः: प्रहारैः, प्रहार के द्वारा
  • कुलेन: वंशेन, कुल से
  • शीलेन: स्वभावेन, स्वभाव से
  • कर्मणा: कार्येण, कार्य से
  • दीपयन्ति: प्रकाशयन्ति, प्रकाशित करते हैं
  • प्रज्ञा: विशेषज्ञानम्, विशिष्ट बुद्धि
  • कौल्यम्: कुलीनता, अच्छे कुल में जन्म
  • दमः: इन्द्रियसंयमः, इन्द्रियों का संयम
  • श्रुतम्: शास्त्रज्ञानम्, शास्त्रों का ज्ञान
  • पराक्रमः: साहसः, वीरता
  • अबहुभाषिता: मितभाषिता, कम और सार्थक बोलना
  • छलम्: कपटता, छलना
  • अभ्युपैति: प्राप्नोति, प्राप्त करता है
  • दुर्जनेन: दुष्टजनेन, दुष्ट व्यक्ति से
  • समम्: सह, साथ
  • सख्यम्: मैत्री, मित्रता
  • दहति: ज्वलयति, जलाता है
  • अङ्गारः: दग्धकाष्ठः, अंगारा
  • कृष्णायते: मलिनं करोति, काला करता है
  • दैवम्: भाग्यम्, भाग्य
  • सिध्यति: सिद्धं भवति, फलता है

योग्यताविस्तरः

  • विष्णुपुराणम्: यह अठारह पुराणों में से एक है, जिसमें सात सहस्र से अधिक श्लोक हैं। इसमें भगवान् विष्णु और उनके अवतारों का वर्णन है।
  • महाभारतम्: यह संस्कृत साहित्य का पाँचवाँ वेद माना जाता है, जिसमें एक लाख से अधिक श्लोक हैं और अठारह पर्व हैं।
  • भर्तृहरि: ये संस्कृत के महान् कवि हैं, जिनकी रचनाएँ नीतिशतक, शृङ्गारशतक और वैराग्यशतक हैं।
  • हितोपदेश: पण्डित नारायण द्वारा रचित यह कथाग्रन्थ चार भागों में विभक्त है – मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह, सन्धिः।
  • चाणक्यनीति: चाणक्य के नीतिश्लोक बालकों के चरित्र निर्माण और आदर्श जीवन के लिए उपयोगी हैं।

2. अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका – chapter Notes

परिचय

अयं पाठः हितोपदेशग्रन्थात् गृहीतः अस्ति। अस्य मुख्यः सन्देशः — सामान्येष्वपि साधनासु यदि संहत्य बलं भवति तर्हि दुष्करकार्यं साधयितुं शक्यते। कथा कपोतराजस्य चित्रग्रीवस्य मित्रं मुषिकः धरणिकः च सम्बन्धिनी अस्ति। मित्रसमूहस्य साहाय्येन बन्धनमोचनं कथ्यते।अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

  • गर्मी-अवकाशे छात्राः उत्तराखण्डं गतवन्तः। ते श्रीकेदारनाथस्य आरोहणकाले सेतुभङ्गः अभवत्।
  • सर्वे भयभीताः अभवन्, किन्तु नायकः समाधानं प्रदत्तवान्। सर्वे मिलित्वा सेतुं दुरुस्तं कृत्वा लक्ष्यं प्राप्तवन्तः।
  • नायकः अवदत् — आत्मविश्वासेन दुष्करं कार्यं साध्यं भवति।
  • अस्मिन् प्रसङ्गे नायकः हितोपदेशस्य एकां कथां श्रोतुं प्रेषितवान्।

हितोपदेशकथा

  • गोदावरीतीरे शालवृक्षः आसीत्। तत्र व्याधः जालं प्रसार्य कपोतान् ग्रहीतुं प्रयत्नवान्।
  • कपोताः तण्डुलकणान् दृष्ट्वा लोभेन भूमौ अवतरितवन्तः।
  • ते सर्वे जाले बद्धाः अभवन्।
  • चक्रवाकः (चित्रग्रीवः) राजः अवदत् — सर्वे मिलित्वा एकचित्तेन जालमुत्पाट्य गगनं गच्छाम।
  • कपोताः एकचित्तेन उत्थाय जालसहिताः आकाशं गतवन्तः।
  • व्याधः विस्मितः अभवत्, तदा कपोताः मित्रं धरणिकं मूषिकं समिपं गतवन्तः।
  • धरणिकः प्रारम्भे शङ्कायुक्तः आसीत्, किन्तु चिरपरिचयात् कपोतराजं दृष्ट्वा प्रसन्नः जातः।
  • धरणिकः सर्वेषां पाशान् कृमेण छित्त्वा मुक्तिं दत्तवान्।
  • सर्वे कपोताः आनन्देन आकाशे पुनः गत्वा कृतज्ञतां प्रकटितवन्तः।

अध्ययनफलं

  • सङ्घटितः प्रयासः महत्कार्यं साधयति।
  • आपद्कालः अपि आत्मविश्वासेन मित्रसाहाय्येन च सुगमः भवति।
  • हितोपदेशः बालानां नीतिशिक्षायाः मूलस्रोतः अस्ति।

शब्दार्थ

  • भगिः – सेतु
  • अक्रन्दन् – रोदितवन्तः
  • तण्डुलकणाः – चावलदानानि
  • चक्रग्रीवः – कपोतराजः
  • धरणिकः – मूषिकः
  • एकचित्तिभूय – एकचित्तेन
  • पाशः – बन्धनम्
  • अपकारः – हानि

अर्थबोधः

  • पाठे एकं सूत्रम् — “सङ्घटितेन प्रयत्नेन दुष्करं कार्यं सुलभं भवति।”
  • हितोपदेशस्य श्लोकाः अपि अस्मिन्नेव विषये नीतिं दर्शयन्ति।
  • तृणानि अपि समूहबलात् गजं बध्नन्ति इत्यत्र दृष्टान्तः दत्तः।

व्याकरणं

  • लङ्लकारः, लट्लकारः, लृट्, लोट् इत्यादयः प्रयोगाः दत्ताः।
  • लट्-लकारे ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगः पठितः।
  • सन्धिसूत्राणि, समासाः, अव्ययानि अपि दत्तानि।

ग्रन्थपरिचयः

  • एषः पाठः “हितोपदेशः” नामकग्रन्थात् उद्धृतः अस्ति।
  • लेखकः पण्डितः नारायणपण्डितः।
  • हितोपदेशे चत्वारः प्रकरणाः — मित्रलाभः, सुहृद्भेदः, विग्रहः, सन्धिः।
  • बालानां संस्कृतशिक्षायै अयं ग्रन्थः उपयोगी अस्ति।

नीतिश्लोकाः

  • “अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैरगुणितैर्मत्वा बद्ध्यन्ते मत्स्ययो महान्॥”
  • “धैर्यं क्षमा धर्ममथोऽभियोगे शमा वक्तृत्वं युधि चाप्रणाशः। यशश्च शीलं च यदा प्रयुक्तं तदा गुणाः स्युः पुरुषस्य सन्तः॥”

1. संगच्छध्वं संवदध्वं  – Chapter Notes

प्रस्तावना

  • अयं पाठः ऋग्वेदस्य दशममण्डले स्थितस्य सज्ञानसूक्तस्य अंशः अस्ति ।
  • एषः सूक्तः “सघटनसूक्त” नाम्ना अपि प्रसिद्धः अस्ति ।
  • अस्य मुख्यसन्देशः – समाजे, राष्ट्रे, विश्वे च परस्परं ऐक्यम्, सहयोगः, एकता च स्थापयेत् ।

मन्त्रा

१ . ओ३म् संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥

मन्त्रार्थ: हे मानवाः! यूयं सर्वे सह गच्छत, सह वदत, सह मनोभावं कुरुत। यथा पूर्वे देवाः भागं सह उपासते।

२. समानो मन्त्रः समितिः समानि समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभि मन्त्येवः समानं हविषा जुहोमि॥
 

मन्त्रार्थ: भवतु वः मन्त्रः समानः, समितिः समानः, मनः समानम्। अहं समानं मन्त्रम् हविषा जुहोमि।

३. समानि वा आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुप्रसाहा इति॥

मन्त्रार्थ: भवतु वः आकूतिः समाना, हृदयानि समानानि। भवतु वः मनः समानं यथा वः सुप्रसाहा।

पदच्छेदः, अन्वयः, भावार्थ

  • संगच्छध्वम् = सह गच्छत।
  • संवदध्वम् = सह वदत।
  • समानी = समानानि।
  • आकूतिः = सङ्कल्पः।
  • भावार्थः – समाजे, राष्ट्रे च सर्वे सह गच्छन्तु, सह वदन्तु, सह चिन्तयन्तु। एवं कृत्वा उन्नतिः, ऐक्यम्, सौहार्दम् च प्राप्यते।

शब्दार्थशब्दःअर्थःसंगच्छध्वम्सह गच्छतसंवदध्वम्सह वदतसमितिःसभाआकूतिःसङ्कल्पःहविषाप्रार्थनयाजुहोमिअर्पयामिसुप्रसाहासहजरीणाःव्याकरणिक-विश्लेषणम्

गम् धातोः लोट्लकाररूपाणि

पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषःगच्छतुगच्छताम्गच्छन्तुमध्यमपुरुषःगच्छगच्छतम्गच्छतउत्तमपुरुषःगच्छावानिगच्छावगच्छाम

संगच्छ धातोः लोट्लकाररूपाणि (आत्मनेपदी)

पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्प्रथमपुरुषःसंगच्छताम्संगच्छेताम्संगच्छन्ताम्मध्यमपुरुषःसंगच्छस्वसंगच्छेथाम्संगच्छध्वम्उत्तमपुरुषःसंगच्छैसंगच्छावहेसंगच्छामहेयोग्यता विस्तर

वेदाः – चत्वारः वेदाः प्राचीनतमाः ग्रन्थाः सन्ति।

  • ऋग्वेदः – मन्त्रसमूहः, मुख्यतया स्तोत्ररूपेण।
  • यजुर्वेदः – यज्ञानां क्रियाविधिः।
  • सामवेदः – गायनप्रधानः, मन्त्राः गीतेन सह।
  • अथर्ववेदः – लोकजीवनं, औषधप्रयोगः, शान्तिकर्माणि च।

उपवेदाः – वेदानां सहायकशास्त्राणि।

  • आयुर्वेदः – शरीरस्य स्वास्थ्यरक्षणं, चिकित्सा।
  • धनुर्वेदः – युद्धविद्या, अस्त्रशस्त्रप्रयोगः।
  • गान्धर्ववेदः – संगीतं, नृत्यं, नाट्यविद्या।
  • अर्थवेदः – अर्थशास्त्रं, राज्यनीतिः।

वेदाङ्गानि – वेदानां अध्ययनाय आवश्यकानि षट् शास्त्राणि।

  • शिक्षा – उच्चारणविद्या।
  • व्याकरणम् – भाषानियमाः।
  • छन्दः – छन्दःशास्त्रं, वृत्तविन्यासः।
  • निरुक्तम् – शब्दव्युत्पत्तिः।
  • ज्योतिषम् – कालज्ञानं, ग्रहणीयानि, तिथयः।
  • कल्पः – यज्ञानां क्रियाप्रक्रिया।

उपनिषदः – वेदान्तशास्त्राणि, तत्त्वज्ञानप्रधानानि।

  • ईशोपनिषद् – ईश्वरस्य सर्वव्यापकत्वम्।
  • केनोपनिषद् – ब्रह्मविद्याया महत्त्वम्।
  • कठोपनिषद् – नचिकेतोपाख्यानं, आत्मतत्त्वम्।
  • प्रश्नोपनिषद् – षट् प्रश्नाः, उत्तररूपेण ब्रह्मविद्या।
  • मुण्डकोपनिषद् – परा–अपरा विद्याभेदः।
  • माण्डूक्योपनिषद् – ओंकारस्य व्याख्या।
  • छान्दोग्योपनिषद् – उपासना, आत्मविद्या।
  • बृहदारण्यकोपनिषद् – विस्तृतं तत्त्वज्ञानम्।