10 .जटायोः शौर्यम्   – Summary          

प्रस्तुत पाठ महाकाव्य ‘रामायणम्’ के अरण्यकांड से लिया गया है। इस महाकाव्य के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि हैं। इस पाठ में जटायु और रावण के मध्य युद्ध का वर्णन है। 

पाठ का सार इस प्रकार है पंचवटी में सीता करुण विलाप करती है। उसके विलाप को सुनकर, पक्षिराज जटायु उसकी रक्षा के लिए आता है। वह रावण को धिक्कारता है, परंतु रावण पर इसका कोई असर नहीं होता है। रावण की अपरिवर्तित मनोवृत्ति को देखकर जटायु उसके साथ युद्ध के लिए उद्यत हो जाता है। यद्यपि रावण युवा है और जटायु वृद्ध तथापि वह रावण को ललकारता है और कहता है कि मेरे जीवित रहते तुम सीता का अपहरण नहीं कर सकते। जटायु अपने पैने नाखूनों और पंजों से रावण पर आक्रमण करता है और उसके शरीर पर अनेक घाव कर देता है। जटायु रावण के धनुष को तोड़ डालता है। इस प्रकार रावण रथ से विहीन, नष्ट घोड़ों और सारथी वाला हो जाता है। जटायु पर रावण लात से प्रहार करता है। जटायु हार नहीं मानता है तथा बदले में रावण पर आक्रमण करता है। वह रावण की दशों भुजाओं को उखाड़ डालता है। इस प्रकार इस पाठ में जटायु की शूरवीरता की कहानी कही गई है।

09. सिकतासेतुः  – Summary                

यह पाठ ‘कथासरित्सागर’ के सप्तम लम्बक से लिया गया है। मूलतः यह सोमदेव की रचना है। इसमें तपोदत्त नामक एक बालक तपस्या के बल पर विद्या प्राप्त करना चाहता है। 

तपोदत्त को एक व्यक्ति मिला जो बालू के द्वारा नदी पर पुल बना रहा था। वह यह देखकर उसका उपहास करने लगा। वह व्यक्ति तपोदत्त से कहने लगा कि जो व्यक्ति बिना अक्षर ज्ञान के विद्या प्राप्त करना चाहता है, वह व्यक्ति कहीं ज्यादा मूर्ख है। मैं जिस कार्य में लगा हुआ है, उसमें मुझे एक दिन सफलता अवश्य मिल जाएगी, परन्तु जो परिश्रम विद्या प्राप्त करना चाहता है, वह कभी सफल नहीं हो सकता। यह सुनकर तपोदत्त को बड़ी आत्मग्लानि हुई। वह पश्चाताप करने लगा। उसने उस व्यक्ति से कहा कि आपने मेरी आँखें खोल दी हैं। मैं आज से ही परिश्रम करूँगा। यह कहकर वह गुरुकुल में चला गया और विद्याभ्यास के द्वारा विद्वान बन गया।

    08. लोहितुला – Summary              

प्रस्तुत पाठ ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक ग्रंथ के ‘मित्र भेद’ नामक तंत्र से लिया गया है। इसके रचयिता विष्णुशर्मा हैं। इस कथा में लोभ के दुष्परिणाम को दिखाया गया है। कथासार इस प्रकार है किसी स्थान पर जीर्णधन नामक व्यापारी रहता था। वह धन कमाने के उद्देश्य से दूसरे देशों को जाया करता था। एक बार उसने अपने पूर्वजों के द्वारा कमाई हुई लोहे की तराजू को एक सेठ के यहाँ धरोहर रख दिया। वह विदेश से आकर उस सेठ से अपनी धरोहर वापस माँगने लगा तो उस सेठ ने कहा कि उसे तो चूहों ने खा लिया।
यह सुनकर जीर्णधन सेठ को पाठ पढ़ाने की एक युक्ति सोची। वह नहाने का बहाना करके उस सेठ के पुत्र को अपने साथ ले गया और उसको एक गुफा में छिपाकर वापस लौट आया। सेठ ने उससे अपने पुत्र के विषय में पूछा तो उसने कहा कि बच्चे को बाज उठा ले गया। यह सुनकर उसने जीर्णधन को बुरा-भला कहा तथा उससे झगड़ते हुए न्यायालय पहुँच गया। न्यायाधिकारी ने विवाद की सच्चाई जानकर सेठ को लोहे की वह तराजू लौटाने का आदेश दिया। अपने तराजू को पाकर जीर्णधन ने सेठ के बच को वापस कर दिया।

06. भ्रान्तो बालः – Summary              

कहानी का परिचय

‘भ्रान्तो बालः’ पाठ “संस्कृत-प्रौढ़पाठावली” नामक ग्रंथ से लिया गया है। यह एक शिक्षाप्रद कहानी है जिसमें एक ऐसे बालक का वर्णन है जिसे पढ़ाई की जगह खेलने में अधिक रुचि होती है। जब उसके साथी पढ़ाई में लगे होते हैं, वह अकेला रह जाता है और निराश होकर इधर-उधर भटकता है। अंततः उसे यह समझ आता है कि हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त है, और उसे भी अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यह कथा हमें समय का सही उपयोग और जिम्मेदारी निभाने की सीख देती है।

कहानी का सारांश

यह कहानी एक ऐसे लड़के की है जिसे खेलना बहुत पसंद है लेकिन पढ़ाई में रुचि नहीं है। स्कूल जाने के समय वह खेलने के लिए निकलता है, लेकिन कोई भी दोस्त उसके साथ खेलने को तैयार नहीं होता क्योंकि सब अपने काम या पढ़ाई में लगे होते हैं। वह उदास होकर पार्क में चला जाता है और खेलने के लिए भौंरे, चिड़िया और कुत्ते से भी आग्रह करता है, लेकिन सभी उसे मना कर देते हैं क्योंकि वे अपने-अपने जरूरी काम में व्यस्त होते हैं। 

भौंरा फूलों से रस इकट्ठा कर रहा होता है, चिड़िया घोंसला बना रही होती है, और कुत्ता अपने मालिक के घर की रक्षा कर रहा होता है। सबके इन जवाबों को सुनकर बालक को समझ में आता है कि इस दुनिया में हर कोई अपने कार्य को महत्व देता है। उसे अपने आलस्य पर शर्म आती है और वह जल्दी से स्कूल चला जाता है। वहां से उसकी पढ़ाई में रुचि बढ़ती है और वह विद्वान, प्रसिद्ध और सम्पन्न बनता है।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों को समझकर समय का सदुपयोग करना चाहिए। आलस्य और बिना उद्देश्य के समय बिताना हमें पीछे ले जाता है, जबकि मेहनत और लगन से हम आगे बढ़ सकते हैं। जब हर जीव-जंतु भी अपना काम ईमानदारी से करते हैं, तो हमें भी अपने जीवन में जिम्मेदारी और अनुशासन को अपनाना चाहिए।

शब्दार्थ

  • संस्कृत शब्द – हिंदी अर्थ
  • भ्रान्तः – भटकता हुआ / भ्रमित
  • बालः – लड़का
  • तन्द्रालुः – आलसी
  • उद्यानम् – बाग़ / पार्क
  • मधुकरः – भौंरा
  • चटकपोतः – चिड़िया
  • नीडम्घों – सला
  • कुक्कुरः – कुत्ता
  • रक्षानियोगः – सुरक्षा का कार्य
  • स्वामिन्मा – लिक
  • पोषयति – पालता है
  • भग्नमनोरथः – टूटी हुई इच्छा वाला
  • वैदुषी – विद्वता / विद्वान होना
  • कुत्सा – निंदा / घृणा
  • सार्थकः – सफल / अर्थपूर्ण

05 . सूक्तिमौक्तिकम् – Summary    

नीति-ग्रंथों की दृष्टि से संस्कृत साहित्य काफी समृद्ध है। इन ग्रंथों में सरल और सारगर्भित भाषा में नैतिक शिक्षाएँ दी गई हैं। इनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन सफल और समृद्ध बना सकता है। ऐसे ही मूल्यवान कुछ सुभाषित इस पाठ में संकलित हैं, जिनका सार इस प्रकार है

मनुष्य को अपने आचरण की रक्षा करनी चाहिए। धन नश्वर है। वह कभी आता है तो कभी चला
जैसा व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
मीठे बोल सभी को प्रिय लगते हैं। अतः मीठा बोलना चाहिए। मनुष्य को बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
महापुरुष अपने लिए कुछ नहीं करते हैं। वे सदा परोपकार करते रहते हैं। कारण कि महापुरुषों का पृथ्वी पर आगमन परोपकार के लिए ही होता है।
मनुष्य को गुणों के लिए यत्न करना चाहिए। गुणों के द्वारा वह महान बनता है। . सज्जन लोगों की मित्रता स्थायी होती है, जबकि दुर्जन लोगों की मित्रता अस्थायी।
हंस तालाब की शोभा होते हैं। यदि किसी तालाब में हंस नहीं हैं तो यह उस तालाब के लिए हानिकर है।

गुणज्ञ व्यक्ति को पाकर गुण गुण बन जाते हैं, परंतु निर्गुण को प्राप्त करके वे ही गुण दोष बन जाते हैं।

04. कल्पतरुः – Summary         

‘वेतालपञ्चविंशतिः’ मनोहर एवं आश्चर्यजनक घटनाओं से युक्त कथाओं का अनोखा संग्रह है। प्रस्तुत पाठ इसी संग्रह से लिया गया है। इसके द्वारा जीवन-मूल्यों की स्थापना की गई है। इस कथा में पर्वतराज हिमालय के शिखर पर स्थित कंचनपुर नामक नगर का वर्णन किया गया है। उसमें जीमूतकेतु नाम का विद्याधरों का स्वामी रहता था। उसके उद्यान में कल्पतरु वृक्ष था। जीमूतकेतु के यहाँ जीमूतवाहन नाम का पुत्र हुआ। वह स्वभाव से अत्यधिक दयालु और परोपकारी था। एक दिन उसने मंत्री जनों की सभा की और उनसे अपने हित की बात पछी। सभी ने कहा कि वंश परंपरा से प्राप्त है। यह सभी मनोरथों को पूरा करने वाला है। तुम इसकी आराधना करो। तब जीमूतवाहन ने अपने पिता के पास जाकर कहा कि मैं इस कल्पवृक्ष से अपने मनोरथों की पूर्ति चाहता हूँ। उसके पिता ने उसको कल्पवृक्ष की आराधना करने की अनुमति दे दी। तत्पश्चात् जीमूतवाहन ने कल्पवृक्ष के पास जाकर प्रार्थना किया-देव, आप मेरी इच्छा पूर्ति करें। मेरी इच्छा है कि इस पृथ्वी पर कोई भी निर्धन न बचे। यह सुनकर कल्पवृक्ष ने प्रसन्न होकर धन की वर्षा की। इससे जीमूतवाहन का यश सर्वत्र फैल गया।

03. गोदोहन्म् – Summary         

यह नाटयांश कृष्णचंद्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित ‘चतुर्म्यहम्’ पुस्तक से सम्पादित करके लिया गया है। इस नाटक में ऐसे व्यक्ति की कथा है जो धनी और सुखी होने की इच्छा से प्रेरित होकर एक महीने के लिए गाय का दूध निकालना बंद कर देता है ताकि गाय के शरीर में इकट्ठा पर्याप्त दूध एक ही बार में बेचकर सम्पत्ति कमाने में समर्थ हो सके।

परन्तु मास के अन्त में जब वह दूध दुहने का प्रयत्न करता है तब वह दूध की बूंद भी प्राप्त नहीं कर पाता है। दूध प्राप्त करने के स्थान पर वह गाय के प्रहारों द्वारा खून से लथपथ हो जाता है और जान जाता है कि प्रतिदिन का कार्य यदि मास भर के लिए इकट्ठा किया जाता है तब लाभ के स्थान पर हानि ही होती है।

02. स्वर्णकाकः – Summary     

कहानी का परिचय

‘स्वर्णकाकः – सोने का कौआ’ श्री पद्मशास्त्री द्वारा रचित “विश्वकथाशतकम्” नामक संग्रह से ली गई एक प्रसिद्ध लोककथा है। यह कथा म्यांमार देश की श्रेष्ठ लोककथाओं में से एक है। इस कथा में एक स्वर्णपंखों वाले कौवे के माध्यम से लोभ और त्याग के परिणामों को दिखाया गया है। यह न केवल एक रोचक कहानी है, बल्कि बच्चों को नैतिक शिक्षा भी देती है।

कहानी का सारांश

बहुत समय पहले एक गाँव में एक गरीब बूढ़ी स्त्री अपनी विनम्र और सुंदर पुत्री के साथ रहती थी। एक दिन माँ ने बेटी से कहा कि वह धूप में रखे चावलों की रक्षा करे। तभी एक सोने के पंखों और चाँदी की चोंच वाला विचित्र कौआ आया और चावल खाने लगा। लड़की ने उसे रोका और गरीबी की बात बताई। कौआ प्रसन्न हुआ और अगले दिन सुबह गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के पास बुलाया, जहाँ उसका सोने का महल था। 

उसने लड़की से सीढ़ी चुनने को कहा – सोने, चाँदी या ताँबे की। विनम्र लड़की ने ताँबे की सीढ़ी चुनी, पर उसे सोने की सीढ़ी दी गई। महल में उसे स्वादिष्ट भोजन भी सोने की थाली में मिला। जाते समय तीन बक्से दिए गए, जिनमें से लड़की ने सबसे छोटा बक्सा चुना। उसमें हीरे थे, और वह अमीर बन गई।

उसी गाँव में एक लालची बुढ़िया रहती थी, जिसकी एक बेटी थी। उसने ईर्ष्या में आकर वही प्रक्रिया दोहराई। लेकिन उसकी बेटी घमंडी थी, उसने सोने की सीढ़ी माँगी और कौए से बद्तमीज़ी की। कौए ने उसे ताँबे की सीढ़ी दी और ताँबे के बर्तन में भोजन कराया। जाते समय उसने सबसे बड़ा बक्सा लिया, पर उसमें से काला भयानक साँप निकला। उसे अपने लोभ का फल मिला और उसने लोभ त्याग दिया।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें सिखने को मिलता है कि हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। जो लोग सच्चे, विनम्र और संतोषी होते हैं, उन्हें अच्छे फल मिलते हैं। लेकिन जो लोग घमंडी और लालची होते हैं, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए हमें हमेशा ईमानदार, नम्र और संतोषी बनकर रहना चाहिए।

शब्दार्थ

  • संस्कृत शब्द – हिंदी अर्थ
  • स्वर्णकाकः – सोने का कौआ
  • निर्धना – गरीब
  • विनम्रा – विनम्र, नम्र
  • तण्डुलाः – चावल
  • पिप्पलवृक्षः – पीपल का पेड़
  • प्रासादः  महल
  • सोपानम् – सीढ़ी
  • स्थाल्या – थाली
  • भोजनम् – भोजन
  • मञ्जूषा – बक्सा
  • हीरकाणि – हीरे
  • कृष्णसर्पः – काला साँप
  • लोभाविष्टा – लालच से भरी हुई
  • लघुतमां – सबसे छोटा
  • बृहत्तमां – सबसे बड़ा

01.भारतीयसन्त्तगीतिः  – Summary      

परिचय

यह अध्याय संस्कृत कक्षा ९ का प्रथम पाठ है, जो ‘भारतीवसन्तगीतिः’ नामक काव्य पर आधारित है। यह आधुनिक संस्कृत-साहित्य के प्रख्यात कवि पण्डित जानकीवल्लभ शास्त्री द्वारा रचित ‘काकली’ नामक गीत-संग्रह से लिया गया है। काव्य में वसन्त ऋतु के सौन्दर्य का चित्रण करते हुए सरस्वती देवी से प्रार्थना की गई है कि नवीन वीणा बजाकर मधुर गीत गाया जाए, जो प्रकृति के विविध रूपों से प्रेरित हो तथा राष्ट्रीय जागरण की भावना को प्रफुल्लित करे। यह रचना स्वाधीनता प्राप्ति की पृष्ठभूमि में लिखी गई है, जो लोकों को प्रेरित करने वाली है।

प्रार्थना

श्लोकः १

या भूमिर् महानद्यः सरितः सरोवरोत्सवानि (सागरः सरोवर आदि) विद्यमानानि । यस्मिन् बहवः प्रकाराः खाद्यपदार्थाः उत्पादन्ति च कृषि व्यापार आदि करोन्तः पुरुषाः सामाजिकसंगठनं कृत्वा वसन्ति (भारतीवसन्तगीतिः) । यस्याम् एते चरन्ति (प्रचरन्ति) प्राणिनः संचरन्ति भ्रमरन्ति । सा पृथ्वी नः प्रथम खाद्यपदार्थान् (अन्नजल) प्रदातु ॥१॥

हिंदी अर्थः जिस भूमि में बड़े नदियाँ, झीलें तथा तालाब (समुद्र, सरोवर आदि) विद्यमान हैं, जिसमें अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं तथा कृषि, व्यापार आदि करने वाले लोग सामाजिक संगठन बनाकर रहते हैं (भारतीवसन्तगीतिः), जिसमें ये चरते (प्रचरन्ति) प्राणी संचरते-भ्रमरते हैं, वह पृथ्वी हमें प्रथम खाद्य पदार्थ (अन्न-जल) प्रदान करे ॥१॥

श्लोकः २

चतुरः दिशः च ऊर्ध्वाः बहवः प्रकाराः खाद्यपदार्थाः (फलं दधि आदि) उत्पाद्यमानाः । तत्र कृषिकर्म करोन्तः सामाजिक संगठनं कृत्वा वसन्ति (भारतीवसन्तगीतिः) । सा (भूमिः) बहवः प्रकाराः प्राणिनां (घास चरितारः च संचरितभ्रमरितारः जीवः) आश्रयान् पोषयति, सा पृथ्वी नः सौख्य आदि लाभान् भोजन पदार्थानां विषयं लीनं कुरु ॥२॥

हिंदी अर्थः जिस भूमि में चार दिशाएँ तथा ऊर्ध्व दिशाएँ अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ (फल, दही आदि) उत्पन्न करती हैं, जहाँ कृषि-कार्य करने वाले सामाजिक संगठन बनाकर रहते हैं (भारतीवसन्तगीतिः), जो (भूमि) अनेक प्रकार के प्राणियों (घास चरने वालों तथा संचरण-भ्रमरण करने वालों जीवों) को पोषण देती है, वह पृथ्वी हमें सुख आदि लाभों तथा भोजन पदार्थों के विषय में लीन बनाए ॥२॥

श्लोकः ३

बहवः प्रकारैः भिन्नाः भाषाः वाचयन्तः च बहवः देवताः ग्रहणन्तः जनसमूहः, एकस्मिन् गृहे वसन्तः पुरुषाः यथा, पोषयित्री च कदापि शून्यं न करोति (भरतभारतीवसन्तगीतिः) इयं गीतिः नः मातुः सहायिका पथिका तद्वत् कश्चित् सौख्यं विना कश्चन बाधा ददाति ॥३॥

हिंदी अर्थःअनेक प्रकार से भिन्न भाषाओं को बोलने वाले तथा अनेक देवताओं को ग्रहण करने वाले जनसमूह को, एक ही गृह में वसन्तः पुरुषाः यथा, पोषयित्री च कदापि शून्यं न करोति (भरतभारतीवसन्तगीतिः) ऐसी यह गीतिः हमारे लिए मातुः सहायिका पथिका का तद्वत् कार्य करे जैसे कोई सुखं विना किसी बाधा के भोजन देती हो ॥३॥

काव्यांश

श्लोकः १

निनादय नवीनामये वाणि! वीणाम् । मृदुं गाय गीतिं ललित-नीति-लीनाम् । मधुर-मञ्जरी-पिञ्जरी-भूत-माला: वसन्ते लसन्तीह सरसा रसाला: कलापा: ललित-कोकिला-काकलीनाम् ॥१॥

हिंदी अर्थः हे सरस्वती (वाणी)! आप अपनी नवीन वीणा को बजाओ। आप सुंदर नीति से युक्त (लीन) मीठे गीत गाओ। फूलों की पीले रंग की पंक्तियों से वसंत ऋतु में मीठे आम के कोयलों की सुंदर ध्वनिवाले मधुर आम के पेड़ों के समूह शोभा पाते हैं।

श्लोकः २

निनादय…॥ वहति मन्दमन्दं सनीरे समीरे कलिन्दात्मजायास्सवानीरतीरे नतां पङ्क्तिमालोक्य मधुमाधवीनाम् ॥२॥

हिंदी अर्थःहे वाणी (सरस्वती)! तुम नई वीणा बजाओ। यमुना नदी के बेंत की लता से युक्त तट पर जल से पूर्ण हवा धीरे-धीरे बहती हुई फूलों से झुकी हुई मधुमाधव की लताओं की पंक्ति को देखकर हे वाणी (सरस्वती)! तुम नई वीणा बजाओ।

श्लोकः ३

निनादय…॥ ललित-पल्लवे पादपे पुष्पपुञ्जे मलयमारुतोच्चुम्बिते मञ्जुकुञ्जे, स्वनन्तीन्ततिम्प्रेक्ष्य मलिनामलीनाम् ॥३॥

हिंदी अर्थः हे वाणी (सरस्वती)! तुम नई वीणा बजाओ। सुन्दर पत्तोंवाले वृक्ष (पौधे), फूलों के गुच्छों तथा सुन्दर कुंजों (बगीचों) पर चंदन के वृक्ष की सुगंधित हवा से स्पर्श किए गए। गुंजायमान करते हुए भौरों की काले रंग की पंक्ति को देखकर हे वाणी! तुम नई वीणा बजाओ।

श्लोकः ४

निनादय…॥ लतानां नितान्तं सुमं शान्तिशीलम्‌ चलेदुच्छलेत्कान्तसलिलं सलीलम्‌, तवाकर्ण्य वीणामदीनां नदीनाम्‌ ॥४॥

हिंदी अर्थः हे वाणी (सरस्वती)! तुम नई वीणा बजाओ। ऐसी वीणा बजाओ कि तुम्हारी तेजस्विनी वाणी को सुनकर लताओं (बेलों) के पूर्ण शांत रहने वाले फूल हिलने लगें नदियों का सुंदर जल क्रीडा (खेल) करता हुआ उछलने लगे।

शब्दार्थःसंस्कृत शब्दःहिंदी अर्थःनिनादयबजाओ (संगीत की ध्वनि उत्पन्न करो)नवीनामयेनवीन वीणा मेंवाणिवाणी (सरस्वती)वीणाम्वीणामृदुं गायमधुर गाओगीतिंगीतललित-नीति-लीनाम्सुन्दर नीति से युक्तमधुर-मञ्जरीमधुर फूलपिञ्जरी-भूत-माला:पंक्तियों के रूप मेंवसन्तेवसन्त मेंलसन्तीहशोभायमानसरसारसीलेरसाला:आम के पेड़कलापा:समूहललित-कोकिलासुन्दर कोयलकाकलीनाम्कूजन वालीवहतिबहती हैमन्दमन्दंधीरे-धीरेसनीरे समीरेहवा मेंकलिन्दात्मजायमुनासवानीरतीरेबांस से युक्त तट परनतांझुकी हुईपङ्क्तिम्पंक्तिमधुमाधवीनाम्मधुमालती कीललित-पल्लवेसुन्दर पत्तों वालीपादपेवृक्षपुष्पपुञ्जेफूलों के गुच्छमलयमारुतचन्दन की हवाउच्चुम्बितेचुम्बित (स्पर्शित)मञ्जुकुञ्जेसुन्दर बगीचेस्वनन्तीम्ध्वनि करने वालीततिम्पंक्तिमलिनाम्काले रंग कीअलीनाम्भौंरों कीलतानांलताओं कीनितान्तंपूर्णतःसुमंफूलशान्तिशीलम्शांत स्वभाव वालेचलेद्चलने लगेंउच्चलेत्उछलने लगेकान्तसलिलंसुन्दर जलसलीलम्क्रीडा युक्ततवाकर्ण्यतुम्हें सुनकरवीणाम्वीणाअदीनाम्नदियों का

13. The Bishop’s Candlesticks – Multiple Choice Questions

MULTIPLE CHOICE QUESTIONS

Read the following extracts and write down the most appropriate option.

1. ‘I was a man once, I’m a beast now, and they made me what I am.’

(a) Who speaks these lines and to whom?
(i) Bishop–Persome
(ii) Convict–Bishop
(iii) Convict–Persome
(iv) None of the above

(b) Who made the speaker what he is?
(i) The Bishop
(ii) Society
(iii) Himself
(iv) His wife

(c) What is the speaker’s tragic story?
(i) Cruelty to his family led to the change
(ii) Poverty drove him to become a beast
(iii) Society maltreated him
(iv) Tortured in the prison

Ans : (a) (ii)
(b) (ii)
(c) (iii)

2. He was kind to me too—but what’s a Bishop for except to be kind to you? Here, cheer up, my hearty, you’re getting soft.

(a) To whom is the convict talking?

(i) Bishop
(ii) Himself
(iii) Persome
(iv) None

(b) How does he interpret the Bishop’s kindness?
(i) Due to his selfishness
(ii) His professional duty
(iii) His pretentious nature
(iv) His real nature

(c) Why does he say ‘My hearty, you’re getting soft’?
(i) Does not want to be kind again
(ii) Does not want to feel obliged to the Bishop
(iii) Has no desire to have human feelings again
(iv) Feels nothing

Ans : (a) (ii)
(b) (ii)
(c) (iii)

3. Convict : Ah! thanks, thanks, Monseigneur. I-I, Ah, I’m a fool, a child to cry, but somehow you have made me feel that—that it is just as if something had come into me— as if I were a man again, not a wild beast.

(a) Why does the convict cry?
(i) Due to sudden help by Bishop
(ii) Due to extreme compassion shown to him
(iii) Because of humanitarian feelings
(iv) Pain in the eyes

 (b) What did the Bishop do to make him feel like a man again?
(i) Saved him from the police
(ii) Gave him candlesticks
(iii) Showed him a safe way to escape
(iv) Gave him healthy food

(c) Why does he thank the Bishop?
(i) For the candlesticks
(ii) For restoring his faith in humanity
(iii) For giving him shelter and food
(iv) For giving him bed to sleep

Ans : (a) (ii)
(b) (i)
(c) (ii)

4. It is hopeless, hopeless. We shall have nothing left. His estate is sold, his savings have gone. His furniture, everything. Were it not for my little dot, we should starve.

(a) Why is Persome so upset?
(i) Bishop does not bother for her
(ii) He neglects his health
(iii) He is overgenerous with total disregard for his own comfort.
(iv) He is silly and people take undue advantage of him

(b) What has been the only sustaining factor to save them from starvation?
(i) Salt-cellars
(ii) Candlesticks
(iii) Her dowry
(iv) Her house

(c) Why do you think Persome is not able to influence her brother?
(i) Bishop does not care for her
(ii) He is most gullible and believes people easily
(iii) He cannot think of his own welfare before the suffering of others
(iv) None of the above

Ans : (a) (iii)
(b) (iii)
(c) (iii)

Q5. You see, my dear, my mother gave them to me on her deathbed just after you were born and————and she asked me to keep them in remembrance of her.

(a) Who is the speaker and who is the listener?
(i) Bishop – Convict
(ii) Convict – Persome
(iii) Bishop – Persome
(iv) None of the above

(b) The speaker appears to be emotionally distressed. Why?
(i) The mother is no more.
(ii) Persome is disturbed.
(iii) Due to the emotional attachment to candlesticks.
(iv) Salt-cellars have been broken

(c) Which quality of the mother is revealed here?
(i) Moral
(ii) Realistic
(iii) Humane
(iv) Affectionate

Ans : (a) (iii)
(b) (iii)
(c) (iv)