04. अव्यय और निपात

अव्यय

‘अव्यय’ ऐसे शब्द को कहते हैं, जिसके रूप में लिंग, वचन, पुरूष कारक इत्यादि के कारण कोई विकार नहीं होता।

अव्यय के प्रकार

कालवाचक अव्यय जैसे – आज, कल, तुरंत, पीछे, अब, जब, तब, कभी-कभी इत्यादि।

स्थानवाचक अव्यय जैसे – यहाँ, वहाँ, कहाँ, जहाँ, इध्र, उध्र इत्यादि।

दिशासूचक अव्यय जैसे – दूर, परे, अलग,  बायें, आरपार आदि।

स्थितिवाचक अव्यय जैसे – नीचे, उपर, तले, सामने, बाहर, भीतर इत्यादि।

निपात

निपात वे अव्यय हैं, जिनका प्रयोग निश्चित शब्द, शब्द-समुदाय या पूर वाक्य का अतिरिक्त भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है। हिन्दी में अधिकतर निपात शब्द समूह के बाद आते हैं, जिनको वे बल प्रदान करते हैं। निपात का मुख्य कार्य प्रश्न बोध्, अस्वीकृत बोध्, विस्मय बोध् कराना या वाक्य में किसी शब्द पर बल देना आदि होता है।

निपात के भेद

निपात मुख्यतः नौ प्रकार के होते हैं-

स्वीकारात्मक निपातः जैसे-हाँ, जी, जी हाँ।

नकारार्थक निपातः जैसे- नहीं, जी नहीं।

निषेधत्मक निपातः जैसे-मत।

प्रश्नबोध्क निपातः जैसे-क्या।

विस्मयादिबोध्क निपातः जैसे-क्या, काश।

बलदायक या सीमा बोध्क निपातः जैसे-तो, ही, तक, सिपर्फ, केवल।

तुलना बोधक निपातः जैसे-सा, से, सी, समान।

अवधरणा बोधक निपातः जैसे-ठीक, लगभग, करीब।

आदर बोधक निपातः जैसे-जी।

03. विशेषण, क्रिया, वाच्य और काल

विशेषण :

जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतायें, उसे ‘विशेषण’ कहते हैं। जिसकी विशेषता बताई जाए व ‘विशेष्य’ कहलाता है।

जैसे- काली गाय मेरी है। यहाँ काली गाय- विशेषणीकृत है।

विशेषण के भेद

1. सार्वनामिक विशेषण – मैं, तू, वह (पुरूषवाचक, निजवाचक) को छोड़कर अन्य सर्वनाम जब किसी संज्ञा के पहले आते हैं; तब वे ‘सार्वनामिक विशेषण’ कहलाते हैं। जैसे वह पुस्तक काली है। यहाँ पुस्तक (संज्ञा) के पहले वह (सर्वनाम) आया है। व्युत्पत्ति के अनुसार सार्वनामिक विशेषण के भी दो भेद है- (i) मौलिक सार्वनामिक विशेषण जो बिना रूपांतर के संज्ञा के पहले आता है। जैसे- यह घर, वह घर (ii) यौगिक सार्वनामिक विशेषण जो मूल सर्वनामों में प्रत्यय लगाने से बनते हैं। जैसे-ऐसा आदमी, जैसा देश आदि।

2. गुणवाचक विशेषण– जिस शब्द से संज्ञा का गुण, दशा, स्वभाव, आदि लक्षित हो, उसे गुणवाचक विशेषण कहते है।

इनके कुछ मुख्य रूप इस प्रकार हैं-

काल नया, पुराना, ताजा, भूत, वत्र्तमान, भविष्य, प्राचीन, अगला, पिछला

स्थान उजाड़, भीतरी, बाहरी, पूरबी, दायाँ, बायाँ, स्थानीय, देशीय, क्षेत्राीय, असमी, पंजाबी, अमेरिकी, भारतीय

आकार गोल, चैकोर, सुदर, नुकीला, लंबा, चैड़ा, सीध, तिरछा

रंग लाल, पीला, हरा, सपफेद, काला, फीका, धुँधला, 

दशा दुबला, पतला, मोटा, भारी, गाढ़ा, गीला, सूखा, गरीब, पालतू, रोगी

गुण भला, बुरा, सच्चा, झूठा, पापी, दानी, दुष्ट, शांत

द्रष्टव्य गुणवाचक में सा जोड़कर-बड़ा-सा, पीला-सा आदि।

3. संख्यावाचक विशेषण जिन शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या लक्षित होती हो, उसे ‘संख्यावाचक विशेषण’ कहते हैं। जैसे-दस लड़के, चार दिन, कुछ एवं सब संख्यावाचक विशेषण हैं। इसके तीन भेद हैं-

(i) निश्चित संख्यावाचक इसके प्रकार हैं-

(क) गुणवाचक एक, सौ, हजार।

(ख) क्रमवाचक पहला, दूसरा।

(ग) आवृतिवाचक दूना, चैगुना।

(घ) समुदायवाचक दोनों, तीनों।

(ड़) प्रत्येक बोध्न प्रत्येक, हर-एक, दो-दो, सवा-सवा।

(ii) अनिश्चित संख्यावाचक जैसे- कुछ सौ, कई।

(iii) परिमाण बोधक इससे किसी वस्तु के नाम-तौल का बोध् होता है। इसके दो प्रकार हैं-

(क) निश्चित परिमाण बोधक दो सेर चना, पाँच उंगालियाँ, चैदह मीटर।

(ख) अनिश्चित परिमाण बोधक बहुत पानी, कुल धन, संपूर्ण आनन्द इत्यादि।

अन्तर्विशेषण

हिंदी में कुछ विशेषणों के भी विशेषण होते हैं। जैसे- शंकर बड़ा साहसी लड़का है। समा अत्यंत बातूनी लड़की है।

विशेषणों की रचना

विशेषण के रूप निम्नलिखित स्थितियों में परिवर्तित होते हैं-

1. रूप रचना की दृष्टि से विशेषण विकारी और अविकारी दोनों होते हैं। अविकारी विशेषणों के रूप में परिवत्र्तन नहीं होता है। ये अपने मूल रूप में बने रहते हैं। जैसे- काला, पीला, सुदर, चंचल, गोल, सुडौल आदि।

2. कुछ विशेषण संज्ञाओं में प्रत्यय लगाकर बनते हैं। जैसे-

प्रत्यय    

संज्ञा    

विशेषण

इक    

अर्थ     

आर्थिक

ईय    

राष्ट    

राष्टीय

वान्    

गुण    

गुणवान

ईला    

शर्म     

शर्मिला

मान्     

श्री     

श्रीमान्

3. सार्वनामिक एवं आकारांत विशेषण लिंग, वचन और कारक के अनुसार बदलकर ‘ए’ या ‘ई’ रूप बन जाते हैं। जैसे-

एकवचन    

बहुवचन

पुलिंग     

काला, बड़ा    

काले, बड़े

स्त्राीलिंग     

काली, बड़ी    

काली, बड़ी

4. संज्ञा के लोप रहने पर विशेषण ही संज्ञा का कार्य करता है। सामान्यतः विशेषण के साथ परसर्ग नहीं लगता, विशेष्य के साथ लगता है, किन्तु विशेषण के संज्ञा बनने पर परसर्ग लगता है। जैसे-बड़ों की बात माननी चाहिए। विद्वानों का आदर करना चाहिए।

तुलनात्मक विशेषण

हिंदी में तुलना अंग्रेजी एवं संस्कृत की तरह नहीं की जाती है। हिंदी में तुलना करने पर विशेषणों के रूप ज्यों के त्यों रहते हैं। जैसे-रवि बब्लू से अध्कि समझदार है।

हिंदी में ‘से’, ‘अपेक्षा’, ‘सामने’, ‘सबसे’, लगाकर विशेषणों की तुलना की जाती है।

क्रिया

जिस शब्द से किसी काम का करना या होना समझा जाय उसे ‘क्रिया’ कहते हैं। जैसे- खाना, जाना, पढ़ना, सोना आदि।

धतु-क्रिया के निमार्ण में ‘धतु’ का विशेष योगदान होता है। ‘धतु’ क्रियापद का वह अंश होता है, जो किसी क्रिया के प्रायः सभी रूपों में पाया जाता है। अर्थात् क्रिया के मूल अक्षर ही ‘धातु’ कहलाते हैं जैसे- खाना-(मूल अक्षर+‘ना’ प्रत्यय) हिंदी में विशेषण से भी क्रिया बनती है;

जैसे- चिकना + आना = चिकनाना

धतु के दो भेद हैं – मूल धतु और यौगिक धातु। मूल धतु स्वतंत्रा होती है जैसे खा, जी, पी देख इत्यादि। जबकि यौगिक धतु तीन प्रकार से बनती है-

(i) धतु में प्रत्यय लगाकर अकर्मक से सकर्मक एवं प्रेरणार्थक क्रिया में कत्र्ता स्वयं काम न कर प्रेरणा देता है। जैसे- लिखना से लिखवाना। उदाहरण-अमित यश से हिंदी लिखवाता है।

(ii) कई धतुओं को संयुक्त करने से संयुक्त धातु बनती है जैसे- खाना खिलाना।

(iii) संज्ञा या विशेषण से नाम धतु बनती है- जो धतु संज्ञा या विशेषण से बनी हो, ‘नाम धातु’ कहते हैं जैसे-संज्ञा से-बात-बतियानाऋ विशेषण से-गरम-गरमाना

रचना की दृष्टि से क्रिया के भेद

रचना की दृष्टि से क्रिया के दो भेद होते हैं-

(i) सकर्मक और (ii) अकर्मक

(i) सकर्मक क्रिया ‘सकर्मक क्रिया’ उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की सम्भावना हो अर्थात् क्रिया का संचालक तो कत्र्ता हो पर पफल दूसरे व्यक्ति या वस्तु अर्थात् कर्म पर पड़े। जैसे-बबलू आम खाता है। यहाँ बबलू के खाने का पफल आम पर पड़ता है।

(ii) अकर्मक क्रिया जिन क्रियाओं का व्यापार और पफल कत्र्ता पर हो वे ‘अकर्मक’ कहलाती हैं। जैसे- जी घबराता है।

अन्य क्रिया भेद

द्विकर्मक क्रिया जिस क्रिया में दो कर्म हों जैसे- ‘मैं उदय को भूगोल पढ़ाता हूँ। इसमें दो कर्म है उदय को और भूगोल।

संयुक्त क्रिया जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनती है उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे- किरण रो रही थी, रमा भी रोने लगी, जया उन दोनों को चुप कराने लगी।


पूर्वकालिक क्रिया जब कत्र्ता एक क्रिया समाप्त कर उसी क्षण दूसरी क्रिया मेें प्रवृत होता हैं तब पहली क्रिया ‘पूर्वकालिक’ कहलाती है। जैसे- उसने नहाकर भोजन किया। इसमें ‘नहाकर’ पूर्वकालिक क्रिया है क्योंकि इससे नहाने की क्रिया की समाप्ति के साथ ही भोजन करने की क्रिया का बोध् होता है।


क्रियार्थक संज्ञा जब क्रिया संज्ञा की तरह व्यवहार में आये, तब वह ‘क्रियार्थक संज्ञा’ कहलाती है। जैसे-टहलना स्ववस्थ्य के लिए अच्छा है।

वाच्य

क्रिया के उस परिवत्र्तन को ‘वाच्य’ कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का बोध् होता है कि वाक्य के अन्तर्गत कर्त्ता, कर्म अथवा भाव में से किसकी प्रधनता है। इनमें किसके अनुसार क्रिया के पुरूष, वचन आदि आए हैं। वाच्य के निम्न तीन भेद हैं-

कर्तृवाच्य क्रिया का वह रूप जिसमें वाक्य में कर्त्ता की प्रधनता का बोध् हो। जैसे- लड़का खाता है, मैंने पुस्तक पढ़ी।

कर्मवाच्य जिस वाक्य में कर्म प्रधन हो। जैसे- पुस्तक पढ़ी जाती है।

भाववाच्य जिस वाक्य में भाव की प्रधनता का बोध् हो। जैसे- राज से चला भी नहीं जाता। यहाँ क्रिया (भाव) की कर्त्ता एवं कर्म के स्थान पर अध्कि प्रभावी हो गयी है।

काल

क्रिया के उस रूपांतर को ‘काल’ कहते हैं, जिससे उसके कार्य व्यापार का समय और उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध् हो।

 काल के तीन भेद हैं-

(i) वर्तमान काल  क्रियाओं में निरंतरता को ‘वत्र्तमानकाल’ कहते हैं। जैसे- वह जा रहा है, वह आया हो, वह गाता है।

(ii) भूतकाल जिस क्रिया से कार्य की समाप्ति का बोध् हो, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं। जैसे- अजय ने  गाना गाया।

(iii) भविष्यत काल भविष्य में होनेवाली क्रिया को भविष्यत काल की क्रिया कहते हैं। जैसे- मनोज कल दवा लाएगा।

02. संधि

संधि

“दो वर्णों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) या ध्वनि उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते है।” 
जैसे: 

हिम + आलय = हिमालय
अ + आ = आ
एक + एक = एकैक
अ + ए = ऐ

संधि के भेद

  • स्वर संधि दो स्वर वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वरसंधि कहते हैं, जैसे: भानु + उदय = भानूदय, महा + इन्द्र = महेन्द्र।
  • व्यंजन संधि व्यंजन वर्ण के साथ स्वर या व्यंजन के मिलने से व्यंजन में जो विकार उत्पन्न होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं। जैसे: अहम् + कार = अहंकार, जगत+आन्नद = जगदान्नद।
  • विसर्ग संधि विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन के मेल से जो विकार होता है, उसे ‘विसर्ग संधि’ कहते हैं। जैसे: निः + चय = निश्चय, निः + तार = निस्तार।

संधि निर्णय

स्वर-संधि

  • अति + अध्कि  = अत्यध्कि
  • अति + अंत  = अत्यंत
  • अति + आवश्यक  = अत्यावश्यक
  • अनु + अय  = अन्वय
  • अभि + आगत  = अभ्यागत
  • आदि + अंत = आद्यंत
  • इति + आदि  = इत्यादि
  • उपरि + उक्त  = उपर्युक्त
  • उमा + ईश = उमेश
  • एक + ईश्वर = एकेश्वर
  • एक + अंकी = एकांकी
  • काम + अन्ध्  = कामन्ध्
  • कृप+ आचार्य = कृपाचार्य
  • कृष्ण + आनंद  = कृष्णानंद
  • खग + इन्द्र  = खगेन्द्र
  • गण + ईश  = गणेश
  • गै + इका  = गायिका
  • ग्राम + उद्धार   = ग्रामोद्धार
  • घन + आनन्द  = घनानन्द
  • चन्द्र + उदय   = चन्द्रोदय
  • चिर + आयु  = चिरायु
  • चे + अन  = चयन
  • छात्रा + आवास  = छात्रावास
  • जन्म + अंतर  = जन्मांतर
  • जल + आशय  = जलाशय
  • तथा + अपि  = तथापि
  • तथा + आगत  = तथागत
  • तथा + एव  = तथैव
  • त्रिगुण + अतीत  = त्रिगुणातीत
  • थान + ईश्वर  = थानेश्वर
  • दाव + अनल  = दावानल
  • दिन + अंत  = दिनांत
  • दीप + आवली  = दीपावली
  • दश + आनन   = दशानन
  • देव + इन्द्र   = देवेन्द्र
  • देश + अंतर  = देशांतर
  • धर्म + अन्ध्  = धर्मान्ध्
  • धर्म + आत्मा  = धर्मात्मा
  • ध्वज + उत्तोलन  = ध्वजोत्तोलन
  • नग + इन्द्र  = नगेन्द्र
  • नर + इन्द्र  = नरेन्द्र
  • नि + उन  = न्यून
  • ने + अन  = नयन
  • पंच + अमृत  = पंचामृत
  • पत्रा + आचार  = पत्राचार
  • पद + अध्किारी  = पदाधिकारी
  • पर + अर्थ  = परार्थ
  • परम + अर्थ  = परमार्थ
  • पीत + अंबर  = पीतांबर
  • पुण्य + आत्मा  = पुण्यात्मा
  • पौ + अन  = पावन
  • प्रति + एक  = प्रत्येक
  • पल + उदय  = पलोदय
  • ब्रह्म + अस्त्रा  = ब्रह्मास्त्रा
  • भो + अन  = भवन
  • मत + एक्य  = मतैक्य
  • मद + अंध्  = मदांध्
  • महा + आशय   = महाशय
  • महा + ट्टषि  = महर्षि
  • यथा + इष्ट  = यथेष्ट
  • योग + इन्द्र = योगेन्द्र
  • रजनी + ईश = रजनीश
  • रमा + ईश  = रमेश
  • राम + अयन = रामायण
  • रूद्र + अक्ष  = रूद्राक्ष
  • लम्ब + उदर  = लम्बोदर
  • वसुध+  एव    = वसुधैव
  • वि+  अर्थ = व्यर्थ
  • वि+  उत्पत्ति  = व्युत्पत्ति
  • शरण+  आगत = शरणागत
  • श्वेत+  अम्बर  = श्वेतांबर
  • सदा+  एव  = सदैव
  • सु+  आगत  = स्वागत
  • हिम+  अचल  = हिमाचल

व्यंजन-संधि

  • आ +  छादन = आच्छादन
  • उत् +  अय  = उदय
  • उत् +  ज्वल  = उज्जवल
  • उत् +  नति  =  उन्नति
  • ट्टक् +  वेद  =  ट्टग्वेद
  • किम् +  चित  =  किंचित
  • जगत् +  ईश   =  जगदीश
  • तत् +  हित  =  तद्धित
  • दिक्+  गज  =  दिग्गज
  • मर् +  अन   = मरण
  • वि +  छेद  = विच्छेद
  • सम् +  कल्प   =  संकल्प
  • सम् +  तोष   = संतोष
  • सम् +  लग्न   =  संलग्न
  • सम् +  कार =  संस्कार
  • सत् +  मार्ग   =  सन्मार्ग
  • सत् +  चित् आनंद  =  सच्चिदानंद

विसर्ग-संधि

  • अतः+  एव   =  अतएव
  • आविः+  कार  = आविष्कार
  • तपः+  वन =  तपोवन
  • दुः+  कर  =  दुष्कर
  • दुः+  जन   =  दुर्जन
  • नमः+  चय  =  निश्चय
  • पुरः+  कार  =  पुरस्कार
  • प्रातः+  काल =  प्रातःकाल
  • पुनः+  जन्म  =  पुनर्जन्म
  • भाः+  कर = भास्कर
  • मनः+  ज =  मनोज
  • मनः+  रथ  =  मनोरथ
  • यशः+ दा =  यशोदा
  • यशः+ धरा  =  यशोध्रा
  • बहिः+ कार =  बहिस्कार
  • श्रेयः+ कर =  श्रेयस्कर
  • सरः+ वर   =  सरोवर
  • स्वः+ ग =  स्वर्ग

01. संज्ञा, लिंग निर्णय और सर्वनाम

संज्ञा

संज्ञा का शाब्दिक अर्थ होता है – नाम। किसी व्यक्ति , गुण, प्राणी, व् जाति, स्थान , वस्तु, क्रिया और भाव आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। शब्दों का वो समूह जिन्हें हम किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु, विचार, गुण या भाव को बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसे संज्ञा (Sangya) या संज्ञा शब्द (Sangya Shabd) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, संज्ञा एक ऐसा शब्द होता है जो किसी चीज़ की पहचान कराता है।

संज्ञा के भेद

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा 

जिससे किसी विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति का बोध् हो। 
उदाहरण:

  • व्यक्तियों एवं दिशाओं के नाम रवि, मिथिलेश, तरूण एवं पूर्व, उत्तर, दक्षिण
  • देशों एवं राष्ट्रीयताओं के नाम भारत,जापान, भारतीय, जर्मनी
  • समुद्रों एवं नदियों के नाम कालासागर, हिंद महासागर, बैकाल सागर, अटलांटिक महासागर, गंगा, यमुना, सतलुज
  •  नगरों, सड़कों के नाम दिल्ली,मुम्बई, आगरा, पृथ्वीराज रोड, राजपथ 
  • पर्वतों के नाम हिमालय, विध्याचल, कैमूर, काराकोरम
  • पुस्तकों तथा समाचार पत्रों के नाम रामायण, महाभारत, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा
  • ऐतिहासिक युद्धों, घटनाओं के नाम अक्टूबर क्रांति, 1857 का गदर
  • दिनों, महीनों एवं त्यौहारों, उत्सवों के नाम जनवरी, मंगलवार, रक्षाबंध्न, होली।

2. जातिवाचल संज्ञा 

जिस संज्ञा से समान प्रकार के वस्तुओं या व्यक्तियों का बोध् हो।
उदाहरण:

  • रिश्तेदारों के नाम, व्यवसाय, पद और कार्यकर्ता, वीवर, संचार मंत्री
  • पशु,पक्षियों के नाम घोड़ा,मुर्गा, तोता
  • प्राकृतिक तत्वों के नाम वर्षा, बिजली, ज्वालामुखी, भँकप
  • वस्तुओं के नाम मकान, दुकान, घड़ी

3. भाववाचक संज्ञा 

जिस संज्ञा शब्द से किसी के गुण, दोष, दशा, स्वाभाव , भाव आदि का बोध हो वहाँ पर भाववाचक संज्ञा कहते हैं। 

4. समूहवाचक संज्ञा

जिस शब्द से किसी एक विशेष व्यक्ति , वस्तु, या स्थान आदि का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। अथार्त जिस संज्ञा शब्द से किसी विशेष स्थान, वस्तु,या व्यक्ति के नाम का पता चले वहाँ पर व्यक्तिवाचक संज्ञा होती है।

5. द्रव्यवाचक संज्ञा

जो संज्ञा शब्द किसी द्रव्य पदार्थ या धातु का बोध कराते है उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। अथार्त जो शब्द किसी पदार्थ, धातु और द्रव्य को दर्शाते हैं वहाँ पर द्रव्यवाचक संज्ञा होती है।

संज्ञा के रूपों में लिंग, वचन और कारक संबंधी अंतर

  • लिंगानुसार नर खाता है – नारी खाती है। 
  • वचनानसुार लड़का खाता है -लड़़के खाते हैं।
  • उपर्युक्त शब्दों में नर का रूपांतर हुआ जबकि नीचे लड़के एवं लड़की के वचन में रूपांतरण हुआ।
  • कारकनुसार: लड़का गाना गाता है- लड़के ने गाना गाया।
  • लड़की गाना गाती है – लड़कियों ने गाना गाया।
  • उत्तर क्रिया में काल का अंतर एवं रूपांतर कत्र्ता कारक ‘ने’ के कारण हुआ।

लिंग निर्णय

प्राणियों का जोड़ा अथवा पदार्थ की जाति बनाने हेतु शब्दों में जो रूपांतर होता है, उसे लिंग कहते हैं।

लिंग का अर्थ चिन्ह होता है। हिन्दी में लिंग के दो भेद हैं- स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग।

तत्सम पुलिंग शब्द 

राष्ट्र, प्रांत, नगर, देश सर्प, सागर, साधन, सार, तत्त्व, स्वर्ण, दातव्य, दण्ड, दोष, धन, नियम, पक्ष, विधेयक, विनिमय, विनियोग, विभाग, विभाजन, विरोध, विवाद, वाणिज्य, शासन, प्रवेश, अनुच्छेद, शिविर, वाद, अवमान, अनुमान, आकलन, निमंत्राण, आमन्त्राण, उद्भव, निबंध्, नाटक, स्वास्थ्य, निगम, न्याय, समाज, विघटन, विर्सजन, विवाह, व्याख्यान ध्र्म, वित्त, उपादान, उपकरण, आक्रमण, पर्यवेक्षण, श्रम, विधन, बहुमत, निर्माण, संदेश, प्रस्ताव, ज्ञापक, आभार, आवास, छात्रावास, अपराध्, प्रभाव, उत्पादन, लोक, विराम, परिहार, विक्रम, न्याय, इत्यादि।

तत्सम स्त्राीलिंग शब्द

दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा, सभा, प्रार्थना, वेदना, समवेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना, अवस्था, नम्रता, सुंदरता, प्रभुता, जड़ता, महिमा, गरिमा, कालिमा, लालिमा, ईष्र्या, भाषा, अभिलाषा,  आशा, निराशा, पूर्णिमा, अरूणिमा, काया, कला, चपला, इच्छा, आज्ञा, अनुज्ञा, आराध्ना, उपासना, याचना, रक्षा, संहिता, आजीविका, घोषणा, गणना, परीक्षा, गवेषणा, नगरपालिका, योग्यता, सीमा इत्यादि।

अप्राणिवाचक पुलिंग हिन्दी शब्द

शरीर के अवयवों रत्नों, धातुओं, अनाज, पेड़ों द्रव्य पदार्थों, भौगोलिक जल एवं स्थल के नाम प्रायः पुलिंग होते हैं जैसे, कान मुँह, मोती, पन्ना, जौ, गेहूँ, पीपल, बड़ पानी, घी, देश, नगर, द्वीप, वायुमंडल आदि।

अपवाद: मणि, चांदी मूंग, खेसारी, लीची, नारंगी, नाशपाती, चाय, शराब, पृथ्वी, झील, इत्यादि स्त्राीलिंग हैं।

अप्राणिवाचक स्त्राीलिंग हिन्दी शब्द नदी गंगा, यमुना, नक्षत्रों -भरणी, अश्वनी, किराना सामान लौंग, हल्दी, हींग खाने-पीने की चीजें प्राय: स्त्राीलिंग होती हैं।

अपवाद सिंधु नदी, पुष्प नक्षत्रा, ध्नियां जीरा, पराठा, दही, रायता, हलुआ, पुलिंग होते हैं।

लिंग निर्णय हेतु सरल सूत्रा

1. तद्भव चाहे अकारांत हो या आकारांत, उनके तत्सम यदि अकरांत हैं, तो शब्द पुलिंग होंगे। जैसे- आम, हाथ, कान (तद्भव)- आम्र, हाथ, कर्ण ;तत्समद्ध पुलिंग हैं।

2. तद्भव अकारांत हो और उनके तत्सम आकारांत हो तब भी ऐसे शब्द स्त्राीलिंग होंगे जैसे- संध्या, शय्या (तत्सम) सांझ, सेज, (तद्भव) स्त्राीलिंग हैं।

3. भाववाचक संज्ञाएं (आकारांत) स्त्राीलिंग होती है जैसे माया, दया, कृपा, छाया, क्षमा, करूणा, लज्जा इत्यादि।

4. द्रव्यवाचक संज्ञाएं जैसे- दही, मोती, क्रिर्याथक संज्ञाएं जैसे लिखना, पढ़ना, उठाना, एवं द्वंद समास जैसे- सीता-राम, दाल-भात, नर-नारी, शब्द पुलिंग होते हैं।

प्रत्यय एवं लिंग निर्णय

5. अकारांत एवं आकारांत पुलिंग को इकारांत करने से स्त्राीलिंग हो जाते हैं जैसे: लड़का-लड़की, नाला-नाली, गोप-गोपी, आदि।

6. व्यवसाय बोध्क जाति बोध्क संज्ञा में इन और आइन प्रत्यय लगाकर स्त्राीलिंग बनाया जाता है। जैसे: माली- मालिन, लाला-ललाइन, धेबी-धेबिन इत्यादि।

7. कुछ उपनाम वाची शब्द में आनी लगाकर स्त्राीलिंग बनाया जाता है जैसे: ठाकुर -ठाकुरानी, सेठ-सेठानी, इत्यादि।

सर्वनाम

सर्व (सब) नामों (संज्ञाओं) के बदले जो शब्द  आते हैं, उन्हें ‘सर्वनाम’ कहते हैं। इन प्रकार यह किसी भी संज्ञा के बदले आता है। जैसे में, तुम, वह, यह इत्यादि।

 सर्वनाम के भेद

हिन्दी में कुछ ग्यारह सर्वनाम हैं- मैं, तू, आप, यह, वह, जो, सो, कोई, कुछ, कौन, क्या, प्रयोग के अनुसार सर्वनाम के छह भेद हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. पुरुषवाचक सर्वनाम: ये मानव के नाम के बदले आते हैं। उत्तम पुरुष में लेखक या वक्ता आता है, मध्यम पुरुष में पाठक या श्रोता और अन्यपुरुष में लेखक और श्रोता को छोड़कर अन्य लोग होते हैं।

इसके तीन भेद होते हैं –

  • उत्तम पुरुष: मैं, हम।
  • मध्यम पुरुष: तू, तुम, आप।
  • अन्य पुरुष: वह, वे, यह, ये।

2. निजवाचक सर्वनाम: इसका रूप ‘आप’ है। यह कत्र्ता का बोध्क है, पर स्वयं कर्त्ता का काम नहीं करता। यह (आप) बहुवचन में आदर हेतु प्रयुक्त होता है। निजवाचक ‘आप’ का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित के लिए होता है। जैसे दूसरे व्यक्ति को निराकरण हेतु होता है। जैसे – वह औरों को नहीं, अपने आप को सुधर रहा है।

3. निश्चयवाचक सर्वनाम: जिससे किसी वस्तु के निश्चय का बोध् हो जैसे- यह, वह। उदाहरणार्थ-यह कोई नया नियम नहीं है; चावल मत खाओ, क्योंकि वह कच्चा है।

4. अनिश्चयवाचक सर्वनाम: जिससे किसी निश्चित वस्तु का बोध् न हो जैसे-कोई, कुछ। उदाहरणार्थ-कोई पुकार तो नहीं रहा है; वह कुछ देर बाद आएगा।

5. सम्बन्ध्वाचक सर्वनाम: जिस सर्वनाम से वाक्य में किसी दूसरे सर्वनाम से संबंध् स्थापित किया जाए, उसे संबंध्वाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-जो, सो। उदाहरणार्थ-वह लड़की कौन थी जो अभी यहाँ आई थी; वह जो न करे, सो थोड़ा।

6. प्रश्नवाचक सर्वनाम: प्रश्न करने के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग होता है, उन्हें ‘प्रश्नवाचक सर्वनाम’ कहते हैं। जैसे-कौन, क्या। उदाहरणार्थ-कौन नियामक है सृष्टि का? क्या उत्तर देना संभव है?

सर्वनाम के रूप में अंतर लिंग, (वचन एवं कारक के अनुसार) सर्वनाम का रूप लिंग परिवर्तन से नहीं बदलता। संज्ञाओं के समान सर्वनाम के भी दो वचन होते हैं-एकवचन एवं बहुवचन। पुरूषवाचक एवं निश्चयवाचक सर्वनाम को छोड़कर शेष सर्वनाम विभक्तिरहित बहुवचन में एकवचन के समान रहते हैं। सर्वनाम में केवल संबोध्न कारक नहीं होता। कारकों में विभक्तियाँ लगाने से सर्वनामों के रूप में विकृति आ जाती है। जैसे- मैं-मुझे, मुझको, मुझसे, मेरा; तुम-तुम्हें, तुम्हारा; हम-हमें, हमारा; वह-उसने, उसको, उसे; कौन-किसने, किससे, किसे।

सर्वनाम की कारक-रचना (सारणी रूप में)

04. मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय – पाठ का सार

पाठ का सार

प्रस्तुत आत्मकथात्मक रचना ‘मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय’ प्रसिद्ध् रचनाकार एवं पत्राकार धर्मवीर भारती के निधन से सात-आठ साल पूर्व की है। सन् 1989 ई. में लेखक एक बार गंभीर रूप से बीमार हुए थे। वे एक के बाद एक जबरदस्त हार्ट-अटैक की चपेट में आ गए थे। अस्पताल में इलाज के बाद लेखक अर्ध-मृत्यु की अवस्था  में घर वापस आए। वहाँ उन्होंने ज़िद ठान ली कि उन्हें उनकी किताबों वाले कमरे में रखा जाए। उन्हें उसी लाइब्रेरीनुमा कमरे में लिटा दिया गया। लेखक को डाॅक्टर की हिदायत थी कि वे पूरी तरह से आराम करें। उन्हें चलना, बोलना, पढ़ना सब मना कर दिया गया।

लेखक उस छोटे से निजी पुस्कालय में (जो अब काफी विस्तृत है ) लेटे हुए थे। लेखक ने परी कथाओं (Fairy Tales) में पढ़ा था कि एक राजा के प्राण उसके शरीर में नहीं बल्कि तोते में रहते थे। वैसे ही उन्हें भी लगता था कि उनके प्राण भी उनके शरीर में नहीं हैं। उनके प्राण शरीर से निकल चुके हैं और वे इन जारों किताबों में बस गए हैं, जो पिछले चालीस-पचास वर्षों में धीरे-धीरे उनके पास जमा होती गईं।

जब आर्य समाज का सुधारवादी आंदोलन शीर्ष पर था, तब लेखक के पिता आर्यसमाज रानीमंडी के प्रधान थे और माँ ने स्त्राी-शिक्षा के लिए आदर्श कन्या पाठशाला की स्थापना की थी। इन बातों से बचपन से ही लेखक प्रभावित होते रहे। लेखक को बचपन में ही नियमित रूप से आर्यमित्र साप्ताहिक, वदेादेम, सरस्वती, गृिहणी आरै बाल पत्रिकाएँ ‘बाल सखा’ एवं ‘चमचम’ पढ़ने का अवसर मिला। लेखक को ‘सत्यार्थप्रकाश’ जैसी पुस्तकों को पढ़ने का भी अवसर प्राप्त हुआ। इस प्रकार से लेखक के बचपन का पूरा माहौल ही पुस्तकों से संपर्क का था। लेखक पर इन चीजों का प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपने बाल्यकाल में स्कूली किताबों से अधिक इन किताबों और पत्रिकाओं को ही पढ़ा।

अपने छोटे-से निजी पुस्तकालय के विषय में लेखक ने बताया है कि कैसे उस पुस्तकालय का विकास हुआ और कब शुरुआत हुई, कब इस लघु-पुस्तकालय के लिए पहली किताब खरीदी गई। इन सब का वर्णन भी लेखक ने इस पाठ में किया है। लेखक को स्कूल में दो किताबें इनाम में मिली थीं एक किताब के माध्यम से लेखक को पक्षियों से भरे आकाश का ज्ञान हुआ और दूसरी किताब में रहस्यों से भरे समुद्र का ज्ञान हुआ। लेखक के पिता जी ने अपनी निजी लाइब्रेरी के एक खाने से अपनी चीशें हटा दीं और लेखक के लिए उसे सुरक्षित कर दिया। उन्होंने ऐसा करके लेखक से कहा ‘‘आज से यह खाना तुम्हारी अपनी किताबों का है, यह तुम्हारी अपनी लाइब्रेरी है।’’ बस, यहीं से लेखक की निजी लाइब्रेरी आरंभ हुई।

लेखक स्कूल-काॅलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद एक दिन यूनिवर्सिटी पहुँचे और अध्यापन की दुनिया में आ गए। अध्यापन छोड़कर लेखक इलाहाबाद होते हुए मुंबई आ गए जहाँ आकर संपादन की दुनिया में प्रवेश किया। इसी रफ्रतार में और इसी क्रम से लेखक की निजी लाइब्रेरी का विस्तार भी होता गया। निजी लाइब्रेरी के विस्तार की प्रेरणा लेखक को इलाहाबाद में रहते हुए मिली। लेखक जीवन में पहली बार साहित्यिक पुस्तक की खरीद के विषय में बताते हैं कि माँ के कहने पर लेखक ने देवदास फिल्म देखने का निश्चय किया। वह पुस्तकों को बेचने और पुरानी पुस्तकों को खरीदने से बचे दो रुपयों को लेकर सिनेमा देखने गए लेकिन फिल्म शुरू होने में थोड़ी देर होने की वजह से वहीं सामने की किसी किताब की दुकान पर लेखक की नज़र पड़ी और लेखक ने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की पुस्तक देवदास रखी देखी। लेखक का ध्यान उस ओर खिंच आया। लेखक ने कीमत पूछी तो पता चला एक रुपए मात्रा। दुकानदार ने एक रुपए से कम में ही वह पुस्तक उन्हें दे दी। वह पुस्तक  केवल दस आने में लेखक को मिल गई। लेखक ने बचे एक रुपए छह आने माँ को लौटा दिए। यह पहली किताब स्वयं लेखक द्वारा खरीदी गई। यह जीवन भर याद रखने वाली घटना  थी। लेखक ने पुस्तक जमा करने का इरादा भी बना लिया और धीर-धीरे करके उनकी निजी लाइब्रेरी में हिंदी, अंग्रेजी के उपन्यास, नाटक, कथा-संकलन, जीवनियाँ, संस्मरण, इतिहास, कला, पुरातत्व, राजनीति की हजारों पुस्तवेंफ इकट्ठी हो गईं। लेखक पीछे नशर दौड़ाते हैं तो उन्हें अपनी पहली किताब खरीदने की प्रबल इच्छा याद आ जाती है।

लेखक भारत के ही नहीं, विश्व स्तर के एक जाने-माने विद्वान हैं। वे भारतीय पत्राकारिता के लिए गौरव का विषय बने हुए हैं। उनकी लाइबे्ररी में रेनर मारिया रिल्वफे , स्टीप़ेफन ज्वीग, मोपाँसा, चेखव, टालस्टाय, दास्तोवस्की, मायकोवस्की, सोल्शेनिस्टिन, स्टीपेफन स्पेंडर, आडेन एशरा पाउंड, यूजीन ओ नील, ज्याँ पाल सात्रो, आॅल्बेयर कामू, आयोनेस्को, पिकासो, रेम्ब्राँ की कृतियाँ हैं। हिंदी में कबीर, सूर, तुलसी, रसखान, जायसी, प्रेमचंद, पंत, निराला, महादेवी के साथ और कितने ही लेखकों, चिंतकों की साहित्यिक कृतियों से पुस्तकालय भरा पड़ा है।

बीमारी की हालत में लेखक से मिलने आए मराठी के वरिष्ठ कवि वृदा करंदीकर ने लेखक से कहा ‘‘भारती, ये सैकड़ों महापुरुष जो पुस्तक-रूप में तुम्हारे चारों ओर विराजमान हैं, इन्हीं के आशीर्वाद से तुम बचे हो। इन्होंने तुम्हें पुनर्जीवन दिया है।’’ लेखक ने मन-ही-मन करंदीकर को और उन महापुरुषों को प्रणाम किया।

शब्दार्थ

  1. नब्ज़ – नस
  2. शॉक्स – चिकित्सा के लिए बिजली के दिए जानेवाले झटके।
  3. अवरोध – रुकावट
  4. सर्जन – शल्य चिकित्सक
  5. अर्धमृत्यु – अधमरा
  6. विशेषज्ञ – विशेष जानकार
  7. सहेजना – संभालकर रखना
  8. खंडन-मंडन – तर्क-वितर्क करके पुष्टि करना
  9. पाखण्ड – दिखावटी
  10. अदम्य – जिसे दबाया ना जा सके
  11. शैली – विधि
  12. प्रतिमाएँ – मूर्तियाँ
  13. मूल्य – आदर्श
  14. रूढ़ियाँ – प्रथाएँ
  15. कुल्हड़ – मटकेनुमा मिटटी का छोटा-सा बर्तन
  16. सनक – जिद
  17. अनिच्छा – बेमन से
  18. कसक – पीड़ा
  19. शिद्दत – अधिकता
  20. पुरातत्व – पुरानी बातों और इतिहास के अध्यन और अनुसंधान से संबंध रखने वाली विशेष प्रकार की विद्या
  21. वरिष्ठ – बड़ा
  22. सहमति – मंजूरी

03. कल्लू कुम्हार की उनाकोटी – पाठ का सार

पाठ का सार

लेखक सन् 1999 के दिसंबर माह में ‘आॅन द रोड’ शीर्षक से तीन खंडों वाली एक टी.वी. शृंखला बनाने के सिलसिले में त्रिपुरा की राजधानी अगरतला गए थे। इस यात्रा के पीछे लेखक का जो बुनियादी विचार था, वह त्रिपुरा की समूची लंबाई में आर-पार जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-44 से यात्रा करने और त्रिपुरा की विकास संबंधी गतिविधियों के बारे में जानकारी देना था।

त्रिपुरा भारत के सबसे छोटे राज्यों में से है। इसकी जनसंख्या वृद्धि की दर 34 प्रतिशत है, जो क़ाफी ऊँची है। यह राज्य बांग्लादेश से तीन तरफ से घिरा हुआ है और एक तरफ से भारत के दो राज्य मिजोरम और असम (उत्तर-पूर्वी सीमा) सटे हुए हैं। सोनपुरा, बेलोनिया, सबरूम, कैलासशहर त्रिपुरा के महत्वपूर्ण शहर हैं, जो बांग्लादेश की सीमा के करीब हैं। अगरतला सीमा चैाकी से महज दो किलोमीटर दूर है। यहाँ बांग्लादेश के लोगों की आवक (आना) बहुत ज़बरदस्त है। यहाँ बाहरी लोगों की जनसंख्या इतनी बढ़ गई है कि मूल निवासी आदिवासियों की संख्या उसके मुकाबले कम पड़ती जा रही है। यही कारण है कि त्रिपुरा के आदिवासियों में असंतोष बढ़ रहा है। लेखक अपना पूरा यात्रा-वृत्तांत सुनाने में पहले तीन दिनों की चर्चा करते हैं, जो अगरतला में बीते और अगरतला के इर्द-गिर्द की शूटिंग की गई। इस दौरान लेखक ने ‘उज्जयंत महल’ की भी चर्चा की है जो अगरतला का मुख्य महल है और अब वहीं पर त्रिपुरा की राज्य विधानसभा बैठती है। लेखक यह बताते हैं कि त्रिपुरा में लगातार बाहरी लोगों के आने से कूछ समस्याएँ पैदा हुई हैं, लेकिन इस समस्या का लाभ यह है कि राज्य बहुधार्मिक समाज का उदाहरण बन गया है।  त्रिपुरा में उन्नीस अनुसूचित जनजातियों और विश्व के चारों बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व मौजूद है।

अगरतला के बाद लेखक टीलियामुरा का वर्णन करते हैं। यह एक कस्बा है जो कि एक विशाल गाँव ही है। यहीं लेखक की मुलाकात त्रिपुरा के प्रसिद्ध लोकगायक हेमंत कुमार जमातिया से होती है, जिन्हें सन् 1996 ई. में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। हेमंत कोकबारोक बोली में गाते हैं। कोकबारोक त्रिपुरा की कबीलाई बोलियों में से एक है। वहीं टीलियामुरा शहर के वार्ड नं. 3 में लेखक की मुलाकात एक और गायक  मंजु ऋषिदास से हुई। ऋषिदास त्रिपुरा में मोचियों (जूते बनाने वालों) के एक समुदाय का नाम है। इस समुदाय के लोग जूते बनाने के अतिरिक्त तबला और ढोल का निर्माण भी करते हैं। मंजु ऋषिदास आकर्षक महिला थीं और रेडियो कलाकार होने के साथ-साथ नगर पंचायत में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व भी करती थीं। उन्होंने लेखक के लिए दो गीत भी गाए।

लेखक ने त्रिपुरा के प्राकृतिक दृश्यों की छटा का वर्णन करते हुए कहा है ‘‘त्रिपुरा की प्रमुख नदियों में से एक मनु नदी के किनारे स्थित मनु एक छोटा कस्बा है। जिस वक्त हम मनु नदी के पार जाने वाले पुल पर पहुँचे, सूर्य मनु के जल में अपना सोना उडे़ल रहा था।’’ लेखक त्रिपुरा जिले में जब प्रवेश कर गए तो उन्होंने वहाँ की लोकप्रिय घरेलू गतिविधियों में से एक अगरबत्तियों के लिए बाँस की पतली  सींकौं तैयार करने वाले घरेलू उद्योग का भी मुआयना किया। बाँस की इन सींकों को अगरबत्तियाँ बनाने के लिए कर्नाटक और गुजरात भेजा जाता है। उत्तरी त्रिपुरा जिले का मुख्यालय कैलासशहर है, जो बांग्लादेश की सीमा के काफी करीब है।

त्रिपुरा में एक स्थान का नाम ‘उनाकोटी’ है, जिसके बारे में लेखक कुछ नहीं जानते थे। लेखक को उसकी विशेष जानकारी वहाँ के जिलाधिकारी से प्राप्त हुई। उनाकोटी का मतलब है एक कोटि यानी एक करोड़ से एक कम। दंतकथा के अनुसार उनाकोटी में शिव की एक करोड़ से एक कम मूर्तियाँ हैं। विद्वानों का मानना है कि यह जगह दस वर्ग किलोमीटर से कुछ ज्यादा क्षेत्रा में फैली है और पाल शासन के दौरान नवीं से बारहवीं सदी तक के तीन सौ वर्षों में यहाँ चहल-पहल रहा करती थी। पहाड़ों को अंदर से काटकर यहाँ विशाल आधार मूर्तियाँ बनी हैं। एक विशाल चट्टान पर ऋषि भगीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण के मिथक (पौराणिक कथा) को चित्रित करती है। गंगा अवतरण के धक्वे से कहीं पृथ्वी धँसकर पाताल लोक में न चली जाए, इसलिए शिव को इसके लिए तैयार किया गया कि वे गंगा को अपनी जटाओं में उलझा लें और इसके बाद इसे धीरे-धीरे पृथ्वी पर बहने दें। शिव का चेहरा एक समूची चट्टान पर बना है और उनकी जटाएँ दो पहाड़ों की चोटियों पर फैली हैं। भारत में शिव की यह सबसे बड़ी आधार मूर्ति है। पूरे साल बहने वाला एक जलप्रपात पहाड़ों से उतरता है, जिसे गंगा जितना ही पवित्रा माना जाता है। यह पूरा इलाका
ही देवी-देवताओं की मूर्तियों से भरा पड़ा है।

स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि इन मूर्तियों का निर्माता कल्लू कुम्हार था। वह पार्वती का पक्का भक्त था और शिव-पार्वती के साथ उनके निवास कैलाश पर्वत पर जाना चाहता था। पार्वती के शोर देने पर शिव कल्लू को कैलाश ले चलने के लिए तैयार हो गए लेकिन इसके लिए शर्त यह रखी गई कि उसे एक रात में शिव की एक कोटि मूर्तियाँ बनानी होंगी। अपनी धुन का पक्का कल्लू इस काम में जुट गया। लेकिन जब भोर हुई तो मूर्तियाँ एक कोटि से एक कम निकलीं। कल्लू नाम की इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने पर अड़े शिव ने इसी बात का बहाना बनाते हुए कल्लू कुम्हार को अपनी मूर्तियों के साथ उनाकोटी में ही छोड़ दिया और स्वयं कैलाश चलते बने। लेखक ने ऊपर की दंतकथा के आधार पर ही इस पाठ का शीर्षक ‘कल्लू कुम्हार की उनाकोटी’ रखना उचित समझा है। इस शीर्षक से त्रिपुरा के भौगोलिक, सामाजिक परिवेश और धार्मिक दंतकथा पर दृष्टिपात करने में सहायता मिलती है।

शब्दार्थ

  1. अलसायी – आलस से भरी
  2. सोहबत – संगति
  3. ऊर्जादायी – शक्ति देने वाली
  4. खलल – बाधा
  5. कानफाड़ू – कानों को फाड़ने वाला
  6. शुक्र – मेहरबानी
  7. विक्षिप्तों – पागलों
  8. तड़ित – बिजली
  9. अल्लसुबह – बिलकुल सुबह
  10. मुहैया – उपलब्ध
  11. आवक – आगमन
  12. इर्द-गिर्द – आस-पास
  13. खासी – बहुत
  14. हस्तांतरण – एक व्यक्ति के हाथ से दूसरे के हाथ में जाना
  15. प्रतीकित – अभिव्यक्त करना
  16. मुँहजोर – मुँहफट
  17. आश्वस्त – विश्वाश से पूर्ण
  18. इरादतन – सोच-विचार कर

02. स्मृति – पाठ का सार

स्मृति पाठ का सारांश

  • प्रस्तुत पाठ या संस्मरण श्रीराम शर्मा जी द्वारा लिखा गया है। इसमें लेखक ने अपनी बाल्यावस्था की एक अविस्मरणीय घटना का वर्णन किया है, जिसमें उन्होंने एक साँप से लड़कर चिट्ठियों को सुरक्षित किया।
  • संस्मरण के अनुसार, ठंड का मौसम चल रहा था। एक दिन शाम को, जब लेखक अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, तभी एक आदमी ने उन्हें बताया कि उनके छोटे भाई ने बुलाया है। लेखक डरे हुए अपने भाई के साथ घर की ओर चल पड़े।
  • लेखक के मन में किसी गलती के कारण पिटने का डर था। घर पहुँचने पर, उन्होंने देखा कि उनके बड़े भाई चिट्ठी लिख रहे हैं। बाद में, बड़े भाई ने उन्हें चिट्ठियाँ दीं और कहा कि उन्हें मक्खनपुर पोस्ट ऑफिस में भेजना है।
  • लेखक और उनके छोटे भाई ने चिट्ठियाँ अपनी टोपी में रखीं और डंडे लेकर चल पड़े। वे गाँव से चार फर्लांग दूर उस कुएँ के पास पहुँचे, जहाँ एक भयंकर काला साँप था। कुआँ कच्चा था और लगभग चौबीस हाथ गहरा था।
  • लेखक ने एक ढेला उठाया और एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर ढेला मार दिया। इस दौरान तीनों चिट्ठियाँ कुएँ में गिर गईं। लेखक को ऐसा लगा जैसे उनकी जान निकल गई हो। दोनों भाई कुएँ के पास बैठकर रोने लगे। कुछ समय बाद, उन्होंने तय किया कि लेखक कुएँ के अंदर जाकर चिट्ठियाँ निकालेंगे।
  • उन्होंने धोतियों और रस्सियों को बाँधकर एक बड़ी रस्सी बनाई। रस्सी के एक छोर पर डंडा बाँधकर उसे कुएँ में डाला गया। लेखक ने रस्सी के दूसरे छोर को अपने छोटे भाई के हाथ में दिया। कुएँ के अंदर साँप फ़न फैलाए बैठा था।
  • लेखक धीरे-धीरे कुएँ में उतरने लगे। उनकी आँखें साँप के फ़न पर थीं, लेकिन जहाँ साँप था, वहाँ डंडा चलाने की जगह नहीं थी। लेखक को लगा कि उनकी योजना असफल हो रही है। साँप ने उन पर कोई हमला नहीं किया, इसलिए उन्होंने डंडे से साँप के फ़न को दबाने की कोशिश नहीं की।
  • ज्यों ही लेखक ने डंडा चिट्ठियों की ओर बढ़ाया, साँप ने विष डंडे पर छोड़ दिया। लेखक का डंडा हाथ से छूट गया। साँप ने डंडे पर लगातार तीन बार प्रहार किया। लेखक के छोटे भाई को डर हुआ कि कहीं साँप ने लेखक को डस तो नहीं लिया।
  • लेखक ने डंडा उठाकर चिट्ठियाँ उठाने का प्रयास किया, लेकिन साँप ने फिर से वार किया। इस बार लेखक ने डंडा नहीं गिरने दिया। जैसे ही साँप का पिछला भाग लेखक के हाथों में लगा, उन्होंने डंडा फेंक दिया। तभी लेखक ने चिट्ठियाँ उठाईं और रस्सी में बाँध दिया।
  • रस्सी से बंधी चिट्ठियाँ ऊपर खींची गईं। नीचे गिरे डंडे को साँप के पास से लेने में बहुत कठिनाई हुई। लेखक को हाथों के बल पर ऊपर चढ़ना था। ग्यारह वर्ष की उम्र में 36 हाथ चढ़ने का साहसिक कार्य उन्होंने किया।
  • लेखक और उनके छोटे भाई ने वहीं पर विश्राम किया। जब लेखक ने 10वीं की परीक्षा पास की, तो उन्होंने यह साहसिक घटना अपनी माँ को सुनाई। उस समय उनकी माँ ने उन्हें अपनी गोद में बैठाकर उनकी प्रशंसा की।

श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय

  • प्रस्तुत पाठ या संस्मरण के लेखक श्रीराम शर्मा जी हैं। इनका जीवनकाल 1896 से 1967 तक रहा। शुरुआती दौर में अध्यापन कार्य करने के बाद वे स्वतंत्र रूप से लम्बे समय तक राष्ट्र और साहित्य सेवा में जुटे रहे। श्रीराम शर्मा जी हिन्दी में ‘शिकार साहित्य’ के अग्रणी लेखक माने जाते हैं।
  • इन्होंने ‘विशाल भारत’ के सम्पादक के रूप में विशेष ख्याति हासिल की। श्रीराम शर्मा जी की प्रमुख रचनाएँ हैं:
    • शिकार
    • बोलती प्रतिमा
    • जंगल के जीव (शिकार संबंधी पुस्तकें)
    • सेवाग्राम की डायरी
    • सन् बयालीस के संस्मरण

स्मृति पाठ के कठिन शब्द शब्दार्थ

  • परिधि – घेरा
  • एकाग्रचित्तता – स्थिरचित्त 
  • सूझ – उपाय
  • समकोण – 90° कोण
  • चक्षु:श्रवा – आँखों से सुनने वाला
  • आकाश-सुमन – कोरी कल्पना
  • पैंतरों – स्थिति
  • अचूक – खाली ना जाने वाला 
  • अवलंबन – सहारा
  • कायल – मानने वाला
  • गुंजल्क – गुत्थी
  • ताकीद – बार-बार चेताने की क्रिया
  • डैने – पंख
  • चिल्ला जाड़ा – बहुत अधिक ठण्ड 
  • आशंका – डर
  • मज्जा – हड्डी के भीतर भरा मुलायम पदार्थ
  • ठिठुर – काँपना 
  • झूरे – तोड़ना 
  • मूक – मौन 
  • प्रसन्नवदन – प्रसन्न चेहरा
  • उझकना – उचकना 
  • किलोले – क्रीड़ा 
  • मृगसमूह – हिरनों का झुण्ड
  • प्रवृत्ति – मन का किसी विषय की ओर झुकाव 
  • मृगशावक – हिरन का बच्चा
  • दाढ़ें – ज़ोर-ज़ोर से रोना
  • उद्वेग – बैचैनी 
  • कपोलों पर – गालों पर
  • दुधारी – दो तरफ़ से धार वाली
  • दृढ़ – पक्का
  • आलिंगन – गले लगना
  • आश्वासन – भरोसा
  • अग्र भाग – अगला हिस्सा
  • प्रतिद्वंदी – विपक्षी

01. गिल्लू – पाठ का सार

पाठ का सार

इस पाठ में लेखिका महादेवी वर्मा का एक छोटे, चंचल जीव गिलहरी के प्रति प्रेम झलकता है। उन्होंने इस पाठ में उसके विभिन्न क्रियाकलापों और लेखिका के प्रति उसके प्रेम से हमें अवगत कराया है। उन्होंने गिलहरी जैसे लघु जीव के जीवन का बड़ा अच्छे ढंग से चित्रण किया है।  

  • एक दिन लेखिका की नजर बरामदे में गिलहरी के एक छोटे से बच्चे पर पड़ी जो शायद घोंसले से गिर गया होगा जिसे दो कौवे मिलकर अपना शिकार बनाने की तैयारी में थे। लेखिका गिलहरी के बच्चे को उठाकर अपने रूम ले गयी और कौवे की चोंच से घायल बच्चे का मरहम-पट्टी किया। कई घंटे के उपचार के बाद मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा हो गया कि लेखिका की ऊँगली अपने पंजो से पकड़ने लगा।
  • तीन चार महीने में उसके चिकने रोएँ, झब्बेदार पूँछ और चंचल चमकती आँखें सभी को आश्चर्य में डालने लगीं। लेखिका ने उसका नाम गिल्लू रखा। लेखिका ने फूल रखने की एक हल्की डलिया में रुई बिछाकर तार से खिड़की पर लटका दिया जो दो साल तक गिल्लू का घर रहा।
  • गिल्लू ने लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह लेखिका के पैर तक आकर सर्र से पर्दे पर चढ़ जाता और फिर उसी तेजी से उतरता। वह दौड़ लगाने का काम तब तक करता जब तक लेखिका उसे पकड़ने के लिए न उठती। वह अपनी चमकीली आँखों से लेखिका के क्रियाकलापों को भी देखा करता। भूख लगने पर वह लेखिका को चिक-चिक कर सूचना देता था।
  • गिल्लू के जीवन में पहला बसंत आया। अन्य गिलहरियाँ जाली खिड़की के जाली के पास आकर चिक-चिक करने लगीं और गिल्लू भी जाली के पास जाकर बैठा रहता। इसे देखकर लेखिका ने जाली के एक कोना खोलकर गिल्लू को मुक्त कर दिया।
  • लेखिका के कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी जाली से बाहर चला जाता। वह दिन भर अन्य गिलहरियों के साथ उछलता-कूदता और शाम होते ही अपने झूले में वापस आ जाता। लेखिका के खाने के कमरे में पहुँचते ही गिल्लू भी वहाँ पहुँच जाता और थाली में बैठ जाना चाहता। बड़ी मुश्किल से लेखिका ने उसे थाली के पास बैठना सिखाया। वह वहीं बैठकर चावल का एक-एक दानासफाई से खाता। 
  • गिल्लू का प्रिय खाद्य पदार्थ काजू था। कई दिन काजू नहीं मिलने पर वह अन्य खानें की चीजें लेना बंद कर देता या झूले से नीचे फेंक देता था। उसी बीच लेखिका मोटर दुर्घटना में आहत हो गयीं जिससे उन्हें कुछ दिन अस्पताल में रुकना पड़ा। उन दिनों में गिल्लू ने अपना प्रिय पदार्थ काजू लेना काफी कर दिया था। लेखिका के घर लौटने पर वह तकिये पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हे पंजों से लेखिका सर और बालों को हौले-हौले सहलाता और एक सेविका की भूमिका निभाता।
  • गर्मियों में वह लेखिका के पास रखी सुराही पर लेट जाता और लेखिका के समीप रहने के साथ-साथ ठंडक में भी रहता। चूँकि गिलहरियों की उम्र दो वर्ष से अधिक नहीं होती इसलिए उसके जीवन का भी अंत आ गया। दिन भर उसने कुछ नहीं खाया-पीया। रात में वह झूले से उतरकर लेखिका के बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से उनकी उँगली पकड़कर चिपक गया। लेखिका ने हीटर जलाकर उसे ऊष्मा देने का प्रयास किया परन्तु प्रयास व्यर्थ रहा और सुबह की पहली किरण के साथ सदा के लिए सो गया।
  • लेखिका ने उसे सोनजुही की लता के नीचे उसे समाधि दी। सोनजुही में एक पीली कली को देखकर लेखिका को गिल्लू की याद आ गयी।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. सोनजुही – एक प्रकार के पीला फूल
  2. अनायास – अचानक
  3. हरीतिमा – हरियाली
  4. लघुप्राण – छोटा जीव
  5. छुआ-छुऔवल – चुपके से छूकर छुप और फिर छूना
  6. काकभुशुंडि – एक रामभक्त ब्राह्मण जो लोमश ऋषि के शाप से कौआ हो गए
  7. समादरित – विशेष आदर
  8. अनादरित – बिना आदर के
  9. अवतीर्ण – प्रकट
  10. कर्कश – कटु
  11. काकद्वय – दो कौए
  12. निश्चेष्ट – बिना किसी हरकत के
  13. स्निग्ध – चिकना
  14. विस्मित – आश्चर्यचकित
  15. लघुगात – छोटा शरीर
  16. अपवाद – सामान्य नियम से अलग
  17. परिचारिका – सेविका
  18. मरणासन्न – जिसकी मृत्यु निकट हो
  19. उष्णता – गर्मी
  20. पीताभ – पीले रंग का

04. मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: लेखक के बचपन के समय कौन-सा आन्दोलन जोर-शोर पर था?
उत्तर: 
लेखक के बचपन के समय आर्य समाज का सुधारवादी आन्दोलन जोर-शोर पर था और उनके पिताजी आर्य समाज रानीमंडी के प्रधान थे।

प्रश्न 2: लेखक की लाइब्रेरी का शुभारंभ कब हुआ?
उत्तर:
 लेखक को पाँचवी कक्षा में प्रथम आने पर अंग्रेजी की दो किताबें इनाम में मिली थी। लेखक के पिता जी ने अपनी अलमारी के एक खाने से अपनी चीजें हटा दीं और लेखक की दोनों पुस्तकें रख दी और कहा आज से यह तुम्हारा पुस्तकों का खाना है। इस प्रकार लेखक की लाइब्रेरी का शुभारंभ हुआ।

प्रश्न 3: लेखक की माताजी ने किसकी स्थापना की थी?
उत्तर: 
लेखक की माताजी ने स्त्री-शिक्षा के लिए आदर्श कन्या पाठशाला की स्थापना की थी।

प्रश्न 4: बच्चों में पुस्तकों के पठन की रुचि एवं उनसे लगाव उत्पन्न करने के लिए आप माता-पिता को क्या सुझाव देंगे?
उत्तर: 
बच्चों में पुस्तकों के पठन की रुचि एवं उनसे लगाव उत्पन्न करने के लिए मैं माता-पिता को पुस्तकों के महत्व के बारे में बताऊँगी। बच्चों के जीवन में पुस्तकों का बहुत महत्व है। पुस्तकें ज्ञान का भंडार होती हैं, जो बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाती हैं और उन्हें पुस्तकों में छिपे विभिन्न प्रकार की उपयोगी बातों और ज्ञान के बारे में बताऊँगी ताकि वे अपने बच्चों को पुस्तकें दिलाने से इनकार न करें।

प्रश्न 5: पिताजी के देहांत के बाद लेखक को किन- किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
 पिताजी के देहांत के बाद लेखक को कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा। लेखक को अपने स्कूल की फीस जुटाना मुश्किल था और किताबों को खरीद पाना भी मुश्किल था इसलिए लेखक पुरानी किताबें खरीदकर पढ़ा करते थे।

प्रश्न 6: लेखक की माँ की आँखों से आंसू क्यों छलक गये?
उत्तर: 
लेखक की माँ ने लेखक को फिल्म देखने के लिए दो रुपये दिए। लेकिन फिल्म शुरू होने से पहले ही लेखक को एक देवदास की पुस्तक दिखाई दी। लेखक ने फिल्म देखने की बजाय देवदास पुस्तक को दस आने में खरीद लिया और बाकी बचे हुए पैसे माँ को लाकर वापिस दे दिए। यह देखकर माँ की आँखों से आँसू छलक गये।

प्रश्न 7: लेखक के पिताजी ने लेखक से क्या वचन लिया?
उत्तर:
 लेखक की माताजी लेखक की पढ़ाई को लेकर चिंतित रहती थी इसलिए लेखक के पिताजी ने लेखक से वचन लिया की जिस तरह से वह अन्य पुस्तकें पढ़ता है उसे तरह से अपनी कक्षा के पाठ्यक्रम की पुस्तकें भी पढ़े।

प्रश्न 8: ‘मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय’ पाठ से आज के विद्यार्थियों को क्या प्रेरणा लेनी चाहिए?
उत्तर: 
‘मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय’ पाठ से आज के विद्यार्थियों को यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि बच्चों को पुस्तकों को सहेजकर रखना चाहिए। बच्चों को अपने माता-पिता का कहना मानकर मन लगाकर पढ़ाई करनी चाहिए।

03. कल्लू कुम्हार की उनाकोटी – Short and Long Question answer

प्रश्न 1: प्रस्तुत पाठ में त्रिपुरा के विषय में दी गई जानकारी को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
 प्रस्तुत पाठ में लेखक ने बताया है कि दिसंबर 1999 में ‘ऑन द रोड’ शीर्षक से तीन खंडों वाली एक टी०वी० श्रृंखला बनाने के सिलसिले में वह त्रिपुरा की राजधानी अगरतला गया था। उसने बताया कि त्रिपुरा भारत के सबसे छोटे राज्यों में से एक है। इसकी जनसंख्या वृद्धि की दर चौंतीस प्रतिशत से भी अधिक है। यह तीन ओर से बाँग्लादेश और एक ओर से भारत के मिज़ोरम व असम राज्य से जुड़ा हुआ है। यहाँ बाँग्लादेश के लोगों का गैर-कानूनी ढंग से आना-जाना लगा रहता है। असम और पश्चिम बंगाल के लोग भी यहाँ खूब रहते हैं।
यहाँ बाहरी लोगों के लगातार आने से जनसंख्या का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ा हुआ है। यह त्रिपुरा में आदिवासी असंतोष का भी मुख्य कारण है। इसके साथ-साथ त्रिपुरा अनेक धर्मों के लोगों के यहाँ बस जाने के कारण बहुधार्मिक समाज का उदाहरण भी बना हुआ है। त्रिपुरा में महात्मा बुद्ध और भगवान शिव की अनेक मूर्तियाँ हैं। यहाँ के उनाकोटी क्षेत्र को तो शैव तीर्थ के रूप में जाना जाता है। यहाँ का पूरा इलाका देवी- देवताओं की मूर्तियों से भरा पड़ा है। उनाकोटी में भगवान शिव की एक करोड़ से एक कम मूर्तियाँ हैं।

प्रश्न 2: उनाकोटी में शूटिंग करते समय शाम का मौसम अचानक कैसा हो गया ?
उत्तर:
 लेखक और उसके साथियों को उनाकोटी में शूटिंग करते-करते शाम के चार बज गए। शाम होते ही सूर्य उनाकोटी के ऊँचे पहाड़ों के पीछे छिप गया और चारों ओर भयानक अंधकार छा गया। अचानक मौसम में भी बदलाव आ गया। तभी कुछ ही मिनटों में वहाँ चारों ओर बादल घिर आए। बादलों ने गर्जन – तर्जन के साथ कहर बरपाना आरंभ कर दिया। उस समय लेखक को ऐसा लगा, मानो शिव जी का तांडव शुरू हो गया हो।

प्रश्न 3: त्रिपुरा में संगीत की जड़ें काफ़ी गहरी हैं। कैसे ?
उत्तर: 
त्रिपुरा को यदि सुरों का घर कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। त्रिपुरा में संगीत की जड़ें काफी गहरी हैं। बॉलीवुड के सबसे मौलिक संगीतकारों में से एक एस.डी बर्मन त्रिपुरा से ही आए थे। वे त्रिपुरा के राजपरिवार के उत्तराधिकारियों में से एक थे। यहीं लोकगायक हेमंत कुमार जमातिया हुए, जिन्होंने अपने गीतों से जनमानस को आनंदित किया।

प्रश्न 4: उत्तरी त्रिपुरा किस कार्य के लिए लोकप्रिय है ?
उत्तर: 
उत्तरी त्रिपुरा घरेलू उद्योगों और विकास का जीता-जागता नमूना है। यहाँ की घरेलू गतिविधियों में अगरबत्तियों के लिए बाँस की पतली सीकें तैयार करना सम्मिलित है। इन सीकों को अगरबत्तियाँ बनाने के लिए गुजरात तथा कर्नाटक भेजा जाता है। उत्तरी त्रिपुरा का मुख्यालय कैलाश शहर है। यह बाँग्लादेश की सीमा के बहुत नज़दीक है।

प्रश्न 5: किस घटना के कारण लेखक त्रिपुरा के उनाकोटी क्षेत्र की यादों में खो गया ?
उत्तर: 
एक दिन प्रातःकाल आकाश काले बादलों से भर गया। चारों ओर अँधेरा छा गया था। उस दिन सुबह-सुबह आकाश बिल्कुल ठंडा और भूरा दिखाई दे रहा था। बादलों की तेज़ गर्जना और बीच-बीच में बिजली का कड़क कर चमकना प्रकृति के तांडव के समान दिखाई दे रहा था। तीन साल पहले ठीक ऐसा ही लेखक के साथ त्रिपुरा के उनाकोटी क्षेत्र में हुआ था। वहाँ भी अचानक घनघोर बादल घिर आए थे और गर्जन -तर्जन के साथ प्रकृति का तांडव शुरू हो गया था। तीन साल पहले और उस दिन के वातावरण में पूर्ण समानता होने के कारण ही लेखक त्रिपुरा के उनाकोटी क्षेत्र की यादों में खो गया।

प्रश्न 6: लेखक के त्रिपुरा जाने का उद्देश्य क्या था ?
उत्तर: 
लेखक दिसंबर 1999 में ‘ऑन द रोड’ शीर्षक से तीन खंडों वाली एक टी.वी श्रृंखला बनाने के सिलसिले में त्रिपुरा की राजधानी अगरतला गया था। इसके पीछे उसका उद्देश्य त्रिपुरा की समूची लंबाई में आर-पार जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग- 44 से यात्रा करने और त्रिपुरा की विकास संबंधी गतिविधियों के बारे में जानकारी ग्रहण करके उसे अपनी टी०वी० श्रृंखला में प्रस्तुत करना था।

प्रश्न 7: लेखक ने अगरतला के विषय में क्या कहा है ?
उत्तर: 
अगरतला त्रिपुरा की राजधानी है। पहले अगरतला मंदिरों और महलों के शहर के रूप में जाना जाता था। उज्जयंत महल अगरतला का मुख्य महल है। इस महल में अब त्रिपुरा की विधानसभा बैठती है। यह महल राजाओं से आम जनता को हुए सत्ता हस्तांतरण को अभिव्यक्त करता है।