4. पर्वत प्रदेश में पावस – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न. 1. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ के आधार पर इंद्र के इंद्रजाल का भाव लिखिए।
उत्तर: 
इंद्र के इंद्रजाल का भाव यह है कि इंद्र मानो जादू के खेल दिखा रहा है।

प्रश्न. 2. पर्वत प्रदेश में पावस के दृश्य को कवि ने इन्द्रजाल क्यों कहा है ? 
उत्तर: पावस के दृश्य को कवि ने इन्द्रजाल इसलिए माना है, क्योंकि इस ऋतु में प्रकृति  पल-पल अपना रूप बदलती है तो ऐसा लगता है, मानो वास्तविकता न होकर कोई माया जाल हो अर्थात् मानो इंद्र ने ही यह जाल फैलाया है।

प्रश्न. 3. शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में क्यों धँस गए ?
उत्तर:
 शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में इसलिए धँस गए, क्योंकि जो धुआँ बादलों के रूप में उठ रहा था उससे उन्हें तालाब जलता हुआ नजर आ रहा था और ऐसा लग रहा है जैसे आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। वे जलने से बचने के लिए धरती में धँस गए थे।

प्रश्न. 4. झरने कविता में किसके गौरव का गान कर रहे हैं ? बहते हुए झरने की तुलना किससे की गई है ?
उत्तर: झरने पर्वतों (गिरि) का गौरव गान कर रहे हैं। बहते हुए झरने की तुलना मोती की लड़ियों से सुन्दर निर्झर जो झाग से भरे हैं उनसे की गई है।

प्रश्न. 5. कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों ?
अथवा
कवि ने तालाब की तुलना दर्पण से क्यों की है ?
उत्तर: 
कवि ने तालाब की तुलना दर्पण से इसलिए की है क्योंकि जिस प्रकार दर्पण में हमें अपना प्रतिबिंब देखने को मिलता है उसी प्रकार तालाब में पर्वत का महाकाय प्रतिबिंब दिखता है।

प्रश्न. 6. पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं ?
उत्तर:
 पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष नीरव आकाश को एकटक झाँककर देख रहे थे। वे अपनी जिज्ञासा और बढ़ती हुई ऊँचाई को प्रतिबिंबित करते हैं।

प्रश्न. 7. प्रतिबिंबित पहाड़ के दृश्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
 वर्षा-ऋतु में पर्वत के तालाब जल से भर गए हैं। तालाब के भीतर पहाड़ का प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है। उसे देखकर यों लगता है मानो करधनी के आकार वाला पहाड़ अपने हजारों फूलों के नयनों से तालाब रूपी दर्पण में अपने विशाल आकार को देख रहा है।

प्रश्न. 8. कवि ने उच्चाकांक्षा पर क्या व्यंग्य किया है ?
उत्तर:
 कवि ने मानव मन की उच्चाकांक्षा पर यह व्यंग्य किया है कि उच्चाकांक्षा वाले व्यक्ति पहाड़ी पेड़ों की तरह हमेशा कुछ चिंतित, मौन, खोए से प्रतीत होते हैं तथा वे हमेशा ऊँचा उठने की कामना से व्यग्र रहते हैं।

प्रश्न. 9. इंद्र को जलद-यान में विचरता हुआ क्यों दिखाया गया है ?
उत्तर
: कवि ने इंद्र को बादल रूपी विमान में घूम-घूमकर जादू बिखेरता दिखाया है। कवि ने यह कहा है कि वर्षा ऋतु के रंग-बिरंगे नित बदलते बादलों के रूप जादुई हैं। इन्हें जादू ही कहा जा सकता है। यह प्रभु का चमत्कार है, प्रकृति  का करिश्मा है।

प्रश्न. 10. इस पद्यांश में ‘मेखलाकार’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है ?
उत्तर:
 इस पद्यांश में ‘मेखलाकर’ शब्द पर्वतों की शृंखला के लिए प्रयोग किया है जो प्रकृति  की मेखला (करधनी) के रूप में प्रतीत होती है।

प्रश्न. 11. पर्वत किसमें अपना प्रतिबिम्ब देख रहा है ?
उत्तर: 
पर्वत तालाब रूपी जलदर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देख रहा है।

प्रश्न. 12. पल-पल क्या परिवर्तित हो रहा है ?
उत्तर: 
पल-पल प्राकृतिक दृश्य परिवर्तित हो रहे हैं।

प्रश्न. 13. किसे ‘गिरि का गौरव गाने वाले’ कहा गया है ?
उत्तर:
 पर्वत से झरने वाले झरनों को ‘गिरि का गौरव गाने वाले’ कहा गया है।

प्रश्न. 14. झरने क्या कर रहे हैं ?
उत्तर:
 झरने पर्वतों का यशगान कर रहे हैं।

प्रश्न. 15. झरने किसके समान लग रहे हैं ?
उत्तर:
 झरने पर्वतों के गले में पड़ी मोती की माला के समान लग रहे हैं।

प्रश्न. 16. ‘मद में नस-नस उत्तेजित कर’ पंक्ति का क्या आशय है ?
उत्तर: 
आशय-झरनों का सौंदर्य मादक, तन-मन को उल्लास, उमंग स्फूर्ति और उत्तेजना का संचार कर देता है।

प्रश्न. 17. वृक्ष आकाश की ओर कैसे देख रहे हैं ?
उत्तर: 
वृक्ष आकाश की ओर एकटक, अटल और चिंतित होकर देख रहे हैं।

प्रश्न. 18. ‘उड़ गया अचानक लो भूधर’ पंक्ति का क्या आशय है ?
उत्तर:
 आशय-पर्वतीय प्रदेशों में अचानक घने बादलों के आ जाने के कारण सारा दृश्य अदृश्य हो जाता है।

प्रश्न. 19. ‘रव-शेष रह गए हैं निर्झर’ पंक्ति का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
 पंक्ति का तात्पर्य है कि झरने की आवाज के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा है।

प्रश्न. 20. प्रकृति  में कौन-कौन से परिवर्तन दिखायी दे रहे हैं ?
उत्तर: आकाश को धरती पर टूट पड़ता हुआ समझकर और तालाब को बादलों रूपी धुएँ में जलता समझकर शाल वृक्ष धरती में धँसते हुए प्रतीत हो रहे हैं।

प्रश्न. 21. कौन-से वृक्ष धरती में धँस गए ?
उत्तर:
 शाल के वृक्ष धरती में धँस गए।

प्रश्न. 22. इन्द्र देवता किसमें सवार होकर घूम रहे हैं ?
उत्तर:
 इन्द्र देवता जलदयान अर्थात् बादल रूपी विमान में सवार होकर घूम रहे हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न. 1. ‘पावस’ में गिरि का गौरव कौन गा रहा है और उत्तेजना का संचार वह कैसे कर पाता है?
उत्तर: (i) झरना
(ii) अपनी आवाज और गति से
व्याख्यात्मक हल:
‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में बताया गया है कि जब पहाड़ों पर वर्षा ऋतु में बादल बरसते हैं तब पर्वतों से प्रवाहित होने वाले झरने गिरि का गौरव गाते हुए पृथ्वी पर गिरते हैं और अपनी आवाज और गति से नस-नस में उत्तेजना का संचार कर पाते हैं।

प्रश्न. 2. कवि पंत ने पर्वत की विशालता को किस प्रकार चित्रित किया है?
उत्तर:
 कवि पंत के अनुसार प्रकृति  पल-पल अपना रूप बदलती है। पर्वत मंडलाकार बहुत विशाल हैं। उस पर फूल रूपी हजारों आँखें अपनी परछाईं को तालाब में देख रही हैं। पर्वत की विशालता इस बात से पता चलती है कि उसे निहारने के लिए केवल दो जोड़ी आँखें नहीं हैं बल्कि हजारों आँखें हैं।

प्रश्न. 3. ‘मेखलाकार’ शब्द का क्या अर्थ है ? कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है ?
उत्तर:
 ‘मेखलाकार’ शब्द का अर्थ है- करधनी के आकार की पहाड़ की ढाल। कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ पर्वत और पर्वतमालाओं के सौंदर्य का वर्णन करने के लिए किया है। जब वर्षा ऋतु में पर्वतों के प्रकृति  वेश में पल-पल जो परिवर्तन होता है, उसको बताने के लिए किया है।

प्रश्न. 4. ”सहस्र दृग-सुमन“ से क्या तात्पर्य है ? कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा ?
उत्तर: 
”सहस्र दृग-सुमन“ से तात्पर्य यहाँ हजारों पुष्प रूपी आँखों से है। कवि ने इस पद का प्रयोग पर्वत की चोटियों के विस्तृत रूप को देखकर किया होगा।

प्रश्न. 5. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए-
(i) गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
है झाँक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष अटल कुछ चिंता पर।

(ii) यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।
(iii) है टूटा पड़ा भू पर अंबर।
उत्तर: (i) कवि इन पंक्तियों के माध्यम से पर्वतों के ऊपर उग आए वृक्षों की शोभा के विषय में बताते हुए कह रहे हैं-पर्वतों के हृदय से उठ-उठकर वृक्ष ऊँचे हो गए हैं। जो तरु हैं वे ऊँची इच्छा वालों की तरह शांत आकाश की ओर एकटक भाव से झाँक रहे हैं। जैसे कोई महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अपनी इच्छाओं के कारण ऊँचाई की ओर देखता हुआ आगे बढ़ता है।
(ii) कवि प्रस्तुत पंक्तियों में कह रहे हैं जैसे-बादल रूपी विमान आकाश में घूम रहा हो ऐसा लग रहा था जैसे कोई जादूगर अपना खेल दिखा रहा हो। जिस समय शाल के वृक्ष धरती में समा गए थे, उस समय तालाब से धुआँ उठ रहा था जो आकाश में बादल रूपी विमान बनकर बीच-बीच में घूम रहा था। जैसे इंद्रजाल वाला जादूगरी के खेल दिखा रहा हो।
(iii) ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ (‘वारिद’ से संकलित) कविता पाठ से ली गई है। इन पंक्तियों में कवि श्री सुमित्रानन्दन पंत जी कह रहे हैं, जो पहाड़ों के ऊपर बादल वर्षा करते हुए गर्जना कर रहे थे अब केवल झरनों के जल के गिरने का शब्द शेष रह गया था, वही स्वर सुनाई दे रहा था। ऐसा लगता था मानो पृथ्वी पर आकाश टूट पड़ा हो।

प्रश्न. 6. पावस ऋतु में प्रकृति  में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं ? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 पावस ऋतु में प्रकृति  में पर्वत प्रदेश के स्वरूप में प्रकृति  का वेश बदल जाता है। ताल-तालाब जल से युक्त हो जाते हैं, पहाड़ों की चोटियों से जल की बूँदें झर-झर कर गिरती हैं, वृक्ष हरे-भरे हो जाते हैं, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु ग्रीष्म के ताप से पावस ऋतु में मुक्त हो जाते हैं। चारों ओर प्रकृति  हरी-भरी हरियाली से युक्त हो जाती है। जो भूमि, पेड़-पौधे ग्रीष्म के प्रचंड तप से झुलस जाते हैं, वे हरे भरे एवं प्रसन्न दिखाई देते हैं।

प्रश्न. 7. बादलों के उठने तथा वर्षा होने का चित्रण ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ के आधार पर अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
 बादल अचानक पहाड़ों से इतने भयानक और विशाल आकार में गरजते हुए ऊपर उठे कि जैसे कोई पहाड़ बादल-रूपी पंख फड़-फड़ाकर आकाश में उड़ गया हो। थोड़ी ही देर में बादल इस तरह धरती पर बरस पड़े मानो आकाश ने धरती पर आक्रमण कर दिया हो। उस समय शाल के पेड़ डर के मारे धरती में धँस गए और तालाब से धुआँ उठने लगा।

प्रश्न. 8. वृक्ष आसमान की ओर चिंतित होकर क्यों देख रहे हैं? ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 वृक्ष महत्वाकांक्षाओं के प्रतीक हैं इसलिए उन्हें पूरा करने के लिए उनमें चिंता है।
व्याख्यात्मक हल: 
वृक्ष आसमान की ओर चिंतित होकर इसलिए देख रहे हैं क्योंकि वे महत्त्वाकांक्षाओं के प्रतीक हैं और उन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की चिंता है। वे हमेशा आगे बढ़ने व ऊँचा उठने की कामना से व्यग्र रहते हैं।

3. मनुष्यता – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न. 1. सरस्वती किसकी कथा कहती हैं?
उत्तर:
 सरस्वती उदार व्यक्ति की कथा कहती हैं।

प्रश्न. 2. उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?
उत्तर: 
उदार व्यक्ति की पहचान उसके कार्यों से हो सकती है।

प्रश्न. 3. मनुष्यता कविता के अनुसार अनर्थ क्या है?
उत्तर:
 मनुष्यता कविता के अनुसार अनर्थ एक भाई का दूसरे भाई के कष्टों का हरण न करना है।

प्रश्न. 4. मनुष्यता कविता के अनुसार मनुष्य कौन है?
उत्तर:
 मनुष्यता कविता के अनुसार मनुष्य वह है जो मनुष्य के लिए मरता है।

मनुष्यता कवि – मैथिलीशरण गुप्तलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. ‘मनुष्यता’ कविता में कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा गया है और क्यों ?
अथवा
कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है ?

उत्तर: मनुष्यता कविता में कवि ने उस मृत्यु को सुमृत्यु कहा है जो व्यक्ति के मरने के बाद भी उसके काम आती है और उसके संसार में याद रखी जाती है। जब भी उस व्यक्ति की स्मृति ताजगी से याद आती है, उसे उसकी मौत के बाद भी जीवित महसूस करने का अनुभव होता है। इसीलिए कवि ने उस मृत्यु को सुमृत्यु कहा है।

प्रश्न 2. ‘मनुष्यता’ कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि पशु-प्रवृत्ति किसे कहा गया है और मनुष्य किसे माना गया है ?
उत्तर:
 कवि के अनुसार जो मनुष्य स्वयं अपने लिए ही नहीं जीता, बल्कि समाज के लिए जीता है, वह कभी नहीं मरा करता। ऐसा मनुष्य संसार में अमर हो जाता है, स्वयं अपने लिए खाना, कमाना और जीना तो पशु का स्वभाव है। सच्चा मनुष्य वह है जो सम्पूर्ण मनुष्यता के लिए जीता और मरता है।

प्रश्न 3. कवि ने उदार व्यक्ति की क्या पहचान बताई है?
उत्तर:
 मनुष्यता कविता में कवि ने उदार व्यक्ति की पहचान स्पष्ट करते हुए कहा है कि जो मनुष्य दूसरों के प्रति दया भाव, सहानुभूति, परोपकार की भावना, करुणा भाव, समानता, दानशीलता, विवेकशीलता, धैर्य, साहस, गुणों से परिपूर्ण होता है वह व्यक्ति उदार कहलाता है। ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा समाज के लोगों द्वारा की जाती है तथा जो यश कीर्ति द्वारा समाज में आदर पाता है।

प्रश्न 4. कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?
उत्तर:
 कवि ने निम्न पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए-
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।

प्रश्न 5. मैथिलीशरण गुप्त ने गर्व रहित जीवन बिताने के लिए क्या तर्क दिए हैं ?
उत्तर:
 मैथिलीशरण गुप्त ने गर्व रहित जीवन बिताने के लिए तर्क देते हुए कहा है कि संसार में रहने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि धन सपत्ति तुच्छ वस्तु है और हम सबके साथ सदैव ईश्वर है। हम अनाथ न होकर सनाथ हैं।

प्रश्न 6. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं ? 
उत्तर: ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से हम यह समझते हैं पृथ्वी पर निवास करने वाले, समस्त मानव प्राणी मनुष्य हैं जो बंधुत्व (भाई) भावना से युक्त हैं। यही सबसे बड़ा ज्ञान है। उदाहरणार्थ-संकट से ग्रस्त, आपदा से युक्त होने पर हम परिचित-अपरिचित व्यक्ति की सहायता करते हैं। यही मनुष्य मात्र के प्रति बंधुत्व भाव है।

प्रश्न 7. इतिहास में कैसे व्यक्तियों की चर्चा होती है और क्यों ? ‘मनुष्यता’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर: इतिहास में उन व्यक्तियों की चर्चा होती है जो इस संसार के प्राणियों के साथ एकता और आत्मीयता का भाव रखता हो। ऐसे उदार व्यक्ति की प्रशंसा उसे हमेशा सजीव बनाए रखती है। उसी की प्रशंसा चारों ओर सुनाई देती है सारा संसार भी उसी उदार व्यक्ति की पूजा करता है। उदार व्यक्ति सारे संसार में अखंडता का भाव भरता है।

प्रश्न 8. कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है ?
उत्तर:
 इस कविता में कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा दी है क्योंकि हम सभी एक ही परिवार के हैं और एक ही माँ की गोद में पले हैं। इससे हमें एक दूसरे के साथ मिलजुलकर रहना चाहिए और एक दूसरे की मदद करना चाहिए। हमें एकता की शक्ति से लगाव करना चाहिए ताकि हम दुनिया में अच्छाई फैला सकें।

प्रश्न 9. व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
जीवन व्यतीत करते समय व्यक्ति को निडर और मनुष्यता से युक्त होना चाहिए। वह महापुरुषों से प्रेरणा लेकर उदार और परोपकारी व्यक्ति बनना चाहिए। वह अभिमान रहित होकर सभी मनुष्यों को अपना बंधु मानते हुए सद्कर्म करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए।

2. पद – Short Questions answer

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न. 1. कवयित्री अपने प्रभु से क्या प्रार्थना कर रही है ?
उत्तर:
 कवयित्री प्रभु से अपने दुःख दूर करने की प्रार्थना कर रही है।

प्रश्न. 2. ईश्वर ने किस-किसके दुःखों को दूर किया है ?
उत्तर:
 ईश्वर ने द्रोपदी, भक्त प्रहलाद, ऐरावत हाथी आदि के दुःखों को दूर किया है।

प्रश्न. 3. द्रौपदी की लाज रखने के लिए प्रभु ने क्या चमत्कार किया ?
उत्तर
: द्रौपदी की लाज बचाने के लिए प्रभु ने उसका चीर बढ़ाया।

प्रश्न. 4. कृष्ण ने नरहरि का रूप क्यों धारण किया ? 
उत्तर: कृष्ण ने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरहरि का रूप धारण किया।

प्रश्न. 5. मीराबाई श्याम की चाकरी क्यों करना चाहती हैं ? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मीराबाई श्रीकृष्ण की चाकरी क्यों करना चाहती हैं ?
उत्तर
: मीराबाई श्याम (श्रीकृष्ण) की चाकरी इसलिए करना चाहती हैं, क्योंकि उनकी चाकरी करने पर मीरा को नित्य दर्शन का लाभ मिलेगा, वृंदावन की कुंज गली में गोविन्द की लीलाओं को गा सकेंगी और उन्हें भक्ति भाव का साम्राज्य प्राप्त हो जाएगा।

प्रश्न. 6. मीरा कृष्ण से क्या प्रार्थना कर रही हैं ?
उत्तर:
 मीरा कृष्ण से उन्हें अपनी सेविका बनाने के लिए प्रार्थना कर रही हैं।

प्रश्न. 7. ‘चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ’ का आशय क्या है ?
उत्तर:
 आशय-आपकी दासी बनकर बाग लगाऊँगी और रोज आपके दर्शन करूँगी।

प्रश्न. 8. मीरा कृष्ण की लीलाओं का गुणगान कहाँ करना चाहती हैं ?
उत्तर:
 मीरा कृष्ण की लीलाओं का गुणगान वृन्दावन की कुँज गलियों में करना चाहती हैं।

प्रश्न. 9. कृष्ण की चाकरी करने पर मीरा को कौन-सी जागीर प्राप्त होगी ? 
उत्तर: कृष्ण की चाकरी करने पर मीरा को कृष्ण  की भक्ति की जागीर प्राप्त होगी।

प्रश्न. 10. भाव-भक्ति को जागीर क्यों कहा गया है ? उसके लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर:
 किसी भी सच्चे भक्त के लिए सबसे बड़ी जागीर है-उसका भगवान। भगवान को पाने का सर्वाेत्तम साधन है-भक्ति। मीरा भावपूर्ण भक्ति की उपासिका थीं। उसी के माध्यम से वे अपने कृष्ण  को पा सकती थीं। इसलिए भाव-भक्ति उनके लिए जागीर के समान थी।

प्रश्न. 11. ‘मोर मुगट’ शब्द का तात्पर्य क्या है ?
उत्तर:
 ‘मोर मुगट’ शब्द का तात्पर्य है ‘मोर पंख से युक्त मुकुट’।

प्रश्न. 12. कृष्ण के गले में क्या पड़ा है ?
उत्तर: 
कृष्ण के गले में वैजन्ती माला पड़ी है।

प्रश्न. 13. मीरा ऊँचे-ऊँचे महलों के बीच-बीच में ‘बारी’ क्यों बनाना चाहती हैं ?
उत्तर:
 मीरा ऊँचे-ऊँचे महलों के बीच-बीच में ‘बारी’ बनकर श्रीकृष्ण  के दर्शन कर सकें।

प्रश्न. 14. ‘कुसुम्बी’ का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: 
‘कुसुम्बी’ का तात्पर्य है-गहरा लाल।

प्रश्न. 15. मीरा श्रीकृष्ण से क्या प्रार्थना करती हैं ?
उत्तर:
 मीरा श्रीकृष्ण से उन्हें यमुना के तट पर आधी रात के समय दर्शन देने की प्रार्थना करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न. 1. ‘हरि आप हरो……’ पद में मीरा ने किन-किन पर की गई कृपा को स्मरण करते हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती की है ?
उत्तर:
 इस पद में हरि से अपनी पीड़ा को हरने की विनती करते समय मीरा उन्हें उनकी दया का स्मरण कराती हैं कि उन्होंने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई थी, भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए नरसिंह रूप धारण किया था तथा डूबते गजराज को मगरमच्छ के मुँह से बचाया था। मीरा चाहती हैं कि उसी प्रकार कृष्ण अपनी इसी मर्यादा के अनुरूप उनकी (मीरा की) पीड़ा का भी हरण कर लें।

प्रश्न. 2. कौन-कौन से उदाहरण देकर मीरा ने हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती किस प्रकार की है ?
अथवा
मीरा ने हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती किस प्रकार की है ?
उत्तर: 
मीराबाई श्रीकृष्ण से बड़े ही विनम्र शब्दों में अपनी पीड़ा हरने के लिए प्रार्थना करती हुई कहती हैं, कि हे प्रभु! आप हमारी पीड़ा दूर करो। जिस प्रकार आपने द्रौपदी की लाज चीर बढ़ाकर की थी, भक्त प्रहलाद की रक्षा नरसिंह रूप धारण करके की थी, डूबते हुए हाथी की रक्षा की, मगरमच्छ को मारकर कुँजर की रक्षा की थी, उसी प्रकार आप मेरी भी रक्षा करें।

प्रश्न. 3. भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं-सोदाहरण सिद्ध कीजिए। 
उत्तर: भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाने के लिए उसे वस्त्र प्रदान किए। उसे सभा में निर्वस्त्र होने से बचा लिया। भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरसिंह का रूप धारण किया तथा हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ डाला। इसी भाँति उन्होंने डूबते हुए हाथी के मुख से हरि नाम सुनकर उसे मगरमच्छ के मुँह ये बचा लिया।

प्रश्न. 4. चाकरी से मीरा को क्या लाभ मिलेगा ?
उत्तर:
 चाकरी से मीरा को कृष्ण दर्शन का लाभ मिलेगा। वह नित्य श्रीकृष्ण के दर्शन कर सकेगी और वृन्दावन की कुंज गली में गोविन्द की लीलाओं को गा सकेगी। जिससे उसे भक्तिभाव का साम्राज्य प्राप्त हो जाएगा।

प्रश्न. 5. मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन कैसे किया है ?
उत्तर: 
मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन इस प्रकार किया है-श्रीकृष्ण का रूप-सौंदर्य और मुखाकृति आकर्षित करने वाली है, उन्होंने अपने सिर पर मोर के पंखों का मुकुट पहन रखा है, गले में वैजन्ती के पुष्पों की माला है, शरीर पर पीले रंग का वस्त्र अर्थात् पीताम्बर सुशोभित हो रहा है, हाथों में बाँसुरी को धारण कर वृंदावन में यमुना के तट पर गायें चराने जा रहे हैं।
प्रश्न. 6. मीरा कृष्ण के लिए कुसुम्बी साड़ी क्यों पहनना चाहती हैं ?
उत्तर:
 

  • कृष्ण भी पीताम्बर धारण करते हैं। 
  • कुसुम्बी साड़ी जोगन मीरा के अनुकूल है।

व्याख्यात्मक हल:
मीरा कृष्ण दर्शन के लिए कुसुम्बी साड़ी इसलिए पहनना चाहती है क्योंकि वह अपने आप को पीताम्बर धारण करने वाले कृष्ण के सामने जोगन के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। कुसुम्बी साड़ी जोगन मीरा के अनुकूल है क्योंकि कुसुम्बी का अर्थ है- गहरा लाल।

प्रश्न. 7. मीरा कृष्ण को अपना प्रियतम मानती हैं। उनकी भक्ति में प्रेम का पुट अधिक है- सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
 मीरा कृष्ण को अपना प्रियतम मानती हैं इसलिए वह उनके सुन्दर छबीले रूप की आराधना करती हैं और लाल साड़ी पहनकर उनसे यमुना तट पर मिलना चाहती हैं। इससे स्पष्ट है कि उनकी भक्ति में प्रेम का पुट अधिक है।

प्रश्न. 8. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:
(क) हरि आप हरो जन री भीर।
द्रौपदी की लाज राखी, आप बढ़ायौ चीर।
भगत कारण रूप नर हरि, धर्यौ आप शरीर।
(ख) बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुज्जर पीर।
दासी मीरा लाल गिरधर, हरौ म्हारी भीर।।
(ग) चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूँ बाताँ सरसी।।
उत्तर: 
(क) भाव- मीराबाई ईश्वर से भक्त एवं व्यक्तियों की पीड़ा दूर करने की प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि द्रौपदी की लाज बचाने के लिए भगवान ने चीर बढ़ा दिया था तथा भक्त प्रहलाद की रक्षा हेतु नरसिंह का रूप हरि ने धारण किया था।
(ख)भाव- मीराबाई ईश्वर से प्रार्थना कर रही है कि जिस प्रकार डूबते गजराज की रक्षा मगरमच्छ को मारकर की थी उसी प्रकार आप अपनी दासी मीरा की पीड़ा को दूर करो।
(ग) भाव- मीराबाई श्रीकृष्ण की चाकरी करना चाहती हैं। अतः वह श्रीकृष्ण से उन्हें चाकर रखने की प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि चाकरी करने पर उन्हें बदले में दर्शन पाने की इच्छा है। जो स्मरण पाएँगी उसे वे खर्च समझकर रख लेंगी। भक्ति-भाव की जागीर उन्हें प्राप्त हो जाएगी।

प्रश्न. 9. ‘द्रोपदी री लाज राखी’ के आधार पर भगवान के रक्षक-रूप का वर्णन कीजिए। मीरा के पद के आधार पर लिखिए।
उत्तर: कृष्ण अपने भक्तों और प्रियजनों की रक्षा करने वाले हैं। द्रोपदी की लाज बचाकर उन्होंने यह साबित कर दिया।
व्याख्यात्मक हल:
भगवान कृष्ण अपने भक्तों और प्रियजनों की रक्षा करते थे। एक बार पांडवों ने जुए में द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया और हार गए। कौरव जीत गए। दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को सभा में खींच लाए और उसे निर्वस्त्र कर दे। तब किसी पांडव ने उसकी रक्षा न की। द्रौपदी ने मन ही मन कृष्ण को याद किया। कृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने द्रौपदी का चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाई।

प्रश्न. 10. द्रौपदी की लाज बचाने के लिए कृष्ण ने क्या किया था? मीरा के पद के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 

  • चीर बढ़ाया
  • संकट में केवल प्रभु सहायक, उन्होंने उसके सम्मान की रक्षा की

व्याख्यात्मक हल:
द्रौपदी की लाज बचाने के लिए कृष्ण ने कौरवों की सभा में द्रौपदी चीर-हरण के समय द्रौपदी का चीर बढ़ाया था। इस प्रकार संकट के समय प्रभु ने भक्त की सहायता करके उसके सम्मान की रक्षा की थी।

यहाँ पढ़ें: “पद” पाठ की व्याख्या
पद पाठ का सार यहाँ से पढ़ें।

1. साखी – Short Questions answer

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1: कबीर की साखी के सदंर्भ में स्पष्ट कीजिए कि मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है ? 
उत्तरः 
मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है, क्योंकि मीठी वाणी सुनने में मधुर होती है जिसे सुनकर हमारा तन और मन प्रसन्न होता है। उसका प्रभाव व्यक्ति को संतोष एवं शान्ति प्रदान करता है। मीठी वाणी से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करके असंभव कार्य को भी संभव किया जा सकता है।


प्रश्न 2: ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते ? कबीर की साखी के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
 ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे नहीं देख पाते हैं क्योंकि मनुष्य अहंकारी, अज्ञानी व अविश्वासी है और स्वयं को इस संसार में महत्त्वपूर्ण मानता है।


प्रश्न 3: ‘कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़े वन माँहि।’ इस पंक्ति द्वारा कबीर क्या संदेश देना चाहते हैं ? 
उत्तरः
 इस पंक्ति द्वारा कबीर यह संदेश देना चाहते हैं कि जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में स्थित रहती है किन्तु मृग इस तथ्य को जानता नहीं और वह उसे जंगल में ढूंढ़ता फिरता है। उसी प्रकार परमात्मा मनुष्य के हृदय में स्थित है परन्तु वह उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या अन्य तीर्थों पर खोजता फिरता है।


प्रश्न 4: संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुःखी कौन ? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं ? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः
 संसार में सुखी व्यक्ति वह है जो आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है। जो सुखी नहीं है, जिसके जीवन में आनंद नहीं है वह कबीर के अनुसार दुःखी है।
यहाँ सोने का अर्थ अज्ञानता की ‘नींद’ से है और जागना ‘ज्ञान से युक्त’ होने का प्रतीक है। इसका प्रयोग ‘साखी’ में अर्थ, सौंदर्य एवं संसार की नश्वरता, ईश्वर भक्ति के लिए किया गया है।


प्रश्न 5: कबीर के अनुसार, इस संसार में कौन दुःखी है, कौन सुखी ?
उत्तरः कबीर के अनुसार, इस संसार में सुखी वह है, जो अज्ञानी है। इसलिए वह संसार को ही अन्तिम सत्य मानकर उसे भोगता है और सुख अनुभव करता है। दूसरी ओर जो प्रभु के रहस्य को जान लेता है, वह विरह के कारण दिन-रात तड़पता है। इसलिए वह संसार की दृष्टि से दुःखी है।


प्रश्न 6: कबीर के अनुसार ‘निन्दक’ किस प्रकार हमारे स्वभाव को निखारने में सहायक होता है ? वे निन्दक के साथ कैसा व्यवहार करने का सुझाव देते हैं ? 
उत्तरः
 निन्दक अपनी आलोचनाओं से हमें हमारी बुराइयों का ज्ञान कराता है और हम उन्हें दूर कर लेते हैं। बुराइयों के दूर हो जाने से हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है, मन के सारे कलुष मिट जाते हैं। निंदक बिना साबुन-पानी का प्रयोग किए, अपनी आलोचनाओं से चित्त को निर्मल कर देता है। इसलिए कबीर निंदक को अपने निकट ही रखने का सुझाव देते हैं।


प्रश्न 7: कबीर के विचार से निन्दक को निकट रखने के क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तरः 
कबीर के विचार से निंदक को निकट रखने से निम्नलिखित लाभ हैं-
(क) निंदक निकट रहने पर बिना साबुन एवं पानी के हमारे स्वभाव को स्वच्छ तथा निर्मल करता है।
(ख) आलोचक हमारी कमजोरियाँ उजागर करता है, जिनको हम सुधार कर दूर कर लेते हैं।
(ग) बुराइयाँ दूर होने पर मनुष्य उच्च पद को प्राप्त करने योग्य बन जाता है।


प्रश्न 8: कबीर के अनुसार निन्दक कौन होता है ? उन्होंने उसे अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक क्यों माना है ? 
उत्तरः
 निन्दक का कार्य हमेशा लोगों की निन्दा करना होता है। कबीर के अनुसार हमें सहनशील होकर अपनी निन्दा सुननी चाहिए। जब निन्दक उँगली उठाकर हमारी गलतियों के प्रति सचेत करता है तब हम अपने व्यवहार संबंधी दोषों के प्रति सतर्क हो जाते हैं और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं।


प्रश्न 9: ‘एकै आषिर पीव का’ पढ़ै सु पंडित होइ’-इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है ?
उत्तरः 
‘एकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ।’-इस पंक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है जिस व्यक्ति ने प्रेम के एक अक्षर को पढ़ लिया है, वह विद्वान् हो जाता है। अर्थात् जिसने प्रेम का व्यावहारिक अनुभव (ज्ञान) प्राप्त कर लिया है, वही संसार में सबसे बड़ा विद्वान् है।


प्रश्न 10: कबीर के अनुसार संसार में क्या व्यर्थ है ? 
उत्तरः 
कबीर के अनुसार पुस्तकीय ज्ञान व्यर्थ है। इसे पढ़कर कोई भी व्यक्ति ज्ञानी नहीं बनता। इसी प्रकार मुँह मुँड़ाना, राम-नाम का जप करना आदि भी व्यर्थ है। राम के ज्ञान के बिना इनका कोई मूल्य नहीं है।


प्रश्न 11:  कबीर की उद्धत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः 
कबीर की साखियों की भाषा की विशेषता है कि यह जन-जन की भाषा है। उन्होंने जन चेतना और जन भावनाओं को अपनी सधुक्कड़ी भाषा द्वारा साखियों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। अपनी चमत्कारिक भाषा के कारण आज भी इनके दोहे लोगों की जुबान पर हैं।


प्रश्न 12: अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है ?
अथवा
कबीर ने निन्दकों को अपने समीप रखने की बात क्यों कही है ? 
उत्तरः अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए, कबीर ने यह उपाय सुझाया है कि हम अपने निंदक (आलोचकों) को अपने समीप रखें, जो समय-समय पर हमारी कमियों को बताकर हमारे स्वभाव को निर्मल रखे।


प्रश्न 13: कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञान क्या है ? 
उत्तरः कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञान पुस्तकों से प्राप्त नहीं होता है। पुस्तकें पढ़-पढ़ कर तो लोग जीवन को व्यर्थ ही गँवाते हैं। सच्चा ज्ञान ‘पी’ अर्थात् प्रिय से प्राप्त होता है अर्थात् जब हम ‘प्रिय’ अर्थात् ‘परमात्मा’ से प्रेम करना सीख जाते हैं तो हमें सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।


प्रश्न 14: कवि किस ज्ञान को वास्तविक ज्ञान मानते हैं? 
उत्तरः कवि के अनुसार वास्तविक ज्ञान वह ज्ञान है जिससे मानव के मन में मानव के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।


प्रश्न 15: ‘घर जाल्या आपणाँ, से क्या तात्पर्य है? 
उत्तरः ‘घर जाल्या आपणाँ, के माध्यम से कवि मनुष्य को ‘भौतिक आकर्षणों’ से विमुख करना चाहते हैं और मनुष्य को ज्ञान मार्ग की ओर अग्रसर होने का संदेश देना चाहते हैं।

14. कारतूस – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. वजीर अली कौन था? उसके चरित्र की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था। इस प्रकार जो अंग्रेजों की ब्रिटिश कम्पनी की सैनिक छावनी में प्रवेश कर कर्नल से कारतूस प्राप्त कर सकता है, वह साधारण व्यक्ति या सिपाही नहीं हो सकता। वज़ीर अली ने एक जाँबाज सिपाही की तरह प्राणों की बाजी लगाकर कारतूस हासिल किए। उसका यह कार्य उसे एक जाँबाज सिपाही सिद्ध करता है और हम वज़ीर अली को जाँबाज सिपाही कह सकते हैं।

प्रश्न 2. लेफ्टीनेंट को ऐसा क्यों लगा कि कम्पनी के खिलाफ सारे हिन्दुस्तान में एक लहर दौड़ गई है? ‘कारतूस’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लेफ्टीनेंट को ऐसा इसलिए लगा कि कम्पनी के खिलाफ सारे हिन्दुस्तान में एक लहर दौड़ गई है, क्योंकि हिन्दुस्तान की जनता कम्पनी के विरोध में आ गई थी, वह वज़ीर अली जैसे जाँबाज यौद्धाओं की तरफदारी कर उनका साथ दे रही थी। गाँधी जी जैसे नेताओं के आह्नान पर भारतीय जनता सत्याग्रह, आन्दोलनों में हिस्सा लेकर कम्पनी के खिलाफ बगावत पर उतर आई थी।

प्रश्न 3. ‘मुट्ठी भर आदमी, मगर ये दमखम’ कथन से क्या तात्पर्य है ? ‘कारतूस’ के आधार पर लिखिए।
उत्तर: 
इसका तात्पर्य है कि वज़ीर अली के पास मुट्ठी भर आदमी थे, अर्थात् बहुत कम आदमियों की सहायता या साथ था, फिर भी इतनी शक्ति और दृढ़ता का परिचय देना कमाल की बात थी। सालों से जंगल में रहने पर भी स्वयं कर्नल, उनकी सेना का बड़ा समूह, जो बहु-संख्या में युद्धसामग्री से लैस था, मिलकर भी उसे पकड़ नहीं पाए थे। उसकी अदम्य शक्ति और दृढ़ता को जीत नहीं पाए थे। उस जाँबाज सिपाही को पकड़ नहीं पाए थे। अर्थात् वह हर काम इतनी सावधानी तथा होशियारी से करता था कि उसने व उसके मुट्ठी भर आदमियों ने ही कर्नल के इतने बड़े सेना-समूह की नाक में दम कर दिया था।

प्रश्न 4. गर्द तो ऐसी उड़ रही है जैसे कि पूरा एक काफिला चला आ रहा हो। मगर मुझे तो एक ही सवार नजर आता है। इसका आशय लिखिए।
उत्तर:
 आशय-जब कर्नल अपने खेमे के बाहर बैठकर लेफ्टीनेंट से वज़ीर अली के विषय में बात कर ही रहे थे कि तभी उन्हें दूर से धूल का गुबार उठता दिखाई दिया जिसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सेना का पूरा-पूरा काफिला चला आ रहा हो परंतु जब ध्यान से देखा तो केवल एक ही व्यक्ति दिखाई दे रहा था। वह अकेला ही पूरे काफिले के समान धूल का गुबार उड़ाता चला आ रहा था।

प्रश्न 5. एकांकी ‘कारतूस’ में वर्णित किन घटनाओं से पता चलता है कि वज़ीर अली अंग्रेज़ों से नफ़रत करता था और उनका कट्टर विरोधी था ?
उत्तर:
 वज़ीर अली अंग्रेजों से नफ़रत करता था तथा उनका कट्टर विरोधी था। अंग्रेज़ों को भारत से निकालना उसका एकमात्र लक्ष्य था। इसके लिए उसने अफ़गानिस्तान के बादशाह शाहे जमा को भारत पर आक्रमण करने का न्यौता दिया। उसने सारे भारत वर्ष में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ वातावरण बना दिया था। अंग्रेज़ों का पक्ष लेने वालों को वह अपना शत्रु समझता था इसी कारण उसने कंपनी के वकील की हत्या कर दी। वह सआदत अली को अवध की गद्दी से हटाना चाहता था और स्वयं उस पर कब्जा करना चाहता था ताकि वहाँ से अंग्रेज़ों को निकाल सके।

प्रश्न 6. वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था, कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था। इस प्रकार जो अंग्रेजों की ब्रिटिश कम्पनी की सैनिक छावनी में प्रवेश कर कर्नल से कारतूस प्राप्त कर सकता है। वह साधारण व्यक्ति या सिपाही नहीं हो सकता। वज़ीर अली ने एक जाँबाज सिपाही की तरह प्राणों की बाजी लगाकर कारतूस हासिल किए। उसका यह कार्य उसे एक जाँबाज सिपाही सिद्ध करता है और हम वज़ीर अली को जाँबाज सिपाही कह सकते हैं।

प्रश्न 7. कारतूस पाठ के आधार पर वजीर अली की विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 वजीर अली की विशेषताएँ-

  • देशभक्ति-अंग्रेजों के प्रति नफरत का भाव।
  • स्वाभिमानी-स्वाभिमान की रक्षा हेतु वकील की हत्या।
  • जाँबाज सिपाही-मुट्ठीभर सेना के साथ अंग्रेजों से मुकाबला।
  • निर्भीक एवं निडर-अंग्रेजों खेले में घुसकर कारतूस ले जाना।
  • नीति कुशल-अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए अफगानिस्तान के बादशाह को निमंत्रण।
    (किन्हीं तीन बिन्दुओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख अपेक्षित।) 

व्याख्यात्मक हल:
वजीर अली एक जाँबाज सिपाही था, उसने अंग्रेजों की ब्रिटिश कम्पनी की सैनिक छावनी में निडरतापूर्वक प्रवेश किया और कर्नल से कारतूस प्राप्त किए। वह एक बलशाली, साहसी नौजवान था। उसने एक जाँबाज सिपाही की तरह अपने प्राणों की बाजी लगाकर कारतूस हासिल किए। उसके जाने के बाद कर्नल भी हक्का-बक्का रह गया और उसकी हिम्मत और बहादुरी से अचंभित रह गया जो उसकी जान बख्श कर चला गया। वजीर अली अंग्रेजों की हुकूमत को समाप्त करना चाहता था, उसने अफगानिस्तान के बादशाह शाहजमा को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने की दावत दी।

13. पतझर में टूटी पत्तियाँ – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’ गाँधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात किस तरह झलकती है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: शुद्ध सोने में……में सोना’ गाँधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात झलकती है। लोग गाँधी जी को ‘व्यावहारिक और आदर्शवादी’ कहते और मानते थे। इसलिए वे अपने विलक्षण आदर्श चला सके। उनके व्यवहार और आदर्शों से प्रभावित होकर देशवासी उनके पीछे चले। उनके आग्रह पर स्वदेशी स्वाधीनतावाद को स्वीकार कर कार्य कर सके। उन्होंने आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं दिया बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाया था। वे सोने में ताँबा नहीं बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे। आजादी की लड़ाई में उन्होंने साधारण व्यक्तियों को जोड़कर उनकी कीमत, प्रसिद्धि बढ़ाई। चाहे वे कृषक पुत्र राजेन्द्र प्रसाद हों, चाहे बल्लभ भाई पटेल हों, चाहे जवाहर लाल नेहरू हों ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। गाँधी जी के व्यक्तित्व, सिद्धांतों  और आदर्श से प्रभावित होकर ही लोग उनके निकट आए।

प्रश्न 2. लेखक ने व्यवहारवादी लोगों के बारे में क्या कहा है ? वे असली जीवन में आदर्शवादी लोगों से कैसे भिन्न हैं ? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 (क) व्यवहारवादी लोग सफल व हमेशा सजग रहते हैं।
(ख) सोने में ताँबे की अपेक्षा ताँबे पर सोने का पानी चढ़ाकर कीमत बढ़ाते हैं।
(ग) आदर्शवादी लोग जीवन मूल्यों के अनुयायी तथा सामाजिक उत्थान में सहयोगी होते हैं।
(घ) स्वार्थ-सिद्धि की उपेक्षा करके वे सर्वस्व उत्थान के हिमायती होते हैं।

प्रश्न 3. ”गाँधी जी सच्चे आदर्शवादी थे और उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी।“ ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ पाठ के आधार पर समझाइए। 
उत्तर: गाँधी जी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी, उदाहरण सहित इस बात की पुष्टि इस प्रकार कर सकते हैं-
(1) सर्वप्रथम गाँधी जी ने नेतृत्व क्षमता का उदाहरण दक्षिण-अफ्रीका की यात्रा के दौरान प्रदर्शित किया। वहाँ रंग-भेद नीति के विरूद्ध आंदोलन खड़ा करके सरकार को भी अपने कानून बदलने के लिए मजबूर कर दिया था।
(2) भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उन्होंने अहिंसा नीति के माध्यम से हिला कर रख दी थी। सन् 1942 के ”अंग्रेजो भारत छोड़ो“ आन्दोलन में गाँधी जी की नेतृत्व क्षमता का परिचय प्राप्त होता है।
(3) सत्याग्रह आन्दोलन, बहिष्कार कार्यक्रम, दाण्डी यात्रा आदि आंदोलन गाँधी जी के नेतृत्व में पूर्ण हुए जिसके परिणामस्वरूप अंत में हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई, जो प्रत्यक्ष रूप से गाँधी जी की नेतृत्व क्षमता का परिचायक है।

प्रश्न 4. आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वर्तमान में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 हमारे विचार से आदर्श, व्यावहारिकता, सूझबूझ, सजगता, लाभ-हानि का हिसाब लगाकर कदम उठाना, नैतिकता, धैर्य, सत्यवादिता आदि ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं। वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता न के बराबर दिखाई दे रही है। समाज का वातावरण बदल चुका है, लोगों की मानसिकता में गिरावट आ गई है। शाश्वत मूल्यों को हेय द्रष्टि से देखा जाने लगा है। आदर्शवादी, सीधे-साधे, नैतिकता का आचरण करने वाले लोगों को हेय और तुच्छ मानकर व्यवहार किया जाता है। लोगों का विश्वास मूल्यों पर से उठता जा रहा है। इसलिए हमारे विचार से वर्तमान समय में मूल्यों की प्रासंगिकता में गिरावट आती जा रही है।

प्रश्न 5. लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए। आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?
अथवा
‘झेन की देन’ पाठ में जापानी लोगों को मानसिक रोग होने के क्या-क्या कारण बताए गए हैं। आप इनसे कहाँ
तक सहमत हैं?
उत्तर: 

  • अमेरिका से प्रतिस्पर्धा।
  • एक माह का काम एक दिन में करने का प्रयत्न।
  • दिमाग में स्पीड का इंजन लगना।
  • एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़।
    (उपर्युक्त विस्तार सहित छात्रों द्वारा दिए गए तर्क संगत उत्तर अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
‘झेन की देन’ पाठ में जापानी लोगों को मानसिक रोग होने के जो कारण बताए हैं उनमें सबसे प्रमुख कारण उनकी अमेरिका से प्रतिस्पर्धा की भावना है। वे बहुत गति से प्रगति करते हैं इसके लिए उनका प्रयत्न एक माह का काम एक दिन में पूरा करने का रहता है। लेखक ने इन्हीं कारणों की वजह से उनके दिमाग में स्पीड का इंजन लगाने की बात कही है जिसके कारण उनकी तनाव लेने की क्षमता बढ़ जाएगी। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ मानसिक रोग होने का प्रमुख कारण है। इन कारणों से हम पूरी तरह सहमत हैं क्योंकि प्रतिस्पर्धा में अधिक पाने की चाह में तनावपूर्ण जीवन मानसिक रोगों की जड़ है।

प्रश्न 6. ‘हमारे जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं बल्कि दौड़ता है।’ ‘झेन की देन’ पाठ के आधार पर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: जापानी लोगों के जीवन की गति बहुत तेज हो गई है। वे सामान्य ढंग से गरिमापूर्वक चलने की बजाय, बेतहाशा भागते हैं ताकि अधिक से अधिक काम कर सकें। वे स्वाभाविक रूप से बोलने की बजाय आवेश में आकर बकते हैं। उनके पास स्वाभाविक रूप से बोलने का समय नहीं होता। वे लोग अकेले में भी शांत नहीं होते। उनके जीवन के तनाव, निराशाएँ और कुंठाएँ उन्हें हिलाकर रख देती हैं अतः वे एकांत में भी बड़बड़ाते रहते हैं। आशय यह है कि वे तनाव से भरपूर जीवन जीते हैं।

प्रश्न 7. टी सेरेमनी की तैयारी और उसके प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
 तैयारी-शांत वातावरण, तातामी (चटाई) से युक्त पर्णकुटी, एक समय में दो या तीन व्यक्तियों का ही प्रवेश, चाजीन द्वारा स्वागत, अँगीठी सुलगाना, चायदानी रखना, बरतन लाकर तौलिए से साफ करना। प्रभाव-दिमाग की गति धीमी होना और फिर बंद हो जाना, तनावमुक्ति, वर्तमान से जुड़ाव।
(उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)
व्याख्यात्मक हल:
तैयारी-झोपड़ी या फूस की बनी एक कुटी। दफ्ती की दीवारों वाली तातामी (चटाई) की जमीन वाली एक सुंदर पर्णकुटी थी। चाजीन ने दो-झो (आइए, तशरीफ लाइए) कहकर स्वागत किया। मिट्टी के बर्तन में पानी भरा हुआ था, जिसमें हाथ-पाँव धोकर ही अंदर प्रवेश कर सकते थे। अँगीठी सुलगाई गई। चाय चढ़ाई, बर्तन लाकर तौलिये से साफ किए। यह सभी क्रियाएँ उसने गरिमापूर्ण ढंग से पूरी की। ‘टी सेरेमनी’ में केवल तीन आदमियों को प्रवेश दिया जाता है। क्योंकि इस सेरेमनी में शांति का बहुत महत्त्व होता है, इसलिए वहाँ अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। प्रभाव:चाय पीने के बाद दिमाग की रफ्तार धीमी पड़ती जाती है। इसमें मानसिक रोग का उपचार होता है, मानसिक सन्तुलन होता है तथा व्यक्ति भूत-भविष्य की चिंता नहीं करता है। ऐसा लगता है वह मानों अनंतकाल में जी रहा हो और वर्तमान से उसका जुड़ाव हो गया है।

प्रश्न 8. टी सेरेमनी किसे कहा जाता है? इसमें होने वाले अनुभवों पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
 
टी सेरेमनी-

  • चाय पीनी की एक विधि, जिसे जापानी में चा-नो-यू कहते हैं।
  • शांतिपूर्ण कक्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को बिठाकर, प्याले में दो घूँट ही चाय दी जाती है।

अनुभव-

  • अतीत या भविष्य की उलझन से निकलते हुए दिमाग की रफ्तार कम होना और अंततः बंद होना।
  • वर्तमान में जीते हुए अत्यधिक संवेदनशील हो जाना, जीने का वास्तविक अर्थ मिलना।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
‘टी सेरेमनी’ चाय पीने की एक विधि को कहा जाता है। जापानी में इसे चा-नो-यू कहते हैं। इसके लिए एक शान्तिपूर्ण कमरे में अधिकतम तीन व्यक्तियों को बिठाकर प्याले में दो घूँट ही चाय दी जाती है। इसमें शान्ति का महत्त्व होने से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। चाय पीने के बाद लेखक ने स्वयं ही अनुभव किया कि अतीत की उलझन निकलते हुए दिमाग की रफ्तार कम होते हुए बंद हो जाती है और सन्नाटा सुनाई देने लगता है। इस प्रकार वर्तमान में जीते हुए व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है और उसे जीने का वास्तविक अर्थ मिल जाता है।

प्रश्न 9. ‘‘हमें सत्य में जीना चाहिए, सत्य केवल वर्तमान है।’’ ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ के इस कथन को स्पष्ट करते हुए लिखिए कि लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?
अथवा
लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 

  • बीता समय वापस नहीं आता है।
  • बीते समय को याद करके दुःखी होना उचित नहीं है।
  • भविष्य को हमने देखा नहीं है।
  • उसकी कल्पनाओं में खोकर समय नष्ट करना व्यर्थ है।
  • वर्तमान ही सत्य है। 

व्याख्यात्मक हल:
लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा इसलिए कहा होगा, क्योंकि जब वह जापान में अपने मित्र के साथ ‘टी-सेरेमनी’ में गया तो चाय की चुस्कियों के मध्य दिमाग की रफ्तार धीरे-धीरे कम होने पर उसे ऐसा अनुभव हुआ। हम हमेशा बीते हुए दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। हम या तो भूत काल में रहते हैं या भविष्य काल में। वास्तव में हमारे सामने जो वर्तमान है, वही सत्य है। हमें उसी में जीना चाहिए।

प्रश्न 10. निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।
(ख) जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट के आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यावहारिक सूझ-बूझ ही आगे आने लगती है।
(ग) सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उनकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों।
उत्तर: (क) समाज में अहिंसा, सत्य, समानता, बंधुता, त्याग जैसे कुछ शाश्वत मूल्य अभी भी बचे हुए हैं। ये मूल्य आदर्शवादी लोगों के कारण ही बचे हुए हैं। उन्होंने अपने व्यवहार से अहिंसा, सत्य, समानता, बंधुता और त्याग का सौंदर्य प्रकट करके दिखाया। तभी लोग आज भी इनका महत्त्व समझते हैं।
(ख) जब आदर्श और व्यवहार में से लोग आदर्शों की बात करना भूल जाते हैं और व्यावहारिक होने को महत्त्व देने लगते हैं तो उनका व्यवहार धीरे-धीरे पतन की ओर जाने लगता है। समझौतों की चर्चा अधिक होने लगती है। लोगों का ध्यान आदर्शों को छोड़ने की ओर लगा रहता है। इस प्रकार पतन के रास्ते खुल जाते हैं।
(ग) ‘टी-सेरेमनी’ में चाजीन ने लेखक और उसके मित्र के स्वागत में अँगीठी जलाना, चायदानी रखना, बर्तन लाना, उन्हें तौलिए से पोंछना आदि कार्य इतने गरिमापूर्ण ढंग से किए कि मानो उसके एक-एक काम से संगीत का कोई उल्लासपूर्ण स्वर निकल रहा हो। उसका एक-एक काम मनोहारी प्रतीत हुआ।

12. अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. बादशाह सुलेमान ने चींटियों से क्या कहा? उससे उनके स्वभाव की किस विशेषता का पता चलता है ?
उत्तर: 
बादशाह सुलेमान बहुत ही दयालु था। वह मानवों की ही नहीं वन्य जीव-जन्तुओं की भाषा भी जानता था। एक बार उसका लश्कर कहीं जा रहा था। उसके घोड़ों की टापों को सुनकर चींटियों का दल भयभीत हो उठा। तब सुलेमान ने चींटियों को कहा कि वे भयभीत न हों। उसका जन्म सभी की रक्षा और मुहब्बत के लिए हुआ है। इस बात और व्यवहार से हमें उसकी उदारता का पता चलता है।

प्रश्न 2. नूह का असली नाम क्या था? वे दुखी होकर क्यों रोते थे?
अथवा
नूह कौन थे? उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता क्या थी?
अथवा
पैगम्बर नूह दुःखी हो मुद्दत तक क्यों रोते रहे? इससे उनके चरित्र की किस विशेषता का पता चलता है ?
उत्तर:
 नूह का वास्तविक नाम लशकर था। वे नूह के लकव (पदाधिकारी) थे। इस्लाम धर्म में आस्था रखने के कारण वे कुत्ते को बहुत ही गंदा जीव मानते थे। एक दिन उन्होंने एक कुत्ते को दुत्कार दिया। तब कुत्ते ने उन्हें कहा:“न तो मैं अपनी मर्जी से कुत्ता हूँ और न तुम अपनी पसंद से इन्सान हो”। यह बात उन्हें चुभ गई। उन्हें लगा कि सभी जीव खुदा के हैं। अतः उन्होंने कुत्ते को दुत्कार कर पाप किया है। इसलिए वे जीवन भर रोते रहे। इससे पता चलता है कि ‘नूह एक अत्यन्त करुणामय व प्रायश्चित करने वाले इन्सान थे।

प्रश्न 3. ‘मिट्टी से मट्टी (मिट्टी) मिले,
खो के सभी निशान,
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचान है ?’
इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पद्यांश का आशय है- सब प्राणियों का निर्माण एक ही मिट्टी से हुआ है। उस मिट्टी में जाने कौन-कौन-सी मिट्टी मिली हुई है। इसका बोध किसी को नहीं है। मृत्यु के बाद सभी इसी मिट्टी में मिल जाते हैं और कोई भिन्नता नहीं रह जाती। अतः मनुष्य में कितनी मनुष्यता है और कितनी पशुता, यह किसी को नहीं पता। इसी प्रकार पशु में कितनी पशुता है और कितनी मनुष्यता यह भी किसी को ज्ञात नहीं। आशय यह है कि मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं को किसी पशु से बेहतर न माने अर्थात् स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ न समझे।

प्रश्न 4. लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली क्यों लगवानी पड़ी?
उत्तर:
 लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली इसलिए लगवानी पड़ी, क्योंकि उसके फ्लैट के एक मचान में दो कबूतरों ने घोंसला बना लिया था, वे दिन में कई बार आते-जाते और चीजों को गिराकर तोड़ देते। कभी लेखक की लाइब्रेरी में प्रवेश कर कबीर या मिर्जा गालिब की पुस्तकों को सताने लगते। इस रोज-रोज की परेशानी से तंग आकर लेखक की पत्नी ने जहाँ कबूतरों का आशियाना था, उस जगह एक जाली लगा दी थी।

प्रश्न 5. लेखक निदा फ़ाजली को प्रकृति की सुरक्षा की सीख अपनी माँ से मिली थी-यह आप कैसे कह सकते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लेखक की माँ बचपन से ही उन्हें सिखाती थी कि बेवक्त फूल और पत्ते मत तोड़ो, नदी को प्रणाम करो, पशु-पक्षियों को मत सताओ। वे स्वयं पशु-पक्षियों से बहुत प्रेम करती थीं। साथ ही उनके जीवन की वह घटना जब गलती से उनकी माँ से कबूतर का अण्डा फूट गया था और वह बहुत दुःखी हुईं और उन्होंने पूरे दिन का रोजा भी रखा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लेखक को माँ से ही प्रकृति से प्रेम करने की सीख मिली।

प्रश्न 6. बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है और क्यों? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ पाठ में बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या कुप्रभाव बताया गया है? अपने शब्दों में विस्तार से लिखिए।
उत्तर
पर्यावरण पर कुप्रभाव-

  • पर्यावरण के संतुलन का बिगड़ना
  • पशु-पक्षियों का आवास छिनना
  • मौसम-चक्र में असंतुलन:गर्मी में अधिक गर्मी,सर्दी में अधिक सर्दी, बेवक्त बरसातें
  • बाढ़, तूफान, जलजला
  • नित नए रोगों का बढ़ना
  • समुद्र का सिमटना।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

उत्तर: बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जो आज हमारे सामने पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के रूप में दिखाई दे रहा है। आबादी के बढ़ने पर मनुष्यों के आवास के लिए जंगलों का विनाश करके आवास बनाए गये जिससे प्रकृति में असंतुलन पैदा हो गया। बढ़ती हुई आबादियों ने समुद्र को पीछे सरकाना शुरू कर दिया, पेड़ों को रास्तों से हटाना शुरू कर दिया है, फैलते हुए प्रदूषण ने पक्षियों को बस्तियों से भगाना शुरू कर दिया। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया। अब गरमी में ज्यादा गरमी, बेवक्त की बरसातें, तूफान, बाढ़, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएँ और नये-नये रोग बीमारियों के रूप में मनुष्य को प्राप्त हो रहे हैं। बढ़ती आबादी के कारण प्रकृति का दोहन होने से वस्तुओं, पदार्थों की गुणवत्ता समाप्त हो चुकी है और मँहगाई समस्या के रूप में खड़ी हुई है।

प्रश्न 7. ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुखी होने वाले’ पाठ के आधार पर प्रकृति के साथ मानव के दुर्व्यहवार और उसके परिणामों पर चर्चा कीजिए।
अथवा
बढ़ती आबादी, मनुष्य की हवस, बारूद की विनाशलीलाओं ने प्राकृतिक संतुलन के साथ क्या खिलवाड़ किया है? इसके दुष्प्रभाव ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुखी होने वाले’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:

व्याख्यात्मक हल:
मानव बढ़ती हुई आबादी के तथा औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के साथ दुर्व्यहवार पर उतर आया है। वह अपना स्वार्थ सिद्ध  करने के लिए अंधा-धुंध वृक्षों की कटाई कर रहा है। मानव जंगलों को समाप्त करके अपने लिए आवास बना रहा है, तथा पशु पक्षियों से उनके आवास छीन रहा है। बढ़ती हुई आबादी ने समुद्र को पीछे सरकाना शुरू कर दिया है। समुद्री जमीन को हड़पकर भवनों का निर्माण किया जा रहा है। बारूद से पहाड़ी क्षेत्र को समतल किया जा रहा है। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया है। मौसम का संतुलन बिगड़ गया है। बाढ़, तूफान व जलजले आने लगे हैं। बेवक्त बरसात होने लगी है। सर्दी कम हो गयी है तथा गर्मी बढ़ गयी है। नित नए-नए रोग उत्पन्न हो रहे हैं। पशु-पक्षी बेघर हो गये हैं यहाँ तक कि कुछ प्रजातियाँ लुप्त हो गयी हैं। मँहगाई समस्या के रूप में सामने खड़ी हो गयी है।

प्रश्न 8. पाठ के आधार पर प्रतिपादित कीजिए कि दूसरों के दुःख से दुखी होने वाले लोग अब कम मिलते हैं?
उत्तर: 

  • स्वार्थ सिद्धि -‘स्व’ की भावना के कारण परोपकारिता का अभाव
  • जीवन मूल्यों में गिरावट-भाई-चारे की कमी (सौहार्दभाव की कमी) के कारण
  • संवेदनहीनता-दूसरों के दुख में समभागी न होना।
  • एकल परिवार का बढ़ना-जीविकोपार्जन की मजबूरी।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
अब दूसरों की पीड़ा व दुःख को समझना तथा मुसीबत के समय काम आना इस प्रवृत्ति के लोग कम हैं। मनुष्य जो कि ईश्वर की उत्कृष्ट  कृति है, उसने धीरे-धीरे पूरी धरती को ही अपनी सम्पत्ति बना लिया है, और जीवधारियों को दर-बदर कर दिया है। उसे किसी के सुख-दुःख की परवाह नहीं है, उसे केवल अपने ही सुख की चिन्ता है क्योंकि स्वार्थ से घिरा मनुष्य मशीनों के बीच मशीन बनकर रह गया है। उसे केवल अपना ही स्वार्थ नजर आता है। उसे दूसरों से दुःख व पीड़ा की कोई परवाह नहीं तथा उनके अन्दर भाईचारे की भावना नहीं है। जीविकोपार्जन की मजबूरी है इस कारण एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं।

प्रश्न 9. ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले’ पाठ के माध्यम से लेखक ने कौन-सी समस्या उठाई है? उसका समाधान क्या हो सकता है ? 
उत्तर: इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक दर्शन के सार्वभौम सत्य को प्रतिपादित करता है कि हम सब परमपिता के अंश रूप हैं। हम सब मिट्टी से निर्मित हैं और मृत्यु होने पर मिट्टी में ही मिल जाएँगे। मिट्टी में मिलने पर हमारी भिन्नता समाप्त हो जाती है। यह पहचान सम्भव ही नहीं होती कि कौन किस रूप में है। अतः हमें भेदभाव को छोड़कर सबको समान रूप से समझना चाहिए और कभी भी अपने आप को किसी से श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए।

प्रश्न 10. बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ? ‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए और बताइए कि पर्यावरण से सम्बन्धित संस्कार आपको अपने परिवार से वैळसे मिलते हैं ?
उत्तर: बढ़ती हुई आबादी के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। पेड़-पौधों के कट जाने के कारण जीव-जन्तु बेघर हो गए तथा उनमें से कुछ की जातियाँ विलुप्त हो गयीं तो कुछ अपना स्थान छोड़कर कहीं और चले गए। आवास बढने से समुद्र का स्वरूप सिकुड़ने लगा। इस प्रकार प्रकृति में असंतुलन होने से मनुष्य को कई प्राकृतिक आपदाएँ तूफान, जलजले, बेवक्त बरसात, ज्यादा गरमी का पड़ना, नित नए रोग, बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। (विद्यार्थी अपने परिवार से मिलने वाले संस्कारों के विषय में स्वयं लिखें।)

प्रश्न 11. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क) ”प्रकृति/नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। प्रकृति के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले मुम्बई में देखने को मिला था।“ पाठ के आधार पर पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 आशय-‘अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले’ पाठ के माध्यम से लेखक श्री निदा फाज़ली प्रकृति/नेचर की सहनशीलता का वर्णन करते हुए कह रहे हैं-
मनुष्य ने प्रकृति के साथ बहुत खिलवाड़ किया है। किन्तु प्रकृति की सहन शक्ति की भी एक सीमा होती है। प्रकृति के कोप का उदाहरण कुछ साल पहले मुम्बई में देखने को मिला था। तब प्रकृति का प्रकोप ;गुस्साद्ध इतना डरावना था कि मुम्बई के निवासी पूजा-स्थलों में जाकर अपने आराध्य देव से प्रार्थना करने लगे थे। उस समय समुद्र ने क्रोधित होकर तीन जहाजों को तीन विभिन्न दिशाओं में अपनी लहरों से उठाकर फेंक दिया था।
(ख) जो जितना बड़ा होता है, उसे उतना ही कम गुस्सा आता है। आशय स्पष्ट कीजिए।
आशय-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से लेखक समुद्र के विषय में बताते हुए कह रहे हैं कि भवन निर्माताओं ने समुद्र के साथ खिलवाड़ किया, वे उसे पीछे ढकेलते गए। समुद्र का हृदय बहुत बड़ा था अर्थात् अपनी विशालता के कारण वह अपने साथ हो रहे अन्याय को सहता रहा, किन्तु आखिरकार जब उसके सब्र का बाँध टूट गया तब उसने अपना कहर बरपाया, जहाजों को गेंद की तरह उठाकर जमीन पर पटक दिया। यह वाक्य समुद्र के संदर्भ में कहा गया है।
(ग) इस बस्ती में न जाने कितने परिंदों-चरिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से कुछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ-वहाँ डेरा डाल दिया है। 
आशय-लेखक मुम्बई के विकास की कथा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं-मुम्बई का जब विकास किया गया तब वहाँ बर्सोवा में घने जंगल, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी थे। बाद में उन्हें उजाड़कर भवन बनाए गए। इस बस्ती में रहने वाले पक्षियों के घर छीन लिए गए, कुछ यहाँ से दूर चले गए। जो शेष बचे उन्होंने फ्लैटों में अपना आशियाना बनाकर डेरा डाल दिया।
(घ) शेख अयाज के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घरवाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’ इन पंक्तियों में छिपी हुई उनकी भावना को स्पष्ट कीजिए। 
आशय-प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज की आत्मकथा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कह रहे हैं:शेख अयाज के पिता बहुत दयालु किस्म के व्यक्ति थे। वह जीव-जन्तुओं पर रहम करने वाले दयालु व्यक्ति थे। एक बार वे कुएँ से स्नान कर घर आए। उनकी बाँह पर एक चींटा रेंग रहा था। वे खाना छोड़कर उसे कुएँ पर छोड़ने के लिए चले गए। इससे उनकी जीव-जन्तुओं के प्रति दयालुता की भावना का पता चलता है।

11. तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेन्द्र – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान का अभिनय लाजवाब था । स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
 जिस समय फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के लिए राजकपूर ने काम करने के लिए हामी भरी वे अभिनय के लिए प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय हो गए थे। इस फ़िल्म में राजकपूर ने ‘हीरामन ‘ नामक देहाती गाड़ीवान की भूमिका निभाई थी। फ़िल्म में राजकपूर का अभिनय इतना सशक्त था कि हीरामन में कहीं भी राजकपूर नज़र नहीं आए। इसी प्रकार छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी हीराबाई’ का किरदार निभा रही वहीदा रहमान का अभिनय भी लाजवाब था जो हीरामन की बातों का जवाब जुबान से । नहीं आँखों से देकर वह सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की जिसे शब्द नहीं कह सकते थे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान का अभिनय लाजवाब था।

प्रश्न 2: हिंदी फ़िल्म जगत में एक सार्थक और उद्देश्यपरक फ़िल्म बनाना कठिन और जोखिम का काम है ।’ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: 
हिंदी फ़िल्म जगत की एक सार्थक और उद्देश्यपरक फ़िल्म है तीसरी कसम, जिसका निर्माण प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र ने किया । इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे प्रसिद्ध सितारों का सशक्त अभिनय था । अपने जमाने के मशहूर संगीतकार शंकर जयकिशन का संगीत था जिनकी लोकप्रियता उस समय सातवें आसमान पर थी । फ़िल्म के प्रदर्शन के पहले ही इसके सभी गीत लोकप्रिय हो चुके थे। इसके बाद भी इस महान फ़िल्म को कोई न तो खरीदने वाला था और न इसके वितरक मिले। यह फ़िल्म कब आई और कब चली गई मालूम ही न पड़ा, इसलिए ऐसी फ़िल्में बनाना जोखिमपूर्ण काम है।

प्रश्न 3: ‘राजकपूर जिन्हें समीक्षक और कलामर्मज्ञ आँखों से बात करने वाला मानते हैं’ के आधार पर राजकपूर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर: 
राजकपूर हिंदी फ़िल्म जगत के सशक्त अभिनेता थे। अभिनय की दुनिया में आने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे उत्तरोत्तर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते गए और अपने अभिनय से नित नई ऊचाईयाँ छूते रहे । संगम फ़िल्म की अद्भुत सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने एक साथ चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा की। ये फ़िल्में सफल भी रही। इसी बीच राजकपूर अभिनीत फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के बाद उन्हें एशिया के शोमैन के रूप ‘जाना जाने लगा। इनका अपना व्यक्तित्व लोगों के लिए किंवदंती बन चुका था । वे आँखों से बात करने वाले कलाकार जो हर भूमिका में जान फेंक देते थे । वे अपने रोल में इतना खो जाते थे कि उनमें राजकपूर कहीं नज़र नहीं आता था । वे सच्चे इंसान और मित्र भी थे, जिन्होंने अपने मित्र शैलेंद्र की फ़िल्म में मात्र एक रुपया पारिश्रमिक लेकर काम किया और मित्रता का आदर्श प्रस्तुत किया।

प्रश्न 4: एक निर्माता के रूप में बड़े व्यावसायिक सूझबूझ वाले व्यक्ति भी चक्कर खा जाते हैं। फिर भी शैलेंद्र फ़िल्म क्यों बनाई ? तर्क सहित उत्तर दीजिए ।
उत्तर: 
एक फ़िल्म निर्माता के रूप में बड़े व्यावसायिक सूझ-बूझ वाले व्यक्ति भी चक्कर खा जाते हैं क्योंकि उन्हें बहुत सोच समझकर फ़िल्म का निर्माण करना पड़ता है। उनका उद्देश्य ‘लाभ कमाना’ होता है। ‘धन-लिप्सा’ ही उनकी मनोवृत्ति होती है । शैलेंद्र ने ‘आत्म संतुष्टि’ व ‘सुख’ के लिए फ़िल्म का निर्माण किया था। व्यावसायिक सूझ-बूझ वाले लोग पैसा कमाने के लिए सस्ती लोकप्रियता को अधिक महत्त्व देते हैं, परंतु शैलेंद्र ने अपनी फ़िल्म में सस्ती लोकप्रियता के तत्त्वों को कोई महत्त्व नहीं दिया। शैलेंद्र अच्छी फ़िल्म बनाने की कला तो जानते थे, किंतु वे जनता को लुभाने की कला नहीं जानते थे । यद्यपि फ़िल्म-निर्माता के रूप में शैलेंद्र सर्वथा अयोग्य थे, फिर भी उन्होंने आत्मिक संतुष्ट व ‘आत्मिक सुख’ के लिए फ़िल्म का निर्माण किया।

प्रश्न 5: ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर:
 ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी । इस फ़िल्म की कहानी मार्मिकता एक कविता के समान है। इस फ़िल्म में मूल साहित्यिक रचना को उसी रूप में प्रस्तुत किया गया। इस फ़िल्म के गीत बहुत लोकप्रिय हुए। इसके गीत दुरूह नहीं थे। ये सभी गीत सहज व भाव-प्रवण थे, वे संदेशप्रद थे। इस फ़िल्म में राजकपूर व वहीदा रहमान जैसे महान कलाकारों ने अभिनय किया है। इस फ़िल्म तथा गीतों को शंकर-जयकिशन जैसे महान संगीतकार ने संगीत दिया जो प्रसारण से पूर्व ही अत्यंत लोकप्रिय हो गए । ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में अन्य फ़िल्मों की तरह चकाचौंध के बजाए, सहज लोकशैली को अपनाया गया। इस फ़िल्म ने अपने गीत-संगीत, कहानी आदि के लिए प्रसिद्धि प्राप्त की । इस फ़िल्म में अपने ज़माने के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर ने अपने जीवन का सबसे बेहतरीन अभिनय कर सबको हैरान कर दिया। इस फ़िल्म को उनके अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । यह फ़िल्म जिंदगी से जुड़ी हुई है। फ़िल्मी सफर में इसे मील का पत्थर माना गया है। आज भी इस फ़िल्म की गणना हिंदी की अमर फ़िल्मों में की जाती है। प्रश्न 11.

प्रश्न 6. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में दुख के भाव को किस प्रकार प्रस्तुत किया गया है? दुख के वीभत्स रूप से यह दुख किस प्रकार भिन्न है? लिखिए ।
उत्तर:
 ‘तीसरी कसम’ फिल्म में दुख के भाव को सहज स्थिति में प्रकट किया गया है। इस फ़िल्म में दुखों को जीवन के सापेक्ष रूप में प्रस्तुत किया है। दुख के वीभत्स रूप से यह सर्वथा भिन्न है क्योंकि यहाँ दुखों से घबराकर लोग पीठ नहीं दिखाते। दुखों से हमें घबराना नहीं चाहिए। दुखों का साहसपूर्वक सामना करना चाहिए। दुख के इस रूप को देखकर मनुष्य ‘व्यथा’ व ‘करुणा’ को सकारात्मक ढंग से स्वीकार करता है । वह दुखों से परास्त नहीं होता, निराश नहीं होता। इस फ़िल्म में दुख की सहज स्थिति लोगों को आशावादी बनाती है ।

प्रश्न 7: ‘तीसरी कसम’ सभी गुणों से पूर्ण होने के बाद भी जनता की भीड़ क्यों नहीं जुटा पाई? तर्क संगत उत्तर दीजिए ।
उत्तर:
 ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म एक महान फ़िल्म थी, परंतु इस फ़िल्म को अधिक वितरक नहीं मिल सके । यद्यपि इस फ़िल्म में नामज़द सितारों ने काम किया था फिर भी इस फ़िल्म को खरीदने वाला कोई नहीं था। दरअसल, इस फ़िल्म की संवेदना दो से चार बनाने का गणित जानने वालों की समझ से परे थी। इस फ़िल्म में दुखों को ग्लोरीफाई करके नहीं दिखाया गया। इस फ़िल्म में दर्शकों की भावनाओं का शोषण नहीं किया गया। इस फ़िल्म में किसी भी प्रकार के अनावश्यक मसाले नहीं डाले गए थे इसलिए इस फ़िल्म के लिए भीड़ जुट नहीं पाई। यही अनावश्यक मसाले जो फ़िल्म के पैसे वसूल करने के लिए आवश्यक होते हैं, इस फ़िल्म में डाले नहीं गए थे। यह एक शुद्ध साहित्यिक फ़िल्म थी जिसमें लोकप्रियता के तत्वों का अभाव होने के कारण वितरकों ने इस फ़िल्म को खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। वस्तुतः वितरक पैसा कमाने को महत्त्व देते थे। वे अच्छी फ़िल्म को महत्त्व नहीं देते थे। मुख्यतः ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में जनरुचि और लोकप्रियता के तत्वों का ध्यान नहीं रखा गया था क्योंकि शैलेंद्र को फ़िल्म निर्माण करने की कला का अनुभव नहीं था। शैलेंद्र ने फ़िल्म में ‘करुणा’ व संवेदना की गहराई पर तो ध्यान दिया, परंतु इसे अधिक आकर्षक बनाने के लिए उन्होंने किसी झूठ का सहारा नहीं लिया। इस फ़िल्म की करुणा किसी तराजू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी। इसीलिए गीत इस फ़िल्म के प्रदर्शित होने से पहले लोकप्रिय हो गए, फिर भी यह फ़िल्म लोगों की भीड़ जुटा नहीं पाई । उत्कृष्ट कलात्मकता अत्यंत लोकप्रिय संगीत, प्रसिद्ध अभिनेता व अत्यंत नामज़द अभिनेत्री के बावजूद ये फ़िल्म लोगों की भीड़ नहीं जुटा पाई।

प्रश्न 8: प्राचीन काल में भारतीय साहित्य में गीत और संगीत किस तरह का महत्व रखते थे? इस संदर्भ में शैलेंद्र के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: 
प्राचीन काल में भारतीय साहित्य में गीत और संगीत को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। गीत और संगीत के माध्यम से भावनाओं को अद्वितीय रूप में प्रकट किया जाता था और लोगों के दिलों में समानता और एकता की भावना को स्थापित किया जाता था। शैलेंद्र भी अपने गीतों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और भावनाओं को उनकी अद्वितीयता में प्रकट करने का प्रयास करते थे।

प्रश्न 9: शैलेंद्र का गीतकारी में योगदान कैसे विशिष्ट था? उनके गीतों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
 शैलेंद्र गीतकारी में विशेष थे क्योंकि उनके गीत न केवल संगीतिक दृष्टिकोण से बल्कि भावनाओं के प्रति भी संवेदनशीलता से भरपूर थे। उनके गीतों में सामाजिक संदेश, प्रेम, आध्यात्मिकता आदि के विभिन्न पहलुओं का संवेदनशीलता से प्रस्तुतिकरण होता था। उनके गीतों का व्यक्तिगतता और जीवन के मामूल्यों के प्रति उनकी आसक्ति उनके गीतों के माध्यम से स्पष्ट दिखती थी।

प्रश्न 10: शैलेंद्र के गीतों में सामाजिक संदेश कैसे प्रकट होते थे? उनके गीतों से हमें कौन-कौन से सामाजिक मुद्दे दिखते हैं?
उत्तर:
 शैलेंद्र के गीतों में सामाजिक संदेश अत्यंत प्रभावशाली रूप से प्रकट होते थे। उनके गीतों में गरीबी, असहमति, समाज में बदलाव, सामाजिक न्याय, आदिक के मुद्दे प्रमुख रूप से दिखते थे। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया और लोगों को सामाजिक सुधार के प्रति प्रेरित किया।

10. तताँरा–वामीरो कथा – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद कहाँ गया ? वहाँ के प्राड्डतिक सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। 
उत्तर: तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद समुद्र किनारे टहलने गया। वहाँ का प्राड्डतिक सौंदर्य बड़ा ही लुभावना था। सूरज समुद्र से लगे क्षितिज तले डूबने को था। समुद्र से ठण्डी बयारें आ रही थीं। पक्षियों की सायंकालीन चहचहाहटें शनैः-शनैः क्षीण होने को थीं। समुद्री बालू पर रंग-बिरंगी किरणें फैल रही थी, लहरों का संगीत समुद्र के किनारे सुनाई दे रहा था।

प्रश्न 2. वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में क्या परिवर्तन आया ?
उत्तर:
 वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में यह परिवर्तन आया कि उसका हृदय वामीरो के लिए व्यथित रहने लगा। उसने किसी तरह दिन व्यतीत किया और वह शाम की प्रतीक्षा करने लगा। उसके पूरे जीवन में यह अकेली प्रतीक्षा थी, यह उसके शांत-गम्भीर जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था। वह अचम्भित और रोमांचित था। वामीरो की प्रतीक्षा में एक-एक पल पहाड़ की तरह भारी था और उसके भीतर एक आशंका भी दौड़ रही थी कि वामीरो उससे मिलने आएगी या नहीं।

प्रश्न 3. प्राचीनकाल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए किस प्रकार के आयोजन किए जाते थे ?
उत्तर:
 प्राचीनकाल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए गाँव में पशु-पर्व और मेले तमाशों का आयोजन किया जाता था। जहाँ पशु पर्व में हृष्ट-पुष्ट पशुओं के प्रदर्शन के अतिरिक्त पशुओं से युवकों की शक्ति परीक्षा प्रतियोगिता भी होती थी। वर्ष में एक बार सभी गाँव के लोग हिस्सा लेते थे। उसमें शिकार, नृत्य-संगीत, दौड़ आदि प्रतियोगिताओं के द्वारा शक्ति प्रदर्शन किया जाता था।

प्रश्न 4. कहानी के अंत में तताँरा का क्या हुआ ? तताँरा का वियोग वामीरो किस तरह सहन कर रही थी ? 
उत्तर: कहानी के अंत में तताँरा के हृदय में समाज के विरुद्ध क्रांति की भावना पैदा हुई। वह अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने अपनी लकड़ी की तलवार को जमीन में गाड़ कर उसे इतनी जोर से खींचा कि द्वीप के दो टुकड़े हो गए। तताँरा द्वीप के साथ पानी में डूब गया। वामीरो तताँरा के न मिलने पर पागल-सी हो उठी। वह हर समय उसे खोजती हुई उसी स्थान पर पहुँच जाया करती थी जहाँ वे घंटों बैठा करते थे। उसने खाना पीना छोड़ दिया। वह परिवार से अलग हो गई।

प्रश्न 5. तताँरा-वामीरो की मृत्यु कैसे हुई? पठित पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 तताँरा की मृत्यु समुद्र की लहरों में बह जाने तथा वामीरो की मृत्यु उसके इन्तजार में खाना-पीना छोड़ने से हुई थी। पाठ के अनुसार तताँरा धरती को काटकर उस हिस्से में रह गया जो समुद्र में धँस गया था। पानी की लहरें न जाने उसे कहाँ बहा ले गईं। वामीरो तताँरा को खोजते-खोजते उसी जगह आ बैठती थी जहाँ से तताँरा अलग हुआ था। उसने भी खाना-पीना छोड़ दिया था और परिवार से अलग हो गई। तताँरा की प्रतीक्षा में एक दिन वह भी चल बसी।

प्रश्न 6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क) जब कोई राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसमें शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। 
(ख) बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी।
उत्तर: (क) आशय-”तताँरा-वामीरो कथा“ पाठ के अनुसार लेखक उस समय का वर्णन कर रहे हैं जब वामीरो के परिवारीजनों ने तताँरा का अपमान कर उसे बुरा-भला कहा। अपमानित होने पर उसे बहुत क्रोध आया, जब उसे कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया तब उसने क्रोध को दबाने के लिए अपनी शक्ति युक्त तलवार को धरती में घोंप दिया और सम्पूर्ण ताकत से उसे खींचने लगा।
(ख) आशय-प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से लेखक उस समय का वर्णन कर रहा है जब तताँरा की प्रथम भेंट समुद्र किनारे वामीरो से हुई। उसने वामीरो से अगले दिन उसी समुद्र तट पर मिलने का वचन लिया। जब वह अगले दिन सायंकाल समुद्र के किनारे पहुँचा, सूर्य अस्त हो रहा था, समुद्र में सूर्य की किरणें डूबती हुई नजर आ रही थीं। उसे बस एक आशा थी कि वामीरो उससे मिलने अवश्य आएगी। यही आशा की किरण उसके मन में विश्वास जगाए हुए थी।

प्रश्न 7. रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगें तब उनका टूट जाना ही अच्छा है, क्यों ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगें तब उनका टूट जाना ही अच्छा है। क्योंकि प्रस्तुत कहानी पाठ ‘तताँरा-वामीरो कथा’ के अनुसार अडंमान द्वीप समूह पर स्थित पासी और लपाती गाँव के रीति-रिवाज के अनुसार विवाह सम्बन्ध के लिए युवक-युवती दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। यह रूढ़िवादी बंधन तताँरा और वामीरो के प्रेम सम्बन्ध के मध्य रुकावट बन गया था। यह वाक्य लेखक ने तताँरा को सम्बोधित करते हुए कहा था। इस वाक्य की प्रासंगिकता प्रस्तुत पाठ के सम्बन्ध में सिद्ध  होती है। नायक ने रूढ़ियों के बंधन बनने पर उनको तोड़ने के लिए विरोधस्वरूप अपने प्राणों का बलिदान दिया।

9. डायरी का एक पन्ना – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न.                                                            प्रश्न 1. सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी ?
अथवा
सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्रियों ने क्या सहयोग दिया ?
उत्तर: सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्रियों का विशेष सहयोग था। गुजराती सेविका संघ के जुलूस में पुलिस ने बहुत-सी लड़कियों को गिरफ्तार किया। मारवाड़ी बालिका विद्यालय ने झण्डा उत्सव मनाया। स्त्रियाँ जुलूस निकालकर ठीक स्थान पर पहुँचने की कोशिश कर रही थीं। लाठी चार्ज की परवाह किए बिना स्त्रियाँ बड़ी तादाद में मोन्युमेंट में पहुँची और उसकी सीढ़ियों पर चढ़कर झण्डा फहराया और घोषणा पढ़ी। पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लाल बाजार भेजने पर भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ। लगभग 105 स्त्रियों को गिरफ्तार किया गया।

प्रश्न 2. ”जबसे कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान में नहीं की गई थी और यह सभा ही, कहना चाहिए कि ओपन लड़ाई थी।“ यहाँ पर कौन-से और किसके द्वारा लागू किए गए कानून को भंग करने की बात कही गई है ? क्या कानून भंग करना उचित था ? पाठ के संदर्भ में अपने विचार प्रकट कीजिए। 
उत्तर:
 यहाँ पर ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए कानून को भंग करने की बात कही गई है। पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकला था। कानून था कि अमुक धारा के अनुसार कोई सभा नहीं हो सकती । जो इस सभा में हिस्सा लेगा वह दोषी समझा जाएगा। कानून भंग करना हमारे विचार से उचित था, ‘डायरी का एक पन्ना’ पाठ के आधार पर भारतीयों को स्वतंत्रता दिवस मनाने का अधिकार नहीं था जिसे मनाने के लिए उन्हें रोका जा रहा था। उस कानून को भंग करके भारतीय नेताओं ने झण्डारोहण भी किया और जुलूस भी निकाला था।

प्रश्न 3. जुलूस के लाल बाजार आने पर लोगों की क्या दशा हुई ? 
उत्तर: 
जुलूस के लाल बाजार आने पर लोगों की यह दशा हुई कि उस जुलूस में नर-नारी, युवा सभी शामिल होने लगे। वे ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगा रहे थे। लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। पुलिस उन्हें रोकने का प्रयास करने के लिए लाठी चलाती जिससे लोग घायल हो जाते थे। लोगों को पकड़कर कुछ दूर पुलिस ले जाती और फिर छोड़ देती थी। इसमें 105 स्त्रियाँ पकड़ी गई थीं। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

प्रश्न 4. बहुत से लोग घायल हुए, बहुतों को लाॅकअप में रखा गया, बहुत-सी स्त्रियाँ जेल गईं फिर भी इस दिन को अपूर्व बताया गया है। आपके विचार में यह सब अपूर्व क्यों है ? अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तर: हमारे विचार में यह सब अपूर्व इसलिए है, क्योंकि इस दिन बहुत अधिक लोगों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया था। लोगों ने अपने-अपने नेताओं के संरक्षण में झण्डारोहण करके विशाल सभाएँ कीं और जुलूस निकाले थे। ब्रिटिश सरकार के बनाए कानून को तोड़ने के अपराध से युवाओं, पुरुषों और स्त्रियों को पुलिस का कोप भाजन बनना पड़ा था। महिलाओं को जेल भी जाना पड़ा था। इसलिए यह दिन अपूर्व है। इस दिन बहुत अधिक लोग लगभग 200 कार्यकत्र्ता घायल हुए थे और बंदी बनाए गए थे। आज जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ कोई काम नहीं हो रहा है, वह आज बहुत अंश में धुल गया था।

प्रश्न 5. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क)आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो  रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया। 

(ख) खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।
उत्तर:
 

(क) ”डायरी का एक पन्ना“ नामक पाठ के माध्यम से लेखक श्री सीताराम सेकसरिया कह रहे हैं, कि जब 26 जनवरी, 1931 के दिन सारे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था, उस दिन क्रांतिकारियों द्वारा स्थान-स्थान पर प्रदर्शन किया जा रहा था। झण्डारोहण, सभा और जुलूस को रोकने की व्यवस्था ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई थी। इस कार्यक्रम में महिलाओं द्वारा धरना जुलूस का आयोजन किया गया। जब सुभाष बाबू का जुलूस चैरंगी पर पहुँचा तो उसे रोक दिया गया और लाठीचार्ज किया गया। विरोध स्वरूप वहाँ भीड़ एकत्र हो गई। स्त्रियाँ जुलूस बनाकर आगे चलीं। तब उन्हें ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। कुल मिलाकर 105 (एक सौ पाँच) स्त्रियाँ बंदी बनाकर थाने लाई गईं। काफी लोग घायल भी हुए थे। आज जो कुछ भी यह हुआ था वह अपूर्व था क्योंकि बंगाल या कलकत्ता के नाम पर लगा हुआ कलंक, कि यहाँ काम नहीं हो रहा है, बहुत अंश तक धुल गया था।

(ख) प्रस्तुत पंक्ति के अनुसार लेखक उस समय का वर्णन कर रहे हैं जब स्वतंत्रता दिवस के आयोजन के अवसर पर ब्रिटिश सरकार ने कानून भंग होने से रोकने के लिए, किसी भी सार्वजनिक सभा को होने से रोकने के लिए नोटिस और सूचना दे दी थी कि जो व्यक्ति किसी भी सभा में शामिल होगा वह दोषी समझा जाएगा। सर्वसाधारण और क्रांतिकारियों ने खुली चुनौती के रूप में सभा का आयोजन करने का निश्चय किया था। इससे पूर्व कोई ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।

प्रश्न 6. ‘डायरी का एक पन्ना’ पाठ के आधार पर भारतीय स्वाधीनता संग्राम की एक झाँकी प्रस्तुत कीजिए। 
उत्तर:
 प्रस्तुत पाठ में 26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रीय झंडा फहराए जाने का वर्णन है। इस दिन भारतीय जनता ने अंग्रेज सरकार के विरूद्ध खुला विद्रोह किया था। काँग्रेस के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। सरकारी आदेश के अनुसार इस दिन सार्वजनिक सभा करने और राष्ट्रीय झंडा फहराए जाने पर रोक थी। स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कौंसिल शाम को मोनुमेंट के नीचे सभा करने तथा झंडा फहराए जाने के लिए तत्पर थी। यह खुला विद्रोह था। पुलिस ने खुलकर लाठीचार्ज किया, पकड़-धकड़ की और आंदोलन को दबाने की कोशिश की। अभूतपूर्व उत्साह होने के कारण लोग चोट खाकर भी रुकते नहीं थे। हजारों नर-नारी सभा स्थल पर इकट्ठे हुए। कितने ही घायल हुए। पकड़े गए और कितनों को जेलों में बंद कर दिया गया। सरकार की हर कोशिश के बावजूद निर्धारित समय पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी गई।

प्रश्न 7. ”भारत को मिली स्वतंत्रता में सभी वर्गों की भूमिका थी“ – सिद्ध कीजिए। 
उत्तर:
 भारत को जो स्वतंत्रता मिली, उसमें समाज के सभी वर्गों की भूमिका थी। इस आंदोलन में स्त्रियों ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। उन्होंने स्वप्रेरणा से अपनी टोलियाँ खुद बनाकर संघर्ष का नेतृत्व किया। उन्होंने पूर्व निश्चय के अनुसार मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा भी फहराया और पूर्ण स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी। उन्होंने लाठियाँ खाईं, गिरफ्तारी दी तथा जेल गईं। विद्यार्थियों ने भी बढ़-चढ़कर झंडोत्सव मनाया। व्यापारियों ने बाजारों और मकानों को ऐसे सजाया मानो स्वतंत्रता मिल गई हो।

प्रश्न 8. 26 जनवरी को ही स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाया गया ? 
उत्तर:
 दिसंबर 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उसमें प्रस्ताव पारित किया गया कि हम पूर्ण स्वराज्य से कम कुछ नहीं मागेंगे। 26 जनवरी, 1930 को देशवासियों ने भारत को ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ दिलाने के लिए हर प्रकार का बलिदान देने की प्रतिज्ञा की। अतः उस दिन को तब से स्वतंत्रता-दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। आजाद भारत में इसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।