8. बड़े भाई साहब  – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई का टाइम-टेबिल बनाते समय क्या-क्या सोचा था और फिर उसका पालन क्यों नहीं कर पाया? 
उत्तर
: छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई का टाइम-टेबल बनाते समय सोचा कि वह अब मन लगाकर पढ़ाई करेगा और बड़े भाई को कभी शिकायत का मौका नहीं देगा। रात गयारह बजे तक हर विषय को पढ़ने का कार्यक्रम बनाया गया परन्तु पढ़ाई करते समय खेल के मैदान उसकी हरियाली, हवा के हल्के-हल्के झोंके, फुटबॉल की उछल-कूद, कबड्डी, बालीबॉल की तेजी सब चीजें उसे अपनी ओर खींचती थीं। इसलिए वह टाइम-टेबिल का पालन नहीं कर पाया। साथ ही प्रिय शौक खेल को टाइम टेबिल में स्थान देना भी रुकावट था।



प्रश्न 2: एक दिन जब गुल्ली-डंडा खेलने के बाद छोटा भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुँचा तो उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर:
 एक दिन जब गुल्ली-डंडा खेलने के बाद छोटे भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुँचे तो उनकी प्रतिक्रिया बहुत भयानक थी। वह बहुत क्रोधित थे। उन्होंने छोटे भाई को बहुत डाँटा। उन्होंने उसे पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा। गुल्ली-डंडा खेल की उन्होंने बहुत बुराई की। उनके अनुसार यह खेल भविष्य के लिए लाभकारी नहीं है। अतः इसे खेलकर उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उन्होंने यह भी कहा कि अव्वल आने पर उसे घंमड हो गया है। उनके अनुसार घमंड तो रावण तक का भी नहीं रहा। अभिमान का एक-न-एक दिन अंत होता है। अतः छोटे भाई को चाहिए कि घमंड छोड़कर पढ़ाई की ओर ध्यान दे।


प्रश्न 3: बड़े भाई की डाँट-फटकार अगर न मिलती, तो क्या छोटा भाई कक्षा में अव्वल आता? अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर:
 बड़े भाई की डाँट-फटकार अगर न मिलती तो हमारे विचार से छोटा भाई कक्षा में अव्वल नहीं आता, क्योंकि किसी कार्य की सफलता के लिए चाणक्य द्वारा बताई साम-दाम, दण्ड-भेद की नीति, प्रेरक शक्ति के रूप में प्रताड़ना प्रेरणा का कार्य करती है। जब बड़े भाई साहब की डाँट छोटे भाई को पड़ती थी, तब वह उनकी डाँट को गलत सिद्ध करने के लिए अध्ययन के प्रति सचेत हो जाता था। जिसका परिणाम यह होता था कि छोटा भाई कक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण हो जाता था। भाई की डाँट उसके अध्ययन की सफलता का सिद्धि मंत्र थी, जो उसे आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती थी। अतः छोटे भाई को अगर बड़े भाई की डाँट-फटकार नहीं मिलती तो वह कक्षा में अव्वल नहीं आता।

प्रश्न 4: बडे़ भाई साहब अपने छोटे भाई पर रौब जमाने के लिए लंबे-लंबे भाषण देते हैं। उनकी आत्यधिक बोलने की आदत उनकी कमजोरी है अथवा खूबी? तर्क सम्मत उत्तर लिखिए। 
उत्तर:
 बड़े भाई साहब की आत्यधिक बोलने की आदत एक समय पर खूबी और दूसरे समय पर कमजोरी हो सकती है, जो स्थिति और मकसद के अनुसार बदलती रहती है। 
इसका तर्कसंगत उत्तर निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है:
खूबी के रूप में:

  • शिक्षा और मार्गदर्शन: बड़े भाई साहब छोटे भाई को जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सलाह देते हुए उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करते हैं। उनके लंबे भाषण छोटे भाई के लिए एक शिक्षा का स्रोत बनते हैं।
  • अनुभव का हवाला: बड़े भाई साहब के पास अधिक जीवन-अनुभव होते हैं, जिसे वे छोटे भाई को समझाने के लिए उपयोग करते हैं। इससे छोटे भाई को जीवन की कठिनाइयों से निपटने के लिए तैयारी मिलती है।
  • उत्तरदायित्व की भावना: बड़े भाई साहब को छोटे भाई के प्रति एक उत्तरदायित्व का अहसास होता है। इस उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए वे अपने विचार बार-बार समझाते हैं।

कमजोरी के रूप में:

  • छोटे भाई की रुचि की अनदेखी: बड़े भाई साहब के लंबे भाषण छोटे भाई को अक्सर ऊबा देते हैं। इससे छोटा भाई उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता और उनका प्रभाव कम हो जाता है।
  • अत्यधिक नियंत्रण की भावना: बड़े भाई साहब के बार-बार बोलने से छोटे भाई में एक अनुभव होता है कि उस पर अत्यधिक नियंत्रण रखा जा रहा है। यह छोटे भाई को प्रतिबंधित महसूस करा सकता है।
  • प्रभावी संचार की कमी: लंबे भाषण देने की बजाय, छोटे भाई के साथ संवाद करना और उसकी राय सुनना अधिक प्रभावी होता। बड़े भाई साहब के एकतरफा बोलने से यह संचार नष्ट हो सकता है।

निष्कर्ष: बड़े भाई साहब की बोलने की आदत खूबी तब होती है जब उनके भाषण छोटे भाई के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक होते हैं। लेकिन जब ये भाषण अत्यधिक और एकतरफा होते हैं, तो वे छोटे भाई को ऊबाते हैं और उसकी रुचि को नष्ट करते हैं, जिससे यह एक कमजोरी बन जाती है। अतः, बड़े भाई साहब को अपने भाषणों को संक्षिप्त और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

प्रश्न 5: बड़े भाई साहब ने स्वयं फेल हो जाने पर भी अपने छोटे भाई को डाँटकर भी उसका प्यार किस प्रकार जीता? अगर आपके बड़े भाई ऐसा करते तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होती? लिखिए। 
उत्तर:
 बड़े भाई साहब ने, यद्यपि स्वयं की पढ़ाई में असफलता का सामना किया, फिर भी छोटे भाई को डाँटने और सही राह दिखाने के माध्यम से उसका प्यार जीता। वे छोटे भाई को अपने अनुभवों से सीखने का मौका देते हैं और उसे सही दिशा में लाने का प्रयास करते हैं। बड़े भाई का यह रवैया इसलिए महत्वपूर्ण है कि वे छोटे भाई के भविष्य के प्रति जिम्मेदार महसूस करते हैं। उनकी डाँट और सख्ती के पीछे छिपा प्यार और चिंता ही वजह बनती है कि छोटा भाई उनकी बातों को गंभीरता से लेता है और अंततः उनके प्रति सम्मान और प्यार विकसित करता है।
अगर मेरे बड़े भाई ऐसा करते, तो मेरी प्रतिक्रिया इस पर निर्भर करती कि उनकी डाँट में कितना सच्चा प्यार और उद्देश्य था। यदि मुझे लगता कि वे मेरे भले के लिए कह रहे हैं, तो मैं उनकी बात को समझने और सुधार करने की कोशिश करता। लेकिन अगर उनकी डाँट में केवल आलोचना होती और उसमें कोई सकारात्मक संदेश नहीं होता, तो मैं थोड़ा निराश महसूस करता और शायद उनसे दूरी बनाने की कोशिश करता। फिर भी, मैं उनके साथ संवाद करने की कोशिश करता और अपनी भावनाओं को साफ़ करने का प्रयास करता, ताकि हम दोनों के बीच समझौता हो सके।
इस तरह, बड़े भाई की डाँट का प्रभाव उसके तरीके और उद्देश्य पर निर्भर करता है। अगर वह सच्चे दिल से छोटे भाई के भले के लिए कहता है, तो वह उसका प्यार और सम्मान जीत सकता है।

प्रश्न 6: छोटे भाई के मन में बड़े भाई साहब के प्रति श्रद्धा क्यों उत्पन्न हुई?
उत्तर:
 छोटे भाई को खेलना बहुत पसंद था। वह हर समय खेलता रहता था। बड़े भाई साहब इस बात पर उसे बहुत डांटते रहते थे। उनके डर के कारण वह थोड़ा बहुत पढ़ लेता था। परन्तु जब बहुत खेलने के बाद भी उसने अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, तो उसे स्वयं पर अभिमान हो गया। अब उसके मन से बड़े भाई का डर भी जाता रहा। वह बेखौफ होकर खेलने लगा। एक दिन पतंग उड़ाते समय बड़े भाई साहब ने उसे पकड़ लिया। उन्होंने उसे समझाया और अगली कक्षा की पढ़ाई की कठिनाइयों का अहसास भी दिलाया। उन्होंने बताया कि वह कैसे उसके भविष्य के कारण अपने बचपन का गला घोंट रहे हैं। उनकी बातें सुनकर छोटे भाई की आँखें खुल गई। उसे समझ में आ गया कि उसके अव्वल आने के पीछे बड़े भाई की ही प्रेरणा रही है। इससे उसके मन में बड़े भाई के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई।

प्रश्न 7: बड़े भाई साहब छोटे भाई को क्या सलाह देते थे और क्यों?
उत्तर:
 बड़े भाई साहब छोटे भाई को पढ़ाई पर ध्यान देने और समय का सदुपयोग करने की सलाह देते थे। वे उसे बताते थे कि पढ़ाई में लगन और मेहनत के बिना सफलता नहीं मिल सकती, और समय को अकेले खेलने या बेकार गुजारने के लिए बर्बाद नहीं करना चाहिए। वे छोटे भाई को यह समझाने की कोशिश करते थे कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से कठिन परिश्रम करना आवश्यक है।
कारण:

  • छोटे भाई की भलाई के लिए: बड़े भाई साहब छोटे भाई को सही रास्ते पर लाना चाहते थे। वे उसके भविष्य के प्रति जिम्मेदार महसूस करते थे और चाहते थे कि वह जीवन में सफल हो।
  • अपने अनुभवों से सीखने के लिए: बड़े भाई साहब ने स्वयं कठिनाइयों का सामना किया था और उन्हें पता था कि अगर छोटा भाई सही समय पर मेहनत नहीं करेगा, तो उसे भी भविष्य में पछताना पड़ेगा। इसलिए, वे उसे समय पर सही फैसले लेने के लिए प्रेरित करते थे।
  • पारिवारिक उत्तरदायित्व: बड़े भाई साहब को लगता था कि उनका यह कर्तव्य है कि वे छोटे भाई को सही मार्गदर्शन दें और उसे जीवन की कठिनाइयों से निपटने के लिए तैयार करें।

इस प्रकार, बड़े भाई साहब की सलाह का मुख्य उद्देश्य छोटे भाई को जीवन में सफल बनाना और उसे सही मार्गदर्शन प्रदान करना था।

प्रश्न 8: ‘बड़े भाई साहब’ पाठ में लेखक ने समूची शिक्षा के किन तौर-तरीकों पर व्यंग्य किया है, क्या आप उनके विचार से सहमत हैं? 
उत्तर: ‘बड़े भाई साहब’ पाठ में लेखक ने शिक्षा की परंपरागत और रटने-आधारित प्रणाली पर व्यंग्य किया है। उन्होंने इन तरीकों की आलोचना की है:

  • रटने की प्रणाली: लेखक बच्चों को बिना समझे रटने पर जोर देने वाली प्रणाली की आलोचना करते हैं। छोटे भाई को बड़े भाई साहब रटने के लिए कहते हैं, न कि समझने के लिए।
  • परीक्षा-केंद्रित शिक्षा: लेखक ने परीक्षा को ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य बनाने पर व्यंग्य किया है। वे बताते हैं कि बच्चों को बस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए तैयार किया जाता है, न कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए।
  • व्यावहारिक ज्ञान की अनदेखी: लेखक ने जीवन के व्यावहारिक पहलुओं को समझने की अनदेखी करने पर व्यंग्य किया है। बड़े भाई साहब छोटे भाई को सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह देते हैं, जबकि खेल और अन्य गतिविधियों को नज़रअंदाज करने को कहते हैं।
  • शिक्षकों की दबावपूर्ण विधियाँ: लेखक ने शिक्षकों की कठोर और डाँट-फटकार भरी विधियों पर व्यंग्य किया है। बड़े भाई साहब की डाँट और डराने की शैली से छोटे भाई पर बहुत दबाव पड़ता है।
  • सैद्धांतिक ज्ञान पर अत्यधिक बल: लेखक ने केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर अत्यधिक बल देने की आलोचना की है। उनका मानना है कि ज्ञान को व्यावहारिक तौर पर लागू करना भी महत्वपूर्ण है।

क्या मैं लेखक के विचार से सहमत हूँ?
हाँ, मैं लेखक के विचार से सहमत हूँ। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों को रटने की बजाय सोचने, समझने और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए। परीक्षा-केंद्रित शिक्षा बच्चों को दबाव में डालती है और उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासा को दबा देती है। खेल और अन्य गतिविधियाँ बच्चों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, और इन्हें नज़रअंदाज करना गलत है।
इसलिए, शिक्षा को जीवन का एक अभिन्न अंग बनाने के लिए, यह आवश्यक है कि इसमें व्यावहारिक ज्ञान, सृजनात्मकता और बच्चों के समग्र विकास पर बल दिया जाए।

प्रश्न 9: आपके माता-पिता द्वारा दी जा रही हिदायतों और पढ़ाई के लिए डाँट-फटकार के प्रति आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है? अपने अनुभव बड़े भाई साहब पाठ के आधार पर लिखिए। 
उत्तर:
 बड़े भाई साहब पाठ के आधार पर, मेरी प्रतिक्रिया अपने माता-पिता द्वारा दी जाने वाली हिदायतों और पढ़ाई के लिए डाँट-फटकार के प्रति मिश्रित हो सकती है। यह पाठ बताता है कि छोटे भाई को बड़े भाई की डाँट और उनके उपदेशों के प्रति अलग-अलग समय पर अलग-अलग भावनाएँ महसूस होती हैं। इसी तरह, मेरे अनुभव भी इन परिस्थितियों के आधार पर बदल सकते हैं।
1. प्रारंभिक प्रतिक्रिया: असंतोष और दबाव
जब माता-पिता या बड़े भाई-बहन हमें पढ़ाई के लिए डाँटते हैं, तो प्रारंभ में हमें यह बात अच्छी नहीं लगती। बड़े भाई साहब की तरह, मेरे माता-पिता की भी अपेक्षाएँ कभी-कभी बहुत ऊँची होती हैं, जिससे मुझे दबाव महसूस होता है। ऐसे में मैं भी कभी-कभी निराश हो जाता हूँ और सोचता हूँ कि “मुझे अपनी गलती का एहसास है, फिर भी मुझे इतनी डाँट क्यों सुननी पड़ती है?”
2. गहरी समझ: प्यार और चिंता का एहसास
लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, मुझे अपने माता-पिता की डाँट के पीछे छुपा प्यार और चिंता समझ में आने लगता है। बड़े भाई साहब भी अपने छोटे भाई को डाँटते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल उसका भला करना है। इसी तरह, मेरे माता-पिता की हर डाँट में एक संदेश छिपा होता है कि वे मेरे भविष्य के लिए चिंतित हैं। जब मैं इसे समझता हूँ, तो मेरे मन में उनके प्रति आदर और प्यार की भावना बढ़ जाती है।
3. प्रेरणा और सुधार की भावना
बड़े भाई साहब की तरह, मेरे माता-पिता की डाँट भी कभी-कभी मुझे प्रेरित करती है। जब मैं उनकी बातों को गंभीरता से लेता हूँ, तो मैं अपने आप में सुधार लाने की कोशिश करता हूँ। 
4. आत्म-विश्लेषण और विकास
अंततः, बड़े भाई साहब के पाठ से मुझे यह सीख मिलती है कि डाँट-फटकार को नकारात्मक तरीके से नहीं, बल्कि एक सीख के रूप में लेना चाहिए। जब मैं अपने माता-पिता की बातों को समझता हूँ और उनकी उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश करता हूँ, तो मैं अपने आप में विकास का अनुभव करता हूँ। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता है और मैं अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए तैयार हो जाता हूँ।
निष्कर्ष: मेरी प्रतिक्रिया अपने माता-पिता की हिदायतों और डाँट-फटकार के प्रति शुरुआत में असंतोषपूर्ण हो सकती है, लेकिन समय के साथ मैं उनके पीछे छुपे प्यार, चिंता और उद्देश्य को समझता हूँ। यह समझ मेरे अंदर सुधार और विकास की भावना जगाती है, जो मेरे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।


प्रश्न 10: निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए: 
(क) इम्तिहान पास कर लेना कोई चीज नहीं असल चीज है बुद्धि का विकास। 
(ख) फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच भी आदमी मायामोह के बंधन में जकड़ा रहता है, मैं फटकार और घुड़कियाँ खाकर खेलकूद का तिरस्कार न कर सकता था। 
(ग) बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान कैसे पायेदार बने ? 
(घ) आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला आ रहा था, मानो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार ग्रहण करने जा रही हो। 

उत्तर: (क) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन का अर्थ है कि केवल परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना या अंक प्राप्त करना जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। वास्तविक उपलब्धि तब होती है जब व्यक्ति की बुद्धि, सोच और समझ में विकास होता है। इसके अंतर्गत ज्ञान का वास्तविक अर्थ, जीवन की समझ और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता आती है। यह कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व और बौद्धिक क्षमता का विकास करना है।
(ख) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन में यह कहा गया है कि चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ या खतरे क्यों न हों, व्यक्ति अपनी इच्छाओं और पसंदों से जुड़ा रहता है। यहाँ लेखक कहता है कि बड़े भाई की डाँट-फटकार के बावजूद भी वह खेलकूद को छोड़ नहीं सकता था। खेलने की उसकी इच्छा और रुचि इतनी मजबूत थी कि वह उसे तिरस्कार नहीं कर सकता था। यह उसके लिए माया का बंधन था, जिससे वह बाहर नहीं निकल पा रहा था।
(ग) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन का अर्थ है कि यदि किसी कार्य या उपलब्धि की आधारशिला (बुनियाद) मजबूत नहीं है, तो उसका परिणाम भी स्थिर या सफल नहीं हो सकता। यहाँ “मकान” का उल्लेख जीवन की उपलब्धियों या सफलता के लिए किया गया है, जबकि “बुनियाद” उसकी शिक्षा, मेहनत और तैयारी को दर्शाता है। यह कहना है कि यदि शिक्षा या किसी कार्य की शुरुआत मजबूत नहीं है, तो अंतिम परिणाम भी सफल नहीं होगा।
(घ) आशय स्पष्टीकरण: इस कथन में लेखक ने एक गहरा और भावपूर्ण दृश्य चित्रित किया है। यहाँ “आँखें आसमान की ओर” देखने का अर्थ है कि व्यक्ति का ध्यान ऊँचे लक्ष्यों या आदर्शों की ओर है। वह “आकाशगामी पथिक” को देख रहा है, जो धीरे-धीरे गिरते हुए प्रतीत होता है। यह पथिक एक आत्मा की तरह है, जो स्वर्ग से नीचे आ रही है और नए संस्कारों को स्वीकार करने के लिए तैयार है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपने ऊँचे सपनों और आदर्शों को छोड़कर वास्तविकता की ओर आ रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहाँ आदर्श और वास्तविकता के बीच संघर्ष का भाव छाया हुआ है।

7. आत्मत्राण – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक का अर्थ बताते हुए उसकी सार्थकता, कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
‘आत्मत्राण’ का अर्थ है-स्वयं अपनी सुरक्षा करना। इस कविता में कवि ईश्वर से सहायता नहीं माँगता। वह ईश्वर को हर दुःख से बचाने के लिए नहीं पुकारता। वह स्वयं अपने दुःख से बचने और उसके सामना करने योग्य बनना चाहता है। इसके लिए वह केवल स्वयं को समर्थ बनाना चाहता है। इसलिए यह शीर्षक विषय वस्तु के अनुरूप बिल्कुल सही और सटीक है।

प्रश्न 2. ‘आत्मत्राण’ कविता में कवि की प्रार्थना से क्या संदेश मिलता है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 

  • जीवन-भार स्वयं वहन कर सकें।
  • सुख के समय में भी प्रभु को निरन्तर याद रखें।
  • ईश्वर की शक्ति और करुणा पर विश्वास रखें।
  • विपत्तियों और बाधाओं में आत्मबल, आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता बनाए रखें।
    (उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)

व्याख्यात्मक हल:
‘आत्मत्राण’ कविता में कवि की प्रार्थना से आत्मनिर्भर जीवन जीने का संदेश मिलता है। कवि ईश्वर से अपने जीवन का भार स्वयं वहन कर सकने की क्षमता माँगता है। वह चाहता है कि सुख के समय में भी हम ईश्वर को निरन्तर याद करते रहें और ईश्वर की शक्ति और करुणा पर अपना अटूट विश्वास बनाये रखें। जीवन में आने वाली विपत्तियों व बाधाओं में हम अपना आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता बनाए रखें।

प्रश्न 3. आत्मत्राण कविता में किसी सहायक पर निर्भर न रहने की बात कवि क्यों कहता है? कविता का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 

  • कवि स्वावलंबी है और वह अपने बलबूते जीवन की सभी बाधाओं और विपत्तियों का सामना करना चाहता है।

केन्द्रीय भाव:

  • विपत्ति के समय ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना।
  • सुख के समय भी ईश्वर को याद रखना।
  • अपने आत्मबल और पुरुषार्थ के बल पर बाधाओं और विपत्तियों का सामना करना।
  • सहायक न मिलने पर भी विचलित न होना।
    (उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)

व्याख्यात्मक हल:
‘आत्मत्राण’ कविता में किसी सहायक पर निर्भर न रहने की बात कवि इसलिए कहता है कि यदि ऐसी परिस्थिति आ जाए कि कोई सहायक न भी मिले अर्थात कोई सहायता करने वाला न हो तो भी उसमें आत्मबल, हिम्मत-साहस और बल पौरुष बना रहे। क्योंकि कवि स्वावलंबी है और वह अपने बलबूते जीवन की सभी बाधाओं और विपत्तियों का सामना करना चाहता है। ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है-स्वयं अपनी सुरक्षा करना। इस कविता में कवि ईश्वर से सहायता नहीं माँगता। वह ईश्वर को हर दुःख से बचाने के लिए नहीं पुकारता। वह स्वयं अपने दुःख से बचने और उसके योग्य बनना चाहता है। इसके लिए वह केवल स्वयं को समर्थ बनाना चाहता है।

प्रश्न 4. आत्मत्राण कविता के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है ? उसका संदेश स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 

  • विपदाओं से भयभीत न हों।
  • किसी सहायक के न मिलने पर भी बल-पौरुष बनाए रखें।
  • लोगों द्वारा छले जाने पर भी मन से हार न मानें।
  • सुख के दिनों में भी ईश्वर को याद रखें।
  • ईश्वर के प्रति मन में कभी भी संदेह न रखें। 

व्याख्यात्मक हल:
आत्मत्राण कविता के द्वारा कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हमें विपत्तियों से न घबराने का संदेश दिया है। भले ही कोई सहायक न मिले पर हम साहस बनाए रखें। यदि कोई हमें धोखा दे या छल-कपट करे तो भी मन में हमें हार नहीं माननी चाहिए। सुख के दिनों में भी सदैव ईश्वर को याद रखें और कभी ईश्वर के प्रति मन में अविश्वास और संदेह की भावना न लाएँ:यही संदेश इस कविता से हमें प्राप्त होता है।

प्रश्न 5. कवि ईश्वर पर संशय नहीं करना चाहता, क्यों ? कविता के संदर्भ में उत्तर दीजिए।
उत्तर:
 कवि ईश्वर पर सदैव विश्वास बनाए रखना चाहते हैं। दुख के दिनों में भी परमेश्वर के प्रति उनकी आस्था पर किसी प्रकार का संदेह या संशय न हो, क्योंकि ईश्वर पर उनके विश्वास का संबल ही उन्हें हर कठिनाई को सहने की शक्ति प्रदान करता है। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास ही उन्हें कठिनाइयों में निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

प्रश्न 6. कवि को ईश्वर के अतिरिक्त और किस पर भरोसा है और क्यों ?
उत्तर:
 कवि को ईश्वर के अतिरिक्त अपनी बुद्धि व कौशल पर विश्वास है। उन्हें अपनी शक्ति व कठिनाइयों का सामना करने के लिए बुद्धि के बल पर बनाई गई योजनाओं और कुशलता के बल पर उनका सामना करने की क्षमता पर विश्वास है, क्योंकि कवि का मानना है कि मनुष्य अपना उद्धार स्वयं ही कर सकता है, अपनी कठिनाइयों से खुद छुटकारा पा सकता है, कोई और उसकी सहायता नहीं कर सकता। वह जानता है कि वह यदि अपनी समस्त शक्तियों का उचित प्रयोग करेगा, तो कठिनाइयाँ निश्चय ही दूर होंगी।

प्रश्न 7. सामान्यतः मनुष्य कैसे दिनों में ईश्वर को भूल जाता है और क्यों? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
 सामान्यतः मनुष्य सुख के दिनों में ईश्वर को भूल जाता है, क्योंकि वह स्वार्थी प्राणी है। जब-जब उसे किसी चीज की आवश्यकता होती है, तब-तब वह उसे पाने के लिए प्रयत्नशील होता है और ईश्वर से इच्छा-पूर्ति की कामना करता है और इच्छा-पूर्ति हो जाने पर भगवान को पूरी तरह भूल जाता है। फिर दुख के समय आपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए पुनः ईश्वर का स्मरण करता है।

प्रश्न 8. हमें संकटों का सामना किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर:
 हमें संटकों का सामना डटकर करना चाहिए। आत्मसंघर्ष करके, संकटों से जूझकर ही विजय प्राप्त की जा सकती है। पुरुषार्थ के बल पर संकटों का सामना करने में ही भलाई है। कवि निर्भय बनकर जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष कर विजय पाने का प्रयत्न करना चाहता है। हमें ईश्वर पर विश्वास बनाए रखकर कठिनाइयों पर पार पाना चाहिए।

प्रश्न 9. कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर:
 ‘आत्मत्राण’ कविता में कवि की आकांक्षा सामान्य लोगों की आकांक्षा से भिन्न है। सामान्य रूप से लोग ईश्वर से दुःखों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। पर इस कविता में कवि दुःखों से विचलित न होकर अपने बुद्धि-बल और साहस के बल पर कठिनाइयों से त्राण पाना चाहता है। वह ईश्वर से इतनी शक्ति चाहता है कि विपत्तियाँ, हानि, धोखा सहन कर पाए। उसका ईश्वर पर सदैव विश्वास बना रहे। सुख-दुःख को समभाव से वहन कर सके। कवि ने जीवन में संघर्ष करने की शक्ति की कामना की है।

6. कर चले हम फ़िदा – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. ‘कर चले हम फ़िदा’ कविता में ‘साथियो’ सम्बोधन किन के लिए किया गया है और उनसे क्या अपेक्षा की गई है?
उत्तर: 
‘कर चले हम फ़िदा’ कविता में कवि ने चीन के युद्ध में सीमाओं पर लड़ने वाले सैनिकों द्वारा ‘साथियो’ शब्द भारत-वर्ष के देशवासियों (युवा पीढ़ी) के लिए सम्बोधन किया है और उनसे अपेक्षा की गई है कि वे तो संसार छोड़कर जा रहे है और अब देश की रक्षा का उत्तरदायित्व उन पर है। हिमालय देश का मुकुट है, इसलिए अपने सिर भले ही कट जाएँ, परंतु हिमालय का सिर नहीं झुकना चाहिए। मातृभूमि पर हँसते-हँसते न्योछावर हो जाएँ। संकट की घड़ी में अपने सुखों को, स्वार्थों को छोड़कर देशसेवा में समर्पित हो जाएँ।

प्रश्न 2. ‘कर चले हम फ़िदा’ कविता में किस प्रकार की मृत्यु को अच्छा कहा गया है और क्यों? इसमें कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर: देश की रक्षा करते समय होने वाली मृत्यु को अच्छा कहा गया है।
देशभक्ति और बलिदान की भावना जगाने के लिए।
संदेश-देश के लिए समर्पण एवं बलिदान का।
(उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित)
व्याख्यात्मक हल:
कविता में युद्ध भूमि में लड़ते समय सैनिक की देश की रक्षा करते समय होने वाली मृत्यु को अच्छा कहा गया है। इससे कवि यह संदेश देना चाहता है कि जब देश पर कोई विदेशी आक्रमणकारी चढ़ आया हो, तब हमें जी जान लगाकर देश की रक्षा करना चाहिए। युद्ध में चाहे कितने भी संकट आएँ, मौत सामने आ जाए, तो भी हमें बलिदान देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। और हमारे अन्दर देश के लिए समर्पण और बलिदान की भावना होनी चाहिए।

प्रश्न 3. इस कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
‘कर चले हम फ़िदा’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान करने वाला वीर सैनिक साथियों से देश की रक्षा का दायित्व उठाने का आह्वान करता है। सैनिक कहता है कि देश के लिए बलिदान का अवसर रोज-रोज नहीं आता अतः इसका सिलसिला चलते रहना चाहिए। देश की मर्यादा और सीमाओं के विरूद्ध उठने वाले दुश्मन के हर वार का मुँहतोड़ जवाब देना है, इसकी रक्षा करनी है।
व्याख्यात्मक हल:
भारतीय वीर सैनिकों में देश की सुरक्षा के लिए जोश भरना तथा देशवासियों के मन में देशभक्ति की भावना भरना इस कविता का उद्देश्य है। देश के लिए बलिदान होने वाला सैनिक अपने साथियों को बताता है कि उसने तथा उसके काफिले के अन्य सैनिकों ने भीषण कष्ट और संकट सहन करके भी शत्रुओं के साथ मुकाबला किया। वे लड़ते-लड़ते शहीद हो गए, मरते दम तक उन्होंने संघर्ष किया। वह अपने अन्य सैनिक साथियों को कहता है कि वे भी देश की धरती को दुल्हन मानकर उस पर फिदा हो जाएँ। वे इसकी सुरक्षा के लिए खून की नदी बहा दें। देश के लिए मरने का अवसर कभी-कभी आता है। अतः वे नए-नए काफ़िले सजाकर शत्रु के साथ संघर्ष करें। उनके होते कोई भी शत्रु देश की सीमाओं में प्रवेश न कर सके। वे शत्रु रूपी रावण के संहार के लिए राम और लक्ष्मण की भाँति संघर्ष करें।

प्रश्न 4. ‘कर चले हम फ़िदा’ कविता पाठक के मन को छू जाती है। आपके मत में इसके क्या कारण हो सकते हैं।
उत्तर:
 

  • देशभक्ति
  • सैनिकों का देश के लिए समर्पण और बलिदान
  • देश की रक्षा के लिए भावी सैनिक तैयार करने की भावना
  • संगीतात्मकता
  • ओजपूर्ण भाषा-शैली 

व्याख्यात्मक हल:
‘कर चले हम फ़िदा’ कविता पाठकों के मन को छू जाती है क्योंक इसकी विषयवस्तु देशभक्ति से ओतप्रोत है। कवि ने इस कविता के माध्यम से सैनिकों के देश के लिए समर्पण व बलिदान होने की भावना को प्रकट किया है। यह कविता देश की रक्षा के लिए भावी सैनिक तैयार करने की भावना उत्पन्न करती है। इसकी भाषा-शैली ओजपूर्ण है तथा इसमें संगीतात्मकता की प्रधानता है। क्योंकि यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म हकीकत के लिए लिखा गया है।

प्रश्न 5. हमें आज़ादी का क्या मूल्य चुकाना पड़ा? ‘कर चले हम फ़िदा’ के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। 
उत्तर: हमें आज़ादी प्राप्त करने के लिए अपने वीर सैनिकों को देश पर कुर्बान करना पड़ा। विदेशियों की चतुराई एवं चालाकी को न समझ पाने के कारण उनके धोखे को सहन करना पड़ा। अनेक बहनों ने अपने भाई तथा अनेक माताओं ने अपने लाल खोकर यह आज़ादी हासिल की, किन्तु इन सबसे हमने शत्रुओं की चतुराई एवं कपटता से सदैव सावधान रहने का पाठ पढ़ा।

प्रश्न 6. मानव जीवन में स्वतंत्रता का क्या महत्त्व है?
उत्तर: 
स्वतंत्रता प्रत्येक प्राणी का जन्मसिद्ध अधिकार है। मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ कर स्वतंत्र रहना चाहते हैं। स्वतंत्रता व्यक्ति के अस्तित्व की पहचान है। पराधीन व्यक्ति को तो सपने में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती है। स्वतंत्र हवा में साँस लेने के लिए हमारे देश के वीरों ने संघर्ष कर अपने प्राण अ£पत कर दिए। प्रत्येक व्यक्ति को जीते-जी अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कुछ भी करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए।

प्रश्न 7. गीत की भाषा तथा शब्द-योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 गीत खड़ी बोली हिन्दी में लिखा गया है। गीत में अरबी और फ़ारसी के शब्दों का प्रयोग मिलता है। गीत में वीर रस की उत्पत्ति करने वाले सुंदर शब्दों का प्रयोग है। भाषा में ओजगुण सर्वत्र विद्यमान है। गीत की भाषा मुहावरेदार है। साधारण बोलचाल की भाषा अत्यंत सरल, सरस, प्रभावशाली एवं मार्मिक है।

5. तोप – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न. 1. कम्पनी बाग और तोप को विरासत मानकर क्यों सुरक्षित रखा गया ?
उत्तर:
 कम्पनी बाग और तोप-ये दोनों अंग्रेजों की विरासत हैं। इन दोनों का उपयोग भारतीय जनता के लिए किया गया। एक ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत की जनता को खुशहाल बनाने के लिए हर नगर में कम्पनी बाग बनवाए। इससे जनता प्रसन्न हुई। दूसरी ओर, कम्पनी ने जनता के विद्रोह को दबाने के लिए, उन्हें अपना गुलाम बनाने के लिए उन पर तोपें दगवाईं। ये दोनों विरासतें भारतीय जनता को सावधान करती हैं। ये कहती हैं कि विदेशी कम्पनियों द्वारा दिए गए आकर्षणों में न फँसो। एक दिन ये तुम्हें गुलाम बना डालेंगी। तुम्हें फिर से इनकी तोपों से दगना पड़ेगा।

प्रश्न. 2. इस कविता से ‘तोप’ के विषय में क्या जानकारी मिलती है ?
उत्तर:
 ‘तोप’ नामक इस कविता में हमें तोप के विषय में निम्नलिखित जानकारी मिलती है:
(i) तोप के इतिहास के विषय में, जो 1857 की है।
(ii) यह विरासत में प्राप्त हुई है, जिसको बड़ी सँभाल के साथ रखा गया है।
(iii) पर्यटकों को सुबह-शाम वह प्रतीक रूप में अपने कार्यों का बखान करती है।
(iv) समय बदलने पर तोप के ऊपर हो रहे परिवर्तनों का वर्णन किया गया है।
(v) बच्चों द्वारा तोप का उपयोग घुड़सवारी, चिड़ियों द्वारा बैठकर गप-शप करने, गौरेये द्वारा उसके अंदर शैतानी करते हुए प्रवेश करना।

प्रश्न. 3. ‘तोप’ कविता का प्रतिपाद्य/संदेश स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 प्रस्तुत कविता शस्त्र-शक्ति और बलपूर्वक दमन का विरोध करती है। इसमें बताया गया है कि तोपों, तलवारों से जनता की आवाज को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, हमेशा के लिए नहीं। जनता का विद्रोह समय आने पर बड़ी-बड़ी तोपों का मुँह बन्द कर देता है, बड़े-बड़े अत्याचारियों को उखाड़ फेंकता है। तब ये तोप बच्चों के खिलौने बन जाती है और इनकी व्यर्थता का उपहास उड़ाया जाता है।

प्रश्न. 4. कविता के आधार पर ‘तोप’ के अतीत और वर्तमान पर प्रकाश डालिए। 
उत्तर: कविता के आधार पर कम्पनी के अफसरों ने भारतीय क्रांतिकारियों को दबाने के लिए इस ‘तोप’ का प्रयोग किया था। इन तोपों ने न जाने कितने शूरवीरों को मार डाला था। उस युग में बेकसूर लोगों को मारने वाली यह तोप आज निरर्थक है। वर्तमान में चिड़ियाँ व गौरैयाँ इस तोप पर बैठकर बातें करती हैं, लड़के घुड़सवारी करते हैं। इससे पता चलता है कि अब उन्हें उस शक्तिशाली तोप का कोई डर नहीं रहा।

प्रश्न. 5. वीरेन डंगवाल द्वारा रचित ‘तोप’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 कम्पनी बाग में 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में काम आई एक तोप रखी है उसे विरासत की तरह सँभाल कर रखा जाता है। मानो वह सैलानियों को बताती है कि उसने कैसे-कैसे वीरों की धज्जियाँ उड़ाई थी। परन्तु आज उस तोप पर या तो छोटे बच्चे सवारी करते हैं या चिड़ियाँ गपशप करती हैं। कभी-कभी गौरेये उसके भीतर भी घुस जाते हैं। वे मानो बताते हैं कि तोप चाहे कितनी भी बड़ी हो उसे एक ना एक दिन चुप होना ही पड़ता है।

प्रश्न. 6. कम्पनी बाग में रखी तोप की क्या विशेषता है ? वह कब और क्यों चमकाई जाती है ?
उत्तर:
 कम्पनी बाग में रखी तोप सन् 1857 के स्वतन्त्रता आन्दोलन की निशानी है। यह विरासत में मिली निशानी है जो अंग्रेजों द्वारा दी गई है। यह तोप दो कारणों से चमकाई जाती है-पहला राष्ट्रीय पर्व स्वतन्त्रता दिवस (15 अगस्त) तथा गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी)। दूसरा उसे जब विदेशी सैलानी देखेंगे तो रख-रखाव से खुश होंगे तथा उसकी कार्यशैली से परिचित होंगे।

प्रश्न. 7. ‘तोप’ कविता के आधार पर लिखिए कि विरासत में मिली चीजों का महत्त्व क्यों होता है ?
उत्तर: एक पुरानी तोप कम्पनी बाग के प्रवेश द्वारा पर रखी गई है जो सन् 1857 की तोप है। इस तोप की देखभाल सँभाल कर की जाती है। जिस प्रकार यह कम्पनी बाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा हमें विरासत में मिला है, वैसे ही यह तोप हमें विरासत में अंग्रेजों  द्वारा दी गई है। यह वर्ष में दो बार चमकाई जाती है अर्थात् इसका प्रयोग दो बार ही किया जाता है। विरासत में मिली चीजों की सुरक्षा बड़ी सँभालकर इसलिए होती है, क्योंकि वह हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त होती हैं, उनका अपना महत्त्व और इतिहास होता है।

प्रश्न. 8. कविता में तोप को दो बार चमकाने की बात की गई है ? ये दो अवसर कौन-से होंगे ?
उत्तर:
 कविता में तोप को दो बार चमकाने की बात की गई है। ये दो अवसर वर्तमान काल में-(1) स्वतन्त्रता दिवस (15 अगस्त), तथा (2) गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी) हैं। पन्द्रह अगस्त को भारत स्वाधीन हुआ था। हमने अंग्रेजों  को देश से बाहर निकाल दिया था तथा 26 जनवरी को देश में भारतीय संविधान लागू हुआ था। इन्हीं दोनों अवसरों पर तोप और कम्पनी बाग को चमकाया जाता है।

प्रश्न. 9. ‘प्रतीक’ और ‘धरोहर’ कितने प्रकार की होती हैं ? उनकी क्या उपयोगिता है ? ‘तोप’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
 ‘तोप’ कविता प्रतीकात्मक कविता है। इसमें तोप, चिड़ियाँ, बच्चे आदि प्रतीकों का प्रयोग किया गया है। किसी भी स्थिति का वर्णन करने के लिए उससे मिलते-जुलते प्रतीकों या धरोहर का प्रयोग किया जाता है जो प्रड्डति से सम्बन्धित होते हैं। हमारे पूर्वजों की, पूर्व अनुभवों की और पुरानी परम्पराओं व संस्कारों की धरोहर नई पीढ़ी को मिलती है जिससे नई पीढ़ी उनके बारे में जान सकती है उनके अनुभवों से कुछ सीख सकती है और उनकी बनाई श्रेष्ठ परंपराओं का पालन कर सकती है। इसीलिए इन्हें बचाकर रखना हमारा परम कर्तव्य है।

4. पर्वत प्रदेश में पावस – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न. 1. पर्वत प्रदेश में वर्षा ऋतु में प्राकृतिक सौन्दर्य कई गुना बढ़ जाता है, परन्तु पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में क्या कठिनाइयाँ उत्पन्न होती होंगी? उनके विषय में लिखिए।
उत्तर: 

  • हरियाली बढ़ जाती है, फल-फूल बढ़ जाते हैं। खेती तैयार होती है।
  • भूमि फिसलन भरी, चट्टानें टूटना, मिट्टी फैलना, बाढ़ आना, जंगल में कीचड़ व दलदल आदि।

व्याख्यात्मक हल:
पर्वतीय प्रदेशों में वर्षा ऋतु में प्राकृतिक सौन्दर्य तो कई गुना बढ़ जाता है, परन्तु इस ऋतु में पहाड़ों पर जीवन व्यतीत करने वाले लोगों के लिए कई समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं जैसे वर्षा के कारण पहाड़ों की भूमि फिसलन भरी हो जाती है जिसके कारण पहाड़ों से फिसलकर गिरने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही चट्टानों का अपक्षय होने लगता है वह टूटकर गिरने लगती है। कभी-कभी बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े गिरते हैं जिनसे जान-माल का बहुत नुकसान होता है। वर्षा के कारण पहाड़ों की मिट्टी फैलने लगती है। कभी-कभी बादल फटने से भयंकर बाढ़ तक आ जाती है। जंगलों में कीचड़ व दलदल बन जाती है जिसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

प्रश्न. 2. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर: प्रस्तुत कविता ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने पर्वतीय प्रदेश में वर्षाकाल में क्षण-क्षण होने वाले परिवर्तनों व अलौकिक दृश्यों का बड़ा सजीव चित्रण किया है। कवि कहता है कि महाकार पर्वत मानो अपने ही विशाल रूप को अपने चरणों में स्थित बड़े-बड़े तालाबों में अपने हजारों सुमनरूपी नेत्रों से निहार रहे हैं। बहते हुए झरने दर्शकों की नस-नस में उमंग व उल्लास भर रहे हैं। पर्वतों के सीनों को फाड़कर उच्चाकांक्षाओं से युक्त ऊँचे-ऊँचे वृक्ष मानो बाहर आए हैं और अपलक व शान्त आकाश को निहार रहे हैं। फिर अचानक ही पर्वत मानो बादल रूपी यान के परों को फड़फड़ाते हुए उड़ गए हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी मालूम होता है कि मानो धरती पर आकाश टूट पड़ा हो और उसके भय से विशाल साल के पेड़ जमीन में धँस गए हों। तालों से उठती भाप ऐसी जान पड़ती है, मानो उनमें आग-सी लग गई हो और धुआँ उठ रहा हो और साल के पेड़ इससे भी भयभीत हों। कवि कहता है कि यह सब देखकर लगता है कि जैसे इन्द्र ही अपने इन्द्रजाल से खेल रहा है।

प्रश्न. 3. ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में झरने पर्वत का गौरव-गान कैसे करते हैं ?
उत्तर:
 ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता में बताया गया है कि जब पहाड़ों पर वर्षा ऋतु में बादल बरसते हैं तब पर्वतों से प्रवाहित होने वाले झरने पर्वतों का गौरवगान करते हुए पृथ्वी पर झर-झर गिरते हैं और नस-नस में उत्तेजना भर देते हैं। झरते हुए झरने झाग भरे हुए होते हैं। वे मोती की माला जैसे लड़ियों की तरह सुन्दर दिखाई देते हैं और ऐसा लगता है कि पहाड़ों से चाँदी का भण्डार सफेद धातु के रूप में गिर रहा है। पहाड़ों के हृदय से उठकर ऊँची आकांक्षाओं वाले वृक्ष आकाश की ओर शान्त भाव से टकटकी लगाकर देख रहे हैं। इस प्रकार झरने पहाड़ों की शोभा को बढ़ाते हैं।

प्रश्न. 4. सिद्ध कीजिए:पंतजी कल्पना के सुकुमार कवि हैं ?
उत्तर: पंतजी कल्पना-लोक के कवि थे। उनकी कल्पनाएँ अत्यंत मनोरम हैं। उन्होंने इस कविता में भी प्रकृति को मानव की तरह क्रिया करते दिखाया है। उन्होंने पहाड़ को अपनी शक्ल निहारता, पेड़ को उच्चाकांक्षा-सा चिंतन-मुद्रा में खड़ा, झरने को गौरव गाथा गाता हुआ, शाल के वृक्षों को भय से धँसा हुआ, बादलों को पारे के समान चमकीले पंख, फड़-फड़ाकर उड़ता हुआ और आक्रमण करता हुआ दिखाया है। ये सब कल्पनाएँ गतिशील, मौलिक एवं नवीन हैं।

प्रश्न. 5. ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
 सचमुच वर्षा-ऋतु में पहाड़ों पर पल-पल दृश्य बदल रहे हैं। कभी तालाब के जल में पहाड़ों का प्रतिबिंब दिखाई देता है, तो कभी तालाब में धुँआ उठने लगता है। कभी पहाड़ों पर खड़े लम्बे वृक्ष शांत आकाश की ओर अपलक देखते प्रतीत होते हैं तो कभी वे भयभीत से धरती में धँसे नजर आते हैं। झरने कभी झर-झर का संगीत करते हुए मोती की लड़ी से सुन्दर लगते हैं, तो कभी वे अद्रश्य हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति सचमुच पल-पल अपना रूप बदलती है।

प्रश्न. 6. पंतजी द्वारा रचित ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ नामक कविता का सारांश लिखिए। 
उत्तर: इस कविता में पंतजी ने पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु का वर्णन किया है। इस कविता का सार इस प्रकार है- पर्वतीय प्रदेश था। वर्षा ऋतु में प्रकृति पल-पल अपना रूप बदल रही थी। पर्वत के नीचे दर्पण जैसा तालाब था। पर्वत पर हजारों फूल खिले थे। लगता था कि वे फूल पर्वत की आँखें हों जिनसे वह बार-बार दर्पण में अपना विराट रूप देख रहा था। पर्वत से गिरने वाले झरने झर-झर स्वर में मानो पर्वत की गौरव गाथा गा रहे थे। चोटियों पर खड़े पेड़ हमारी महत्त्वाकांक्षाओं के समान ऊँचे थे। वह मानो चुपचाप अपलक और चिन्तामग्न होकर नीले आकाश को निहारे जा रहे थे। अचानक बादल ऐसे ऊपर उठे मानो पूरा पहाड़ अपने पंख फड़-फड़ाकर उड़ चला हो। झरने दिखना बंद हो गए। उनका शोर-शोर रह गया। बादलों के कारण शाल के पेड़ धरती में धँसे हुए से जान पड़ते थे। तालाब से उठता धुआँ देखकर लगता था मानो तालाब जल गया हो। इस प्रकार इंद्र देवता घूम-घूमकर अपना इंद्रजाल दिखा रहे थे।

3. मनुष्यता – Long Question answer

प्रश्न 1. ‘वृथा मरे, वृथा जिए’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

उत्तर: ‘वृथा मरे, वृथा जिए’ यह शब्द कवि सूरदास द्वारा रचित दोहे से लिए गए हैं। इस दोहे का तात्पर्य यह है कि जीवन व्यर्थ है जब हम उसे धर्म और सच्चाई से वंचित रखते हैं तथा अपने दुःखों को भोगते रहते हैं। इसके बदले हमें सच्चाई की खोज में निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए ताकि हम अपने जीवन को एक सार्थक और उपयोगी ढंग से जी सकें।

मनुष्यता कवि – मैथिलीशरण गुप्त 

प्रश्न 2. मनुष्यता कविता में कवि ने किन महान व्यक्तियों का उदाहरण दिया है और उनके माध्यम से क्या संदेश देना चाहा है?
अथवा
कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?

उत्तर: मनुष्यता कविता में कवि ने राजा रंतिदेव, दधीचि ऋषि, उशीनर, कर्ण तथा महात्मा बुद्ध का उदाहरण देते हुए मानवता, एकता, सहानुभूति, सद्भाव, उदारता और करुणा का संदेश देना चाहता है। वह मनुष्य को स्वार्थ, भिन्नता, वर्गवाद, जातिवाद आदि संकीर्णताओं से मुक्त करना चाहता है। वह मनुष्य में उदारता के भाव भरना चाहता है। कवि चाहता है कि हर मनुष्य समस्त संसार में अपनत्व की अनुभूति करे। वह दुखियों, वंचितों और जरूरत मंदों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को भी तैयार हो। वह कर्ण, दधीचि, रंतिदेव आदि के अतुल त्याग से प्रेरणा ले। वह अपने मन में करुणा का भाव जगाए। वह अभिमान, लालच और अधीरता का त्याग करे। एक-दूसरे का सहयोग करके देवत्व को प्राप्त करे। वह हँसता-खेलता जीवन जिए तथा आपसी मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास करे। उसे किसी भी सूरत में अलगाव और भिन्नता को हवा नहीं देनी चाहिए।

प्रश्न 3. कवि गर्वरहित जीवन जीने की सलाह क्यों दे रहा है?

उत्तर: कवि गर्वरहित जीवन जीने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि गर्व और अभिमान की वजह से मनुष्य अनेक बार अपने असली धर्म से भटक जाता है। इससे मनुष्य दूसरों को नुकसान पहुंचाने लगता है और स्वयं भी अस्थिर बन जाता है। इससे उसके समाज में सम्मान की कमी होती है।
इससे बेहतर है कि मनुष्य गर्व की जगह हमेशा समझदारी और सम्मति का मार्ग अपनाएं। गलती करने पर उसे इसे स्वीकारना चाहिए और उससे सीख लेना चाहिए। इससे उसका जीवन सुखद और आनंदमय होता है जो उसे एक अच्छे मानव के रूप में बनाता है।
इससे समाज का भी फायदा होता है क्योंकि गर्व और अभिमान से वंचित लोग एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और समझदारी रखते हैं जो समाज के विकास में मददगार साबित होता है।
इसलिए, कवि गर्वरहित जीवन जीने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि इससे मनुष्य समझदार, सम्मतिपूर्ण, और संतुलित बनता है।

प्रश्न 4. मनुष्यता कविता के माध्यम से कवि ने किन गुणों को अपनाने का संकेत दिया है ? तर्क सहित उत्तर दीजिए

उत्तर: मनुष्यता कविता के माध्यम से कवि ने परोपकार, वसुधैव कुटुंबकम्, सहयोग की भावना, भाईचारा, दानशीलता, उदारता, अहंकार का त्याग, धन का अहंकार न करना, भेदभाव न करना, सहानुभूति की भावना आदि गुणों को अपनाने का संकेत दिया है क्योंकि यही गुण मनुष्य की पहचान है। माँ सरस्वती भी परोपकारी व्यक्ति की प्रशंसा करती हैं। हम सब एक ही परमपिता की संतान होने से आपस में भाई-भाई हैं इसलिए हमें एक-दूसरे की उन्नति में सहयोग देना चाहिए। हम सब का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है जिसके लिए हमें रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण व महात्मा बुद्ध जैसे उदार व दानी बनना चाहिए।

प्रश्न 5. मनुष्यता कविता का मूल संदेश स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है ?
अथवा
‘मनुष्यता’ कविता का प्रतिपाद्य संक्षेप में लिखिए। 

उत्तर: मनुष्यता कविता के माध्यम से कवि मानवता, एकता, सहानुभूति, सद्भाव, उदारता और करुणा का संदेश देना चाहता है। वह मनुष्य को स्वार्थ, भिन्नता, वर्गवाद, जातिवाद आदि संकीर्णताओं से मुक्त करना चाहता है। वह मनुष्य में उदारता के भाव भरना चाहता है। कवि चाहता है कि हर मनुष्य समस्त संसार में अपनत्व की अनुभूति करे। वह दुखियों, वंचितों और जरूरतमंदों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को भी तैयार हो। वह कर्ण, दधीचि, रंतिदेव आदि के अतुल त्याग से प्रेरणा ले। वह अपने मन में करुणा का भाव जगाए। वह अभिमान, लालच और अधीरता का त्याग करे। एक-दूसरे का सहयोग करके देवत्व को प्राप्त करे। वह हँसता-खेलता जीवन जिए तथा आपसी मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास करे। उसे किसी भी सूरत में अलगाव और भिन्नता को हवा नहीं देनी चाहिए।

प्रश्न 6. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए:
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी। 

उत्तर: यह पंक्तियाँ एक संदेश देती हैं कि हमें जीवन में हमेशा उन मार्गों को चुनना चाहिए जो सत्य हों और जिनसे हमारे और लोगों के लिए अच्छाई हो। हमें विपत्तियों और विघ्नों से नहीं घबराना चाहिए, बल्कि हमें उनका सामना करना चाहिए और उन्हें पार करना चाहिए। हमें एक दूसरे से मिलना चाहिए और एक दूसरे का साथ देना चाहिए, क्योंकि इससे हमारे बीच एकता बढ़ती है और हमें समस्याओं का सामना करने में मदद मिलती है। हमें सभी के लिए एक ही मार्ग का चुनाव करना चाहिए, जो सबके लिए उचित हो। इससे भेदभाव और विभिन्नता नहीं होगी और हम एक दूसरे के साथ समझदारी से रह सकेंगे।

2. पद – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न. 1. मीराबाई श्रीकृष्ण को पाने के लिए क्या-क्या कार्य करने को तैयार हैं ?
उत्तर: वे (मीराबाई) श्रीकृष्ण को पाने के लिए निम्नलिखित कार्य करने को तैयार हैं-
(i) वे श्रीकृष्ण के यहाँ सेवक के रूप में चाकरी (नौकरी) करने को तैयार हैं।
(ii) चाकर के रूप में बाग लगाएँगीं और प्रातःकाल आवाज लगाकर दर्शन करेंगी।
(iii) वृंदावन की गलियों में गोविंद की लीलाओं को गाकर सुनाएँगी।
(iv) वे वृंदावन में गायें भी चराएँगी।

प्रश्न. 2. पठित पाठों के आधार पर मीरा की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 मीरा भगवान कृष्ण की भक्त थीं। वे कृष्ण को अपना प्रियतम, पति और रक्षक मानती थीं। इन पदों में उन्होंने उनके दो रूपों-रक्षक रूप तथा रसिक रूप की आराधना करते हुए प्रभु से अपनी रक्षा करने की गुहार की है। वे स्वयं को उनकी दासी बताते हुए कहती हैं- ‘दासी मीरा लाल गिरधर, हरो म्हारी पीर’।
वे स्वयं को कृष्ण का अपनाजन ही कहती हैं तथा उनकी चाकरी करने को तैयार हैं। वे उनके महल में रहकर उनके विहार के लिए बाग लगाने को भी तैयार हैं। वे वृन्दावन की गली-गली में घूमकर कृष्ण का गुणगान करना चाहती हैं। दूसरे पद में वे कृष्ण के सुंदर छबीले रूप की आराधना करती हैं और उनके मुरलीधर रूप का स्मरण करती हैं। वे स्वयं लाल साड़ी पहनकर उनसे मिलना चाहती हैं और यमुना तट की याद कराकर प्रेम के बंधन में बाँध लेना चाहती हैं।

प्रश्न. 3. मीराबाई की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: 
मीराबाई की भाषा शैली भक्ति दैन्य और माधुर्यभाव की है। इन पर योगियों, संतों और वैष्णव भक्तों का सम्मिलित प्रभाव है। मीरा के पदों की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषाओं का मिश्रण पाया जाता है। कहीं-कहीं पंजाबी, खड़ी बोली और पूर्वी भाषा के प्रयोग भी मिल जाते हैं। मीराबाई में अभूतपूर्व काव्य क्षमता थी। मीराबाई के पदों ने जन सामान्य को अधिक प्रभावित किया, क्योंकि उन्होंने अपने मन के भावों को सीधे सरल शब्दों में व्यक्त किया है। इनके पद गेय एवं संगीतात्मक शैली से युक्त हैं।

प्रश्न. 4. मीरा के पदों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 हमारी पाठ्य-पुस्तक में मीरा रचित दो पद संकलित हैं।। इनका सारांश निम्न प्रकार है:
(i) इस पद में मीरा ने कृष्ण को अपना संरक्षक माना है। उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की है कि वे मीरा की रक्षा करें। कृष्णा ने द्रौपदी की लाज रखी थी। प्रहलाद के लिए नरहरि अवतार लिया था। डूबते हुए हाथी को बचाया। अतः वह अब अपनी दासी मीरा की रक्षा करें।
(ii) इस पद में मीराबाई अपने प्रियतम कृष्ण के समीप रहने के लिए उनकी सेविका बन जाना चाहती हैं। वह चाहती हैं कि उसे वृंदावन में कृष्णा के बाग-बगीचे लगाने का सौभाग्य मिले। इसी बहाने वह नित्य प्रातः उठकर प्रभु के दर्शन करेंगी। दिन-रात उन्हें याद करेंगी और उनकी लीला-गुण गाएँगीं। वह पीताम्बरधारी साँवले कृष्णा की आराधना में लीन होना चाहती हैं। उसका हृदय प्रभु के दर्शन पाने के लिए बहुत व्याकुल है।

1. साखी – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: ईश्वर भक्ति ने कबीर के अहंकार को दूर कर दिया। आप इस दोहे को पढ़कर क्या समझे हैं ? अपने विचार लिखिए।
‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि।।’
उत्तर: 

  • ईश्वरीय सत्ता सर्वोपरि है। मनुष्य स्वयं को भूलकर ईश्वर को ही स्वयं में व सम्पूर्ण संसार में देखता है।
  • व्यक्ति की शक्ति अत्यंत सीमित।
  • झूठा अभिमान किस लिए।

व्याख्यात्मक हल: जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि।’ इस दोहे को पढ़कर हम यह समझते हैं कि मनुष्य अहंकारी है तथा स्वयं को महत्त्वपूर्ण मानता है, इसलिए वह कण-कण में व्याप्त ईश्वर को नहीं देख पाता है, जबकि ईश्वरीय सत्ता सर्वोपरि है और मानव की शक्ति अत्यंत सीमित है। इसका अहसास व्यक्ति को तब होता है जब उसके अंदर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश फैलता है और उसके अंदर का अहंकार रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है। इस अवस्था में वह अपने झूठे अभिमान को त्यागकर अपने आपको भूल जाता है और ईश्वर को स्वयं में और सम्पूर्ण संसार में देखने लगता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ईश्वर की भक्ति ने कबीर के अहंकार को दूर कर दिया है।

प्रश्न 2: अपने अंदर का दीपक दिखाई देने पर कौन-सा अँधियारा कैसे मिट जाता है ? कबीर की साखी के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
कबीर दास के अनुसार, अहंकारी व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि अहंकारी व्यक्ति स्वयं को सर्वोपरि मानता है, परन्तु जब उसके अंदर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश फैलता है, तब उसके अंदर का अहंकार रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है और मानव मन के सारे भ्रम, क्लेश, संदेह व परेशानियाँ समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 3: ‘एकै अषिर पीव का पढ़े सु पंडित होय’ पंक्ति का आप क्या अर्थ समझे हैं ? प्रेम का एक अक्षर सभी ग्रन्थों से किस प्रकार भारी है, अपने जीवन के एक अनुभव के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 

  • ‘प्रेम’ का एक अक्षर हृदय से पढ़ लेना सौ पुस्तकें पढ़ने के बराबर है।
  • मानव जीवन का मूल मंत्र-मानव प्रेम
  • व्यक्तिगत अनुभव

व्याख्यात्मक हल: एकै अषिर पीव का पढ़े सु पंडित होय’ पंक्ति का अर्थ है कि जिस व्यक्ति ने प्रेम के एक अक्षर को पढ़ लिया है, वह विद्वान हो जाता है। यह पूर्णतः सत्य है क्योंकि संसार में लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़-पढ़कर मर जाते हैं परन्तु ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते हैं और न ही सत्य को जान पाते हैं। कबीर दास जी का मानना है कि ईश्वर अनुभवगम्य है, अक्षरगम्य नहीं। वह केवल अपने अनुभव से ही जाना जा सकता है, दूसरों के अनुभवों से नहीं। मानव जीवन का मूल-मंत्र मानव प्रेम है और प्रेम का अक्षर हृदय से पढ़ लेना सौ पुस्तकों के पढ़ने के बराबर होता है। अतः स्पष्ट है कि प्रेम का एक अक्षर सभी ग्रन्थों पर भारी होता है।

प्रश्न 4: ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय’। कबीर के इस काव्यांश की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए। 
उत्तर:
 इस काव्यांश का आशय है — संसार के लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते मर गए, किन्तु उन्हें न तो ईश्वर की प्राप्ति हो सकी और न सत्य एवं ज्ञान की। कवि के अनुसार ईश्वर अनुभवगम्य है, अक्षरगम्य नहीं। वह अपने अनुभव से जाना जा सकता है, दूसरों के अनुभवों से नहीं।

प्रश्न 5: कबीर द्वारा रचित साखियों का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 कबीर ग्रंथावली से संकलित ‘साखी’ कबीरदास द्वारा रचित है। ‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ शब्द का ही तद्भव रूप है। साखी शब्द साक्ष्य से बना है, जिसका अर्थ होता है- प्रत्यक्ष ज्ञान। यह ज्ञान गुरु शिष्य को प्रदान करता है। संत सम्प्रदाय में अनुभव ज्ञान की ही महत्ता है, शास्त्रीय ज्ञान की नहीं। कबीर का अनुभव क्षेत्र विस्तृत था। ‘साखी’ वस्तुतः दोहा छंद ही है। प्रस्तुत पाठ की साखियाँ इसका प्रमाण हैं कि सत्य की साक्षी देता हुआ ही गुरु शिष्य को जीवन के तत्त्व ज्ञान की शिक्षा देता है। यह शिक्षा जितनी प्रभावपूर्ण होती है, उतनी ही याद रखने योग्य भी। प्रस्तुत साखियों में संत कबीर ने वाणी, ईश्वर, आत्मज्ञान, ज्ञान और अज्ञान, विरह, निंदक, व्यावहारिक ज्ञान आदि के विषय में बताया है।

प्रश्न 6: पाठ्य-पुस्तक में संकलित साखियों का भाव संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
 (i) ऐसी मीठी वाणी बोलो जिससे बोलने और सुनने वाले दोनों को शांति मिले।
(ii) राम प्रत्येक प्राणी के मन में वास करता है। फिर भी लोग उसे देख नहीं पाते।
(iii) अहंकार और परमात्मा इकट्ठे नहीं रह सकते। जब मन में परमात्मा का बोध जागा, तो अहंकार मिट गया।
(iv) परमात्मा के प्रति जाग्रत मनुष्य उसके विरह से तड़पता है, जबकि संसारिक लोग मौज करते हैं।
(v) विरह रूपी साँप के डँसने पर विरहणी आत्मा तड़पती रह जाती है। उसे परमात्मा के बिना शांति नहीं मिलती।
(vi) निंदक अपने निंदा-वचनों से साधक के चरित्र को पवित्र बना देता है। इसलिए निंदक को पास रखना चाहिए।
(vii) सांसारिक ज्ञान से ईश्वर नहीं मिलते। प्रेम के ढाई अक्षर से ही उसकी प्राप्ति होती है।
(viii) कबीर ने प्रभु-प्राप्ति के लिए अपनी सांसारिक वासनाओं में आग लगा ली है। अब वे अन्य साधकों को प्रेरणा दे रहे हैं।

प्रश्न 7: कबीर ने सच्चा भक्त और पंडित किसे कहा है ? पंडित या भक्त होने के लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर:
 सच्चा भक्त वह है जिसने ईश्वर के प्रेम का अनुभव किया हो और वह ईश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करता हो। प्रेमी ही ज्ञानी और विद्वान भी है।
व्याख्यात्मक हल: कबीर ने सच्चा भक्त उसे कहा है जो प्रभु के विरह में घायल हो, जिसने प्रभु के प्रेम का अनुभव किया हो और पंडित उसे कहा गया है जिसने प्रेम का एक अक्षर पढ़ लिया है, अर्थात् जिसने प्रेम का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लिया है, वही संसार का सबसे बड़ा विद्वान है। इससे स्पष्ट है कि पंडित या भक्त होने के लिए प्रेमी होना आवश्यक है।

प्रश्न 8: मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लोग आदर और सम्मान भरे वचनों को सुनकर सुखी होते हैं। इसी प्रकार मीठी बोली बोलने वाला व्यक्ति बातचीत करते हुए जब अहंकार का त्याग कर देता है, तो उसके तन को भी शीतलता मिलती है।
व्याख्यात्मक हल: कबीर ने साखी के माध्यम से स्पष्ट किया है कि मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि मीठी वाणी सुनने में मधुर और आदर-सम्मान से युक्त होती है। ऐसे आदर और सम्मान से भरे वचनों को सुनकर लोग सुखी होते हैं और मीठी बोली बोलने वाला व्यक्ति जब अपने अहंकार का त्याग करके बात करता है, तो उसके तन को भी शीतलता प्राप्त होती है।

14. कारतूस – पाठ का सार

लेखक परिचय

हबीब तनवीर (1923-2009) का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। उन्होंने 1944 में नागपुर से स्नातक किया और ब्रिटेन की नाटक अकादमी से नाट्य-लेखन का अध्ययन किया। वे नाटककार, कवि, पत्रकार, नाट्य निर्देशक, और अभिनेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। हबीब तनवीर को लोकनाट्य के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए जाना जाता है। उन्हें कई पुरस्कारों और पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके प्रमुख नाटकों में “आगरा बाज़ार”, “चरनदास चोर”, और “हिरमा की अमर कहानी” शामिल हैं।

पाठ प्रवेश

अंग्रेज शुरू में इस देश में व्यापारी बनकर आए थे। ताकि किसी को शक न हो, वे पहले सिर्फ व्यापार ही कर रहे थे। लेकिन उनका असली इरादा सिर्फ व्यापार करना नहीं था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई और धीरे-धीरे देश की रियासतों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। जब देशवासियों को इसका एहसास हुआ, तो उन्होंने अंग्रेजों को बाहर निकालने की कोशिशें शुरू कर दीं।

इस पाठ में भी एक ऐसे ही वीर व्यक्ति की कहानी बताई गई है, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजों से लड़ाई की। उसका एक ही मकसद था – अंग्रेजों को देश से निकालना। उसने कंपनी के अफसरों की नींद उड़ा दी थी। वह इतना बहादुर था कि खतरे को खुद बुलाकर अंग्रेज अफसरों के सामने जा पहुंचा। उसने कर्नल को इतनी हिम्मत से जवाब दिया कि कर्नल भी उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सका।

पाठ सार

यह पाठ हबीब तनवीर द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण नाट्य रूपक है, जो भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के समय पर आधारित है। इसमें 1799 की घटनाओं का वर्णन किया गया है, जब अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान में अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए अलग-अलग रियासतों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था।

पाठ में मुख्य रूप से अवध के वज़ीर अली की बहादुरी और अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष को दिखाया गया है। वज़ीर अली अंग्रेज़ों से गहरी नफरत करते थे और उन्हें देश से बाहर निकालने के लिए कई योजनाएँ बना रहे थे। अंग्रेज़ उनसे इतना डरते थे कि उन्हें पकड़ने के लिए जंगलों में अपनी सेना भेज चुके थे, लेकिन वज़ीर अली बार-बार उनकी पकड़ से बच निकलते थे।

कर्नल और लेफ्टिनेंट आपस में वज़ीर अली की बहादुरी की चर्चा करते हैं। वे कहते हैं कि वज़ीर अली ने अंग्रेजों को परेशान कर रखा है और उन्हें देखकर रॉबिनहुड की याद आती है। कर्नल अपने साथी को बताता है कि वज़ीर अली के चाचा, सआदत अली, अंग्रेजों के मित्र बन गए थे और अवध का सिंहासन बचाने के लिए उन्होंने अंग्रेजों को अपनी आधी दौलत और दस लाख रुपये दिए थे।

लेफ्टिनेंट को यह जानकर चिंता होती है कि कई हिंदुस्तानी राजा और नवाब अफगानिस्तान के नवाब को दिल्ली पर हमला करने के लिए बुला रहे हैं। कर्नल भी इस बात से सहमत होता है और कहता है कि अगर ऐसा हुआ, तो अंग्रेजों को हिंदुस्तान में जो कुछ मिला है, वह सब गंवाना पड़ेगा।

कर्नल यह भी बताता है कि वज़ीर अली अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं, क्योंकि उन्होंने कंपनी के एक वकील की हत्या भी कर दी थी। जब वकील ने वज़ीर अली की शिकायतों को अनसुना कर दिया और उन्हें बुरा-भला कहने लगा, तो वज़ीर अली ने गुस्से में आकर चाकू से उसकी हत्या कर दी।

अंग्रेजों को पता था कि वज़ीर अली नेपाल जाना चाहते हैं और वहाँ से अपनी ताकत बढ़ाकर सआदत अली को हटाकर अवध पर कब्ज़ा करना और अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना चाहते हैं। इसलिए अंग्रेजों और नवाब सआदत अली की सेना बहुत सख्ती से वज़ीर अली का पीछा कर रही थी।

पाठ का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य तब आता है जब एक घुड़सवार अंग्रेजी खेमे में आता है और कर्नल से कारतूस माँगता है। कर्नल उसे वज़ीर अली का दुश्मन समझकर दस कारतूस दे देता है। लेकिन जैसे ही कर्नल उसका नाम पूछता है, वह खुद को वज़ीर अली बताता है और कहता है कि चूँकि कर्नल ने उसे कारतूस दिए हैं, इसलिए वह उसकी जान बख्श रहा है। इतना कहकर वह वहाँ से चला जाता है। कर्नल यह देखकर हैरान रह जाता है कि वज़ीर अली कितना बहादुर और चालाक है।

यह पाठ वज़ीर अली के साहस, बुद्धिमानी और अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष को दर्शाता है।

पाठ का निष्कर्ष

यह पाठ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन साहसी योद्धाओं की कहानियों को उजागर करता है, जिन्होंने अंग्रेज़ों की सत्ता को चुनौती दी। वज़ीर अली जैसे नायक इस संघर्ष के प्रतीक थे, जो अपनी बहादुरी और स्वतंत्रता की चाह में हर जोखिम उठाने को तैयार थे।

13. पतझर में टूटी पत्तियाँ – पाठ का सार

कवि परिचय

रवींद्र केलेकर (1925-2010) एक प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक और लेखक थे, जिनका जन्म 7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में हुआ था। वह छात्र जीवन से ही गोवा मुक्ति आंदोलन से जुड़े और अपने लेखन के माध्यम से जन-जीवन, समाज और व्यक्तिगत विचारों को प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में मौलिक चिंतन और मानवीय सत्य की गहरी तलाश दिखाई देती है। केलेकर कोंकणी और मराठी के शीर्ष लेखक माने जाते हैं, और उनकी कई पुस्तकें इन भाषाओं के अलावा हिंदी और गुजराती में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – उजवाढाचे सूर, समिधा, सांगली (कोंकणी), कोंकणीचें राजकरण, जापान जसा दिसला (मराठी), और पतझर में टूटी पत्तियाँ (हिंदी)। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था, जिनमें गोवा कला अकादमी का साहित्य पुरस्कार प्रमुख है।

पाठ प्रवेश

कविता का प्रमुख गुण यह माना जाता है कि वह थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह देती है। जब गद्य रचना में भी यह गुण दिखाई देता है, तो यह अपनी सहजता और सार्थकता के कारण अलग पहचान बनाती है। सरल और संक्षिप्त लेखन आसान नहीं होता, लेकिन फिर भी इसे लेखन की उच्च कला माना जाता है। इस प्रकार की गद्य रचनाएँ सूक्ति, जातक कथाएँ और पंचतंत्र की कहानियों में मिलती हैं। कोंकणी में रवींद्र केलेकर ने भी इसी प्रकार के लेखन का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

प्रस्तुत पाठ के प्रसंग थोड़े में अधिक समझने की प्रेरणा देते हैं। पहला प्रसंग ‘गिन्नी का सोना’ उन लोगों को प्रस्तुत करता है जो अपने जीवन में सुख-साधन जुटाने की बजाय इस दुनिया को जीने और रहने योग्य बनाते हैं। दूसरा प्रसंग ‘झेन की देन’ बौद्ध ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है, जो जापानियों को व्यस्त जीवन के बीच में भी शांति और सुकून के कुछ पल प्रदान करती है।

पाठ का सार

इस पाठ में दो प्रसंग सम्मिलित हैं।1. गिन्नी का सोना

गिन्नी का सोना और शुद्ध सोना दोनों में फर्क होता है। गिन्नी का सोना, जिसमें थोड़ा ताँबा मिलाया जाता है, मज़बूती और चमक दोनों में शुद्ध सोने से बेहतर होता है। इसी प्रकार, आदर्श भी होते हैं। शुद्ध आदर्शों में कुछ व्यावहारिकता मिलाकर लोग उन्हें ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ कहते हैं। लेकिन, जब आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर लाया जाता है, तो आदर्श पीछे हटने लगते हैं और व्यावहारिकता आगे आती है।

गांधीजी को ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर ऊँचा उठाया और व्यावहारिकता को आदर्शों की ऊँचाई पर ले गए। वे ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे, न कि सोने में ताँबा मिलाकर उसकी चमक।

व्यवहारवादी लोग जीवन में लाभ-हानि का हिसाब लगाते हैं और इसलिए वे सफलता प्राप्त करते हैं। हालांकि, आदर्शवादी लोग ही समाज को ऊँचाइयों पर ले जाते हैं और शाश्वत मूल्यों को समाज के लिए प्रदान करते हैं, जबकि व्यवहारवादी लोग समाज को गिराने का काम करते हैं।2. झेन की देन

जापान में मानसिक बीमारियाँ बढ़ने का कारण है जीवन की तेजी और प्रतिस्पर्धा। लोग तेजी से दौड़ते हैं और काम को समय से पहले पूरा करने की कोशिश करते हैं, जिससे दिमाग का तनाव बढ़ता है और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।

एक दिन, लेखक को एक ‘टी-सेरेमनी’ में ले जाया गया, जो जापानी चाय-पीने की विधि है। यहाँ वातावरण अत्यंत शांत और गरिमापूर्ण था। चाय पीने की यह विधि तीन लोगों के बीच शांति बनाए रखने पर आधारित थी, और चाय के प्याले में केवल दो घूँट होते थे।

लेखक ने महसूस किया कि चाय पीते समय दिमाग की रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ती है और वह पूर्ण शांति का अनुभव करता है। भूतकाल और भविष्य के विचार उसकी मन से मिट गए और केवल वर्तमान क्षण का अनुभव हुआ, जो अनंतकाल जितना विस्तृत था। इस अनुभव ने लेखक को सिखाया कि जीने का सही तरीका क्या है, और यह झेन परंपरा की बड़ी देन है।