05. शुक्र तारे के सामान – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: महादेव जी के सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति उनके विषय में क्या सोचते थे?
उत्तर: 
महादेव जी के सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति उनकी निर्मल प्रतिभा और मनोहारी स्वभाव के कायल हो जाते थे।

प्रश्न 2: महादेव भाई ने वकालत किसके साथ पढ़ी? यह पेशा उन्होंने क्यों छोड़ दिया?
उत्तर:
 महादेव भाई ने अपने मित्र नरहरि भाई के साथ वकालत पढ़ी। उन्होंने यह पेशा इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि इसमें झूठ को सच बनाना होता था। जबकि उनके संस्कार साहित्यिक थे।

प्रश्न 3: महादेव जी मित्रों के बीच अपना परिचय किस प्रकार देते थे?
उत्तर:
 महादेव जी अपना परिचय गांधीजी का ‘हम्माल’ और उनके ‘पीर – बावर्ची भिश्ती – खर’ के रूप में देते थे।

प्रश्न 4: महादेव को साहित्यिक लेखन का समय न मिलने का क्या कारण था?
उत्तर:
 महादेव साहित्यिक लेखन के लिए समय इसलिए नहीं निकाल सके, क्योंकि वे गांधीजी के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में जुट गए। वे गांधीजी के लेखन कार्य को समय देने लग गए।

प्रश्न 5: लोग किन अत्याचारों की कहानियाँ किसको सुनाते थे? क्यों?
उत्तर: 
जलियाँवाला बाग कांड के बाद अंग्रेज़ों ने बेइंतहा जुल्म जनता पर किए । जनता उनके जुल्मों की कहानियाँ महात्मा गाँधी को सुनाती थी।

प्रश्न 6: महादेव भाई सबके लाड़ले किस प्रकार बन गए?
उत्तर:
 गांधीजी के समुचित मार्गदर्शन, बेजोड़ लेखनकला तथा शत्रु के खिलाफ भी विनययुक्त विवाद करने की शिक्षा ने समाचार-पत्रों की दुनिया में महादेव भाई को सबका लाड़ला बना दिया।

प्रश्न 7: महादेव की डायरी में कमी क्यों नहीं मिलती थी?
उत्तर: 
महादेव को तेज गति से बिना गलती किए लंबी चर्चा को कागज पर लिखने का अभ्यास था। इसी कारण उनकी डायरी में कमी नहीं मिलती थी।

प्रश्न 8: महादेव पीड़ितों के लिए क्या कार्य करते थे?
उत्तर:
 महादेव जी पीड़ितों की बातों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ तैयार करके उन्हें गाँधीजी के समक्ष पेश करते थे तथा उनके साथ प्रत्यक्ष मुलाकात भी करवाते थे।

प्रश्न 9: हार्नीमैन कौन थे? उन्हें देश निकाले की सजा क्यों दी गई?
उत्तर:
 हार्नीमैन ‘बंबई क्रॉनिकल’ अखबार के संपादक थे। वे अंग्रेज़ सरकार पर तीखी टिप्पणियाँ करते थे। उनकी निडरता व कटु आलोचना के कारण उन्हें ‘देश – निकाला’ सजा देकर इंग्लैंड भेज दिया गया।

प्रश्न 10: आकाश में चमकता तेजस्वी तारा किसे कहा गया है?
उत्तर:
 आकाश में चमकता तेजस्वी तारा शुक्रतारे को कहा गया है।

प्रश्न 11: महादेव की गाँधीजी के बिना कल्पना क्यों नहीं हो सकती ?
उत्तर:
 महादेव का जीवन व उनके सारे कामकाज गांधीजी के साथ एकरूप हो गए थे। यही कारण है कि उन्हें गांधीजी से अलग करने की कल्पना नहीं की जा सकती थी।

प्रश्न 12: नक्षत्र मंडल के शुक्रतारे को ‘कलगी रूप तारा’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: 
शुक्रतारे को ‘कलगी रूप तारा’ कहा जाता है, क्योंकि वह कलगी के समान चमकता है।

प्रश्न 13: ‘आँखों में तेल डालकर देखना’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
 इस मुहावरे का अर्थ है – पैनी दृष्टि से जाँच-पड़ताल करना, गांधीजी की हर बात पर दृष्टि रखना और उनके काम में कमियाँ खोजना।

प्रश्न 14: गांधीजी से मुलाकात करने के लिए कौन-कौन आते थे?
उत्तर:
 गांधीजी से मिलने के लिए बड़े-बड़े देशी-विदेशी राजपुरुष, राजनीतिज्ञ, प्रसिद्ध समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि, पादरी, ग्रंथकार, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के संचालक आदि आते थे।

प्रश्न 15: बिहार व उत्तर प्रदेश के मैदान किससे बने हैं?
उत्तर:
 बिहार और उत्तर प्रदेश के हजारों मील लंबे मैदान गंगा, यमुना तथा अन्य दूसरी नदियों के परम उपकारी गाद से बने हैं।

04. वैज्ञानिक चेतना के वाहक : चन्द्र शेखर वेंकटरमन – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: किस मैगजीन में रामन् का पहला शोधपत्र छपा?
उत्तर
: रामन् का पहला शोधपत्र फिलॉसॉफिकल मैगजीन में छपा।

प्रश्न 2: रामन् द्वारा पश्चिमी देशों की किस भ्रांति को तोड़ा गया?
उत्तर:
 रामन् ने इस भ्रांति को तोड़ा कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्ययंत्रों की तुलना में घटिया है।

प्रश्न 3: मुखर्जी महोदय ने रामन् के सामने क्या प्रस्ताव रखा?
उत्तर:
 मुखर्जी महोदय ने रामन् के सामने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के पद का प्रस्ताव रखा।

प्रश्न 4: रामन् ने क्या खोज की थी?
उत्तर:
 रामन् ने समुद्र के जल के नीले रंग के रहस्य का पता लगाया।

प्रश्न 5: रामन् की खोज को क्या नाम दिया गया?
उत्तर: 
रामन् की खोज को ‘रामन् प्रभाव’ नाम दिया गया।

प्रश्न 6: रामन् के पिता ने उन्हें किन विषयों की सशक्त नींव डाली?
उत्तर:
 गणित और भौतिक विषयों की नींद डाली थी रमन की पिता ने।

प्रश्न 7: वाद्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन् ने कौन-सी भांती तोड़ने की कोशिश की?
उत्तर: 
राम ने देश तथा विदेश वाद्य यंत्रों पर कई खोज की और उन्होंने यह भ्रम तोड़ दिया कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्ययंत्रों से घटिया है।

प्रश्न 8: समुद्र को देखकर रमन के मन में कौन-सी दो जिज्ञासाएँ उठी?
उत्तर:
 समुद्र को देखकर रमन के मन में दो जिज्ञासाएँ उठी। पहले यह थी कि ‘समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है’? और दूसरी है ‘और कोई रंग क्यों नहीं होता है’?

प्रश्न 9: प्रकाश तरंगों के बारे में आइस्टाइन ने क्या बताया?
उत्तर:
 आइंस्टाइन ने यह बताया कि प्रकाश अति सूक्ष्म किरणों की तीर धारा हैं।

प्रश्न 10: सरकारी नौकरी छोड़ने के पीछे रामन् की क्या भावना थी?
उत्तर:
 सरकारी नौकरी छोड़ने की विजय रमन की यह भावना थी कि वह पढ़ाई आगे जारी रख कर और शोध कार्य में अपना पूरा समय लगाएंगे।

प्रश्न 11: ‘रामन् प्रभाव’ की खोज के पीछे कौन-सा सवाल हिलोरें ले रहा था?
उत्तर:
 “आखिर पानी का रंग नीला क्यों है” यह सवाल ‘रमन प्रभाव’ की खोज के पीछे हिलोरे ले रहा था।

प्रश्न 12: कालेज के दिनों में रामन् को दिली इच्छा क्या थी?
उत्तर: 
कॉलेज के दिनों में रमन को दिली इच्छा वैज्ञानिक प्रयोगों में थी। उनका पूरा दिमाग वैज्ञानिक रहस्य को सुलझाने में लगा रहता था।

प्रश्न 13: वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के अध्ययन के द्वारा रामन् क्या करना चाहते थे?
उत्तर:
 वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के अध्ययन के द्वारा रामन् उनके पीछे छुपे हुए कंपनी के रहस्य को उजागर करना चाहते थे।

03. तुम कब जाओगे, अतिथि – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: खिचड़ी बनाना किस बात का संकेत था?
उत्तर:
 अतिथि जल्दी चला जाए इसलिए खिचड़ी बनाकर उसे न झेल पाने का संकेत दिया था।

प्रश्न 2: लेखक के मन में अतिथि को ‘गेट आउट’ कहने की बात क्यों आई?
उत्तर: 
चार दिन की मेहमाननवाजी के पश्चात् भी जब अतिथि वापस नहीं गया, तो लेखक की सहनशीलता जवाब दे गई। अतिथि व लेखक के संबंध भी पहले जैसे मधुर नहीं रहे। लेखक को अतिथि बोझ लगने लगा तथा वह सोचने लगा कि अतिथि को शराफ़त से लौट जाना चाहिए अन्यथा ‘गेट आउट’ भी एक वाक्य है, जो बोला जा सकता है।

प्रश्न 3: जब अतिथि लेखक के घर पधारा तो उसने व उसकी पत्नी ने उसका स्वागत-सत्कार किस प्रकार किया?
उत्तर:
 अतिथि के आने पर लेखक ने स्नेहभरी मुसकराहट के साथ गले मिलकर उसका स्वागत किया तथा उसकी पत्नी ने सादर नमस्ते की। उन्होंने अतिथि के सम्मान में रात के भोजन को उच्च-मध्यम वर्ग के डिनर में बदल दिया। अगले दिन भी उन्होंने दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की एवं उसे सिनेमा भी दिखाया।

प्रश्न 4: अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक और उसकी पत्नी के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए?
उत्तर: 
जहाँ अतिथि के आने पर लेखक ने उसका गर्मजोशी से स्वागत-सत्कार किया व उसने सम्मान में अच्छा भोजन बनवाया तथा सिनेमा दिखाया, वहाँ अब उसके अपेक्षा से अधिक टिके रहने पर संबंधों की मधुरता समाप्त हो गई तथा भोजन में भी खिचड़ी बनाई गई। पहले ठहाकों से भरे वातावरण में बातचीत होती थी, किंतु अब चुप्पी थी।

प्रश्न 5: अतिथि के आने पर लेखक का बटुआ अंदर-ही-अंदर क्यों काँप गया?
उत्तर:
 अतिथि के आने पर लेखक का हृदय अज्ञात आशंका से धड़क उठा। वह सोचने लगा कि अब मेहमान की मेहमाननवाज़ी में काफ़ी धन खर्च हो जाएगा तथा उसकी आर्थिक स्थिति चरमरा जाएगी। इसी कारण वह अपने बटुए अर्थात् धन की चिंता करने लगा।

प्रश्न 6: चौथे दिन लेखक को क्या आशा हुई?
उत्तर: 
लेखक को आशा हुई कि कल अतिथि स्थिति समझकर स्वयं ही चला जाएगा।

प्रश्न 7: अतिथि के आने पर लेखक और उसकी पत्नी के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए?
उत्तर:
 जब अतिथि दो दिन के बाद भी विदा नहीं हुआ, तो लेखक तीसरे व चौथे दिन उसे दिखाकर कैलेंडर में तारीखें बदलने लगा, ताकि उसे यह एहसास दिला सके कि उसे लेखक के घर पर ठहरे हुए चार दिन बीत गए हैं तथा अब उसे और अधिक दिन न ठहरकर वापस चले जाना चाहिए।

प्रश्न 8: अतिथि द्वारा दिया गया क्या आघात अप्रत्याशित था?
उत्तर:
 तीसरे दिन धोबी को कपड़े देने की बात लेखक के लिए अप्रत्याशित आघात था।

प्रश्न 9: लेखक ने पहली रात के भोजन को उच्च-मध्यम वर्ग के डिनर में किस उद्देश्य से बदला? उसने भोजन में क्या-क्या बनवाया?
उत्तर:
 अतिथि के आने पर लेखक ने पहली रात के भोजन को उच्च-मध्यम वर्ग के डिनर में यह सोचकर बदला कि वह एक दिन टिककर भावभीनी विदाई लेकर लौट जाएगा। अतः उसके हृदय पर शानदार मेहमाननवाजी की छाप अंकित करने के उद्देश्य से ही लेखक ने ऐसा किया। उसने भोजन में दो सब्ज़ियों और रायते के अतिरिक्त मीठा भी बनवाया था।

प्रश्न 10: आर्थिक सीमाओं की बैंजनी मिट्टी खोदने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
 लेखक की आय सीमित है और अतिथि के सत्कार के कारण बजट बिगड़ गया है।

प्रश्न 11: अतिथि के अधिक दिन रुकने से स्थिति में क्या बदलाव आया?
उत्तर:
 अतिथि और लेखक दोनों चुप हैं। दोनों के बीच बातचीत नहीं हो रही है।

प्रश्न 12: लेखक ने अतिथि की तुलना एस्ट्रॉनाट्स से क्यों की है?
उत्तर: 
लेखक ने कहा है कि एस्ट्रॉनॉट्स लाखों मील लंबी यात्रा तय करने के बाद चाँद पर पहुँचे थे तथा अपना कार्य समाप्त कर वे धरती पर लौट आए थे, किंतु अतिथि छोटी-सी यात्रा तय करके आया था तथा अपने सारे कार्य कर चुकने के बाद भी जाने का नाम तक नहीं ले रहा था। उसे तो उतने दिन भी नहीं रुकना चाहिए था, जितने दिन एस्ट्रॉनॉट्स चाँद पर रुके थे।

02. एवरेस्ट: मेरी शिखर यात्रा – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: एवरेस्ट अभियान कब और कहाँ से कहाँ तक के लिए चला?
उत्तर:
 एवरेस्ट अभियान 7 मार्च को दिल्ली से काठमांडू के लिए चला।

प्रश्न 2: तीसरे दिन यात्रियों का क्या कार्यक्रम था?
उत्तर: 
यात्रा दल के लिए तीसरा दिन हिमपात से कैंप तक सामान ढोकर चढ़ाई का अभ्यास करने के लिए निश्चित था।

प्रश्न 3: अग्रिम दल का नेतृत्व कौन कर रहे थे? वे कव तथा कहाँ वापस आए?
उत्तर: 
अग्रिम दल का नेतृत्व प्रेमचंद कर रहे थे, वे 26 मार्च को पैरिच वापस आ गए।

प्रश्न 4: नमचे बाजार कहाँ का महत्त्वपूर्ण नगरीय क्षेत्र है? इसके आसपास क्या है?
उत्तर:
 नमचे बाजार शेरपालैंड का एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके आसपास शेरपा लोगों के गाँव हैं।

प्रश्न 5: ‘अनियमित’ में प्रयुक्त उपसर्ग तथा प्रत्यय का नाम बताइए।
उत्तर: 
‘अनियमित’ शब्द में ‘इत’ प्रत्यय तथा ‘अ’ उपसर्ग लगा हुआ है।

प्रश्न 6: लेखिका का कैंप तहस-नहस कैसे हो गया?
उत्तर: 
एक लंबे बर्फ के पिंड ने लहोत्से ग्लेशियर से टूटकर ढलान से नीचे आते हुए लेखिका के कैंप को तहस-नहस कर दिया।

प्रश्न 7: लेखिका के यात्रा दल के नेता कौन थे?
उत्तर:
 लेखिका के एवरेस्ट अभियान दल के नेता थे कर्नल खुल्लर |

प्रश्न 8: लेखिका के अगले दिन की महत्त्वपूर्ण चढ़ाई दल के सह सदस्य कौन थे?
उत्तर:
 लेखिका के साथ अगले दिन की महत्त्वपूर्ण चढ़ाई दल के सह सदस्य थे – की, जय तथा मीनू।

प्रश्न 9: फूल (प्लूम) बनने का क्या कारण था?
उत्तर:
 प्लूम पर्वत शिखर की ऊपरी सतह के आसपास 150 किलोमीटर या इससे भी अधिक गति से हवा चलने के कारण बनता था।

प्रश्न 10: लेखिका क्यों डर गई?
उत्तर: 
लेखिका पर्वत शिखर पर 150 किलोमीटर या इससे भी अधिक की रफ़्तार से बहती बर्फीली आँधी तथा तूफ़ानों को देखकर अत्यंत डर गईं थी।

प्रश्न 11: की, जय और मीनू कैंप तक देर से क्यों पहुँचे?
उत्तर: 
क्योंकि वे भारी बोझ लेकर एवं बिना ऑक्सीजन के यात्रा कर रहे थे।

प्रश्न 12: नमचे वाजार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
 नमचे बाजार शेरपालैंड का एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगरीय क्षेत्र है। यह बाजार नेपालियों के मध्य सागरमाथा के नाम से प्रसिद्ध है। अधिकांश शेरपा इसी के आसपास रहते हैं।

प्रश्न 13: ‘की’ क्यों हक्का-बक्का रह गया?
उत्तर:
 ‘की’ लेखिका को बिना कोई सावधानी लिए कैंप क्षेत्र के बाहर देखकर हक्का-बक्का रह गया।

प्रश्न 14: जय लेखिका से कहाँ मिला?
उत्तर:
 जय लेखिका से जेनेवा स्पर की चोटी के ठीक नीचे मिला।

प्रश्न 15: एवरेस्ट की यात्रा पर गए यात्रियों को सबसे अधिक कष्ट कव तथा कहाँ झेलना पड़ता था?
उत्तर:
 एवरेस्ट की यात्रा पर गए यात्रियों को सबसे अधिक कष्ट मौसम खराब होने पर दक्षिण-पूर्वी पहाड़ी पर तूफानों के रूप में झेलना पड़ता था।

01. दुःख का अधिकार – Very Short Questions answer

प्रश्न 1: किसी व्यक्ति की पोशाक को देखकर हमें क्या पता चलता है?
उत्तर: 
किसी व्यक्ति की पोशाक देखकर हमें उसकी श्रेणी या वर्ग का पता चलता है।

प्रश्न 2: उस स्त्री को देखकर लेखक को कैसा लगा?
उत्तर:
 उस स्त्री को देखकर लेखक का हृदय पीड़ा से भर उठा और वह उसके दुख को जानने के लिए बेचैन हो गया।

प्रश्न 3: बुढ़िया को कोई भी उधार क्यों नहीं देता?
उत्तर:
 उस स्त्री को उधार देने वाला व्यक्ति कोई भी नहीं था क्योंकि उसके घर में कोई भी कमाने वाला अब नहीं रह गया था।

प्रश्न 4: पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है?
उत्तर:
 पोशाक हमारे लिए तब बंधन और अड़चन बन जाती है जब समाज की निचली श्रेणियों की अनुभूतियों को समझने और उनके सुख-दुखों को बांटने में हमारा सम्मान कम होने लगता है अथवा कम होने की संभावना होती है।

प्रश्न 5: भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
उत्तर:
 भगवाना शहर के पास डेढ़ बीघे जमीन पर साग-सब्जी और फल उगाता था। उसी की बिक्री से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था।

प्रश्न 6: खरबूज़े बेचने वाली स्त्री से कोई खरबूजे क्यों नहीं खरीद रहा था?
उत्तर: 
खरबूजे बेचने वाली अपने मुँह को कपड़े में छुपाकर सिर को घुटनों में रखे रो रही थी इसलिए लोग उससे खरबूजे नहीं खरीद रहे थे।

प्रश्न 7: उस स्त्री के लड़के की मृत्यु का क्या कारण था?
उत्तर: 
उस स्त्री के बेटे की मृत्यु का कारण एक साँप का डसना था। जब उस स्त्री का बेटा खरबूजे के खेत में बने हुए मेड़ पर खरबूज़े चुन रहा था, तभी किसी विषधर साँप ने उसे डस लिया था।

प्रश्न 8: मनुष्य के जीवन में पोशाक का क्या महत्व है?
उत्तर: 
पोशाक के माध्यम से मनुष्य को समाज में सम्मान के साथ ऊँचा दर्जा भी मिलता है। इस पोशाक से उसके अधिकार तय होते हैं और जीवन में आगे बढ़ने के लिए नए रास्ते भी खुल जाते हैं, किंतु कभी-कभी पोशाक लोगों की अनुभूतियों को समझने में बाधक बन दुख पहुँचाने का माध्यम भी बन जाती है।

प्रश्न 9: लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाया?
उत्तर: 
लेखक एक अच्छी पोशाक पहने हुए थे, जिससे समाज में बनाई अपनी प्रतिष्ठा के बिगड़ जाने का  डर था इसलिए उस गरीब और उपेक्षित स्त्री से चाहते हुए भी उसके रोने का कारण नहीं पूछ पाये।

प्रश्न 10: लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुढ़िया खरबूज़े बेचने क्यों चल पड़ी?
उत्तर: 
लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन वो बूढ़ी स्त्री इसलिए खरबूजे बेचने के लिए बाहर निकल पड़ी क्योंकि पुत्र की अंतिम-क्रिया में घर में बचे हुए पैसे और सारा राशन खर्च हो गया था। अब सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट था। उसकी बहू बुखार से पूरी तरह तप रही थी और बुढ़िया को अपने पोते-पोतियों के लिए भोजन जुटाना भी जरूरी था।

10. नए इलाके में… खुशबू रचते हैं हाथ… – पाठ का सार

कवि परिचय

कवि अरुण कमल का जन्म 1936 में हुआ था। वे हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में से एक माने जाते हैं। उनकी कविताओं में जीवन, संघर्ष और समाज की सच्चाइयों को उजागर किया गया है। निराला की कविताओं में खासकर संवेदनशीलता और गहरी सोच का अनुभव होता है। वे भारतीय समाज की वास्तविकताओं को चित्रित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने आम जनमानस को प्रभावित किया और समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया।

कविता का सार

‘नए इलाके में’

प्रस्तुत पाठ की पहली कविता ‘नए इलाके में’ में कवि ने एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करने का वर्णन किया है, जो एक ही दिन में पुरानी हो जाती है। इस कविता के माध्यम से कवि यह समझाना चाहते हैं कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, अर्थात कोई भी वस्तु या जीव हमेशा के लिए नहीं रहते। कवि का अक्सर यह अनुभव होता है कि वह अपना रास्ता ढूंढने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है, लेकिन हर जगह मकानों के बनने के कारण वह पीपल का पेड़ अब नहीं मिलता। कवि पुराने गिरे हुए मकान को खोजता है, लेकिन वह भी अब कहीं नहीं दिखता। कवि कहता है कि जहाँ रोज कुछ नया बन रहा हो और कुछ मिटाया जा रहा हो, वहाँ व्यक्ति अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं कर सकता। कवि के अनुसार, एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। अब सही घर खोजने का उपाय यही है कि हर दरवाजे को खटखटा कर पूछा जाए कि क्या वह सही घर है।

‘खुशबू रचते हैं हाथ’

इस पाठ की दूसरी कविता ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ में कवि ने सामाजिक विषमताओं को उजागर किया है। इस कविता में कवि ने गरीबों के जीवन पर प्रकाश डाला है। कवि कहता है कि अगरबत्ती का इस्तेमाल लगभग हर व्यक्ति करता है। कवि ने उन खुशबूदार अगरबत्ती बनाने वालों का वर्णन किया है जो खुशबू से दूर हैं। अगरबत्ती का कारखाना अक्सर किसी तंग गली में, गंदे पानी के बहाव के लिए बनाए गए रास्ते के पार और बदबूदार कूड़े के ढेर के करीब होता है। कवि ने यह भी बताया कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ अलग-अलग होते हैं; कुछ के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं, तो कुछ के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं। कवि कहता है कि दूसरों के लिए खुशबू बनाने वाले खुद कितनी कठिनाइयों का सामना करते हैं। यह विडंबना है कि खुशबू उन स्थानों पर बनाई जाती है जहाँ गंदगी होती है।

नए इलाके में कविता का भावार्थ

(1)
इन नए बसते इलाकों में
जहाँ रोज बन रहे हैं नए-नए मकान
मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ

भावार्थ: कवि कहता है कि शहर में नए मुहल्ले रोज़ ही बसते हैं। ऐसी जगहों पर रोज नये-नये मकान बनते हैं। रोज-रोज नये बनते मकानों के कारण कोई भी व्यक्ति ऐसे इलाके में रास्ता भूल सकता है। कवि को भी यही परेशानी होती है। वह भी इन मकानों के बीच अपना रास्ता हमेशा भूल जाता है।

(2)
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढ़हा हुआ घर
और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंजिला

भावार्थ: कवि कहता है कि जो पुराने निशान हैं वे धोखा दे जाते हैं क्योंकि कुछ पुराने निशान तो सदा के लिए मिट जाते हैं। कवि के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह अपना रास्ता ढूँढ़ने के लिए पीपल के पेड़ को खोजता है परन्तु हर जगह मकानों के बनने के कारण उस पीपल के पेड़ को काट दिया गया है।फिर कवि पुराने गिरे हुए मकान को ढूँढ़ता है परन्तु वह भी उसे अब कही नहीं दिखता। कवि कहता है कि पहले तो उसे घर का रास्ता ढूँढ़ने के लिए जमीन के खाली टुकड़े के पास से बाएँ मुड़ना पड़ता था और उसके बाद दो मकानों के बाद बिना रंगवाले लोहे के दरवाजे वाले इकमंजिले मकान में जाना होता था। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि को अब बहुत से मकानों के बन जाने से घर का रास्ता ढूँढ़ने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

(3)
और मैं हर बार एक घर पीछे
चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता
यहाँ रोज कुछ बन रहा है
रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं

भावार्थ: कवि कहता है कि अपने घर जाते हुए वह हर बार या तो अपने घर से एक घर पीछे ठहर जाता है या डगमगाते हुए अपने घर से दो घर आगे ही बढ़ जाता है। कवि कहता है जहाँ पर रोज ही कुछ नया बन रहा हो और कुछ मिटाया जा रहा हो, वहाँ पर अपने घर का रास्ता ढ़ूँढ़ने के लिए आप अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं कर सकते।

(4)
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ
अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ
और पूछो – क्या यही है वो घर?
समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढ़हा आ रहा अकास
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर।

भावार्थ: कवि कहता है कि एक ही दिन में सबकुछ इतना बदल जाता है कि एक दिन पहले की दुनिया पुरानी लगने लगती है। ऐसा लगता है जैसे महीनों बाद लौटा हूँ। ऐसा लगता है जैसे घर से बसंत ऋतु में बाहर गया था और पतझड़ ऋतु में लौट कर आया हूँ।
जैसे बैसाख ऋतु में गया और भादों में लौटा हो। कवि कहता है कि अब सही घर ढ़ूँढ़ने का एक ही उपाय है कि हर दरवाजे को खटखटा कर पूछो कि क्या वह सही घर है। कवि कहता है कि उसके पास अपना घर ढूँढ़ने लिए बहुत कम समय है क्योंकि अब तो आसमान से बारिश भी आने वाली है और कवि को उम्मीद है कि कोई परिचित उसे देख लेगा और आवाज लगाकर उसे उसके घर ले जाएगा।

खुशबू रचते हैं हाथ कविता का भावार्थ

(1)
नई गलियों के बीच
कई नालों के पार
कूड़े करकट
के ढ़ेरों के बाद
बदबू से फटते जाते इस
टोले के अंदर
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ!

भावार्थ: कवि कहता है कि अगरबत्ती का इस्तेमाल लगभग हर व्यक्ति करता है। अगरबत्ती हालाँकि पूजा पाठ में इस्तेमाल होती है लेकिन इसकी खुशबू ही शायद वह वजह होती है कि लोग इसे प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं।
इस कविता में कवि ने उन खुशबूदार अगरबत्ती बनाने वालों के बारे में बताया है जो खुशबू से कोसों दूर है। ऐसा कवि ने इसलिए कहा है क्योंकि अगरबत्ती का कारखाना अकसर किसी तंग गली में, घरों और सड़कों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाए गए रास्ते के पार और बदबूदार कूड़े के ढेर के समीप होता है। ऐसे स्थानों पर कई कारीगर अपने हाथों से अगरबत्ती को बनाते हैं।

(2)
उभरी नसोंवाले हाथ
घिसे नाखूनोंवाले हाथ
पीपल के पत्ते से नए नए हाथ
जूही की डाल से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे पिटे हाथ
जख्म से फटे हुए हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ!

भावार्थ: कवि कहता है कि अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों के हाथ विभिन्न प्रकार के होते हैं। किसी के हाथों में उभरी हुई नसें होती हैं। किसी के हाथों के नाखून घिसे हुए होते हैं। कुछ बच्चे भी काम करते हैं जिनके हाथ पीपल के नये पत्तों की तरह कोमल होते हैं। कुछ कम उम्र की लड़कियाँ भी होती हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाल की तरह खुशबूदार होते हैं। कुछ कारीगरों के हाथ गंदे, कटे-पिटे और चोट के कारण फटे हुए भी होते हैं। कवि कहता है कि दूसरों के लिए खुशबू बनाने वाले खुद न जाने कितनी और कैसी तकलीफों का सामना करते हैं।

शब्दावली

  • इलाका: क्षेत्र
  • अकसर: प्रायः 
  • ताकतादेखता
  • ढहागिरा हुआ 
  • ठकमकाताडगमगाते हुए
  • स्मॄतियाद 
  • वसंतएक ऋतु
  • पतझडएक ऋतु जिसमें पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं
  • वैसाखचैत के बाद आने वाला महीना
  • भादोंसावन के बाद आने वाला महीना
  • अकासगगन
  • कूड़ा-करकटरद्दी या कचरा
  • टोलेछोटी बस्ती
  • जख्मघाव
  • मुल्कदेश 
  • खसपोस्ता
  • रातरानीएक सुगंधित फूल
  • मशहूरप्रसिद्ध

09. अग्नि पथ – पाठ का सार

कविता का सार

प्रस्तुत कविता में कवि ने संघर्षमय जीवन को ‘अग्नि पथ’ कहते हुए मनुष्य को यह संदेश दिया है कि राह में सुख रूपी छाँह की चाह न कर अपनी मंजिल की ओर कर्मठतापूर्वक बिना थकान महसूस किए बढते ही जाना चाहिए। कवि कहते हैं कि जीवन संघर्षपूर्ण है। जीवन का रास्ता कठिनाइयों से भरा हुआ है। परन्तु हमें अपना रास्ता खुद तय करना है। किसी भी परिस्थिति में हमें दूसरों का सहारा नही लेना है। हमें कष्ट-मुसीबतों पर जीत पाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करना है।

कवि परिचय

हरिवंश राय बच्चन – इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में 27 नवंबर 1907 को हुआ। बच्चन कुछ समय तक विश्वविधालय में प्राध्यापक रहने के बाद भारतीय विदेश सेवा में चले गए थे। इस दौरान इन्होने कई देशों का भम्रण किया और मंच पर ओजस्वी वाणी में काव्यपाठ के लिए विख्यात हुए। बच्चन की कविताएँ सहज और संवेदनशील हैं। इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना और जीवन दर्शन के स्वर मिलते हैं।

प्रमुख कार्य
कविता संग्रह – मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, मिलन यामिनी, आरती और अंगारे, टूटती चटानें, रूप तरंगिणी।
आत्मकथा के चार खंड – क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. अग्निपथ – कठिनाइयों से भरा हुआ मार्ग।
  2. पत्र – पत्ता
  3. शपथ – कसम
  4. अश्रु – आंसू
  5. स्वेद – पसीना
  6.  रक्त – खून
  7. लथपथ – सना हुआ।

08. गीत – अगीत – पाठ का सार

गीत अगीत कविता का अर्थ व्याख्या

गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कहती जाती है।
तट पर एक गुलाब सोचता
“देते स्वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।“

गा-गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ गीत-अगीत कविता से उद्धृत हैं, जो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि नदी दुःखी होकर विरह या दुःख का गीत गाते हुए तेज गती से निरन्तर बहती जा रही है तथा अपना दुःख से भारी दिल हलका करने के लिए किनारों या उपलों से कुछ कहती जा रही है। तत्पश्चात्, इसी बीच किनारों पर खिला एक गुलाब के मन में भाव जागता है और वह सोचता है कि यदि भगवान ने मुझे भी स्वर दिया होता तो मैं भी अपने पतझड़ के सपनों का गीत सारे जग को सुनाता। बहते हुए झरने गीत गा-गाकर निरन्तर बह रही है, और गुलाब किनारों या तट पर शान्त खड़ा है। आगे कवि कह रहे हैं कि गीत, अगीत, कौन सुंदर है ? अर्थात् मेरे गीत सुन्दर हैं या प्रकृति के यह अद्भुत ना बोलने वाले अगीत अधिक सुंदर हैं।


(2) बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो खोंते को छाया देती।
पंख फुला नीचे खोंते में
शुकी बैठ अंडे है सेती।
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर।
किंतु, शुकी के गीत उमड़कर
रह जाते सनेह में सनकर।

गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फूला मग्न शुकी का पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ गीत अगीत कविता से उद्धृत हैं, जो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि शुक यानी तोता एक घनी डाल पर बैठा है, जो डाल तोते के घोंसले को छाया देती है तथा उसी डाल में नीचे के घोंसले में उस तोते की पत्नी शुकी पंख फैलाकर अपने अंडों को सेती है। जब सुनहरे सूर्य की किरणें पत्तों से पार होकर तोते के पंखो को छूती है, तो तोता बेशुद्ध होकर गीत गाने लगता है, साथ में उसकी पत्नी शुकी भी गाना चाहती है, किन्तु पत्नी के गीत पति के प्रेम के बंधन में ही बंध कर रह जाती है | तोता यानी शुक का स्वर वन में गूंजता देख उसकी पत्नी शुकी फुले नहीं समा रही है, वह अत्यंत हर्षित है | आगे कवि कह रहे हैं कि ये सब विचार करने वाली बात है कि कवि के गीत सुन्दर हैं या प्रकृति के न बोल पाने वाले अगीत सुन्दर हैं।


(3)  दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्हा गाता है,
पहला स्वर उसकी राधा को
घर से यहीं खींच लाता है।
चोरी-चोरी छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है।

वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है।
गीत, अगीत कौन सुंदर है?
भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ गीत अगीत कविता से उद्धृत हैं, जो कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि यहाँ दो प्रेमी रहते हैं, जब एक प्रेमी संध्या के वक़्त आल्हा (एक प्रकार की गीत) गाता है, तो गीत का पहला स्वर उसकी प्रेमिका रूपी राधा को सीधे घर से खिंच लाता है | वह चोरी से छुपकर अपने प्रीतम का गीत सुनती है | प्रेमिका मन में सोचने लगती है कि मैं भी इस गीत का हिस्सा क्यों नही हूँ | ये सब देखकर कवि विचार करते हैं कि मेरा गीत सुन्दर है या ये प्रकृति का अगीत सुन्दर है | 


गीत अगीत कविता पाठ का सारांश 

प्रस्तुत पाठ गीत-अगीत लेखक रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा रचित है | इस पाठ में कवि ने प्रकृति का सजीव चित्रण किया है | यह पूरा पाठ प्रकृति में उपस्थित नदी, झरने, पुष्प, पशु-पक्षी, वन और प्रेमी-प्रेमिका के कुछ कहने और मौन रहने दोनों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष वर्णन  किया गया है।
कवि को नदी के बहाव में गीत का सृजन होता जान पड़ता है | नदी के विरह के गीत गाते हुए बहना, गुलाब का तट पर मौन खड़े होकर भगवान से आवाज़ होने पर अपने सपनों का बखान करना, शुक-शुकी के प्रेम के गीत में पूरे वन में गूंज जाना। प्रेमी के गीत को सुनकर प्रेमिका का मन में सोचना की वह भी इस गीत का हिस्सा क्यों नहीं है। यह सब देखकर कवि को दुविधा बस इतनी होती है कि उनका गीत सुन्दर है या ये प्रकृति का मौन अगीत सुन्दर है…|| 


जीवन परिचय

प्रस्तुत पाठ के रचयिता रामधारी सिंह दिनकर जी हैं। इनका जन्म 30 सितम्बर 1908 को बिहार में मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव मे हुआ था। दिनकर जी सन् 1952 में राज्य सभा के सदस्य मनोनीत किये गए थे, भारत सरकार ने दिनकर जी को ‘पद्मभूषण’ सम्मान  से अलंकृत किया था। इनको  “संस्कृति की चार अध्याय” पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं काव्यकृति “उर्वशी” के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दिनकर जी की लेखनी अत्यंत सरल, ओजस्वी, प्रवाहपूर्ण है , इन्हें ओज के कवि के रूप में जाना जाता है, ये हमेशा युग एवं देश के प्रति सजग रहे है,  इनके विचार और संवेदना का अनोखा समन्वय प्राप्त होता है। दिनकर जी की रचनाओं में प्रेम और सुंदरता का भी अनूठा चित्रण मिलता है। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, हुँकार, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, और संस्कृति के चार अध्याय…||

07. दोहे – पाठ का सार

रहीम के नीतिपरक दोहे

इस पाठ में रहीम के ग्यारह नीतिपरक दोहे संकलित हैं। ये दोहे जहाँ एक ओर पाठक वर्ग को दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए – इसकी सीख देते हैं, वहीं सभी मनुष्यों को करणीयअकरणीय आचरण का ज्ञान भी कराते हैं।पहले चार दोहे

  • पहले दोहे में कवि ने प्रेम रूपी धागे को तोड़ने से मना किया है, क्योंकि आपसी प्रेम-संबंध में एक बार दरार पड़ने पर वह पहले जैसा नहीं रहता।
  • दूसरे दोहे में बताया गया है कि अपने मन की वेदना या कष्ट को अपने मन में ही छिपाकर रखना चाहिए, जो कि संयम की शिक्षा है।
  • तीसरे दोहे में कवि कहते हैं कि जिस प्रकार वृक्ष के मूल जड़ को सींचने से वृक्ष में फल-फूल स्वयं उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार इस सृष्टि के मूल परमात्मा की साधना करने से इस संसार की सभी कामनाएँ स्वतः पूरी हो जाती हैं।
  • चौथे दोहे में कहा गया है कि विपत्ति आने पर मनुष्य शांति प्रदान करने वाले स्थान में चला जाता है।

पाँचवे से ग्यारहवें दोहे

  • पाँचवे दोहे में दोहा छंद की विशेषता का वर्णन हुआ है।
  • छठे दोहे में रहीम बताते हैं कि कीचड़ का पानी भी धन्य है, क्योंकि इससे न जाने कितने छोटे-छोटे प्राणी अपनी प्यास बुझाते हैं।
  • इसके विपरीत, विशाल जल का भंडार होकर भी सागर किसी की प्यास नहीं बुझा सकता।
  • सातवें दोहे में कवि ने कहा है कि संगीत की सुर-लहरी पर मुग्ध होकर मृग अपने प्राण तक न्यौछावर कर देता है, किंतु मनुष्य यदि किसी की कला पर मोहित होकर कुछ दान नहीं करता तो वह पशु से भी अधम है।
  • आठवें दोहे में कवि ने कहा है कि कोई बात यदि एक बार बिगड़ जाए, तो लाख प्रयत्न करने पर भी वह बात बनती नहीं है, जैसे दूध फट जाने पर मक्खन नहीं निकलता।
  • नवें दोहे में कवि ने कहा है कि प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व होता है। बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
  • दसवें दोहे में अपनी निजी संपत्ति का महत्व बताया गया है।
  • ग्यारहवें दोहे में कवि ने पानी की महत्ता को विभिन्न संदर्भों में स्थापित किया है।

06. रैदास – पाठ का सार

कवि परिचय

कवि रैदास का मूल नाम संत रविदास था, परन्तु इन्हें ख्याति ‘रैदास’ के नाम से हासिल हुई। ऐसी मान्यता है कि कवि रैदास का जन्म 1388 और निर्वाण 1518 में बनारस में ही हुआ | इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था | मध्ययुगीन साधकों में कवि रैदास का विशिष्ट स्थान है | मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का तनिक भी विश्वास नहीं था | वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म माना करते थे | 
संत कवि रैदास की रचनाओं में सरल और व्यवहारिक ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है, जिसमें, राजस्थानी, अवधि, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी शब्दों का भी मिश्रण है | उल्लेखनीय है कि कवि रैदास के 40 पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में भी सम्मिलित हैं |

कविता का सारांश

इस कविता में रैदास जी ने भगवान के प्रति भक्ति की अत्यंत गहरी भावना को व्यक्त किया है। पहले पद में रैदास जी बताते हैं कि जब भक्त पर भगवान की भक्ति का रंग चढ़ जाता है, तो वह भगवान के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। वे उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं कि जैसे चंदन की सुगंध पानी में समा जाती है, वैसे ही भगवान की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समा जाती है। दूसरे पद में रैदास जी भगवान की महिमा का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि भगवान गरीबों और दुःखी जनों के उद्धारकर्ता हैं। वे जात-पात का अंत करने की शक्ति रखते हैं और सबको एक समान दृष्टि से देखते हैं।

मुख्य विषय

इस कविता का मुख्य विषय भगवान की भक्ति और भक्त का भगवान के प्रति समर्पण है। रैदास जी ने यह व्यक्त किया है कि जब भगवान की भक्ति भक्त के हृदय में समा जाती है, तो भक्त को भगवान से अलग करना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, रैदास जी भगवान के साकार रूप, उनके गुणों और उनकी शक्ति का बखान करते हैं, यह बताते हुए कि भगवान सबकी मदद कर सकते हैं और किसी को भी उद्धार दे सकते हैं।

कविता का भावार्थ

(1)
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी , जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा , जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती , जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा , जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा , ऐसी भक्ति करै रैदासा।

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियाँ संत कवि रैदास जी द्वारा रचित कविता या पदों से उद्धृत की गई हैं। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से अपने आराध्य (ईश्वर) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि प्रभु! हमारे मन में जो आपके नाम की रट लगी हुई है, वह कैसे छूटेगी? जिस प्रकार चंदन पानी के संपर्क में आते ही अपनी सुगंध पानी में बिखेर देता है, ठीक उसी प्रकार मेरे तन-मन में आपके प्रेम रूपी सुगंध प्रवाहित हो रही है। कवि अपने आराध्य से कहते हैं कि बेशक आप आसमान में छाए काले बादल के समान हैं और मैं वन में नाचने वाला मोर हूँ। जिस तरह बारिश के दिनों में घुमड़ते बादलों को देखकर मोर खुशी से नाच उठता है, ठीक उसी प्रकार मैं आपके दर्शन पाकर खुशी से फूला नहीं समाता। जिस प्रकार चकोर पक्षी सदा अपने चंद्रमा की ओर निहारता रहता है, ठीक उसी प्रकार मैं भी हमेशा आपके प्रेम और दर्शन की लालसा रखता हूँ। कवि अपने आराध्य (ईश्वर) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आप दीपक हैं और मैं उसकी बाती, जो दिन-रात आपके प्रेम में जलती रहती है। आप मोती हैं और मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ। हमारा मिलन मानो सोने पे सुहागा है। अंतिम पंक्ति में कवि रैदास अपने आराध्य से कहते हैं कि आप मेरे स्वामी हैं और मैं आपका दास मात्र हूँ।

(2)
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढ़रै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥

भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियाँ संत कवि रैदास जी द्वारा रचित कविता या पदों से उद्धृत की गई हैं। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से अपने आराध्य (ईश्वर) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! केवल आप ही हैं जो दिन-दुखियों पर कृपा-दृष्टि रखने वाले हैं। आपके सिवा इस संसार में और कौन कृपालु हो सकता है? कवि कहते हैं कि आप ही वह महान ईश्वर हैं जिन्होंने मुझ जैसे अछूत और नीच व्यक्ति के माथे पर भी राजाओं जैसा छत्र रख दिया। आपकी कृपा से ही यह संभव हुआ। वे आगे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि आपकी दया से नामदेव, कबीर जैसे जुलाहे, त्रिलोचन जैसे साधारण व्यक्ति, सधना जैसे कसाई और सैन जैसे नाई भी संसार के बंधनों से मुक्त हो गए और उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। अंतिम पंक्ति में कवि रैदास सभी संतों से कहते हैं कि हे संतजन! सुनो, हरि जी सब कुछ करने में सक्षम और समर्थ हैं। उनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है।

शब्दावली

  • बास: गंध
  • घन: बादल 
  • चितवत: देखना 
  • चकोर: तीतर की जाति का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है।
  • बरै: बढ़ाना या जलना 
  • सुहागा: सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में आने वाला क्षार द्रव्य 
  • लाल: स्वामी 
  • ग़रीब निवाजु: दीन-दुखियों पर दया करने वाला 
  • माथै छत्रु धरै: मस्तक पर स्वामी होने का मुकुट धारन करता है 
  • छोति: छुआछूत 
  • जगत कौ लागै: संसार के लोगों को लगती है 
  • हरिजीऊ: हरि जी से 
  • नामदेव: महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध संत 
  • तिलोचनु: एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य जो ज्ञानदेव और नामदेव के गुरु थे।
  • सधना: एक उच्च कोटि के संत जो नामदेव के समकालीन माने जाते हैं। 
  • सैनु: रामानंद का समकालीन संत।
  • हरिजीउ: हरि जी से
  • सभै सरै: सबकुछ संभव हो जाता है