05. शुक्र तारे के सामान – पाठ का सार

पाठ का सार

आकाश में शुक्रतारे का कोई जोड़ नहीं है। शुक्र को चंद्र का साथी माना जाता है। उसकी आभा-प्रभा बेजोड़ मानी जाती है लेकिन इसके आकाश में ठहरने का समय काफी अल्प होता है। भारत की राजनीति अथवा स्वतंत्राता आंदोलन के क्षेत्रा में शुक्रतारे की भाँति अपनी चमक दिखाने वाले व्यक्तित्व का नाम था महादेव भाई देसाई। महादेव भाई देसाई का गांधी जी से संर्पक सन 1917 में हुआ। इनकी इतनी ख्याति फैली कि देश के कोने-कोने में इनके गुणों की चर्चा होने लगी।

महादेव देसाई को संक्षेप में एम. डी. कहा जाने लगा। गांधी की प्रेम की छाँव में रहने के कारण एक दिन ऐसा भी आया कि एम.डी. सबके लाड़ले बन गए। भारत में उनके अक्षरों का कोई सानी नहीं था। वाइसराय के नाम जाने वाले गांधी जी के पत्रा हमेशा महादेव भाई देसाई की लिखावट में ही जाते थे। उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय लंबी साँस-उसाँस लेते रहते थे। बड़े-बड़े सिविलियन और गवर्नर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखनेवाला खोजने पर भी नहीं मिलता। उनका शुद्ध और सुंदर लेखन पढ़ने वाले को मंत्रा-मुग्ध कर देता था। लेखक कहते हैं “प्रथम-श्रेणी की शिष्ट, संस्कार-संपन्न भाषा और मनोहारी लेखन-शैली की ईश्वरीय देन महादेव जी को मिली थी।”

महादेव भाई देसाई का आदर्श जीवन हमारे लिए अनुकरणीय है। लेखक ने महादेव भाई देसाई के व्यक्तित्व को शब्दबद्ध कर कहा है उनकी निर्मल प्रतिभा उनके संपर्वफ में आने वाले व्यक्ति को चंद्र-शुक्र की प्रभा के साथ दूधों नहला देती थी। उसमें सराबोर होने वाले के मन में उनकी इस मोहिनी का नशा कई-कई दिन तक उतरता न था। महादेव का समूचा जीवन और उनके सारे कामकाज गांधी जी के साथ एक रूप होकर इस तरह गुँथ गए थे कि गांधी जी से अलग करके अकेले उनकी कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती। यह पाठ एक ऐसे व्यक्ति के जीवन-परिचय के लिए तैयार किया गया है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण होते हुए भी गुमनाम रहा, अतः ऐसे चरित्रा को सर्वसमक्ष उजागर करने की अपेक्षा को लेखक ने निश्चित रूप से पूरा किया है।

लेखक परिचय

स्वामी आनंद
इनका जन्म गुजरात के कठियावाड़ जिले के किमड़ी गाँव में सन 1887 को हुआ। इनका मूल नाम हिम्मतलाल था। जब ये दस साल के थे तभी कुछ साधु इन्हें अपने साथ हिमालय की ओर ले गए और इनका नामकरण किया – स्वामी आनंद। १९०७ में स्वामी आनंद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1917 में गाँधे जी के संसर्ग में आने के बाद उन्हीं के निदेशन में ‘ नवजीवन’ और ‘ यंग इंडिया ’ के प्रसार व्यवस्था संभाल ली। इसी बहाने उन्हें गाँधी जी और उनके निजी सहयोगी महादेव भाई देसाई और बाद में प्यारेलाल जी को निकट से जानने का अवसर मिला।

कठिन शब्दों के अर्थ

  • नक्षत्र-मंडल – तारा समूह
  • कलगी रूप – तेज़ चमकने वाला तारा 
  • हम्माल – कुली 
  • पीर – महात्मा
  • बावर्ची – रसोइया 
  • भिश्ती – मसक से पानी ढोने वाला व्यक्ति 
  • खर – गधा
  • आसेतुहिमाचल – सेतुबंध रामेश्वर से हिमाचल तक विस्तीर्ण
  • ब्योरा – विवरण
  • रूबरू – आमने-सामने 
  • धुरंधर – प्रवीण
  • कट्टर – दॄढ़ 
  • चौकसाई – नजर रखना
  • पेशा – व्यवसाय 
  • स्याह – काला
  • सल्तनत – राज्य 
  • अद्यतन – अब तक का
  • गाद – तलछट 
  • सानी – उसी जोड़ का दूसरा
  • अनायास – बिना किसी प्रयास के

04. वैज्ञानिक चेतना के वाहक : चन्द्र शेखर वेंकटरमन – पाठ का सार

पाठ का सार

भारत के महान वैज्ञानिक डाॅ. रामन् के विषय में सबसे पहले सन् 1921 की बात सामने आती है, जब वे एक समुद्री यात्रा पर थे और समुद्र का पानी नीला क्यों होता है, इसकी खोज कर बैठे। यह काम पूरा करते ही रामन् विश्वविख्यात हो गए। 7 नवंबर सन् 1888 में जन्मे रामन् गणित और भौतिकी विषयों के कारण जगत-प्रसिद्ध हुए, जिसका श्रेय उनके पिता को जाता है। रामन् का मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने काॅलेज के जमाने से ही उन्होंने शोध कार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था।

उनका पहला शोधपत्रा फिलाॅसाॅफिकल मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ था। रामन् सर्वप्रथम भारत सरकार के वित्त-विभाग में अफसर बने। उनका कार्यक्षेत्रा कलकत्ता (कोलकाता) रहा। नौकरी करते हुए उन्होंने कलकत्ता की प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था ‘इंडियन एसोसिएशन फाॅर द कल्टीवेशन आॅफ साइंस’ के जरिए शोधकार्य चालू रखा। इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना था। रामन् ने सरकारी नौकरी छोड़कर विश्वविद्यालय में भी नौकरी की। रामन् की खोज भौतिकी के क्षेत्रा में एक क्रांति के समान थी। इसका पहला परिणाम तो यह हुआ कि प्रकाश की प्रकृति के बारे में आइंस्टाइन के विचारों का प्रायोगिक प्रमाण मिल गया। रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज हो

गया। पहले इस काम के लिए इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाता था। यह मुश्किल तकनीक है और इसमें गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थ की आणविक और परमाणविक संरचना के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। रामन् प्रभाव की खोज ने उनको विश्व की चोटी के वैज्ञानिकों की पंक्ति में ला खड़ा किया।

भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अक्षुण्ण रखा। रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र-लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति समर्पित थे। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने ‘करेंट साइंस’ नामक एक पत्रिका का भी संपादन किया।

रामन् वज्ञैानिक चेतना की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने प्रकाश की किरणों की आभा के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी चीज़ें हैं जो अपने पात्रा की तलाश में हैं। शरूरत है, रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और
प्रकृति के बीच छिपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने की।

लेखक परिचय  

धीरंजन मालवे

इनका जन्म बिहार के नालंदा जिले के डुंवरावाँ गाँव में 9 मार्च 1952 को हुआ। ये एम.एससी (सांख्यिकी), एम. बी.ए और एल.एल.बी हैं। वे आज भी वैज्ञानिक जानकारी को आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। मालवे ने कई भरतीय वैज्ञानिकों की संक्षिप्त जीवनियाँ लिखी हैं, जो इनकी पुस्तक ‘विश्व-विख्यात भारतीय वैज्ञानिक’ पुस्तक में समाहित हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. आभा – चमक
  2. जिज्ञासा – जानने के इच्छा
  3. हासिल – प्राप्त
  4. अयिशयोक्ति – किसी बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहना 
  5. रूझान – झुकाव
  6. असंख्य – अनगिनत
  7. उपकरण – साधन
  8. सृजित – रचा हुआ
  9. समक्ष – सामने 
  10. अध्यापन – पढ़ाना
  11. परिणति – परिणाम 
  12. ऊर्जा – शक्ति
  13. फोटॉन – प्रकाश का अंश
  14. नील वर्णीय – नीले रंग का
  15. ठोस रवे – बिल्लौर 
  16. एकवर्णीय – एक रंग का
  17. समृद्ध – उन्नतशील 
  18. भ्रांति – संदेह

प्रश्न उत्तर

03. तुम कब जाओगे, अतिथि – पाठ का सार

पाठ का सार

लेखक के घर एक अतिथि आए। अतिथि के सत्कार में लेखक और उनकी पत्नी की ओर से कोई कमी नहीं की गई। इस उम्मीद से कि अतिथि आते ही हैं शीघ्र जाने के लिए। लेकिन अतिथि जा नहीं रहे हैं। लेखक को अब शंका हो रही है कि अतिथि न जाने कितने दिन ठहरेंगे। लेखक अतिथि के कुछ दिन टिकने और स्थायी होने की आशंका से डर ही रहे थे कि अतिथि ने और अधिक ठहरने का संकेत दिया। अतिथि ने कपड़े गंदे होने की बात कही और उसकी धुलाई के लिए धोबी की चर्चा की। लेखक तिलमिला तेा गए लेकिन लाण्ड्री से कपडे़ धुलाकर घर ला देना उचित समझा। लेकिन अब भी अतिथि चले जाएँगे, इसकी कोई गारंटी न थी। लेखक आरै उनकी पत्नी अतिथि से परेशान हो चुके थे।


कल तक जिस अतिथि के प्रति यह भाव था कि अतिथि देवतुल्य होते हैं, अब यह स्थिति हो गई वही कि अतिथि राक्षस प्रतीत होने लगे। इस व्यंग्य के माध्यय से लेखक ने आज के अतिथियों की निर्लज्जता को स्पष्ट किया है। प्रतिष्ठा माँगने से नहीं मिलती बल्कि जब प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसा आचरण किया जाता है तब उस व्यवहार से मुग्ध होकर अन्य लोग स्वयं ही उस व्यक्ति को प्रतिष्ठा देते हैं।

लेखक ने यह भी दिखाया है कि अल्प अवधि तक के अतिथि शानदार आतिथ्य के भागीदार होते हैं, लेकिन दीर्घकाल तक आतिथ्य का सुख-भोग करने का जिनका इरादा होता है वैसे अतिथि मेजबान के द्वारा अपमानित भी होते हैं। लेखक ने एक और बात स्पष्ट कर दी है कि दूसरों के घर में रहकर सत्कार पाना सबको अच्छा लगता है। इसका यह अर्थ नहीं कि सभी अपना घर छोड़कर दूसरे के घर ही रहना आरम्भ कर दें। 

लेखक ने यह भी बताया है कि इज्जत मिलने का यह मतलब नहीं कि इज्जत जहाँ मिले, वहाँ और सिर चढ़ जाए। इज्जत माँगने से नहीं मिलती है। अगर अतिथि बिना माँगे इज्जत चाहते हैं तो उन्हें यह सावधानी बरतनी होगी कि अल्प समय में ही किसी का दरवाशा छोड़ दें । अतिथि द्वारा फूहड़ आचरण किए जाने का दुष्परिणाम एक दिन यह भी हो सकता है कि मेज़बान द्वारा उन्हें ‘गेट आउट’ भी कह दिया जा सकता है। यह व्यंग्य-रचना सही मायने में मेहमान और मेज़बान की संयुक्त आचार संहिता है।

लेखक परिचय

शरद जोशी

इनका जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में 21 मई 1931 को हुआ। इनका बचपन कई शहरों में बिता। कुछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे फिर इन्होने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इन्होंने व्यंग्य लेख , व्यंग्य उपन्यास , व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। सन  1991 में इनका देहांत हो गया।

प्रमुख कार्य

  •  व्यंग्य-कृतियाँ – परिक्रमा , किसी महाने , जीप पर सवार इल्लियाँ , तिलस्म , रहा किनारे बैठ , दूसरी सतह , प्रतिदिन।
  • व्यंग्य नाटक: अंधों का हाथी और एक था गधा।
  • उपन्यास – मैं,मैं,केवल मैं, उर्फ़ कमलमुख बी.ए.।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. निस्संकोच – बिना संकोच के
  2. सतत – लगातार
  3. आतिथ्य – आवभगत
  4. अंतरंग – घनिष्ठ या गहरा
  5. छोर – किनारा 
  6. आघात – चोट 
  7. मार्मिक – हृदय को छूने वाला
  8. भावभीनी – प्रेम से ओतप्रोत 
  9. अप्रत्याशित – आकस्मिक
  10. सामीप्य – निकटता
  11. कोनलों – कोनों से 
  12. ऊष्मा – गरमी 
  13. संक्रमण – एक स्थिति या अवस्था से दूसरी में प्रवेश 
  14. निर्मूल – मूल रहित 
  15. सौहार्द – मैत्री 
  16. गुँजायमान – गूँजता हुआ 
  17. एस्ट्रॉनाट्‍स – अंतरिक्ष यात्री

प्रश्न उत्तर

02. एवरेस्ट: मेरी शिखर यात्रा – पाठ का सार

पाठ का सार

प्रस्तुत लेख में बचेंद्री पाल ने अपने अभियान का रोमांचकारी वर्णन किया है कि 7 मार्च को एवरेस्ट अभियान दल दिल्ली से काठमांडू के लिए चला। नमचे बाज़ार से लेखिका ने एवरेस्ट को निहारा। लेखिका ने एवरेस्ट पर एक बड़ा भारी बर्फ़ का फूल देखा। यह तेज़ हवा के कारण बनता है। 26 मार्च को अभियान दल पैरिच पहुँचा तो पता चला कि खुंभु हिमपात पर जाने वाले शेरपा कुलियों में से बर्फ़ खिसकने के कारन एक कुली की मॄत्यु हो गई और चार लोग घायल हो गए। बेस कैंप पहुँचकर पता चला कि प्रतिकूल जलवायु के कारण एक रसोई सहायक की मृत्यु हो गई है। फिर दल को ज़रुरी प्रशिक्षण दिया गया। 29 अप्रैल को वे 7900 मीटर ऊँचाई पर स्थित बेस कैंप पहुँचे जहाँ तेनजिंग ने लेखिका का हौसला बढ़ाया। 15-16 मई, 1984 को अचानक रात 12:30 बजे कैंप पर ग्लेशियर टूट पड़ा जिससे कैंप तहस-नहस हो गया , हर व्यक्‍ति चोट-ग्रस्त हुआ। लेखिका बर्फ़ में दब गई थी। उन्हें बर्फ़ से निकाला गया।

 फिर कुछ दिनों बाद लेखिका साउथकोल कैंप पहुँची। वहाँ उन्होंने पीछे आने वाले साथियों की मदद करके सबको खुश कर दिया। अगले दिन वह प्रात: ही अंगदोरज़ी के साथ शिखर – यात्रा पर निकली। अथक परिश्रम के बाद वे शिखर – कैंप पहुँचे। एक और साथी ल्हाटू के आ जाने से और ऑक्सीजन आपूर्ति बढ़ जाने से चढ़ाई आसान हो गई। 23 मई , 1984 को दोपहर 1:07 बजे लेखिका एवरेस्ट की चोटी पर खड़ी थी। वह एवरेस्त पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला थी। चोटी पर दो व्यक्तियों के साथ खड़े होने की ज़गह नहीं थी, उन्होंने बर्फ के फावड़े से बर्फ की खुदाई कर अपने आप को सुरक्षित किया। लेखिका ने घुटनों के बल बैठकर ‘सागरमाथे’ के ताज को चूमा। फिर दुर्गा माँ तथा हनुमान चालीसा को कपडे में लपेटकर बर्फ़ में दबा दिया। अंगदोरज़ी ने उन्हें गले से लगकर बधाई दी। कर्नल खुल्लर ने उन्हें बधाई देते हुए कहा – मैं तुम्हरे मात-पिता को बधाई देना चाहूँगा। देश को तुम पर गर्व है। अब तुम जो नीचे आओगी , तो तुम्हें एक नया संसार देखने को मिलेगा।

लेखक परिचय  

बचेंद्री पाल

इनका जन्म सन 24 मई, 1954 को उत्तरांचल के चमोली जिले के बमपा गाँव में हुआ। पिता पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते थे। अत: बचेंद्री को आठवीं से आगे की पढ़ाई का खर्च सिलाई-कढ़ाई करके जुटाना पड़ा। 

विषम परिस्थितियों के बावज़ूद बचेंद्री ने संस्कृत में एम.ए. और फिर बी. एड. की शिक्षा हासिल की। बचेंद्री को पहाद़्ओं पर चढ़ने शौक़ बचपन से था। पढ़ाई पूरी करके वह एवरेस्ट अभियान – दल में शामिल हो गईं। कई महीनों के अभ्यास के बाद आखिर वह दिन आ ही गया , जब उन्होंने एवरेस्ट विजय के लिए प्रयाण किया।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. दुर्गम – जहाँ जाना कठिन हो
  2. ध्वज – झंडा
  3. हिम-स्खलन – बर्फ़ का गिरना 
  4. नेतॄत्व – अगुवाई 
  5. अवसाद – निराशा
  6. ज़ायजा लेना – अनुमान लेना
  7. हिम-विदर – बर्फ़ में दरार पड़ना 
  8. अंतत: – आखिरकार
  9. हिमपुंज – बर्फ़ का समूह
  10. उपस्कर – आरोही की आवश्यक सामग्री
  11. भुरभुरी – चूरा-चूरा टूटने वाली 
  12. शंकु – नोक
  13. रज्जु – रस्सी

01. दुःख का अधिकार – पाठ का सार

लेखक परिचय

इस पाठ के लेखक यशपाल जी है। इनका जन्म फ़िरोज़पुर छावनी में सन 1903 में हुआ। इन्होंने आरंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूल में और उच्च शिक्षा लाहौर में पाई। वे विद्यार्थी काल से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए थे। अमर शहीद भगत सिंह आदि के साथ मिलकर इन्होंने भारतीय आंदोलन में भाग लिया। सन 1976 में इनका देहांत हो गया। इस पाठ में लेखक समाज में होने वाले उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के भेदभाव को दर्शा रहा है। यहाँ लेखक अपने एक अनुभव को साँझा करते हुए कहता है कि दुःख मनाने का अधिकार सभी को होता है फिर चाहे वह समाज के किसी भी वर्ग का हो।

पाठ का सार

लेखक ने कहा है कि मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्राय: पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्ज़ा निश्चित करती है। हम जब झुककर निचली श्रेणियों की अनुभूति को समझना चाहते हैं तो यह पोशाक ही बंधन और अड़चन बन जाती है।

बाज़ार में खरबूजे बेचने आई एक औरत कपड़े में मुँह छिपाए सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रो रही थी। पड़ोस के लोग उसे घृणा की नज़रों से देखते हैं और उसे बुरा-भला कहते हैं। पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर पता चलता है कि उसका तेईस बरस का लड़का परसों सुबह साँप के डसने से मर गया था। जो कुछ घर में था , सब उसे विदा करने में चला गया था। घर में उसकी बहू और पोते भूख से बिल-बिला रहे थे। इसलिए वह बेबस होकर खरबूज़े बेचने आई थी ताकि उन्हें कुछ खिला सके ; परंतु सब उसकी निंदा कर रहे थे , इसलिए वह रो रही थी।

लेखक उसके दुख की तुलना अपने पड़ोस की एक संभ्रांत महिला के दुख से करने लगता है, जिसके दुख से शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र-शोक से द्रवित हो उठे थे। लेखक सोचता चला जा रहा था कि शोक करने, ग़म मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और दु:खी होने का भी एक अधिकार होता है।

संदेश 

गद्य लेखन का मुख्य उद्देश्य भाषा को प्रभावपूर्ण और संप्रेषणीय बनाना है। लेखक अपनी रचनाओं में विविध भाषा प्रयोगों का उपयोग करके इसे सजीव और रोचक बनाता है। गद्य पाठों का पठन-पाठन विद्यार्थियों की लिखित और मौखिक अभिव्यक्ति को बेहतर बनाता है और उन्हें हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न करता है।

कठिन शब्दों के अर्थ

  • अनुभूति – एहसास
  • अधेड़ – ढलती उम्र का 
  • व्यथा – पीड़ा
  • व्यवधान – रुकावत
  • बेहया – बेशर्म
  • नीयत – इरादा
  • बरकत – वृद्धि
  • ख़सम – पति 
  • लुगाई – पत्नी
  • सूतक – छूत
  • कछियारी – खेतों में तरकारियाँ बोना
  • निर्वाह – गुज़ारा
  • मेड़ – खेत के चारों ओर मिट्टी का घेरा
  • तरावत – गीलापन
  • ओझा – झाड़-फूँक करने वाला 
  • छन्नी-ककना – मामूली गहना
  • सहूलियत – सुविधा

10. खुशबू रचते हैं हाथ… – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तरः इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य समाज के उपेक्षित मजदूर वर्ग की दयनीय दशा की ओर ध्यान आकर्षित करना है। कवि का उद्देश्य यह है कि जो समाज हमारे लिए सुन्दर-सुन्दर वस्तुओं का निर्माण करती है वो स्वयं इस प्रकार का उपेक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर क्यों है? इस कविता के द्वारा कवि श्रमिकों की इसी दयनीय दशा को सुधारना चाहता है। वह चाहता है कि इनके रहने की दशा को स्वास्थ्यप्रद बनाया जाए। इनके गली-मोहल्ले की उचित साफ़-सफ़ाई का प्रबंध किया जाए। साथ ही इन्हें इनके काम के लिए इतनीमज़दूरी तो मिलनी ही चाहिए जिससे वे ठीक प्रकार रह सकें।

प्रश्न 2. ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ कविता में कवि ने समाज की किस विसंगति पर कटाक्ष किया है ?

उत्तरः ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ कविता ने समाज के निर्माण में योगदान करने वाले लोगों के साथ होने वाले उपेक्षा भाव को बेनकाब किया है। जो वर्ग समाज में सौंदर्य की सृष्टि कर रहा है और उसे खुशहाल बना रहा है, वही वर्ग अभाव में, गंदगी में जीवन बसर कर रहा है। लोगों के जीवन में सुगंध बिखेरने वाले हाथ भयावह स्थितियों में अपना जीवन बिताने पर मजबूर हैं। खुशबू रचने वाले हाथ सबसे गंदे और बदबूदार इलाकों में जीवन बिता रहे हैं-यह कैसी सामाजिक विषमता एवं विडम्बना है।

प्रश्न 3. ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तरः इस कविता का प्रतिपाद्य है-श्रमिकों की दीन-हीन दशा की ओर समाज का ध्यान आकर्षित कराना। कवि उनके रहने और काम करने की विषम परिस्थितियों की ओर हमारा ध्यान दिलाता है। दूसरों की जिंदगी में खुशबू फैलाने वाले लोग स्वयं दुर्गन्धमय वातावरण में जीते हैं। वे नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं। ये कूड़े-करकट के ढेरों के इर्द-गिर्द रहते हैं। इनके जीवन में गंदगी-ही-गंदगी है, पर ये सुगंधित अगरबत्तियाँ बनाते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम इनके रहने की स्थितियों में अपेक्षित सुधार लाएँ।

प्रश्न 4ः निम्नलिखित काव्यांश में निहित काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए-
पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ
जूही की डाल -से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे-पिटे हाथ
जख्म से फटे हुए हाथ
उत्तरः इन काव्य-पंक्तियों में अगरबत्ती बनाने वाले विभिन्न लोगों के बारे में हाथों के माध्यम से बताया गया है। इनमें कुछ नए बालक भी शामिल हैं। इन बालकों के हाथों को पीपल के नए पत्तों के समान कोमल बताया गया है। इन बच्चों के हाथ जुही की डाल की सुगंध लिए हुए होते हैं पर कुछ दिनों में काम करते-करते ये हाथ कट-फट जाते है तथा जख्मी तक हो जाते है। बालकों के साथ हो रहे अन्याय का मार्मिक चित्रण है। हाथ की उपमा पीपल के पत्ते से दी गई है अतः उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है। जूही डाल से खुशबूदार हाथ में उपमा अलंकार है। भाषा सरल, सजीव है।

10. नए इलाके में… – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. कवि ने इस कविता में ‘समय की कमी’ की ओर क्यों इशारा किया है ?
उत्तरः
 कवि ने इस कविता में ‘समय की कमी’ की ओर इशारा किया है। लोग हरदम कुछ-न-कुछ करने, बनाने और रचने की जुगाड़ में लगे रहते हैं। इस अन्धी प्रगति में उनकी पहचान खो गई है। वे स्वयं को भूल गए है। इस कारण उनके भीतर एक डर समा गया है कि कहीं वे अकेले तो नहीं रह गये है। क्यों कोई उन्हें पहचानने वाला मिल पायेगा या नहीं। पुरानी स्मृतियों को सोचने के लिए वह समय की कमी महसूस कर रहा है।

प्रश्न 2. इस कविता में कवि ने शहरों की किस विडम्बना की ओर संकेत किया है ?
उत्तरः
 इस कविता में कवि ने शहरों की इस विडम्बना की ओर संकेत किया है कि वहाँ के लोगों के पास समय का सदा अभाव रहता है। वहाँ कोई किसी से जान-पहचान रखना नहीं चाहता। दरवाजा खटखटाने पर भी कोई किसी की सहायता करने को तैयार नहीं होता। वहाँ अब पूर्व परिचितों का अकाल-सा पड़ गया है। वहाँ सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते हैं। शहरों में पड़ोसी-पड़ोसी को नहीं पहचानता। न उनमें कोई पे्रेम भावना तथा स्नेह होता है।

प्रश्न 3. ‘वसंत का गया पतझड़ को लौटा’ और ‘वैसाख का गया भादौ को लौटा’ से कवि का क्या अभिप्राय है ?
उत्तरः ‘वसंत का गया पतझड़ को लौटा’ और ‘बैसाख का गया भादौ को लौटा’ का अभिप्राय है कुछ ही समय में एकाएक परिवर्तन हो गया है। आने और जाने के समय में ही अद्भुत परिवर्तन हो गया है। पुरानी जगहें नया रूप ले चुकी हैं और पुरानी पहचान गायब हो चुकी है कवि को अपने घर ठिकाने की ठीक से पहचान नहीं है।

प्रश्न 4. व्याख्या कीजिए-
(क)यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
उत्तरः कवि परिवर्तन के दौर की विशेषता का उल्लेख करते हुए कहता है कि अब जीवन को स्मृति के सहारे नहीं जिया जा सकता। अब वह कई बार धोखा दे जाती है। यह दुनिया रोज नए रंग बदलती है। यह एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।
(ख) समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास

शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर

उत्तरः व्यक्ति के पास समय का अभाव है। नई परिस्थितियों में सभी काम में व्यस्त हैं। रोज नए परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे बदलते वातावरण में भी आशा की एक किरण अवश्य रहती है कि सम्भवतः कोई ऊपर से देखकर पहचान कर पुकार ले।

09. अग्नि पथ – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. ‘अग्निपथ’ कविता में ‘अग्निपथ’ किसे कहा गया है और क्यों? लिखिए।

उत्तरः 

  • संघर्षरत जीवन को।
  • जीवन में अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
  • सुविधारूपी प्रलोभन राह में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • सुखों में डूबकर, परिश्रम न करने से हम अपनी मंजिल से दूर हो जाते हैं।

व्याख्यात्मक हल:
‘अग्निपथ’ से कवि का आशय कठिन संघर्षमय जीवन से है, जीवन किसी आग रूपी मार्ग अर्थात् ‘अग्निपथ’ से कम नहीं है। जीवनरूपी मार्ग में आयी तरह-तरह की बाधाएँ और रूकावटें मनुष्य को रोकने का प्रयास करती है। लेकिन मनुष्य को बाधाओं से हार मानकर न तो थकना है और न ही सुविधा रूपी प्रलोभनों के माया जाल में फंस कर रूकना है, उसे बिना थके और बिना रुके सतत् रूप से परिश्रम करते रहना है, तभी वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पायेगा।

प्रश्न 2. ‘अग्निपथ’ कविता में कवि ने मनुष्य को कौन-सा शपथ लेने को प्रेरित किया है और क्यों? लिखिए।

उत्तरः 

  • वह जीवन-पथ पर संघर्षों से थकेगा नहीं।
  • विश्राम के लिए रुकेगा नहीं।
  • क्योंकि थकने का अर्थ है कि हार मान लेना, जो कवि नहीं चाहता। अधिकतर लोग कठिनाइयों से घबरा जाते हैं।
  • रुकने का अर्थ है सुविधाओं के प्रलोभन से अपने लक्ष्य को भुला देना। लक्ष्य पर पहुँचने से पहले रास्ता छोड़ देते हैं।

व्याख्यात्मक हल:

कवि कहता है कि जीवन रूपी संघर्षमयी पथ पर चलते हुए मनुष्य का कठिनाइयों से घबराकर हार मानकर थकना नहीं है और न ही मार्ग की कठिनाइयों के बीच मिली सुविधाओं के मोहजाल में फंसकर अपने लक्ष्य को भुलाकर रुक जाना है। अपने लक्ष्य पर पहुँचने से पहले वह न तो विश्राम करेगा। और न ही पीछे मुड़कर देखेगा। यही शपथ लेने के लिए कवि पथिक को प्रेरित करता है।

प्रश्न 3. ‘अग्निपथ’ कविता में ‘अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ’ मनुष्य के जीवन के जीवन को एक महान दृश्य बताकर हमें क्या सन्देश दिया गया है? स्पष्टकीजिए।
उत्तरः जीवन-पथ अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से भरा।
लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए परिश्रम आवश्यक है।
राह में विभिन्न घटनाओं का सामना करना पड़ेगा।
जीवन में आँसू, पसीना और रक्त भी बहाना पड़ सकता है। पर हमें आगे ही बढ़ते जाना है।
व्याख्यात्मक हल:
कवि कहता है कि जीवन पथ अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रकार की परिस्थितियों से भरा हुआ है। यह संसार अग्नि से पूर्ण मार्ग के समान कठिन है और इस कठिन मार्ग का सबसे सुन्दर दृश्य कवि के अनुसार कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ना है। संघर्ष-पथ पर चलने पर उसकी (मनुष्य की) आँखों से आँसू बहते हैं, शरीर से पसीना निकलता है और खून बहता है, फिर भी वह इन सब की परवाह किए बिना निरन्तर परिश्रम करते हुए संघर्ष-पथ पर बढ़ता जाता है।

प्रश्न 4. ‘अग्निपथ’ कविता के आधार पर लिखिए कि क्या घने वृ़क्ष भी हमारे मार्ग की बाधा बन सकते हैं ?
उत्तरः अग्निपथ कविता में संघर्षमय जीवन को अग्निपथ कहा गया है और सुख-सुविधाओं को घने वृक्षों की छाया। कभी-कभी जीवन में मिलने वाली सुख-सुविधाएँ (घने वृक्षों की छाया) व्यक्ति को अकर्मण्य बना देती है और वे सफलता के मार्ग में बाधा बन जाते हैं इसीलिए कवि जीवन को अग्नि पथ कहता है। घने वृक्षों की छाया की आदत हमें आलसी बनाकर सफलता से दूर कर देती है।

प्रश्न 5. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए-

(क) चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ।

उत्तरः इन पंक्तियों का भाव यह है कि मनुष्य का आगे की ओर चले जाना ही अपने आप में एक विशेष बात हैं। संघर्ष-पथ पर चलने में व्यक्ति को कई बार आँसू बहाने पड़ते हैं। थकने पर वह पसीने से तर-बतर हो जाता है और शक्ति का व्यय करना भी पड़ता है। वह लथपथ हो जाता है। इस स्थिति से न घबराकर निरंतर आगे बढ़ते जाना ही जीवन का लक्ष्य है।

(ख) यह महान दृश्य है
चल रहा है मनुष्य
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

उत्तरः कवि कहता है कि हे मनुष्य यह संसार अग्नि से पूर्ण मार्ग के समान कठिन है। इस कठिन मार्ग पर सबसे सुन्दर दृश्य यही हो सकता है कि मनुष्य कठिनाइयों का सामना करते हुए निरन्तर चल रहा है। कठिनाइयों का सामना करते हुए उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, शरीर से पसीना निकल रहा है और खून बह रहा है। फिर भी वह इनकी परवाह किए बिना निरन्तर संघर्ष-पथ पर बढ़ता जा रहा है। सामने कठिनाइयों से पूर्ण मार्ग है, फिर भी मनुष्य को चलते चले जाना है।

08. गीत – अगीत – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘गीत-अगीत’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि प्रेम की पहचान मुखरता में नहीं अपितु मौन भाव में है।
उत्तर:
 ‘गीत-अगीत’ कविता में कविवर श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने प्रेम के साहित्यिक पक्ष को अभिव्यक्ति प्रदान की है। कवि का मानना है कि प्रेम की पहचान मुखरता में नहीं अपितु प्रेम की पीड़ा को मौन भाव से पी जाने में है। इसे कवि ने नदी और गुलाब, शुक और शुकी तथा प्रेमी और प्रेमिका की निम्नलिखित तीन स्थितियों के माध्यम से स्पष्ट किया है –

  • नदी पहाड़ से नीचे उतरकर समुद्र की ओर तेजी से आगे बढ़ती हुई निरंतर विरह के गीत गाती है। वह किनारे या मध्य धारा में पड़े पत्थरों से दिल की पीड़ा कहकर अपना मन हल्का कर लेती है। लेकिन किनारे पर उगा हुआ एक गुलाब मन ही मन सोचता है कि भगवान यदि उसे भी वाणी प्रदान करता तो वह भी पतझड़ में मिलने वाली हताशा और दुख प्रकट कर पाता। वह भी संसार को बताता कि विरह की पीड़ा कितनी दुखमय है, पर वह ऐसा कर नहीं पाता। नदी तो गा-गाकर विरह भावना को व्यक्त करती हुई बह रही है पर गुलाब किनारे पर चुपचाप खड़ा है।
  • एक तोता किसी पेड़ की उस घनी शाखा पर बैठा है जो नीचे की शाखा को छाया दे रहा है जिस पर उसका घोंसला है घोंसले में तोती पंख फुला कर मौन भाव से बैठी है। वह मातृत्व भाव से भरी हुई है और अपने अंडों को सेने का कार्य कर रही है। सूर्य के निकलने के बाद सुनहरी वसंती किरणें जब पत्तों से छन-छनकर नीचे आती हैं तो तोता प्रसन्नता से भरकर मधुर गीत गाता है, किंतु तोती मौन है। उसके गीत मन में उमड़कर भी बाहर नहीं आते। वह तो अपने उत्पन्न होने वाले बच्चों के प्रेम में मग्न है। तोते का स्वर तो सारे जंगल में गूँज रहा है, वह अपने प्रसन्नता के भावों को प्रकट कर रहा है पर तोती अपने पंख फुला कर मातृत्व के सुखद भावों में डूबी है।
  • शाम के समय प्रेमी आल्हा की कथा को रसमय ढंग से गाता है। उसकी आवाज़ सुनते ही उसकी प्रेमिका स्वयं ही खिंची चली आती है – वह घर में नहीं रह पाती। वह प्रेमी के सामने यह सोचकर नहीं जाती कि कहीं उसका प्रेमी गीत गाना बंद न कर दे। वह वहीं एक नीम के पेड़ के नीचे चोरी-चोरी छिपकर गीत सुनती रहती है और मन में सोचती है कि हे ईश्वर ! मैं भी अपने प्रेमी के गीत की एक कड़ी क्यों न बन गई? प्रेमी उच्च स्वर में गीत गा रहा है पर प्रेमिका का हृदय मूक प्रसन्नता से भरता जा रहा है।
    इन तीनों स्थितियों में नदी, शुक और प्रेम मुखरित हैं किंतु गुलाब, शुकी और प्रेमिका अपने प्रेम को व्यक्त नहीं करते हैं किंतु मन-ही-मन प्रेम का आस्वादन करते हैं। इनका प्रेम भी नदी, शुक और प्रेमी से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इनका यह मौन भाव ही इनके सात्विक प्रेम की पहचान है। इसलिए स्पष्ट है कि सच्चा प्रेम मुखरता में नहीं बल्कि मौन भाव में होता है।


प्रश्न 2: नदी अपने हृदय की पीड़ा को कैसे कम करती है और उसके विरह के गीत कौन सुनता है ?
उत्तर: 
नदी अपने हृदय की पीड़ा को कम करने के लिए पहाड़ से नीचे उतरते हुए तेज़ी से आगे बढ़ते हुए विरह के गीत गाती है। अपनी विरह – पीड़ा की कथा कल-कल ध्वनि से सुनाती है। उसकी विरह कथा किनारे या मध्य पड़े पत्थर सुनते हैं। इस तरह नदी अपनी बात कह कर अपना मन हल्का कर लेती है।

प्रश्न 3: नदी को अपनी पीड़ा व्यक्त करते देख गुलाब का फूल क्या सोच रहा है ?
उत्तर:
 नदी को अपनी पीड़ा व्यक्त करते देख गुलाब सोचता है कि यदि भगवान ने उसे भी वाणी दी होती तो वह भी की कहानी सुनाता। वह भी संसार को बताता कि पतझड़ आने पर वह कैसे निराश और दुखी हो जाता है

प्रश्न 4: शुक अपना प्यार कैसे व्यक्त करता है ?
उत्तर: 
शुक अपने परिवार के साथ पेड़ की शाखा पर बने घोंसले में रहता है। शुकी घोंसले में अंडों को सेने का काम करती है। वह मातृत्व के स्नेह में डूबी हुई है। शुक सूर्य निकलने के बाद सुनहरी वसंती किरणें जब पत्तों से छनकर उसकी ओर आती हैं तो वह प्रसन्नता से भर जाता है और मधुर गीत गाने लगता है। इस प्रकार वह अपना प्रेम प्रकट करता है।

प्रश्न 5: शुकी, शुक के प्रेम-भरे गीत सुनकर भी बाहर क्यों नहीं आती है ?
उत्तर: शुकी घोंसले में अपने पंख फैलाकर अपने अंडे सेने का काम कर रही है। वह मातृत्व स्नेह से भरी हुई है। उसे शुक के प्रेम-भरे गीत सुनाई दे रहे हैं। परंतु उसके गीत मन में उमड़कर भी बाहर नहीं आते। शुकी अपने उत्पन्न होने वाले बच्चों के प्रेम में सिक्त है। वह शुक का प्रेम-गीत सुन रही है, परंतु उसका प्रेम मौन रूप धारण किए हुए है। वह अपना प्रेम प्रकट नहीं करती है क्योंकि वह मातृत्व के सुखद भावों में डूबी हुई है।

07. दोहे – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. प्रेम का धागा टूटने पर पहले की भाँति क्यों नहीं हो पाता?
उत्तरः प्रेम का धागा विश्वास से बँधा होता है। जब यह धागा टूट जाता है, तो मन में एक गाँठ पड़ जाती है और पहले की तरह प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहीं बन पाते। अर्थात्, जब विश्वास खत्म हो जाता है, तो मन को फिर से नहीं जोड़ा जा सकता। इसलिए, हमें सम्बन्धों की डोर से आपसी विश्वास को मजबूत बनाए रखना चाहिए। सम्बन्धों को जोड़ने में समय लगता है, परन्तु तोड़ना बहुत आसान होता है। अतः हमें सम्बन्धों को बड़ी नजाकत से निभाना चाहिए।


प्रश्न 2. रहीम के अनुसार कौन-सा जल स्त्रोत या साधन उपयोगी होता है?
उत्तरः
 रहीम के अनुसार, वही जल स्त्रोत या साधन मनुष्य के लिए उपयोगी होता है जो उसके काम आता है। सागर कितना भी बड़ा हो, वह किसी की प्यास नहीं बुझा सकता, इसलिए वह अनुपयोगी होता है। इसके विपरीत, कीचड़ का जल छोटे जीवों के काम आता है, इसलिए वह उपयोगी माना जाता है। इस प्रकार, महत्व उपयोगिता से होता है, विस्तार से नहीं।
व्याख्यात्मक हल:
रहीम के अनुसार किसी भी व्यक्ति या वस्तु की महत्ता उसके छोटे या बड़े होने के आधार पर तय नहीं होती बल्कि उसकी उपयोगिता के आधार पर होती है। जो हमारे लिए जितना अधिक उपयोगी होगा वह उतना ही महत्वपूर्ण माना जाएगा। जिस प्रकार सागर बहुत विशाल होता है लेकिन उसका पानी खारा होने के कारण किसी की प्यास नहीं बुझा सकता इसलिए वह हमारे लिए अनुपयोगी होता है। इसके विपरीत कीचड़ से युक्त जल पीकर छोटे-छोटे जीव अपनी प्यास बुझा सकते हैं। इसलिए सागर की अपेक्षा कीचड़ से युक्त जल श्रेष्ठ है।


प्रश्न 3. हमें अपने निर्धन मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। इस भाव के लिए रहीम ने कौन-सा उदाहरण दिया है?
अथवा
सूई तथा तलवार के उदाहरण द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहते हैं? 
अथवा
लघु वस्तु का तिरस्कार क्यों नहीं करना चाहिए? 
उत्तरः रहीम का मानना है कि प्रत्येक छोटी-बड़ी वस्तु की अपनी अलग-अलग उपयोगिता होती है, इसलिए वह कहते हैं कि कभी भी धनी मित्रों को पाकर निर्धन मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। इसके लिए रहीम सुई और तलवार का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जहाँ सुई का काम होता है, वहाँ तलवार व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार रहीम इस उदाहरण के माध्यम से समाज में सभी के सम्मान का संदेश देते हैं। सभी वस्तु भले ही वे छोटी ही क्यों न हों, उपयोगी होती हैं इसलिए छोटे व्यक्तियों या छोटी वस्तुओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।


प्रश्न 4. विपत्ति में हमारा सहायक कौन बनता है? रहीम के दोहों के आधार पर उत्तर दीजिए?
अथवा
रहीम ने जलहीन कमल का उदाहरण देकर क्या सिद्ध करना चाहता है? इससे हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तरः रहीम के अनुसार विपत्तियों में अपने ही साधन और संबंध काम आते हैं। उदाहरण के लिए सूखते हुए कमल को जल ही बचा सकता है। सूरज की ऊष्मा से नहीं कमल जल में से जन्म लेता है इसलिए वही उसका जीवन रक्षक होता है। यदि वही सूख गया तो फिर सब कुछ नष्ट हो जाता है। 
व्याख्यात्मक हल: रहीम दास जी कहते हैं कि जिसके पास अपना कुछ नहीं, दूसरे भी उसकी सहायता नहीं कर सकते। संसार में अपनी सम्पत्ति अपनी योग्यता के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः मुसीबत के समय अपने आत्मबल को बनाए रखना चाहिए। जिस तरह सूखते हुए कमल को जल ही बचा सकता है। जल ही जलज का जीवन है। सूरज की ऊष्मा नहीं। कमल जल में से जन्म लेता है। जल के न होने पर सूरज भी कमल को जीवन दान नहीं कर सकता।


प्रश्न 5. रहीम के दोहे के सन्दर्भ में पानी के तीन अर्थ स्पष्ट करते हुए तीनों के अलग-अलग प्रयोगों पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः (क) मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ है चमक। रहीम का कहना है कि चमक के बिना मोती का कोई मूल्य नहीं होता।
(ख) मनुष्य के संदर्भ में पानी का अर्थ है आत्मसम्मान। रहीम का कहना है कि आत्मसम्मान के बिना मनुष्य का कोई मूल्य नहीं होता।
(ग) चून के संदर्भ में पानी का महत्व सर्वोपरि है। बिना पानी के आटे से रोटी नहीं बनाई जा सकती है।व्याख्यात्मक हल:
रहिमन पानी राखिए, बिनुपानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।।
रहीम जी के अनुसार पानी के बिना सब सूना है। पानी के बिना मोती, मनुष्य तथा आटा किसी का भी महत्व नहीं रह जाता। मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ है- चमक। मोती की चमक न रहने पर उसका कोई मूल्य नहीं होता। मनुष्य के संदर्भ में पानी का अर्थ है- उसका आत्मसम्मान। आत्मसम्मान के बिना मनुष्य महत्वहीन हो जाता है। एक बार यदि कोई मनुष्य आत्मसम्मान गँवा देता है तो उसे पुनः प्राप्त करना सहज नहीं है। चून अर्थात् आटे के सन्दर्भ में पानी का महत्व सबसे अधिक है। बिना पानी के आटे से रोटी नहीं बनाई जा सकती है।